अप्रसाद क्षेत्र में कौ
अपराध क्षण भर का
प्रकाशकीय
दिनांक 26 दिसम्बर, 1988 से प्रारम्भ हुई श्रीमती धूडीबाई खेमराज गिडिया ग्रन्थमाला के माध्यम से विगत 14 वर्षों से निरन्तर प्रथमानुयोग के आधार पर बाल साहित्य प्रकाशित करने में अग्रणी रही है। अबतक ग्रन्थमाला के माध्यम से जैनधर्म की कहानियों के 14 भागों के रूप में 2 लाख 22 हजार प्रतियाँ एवं चौबीस तीर्थंकर महापुराण (हिन्दी व गुजराती) की 24 हजार प्रतियाँ जन-जन में पहुँच चुकी हैं, फिर भी उनकी निरन्तर माँग बनी हुई है।
कहा जाता है कि बाल्यावस्था में जो संस्कार पड़ जाते हैं, वे अमिट हो जाते हैं। आज के इस दूरदर्शन के युग में बालकों को सही दिशा देने के लिए इसप्रकार के सहज शिक्षाप्रद एवं बोधगम्य बाल साहित्य की जरूरत बहुत महसूस की जा रही है, परन्तु अभीतक मात्र कहानियों के माध्यम से ही उसकी पूर्ति हो रही थी, पर अब हम इस नई कड़ी के रूप में खास कर 5 से 10 तक वर्ष के बालकों को ध्यान में रखते हुए “मुक्ति कामिका” का प्रकाशन प्रारम्भ करते हुए अनन्त प्रसन्नता का अनुभव कर रहे हैं, जिसका प्रथम भाग आपके हाथों में है।
आशा है हमारा यह प्रयास अवश्य ही बालकों के साथ आप सभी को भी लाभप्रद सिद्ध होगा। आप इसे और अधिक उन्नत बनाने हेतु अपना सुझाव व सहयोग अवश्य भेजें।
प्रस्तुत कृति की कीमत कम करने में जिन्होंने सहयोग दिया है अथवा ग्रन्थमाला के सदस्य बनकर सहयोग किया है। हम उन सभी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं एवं आशा करते हैं कि भविष्य में भी सभी इसीप्रकार सहयोग देते रहेंगे। अन्त में, हम कॉमिक्स के लेखक डॉ. योगेशचन्द्र जैन, रेखाकार श्री त्रिभुवन सिंह, रंगकार श्री मनमोहन सोनी एवं मुद्रक जैन कम्प्यूटर्स के विशेष आभारी हैं।
मोतीलाल जैन
अध्यक्ष
प्रेमचन्द जैन
साहित्य प्रकाशन प्रमुख
सम्पादकीय
“अपराध क्षणभर का” भले ही तीर्थंकर महावीर के शिष्य राजा श्रेणिक के जीवन पर आधारित घटनाओं को रेखांकित कर रहा है, परन्तु यह श्रेणिक व चेलना के जीवन की व्याजोक्ति में सम्पूर्ण मानव जीवन के आपराधिक परिणामों का एक चित्रांकन है। अपराधों को अंजाम देने के साथ बहुत लम्बे नहीं हुआ करते, परन्तु उसके परिणाम व बदनामी का काल बहुत कष्टदायी एवं दीर्घजीवी हुआ करते हैं किसी ने कहा है - “कुछ लम्हे खता करते है, परन्तु सदियाँ सजा पाती हैं।”
उपरीलिखित लोक-सिद्धान्त से हमारा पाठक भी शायद सहमत होगा, और सम्पूर्ण श्रेणिक चरित्र से ऐसा ध्वनित भी होता है। अतः हमें अपने परिणामों के सुधार का निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए। जब श्रेणिक के कुछ क्षण के तीव्र परिणाम उसे नरक गति के बन्ध के कारण हुए तो हमारे ऐसे सतत होने वाले परिणामों से क्या गति होगी, इसका गम्भीर विचार एकान्त क्षणों में हमें करना चाहिए, यही इस चित्रकथा के लिखने-पढ़ने का उद्देश्य है, आशा है, सुधी-बालमन इस उद्देश्य की पूर्ति करेगा। ऐसी भावना के साथ…
- डॉ. योगेशचन्द्र जैन, अनेकान्त फार्मा, अलीगंज
अपराध क्षण भर का
आलेख एवं सम्पादन - डॉ. योगेशचन्द्र जैन
एम. ए. पी एच डी., जैनदर्शनाचार्य
रेखाकार - त्रिभुवन सिंह यादव
रंगकार - मनमोहन सोनी
प्राचीन काल में मगध देश की राजधानी राजगृह में एक राजा राज्य करता था, उसके श्रेणिक आदि 500 पुत्र थे।
वह बहुत दयालु व निरभिमानी था, परन्तु उसका पड़ोसी राजा सोमशर्मा अहंकारी, ईर्ष्यालु व निर्दयी था। अतः सोमशर्मा की दूषित प्रजा का दुख दूर करने के लिए एक दिन दयालु राजा ने चढ़ाई कर दी।
दयालु राजा ने युद्ध जीतकर सोमशर्मा का अहंकार तोड़कर राज्य भी वापस कर दिया।
मैं हार तो गया… परन्तु तुमसे बदला लेकर रहूँगा…
मुक्त कॉमिक्स
और तब सोमशर्मा ने बदला लेने के लिए एक चाल चली, एक भयानक खूंखार घोड़ा…
जाओ इसे श्रेणिक के पिता को बेच दो।
और सारी योजना समझा दी।
घोड़ा लेकर व्यापारी श्रेणिक के पिता के दरबार में जा पहुँचा।
ओह वाह ! यह कोई सामान्य घोड़ा नहीं, अश्वरल है अश्वरल।
ऐसा घोड़ा तो घुड़साल में भी नहीं।
और फिर बिना सोचे समझे राजा ने घोड़े पर बैठकर एवं लगा दी, घोड़ा जंगल को और ले भागा।
कुछ गड़बड़ लगती है।
बिना सही जानकारी के कोई कार्य नहीं करना चाहिये। कहीं कुछ…
अपराध क्षण भर का
यह समाचार सुनकर शहर में भगदड़ मच गई। रानियाँ मूर्च्छित हो गई और सैनिक घोड़ा पकड़ने के लिए पीछे-पीछे भागे।
उधर घोड़ा राजा को एक भयानक जंगल में ले गया और गहरे गड्ढे में गिरा दिया।
आह ! बचाओ।
परन्तु हताश ! सैनिक राजा को खोज न सके।
तभी एक व्यक्ति वहाँ से गुजरा।
ये कराहने की आवाज !
