अनोखी कथाएँ — जैन स्वाध्याय सामग्री | Anokhi Kathayen

अनोखी कथाएँ

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अनोखी कथाएँ

संपादक
ब्र० धर्मचंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य

भाग 1

प्रकाशक
आचार्य धर्मश्रुतग्रन्थमाला
दिल्ली

समय के साथ

विश्व के प्रत्येक राष्ट्र के कोने कोने में बच्चों और जन-सामान्य के लिए कथा कहानियों का साहित्य सृजित होता रहा है। भारत में भी विभिन्न भाषाओं में ऐसी अनेकों कहानियाँ हैं। संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं में लेखक इन्हें लिखने में पीछे नहीं रहे।
भारतीय संस्कृति की सामाजिक, सहिष्णुता और सामंजस्य की भावना को लक्ष्य में रखकर भारतीय लोक कथाओं का संकलन किया।
जैन कथाओं का योग दान महत्त्वपूर्ण है ही किन्तु जैनेतर कथाओं का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक कथा के पीछे कुछ न कुछ रहस्य जरूर होता है जिसके कारण कथा प्रचलित होती है।
कथा साहित्य हजारों वर्षों से मौखिक चलना आ रहा है उसका संकलन करके प्रकाशित करने का एक छोटा सा प्रयास किया जा रहा है। जो लगभग सभी को पढ़ने में रुचिवृद्ध होगा। कथा ऐसी सरस विद्या है जिसको बाल-गोपाल रुचि से पढ़ते हैं और सुनते ही नहीं उनके अन्तः करण को संस्कारित भी करते हैं।
मुझे आशा है कि आप इन अनोखी कहानियों को पढ़ कर ज्ञान प्राप्त कर दूसरों को पढ़ायें या सुनायें।
धर्मचंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य

  • प्रेरणा : शु० राजमति माता जी
  • संकलन एवं संपादन : धर्मचंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य
  • प्रकाशन वर्ष : 2000
  • पृष्ठ नं : 1
  • मूल्य : 20 रुपये
  • प्रकाशक : आचार्य धर्म श्रुतग्रन्थ माला
  • प्राप्ति स्थान : जैन मंदिर गुलाब वाटिका
    लोनी रोड दिल्ली

अनुक्रम

विषय पेज सं विषय पेज सं
उत्तराधिकारी 1 शराब का नशा 25
पुरुस्कार की जीत 3 मतलब 26
संकल्प के प्रति समर्पण 5 रक्स चाइल्ड 26
सन्यासी को सोने में गा 6 मैं क्या बताऊँ 27
चमत्कार 8 लाद दिया 28
दर्द का भान 9 दादी में आग 28
जीवन्त चित्र 9 जरूरत 30
पुद्गल का स्वभाव 13 जज अपराधी 30
मेरी सीमा 14 कौरा कागज 31
तुम मान लो 15 राजा और संन्यासी 32
आवरण हटा 17 यमराज 33
स्टोर खाली हो जाये 18 देखा देखी 34
चौकीदारी 19 घृणा और प्रेम 35
मित्रों से परामर्श 20 तुम मूर्ख हो 36
स्वधर्म सुधर्म 20 नीयत का असर 37
पसीना सुखाओं 22 आना और जाना 38
आज पूर्णिमा 22 गधे का घोडा 40
तर्कबाज 23 बातों से प्रसन्न 41
पता ही नहीं लगता 24 आस्था 42
नीचे भी देख लो 43 पानिकाता कितनी 62
नाटक 44 दासी के दास 63
बुखार 44 आपत्ति 65
खुदा के साथ 45 सोने की सीमा 65
विदेश जाने की आवश्यकता नहीं 46 मन की परिणति 66
प्रतीक्षा 47 दरवाजे पर लिखा 68
सम्राट सिकन्दर 48 घर की प्रतीक्षा 69
शास्त्रीय संगीत 49 मैं मेरे बाप का स्वामी 69
सलाह 50 डबल रोटी खान 69
लाभदायक 50 तुम एक काम करो 70
मैं नहीं मानता 52 आप हंस रहे हो 71
मैं तो छोटा हूँ 52 गप्पू की मां 72
डाक्टर का परामर्श 52 कार्य में मस्त 72
वाणी का चमत्कार 53 कुरूप ही कुरूप 73
एकाग्रम आधी करदें 54 कंजूसी का असर 74
धन्यवाद 55 तुम ठीक कहते हो 75
अपराध 55 पारस पत्थर 75
पशु की तरह 56 राजा भोज 85
श्रम का मूल्य 57 सच्चा का फल 89
लोड सकते है जोव नहीं 58 महाजयामुंडइणकोफिश 93
आशा 59
रूप में परिवर्तन 59

