अनुबन्ध — एकांकी | Anubandh Jain Ekanki (वैराग्य, ब्रह्मचर्य व साधना पर मंचन योग्य नाटक — अंश)

एक अंग्रेजी उपन्यास के अंश पर आधारित रचना एवं नाट्य-रूपान्तर — मंचन-योग्य जैन एकांकी अनुबन्ध। महावीर के परम भक्त गुलाब, उसकी धर्मपत्नी व साधिका मंदासिंह, त्यागी सुलभसुषमा आदि पात्रों के माध्यम से यह नाटक वैराग्य, संयम-साधना व आत्म-बोध के प्रसंगों को नाट्य-रूप में प्रस्तुत करता है। पूरे पात्र-संवाद व मंच-निर्देश सहित। :red_circle: यह ग्रन्थ लगभग ७९ पृष्ठों का व स्कैन रूप में है — यहाँ केवल प्रारंभिक दृश्यों का अंश प्रस्तुत है।

A staged Jain ekanki, Anubandh — a dramatic adaptation of a passage from an English novel. Through characters like Gulab (a devotee of Mahavir), his wife and sadhika Mandasinh, and the renunciates Sulabh and Sushma, the play dramatizes vairagya, sanyam-sadhana and self-awakening, with full character dialogue and stage directions. The source is a ~79-page scan; only the opening scenes excerpt is reproduced here.


अनुबन्ध

रचना एवं नाट्य रूपान्तर: एक अंग्रेजी उपन्यास के अंश

पात्रों का वर्ग-विभाजनः
महावीर के भक्तजन
गुलाब - महावीर का परम भक्त
मंदासिंह - गुलाब की धर्मपत्नी तथा साधक
सुलभ - मंदासिंह की चचेरी बहिन तथा त्यागी
सुषमा - मंदासिंह की बुआ
(सत्या, मंगला, सुमति, मनोरमा इत्यादि नारियाँ।)

दृश्यः प्रथम

(मंदासिंह का विवाह हो चुका है। वधू आगमन पर बधाई बन्धाए जारी हो रहे हैं। मन्दिर का द्वार भी पास में है, जो छोटा है। कोने में एक पलंग बिछा हुआ है, निकट में नमोकार मंत्रों का गुथा हुवा सुंदर कोट रखा है। मंदा जगह-जगह दौड़ रही है। मनोरमा ढोलक बजा रही है। शेष महिलाएँ गा रही हैं।) धीरे से मंदासिंह पर-

सुमति- बहिन सुषमा ! अब मैं जा रही हूँ।
सुषमा- थोड़ी देर और नाचो न सुमति !
सुमति- नहीं बहिन ! रात्रि अधिक हो गयी है, सभी जाने की धुन में हैं।
सत्या- ठंड भी बहुत है, अब तो।
सुषमा- हाँ गीत को प्रलम्बा तो भयंकर है, नाचो बहिनों ! सुनो सब क्यों बहुत-बहुत धन्यवाद ! बिना बुलाए आप कोई जाना मत बहिन !
(मंदा का टोकरी लेकर सुषमा आ जाती है)
सुषमा- लो मंगला ! बांटो बुलाओ।
मंगला- तुरत बांटते। लो पूजा।
सुषमा- नहीं, तुम बांटो, मैं तो परेशान हूँ।
(मंगला सबको बांट-बांट कर आंचल में बताए देती है। चचेरी बहिन बंधु का घूँघट खोल-खोलकर मुख देख ठनगन साथ में बांटने के लिये दौड़ जाती है)
सत्या- बहिनों ! बहुत देर हो जाती है।
सुमति- सूचना के साथ शुभकामना भी हुई तो सोने में सुगन्ध आ जायगी।
मनोरमा- वाह ! यह भी कोई कहने की बात है। भाभी को सभी प्रशंसा करते हैं। कार्यकलाप में निपुण दिख रही हैं।
सत्या- (हँसते हुए) पराये ने भाभी का एक अंग अभी से लेना शुरू कर दिया।
मनोरमा- पूछो तो क्या बात ? सच कहा है।
सुमति- ऐसे ही तो हम सबको भी यही शुभ कामना है।
मंगला- जीजी ने धीवर को निकट शटर-आटा कर दिया।
सुमति- बहुत परिश्रम किया है सुषमा बहिन ने मंदा को कीहड़ जाते बालक से अधिक माना।
सुषमा- मानती क्यों नहीं बहिन ! तीन घड़िया के परिवार में ससुर एक घड़ी तो ठाकुर का दीपक है। शेष दो तो मेरे पीहर तो बना है।
सत्या- सुनो अपना कल्पना निवाहा। जब मंदासिंह की बारी है, मेरा मंदा भी खूब बढ़ चढ़ सम्मान देता है बहिन ! बिना सम्मति के कोई कार्य नहीं करता।
(सुलभ सन्न होकर सब बातें सुनती है)
सुषमा- अच्छा बहिनों ! नमस्कार। आती रहूँगी।
सुमति- अभी तुम चलो ना जीजी।
सत्या- नहीं, कल चल जायेंगी।
सुमति- इतनी जल्दी।
सुषमा- एक माह होते को आ गया है, तुम्हारे जीजाजी को अनुबन्ध के समाचार आ रहे हैं, जाना ही होगा। वैसे मेरा आना-जाना तो लगा ही रहता है। मन में तू समय निकाल कर भाभी के पास आ जाया करना। अकेली घबराएगी।
मनोरमा- मैं तो आऊँगी ही मौसी ! तुम नहीं कहतीं, तब भी मैं आती।
सुषमा- चलो मुझे तो निश्चिन्त कर दिया।
(सबका प्रस्थान)

