बाल भविना — जैन स्वाध्याय सामग्री | Bal Bhavina

बाल भविना

बाल भावना

  • बा. ब्र. श्री रवीन्द्रकुमार जैन

अनुक्रमणिका

नाम पृष्ठ नं.
१. बालगीत-१
२. सच्चे जैन
३. देवदर्शन विधि
४. षट्आवश्यक
५. सम्यग्दर्शन के आठ अंग
६. सम्यग्ज्ञान के आठ अंग
७. सम्यक्चारित्र
८. नवदेव
९. गुरु
१०. धर्म के दशलक्षण
११. पाँच व्रत
१२. छह द्रव्य
१३. नौ पदार्थ
१४. बारह भावना नाम
१५. सोलहकारण भावना नाम
१६. सोलह कारण भावनाएँ १०
१७. स्वाध्याय सप्तपदी ११
१८. क्षमा १२
१९. तप १३
२०. दान १४
२१. संयम १५
२२. सुनो १६
२३. समर्पण १६
२४. बढ़े चलो… १७
२५. भोजन १८
२६. पढ़ना १९
२७. सत्संगति २०
२८. हितोपदेश २०
२९. भावना २१
३०. संकल्प २२
३१. छोड़ें खोट २३
३२. तैयार २३
३३. सप्त व्यसन-१ २४
३४. सप्त व्यसन-२ २५
३५. बालगीत-२ २६
३६. बालगीत-३ २७
३७. बालगीत-४ २७
३८. मुक्तिपुरी जाओ २८

दो शब्द

गुनगुनाते हुए जिनवाणी के भावों से परिचय कराने वाली,
बालशैली में रचित लघु पुस्तिका से बच्चे सीखेंगे
शिष्टाचार एवं सदाचार
तत्त्वज्ञान के संस्कार
वात्सल्य एवं प्रभावना का उल्लास
स्वयं दूर होंगी
दुष्प्रवृत्तियाँ और कुरीतियाँ
बनेगा मंगलमय भविष्य
बच्चों का, हमारा, समाज एवं देश का
पढ़ें पढ़ायें और आगे बढ़ायें ।

-मंत्री

वस्तु - अनेकान्तमय
जिनागम - स्याद्वादमय
धर्म - अहिंसामय
जीवन - अनुशासनमय

१. बालगीत-१

भक्ति से जिनवर के दर्शन करेंगे,
अपना प्रभु अपने में देखेंगे हम ॥
गुरुवर की उत्तम संगति करेंगे,
अपना गुरु अपने में देखेंगे हम ॥
जिनवाणी साँची माता हमारी ।
पढ़ेंगे और सबको पढ़ायेंगे हम ॥
परम पुरुष जो हुए अलौकिक ।
आदर्श उनको बनायेंगे हम ॥
अन्तर्मुख होकर अनुभव करेंगे ।
अपने को आत्मा देखेंगे हम ॥
परभावों से न्यारा सहज अकर्ता ।
अपने को ज्ञाता देखेंगे हम ॥
जन्मते-मरते, मिलते विछुड़ते ।
देहादि को न्यारा देखेंगे हम ॥
मोहादि दुर्भाव दुःख के हैं कारण ।
स्वाश्रय से इनको छोड़ेंगे हम ।
परमार्थ रत्नत्रय शिवसुख का कारण ।
अन्तर में स्वाश्रय से पायेंगे हम ॥
अवसर न चूके पुरुषार्थ करके ।
मुक्तिपुरी को जायेंगे हम ॥

१६. सोलह कारण भावनाएँ

जिनवर दर्श विशुद्धि प्रवर्ते । विनय भाव स्वाभाविक वर्ते ॥१॥
अतीचार प्रभु लगे न कोई । शील परम निर्दोष सु होई ॥२॥
ज्ञानाभ्यास रहे मनमाहीं । दुर्बिकल्प कुछ उपजे नाहीं ॥३॥
भव-तन-भोग-विरक्त रहावें । नित संवेग भावना भावें ॥४॥
दान देय चित्त में हर्षवें । लोभादिक दुर्भाव नशावें ॥५॥
यथाशक्ति जिन तप को धारें । कर्मकलंक समूल निवारें ॥६॥
साधुसमाधि सदा चित्त लावें । परमसमाधि भावना भावें ॥७॥
यथायोग्य गुणीजन की सेवा । हमको होवे आनंद देवा ॥८॥
अर्हत्भक्ति में चित्त पागें । विषय कषाय दूर ही भागें ॥९॥
श्री आचार्यभक्ति सुखकारी । हो आचरण सु मंगलकारी ॥१०॥
बहुश्रुतवंत भक्ति चित्त लावें । परमज्ञान केवल प्रगटावें ॥११॥
प्रवचनभक्ति सदा सुखदाता । रहै सहज ही दृष्टा-ज्ञाता ॥१२॥
यथायोग्य आवश्यक पालें । परमावश्यक भाव संभालें ॥१३॥
श्री जिनधर्म प्रभाव बढ़ावें । वात्सल्य सब ही प्रति लावें ॥१४॥
यों सोलह कारण नित भावें । रागादिक दुर्भाव नशावें ॥१५॥
धर्मतीर्थ जग में प्रगटावें, हो निष्कर्म सिद्धपद पावें ॥१६॥