आह ! आह !
आवाज को सुनकर वह गड्ढे के पास आया।
भाई ! तुम कौन हो ? ठहरो ! अभी निकालता हूँ।
मुक्त कॉमिक्स
और वह राजा को निकाल कर अपनी झोपड़ी की ओर ले चला।
झोपड़ी में लिटाकर राजा की बेहोशी दूर करने का यत्न करने लगा।
थोड़ी देर बाद राजा को होश आया।
राजा अरे तुम कौन हो ?
व्यक्ति मैं यहाँ कहाँ हूँ ?
व्यक्ति मैं भीलों का राजा यमदड़ हूँ, आप मेरे जंगल में है।
तो राजा ने सारी घटना सुनाते हुए अपना परिचय दिया।
यमदड़ मैं यह तो जानता था कि सोमशर्मा दुष्ट है, धोखेबाज है, परन्तु घोड़ा भी दुष्ट होगा…?
राजा ठीक है राजन ! आखिर जानवर ही तो है, जिसकी खाता है, उसकी निभाता है।
अपराध क्षण भर का
और फिर शाम के समय
भोजन हेतु पधारे राजन!
नहीं! नहीं! मैं शुद्ध शाकाहारी
अब समझा, मेरी बेटी धार्मिक प्रवृत्ति की है, उसने ही क्रियापूर्वक बनाया है।
तो राजा ने सहर्ष शुद्ध भोजन स्वीकार किया
बहुत ही स्वादिष्ट है
राजा भीलकन्या के व्यवहार से बहुत प्रभावित हुआ और उस पर मोहित भी..
दूसर दिन भीलराज के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा तो…
इस घनघोर जंगल में भी इतना रूप लावण्य और गुणवती भी… मुझे शादी का प्रस्ताव…।
यह तो मेरा अहो भाग्य होगा, परन्तु…
देर रात तक राजा सोचता रहा
सुक्ति कामिक्स
परन्तु क्या? निःसंकोच कहो
आपके तो बहुत-सी रानियाँ हैं, मेरी पुत्री तो दासी मात्र बनकर रह जावेगी। उसकी संतान भी ऐसी ही रहेगी।
भीलराज ने अपनी पत्नी व पुत्री से सहमति माँगी।
नहीं! नहीं! हम उसे पटरानी बनायेंगे। और उसका पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी होगा
जैसा आप ठीक समझें
शुभमुहूर्त में भीलराज यमदंड की पुत्री तिलकवती की शादी सानन्द सम्पन्न हुई।
उसके बाद राजा ने अपने राज्य को प्रस्थान किया।
अपराध क्षण भर का
राजा के आगमन का समाचार सुनकर राज्य में खुशी छा गई।
राजा अपने राज्य लौटकर राजकाज देखते हुए पटरानी तिलकवती के साथ जीवन-यापन कर रहा था कि एक दिन…
बधाई हो! बधाई हो!!
राजन! पटरानी साहिबा के पुत्ररत्न हुआ!