सुषमा- (खड़ी हो) अभी तक मंदा नहीं आया। गुलाब ! उठ, पानी-वानी पीयो। जब से बैठे हो समेटे-सी।
गुलाब- पानी नहीं पीऊंगा मौसी जी ! (स्थिर से बैठे) ये रुपये रहते आप।
सुषमा- ये तुम्हारे रुपये हैं बेटू ! तुम ही रखो। मैं नहीं रखूँगी, अब इस घर की बाग-संभाल तुम्हारी राय में है, कुल की मर्यादा रखना सब इतना ही शुभ कामना है।
गुलाब- आप निश्चिन्त रहिये मौसी ! कोई भी ऐसा कार्य नहीं करूँगा जिससे कुल पर आंच आये। फिर मार्ग दर्शन तो आपका ही रहेगा।
सुषमा- मेरे क्या मार्ग दर्शन ? जहाँ स्नेह तो हो नहीं। तुम स्वयं संभलो तो संभले, अगर पास पास साधु-संतु नहीं हैं, इसलिये मुझे विशेष चिन्ता है।
गुलाब- कौन ?
सुषमा- सो तो है ही बुआजी ! आप के अतिरिक्त हमारा है ही कौन ?
गुलाब- तेरे आने से मेरा भी धीरज बन गया बेटा ! भाई-भावज के निधन से तो इस घर के घट बंद हो चुके थे, तेरे पड़ते ही सब खुल गये हैं। कभी आई तो बनी-बनाई रसोई तो मिलेगी जीने को।
सुषमा- क्यों नहीं बुआ जी ! ये तो मेरा कर्त्तव्य है।
(इस से चुप हो कर परदे के विवाह से हवा भरा हो गया। तो अपमान उनके जीवन को धुंधपूर्ण बना देगा, तब यही मंगल कामना है।)
गुलाब- आपका आशीर्वाद हो, हमारा जीवन का मंगल होगा बुआजी !
मंदासिंह- (प्रवेश कर हँसते हुए) काटो न मौसी, चरण छुने से आशीर्वाद मिलता है।
गुलाब- उसके हृदय के चरण नहीं हैं।
सुषमा- तू बेटू रह। मंदा की बात पर मत जा, मन तो सदा आशीर्वाद दे दूँ तुम दोनों को।
गुलाब- बुआजी ! सेवा करने से सेवा मिलती है।
मंदासिंह- बुआजी को तो हम प्रणाम हैं, जो हम पर का अस्तित्व टिका हुआ है। इस संबध में पन्द्रह दिन तक रात-दिन परिश्रम किया है।
सुषमा- यह तो मेरा कर्त्तव्य था बेटा ! अब भाई-भावज को घरावर पुण्य को सोचते हैं। तुझे तो तेरे रखे। यही प्रसाद को निर्वाह करूँगा।
गुलाब- भगवन् ! मुझे ऐसी शक्ति दो कि भारतीय गृहिणी के उत्तरदायित्व को निभा सकूँ।
सुषमा- मुझे विश्वास है गुलाब ! एक दिन तुम दोनों का जीवन बन कर यूँ ही हँसते खिलते पाओ तो सब तक पहुँच जाऊँगी।।