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उत्तराधिकारी

प्रसेनजित्त मगध का राजा था। उसने सोचा-मुझे अपने उत्तराधिकारी को नियुक्त करना है। पुरानी परंपरा थी कि जो बड़ा लड़का होता वह राज्य का उत्तराधिकारी बन जाता प्रसेनजित्त ने सोचा-मैं ऐसा नहीं करूंगा। मैं इस परम्परा को तोड़कर, मेरे सी गुण है उनमे जो योग्यतम होगा उसे अपना उत्तराधिकारी सौंप दूंगा। उन्होंने उपाय सोचा कि परीक्षा करू, योग्यता को परखू। उन्होंने अपने सारे अधिकारियो को सारी योजना बता दी। किस प्रकार व्यवस्था करनी है यह भी उन्हे अच्छी तरह समझा दिया। उसी दिन पचास राजकुमारों को भोजन के लिए एक पंक्ति में बैठा दिया गया। पचास थाल परोस दिए गए। भोजन की तैयारी होने वाली है। सब राजकुमार भोजन की प्रतीक्षा में बैठे है।

महाराज ऊपर बैठे है औरोखे में। सब देख रहे है। जैसे ही भोजन की तैयारी हुई, आदेश था कि जैसे ही सूचना मिले सबको भोजन शुरू करना है। इधर भोजन की सूचना मिली और उधर दरवाजे खुले। चारो तरफ शिकारी कुत्ते झपट पड़े। बड़े खूंखार कुत्ते ! भगदड़ मच गई। सभी राजकुमार प्रभावित हो गए। मनःस्थिति का सन्तुलन समाप्त हो गया। भोजन छोड़-छोड़कर वे

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भागने लगे। सारे राजकुमार भाग गये। केवल एक बचा, जो सबसे छोटा था। उसका नाम था श्रेणिक। वह बैठा रहा, भागा नहीं। भोजन कर लिया, पूरा भोजन किया। भोजन के बाद उठा और चला गया, दूसरा दिन हुआ। राजकुमार जुड़ें। पचास राजकुमार सामने बैठे है। पूरी मंत्री परिषद, अधिकारी, संसद के और नगर के कुछ प्रतिष्ठित लोग बैठे है। राजा ने कहा कि मैं आज अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करना चाहता हूं। लोगों को आश्चर्य हुआ। घोषणा की कौन-सी बात है! बड़ा राजकुमार ही तो होगा। राजा ने और स्पष्ट करते हुए कहा- मैं इस परम्परा को तोड़ना चाहता हूं। मैं उसे अपना उत्तराधिकारी बनाऊंगा जो सबसे योग्य होगा और मैंने योग्यता की कसौटी कर ली है। वह कसौटी अब आपके सामने प्रस्तुत करना चाहता हूं। सारे राजकुमार भी चौकन्ने हो गये। हर व्यक्ति सोचने लगा कि किसका नाम आयेगा। शायद यही सोचने लगे कि मेरा नाम आएगा। व्यक्ति के मन में एक भावना होती है, आकांक्षा होती है। सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। लोगों में भी बड़ा कुतूहल पैदा हो गया, सब में जिज्ञासा जाग गई। बड़ी उत्कंठा पैदा हो गई कि क्या होगा? राजा ने कहा- तुम लोग कल भोजन करने बैठे। भोजन किया? सब के सब एक साथ बोले- महाराजा! भोजन कैसे करते? आपके अधिकारी बिल्कुल व्यवस्था को जानते ही नहीं।

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व्यवस्था का कोई पता नहीं। इतने गैर जिम्मेदार है कि अपना दायित्व भी नहीं निभाते। हम तो भोजन करने बैठे और उधर से शिकारी कुत्ते भीतर आ गये। उन्होंने कोई व्यवस्था ही नहीं की, कैसे भोजन करते?

क्या किसी ने भी भोजन नहीं किया?

