अष्टाह्निका में नंदीश्वर द्वीप ही क्यों, और देव तिथि कैसे मानते हैं? | Ashtahnika Mein Nandishwar Dweep Hi Kyon

शंका: अष्टाह्निका पर्व में नंदीश्वर द्वीप का ही विशेष महत्त्व क्यों? और देव तिथि कैसे मानते हैं?

वर्ष में तीन बार, आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास के अंतिम आठ दिनों में अष्टाह्निका पर्व आता है। इन दिनों हम अपने मंदिरों में नंदीश्वर द्वीप की पूजा और सिद्धचक्र विधान करते हैं, और कहा जाता है कि देव स्वयं नंदीश्वर द्वीप जाकर पूजा करते हैं।

इस पर कुछ प्रश्न मन में उठते हैं:

१. अष्टाह्निका में नंदीश्वर द्वीप ही इतना महत्त्वपूर्ण क्यों माना गया? वहाँ ऐसा क्या है?

२. देवलोक में दिन रात का भेद नहीं है, वहाँ तिथियों का प्रचलन भी नहीं है। देवों के लिए तो सब दिन एक से हैं। फिर अष्टाह्निका की निश्चित तिथियों में देव नंदीश्वर जाकर कैसे और क्यों पूजा करते हैं?

३. क्या ऐसा है कि अष्टाह्निका आठ दिन की है और नंदीश्वर आठवाँ द्वीप है, इसलिए दोनों को जोड़ दिया गया? और क्योंकि मनुष्य वहाँ जा नहीं सकते, इसलिए वह पूजा देवों से जोड़ दी गई?

४. साथ ही, सिद्धचक्र विधान जैसे बड़े आयोजनों में चमत्कार की कथाएँ बहुत सुनाई जाती हैं। पूजा का वास्तविक उद्देश्य क्या है?

कृपया ग्रंथों के प्रमाण सहित समाधान बताएँ। :folded_hands:

समाधान (ग्रंथों के प्रमाण सहित)


१. नंदीश्वर द्वीप का स्वरूप

नंदीश्वर मध्यलोक का आठवाँ द्वीप है। उसकी हर दिशा में एक अंजनगिरि है, उसके चारों ओर चार वापियाँ, हर वापी के बीच एक दधिमुख पर्वत और बाहरी कोनों पर रतिकर पर्वत। हर एक पर्वत के शिखर पर एक अकृत्रिम जिनमंदिर है:

एक्कचउक्कट्ठंजणदहिमुहरइयरगिरीण सिहरम्मि ।
चेट्ठदि वररयणमओ एक्केक्कजिणिंदपासादो ॥
(तिलोयपण्णत्ति, अधिकार 5, गाथा 70)

अर्थ: एक अंजनगिरि, चार दधिमुख और आठ रतिकर पर्वतों के शिखर पर उत्तम रत्नमय एक एक जिनेन्द्र मंदिर स्थित है।

इस प्रकार एक दिशा में 13 और चारों दिशाओं में कुल 52 पर्वत, 52 अकृत्रिम जिनालय, 16 वापियाँ और 64 वन हैं।
(तिलोयपण्णत्ति 5/70 से 75; राजवार्तिक 3/35; हरिवंशपुराण 5/676)


२. देव कब आते हैं

वरिसे वरिसे चउविहदेवा णंदीसरम्मि दीवम्मि ।
आसाढकत्तिएसुं फग्गुणमासे समायंति ॥
(तिलोयपण्णत्ति 5/83)

अर्थ: चारों प्रकार के देव प्रत्येक वर्ष आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास में नंदीश्वर द्वीप में आते हैं।

इसके बाद गाथा 84 से 98 तक बताया है कि सौधर्म इन्द्र ऐरावत पर, ईशान इन्द्र उत्तम हाथी पर, सनत्कुमार सिंह पर, इस प्रकार सब इन्द्र अपने अपने वाहन पर, हाथ में फल पुष्प लेकर भक्ति से आते हैं।


३. चारों दिशाओं में चारों निकाय

पुव्वाए कप्पवासी भवणसुरा दक्खिणाए वेंतरया ।
पच्छिमदिसाए तेसुं जोइसिया उत्तरदिसाए ॥
(तिलोयपण्णत्ति 5/100)