मंदासिंह- इतनी जल्दी बुआ।
गुलाब- कुछ दिन मेरे पास रह ले बुआ !
सुषमा- (आंख मींज कर) अभी नहीं जाऊँ तो तुम आपकों दुःख हो जा रहा है न। तुम्हें तो अपने मन से औषधि नहीं जाना चाहती। बहुत बेबाकी क्या करें ? मैं मजबूर हूँ। नहीं तो कोई चलना औषधि में ही नियंत्रित है पापी।
मंदासिंह- (अचन आहट भर श्वास में) ये-चार दिन और रह लो न बुआ !
सुषमा- अभी मत कहो बेटू ! अब मेरा मन नहीं लगता।
गुलाब- तो आप क्या अकेली जायेंगी। मैं साथ को चला तो लगा दूँ।
सुषमा- मैंने पता लगा लिया है। धीरज चाचा जा रहे हैं। उनका साथ अच्छा रहेगा। दिन छिपते-छिपते गाँव पहुँच जाऊँगी।
मंदासिंह- तो आप पहले ही सब निश्चित कर चुकी हैं। अभी तक तो काम में व्यस्त रहीं। अब कुछ दिन आराम से रह लेतीं। किन्तु आपने जाने का ही पक्का कर लिया है, मेरा याद मत भूलना बुआ ! सुधिअनुसार आती रहना।
सुषमा- (हँसते हुए) पागल ! मैं तुझे भूलाऊँगी ? अरे अब तू ही मुझे मत भूलाना, जब तो तेरी बहू मुझे भूलायेगी और तू तेरी आप्त। तब जाऊँगी।
मंदासिंह- हाँ हाँ मेरी ही भूलऊँगी। लेने में कैसे तो ऐसा नहीं तो, तुम ही अब कुछ तो तूने ही मुझे पढ़ा-लिखा है। क्या इतना कचरज हो जाऊँगी कि तुम्हें घर छोड़ूँ?
सुषमा- जाते बच्चे प्यारे हो जाते हैं, तू तो गोद खिलाया भतीजा है।
मंदासिंह- (हँसते हुए) देख बुआ ! मुझसे ऐसा मत कहना। मैं तो तुम्हें अपनी माँ ही मानता हूँ।
सुषमा- तुझसे यही कह रहे है। जगत की रीति ऐसी ही है। अब मैं सोऊँगी। तुम लोग भी सोओ। सुबह जल्दी उठना है।
(प्रस्थान)
(मंदासिंह उठकर किवाड़ लगा लेता है, घूंघट सिमटी गुलाब और अधिक सिमट जाती है)
मंदासिंह- भला अब घूंघट क्यों ? बुआ तो चली गईं। यहाँ और तुम। (कहते हुए गुलाब का घूंघट उलट देता गुलाब को सिर झुका लेती है। वह सिर हिला देती है।)
गुलाब- (सिर हिलाये हुए) ये क्या ?