अच्छा! चिल्लाती के जन्म का शुभ समाचार… लो ये…
इस तरह काफी दिनों राज्य करते हुए राजा वृद्ध हो गया, उसे चिन्ता हुई…
काफी सोचकर राजा ने विशेष विद्वानों को बुलाया
इसके लिए तो राजकुमारों की बुद्धि परीक्षा करनी चाहिए
यहो उत्तम है।
मैं अब किस पुत्र को राज्य दूँ वचन तो चिल्लाती को दिया है…
मुक्ति कामिक्स
दूसरे दिन राजा ने राजकुमारों से सारी बात कही।
पिताश्री हम आपकी बात समझ गए है, हम अपनी योग्यता की परीक्षा के लिए तैयार हैं…
राजा प्रिय पुत्रों ! करोड़ी पर कसे बिना न सोना पहचाना जाता है और न ही उसका मूल्य ही मिलता है, वैसे ही…
बात सुनकर राजा ने घड़े में ओस लाने का कहा।
परन्तु श्रेणिक ने रुई से केले के पत्ते पर रखी ओस को बटोरकर घड़ा भरा।
राजा की बात से सभी राजकुमार असमंजस में पड़ गए…
तत्पश्चात् राजा ने दूसरी परीक्षा ली। लड्डुओं से भरी टोकरी के मुँह को बिना खोले लड्डू खाने को कहा।
राजकुमार मुझे तो जोरों से भूख लगी है।
परन्तु श्रेणिक ने टोकरी को जोर-जोर से हिलाकर लड्डू फोड़ डाले और उसमें से गिरे चूरे को खाया।
अपराध क्षण भर का
जब दो परीक्षाओं में श्रेणिक जीत गया तो एक परीक्षा गुप्त रूप से ली गयी।
राजकुमार आग ! भागो ! भागो !
राजकुमार मेरे कपड़े
राजकुमार मेरा भोजन
परन्तु श्रेणिक छत्र-चमर, सिंहासन राजचिन्ह लेकर भागा…
सभी परीक्षाओं में
जीते श्रेणिक की बुद्धि से राजा प्रभावित भी हुआ और चिन्तित भी…
राजा राजा बनने के लक्षण तो श्रेणिक में हैं…! परन्तु अब चिल्लाती को राज्य देने के मेरे वचन का क्या होगा ?
मंत्री चिन्ता क्यों करते है राजन् ! अबकी बार वह नहीं जीत सकेगा।
योजनानुसार दूसरे दिन जब सभी को एक साथ भोजन परोस दिया। तभी अचानक…
राजकुमार हाय ! मेरे चूरमे को क्या होगा
राजकुमार मेरे लड्डू
राजकुमार अरे ! मेरा ही चूरमा बन गया
परन्तु श्रेणिक कुत्तों की तरफ भोजन फेंकता गया और दूसरे हाथ से स्वयं खाता गया।
मुक्ति कामिक्स
राज्य प्राप्ति के सभी लक्षण धीरता-वीरता व सौभाग्य आदि श्रेणिक में देखकर तो राजा घोर चिन्ता में ही पड़ गया। उसने अपने मंत्री सुमति व अतिसार से विचार किया।
राजा राजा के योग्य तो श्रेणिक ही है, परन्तु वचन तो…
मंत्री चिन्ता न करें राजन् ! हमने उपाय सोच लिया है।
मंत्री बस हमें तो आपकी आज्ञा चाहिए…
राजाज्ञा से वे मंत्री श्रेणिक के पास गये।
मंत्री वाह ! अब हमसे ही अपराध पूछते हो। कल बड़े मजे से कुत्तों के बीच भोजन… छी…छी…छी… शर्म आनी चाहिये
मंत्री कुमार ! महाराजा आपसे सख्त नाराज है, अतः आपको यह देश छोड़कर…
श्रेणिक परन्तु मेरा अपराध ?
श्रेणिक मंत्रीवर ! उस समय तो यत्न से भोजन की रक्षा ही योग्य थी। जो राजकुमार अपने भोजन पात्रों की ही रक्षा नहीं कर सकता, वह प्रजा की क्या रक्षा करेगा ? अतः आपका कहना न्यायसंगत नहीं है।
मंत्री अरे ! अब बहस का समय नहीं है। अभी तो शान्ति ही श्रेष्ठ है, सिंह भी शान्ति से दो कदम पीछे हटकर अपने लक्ष्य को जानता है। अतः तुरन्त यह देश छोड़ने में ही भलाई है।
अपराध क्षण भर का
तब श्रेणिक ने काफी सोचा-समझा; और माँ को बिना बताये ही चल दिया।
श्रेणिक की माँ व प्रजा ने जब यह सुना तो…
हा देव! ऐसा कौन-सा अपराध किया, जो पुत्र वियोग सहना पड़ रहा है
इधर भूखे-प्यासे जंगल में भटकते श्रेणिक को इन्द्रदत्त नामक सेठ मिला…
और वे नन्दियाम के सरपंच के यहाँ पहुँचे।
इन्द्रदत्त चलो मामाश्री! किसी पास के गाँव में चलकर भोजन तलाश करें।
सरपंच चलो भ्रामी यहाँ से मैं तो तुम्हें पानी भी न दूँ, भोजन का तो प्रश्न ही नहीं.. पता नहीं कहाँ-कहाँ से…
इस तरह अपमानित भूखा-प्यासा श्रेणिक बौद्ध साधुओं के मठ में जा पहुँचा।
बौद्ध साधु भविष्य में यह मनुष्य निश्चित रूप से राजा होगा। इससे उत्तम व्यवहार करना अच्छा रहेगा।
बौद्ध साधु आइये-आइये…नरश्रेष्ठ! पहले भोजनदि से प्रसन्न होइयेगा।
बौद्ध साधु यह आश्रम आपका ही है! यहाँ कुछ दिन रहकर इसे शोभित करें।
मुक्ति कामिक्स