श्रेणिक बोला- महाराजा मैंने किया। राजा बोला- तुम मूर्ख हो। ये तो सारे समझदार है। शिकारी कुत्ते आये। भोजन छोड़-छोड़ कर भाग गये। तुम वहां कैसे रहे? कुत्ते काट खाते तो क्या होता? श्रेणिक बोला- मैं मूर्ख नहीं। जो अकेला खाना चाहता है, कुत्ते उसे काटते है। जो दूसरों को खिलाना जानता है, कुत्ते उसे कभी नहीं काटते। मेरे सामने पचास थाल पड़े थे। कुत्ते आते गये। थाल सरकाता रहा। वे भी खाते रहे, मैं भी खाता रहा। जो अकेला खाता है, उसे कुत्ते काटते है। जो दूसरों को खिलाना जानता है, उसे कुत्ते कभी नहीं काटते।

राजा ने श्रेणिक को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया।


पुरुस्कार की जीत

राजा भोज बहुत विद्वान थे। वे विद्वानों का बहुत सम्मान करते थे। एक बार राजा भोज ने राजसभा में घोषणा की-कोई भी विद्वान, पंडित मुझे स्वरचित नया

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श्लोक सुनायेगा। उसे एक लाख रुपये पुरस्कार में दूंगा।
दूसरे ही दिन अनेक पंडित राजा भोज की सभा में श्लोक
सुनाने के लिए प्रस्तुत हो गये। राजा भोज का मंत्री उन
सबको देखकर चिंतित हो उठा। वह बुद्धिमान था।
उसने सोचा-यदि इस प्रकार पंडित प्रतिदिन श्लोक
सुनायेंगे तो खजाना खाली हो जायेगा और राजा की
घोषणा रद्द करना असंभव है। गहन चिंतन के बाद मंत्री
ने एक उपाय ढूंढ निकाला।
प्रत्येक विद्वान खड़ा होकर पहले राजा को आशीर्वाद
देता, फिर राजाज्ञा प्राप्त कर श्लोक पढ़ता। मंत्री प्रत्येक
विद्वान के श्लोक को सुनकर कहता, ‘यह श्लोक नया
नहीं है, मैंने इसे अनेक बार सुना है।’ मंत्री की प्रतिभा
इतनी तेज थी वह प्रत्येक श्लोक को एक बार सुनकर
वैसा का वैसा याद कर लेता और उसे उसी शैली में
उसी प्रकार सुना देता। सारे विद्वान निरुत्तर हो जाते।
वे अपना मुंह दिखाने योग्य भी नहीं रहते। पंडितों ने
अनेक प्रकार के अनेकानेक रागों में तथा विविध विधाओं
में बहुत परिश्रम करके नये-नये श्लोक बनाये, किंतु मंत्री
ने प्रत्येक बार उनकी आशाओं पर घुड़सवारी कर दिया।
सारे विद्वान दीन-हीन, निराश हो गये। उनके मन में
मंत्री के प्रति भारी रोष व्याप्त हो गया। एक बार एक
विद्वान बहुत सारे विद्वान साथ लेकर आया। उसने राजा
को श्लोक में ही आशीर्वाद देते हुए कहा-

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स्वस्ति श्री भोजराज! त्रिभुवनविदितो धार्मिकस्ते पितामू।
मित्रां तेनदमाहृता नवमतिललिता रत्नाकोट्यो मदीया।।
ता में देहीति राजन्! सकलवधजनैः श्रायते तत्त्वतेन।
नो वा आननि केचित् ममकृतिरथा देहि चेत्तं ततो माम्।।
‘राजन् आपका कल्याण हो। आपके पिता बहुत
धार्मिक थे और जगत् विख्यात थे। एक बार आपके पिता
ने मेरे से नित्यानये करोड़ रत्न-मुद्राएं ली थीं। राजन्
आप वे मुद्राएं मुझे दें क्योंकि सारे विद्वान इस सत्य को
जानते हैं। यदि कोई नहीं जानता है तो मेरी कृति नयी
है इसलिए आप मुझे एक लाख रुपये पुरस्कार में दें।’
सारे विद्वान सारे सभासद खिलखिला उठे। मंत्री भी
एकदम चुप हो गया। विद्वान एक लाख का पुरस्कार
जीत गया।

संकल्प के प्रति समर्पण

एक छोटा लड़का साहसी काम करने के लिए उद्यत
हुआ। वह महाराज शिवाजी की हत्या करने आया।
सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। उसके हाथ में शस्त्र था।
उसे शिवाजी के सम्मुख उपस्थित किया गया। शिवाजी
ने पूछा, ‘क्यों आये हो यहाँ? हाथ में तलवार क्यों ली
है?’ वह बालक साहस के साथ बोला, ‘शिवाजी को मारने
आया हूं।’

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शिवाजी ‘क्यों मारना चाहते हो शिवाजी को?’
बालक ‘मैंने एक व्यक्ति को वचन दे दिया था। उसी की
पूर्ति के लिए आया हूं।’
शिवाजी ‘अरे, तुम किसको वचन दे चुके हो?’
बालक ‘मैंने शिवाजी के शत्रु राजा तुमाराय को वचन दे
दिया था। मैं उसकी पूर्ति से बंध गया था। मैं मारने के
लिए आया हूं।’
शिवाजी उसकी स्पष्टवादिता और निर्भयतादिता से
बहुत प्रसन्न हुए। छोटी अवस्था और इतना पराक्रम,
साहस और स्पष्टवादिता। उन्होंने बच्चे के साहस को,
पराक्रम को पहचान लिया। वे बोले, ‘तुम्हें इस जघन्यतम
अपराध के लिए क्या दण्ड मिलना चाहिए?’