मंदासिंह- क्यों ? मुझे यह अधिकार नहीं है क्या ?
गुलाब- (गुलाब प्रमुख से मुस्कान बिखेर देती है)
मंदासिंह- गुलाब आज अपनी प्रभुता में है। पर मैं एक ऐसी प्रभुता में फँस गया हूँ कि विवाह को ही मन्ना पड़ गया आनन्द टूट गया।
गुलाब- (घबराकर) क्यों ऐसी कौनसी विषम समस्या आ गई कि हमें में सुलझाने को खोजा खिड़व रहे ?
मंदासिंह- इस समस्या को सुलझाने में तुझे दुःख तो लगेगा जो आनन्द आवश्यकता है।
गुलाब- अपनी कहोगे तो देवी तो कौन देगा ? बताइये मैं क्या सेवा कर सकती हूँ ?
मंदासिंह- बताओ तुझे ओढ़ने में ओढ़ना कि वो सब कैसे हुआ ?
गुलाब- अपना निश्चय भम्र करे, मैं समझी नहीं। क्या विवाह में भी प्रकार होते हैं ? और शरारत आई।
मंदासिंह- और नहीं और विवाह ही क्या ?
गुलाब- यह तो बाते बड़ी हैं जो सबकी समान होती हैं पर अन्त में अपना है।
मंदासिंह- अन्त में अपना ! इसीलिये सौ न बुझाया। जल्दी से बता दे कैसे हुआ ?
गुलाब- तो सुनो, हम दोनों के पिता परस्पर अभिन्न मित्र थे।
मंदासिंह- क्यों अपनी मैचीयस्थला हमारे जन्म के पूर्व हो मंगनी कर ली थी।
गुलाब- (हँसते हुए) क्या तूने पूरी हो ?
मंदासिंह- तुम्हारे से उनकी आकांक्षाएँ पूरी हुई। एक घर में बेटी और दूसरे के घर में जन्म हो गया। जन्मकाल में विवाह-बन्धन की रस्म भी पूरी कर ली गई।
गुलाब- यह तो बहुत अच्छा हुआ। सब मेरे भाग्य सब कैसे होते ?
मंदासिंह- (त्योजित द्रष्ट से) मानो तो दृष्टि ही का मन था भाग्य का यह व्यंकन नहीं था।
गुलाब- कौन-सा किलन था यह ?
मंदासिंह- सौभाग्य ने पीठ फेरी और दुर्भाग्य ने अघन जमाया। पाँच वर्ष की आयु में ही पिताजी का पदचिन्हों तक पूरा होते होते पिता परलोक सिधार गये। बुआ ने मुझे सहारा दिया। जैसे तो पाले पोसे से ही बुआ के पास होते लोग था परन्तु कभी-कभी पिता के पास जा जाता था।
गुलाब- फिर तो कठिह को खा सामना करना पड़ा होगा।
मंदासिंह- (व्यथित हो) पर बुआ के प्यार ने सारा दुःख हर लिया। जब मैं बड़ा हुआ तो बुआ ने तुम्हारे पिता के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा।

गुलाब- बच्चों की शिक्षा तो उनको देनी चाहिए थी।
मंदासिंह- तब क्या हुआ? उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
गुलाब- बस इतनी सी बात थी। तब अस्वीकार करने का क्या स्थल था?
मंदासिंह- बड़ी छोटी घटना या गुलाब ! तुम क्या समझो, मैं बच्चों में पला। पिताजी कितने तुमक थे। क्या तुम को बच्चों में सावन दी गयी। बुआ जी ने घर का सारा तियाग दाव में धर दी। जितनी भी असर हो सकी।
गुलाब- वो चिंता में रह रहे थे। नहीं किया। और भाग्य में वो होगा ही। बड़ी दौलत उतना और भी तो करना था।
मंदासिंह- फिर किसने किया?
गुलाब- बड़ी कठिन ही हुआ। मैं सारी बातें बतलाने से तो मर्यादा का भ्रम बन गया। मेरे पास कुछ तो नहीं। और तुम्हारी शिक्षा की क्या बीती। तुम्हारा साथ हो गया। तो तो कन्या का विवाह तुम्हारे साथ हो घटना है।
मंदासिंह- बड़ी कितनी वृजिन बात है। धन के मापन यन्त्र का कोई मूल्यांकन नहीं ?
गुलाब- बात तो ठीक है उनकी, कोई भी पिता अपनी कन्या निर्धन के पाले क्यों बाँधे ?
मंदासिंह- पर गा सिव से सम्बन्ध बांधा ही हुआ था। मैं तुम्हारी ताम्र ऋणी भी किस सिद्ध का सम्बंध है। करना था।
गुलाब- ऐसे उन्होंने नहीं देने दिया। किआ के तो लगी पर जा कोई अन बन थे मैं मंदिर धन पर कोलाहल बीच हताश हो। वे मेरे घर मंगल किया। और मुझे मँगाया।
मंदासिंह- इतनी बड़ी आप बेढ़ा उठाएँ ?
गुलाब- हमारे बीच अंतर हो गया। क्यों तो वो चली गयी।
मंदासिंह- और मैं भी चला गया।
गुलाब- पर वे कहाँ रहे। पूछ ही जाती। खड़े हो के भी और वो चला गया।
मंदासिंह- तब पिता के पास मित्र चाहा से रचा भीगा।
गुलाब- जहाँ चाह वहाँ राह। आज कामनाओं हुई। सभी मन गया।
मंदासिंह- (आश्चर्य से आंख फाड़कर) बीस हजार को हर्जा चुकाया। फिर भी पिता के नाम पर दो बीघे जमीन बेच दी।
गुलाब- वही मैंने पिताजी को दिया था।
मंदासिंह- (गंभीर स्वर में) तुमने मुझे क्यों नहीं बताया।
गुलाब- कैसा अनुबंध?


स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि)।

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