बौद्धमठ में कुछ दिनों रहकर शिक्षा प्राप्त करने पर एक दिन बौद्धाचार्य ने कहा…
बौद्धाचार्य आप बौद्धधर्म स्वीकार कर लें! इससे आपको राज्य व सुख की निःसन्देह प्राप्ति होगी।
बौद्धाचार्यों की सेवा सहानुभूति व उपदेश से प्रभावित होकर श्रेणिक बौद्ध बन गया।
बुद्धं शरणं गच्छामि
श्रेणिक बौद्धधर्म अपनाकर अपने “मामाश्री” के साथ दूसरे गाँव चल दिया।
परन्तु मामाश्री कुछ न समझे और मौनपूर्वक चलते-चलते उन्हें एक नदी मिली तो वे नदी पार करने लगे।
मामाश्री मामाश्री रास्ता बहुत लम्बा है, क्यों न हम जिन्दा रूपी रथ पर सवारी करें।
श्रेणिक पहले जूते उतार लूँ, परन्तु इसने क्यों पहन लिये? अभी तक तो नंगे पैर चल रहा था। भूख लगती है…
नदी पार करने के बाद वे काफी चल दिये तो…
वृक्ष के नीचे इन्द्रदत्त ने छतरी बन्दी कर ली, जबकि श्रेणिक ने खोल दी।
इन्द्रदत्त चलो! वहाँ वृक्ष के नीचे विश्राम कर लें…
श्रेणिक यह कोई साधारण मूर्ख नहीं! लोग तो धूप में छतरी लगाते हैं, जबकि यह यहाँ खोल रहा है!
अपराध क्षण भर का
आराम करने के बाद वे फिर चलने लगे, चलते-चलते वे एक शहर पहुँचे।
इन्द्रदत्त भानजे! तेरे उत्तर तो नहीं मालूम, पर इतना अवश्य पता है कि तेरी बुद्धि उजड़ चुकी है, मुखराज कहीं का…
श्रेणिक “मामाश्री” वह स्त्री बाँधी है या खुली, तथा यह शहर उजड़ा हुआ है या बसा हुआ?
श्रेणिक इस प्रकार के अटपटे प्रश्न करते हुए आगे बढ़ रहा था कि तभी…
परन्तु श्रेणिक को मुखविराज समझकर इन्द्रदत्त आगे बढ़े जा रहा था कि तभी उसे अपना गाँव दिखा।
इन्द्रदत्त मैं तो चला गाँव, पर तू यहीं ठहर, कहीं न जाना, समझे! किसी को भेजूँगा…
श्रेणिक मामाश्री! यह मनुष्य आम मरा है कि जन्म से मरा है?
श्रेणिक वहीं बैठ गया।
घर पहुँचकर सेठ ने रास्ते का सारा समाचार कह सुनाया।
इन्द्रदत्त की पत्नी मुझे तो श्रेणिक बहुत मूर्ख लगा बेटी।
इन्द्रदत्त की बेटी अरे! वह मूर्ख नहीं, बहुत बड़ा विद्वान् है विद्वान्।
इन्द्रदत्त की पत्नी वह कैसे?
मुक्ति कामिक्स
पिता द्वारा श्रेणिक के आचरण को सुनकर नन्दश्री बहुत प्रभावित हुयी; उसने कहा…
- तुम्हें मामा कहकर वह तुमसे स्नेह चाहता था।
- जिह्वा रथ का अर्थ कथा-कौतुहल करना है।
- जल में जूता न पहिनने से काँटे, पत्थर व सर्प आदि के काटने का भय रहता है।
- वृक्ष के नीचे छतरी न लगाने से पक्षियों की ‘बीट’ गिरने का भय रहता है।
- वही शहर बसा हुआ है, जहाँ जिनमन्दिरादि है और विवाहिता स्त्री बंधी हुई व कुंवारी मुक्त है।
- स्वाध्यायी, दानी, धर्मात्मा के मरने पर हाल का मरा हुआ व इनसे रहित जन्म से मरा हुआ है।
यह जानकर इन्द्रदत्त बहुत प्रभावित हुआ और “नन्दश्री” ने रूपवान श्रेणिक को बुलाने अपनी दासी को सब कुछ समझाकर भेज दिया।
दासी आपको मेरे स्वामी ने निमन्त्रित किया है।
श्रेणिक कमाल है? काम में तालवृक्ष का पत्ता क्यों पहिने थी? और घर भी नहीं बताया!.. आह! अब समझा…
यह तो ठीक है, परन्तु उनका घर कहाँ है और किस जगह है।
अपराध क्षण भर का
इधर नन्दश्री श्रेणिक के आगमन की प्रतीक्षा करने लगी…
उधर श्रेणिक दासी के दिखाये संकेत को खोजने लगा…
श्रेणिक [दासी के घर के पास पहुँचकर] सुन सखी! कुमार के आने का समय हो गया! दरवाजे पर मैंने जैसा करने को कहा, वैसा कर दिया। अब देखती हूँ वह कितना चतुर है…
श्रेणिक [दासी के घर के पास पहुँचकर] अर! वही है तालवृक्ष… उसी का पत्ता दासी ने कान में लगाया था। वही घर है।
जब श्रेणिक ‘नन्दश्री’ के द्वार पर आया…
फिर तो श्रेणिक ने कीचड़ में ही चलने का निर्णय लिया।
श्रेणिक गजब है अभी तो बरसात भी नहीं है, शहर में कहीं भी कीचड़ नहीं था, यहाँ ही क्यों है? और ईंट भी रखी हैं, इन पर पैर रखूँगा तो गिरूँगा.. हँसी होगी…
श्रेणिक [दासी को देखकर] आश्चर्य! वाह! ऐसी चतुराई और कहाँ
दरवाजे पर आने के समय गिलास भर पानी लाया गया…
एक क्षण विचारकर श्रेणिक ने तालवृक्ष के पत्तों व लकड़ी से खुरचकर कीचड़ साफ की और…
श्रेणिक कहो तो इतना कीचड़ और कहो इतना-सा पानी? इससे कीचड़ धुल सकेगा?