बालक ‘जो आपकी इच्छा हो वह दण्ड मुझे स्वीकार है।
इसका दण्ड है मृत्यु।’
शिवाजी ‘स्वीकार है! मैं आपकी पकड़ में आ गया। मैं विवश
हूं। पर एक बार आप मुझे मेरी मां से मिलने के लिए
जाने दें। मैं मां से मिलकर लौट आऊंगा, फिर आप मुझे
मौत के घाट उतार देना।’
शिवाजी ‘अरे, वापस कौन आयेगा? मौत के मुंह में जाने के
लिए कौन आयेगा? तुम मुझे बहका रहे हो।’
बालक ‘महाराज, विश्वास करें। मैं मां से मिलकर लौट
आऊंगा। मुझे मरने का भय नहीं है।’
लड़के को मुक्त कर दिया।
वह मां से मुलाकात कर ठीक समय पर आ गया।

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संन्यासी को सोने में गंध

गांव में एक संन्यासी आया। वह तेजस्वी और
शक्तिशाली था। राजा ने उसकी प्रशंसा सुनी। वह दर्शन
करने आया। उसे अपूर्व शांति की अनुभूति हुई। उसने
कहा, ‘महाराज! कुछ दिन के लिए आप मेरे महल में
चलें।’ संन्यासी ने कहा, ‘महलों में मुझे सोने की गंध
आती है। मैं वहां नहीं रह पाऊंगा।’ राजा बोला, ‘कैसी
बात करते हो? सोने की गंध कहां है? लोग सोने का
नाम लेते ही उस ओर दौड़ पड़ते हैं। आप उससे दूर
जाना चाहते हैं। मैं वहां रहता हूं, मुझे आज तक गंध
नहीं आयी।’ संन्यासी ने कहा, ‘चलो मेरे साथ।’ संन्यासी
राजा को चमारों की बस्ती में ले गया। राजा को चमड़े
की दुर्गंध सताने लगी। उसने अपनी नाक कपड़े से ढक
ली। संन्यासी एक चमार के घर पर जा रुका। राजा
ने कहा, ‘महाराज! कहां ले आये आप? बड़ी दुर्गंध आ
रही है। मेरी जीभ सूंघ रही है। जल्दी चलें।’ संन्यासी
बोला, 'कैसी दुर्गंध! आप भी बड़ी विचित्र बात कर रहे
हैं। आप इस घर के मालिक से पूछें। घर का स्वामी
आया। संन्यासी ने पूछा, ‘अरे, तुम्हें यहां दुर्गंध नहीं
आती?’ घर के स्वामी ने कहा, ‘नहीं दुर्गंध है कहां? मुझे
यहां रहते पचास वर्ष हो गये। कभी दुर्गंध की अनुभूति
नहीं हुई।’ संन्यासी राजा को लेकर महल में आ गया।
वह राजा से बोला, 'महाराज! आपको वहां चमड़े की

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दुर्गंध आ रही थी। वहां रहने वालों को उसका अनुभव
ही नहीं हो रहा था। इसी प्रकार यहां आपके महलों में
मुझे सोने की गंध आती है, आपको इसका अनुभव ही
नहीं होता जो जिससे रच-पच जाता है, वह वैसा ही
हो जाता है।

चमत्कार

एक आदमी बीमार था। बहुत घबरा रहा था। एक
वैद्य आया। रोगी को देखा। उसकी घबराहट को देखा।
वैद्य बोला, ‘घबराओ मत। सात होते-होते तुम स्वस्थ
हो जाओगे, घूमने-फिरने लग जाओगे। तुम्हारी
घबराहट मिट जायेगी। मैं ऐसी दवा दूंगा कि रोग मिट
जायेगा।’ वैद्य बाहर गया। रात और नमक की पुड़िया
बांधी। रोगी को पुड़िया देते हुए कहा, 'यह बहुत कीमती
दवा है। दो पुड़िया लेते ही बीमारी शांत हो जायेगी।
रोगी को इतना विश्वास दिलाया कि स्वस्थ होने की बात
आत्मा तक पहुंच गयी। रोगी ने पुड़िया ली। दूसरी
पुड़िया लेते ही उसे स्वस्थता का अनुभव होने लगा और
संध्या से पहले ही वह चलकर वैद्य के घर चला गया।
न बीमार और न घबराहट। पुड़िया का चमत्कार नहीं
था, चमत्कार था बात का भाव तक पहुंच जाना।