१७. स्वाध्याय सप्तपदी

स्वाध्याय नित करना, नित्य नियम से करना ।
विनय भक्ति से करना, हित दृष्टि से करना ॥१॥
तत्त्व जिज्ञासु होकर, शास्त्र वांचना भाई ।
नहीं समझ में आवे, प्रश्न करो सुखदाई ॥२॥
गुरुजन उत्तर देवें, चिंतन कर सुखकारी ।
करना ऊहापोह फिर, हो निर्णय अविकारी ॥३॥
नहीं शब्द पकड़कर, पक्ष का पोषण करना ।
शास्त्रों का अभिप्राय तुम, सहज हृदय में धरना ॥४॥
नहीं भूलना भाई, आम्नाय सुखकारी ।
सम्यक्ज्ञान ही जग में, सत्य-शरण हितकारी ॥५॥
श्रद्धावान सु होकर, स्व-पर विवेक जगाना ।
जिज्ञासु जो होवें, धर्मोपदेश सुनाना ॥६॥
सहज भाव ही रखना, निज वैराग्य बढ़ाना ।
बोधि समाधि पाकर, नरभव सफल बनाना ॥७॥

१८. क्षमा

क्षमा भाव सुखकारी, निज स्वभाव अविकारी ।
वस्तुस्वरूप विचारो, नहीं अनिष्ट चितारो ॥१॥
हो परिणमन स्वतंत्र, क्यों होकर परतंत्र ?
क्रोध अग्नि में जलते, नहीं स्वरूप समझते ॥२॥
एक कार्य में होते, अनेक कारण भाई ।
तत्त्वदृष्टि से देखो, दोषदृष्टि दुःखदाई ॥३॥
कर्मों के हैं प्रेरे, जग में जीव घनेरे ।
नहीं क्षोभ तुम करना, दया भाव उर धरना ॥४॥
यदि नहीं माने तो भी, मध्यस्थ ही रहना ।
उपसर्ग और परीषह, साम्यभाव से सहना ॥५॥
भिन्न ज्ञेय हैं सब ही, तुम ज्ञाता भगवान ।
रहो सहज ही ज्ञाता, बन जाओ भगवान ॥६॥

१९. तप

इच्छाओं की पूर्ति न होवे, आशा-तृष्णा बढ़ती जावे ।
जब इच्छा निरोध हो जावे, निज में ही विश्रान्ति पावे ॥१॥
सम्यक्तप हो मंगलकारी, तब ही होवे शिवमगचारी ।
अंतरंग छह बहिरंग छह, सुख देते प्राणी को अक्षय ॥२॥
अनशन ऊनोदर हितकारी, रस परित्याग सदा सुखकारी ।
अपनी वृत्ति सीमित कीजे, हो असंग कायोत्सर्ग कीजे ॥३॥
दोषों का प्रायश्चित्त सु करना, सहज विनय जीवन में धरना ।
वैयावृत्ति से दुःख नाशे, स्वाध्याय से ज्ञान प्रकाशे ॥४॥
निर्मम भाव सदा सुखदाता, आत्मध्यान सब कर्म नशाता ।
सोना अग्निमाँहि तपाता, तब ही उत्तम शुद्ध कहाता ॥५॥
सम्यक्तप जब धारे आतम, तब ही कहलावे परमातम ।
श्रद्धा सहित समझकर कीजे, शक्तिप्रमाण सदा ही कीजे ॥६॥