अर्थ: नंदीश्वर के जिनमंदिरों की यात्रा में कल्पवासी देव पूर्व दिशा में, भवनवासी दक्षिण में, व्यंतर पश्चिम में और ज्योतिषी उत्तर दिशा में (स्तोत्र पढ़ते हुए) अपनी अपनी विभूति के योग्य महिमा करते हैं। (गाथा 100 से 101)

त्रिलोकसार गाथा 977 के अनुसार सौधर्म, ईशान, चमर और वैरोचन ये चारों इन्द्र प्रदक्षिणा रूप से पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में पूजा करते हैं, अर्थात् एक दिशा पूरी करके अगली दिशा में जाते हैं।


४. पूजा किस समय होती है

पुव्वण्हे अवरण्हे पुव्वणिसाए वि पच्छिमणिसाए ।
पहराणि दोण्णि दोण्णि वरभत्तीए पसत्तमणा ॥
कमसो पदाहिणेणं पुण्णिमयं जाव अट्ठमीदु तदो ।
देवा विविहं पूजा जिणिंदपडिमाण कुव्वंति ॥
(तिलोयपण्णत्ति 5/102 से 103)

अर्थ: ये देव आसक्त चित्त होकर अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक पूर्वाह्न, अपराह्न, पूर्वरात्रि और पश्चिमरात्रि में दो दो प्रहर तक उत्तम भक्तिपूर्वक, प्रदक्षिणा क्रम से जिनेन्द्र प्रतिमाओं की विविध प्रकार से पूजा करते हैं।

त्रिलोकसार (आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती), गाथा 973 से 976: बारह कल्पों के इन्द्र, अन्य कल्पवासी और भवनत्रिक देवों सहित, हाथी, घोड़ा, सिंह, हंस, मोर आदि वाहनों पर आरूढ़ होकर, हाथों में दिव्य फल पुष्प लेकर, नंदीश्वर द्वीप जाकर प्रतिवर्ष आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास की अष्टमी से पूर्णिमा पर्यंत निरंतर दो दो प्रहर ऐन्द्रध्वज आदि महापूजा करते हैं।


५. मनुष्य वहाँ क्यों नहीं जा सकते

प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्याः ॥
(तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय 3, सूत्र 35)

अर्थ: मानुषोत्तर पर्वत तक, अर्थात् अढ़ाई द्वीप में ही मनुष्य होते हैं। उस पर्वत से परे ऋद्धिधारी मुनि या विद्याधर भी नहीं जा सकते।

नंदीश्वर आठवाँ द्वीप है, मनुष्यलोक (अढ़ाई द्वीप) से बहुत आगे। इसलिए मनुष्य अपने मंदिरों में नंदीश्वर द्वीप की स्थापना करके, उन्हीं दिनों में भक्तिभाव से उन 52 चैत्यालयों की पूजा करते हैं। (जैनकोष, “नंदीश्वर द्वीप”)


६. मूल शंका: देवलोक में तिथि नहीं, फिर देव तिथि कैसे मानते हैं?

यह बात सही है कि स्वर्गों में सूर्य चंद्र के उदय अस्त से होने वाला दिन रात नहीं है। पर आगम बताता है कि घड़ी, दिन, रात, पक्ष, मास, यह सारा व्यवहार काल मनुष्यलोक में ही बनता है, और वही सबके लिए काल की गिनती है:

मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥ 13 ॥
तत्कृतः कालविभागः ॥ 14 ॥
बहिरवस्थिताः ॥ 15 ॥
(तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय 4, सूत्र 13 से 15)

अर्थ:
सूत्र 13: ज्योतिषी देव (सूर्य, चंद्र आदि) मनुष्यलोक में मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा देते हुए निरंतर गमन करते हैं।
सूत्र 14: घड़ी, घंटा, दिवस, रात इत्यादि व्यवहार काल का विभाग इन्हीं गतिशील ज्योतिषी देवों के द्वारा होता है।
सूत्र 15: मनुष्यलोक के बाहर के ज्योतिषी देव स्थिर हैं।