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दर्द का भान

बर्नार्ड शॉ के जीवन की एक घटना है। वे बहुत
मजाक करने वाले व्यक्ति थे। एक बार उनके हृदय में
दर्द हो गया। डॉक्टर को बुलाया और कहा, ‘हार्ट में
दर्द हो गया है।’ डॉक्टर जानता था। वह बोला, ‘शॉ!
मुझे बहुत पीड़ा हो रही है। क्या करूं?’ डॉक्टर ने ऐसा
आकार बताया कि शॉ घबरा गये। वे तत्काल उठे।
पानी लाये। पानी पिलाया, उपचार किया। डॉक्टर ठीक
हो गया। वह उठा और बोला, ‘शॉ! मुझे फीस दें।’ शॉ
ने कहा, ‘किस बात की फीस दूं?’ डॉक्टर ने कहा, ‘इलाज
तो मैंने तुम्हारा इलाज किया है। उसकी फीस चुकाओ।’
शॉ बोला, ‘इलाज तो मैंने तुम्हारा किया। उपचार कर
मैंने तुम्हें स्वस्थ बनाया।’ डॉक्टर ने कहा, ‘शॉ, मैंने यह
सारा नाटक आपके लिए ही तो रचा था। बर्नार्ड, आपका
दर्द कहां है?’ वास्तव में शॉ दर्द को भूल ही गये थे।
उन्हें आत्मविस्मृति हो गयी थी। दर्द का उन्हें भान ही
नहीं रहा।

जीवन्त चित्र

राजा ने चित्रकारों को आमंत्रित किया। देश-भर के
चित्रकार एकत्रित हुए। राजा ने कहा, 'राज्य-मुद्रा

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बनानी है। उसमें मांग देते हुए मुर्गी का चित्र होगा। ऐसा जीवन्त चित्र बनाओ जिससे मुर्गा की श्रेष्ठता सिद्ध हो सके। सर्वश्रेष्ठ चित्र पुरस्कृत किया जायेगा। चित्रकार बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा की सब शर्तों को स्वीकार कर लिया। कुछ दिन बाद वे चित्र बनाकर लाये और राजा के सामने प्रस्तुत किए। राजा ने देखा। उसे चित्र बहुत अच्छे लगे। उसने सोचा, ‘मैं कोई कलाकार तो हूँ नहीं। किस चित्र को प्राथमिकता दी जाये, इसका निर्णय कौन करे?’ राजा ने सोच-विचारकर एक बूढ़े चित्रकार को बुलाया। किसी समय वह राज्य का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार था, किन्तु अब बूढ़ा हो चला था। राजा ने कहा, ‘इन चित्रों में कौन प्रथम है, इसका निर्णय करो।’ चित्रकार सारे चित्रों को ले गया। दूसरे दिन आकर बोला, ‘महाराज! मुद्रा में देने लायक एक भी चित्र नहीं है। सब बेकार है।’ यह कैसे कहते हो? चित्र बहुत सुन्दर है।’ राजा ने आश्चर्य की मुद्रा में कहा। चित्रकार बोला, ‘सुन्दर तो है, किन्तु आपने कहा था कि जीवन्त चित्र होना चाहिए। इसमें जीवन्त चित्र एक भी नहीं है।’ राजा कठिनाई में पड़ गया। राज्य के सारे मूर्धन्य कलाकार आ गए। ‘उनका एक भी चित्र पसन्द नहीं आया तो फिर तुम बनाओ’ – राजा ने कहा। चित्रकार बोला, 'मैं बूढ़ा हो गया हूँ, कैसे बनाऊँ? फिर भी यदि आप चाहते हैं तो मैं चित्र बनाऊँगा। पर मुझे तीन वर्ष का समय