२०. दान

उत्तम त्याग सु मंगलदायी, उत्तम दान सर्व सुखदायी ।
महापाप कंजूसी जानो, भोग पाप का कारण मानो ॥१॥
शक्तिविचार सर्व तज दीजे, पात्रदान भक्ति से दीजे ।
दीन दुःखी पर करुणा कीजे, दुर्जन में मध्यस्थ रहीजे ॥२॥
उत्तम पात्र कहे मुनिराई, देशव्रती मध्यम हैं भाई ।
जघन कहे अविरत समदृष्टि, करना यथायोग्य तुम भक्ति ॥३॥
श्रद्धा, भक्ति, तुष्टि सुखकारी, गुण, विज्ञान, सु मंगलकारी ।
ईर्ष्या मान लोभ नहि कीजे, क्षमा सहित हर्षित हो दीजे ॥४॥
धर्मवृद्धि का जो कारण हो, जिसमें नहीं विषय पोषण हो ।
आहार औषधि अभय सु देना, तत्वज्ञान भी सबको देना ॥५॥
तन मन धन करना तुम अर्पण, धर्म हेतु सर्वस्व समर्पण ।
हो निर्ग्रन्थ समाधि करना, यों ही भवसागर से तरना ॥६॥
रत्नत्रय सा और धर्म ना, कृत-कारित-अनुमोदन करना ।
ये ही निज पर को हितकारी, हो प्रभावना मंगलकारी ॥७॥

२१. संयम

सम्यक् आत्मनियंत्रण संयम । परमानंदमय उत्तम संयम ॥
मंगलमय लोकोत्तम संयम । शरण अनन्य जीव को संयम ॥१॥
ज्ञानमात्र निज सीमा जानो । रागादिक से भिन्न पिछानो ॥
ज्ञातानुप ही अनुभव करना । ज्ञानानंद में तृप्त सु रहना ॥२॥
पंचेन्द्रिय के विषय त्यागना । मन में भी नहिं चिन्तन करना ॥
ये ही इन्द्रिय संयम सुखमय । सब जीवों को करता निर्भय ॥३॥
षट्कायिक जीवों की हिंसा । त्यागे पाले सदा अहिंसा ॥
प्राणी संयम सो हितकारी । महापुरुष धारे सुखकारी ॥४॥
संयम भाव दीनता नाशे । संयम से प्रभुता परकाशे ॥
साक्षात् मुक्ति का कारण । संयम सकल करो तुम धारण ॥५॥
जो शक्ति होवे नहीं भाई । संयम देश धरो सुखदायी ॥
पंच अणुव्रत धारण करना । गुणव्रत और शिक्षाव्रत धरना ॥६॥
अन्तसमय सन्यास मरणकर । पावे देवगति मंगलकर ॥
तहँ तैं नर हो मुनिपद धारे । दुःखमय आवागमन निवारे ॥७॥

२२. सुनो

सुनो-सुनो भाई पाप पाँच हैं, परमेष्ठी भगवान पाँच हैं ।
पाँच पाप को तजना है, पंच प्रभु को भजना है ॥१॥
इनसे ही दुःख नशाता है, सुख का मारग मिलता है ।
होने योग्य सहज ही होता, स्वाश्रय से ही शिवसुख होता ॥२॥

२३. समर्पण

पहले सच्ची श्रद्धा धारें, शंका, भय, आलस्य निवारें ।
आत्महित की करें प्रतिज्ञा, समझें पालें श्री जिन आज्ञा ॥१॥
धर विवेक हम क्रिया सुधारें, सम्यक् वस्तुस्वरूप विचारें ।
तन-मन-धन सब करें समर्पण, धर्म हेतु जीवन हो अर्पण ॥२॥
देव, गुरु हैं प्राण हमारे, मंगलोत्तम शरण सहारे ।
सदा स्मरण करें इन्हीं का, सदा अनुकरण करें इन्हीं का ॥३॥
अन्तर्मुख हो समकित पायें, नित वैराग्य भावना भायें ।
ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना, धर्म-ध्वजा घर-घर फहरायें ॥४॥

२४. बढ़े चलो…

बढ़े चलो, बढ़े चलो, प्रभु के पथ पर बढ़े चलो ।
गुरु संगति में बढ़े चलो, हो असंग तुम बढ़े चलो ।
सम्यक्श्रद्धा, सम्यक्ज्ञान, सम्यक्चारित्र शिवपथ जान ।
हर्षित होकर बढ़े चलो, प्रभु … ॥१॥
तत्त्वों का सम्यक्निर्णय हो, भेदज्ञान आतम अनुभव हो ।
पुरुषारथ से बढ़े चलो, प्रभु … ॥२॥
आगम से हो सम्यक्ज्ञान, पढ़ो-पढ़ावो हो कल्याण ।
भक्तिभाव से बढ़े चलो, प्रभु … ॥३॥
भाओ नित वैराग्य भावना, गुरुसाक्षी में चारित्र धरना ।
मुक्तिपथ में बढ़े चलो, प्रभु … ॥४॥
परीषहों से नहीं घबराना, क्षण-क्षण भावविशुद्धि बढ़ाना ।
अंतर में ही बढ़े चलो, प्रभु … ॥५॥
आत्मश्रद्धा आत्मज्ञान, आत्मलीनता चारित्र जान ।
ज्ञान सिन्धु में रमे चलो, प्रभु … ॥६॥