श्रेणिक [दासी को देखकर] अब इस थोड़े से जल से पैर धोऊँ।
मुक्ति कामिक्स
श्रेणिक महल में प्रवेश करते पर “नन्दश्री” ने श्रेणिक से भोजन के लिए निवेदन किया।
श्रेणिक हे मनोरमणी! मैं भोजन वही करूँगा, जो मेरी प्रतिज्ञा के अनुसार होगा।
नन्दश्री पर… आपकी प्रतिज्ञा।
नन्दश्री “नन्दश्री” के द्वारा आग्रहपूर्वक पूछने पर…
श्रेणिक इन १२ चावलों से ही जो दूध-दही युक्त सरस भोजन बना सके।
नन्दश्री ठीक है, ऐसा ही होगा।
नन्दश्री “नन्दश्री” ने १२ चावलों का रहस्य समझाकर दासी को बाजार भेजा…
श्रेणिक ये मंत्रित गोलियाँ हैं, जिसके पास होगी, वह सदा सफल रहेगा…
नन्दश्री अच्छा! ऐसा है, तो ये लो अशर्फ़ी और दो ये गोली।
नन्दश्री चावल से बनी गोलियों को बेचकर उसने दूध-दही खरीदकर मिष्ठान बनाये।
श्रेणिक वाह! वाह! भोजन तो बहुत ही स्वादिष्ट है…
इस तरह कुछ दिनों रहते हुए उनमें परस्पर प्रेम हो गया। उनके प्रेम को देखकर सेठ इन्द्रदत्त ने शुभमुहूर्त में विवाह कर दिया…
श्रेणिक जोड़ी भी क्या खूब बनी…
अपराध क्षण भर का
उसी नगर में रहते हुए नन्दश्री ने एक पुत्ररत्न को जन्म दिया।
तभी अचानक श्रेणिक के एक ख़ास व्यक्ति ने पिता की मृत्यु व चिलाती के राजा होने का सन्देश व एक गुप्त पत्र लाकर दिया।
नन्दश्री बिल्कुल तुम्हारे जैसा है, बुद्धिमान् और अभय…
श्रेणिक कैसा है, मेरा लाल
योजनानुसार श्रेणिक ने अपने पिता के घर जाने का निर्णय लिया…
श्रेणिक के आने का समाचार मगध देश में फैल गया।
श्रेणिक प्रिये ! मेरा जाना ज़रूरी है। अतः जब तक मैं न बुलाऊँ तुम अपने पिता के घर पर ही रहना…
श्रेणिक अब हम पर हो रहा अत्याचार समाप्त हो जायेगा।
नन्दश्री श्रेणिक आये समझो हमारी शान्ति आ गयी।
जब चिलाती ने यह सुना तो वह मरे डर के कुछ सोना चाँदी लेकर गाँवब हो गया।
उधर सारे मंत्री व नागरिक श्रेणिक को राजा बनाने के पक्ष में हो गये और उसे गाजे-बाजे के साथ राजदरबार में प्रवेश कराया।
मुक्ति कामिक्स
महाराजा श्रेणिक को एक दिन बीते दिन याद आने लगे।
फलस्वरूप राजा ने मंत्री को बुलाकर नन्दिग्राम खाली करने का आदेश दिया।
नन्दीग्रामवासियों ने मुझे बुरे दिनों में भोजन तक नहीं दिया था, अब अपमान का बदला लेकर रहूँगा।
मंत्री पर महाराज ! इससे तो आपकी बहुत बदनामी होगी।
जब श्रेणिक ने पूरी घटना कह सुनायी तो… मंत्रियों ने क्रोध को शान्त करने की कोशिश की।
मंत्री महाराज ! अन्याय से तो राज्य में पापियों की ही संख्या बढ़ेगी।
मंत्री राजन् ! आप क्षमाशील हैं, कृपालु हैं, आप उन्हें क्षमादान करने को श्रेष्ठ रहेगा।
मंत्री स्वामी ! राजा के न्यायवान होने से प्रजा भी न्यायप्रिय होती है।
अपराध क्षण भर का
नीतियुक्त वचनों से राजा का क्रोध तो शान्त हो गया। परन्तु बदला लेने की युक्ति सोचने लगा। एक दिन…
बकरा लेकर राजा का नोकर नन्दि गाँव चल दिया…
राजा जाओ ! इस बकरे को नन्दिग्राम वालों को देकर आओ। और उनसे कहो कि इसे खूब खिलायें। परन्तु सावधान ! यह न तो मोटा होवे न ही वजन बढ़े। अन्यथा राजदण्ड…
गाँववालों ने जब राजाज्ञा सुनी तो उनके होश उड़ गये।
गाँववाले अब हमें क्या करना चाहिये ?
