अरे जिया, जग धोखे की टाटी ।।टेक।।
झूठा उद्यम लोक करत है, जामें निश दिन घाटी।।1।।
जान-बूझ के अंध बने हैं, आँखन बाँधी पाटी ।।2।।
निकल जाएंगे प्राण छिनक में, पड़ी रहेगी माटी।।3।।
'दौलतराम' समझ मन अपने, दिल की खोल कपाटी ।।4।।
Artist - पं.दौलतराम जी
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १७०
अर्थ - हे जीव! यह संसार भ्रम का पर्दा है। यहां लोग ऐसा खोटा व्यापार ( मिथ्या पुरुषार्थ) करते है जिसमे हमेशा हानि ही हानि होती है।