२५. भोजन

पहले दर्शन बाद में भोजन ।
पहले पूजन बाद में भोजन ।
पहले स्वाध्याय बाद में भोजन ।
पहले दान बाद में भोजन ।
संयम सहित करें हम भोजन ।
तप वृद्धि करने को भोजन ।
आसक्ति तज करें सु भोजन ।
रहकर मौन करें हम भोजन ।
द्रव्यशुद्ध हो क्षेत्र शुद्ध हो ।
काल शुद्ध हो भाव शुद्ध हो ।
शुद्धि सहित करें हम भोजन ।
शान्तचित्त हो करें सु भोजन ।
नहीं हमारा ये जड़ भोजन ।
करें ज्ञानमय नित ही भोजन ।

२६. पढ़ना

बच्चों ! नित्य नियम से पढ़ना ।
हित पर दृष्टि रखकर पढ़ना ॥१॥
आदर और विनय से पढ़ना ।
पढ़कर जाना आकर पढ़ना ॥२॥
समझ-समझकर के तुम पढ़ना ।
पिछला पाठ याद तुम रखना ॥३॥
प्रातः जल्दी उठकर पढ़ना ।
समयचक्र का पालन करना ॥४॥
तजने योग्य सहज ही तजना ।
भजने योग्य सहज ही भजना ॥५॥
पढ़कर के आतम हित करना ।
देश धर्म की उन्नति करना ॥६॥
नाम गुरु का नहीं छिपाना ।
विद्यालय का नाम बढ़ाना ॥७॥

२. सच्चे जैन

प्रभुदर्शन नित करते, रात्रिभोजन तजते ।
पियें छानकर पानी, सुनें सदा जिनवाणी ॥१॥
कभी अभक्ष्य न खाते, जीव दया चित लाते ।
सप्त व्यसन के त्यागी, संयम में अनुरागी ॥२॥
वस्तुस्वरूप समझते, शुद्धात्म को भजते ।
जाग्रत प्रज्ञा छैनी, वे ही सच्चे जैनी ॥३॥

३. देवदर्शन विधि

(लावनी)

प्रातः उठकर के णमोकार तुम पढ़ना ।
तत्त्वों का चिंतन कर निज रूप सुमरण ॥
फिर यथायोग्य तन की भी शुद्धि करना ।
धारणकर वस्त्र पवित्र जिनालय चलना ॥१॥
द्वारे पर पानी रखा लखो तुम भाई ।
धो हाथ-पैर निःसही शब्द उच्चरना ॥
जय-जय ध्वनि करते जिनमंदिर में जाना ।
प्रभु सन्मुख भक्ति से तुम शीश नवाना ॥२॥

२७. सत्संगति

सत्संगति ही शिवसुखदाता, सत्संगति सद्भाग्य विधाता ।
सत्संगति सन्मार्ग दिखावे, सत्संगति सु विवेक जगावे ॥१॥
सत्संगति से बढ़े प्रतिष्ठा, सत्संगति से होय पूज्यता ।
सत्संगति सब दोष मिटावे, सत्संगति सब पाप नशावे ॥२॥
सत्संगति सब व्यसन छुड़ावे, सत्संगति दुर्ध्यान मिटावे ।
सत्संगति सब गुण प्रगटावे, सत्संगति निर्मलता लावे ॥३॥
सत्संगति में निशादिन रहना, सत्संगति को कभी न तजना ।
भाव तुम्हारे निर्मल होंगे, ज्ञानादिक गुण विकसित होंगे ॥४॥
धर्म ध्यान में चित्त लगेगा, जीवन तब आदर्श बनेगा ।
रत्नत्रय के पात्र बनोगे, मुक्तिमार्ग में तभी बढ़ोगे ॥५॥

२८. हितोपदेश

उत्तम संगति ही तुम करना, उत्तम पुस्तक ही तुम पढ़ना ।
सादा जीवन उच्च विचार, उन्नति का ये ही आधार ॥१॥
खोटी चिंता में नहीं घुलना, तत्त्व विचार सदा ही करना ॥
खोटे वचन न कभी बोलना, सांच बिना मुख नहीं खोलना ॥२॥

हितमित अरु प्रिय वचन उचरना, धर्म अहिंसा पालन करना ।
जिन आज्ञा मस्तक पर धरना, रत्नत्रय पथ पर नित बढ़ना ॥१॥
दूर प्रपंचों से तुम रहना, समता से कष्टों को सहना ।
जिन शासन की शान बढ़ाना, नहीं माता का दूध लजाना ॥४॥