गाँववाले सभी लोग उस बच्चे के पास गये उसने कहा…
बच्चा अरे, याद आया अपने गाँव में अभी-अभी एक बुद्धिमान् बच्चा आया है। चलो वहाँ ही कुछ तरकीब…
बच्चा इसे दिन में खूब खिलाओ !
बच्चा और रात में शेर के सामने बाँध दो
एक माह बाद जब बकरे को राजदरबार में ले जाया गया तो…
मुक्ति कामिक्स
श्रेणिक ने दूसरी आज्ञा दी
इस हाथी का वजन तौलकर ले आओ।
गाँव वाले फिर उस बालक के पास गये।
चिन्तित होने की बात नहीं इसे नदी के किनारे ले चलो।
नाव पर खड़ा करके जितनी डूब जाए उतने पर निशान लगाओ।
अब इस पर इतने ही निशान तक कंकड़ पत्थर डालकर उन्हें तराजू से तौल लो।
गाँव वाले हाथी का वजन बतलाने राजदरबार गये।
देने के इतने बहाने किए परन्तु ये आड़े हाथ नहीं आ रहे।
असफलता देखकर श्रेणिक बहुत क्रोधित व दुःखी हुआ। उसने
पुनः आज्ञा दी।
जाओ! शीघ्र ही बालू की रस्सी बनाकर लाओ वर्ना मृत्युदण्ड…
अपराध क्षण भर का
इस आदेश से सभी चिन्तित हुए।
यह बालक न होता तो हम कभी के…
वह तो हमारा भगवान् है।
सभी बालक के पास गये उसने उपाय बताया।
दूसरे दिन वे श्रेणिक के यहाँ..
हम ऐसा ही करेंगे।
राजन!
बालू की दूसरी रस्सी मिले तो वैसी ही सेवा में हाजिर कर दे अन्यथा हमारा अपराध क्षमा कर दे।
सही उत्तर सुन श्रेणिक सोचने लगा…
यह सोचकर श्रेणिक ने गुप्तचरों को आदेश दिया।
वहाँ अवश्य ही कोई बुद्धिमान् आया है, इनमें इतनी बुद्धि है ही नहीं…
पता करो, इनको कौन बचने का रास्ता बतलाता है।
मुक्ति कामिक्स
गुप्तचर गाँव जाते हैं।
जब श्रेणिक को गुप्तचरों ने समाचार दिया
यही सबसे बुद्धिमान् बालक है।
सुना है, यही राजकुमार ‘अभय’ है।
रानी नन्दश्री व पुत्र अभय को उत्सवपूर्वक ले आओ।
एक दिन किसी चित्रकार ने एक चित्र भेंट किया।
ये सुन्दरी कौन है?
किस देश के राजा की पुत्री है?
और इस महल की रानी कैसे बन सकती है।
राजन!
सिन्धु देश के राजा चेटक की सात कन्याओं में यह छठवीं है, परन्तु…
परन्तु क्या…?
मैं तो बौद्ध हूँ, पर एक उपाय है…
वह वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु भक्त श्रावक को ही अपनी कन्या देता है।
अपराध क्षण भर का
पिता की आज्ञा से ‘अभय’ जैन श्रेणियों को तैयार करके चेटक जा पहुँचा और सावधानीपूर्वक जैन होने का नाटक करते हुए पूजा पाठ करने लगा…
इनके बहुत धर्मात्मा होने की खबर राजा चेटक तक भी पहुँची। तभी अभय वहाँ पहुँचा।
अभय
हम जौहरी बच्चे हैं और अनेक देशों में घूमते हुए यहाँ आये हैं। यहाँ कुछ दिन ठहरना चाहते हैं।
चेटक
हाँ, हाँ! क्यों नहीं आप तो सज्जन हैं, हमारे ही महल में ठहरें।
राज कन्याएँ प्रतिदिन इनकी पूजन भक्ति देखकर अत्यधिक प्रभावित हुई, एक दिन…
राज कन्याएँ
आप धन्य है! आप जैसा भक्त, ज्ञानवान व रूपवान हमने आज तक नहीं देखा…
अभय
आपका देश कौनसा है व वहाँ के राजा कौन है?
