स्मृति-भ्रंश संसारमें एक असीम दुखका कारण है। मानव, जब अपनी स्मृति खो बैठता है, तो उसका जीवन कितना पराधीन, व्यथित और आकुल हो जाता है, यह वही समझ सकता है जिसने कभी जीवनमें अपनी स्मृति खोकर विवशता, व्यथा और आकुलताओंका सामना किया हो। अन्यथा स्मृति-भ्रंशके असीम दुखकी उस व्यक्तिको कहांसे अनुभूति हो सकती है जो इस स्थितिक परिवर्तन-चक्रसे अपरिचित हैं। आज आत्माराम जो इतने कष्ट झेल रहा है और अनादिकालसे झेलता आ रहा है, जिनक इयत्ताकी कोई भी कल्पक कल्पना नहीं कर सकता। भला किसीने कभी इसका भी लेखा लगाया है कि इस संकट-सन्तति को झेलते रहनेका क्या हेतु है ? हमारे अध्यात्म-कला-कुशल कविवर दौलतरामजीने आत्मारामकी इस दुर्वह दुःख-परम्पराक हेतुको खूब समझा है और बतलाया है कि आत्माराम, तू अपने स्मृति-भ्रंशके कारण ही इतनी यातनाएं झेल रहा है, जिस प्रकार तोता अपनी आकाश-गति भुलाकर नलिनीक बन्धनमें फंसकर व्यथातुर होता है। कविकी अलौकिक लयपूर्ण वाणीका स्वर सुनियेः-"अपनी सुधि भूल आप, आप दुख उपायौ । ज्यों शुक नभ चाल बिसरि, नलिनी ललकायौ ।। अपनी सुधि भूल आप, आप दुख उपायौ । आत्मन्, तुझे ये दुख इसलिए झेलने पड़ रहे हैं कि तू आत्म-विस्मृत हो चुका ह-तून स्वयं अपने आपको भुला दिया है। जिस प्रकार तोता अपनी आत्म-गति-आकाश-गति भूलकर नलिनीके फन्देमें फंसता है और पश्चात्ताप
तथर दुखकी अग्नि में झुलसता है, ठीक उसी प्रकार आत्मन्, तू भी आत्म-रूप भूल गया है और परमें अपनत्व-बुद्धि रखकर दुख उठा रहा है। आत्मन्, क्या तू यह भी भल गया-
"चेतन अविरुद्ध शुद्ध, दरशबोधमय विशुद्ध,
तेरा स्वभाव शुद्ध चतन्य और दशन ज्ञानमय है। आत्मन् ! तू इस आत्म-रूपको तो भूल गया और तून जड रूप, स्पर्श-रस-गन्धमय पुद्गलसे नाता जोड़कर उसमें ही आत्म-रूपके दशन किये और उसके साथ ही 'राग बुद्धि दर्शाई। पर, तूने इस बातका बिलकुल ही विचार नहीं किया कि 'पर के साथ राग-बुद्धि रखकर कैसे आत्म-सुख प्राप्त किया जा सकता है। आखिर ‘पर-राग’ ‘पर-राग’ है और ‘आत्म-राग’, ‘आत्म-राग’ । ‘पर-राग’ और ‘आत्म-राग’ दोनोंमें बड़ा मौलिक अन्तर है और यह दोनों परस्परमें एक दूसरेके कैसे पूरक हो सकते हैं ?