२९. भावना

सप्त व्यसन से दूर रहेंगे, पंच उदुम्बर त्याग करेंगे ।
रात्रि भोजन नहीं करेंगे, अयोग्य भोजन नहीं करेंगे ॥१॥
पानी छना काम में लेंगे, सरल सत्य व्यवहार करेंगे ।
सब जीवों से प्रेम करेंगे, गुणीजनों की विनय करेंगे ॥२॥
सेवा वैयावृत्ति करेंगे, उनके सद्गुण ग्रहण करेंगे ।
दुखियों पर हम दया करेंगे, दुर्जन में मध्यस्थ रहेंगे ॥३॥
निज-पर भेदविज्ञान करेंगे, द्रव्यदृष्टि हम नित्य रखेंगे ।
आत्म साधना सदा करेंगे, धर्मभावना सदा करेंगे ॥४॥

३०. संकल्प

घर-घर जैन ध्वजा लहरायें - ये ही हमने ठाना है ।
दूर भगावें बुरी रीतियाँ - ये ही हमने ठाना है ।
मेलमिलाप बढ़ावे हम सब - ये ही हमने ठाना है ।
दुःख बटायें नित दुखियों का - ये ही हमने ठाना है ।
न्याय नीति से चलें सदा हम - ये ही हमने ठाना है ।
ईर्ष्या द्वेष न मन में आये - ये ही हमने ठाना है ।
जीर्णोद्धार करें तीर्थों का - ये ही हमने ठाना है ।
पढ़ें पढ़ावें नित जिनवाणी - ये ही हमने ठाना है ।
सम्यक्दर्शन प्राप्त करेंगे - ये ही हमने ठाना है ।
सम्यक्ज्ञान प्रकाश करेंगे - ये ही हमने ठाना है ।
समतामय आचरण करेंगे - ये ही हमने ठाना है ।
दशलक्षण मय रहे परिणति - ये ही हमने ठाना है ।

३१. छोड़ें खोट

खोटे देव कभी नहीं भजना, खोटे गुरु दूर से तजना ।
खोटी पुस्तक कभी न पढ़ना, खोटे वचन कभी नहीं सुनना ॥१॥
खोटे भाव न मन में लाना, कभी न खोटी बात बनाना ।
खोटी चेष्टा कभी न करना, खोटी आदत कभी न रखना ॥२॥
खोटी संगति कभी न करना, खोटी दृष्टि कभी न धरना ।
खोटे काम दूर से तजना, खोटे धंधे कभी न करना ॥३॥
खोटा सिक्का नहीं चलाना, खोटी चाल कभी नहीं चलना ।
खोटे वेश कभी न बनाना, खोटे मार्ग कभी नहीं जाना ॥४॥
खोटी सलाह कभी नहीं देना, खोटी चिंता में नहीं खोना ।
सम्यक् तत्त्वज्ञान प्रगटाना, दुर्लभ नरभव सफल बनाना ॥५॥

३२. तैयार

श्री जिनवर का दर्शन करने - हैं तैयार, हैं तैयार ।
प्रभु की भक्ति, पूजा करने - हैं तैयार, हैं तैयार ।
जिनगुरुओं की सेवा करने - हैं तैयार, हैं तैयार ।
जिनवाणी पढ़ने अरु सुनने - हैं तैयार, हैं तैयार ।

काव्य

औरों को भी सहज सुनाने - मैं तैयार, मैं तैयार।
तत्त्वों का हम निर्णय करने - मैं तैयार, मैं तैयार।
सच्चा वस्तुस्वरूप समझने - मैं तैयार, मैं तैयार।
भेदज्ञान निज-पर का करने - मैं तैयार, मैं तैयार।
स्वानुभूतिमय श्रद्धा करने - मैं तैयार, मैं तैयार।
नित वैराग्य भावना भाने - मैं तैयार, मैं तैयार।
क्रोध त्यागने, क्षमा धारने - मैं तैयार, मैं तैयार।
मान त्यागने, मृदुता धरने - मैं तैयार, मैं तैयार।
माया त्याग, सरलता धरने - मैं तैयार, मैं तैयार।
लोभ त्याग, संतोष धारने - मैं तैयार, मैं तैयार।
विषय त्यागने, संयम धरने - मैं तैयार, मैं तैयार।
त्याग परिग्रह, मुनिपद धरने - मैं तैयार, मैं तैयार।
हर उपसर्ग परीषह सहने - मैं तैयार, मैं तैयार।
आत्मध्यान में स्थिर रहने - मैं तैयार, मैं तैयार।
श्रेणी चढ़ने, कर्म नशाने - मैं तैयार, मैं तैयार।
अक्षय परमातम पद पाने - मैं तैयार, मैं तैयार।