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चाहिए।’ तीन वर्ष का समय?’ राजा ने विस्मय के साथ पूछा। चित्रकार ने कहा, ‘श्रेष्ठता साधन के बिना प्राप्त नहीं होती। तात्कालिकता कामचलाऊ हो सकती है, किन्तु वह श्रेष्ठता का संस्पर्श नहीं कर सकती।’
चित्रकार तीन वर्ष की अवधि लेकर वहाँ से चला गया। वह मास बीत गये। चित्रकार कभी राजा से मिला नहीं। राजा ने उसके कार्य की जानकारी लेने के लिए अपने विश्वस्त कर्मचारी को भेजा। वह चित्रकार के घर गया। वह घर में नहीं मिला। खोजते-खोजते वह जंगल में गया। उसने देखा, वह बाग रहा है। उसने पयासी मुर्गे हैं। बूढ़ा चित्रकार मुर्गों के बीच में बैठा है। राजा के कर्मचारी ने पूछा, ‘क्या चित्र बन गया?’ बूढ़ा बोला, ‘चित्र बना रहा हूँ।’
‘कब तक बनेगा?’
‘अभी ढाई वर्ष लगेंगे।’
‘ढाई वर्ष बीत गये।’ राजा ने फिर जांच करवाई। चित्रकार को बुलाकर कहा, ‘चित्र लाओ।’
‘चित्र अभी बना नहीं है।’
‘तीन वर्ष बीत गये, फिर चित्र क्यों नहीं बना? अब तक क्या किया?’
‘क्या किया, यह बताऊँ?’
‘मैं अवश्य जानना चाहूँगा।’
राजसभा में चारों ओर मुर्गे की आवाज होने लगी।

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इधर-उधर मुर्गा दौड़ने लगा। सभासदों ने देखा, यह कैसा आदमी? यह तो मुर्गा है। वही भाषा, वही व्यवहार और वही आचरण। राजा ने कहा, ‘यह क्या कर रहे हो?’
‘महाराज! तीन वर्षों में मैंने क्या किया, यह बता रहा हूँ, मैं मुर्गा हो गया हूँ।’
‘मुझे तुम्हें मुर्गा नहीं बनाना है, मुझे मुर्गी का चित्र चाहिए।’
‘मुर्गी बने बिना मुर्गी का चित्र नहीं बन सकता।’
‘तो तुम मुर्गी बन गए? अब चित्र लाओ।’
‘चित्र बनाने में क्या कठिनाई हो आधा घंटे का काम है। तूलिका लाओ, रंग लाओ, कागज लाओ, अभी चित्र तैयार कर देता हूँ।’
सारी सामग्री लायी गयी और देखते-देखते चित्र तैयार हो गया।
राजा ने पूछा, ‘क्या यह जीवन्त चित्र है?’
‘महाराज! हाँ।’
‘इसकी कसौटी क्या है? ये जीवन्त क्यों नहीं थे और यह जीवन्त क्यों है?’
चित्रकार ने मुर्गा मंगाया। पहले के चित्रों को रखा और उसके सामने मुर्गे को छोड़ा। मुर्गा चित्रों के सामने गया और मुंह फेरकर लौट आया। सबके बाद अपना चित्र रखा। उसे देखते ही मुर्गा सक्रिय हो गया। लड़ने की मुद्रा में आ गया। उसने चित्र के मुर्गे पर आक्रमण

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कर दिया। चित्रकार बोला-
‘महाराज! यह जीवन्त चित्र है। मुर्गा मुर्गी से लड़ रहा है।’
‘इतना जीवन्त चित्र! इतनी जल्दी कैसे बनाया तुमने?’ राजा ने पूछा।
चित्रकार ने कहा, ‘महाराज! मैंने तीन वर्ष का समय मुर्गा बनने में लगाया। अगर मैं मुर्गा नहीं बनता तो जीवन्त मुर्गा नहीं बना पाता।’

पुर्तगाल का स्वभाव

राजा जितशत्रु नगर के बाहर जा रहा था। मंत्री सुबुद्धि उसके साथ था। एक खाई आयी। उसमें जल भरा था। वह कूड़े-करकट से सड़ा हो रहा था। उसमें मृत पशुओं के कलेवर सड़ रहे थे। दूर तक दुर्गन्ध फूट रही थी। राजा ने कपड़ा निकाला और नाक को दबा लिया। ‘कितनी दुर्गन्ध आ रही है!’ राजा ने मंत्री की ओर मुड़कर कहा। मंत्री तत्परता थी। उसने कहा, ‘महाराज! यह पुर्तगालों का स्वभाव है।’ उसने राजा के भाव की तीव्रता को अपनी भावमयी से मंद कर दिया। बात वहीं समाप्त हो गयी। कुछ दिनों बाद मंत्री ने राजा को अपने घर भोजन के लिए निमंत्रित किया। भोजन के मध्य राजा ने पानी पीया, अत्यन्त निर्मल, अत्यन्त मधुर और अत्यन्त