राज कन्याएँ
हम मगध देश के जैनधर्म भक्त, रूपवान, गुणवान राजा श्रेणिक की प्रजा है।
मुक्ति कामिक्स
राज कन्याएँ
राजा श्रेणिक के ज्ञान की प्रशंसा सुनकर वे कन्याएँ उनसे विवाह के लिए ललचाने लगीं एक दिन वे चुपचाप अभय के पास आयीं।
राज कन्याएँ
कहाँ तो वे पुरुषोत्तम, और कहाँ हम…
राज कन्याएँ
अब हमारी आँखों में नींद कहाँ, जब तक…
राज कन्याएँ
महान् श्रेणिक हमारे पति कैसे हों, वह उपाय बतावें।
अभय
परन्तु वे ही हमारे स्वामी हों… नहीं तो यह जीवन बेकार है।
उन कन्याओं की बातें सुनकर अभय मन ही मन प्रसन्न हुआ। और एक गुप्त सुरंग बनाकर उन्हें भगा ले गया।
अभय
सुरंग के बाहर चेलना ही आयी। और बहिन चंदना, रास्ते से लौट गयी। चेलना को रथ पर बैठाकर राजगृह ले आये।
अभय
सेठ इन्द्रदत्त के यहाँ चेलना को ठहरा दो।
सेठ इन्द्रदत्त
जैसी आज्ञा।
अपराध क्षण भर का
श्रेणिक से शादी के बाद चेलना ने ‘कुणिक’ को जन्म दिया, तभी एक ज्योतिषी आया।
ज्योतिषी
अपने पुत्र को इतना प्यार कर रही हो, पता है यही अपने पिता की मृत्यु का कारण होगा।
चेलना
नहीं, हरगिज नहीं। उसे वापस ले आओ।
एक दिन बौद्ध साधुओं के राजमहल में आने पर उसे अचानक ध्यान आया।
चेलना
अरे यह तो कभी जैन साधु नहीं आते? जिन पूजन भी नहीं होता, यहाँ तो सभी विधर्मी है!
श्रेणिक
आह! अपने को जैन बताकर पुत्र अभय ने ठग लिया है। मैंने कौनसा पाप किया था, जो जैनधर्म से विमुख होना पड़ा।
दुःखी चेलना ने खाना-पीना छोड़ दिया। जब श्रेणिक को पता चला तो वे बहुत दुःखी हुए और बहुत समझाया, परन्तु हार गये।
चेलना
स्वामी! जैनधर्म व जैन साधु ही श्रेष्ठ है। ये जीव जन्तुओं पर दया भी करते है। फिर आप ही बतावें कि हम इस सुखकारी धर्म को कैसे छोड़ें?
श्रेणिक
ठीक है, जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। परन्तु दुःखी न रहो।
मुक्ति कामिक्स
यह जानकर बौद्ध साधु भयभीत होकर श्रेणिक के पास आये।
अनुकूल उत्तर पाकर रानी धर्माराधना करते हुए महल में ही सभी को जैनागम पढ़ाने लगी।
बौद्ध साधु सुना है रानी… इससे तो बौद्ध धर्म रसातल में पहुँच जाएगा।
श्रेणिक मैंने बहुत समझाया… पर वह मानती ही नहीं।
तब बौद्ध साधु रानी चेलना को समझाने आये।
बौद्ध साधु देख रानी ! तेरा जैनधर्म कदापि श्रेष्ठ नहीं। भक्खुओं व नंगों का यह धर्म ज्ञान-विज्ञान रहित है।
बौद्ध साधु अरे इन दीन-दरिद्रों की सेवा करोगी, तो ऐसा ही फल पाओगी। हमने अपनी सर्वज्ञता से ऐसा जाना।
रानी चेलना नहीं ! नहीं ! जैन साधु तो महान् शूरवीर, निर्विकारी व विद्वान् होते हैं। तुम लोग दम्भी व कायर हो इसलिए शहर में रहते हो, और अपने पापों को ढकने के लिए वस्त्र पहनते हो…
अपराध क्षण भर का
भोजनोपरांत जब वे जाने लगे तो…
अगले दिन उसने सभी बौद्ध साधुओं को भोजन कराया।
बौद्ध साधु मेरे जूते कहाँ है? यहीं तो…
श्रेणिक पर आप तो सर्वज्ञ है, आपको यह भी पता नहीं, तो मेरे अगले जन्म का क्या पता होगा।
अनुगृहीत होकर साधु बहुत अपमानित हुए। और राजा से शिकायत की। राजा श्रेणिक, रानी को नीचा दिखाने का अवसर तलाशने लगा। एक दिन जंगल में…
श्रेणिक अरे ! वो नंगा कौन खड़ा है?