३३. सप्त व्यसन-१

जुआ दु:ख रूप, बर्बादी का कूप।
शर्त नहीं धरना, सहज काम करना ॥
चोरी का धन, मोरी में जावे।
भयभीत रहते, महादण्ड पाते ॥
अण्डा मांस खाते, जीवों को सताते।
रोगों को बढ़ाते, महादु:ख पाते ॥
करने से शिकार, जीवन हो बेकार।
तड़फ-तड़फ वे मरते, नरकों में दु:ख भरते ॥
पीने से शराब, बुद्धि हो खराब।
जरदा और धूम्रपान, भांग अफीम दु:खखान ॥
शरीर भी गलता, महापाप लगता।
नशा दुखदाई, छोड़ो-छोड़ो भाई ॥
पर स्त्री माता बहिन समान है।
वासना की दृष्टि से होता हैरान है ॥
धोबी की शिला सम, वेश्या को टालो।
दूर से ही छोड़ो, शील धर्म पालो ॥
दुखदाई आदतें निंदनीय कुव्यसन।
छोड़ो इन्हें तब ही, धर्म में लगेगा मन ॥

३४. सप्त व्यसन-२

छोड़ो-छोड़ो रे व्यसन, ये हैं दुर्गति करन।
छोड़ो-छोड़ो रे जुआ, बर्बादी का ये कुँआ।
छोड़ो-छोड़ो रे शराब, करती बुद्धि को खराब।
छोड़ो-छोड़ो रे चोरी, तेरी जिंदगी थोरी ॥
छोड़ो-छोड़ो मांस खाना, ये हैं रोगों का खजाना।
छोड़ो-छोड़ो ये शिकार, हिंसा कर्म दु:खकार ॥
छोड़ो-छोड़ो परनार, ये है दुर्गति का द्वार।
छोड़ो-छोड़ो वेश्या संग, तब ही चढ़े धर्म का रंग ॥

३५. बालगीत-२

हिंसा छोड़ो झूठ छोड़ो, चोरी कुशील परिग्रह छोड़ो।
जग विषयों से मुख को मोड़ो, मुक्तिमार्ग में परिणति जोड़ो।
छोड़ो-छोड़ो पाँचों पाप, करते महा संताप।
तब ही होगा कल्याण, कहें वीर भगवान ॥

३६. बालगीत-३

छोड़ो-छोड़ो रे कषायें, महा दुःख उपजायें।
श्री गुरु समझायें, जिनवाणी बतलाये ॥१॥
क्रोध छोड़ो मान छोड़ो, माया छोड़ो लोभ छोड़ो।
हास्य रति अरति छोड़ो, शोक भय अरु ग्लानि छोड़ो ॥२॥
विषयों की वांछा को छोड़ो, ईर्ष्या छोड़ो मोह छोड़ो।
करो तत्व अभ्यास, अपना सुख है अपने पास ॥३॥
तुम हो शुद्ध चिद्रूप, साधो-साधो अपना रूप।
पाओ मुक्ति साम्राज्य, कहें श्री जिनराज ॥४॥

३७. बालगीत-४

क्रोध मान अरु माया लोभा, त्यागे से जीवन की शोभा।
दर्शन ज्ञान चरित्र तप भाई, आराधन है शिव सुख दायी ॥१॥
चार कषायों को त्यागो, आराधन में चित पागो।
तभी तुम्हारा दुख मिटेगा, तभी निराकुल सुख मिलेगा ॥२॥

३८. मुक्तिपुरी जाओ

सच्चे देव-शास्त्र-गुरु जानो, धर्म अहिंसा उरलाओ ॥टेक॥
तत्वों का सम्यक् निर्णय कर, भेदज्ञान सु प्रगटाओ।
अन्तर्मुख हो करो स्वानुभव, ज्ञायक की श्रद्धा लाओ।
सकल धर्म का मूल यही है, सम्यग्दर्शन प्रगटाओ ॥
मैं आतम हूँ देह है पुद्गल, मैं अविनाशी देह विनाशी।
मैं हूँ चेतन देह अचेतन, मैं आनंदमय देह है जड़मय।
निजसुख निज में ही पाओ, मुक्तिमार्ग में बढ़ जाओ ॥
रागादिक हैं आश्रव बंध, दुखमय दुख के ही कारण।
रत्नत्रय ही संवर निर्जरा, तथा मोक्ष सुख के कारण।
स्वाश्रय से स्वगुण पाओ, निजप्रभुता में रम जाओ ॥
ज्ञानाभ्यास करो नित भाई, सम्यग्ज्ञान बढ़े सुखदाई।
भोगों की मत करो कामना, भाओ नित वैराग्य भावना।
सम्यक्चारित्र प्रगटाओ, जिससे मुक्तिपुरी जाओ ॥