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सुगन्धित। राजा बोला, ‘मंत्री! यह पानी तुम कहाँ से लाये हो? इच्छा होती है कि एक गिलास और पीऊँ। मैं तुम्हें अभिनन्दन मानता हूँ, किन्तु तुम मुझे वैसा नहीं मानते। तुम इतना अच्छा पानी पीते हो, मुझे कभी नहीं पिलाते।’ मंत्री मुस्कराया और बोला, ‘महाराज! यह पानी उस खाई से लाया हूँ जहाँ आपने नाक-भी सिकोड़ी थी और कपड़े से नाक ढकी थी।’ राजा ने कहा, ‘यह नहीं हो सकता। यह पानी उस खाई का कैसे हो सकता है?’ मंत्री अपनी बात पर अटल रहा। राजा ने उसका प्रमाण चाहा। मंत्री ने उस खाई का पानी मंगवाया। राजा की देख-रेख में सारी प्रक्रिया चली और वह पानी वैसा ही निर्मल, मधुर और सुगन्धित हो गया जैसा राजा ने मंत्री के घर पीया था। केवल पानी ही क्या, हर वस्तु बदलती है।

मेरी सीमा

एक पक्षी कुएँ की मेड़ पर आकर बैठा। कुएँ में मेंढक था। मेंढक ने उस पक्षी को देखा और पूछा, ‘कहाँ से आया है?’ पक्षी ने उत्तर दिया, ‘मानसरोवर से।’ कितना बड़ा है तुम्हारा मानसरोवर?’ मेंढक का अगला प्रश्न था। ‘एक छलांग भरी-इतना बड़ा?’ ‘नहीं, और बड़ा।’ फिर कूदा- ‘क्या इतना बड़ा?’ ‘नहीं, और बहुत बड़ा।’ मेंढक बोला- 'झूठ बोलता है। मेरे घर से बड़ा तुम्हारा

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मानसरोवर नहीं हो सकता।’ पक्षी ने सोचा- ‘जब मूर्ख से पाला पड़े तो भाग जाना ही अच्छा है।’ वह उड़ गया। ‘जो नीचे रहने वाला होता है, जिसने कुएं के बाहर जाकर इस दुनिया को नहीं देखा, जिसने अपनी सीमा को तोड़कर विराट् सत्य को नहीं देखा, वह अहंकारी बन जाता है और यह समझता है जो मेरी रेखा है वही सत्य है। उसके सिवाय दुनिया में कोई सत्य नहीं।’

तुम मान लो

एक नौकर था सेठानी के घर। एक बार कोई स्थिति आयी। रात का समय। काफी अंधेरा हो गया। सेठानी ने नौकर से कहा, ‘पी ले आओ बाजार से।’ नौकर ने कहा, ‘कैसे जाऊँ, डर लगता है, बाहर बहुत अंधेरा है।’ मुझे बहुत डर लगता है। मैं तो नहीं जा सकता।’ सेठानी ने कहा, ‘अरे, डर कुछ भी नहीं होता। तुम मान लो, डर कुछ भी नहीं होता इस दुनिया में, तुम्हें डर नहीं लगेगा।’ क्या करे बेचारा नौकर, विवश था। मालकिन का आदेश जो था। गया। दो-चार सीढ़ियां ही उतरा होगा कि अंधेरा आ गया, डर लगा और वापस दौड़ आया। मालकिन के पास आकर बोला, 'तुम कुछ भी कहो, मुझे

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तो डर लगाता है, मैं तो नहीं जा सकता।’ मालकिन ने फिर समझाया। कहा, ‘तुम बहुत भोले हो। दुनिया में डर नाम की कोई चीज नहीं होती, ऐसा मान लो।’ बहुत दबाव दिया। आखिर नौकर था, फिर चला। पांच-दस कदम गया और फिर दौड़ आया। सेठानी ने फिर लंबा उपदेश दिया। उसने एक ही धुन पकड़ा दिया कि तुम मान लो, दुनिया में डर नाम की कोई चीज नहीं है। बेचारा बहुत परेशान था। नीचे गया और पांच-सात मिनट में वापस लौट आया। बेचैन भरा हुआ मालकिन के सामने रख दिया- ‘लो तुम्हारा घी।’ उसने देखा और कहा कि इतनी जल्दी क्यों ले आये? नौकर ने जवाब दिया, ‘इससे तुम्हें क्या मतलब! ले आया, ले आया- देख लो।’ डक्कन उठाकर देखा तो पीला-पीला रंग। थोड़ा सूघा तो बदबू आयी। शंका तो कड़वा। कि- ‘यह क्या ले आये?’ ‘कुछ भी नहीं, घी है।’ ‘यह घी नहीं है, यह तो मृत लगाना है।’ (वास्तव में वह नीचे खड़े एक गधे को मृत ही मरकर लाया था।) नौकर ने कहा, ‘तुम मान लो यह घी है।’ सेठानी ने कहा, ‘जब घी नहीं तो मैं कैसे मान लूं यह घी है!’ नौकर ने कहा, ‘मुझे जब डर लगाता है तो कैसे मान लूं कि डर नहीं है?’