श्रेणिक राजन् ! यही तो गंदा, मूर्ख व अभिमानी चेलना का गुरु है।
इतना सुनते ही क्रोध से तमतमाये श्रेणिक ने उन पर भयंकर शिकारी कुत्ते छोड़ दिये।
परन्तु जब कुत्तों ने साधु की शांत मुद्रा देखी तो…
मुक्ति कामिक्स
इस दृश्य से राजा और क्रोधित हुआ, तभी उसे एक साँप दिखा और
साँप को मारकर यशोधर मुनि के गले में डालकर वह चला गया।
श्रेणिक लगता है, मांत्रिक है, कुत्तों का मुँह बन्द कर दिया… तो ये ले।
श्रेणिक राजा ने तीसरे दिन यह घटना चेलना को सुनायी।
रानी चेलना हाय ! यह तो बहुत बुरा किया। काश ! मैं कुँवारी ही रहती।
श्रेणिक अरी ! बावली क्यों होती है? वह पाखण्डी तो अब तक साँप फेंक कर भाग गया होगा।
रानी चेलना नहीं… नहीं.. वे साधु तो उपसर्गों समझकर पर्वत की तरह अचल रहकर ध्यान में लीन हो गये होंगे…
श्रेणिक ऐसी बात है? तो चलो अभी चलकर देख लेते हैं, सत्य सामने आ जायेगा।
अपराध क्षण भर का
रात्रि में ही वहाँ जाकर देखते हैं, ध्यान में लीन मुनि का शरीर चींटियों से भरा पड़ा है।
पुरुष
आह! भयंकर उपसर्ग… शरीर को काट लिया है, आह! कितनी सूजन… कोई उपाय…।
और जमीन में खांड डालकर चींटियों को शरीर पर से उतारने लगी…
इस तरह चींटियों को दूर किया।
सुबह मुनिराज ने दोनों को ही आशीर्वाद दिया।
मुनि
अरे! ये क्या? आश्चर्य, मैंने तो अहित किया, फिर भी मुझे धर्मवृद्धि का आशीर्वाद। ये कितने महान् हैं, और मैं सचमुच में निन्दा का पात्र…
मुनि
अरे! अपनी भूल पर इतना खेद क्यों?
वह तुम्हारा शिक्षक है, उससे शिक्षा ग्रहण करके भूले हुए भगवान् को याद करो।
भगवान् बनने के सामर्थ्य को जानो, पहचानो, स्वीकारो…
पुरुष
मेरी सुप्त सामर्थ्य को ललकारने वाले तुमने मेरे मन की बात कैसे जान ली?
मुक्ति कामिक्स
कुछ दिनों बाद विपुलाचल पर्वत पर भगवान् महावीर का समवसरण आया। श्रेणिक ने वहाँ जाकर हजारों प्रश्न पूछे।
श्रेणिक
भगवन्! मेरे मुनि बनने के भाव क्यों नहीं होते?
भगवान् महावीर
क्योंकि तुमने नरक का बन्ध कर लिया है, परन्तु वहाँ से निकलकर उत्सर्पिणी के प्रथम काल में ‘महापद्म’ नामक पहिले तीर्थंकर होगे।
उधर राजा कुणिक सोचने लगा।
यह सुनकर राजा अपने पुत्र कुणिक को राज्य देकर स्वाध्याय आदि करने लगा।
कुणिक
पिता ने बाल्यकाल में मुझे जंगल में फिकवा दिया था।
फलस्वरूप उसने मंत्री को आदेश दिया।
कुणिक
जाओ! उस दुष्ट को बंदी बनाकर घोर यातना दो…
एक दिन जब कुणिक भोजन कर रहा था तो…
अपराध क्षण भर का
परन्तु कुणिक ने कुछ भी ध्यान नहीं दिया… उसने
कुणिक की माँ
माँ! मेरे समान इस जगत् में पुत्र मोही कोई न होगा।
कुणिक की माँ
अरे! तू ही क्या, सभी का पुत्र मोह ऐसा ही होता है। याद है, बचपन में जब तेरी अंगुली में फोड़ा हुआ था, तो दुर्निधि की परवाह न करके तेरे पिता ने ही मुँह में मेरी अंगुली डालकर मवाद चूसकर फेंका था। तब तुझे आराम मिला था।
सारी बात जानकर कुणिक का भ्रम दूर हुआ, और बहुत दुःखी हुआ।
कुणिक
जिसने तुझे पढ़ाया-लिखाया राज्य-सम्पदा दी। उसके साथ ऐसा क्रूर व्यवहार, धिक्कार है तुझे अरे पापी! कृतघ्नी!
उन्हें मुक्त कर और चरणों को छूकर माफी माँग।
कुणिक की माँ
हाँ माँ! मैं नीच हूँ, पशुतुल्य हूँ। क्षमा कर माँ मैं अभी जाकर उन्हें छुड़ाता हूँ।
तभी कारागृह की ओर आते कुणिक को देखकर श्रेणिक सोचता है।
इसी घबराहट में वह पैनी सलाखों से जा टकराया और…
श्रेणिक
इतने दिनों से भूखा-प्यासा… उस पर इतना अपमान… हे भगवान् और नहीं सहा जाता… अरे! शायद यही… अब और दुःख देने…
श्रेणिक
आह! मैं अपराधी क्षणभर का…
मुक्ति कामिक्स
पिता की मृत्यु देखकर कुणिक के तो होश ही उड़ गए। चेतना बेहोश हो गई। सम्पूर्ण देश में हा-हाकार मच गया।
चेतना आह! अपराधी मैं क्षणभर का
चेतना अपराधिनि मैं… क्षणभर…
और फिर इस असार संसार का स्वरूप पहचान कर भवभोगों से सर्वथा उदासीन होकर चेतना रानी ने चंदना नाम की आर्यिका से दीक्षा ले ली।
ॐ हमारे प्रकाशन ॐ
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श्रीमती धुड़ीबाई खेमराज गिगिया ग्रंथमाला का 22वाँ पुष्प
मंगलायतन, अलीगढ़ में आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव के अवसर पर (31 जनवरी, 2003)
प्रथम संस्करण - 6000 © सर्वाधिकार सुरक्षित मूल्य - दस रुपये मात्र
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स्रोत: Gyata संग्रह।
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