स्तुति करके प्रभु के गुण चितो भाई।
देना फिर तीन प्रदक्षिणा मंगलदाई ॥
कर कायोत्सर्ग तुम पाप मैल को धोना।
फिर शास्त्र सभा में बैठ धर्म को सुनना ॥३॥
अथवा अति प्रीति से तुम खुद ही पढ़ना।
सुनकर-पढ़कर तुम वस्तुस्वरूप समझना।
साधर्मिजन पर बहुत प्रेम दर्शाना।
जिनदर्शन करके भावविशुद्धि बढ़ाना ॥४॥
अन्तर्मुख हो सुखमय निजदर्शन पाना।
रत्नत्रय पाकर जीवन सफल बनाना।
जिनवर का है ये ही उपदेश सुहाना।
इससे ही बनता जीव स्वयं भगवाना ॥५॥

४. षट्आवश्यक

जिनवरपूजा मंगलकारी, गुरु उपासना आनंदकारी।
स्वाध्याय सद्ज्ञान प्रकाशे, संयम से सब दुःख विनाशै ॥१॥
तप सब कर्म नशावनहारा, उत्तमदान सर्व सुखकारा।
षट् आवश्यक नित पालीजे, धर्माराधन में चित दीजे ॥२॥

५. सम्यक्दर्शन के आठ अंग

निःशंकित, निःकांक्षित, निर्विचिकित्सा पालो ।
अमूढ़दृष्टि होकर, उपगूहन संभालो ॥१॥
करो स्थिरीकरण धर्म में, वात्सल्य उर लाओ ।
विनय विशुद्धि और लगन से, धर्म प्रभाव बढ़ाओ ॥२॥
आठ अंग सम्यक्दर्शन के, इन्हें सदा तुम धरना ।
सकल धर्म का मूल यही है, भवसागर से तरना ॥३॥

६. सम्यक्ज्ञान के आठ अंग

अक्षर शुद्ध उच्चारो, अर्थ भी शुद्ध विचारो ।
उभयशुद्धि सुखकारी, कालाध्ययन हितकारी ॥१॥
अवधारण उपधान, करो योग्य बहुमान ।
नाम गुरु न छिपाओ, योग्य विनय प्रगटाओ ॥२॥
आठ अंग नित भजना, संशयादि को तजना ।
पाओ सम्यक्ज्ञान, तब ही हो कल्याण ॥३॥

७. सम्यक्चारित्र

सम्यक्चारित्र सुखकारी, साम्यभाव नित हितकारी ।
मोह क्षोभ बिन पहचानो, स्थिरता ही चारित जानो ॥१॥
स्व-पर दयामय सुखकारी, व्रत तप संयम व्यवहारी ।
विषय कषायों को टालो, सम्यक्चारित्र तुम पालो ॥२॥
साक्षात् मुक्ति का कारण, सर्व दुःखों का करे निवारण ।
मानव भव का ये ही सार, इससे ही होवे भव पार ॥३॥

८. नवदेव

सम्यक्दर्शन-ज्ञान-चरण हैं, यही जीव को सदा शरण हैं ।
पंचपरमेष्ठी इनके धारक, मंगलमय अरु मंगलदायक ॥१॥
दर्शन करना हर्षित होकर, गुण चितो अन्तर्मुख होकर ।
भेदज्ञान को सदा सुमिरना, शुद्धात्म का अनुभव करना ॥२॥
वीतरागता पोषक वाणी, जग में कहलाये जिनवाणी ।
करो सदा अभ्यास सहज ही, नाशो भ्रम अज्ञान सर्व ही ॥३॥
श्री जिनबिम्ब जिनालय जानो, जैनधर्म नवदेव पिछानो ।
धर्मतीर्थ हैं मंगलकारी, धर्मजिन भी आनंदकारी ॥४॥
स्तुति करना, वंदन करना, सेवा करना रक्षा करना ।
ये सम्यक् पूजा व्यवहारा, निश्चय रत्नत्रय अविकारा ॥५॥

९. गुरु

गुरु निर्ग्रन्थ परिग्रह त्यागी, भव-तन-भोगों से वैरागी ।
आशा पाशी जिनने छेदी, आनंदमय समता रस वेदी ॥१॥
ज्ञान-ध्यान-तप लीन रहावें । ऐसे गुरुवर मोकों भावें ।
हरष-हरष उनके गुण गाऊँ । साक्षात् दर्शन मैं पाऊँ ॥२॥
उनके चरणों शीश नवाकर । ज्ञानमयी वैराग्य बढ़ाकर ।
उनके ढिंग ही दीक्षा धारूँ । अपना पंचम भाव संभारूँ ॥३॥
सकल प्रपंच रहित हो निर्भय । साधूँ आतम प्रभुता अक्षय ।
ध्यान अग्नि में कर्म जलाऊँ । दुःखमय आवागमन नशाऊँ ॥४॥

