बालक भगवान् का अभिषेक किस आयु से कर सकता है? | Balak Bhagwan Ka Abhishek Kis Aayu Se Kar Sakta Hai

शंका: बालक भगवान् का अभिषेक किस आयु से कर सकता है?

कोई बालक भगवान् का अभिषेक 8 वर्ष पूर्ण होने पर कर सकता है, या 7 वर्ष पूर्ण होकर 8वाँ वर्ष प्रारम्भ होने पर कर सकता है?

और यह आयु गर्भ सहित गिनी जाती है या जन्म से?

कृपया आगम प्रमाण सहित समाधान बताएँ। :folded_hands:

समाधान (आगम प्रमाण सहित)

संक्षेप में: अभिषेक की न्यूनतम आयु बताने वाला कोई सीधा आगम वचन नहीं मिला। आठ वर्ष की सीमा आगम में उपनीति संस्कार और व्रत, संयम की योग्यता के प्रसंग में आती है। अधिकांश प्रमाणों में यह गिनती गर्भ से है, किन्तु धवला में एक स्थान पर जन्म से गिनती भी मिलती है। दोनों नीचे दिए हैं।


१. आदिपुराण: उपनीति क्रिया गर्भ से आठवें वर्ष में

क्रियोपनीतिर्नामास्य वर्षे गर्भाष्टमे मता ।
यत्रापनीतकेशस्य मौञ्जी सव्रतबन्धना ॥ १०४ ॥
कृतार्हत्पूजनस्यास्य मौञ्जीबन्धो जिनालये ।
गुरुसाक्षि विधातव्यो व्रतार्पणपुरस्सरम् ॥ १०५ ॥
(आदिपुराण, आचार्य जिनसेन, पर्व 38, श्लोक 104, 105)

अर्थ: गर्भ से आठवें वर्ष में बालक की उपनीति क्रिया होती है, जिसमें केशों का मुण्डन, व्रतबन्धन और मौञ्जीबन्धन होता है। जिसने अर्हन्त भगवान् की पूजा की है, ऐसे बालक का मौञ्जीबन्धन जिनालय में गुरु की साक्षी में, व्रत देकर करना चाहिए।

यहाँ जिनालय में अर्हन्त पूजा इसी संस्कार का अंग है।


२. धवला (षट्खण्डागम पुस्तक 13): गर्भ से अन्तर्मुहूर्त अधिक आठ वर्ष

गब्भादिअट्ठवस्साणमंतोमुहुत्तब्भहियाणमुवरि वेदगसम्मत्तं संजमं च जुगवं पडिवण्णो ।
(षट्खण्डागम, धवला टीका, पुस्तक 13, सूत्र 5,4,31, पृष्ठ 153)

अर्थ: गर्भ से लेकर अन्तर्मुहूर्त अधिक आठ वर्ष का होने पर वेदक सम्यक्त्व और संयम को एक साथ प्राप्त हुआ।


३. गोम्मटसार जीवकाण्ड: आठ वर्ष की गिनती गर्भ से

पूर्वकोटिवर्षायुर्मनुष्यो गर्भाद्यष्टवर्षचरमेऽन्तर्मुहूर्तषट्के अवशिष्टे … अष्टवर्षचरमसमये संयमं स्वीकृत्य …
(गोम्मटसार जीवकाण्ड, लेश्या मार्गणा, जीवतत्त्वप्रदीपिका टीका, भाग 2, पृष्ठ 781)

अर्थ: पूर्वकोटि आयु वाला मनुष्य, गर्भ से लेकर आठ वर्ष पूरे होने के अंतिम समय में संयम स्वीकार करके …


४. धवला (षट्खण्डागम पुस्तक 10): जन्म से आठ वर्ष, दूसरा पाठ

गब्भादो णिक्खंतपढमसमयप्पहुडि अट्ठवस्सेसु गदेसु संजमग्गहणपाओग्गो होदि ।
(धवला टीका, षट्खण्डागम पुस्तक 10, सूत्र 4,2,4,59, पृष्ठ 278; उद्धृत: जैनपरम्परा और यापनीयसंघ, खण्ड 3, पृष्ठ 206)

अर्थ: गर्भ से निकलने (जन्म) के प्रथम समय से लेकर आठ वर्ष बीत जाने पर जीव संयम ग्रहण के योग्य होता है।

इस स्थल पर गिनती जन्म से है। अतः आगम में दोनों पाठ मिलते हैं। यह प्रसंग संयम ग्रहण का है, अभिषेक का नहीं।


५. पूजक के लक्षण में आयु की शर्त नहीं

नित्यपूजाविधायी यः पूजकः स हि कथ्यते ।
द्वितीयः पूजकाचार्यः प्रतिष्ठादिविधानकृत् ॥ १४१ ॥
…
जात्या कुलेन पूतात्मा शुचिर्बन्धुसुहृज्जनः ।
गुरूपदिष्टमन्त्रेण युक्तः स्यादेष पूजकः ॥ १४३ ॥
(धर्मसंग्रह श्रावकाचार, पं. मेधावी, श्लोक 141, 143; श्रावकाचार संग्रह भाग 2)

अर्थ: नित्य पूजा करने वाला पूजक कहलाता है, और प्रतिष्ठा आदि कराने वाला पूजकाचार्य। जो जाति, कुल से पवित्र, शुद्ध और गुरु से उपदिष्ट मंत्र से युक्त हो, वह पूजक है।

इसी ग्रंथ में श्लोक 150 में “न वृद्धो नाऽतिबालकः” (न वृद्ध हो, न अति बालक) की शर्त पूजकाचार्य (प्रतिष्ठाचार्य) के लिए है, नित्य पूजा या अभिषेक करने वाले के लिए नहीं।


६. हिसाब

गर्भ के लगभग 9 माह जोड़ें, तो गर्भ से 8 वर्ष जन्म से लगभग 7 वर्ष 3 माह पर पूरे होते हैं। जन्म से गिनें (धवला पु. 10 का पाठ), तो जन्म से पूरे 8 वर्ष।


७. आगम और प्रथा का भेद

  • आगम में मिला: आठ वर्ष की सीमा उपनीति और व्रत, संयम की योग्यता के लिए। गिनती अधिकांश स्थलों पर गर्भ से, एक स्थल पर जन्म से।
  • आगम में नहीं मिला: अभिषेक के लिए अलग से न्यूनतम आयु।
  • प्रथा: बालक से पहला अभिषेक 8 वर्ष पूरे होने पर कराना आज समाज की परंपरा है। अपने मंदिर की आम्नाय भी देख लें।

किसी साधर्मी के पास अभिषेक की आयु पर सीधा आगम वचन हो, तो कृपया यहाँ जोड़ें। :folded_hands:


स्रोत:
आदिपुराण भाग 2 (आचार्य जिनसेन), पर्व 38, भारतीय ज्ञानपीठ: Adi Puran Part 2 - Jain Quantum
षट्खण्डागम पुस्तक 13, धवला: Shatkhandagama Pustak 13 - Jain Quantum
गोम्मटसार जीवकाण्ड भाग 2, जीवतत्त्वप्रदीपिका: Gommatasara Jiva kanda Part 2 - Jain Quantum
जैनपरम्परा और यापनीयसंघ खण्ड 3 (धवला पु. 10 का उद्धरण): Jain Parampara aur Yapaniya Sangh Part 03 - Jain Quantum
श्रावकाचार संग्रह भाग 2, धर्मसंग्रह श्रावकाचार: Shravakachar Sangraha Part 2 - Jain Quantum
जैनकोष: उपनीति - जैनकोष