निष्कर्ष: मनुष्यलोक के बाहर ज्योतिषी स्थिर हैं, इसलिए वहाँ अपना दिन रात नहीं बनता। काल का एकमात्र व्यावहारिक माप मनुष्यलोक के सूर्य चंद्र की गति है। देव भी इसी माप से समय जानते हैं। यही कारण है कि तिलोयपण्णत्ति 5/102 स्वयं देवों की पूजा को “पूर्वाह्न, अपराह्न, पूर्वरात्रि, पश्चिमरात्रि” और “अष्टमी से पूर्णिमा” की भाषा में बताती है, जो मनुष्यलोक का ही समय है।

तो देवों के लिए तिथि का “प्रचलन” न होना और उनका मनुष्यलोक के काल अनुसार पूजा करना, इसमें कोई विरोध नहीं है। ग्रंथ स्पष्ट रूप से इन्हीं तिथियों में देवों का आगमन बताते हैं (तिलोयपण्णत्ति 5/83, त्रिलोकसार 976)।


७. “आठ दिन और आठवाँ द्वीप” वाली संभावना

यह संयोग सुंदर है, पर किसी ग्रंथ में यह संबंध नहीं मिला। “अष्टाह्निका” शब्द का अर्थ ही है आठ दिन (अष्ट + अह्न), और ग्रंथ इन आठ दिनों का कारण आठवाँ द्वीप होना नहीं बताते। इसलिए इसे संयोग मानना ही ठीक है, आगम का कथन नहीं।

इसी प्रकार “मनुष्य जा नहीं सकते, इसलिए पूजा देवों से जोड़ दी गई” यह भी ग्रंथ के अनुसार नहीं है। ग्रंथ (तिलोयपण्णत्ति, त्रिलोकसार, हरिवंशपुराण) देवों की नंदीश्वर यात्रा को वास्तविक घटना के रूप में ही बताते हैं, और मनुष्यों की पूजा उसके अनुकरण में, स्थापना द्वारा होती है।

“केवल नंदीश्वर ही क्यों”, इसका कोई अलग दार्शनिक कारण इन ग्रंथों में नहीं मिला। वे इतना ही बताते हैं कि तीनों अष्टाह्निका में चारों निकाय के देवों की सामूहिक महापूजा वहीं होती है। जहाँ ग्रंथ मौन हैं, वहाँ अपनी ओर से कारण गढ़ना उचित नहीं।


८. पूजा का वास्तविक उद्देश्य: गुण, न कि इच्छापूर्ति

मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम् ।
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये ॥
(तत्त्वार्थसूत्र, मंगलाचरण)

अर्थ: मोक्षमार्ग के नेता, कर्मरूपी पर्वतों के भेदक और विश्व के समस्त तत्त्वों के ज्ञाता को, उनके गुणों की प्राप्ति के लिए मैं वंदन करता हूँ।

न पूजयार्थस्त्वयि वीतरागे न निन्दया नाथ विवान्तवैरे ।
तथापि ते पुण्यगुणस्मृतिर्नः पुनाति चित्तं दुरिताञ्जनेभ्यः ॥
(आचार्य समन्तभद्र, स्वयंभूस्तोत्र, श्लोक 57, वासुपूज्य स्तुति)

अर्थ: हे नाथ, आप वीतराग हैं, इसलिए आपको पूजा से कोई प्रयोजन नहीं; आप वैर रहित हैं, इसलिए निंदा से भी कोई प्रयोजन नहीं। फिर भी आपके पवित्र गुणों का स्मरण हमारे चित्त को पाप रूपी मैल से पवित्र कर देता है।

अर्थात् नंदीश्वर पूजा हो या सिद्धचक्र विधान, उसका फल भगवान् के गुणों का स्मरण और अपने परिणामों की शुद्धि है। चमत्कार की कथाएँ श्रद्धा जगा सकती हैं, पर पूजा का लक्ष्य वीतरागता है, सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति नहीं।


प्रमुख स्रोत:
तिलोयपण्णत्ती (आचार्य यतिवृषभ), भाग 2, अधिकार 5, जैन संस्कृति संरक्षक संघ, सोलापुर, 1956
त्रिलोकसार (आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती), नरतिर्यग्लोकाधिकार, गाथा 973 से 977
तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य उमास्वामी), अध्याय 3 और 4
स्वयंभूस्तोत्र (आचार्य समन्तभद्र), सं. जुगलकिशोर मुख्तार, वीर सेवा मंदिर
जैनकोष: “नंदीश्वर द्वीप”, “लोक”