१०. धर्म के दशलक्षण

सम्यक् दर्शन ज्ञान सहित हैं, यही धर्म के लक्षण ।
क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम ॥१॥
तप, त्याग, आकिंचन, ब्रह्मचर्य सुखकर है ।
इनको धारो जीवन में, होगा बेड़ा पार है ॥२॥

११. पाँच व्रत

त्याग मोह सम्यक् प्रगटावें, ये संकल्प हमारा है ।
हिंसा छोड़, अहिंसा पालें, यह कर्तव्य हमारा है ॥१॥
सत्य निष्ठ हो रहें प्रमाणिक यह व्यवहार हमारा है ।
चोरी छोड़ अचौर्य सु पालें यह आचार हमारा है ॥२॥
विषय-भोग तज ब्रह्मचर्य धारें, ये ही हमको प्यारा है ।
परिग्रह तज संतोषी रहना, यह कर्तव्य हमारा है ॥३॥

१२. छह द्रव्य

जीव द्रव्य हैं अनंत, पुद्गल अनंतानंत ।
धर्म अधर्म आकाश एक - एक जानो ॥१॥
कहे जिन आगम में समझो सुयुक्ति से ।
काल द्रव्य असंख्यात लोक प्रमाण मानो ॥२॥
विश्व है इन्हीं छह द्रव्यों का मेला ।
चेतना स्वरूप जीव सदा है अकेला ॥३॥
सदा है अकेला किन्तु नहीं अधूरा ।
प्रभु है स्वभाव से ही सदा काल पूरा ॥४॥

१३. नौ पदार्थ

अनादि अनंत जो एक रूप है, सदा काल ज्ञाता स्वरूप है ।
सुख-दुःख को वेदे व्यवहार, निश्चय से तो सुख स्वरूप है ॥१॥
मैं तो ऐसा जीव तत्व हूँ, आश्रय योग्य सु परम तत्व हूँ ।
अकृत्रिम शाश्वत परमात्म, तीन लोक में सार तत्व हूँ ॥२॥
देहादिक अजीव तत्व हैं, मात्र ज्ञान के ज्ञेय अरे ।
मैं नहीं इनका कर्ता-भोक्ता, स्वामी नहीं तिहुँकाल अरे ॥३॥
मोहादिक भावों का होना, भावश्रव दुःखदाता है ।
उस निमित्त से कर्म जो आवें, द्रव्यास्रव कहलाता है ॥४॥
द्रव्यबंध का निमित्त भाव ही, भावबंध तुम पहचानो ।
कर्मों का बंधना द्रव्यबंध, भव भ्रमने का कारण जानो ॥५॥
सम्यक्तादि शुद्ध भावों से, अशुद्ध परिणति रुक जाना ।
यही भाव सुखमय संवर, द्रव्यसंवर कर्म नहीं आना ॥६॥
शुद्धभाव का बढ़ते जाना, भाव निर्जरा सुखकारी ।
पूर्व बंध का झड़ते जाना, द्रव्य निर्जरा हितकारी ॥७॥
सर्व प्रकार शुद्ध परिणति ही, भाव मोक्ष मंगलमय है ।
सकल कर्म का क्षय हो जाना, द्रव्य मोक्ष ही अक्षय है ॥८॥
विषयों का अनुराग पाप है, सब प्रकार दुःख का कारण ।
पुण्य भाव धर्मानुराग है, परंपरा सुख का कारण ॥९॥
ये ही प्रयोजन भूत तत्व हैं, इनका निर्णय अब करना ।
भेदज्ञान अरु स्वानुभूति से, सम्यक् दर्श प्रगट करना ॥१०॥

१४. बारह भावना नाम

अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व,
अन्यत्व, अशुचि, आश्रव, संवर
निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ, धर्म
भाओ बारह भावना, वैराग्य बढ़ावना
निजस्वरूप को ध्यावना, परमपद पावना
निजस्वरूप ही सार है, शेष सब असार है ।

१५. सोलहकारण भावना नाम

दर्शन विशुद्धि विनय सम्पन्नता
निरतिचार शीलव्रत, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग
संवेग अरु शक्तित्याग, शक्ति तप जानना
साधु समाधि, वैयावृत्ति मंगलकारी मानना
अरहंतभक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुत प्रवचनभक्ति
आवश्यक परिहाणि, मार्ग प्रभावना
प्रवचन वात्सल्य, सोलह कारण भावना

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स्रोत: Gyata संग्रह।

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