अपूर्व कार्य करूंगा | Apurva Karya Karunga

नरभव मिला है, मैं अपूर्व कार्य करूंगा।
पाया जिनशासन, अब भव का अभाव करूंगा।
है मेरा निश्चय, है सम्यक् निश्चय। नरभव…।।१।।

मिथ्यात्व वश अनादि काल से ही रुल रहा।
गति-गति में खाते ठोकरें मैं अब तो थक गया ।।
जिनदर्शन से निजदर्शन करके मोह तजूंगा। नरभव…॥२॥

भव से रहित भगवान अंतर मांहिं दिखाया।
भगवान होने का सहज विश्वास जगाया ।।
निज के आनंद से ही निज में तृप्त रहूँगा। नरभव…।।३।।

इन्द्रिय सुखों की कामना अब है नहीं मन में।
उपसर्गों की परवाह नहीं जाकर बसूँ वन में ।।
निर्द्वन्द्व हूँ स्वभाव से निर्द्वन्द्व रहूँगा। नरभव…||४ ।।

देहादि से अति भिन्न हूँ न्यारा विभावों से।
गुण भेद से भी भिन्न हूँ न्यारा पर्यायों से।
स्वाधीन निर्भय एकाकी अतितृप्त रहूँगा। नरभव…||५||

चैतन्य की अद्भुत शोभा ही भाई है मुझे।
अक्षय विभूति सिद्ध सम सुहाई है मुझे ॥
झूठे प्रपंचों में फंस कर दुख अब न सहूँँगा। नरभव…।।६।।

रे कर्म अपने ठाठ तू दिखाता है किसे।
प्रतिकूलताओं का भी भय बताता है किसे ।।
निरपेक्ष ज्ञाता रूप हूँँ ज्ञाता ही रहूँगा। नरभव…।।७।।

निज के लिये निज में भरा है सुख अतीन्द्रिय।।
भोगूँँगा अनंत काल तक बनूँँगा जितेन्द्रिय ।।
है द्वार मुक्ति का मिला अब मैं न रुलूँँगा। नरभव…।।८।।

जिनको अनंतों बार भोग-भोग कर छोड़ा।
हैं वे ही भोग, नहीं नवीन हैं, चित्त है मोड़ा।
अज्ञान वश उच्छिष्ट भोगी अब न बनूँँगा। नरभव…।।९।।

दुख के पहाड़ बाह्य की प्रवृत्ति मार्ग में।
आनन्द की हिलोरें हैं निवृत्ति मार्ग में ।
उल्लास से निवृत्ति के मारग में बढूँँगा । नरभव…॥१०॥

इस मार्ग में कुछ पाप तो होते ही नहीं हैं।
रे पूर्व बंध भी सहज खिरते ही सही हैं।
कैसे कहो फिर दुख की कल्पना भी करूँँगा। नरभव…॥११॥

निंदा करें वे ही जिन्हें कुछ ज्ञान नहीं है।
अनुमोदना करते जिन्हें निज ज्ञान सही है।
कुछ हर्ष या विषाद अब मन में ना धरूँँगा। नरभव…॥१२॥

असहाय परिणमन है सर्व द्रव्यों का सदा।
वाँँछा सहाय की नहीं मन में भी हो कदा ।।
विश्वास निजाश्रय से ही शिवपद भी लहूँगा। नरभव…।।१३।।

स्वभाव से निर्मुक्त हूँ स्वीकार है हुआ।
स्वभाव के सन्मुख सहज पुरुषार्थ है हुआ।
ध्याऊँ सहज शुद्धात्मा सन्तुष्ट रहूँगा। नरभव…॥१४॥

भवितव्य भली काललब्धि आई है अहो।
निमित्त भी मिले मिलेंगे योग्य ही अहो ।
हर हालत में आराधना में रत ही रहूँगा। नरभव…॥१५॥

विघ्नों के भय से मूढ ही निज लक्ष्य नहीं भजते ।
विघ्नों के आने पर भी धीर मार्ग नहीं तजते ।।
निश्चिंत निराकुल हुआ निज साध्य लहूँगा। नरभव…।।१६।।

सब जीवों के प्रति मेरे सहज क्षमाभाव है।
करना क्षमा, मुझको, क्षमा आतम स्वभाव है।
त्यागा हैं मोह, राग-आग में न जलूँगा। नरभव…॥१७॥

पाया है ऐसा मार्ग जिसके बाद मार्ग ना।
पाऊँगा ऐसा सुख जिसके बाद दुख ना ।।
जिसका न हो अभाव वह प्रभुत्व लहूँगा। नरभव…॥१८।।

पाया स्वरूप झूठे स्वांग अब मैं न धरूँँगा।
चैतन्य महल मिला अब भव में न भ्रमूँँगा।
दारिद्र फिर जिसमें न हो वह वैभव लहूँँगा। नरभव…॥१९॥

संयोगों को मैंने वरण किया अनंत बार।
वियोग के दुख के जहाँ टूटे सदा पहाड़।।
निश्चय किया अतएव ध्रुवस्वभाव वरूँगा। नरभव…॥२०॥

तज करके मोह देखो यह आनंदमय है मार्ग।
निःशंक हो आओ सभी आनंदमय है मार्ग ।।
आनंदमय जिनमार्ग का प्रभाव करूंगा। नरभव…॥२१ ।।

इस मार्ग से ही पाया है भगवंत ने भव अंत।
इस मार्ग में विचरें अभी भी ज्ञानी साधु संत ।।
उनका ही अनुशरण कर निजानुभव करूँँगा। नरभव…॥२२॥

चिंता नहीं विभावों की नसेंगे वे स्वयं ।।
निर्ग्रन्थ हो निज भाव में ही रमण हो स्वयं ।।
होता हुआ शिव होगा, सहज ज्ञाता रहूँगा। नरभव…॥२३॥

Artist - ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

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