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आवरण हटा

एक राजकुमार को संगीत की शिक्षा देनी थी। वीणा-वादन और संगीत के लिए राजकुमार उदयन का नाम सर्वत्र काफी चमक रहा था। राजा ने कूट-प्रयोग से उदयन को उपलब्ध कर दिया। राजा राजकुमारी को संगीत सिखाना चाहता था और दोनों को सम्पर्क से बचाना भी चाहता था। इसलिए दोनों के बीच में यवनिका बांध दी। दोनों के मन में भी यवनिका बांधने की चेष्टा थी। उदयन से कहा गया, ‘राजकुमारी अंधी है, यह तुम्हारे सामने आने में सकुचाती है।’ अतः वह यवनिका के भीतर बैठेगी।’ राजकुमारी से कहा गया, ‘उदयन कोढ़ी है। वह तुम्हारे सामने बैठने में सकुचाता है।’ अतः वह यवनिका के बाहर बैठेगा।’ शिक्षा का क्रम चालू हुआ और कई दिनों तक चलता रहा। एक दिन उदयन संगीत का अभ्यास करा रहा था। राजकुमारी बार-बार दखलित हो रही थी। उदयन ने कई बार टोका, फिर भी राजकुमारी उसकी स्वरों को पकड़ नहीं सकी। उदयन कुछ क्रुद्ध हो गया। उसने आवेश में कहा, ‘जरा संभलकर चलो। कितनी बार बता दिया, फिर भी ध्यान नहीं देती हो। आखिर अंधी हो हो।’ राजकुमारी के मन पर चोट लगी। वह चीखना उठी। उसने जो आवेश में कहा, ‘कोढ़ी! जरा संभलकर बोलो!’ उदयन ने सोचा, 'कोढ़ी

कौन है? मैं तो कोढ़ी नहीं हूं। फिर राजकुमारी ने कोढ़ी कैसे कहा?’ राजकुमारी ने भी इसी भाषा में सोचा, ‘मैं तो अंधी नहीं हूं। फिर उदयन ने अंधी कैसे कहा?’ सचाई को जानने के लिए दोनों तरफ उठे। यवनिका हटाकर देखा, कोई अंधी नहीं है और कोई कोढ़ी नहीं है। बीच का आवरण यह धारणा बनाए हुए था कि यवनिका के इस पार अन्धापन और उस पार कोढ़। आवरण हटा और दोनों बातें हट गयी।

स्टोर खाली हो जाये

एक बार जयप्रकाश नारायण और उनके मित्र उत्तर प्रदेश की यात्रा पर जा रहे थे। कई स्थानों पर लोग बड़े हास्य और बातें कर रहे थे। थोड़ी देर बाद जापानी मित्र ने कहा- 'जे० पी०! तुम्हारा भारत तो बड़ा समृद्ध लगता है। जयप्रकाश ने कहा- ‘इतना व्यंग्य क्यों करते हो? यहां तो टूटी-फूटी झोपड़ियां हैं, फटे कपड़े और नंगे बदन वाले आदमी हैं। देखने से ही गरीब लगते हैं।’ जापानी मित्र ने कहा- 'देखो, ये कितने लोग खाली हाथ बैठे हैं। जापान में कोई भी निकम्मा नहीं मिलेगा। निकम्मापन समृद्ध देश में ही हो सकता है। एक ओर

अनोखी कथाएँ

गरीबी है, खाने को नहीं है, फिर भी खाली बैठे बातें करते हैं। जापान में जनरल स्टोर में चले जाइए। जो वस्तु पसन्द आए, उसको बता दीजिए। वह आपको दे देगा। वह चेक नहीं करेगा कि कितनी वस्तु आपने ली है और कितनी बची रहे है। भारत में यदि ऐसे न पूछे तो चार दिन में स्टोर खाली हो जाए।

चौकीदारी

राजा बहुत खर्च करने लगा। खजाने में से बहुत बांटने लगा। खर्चीची आया और बोला- 'महाराज! आपके पुरखों का इकट्ठा किया हुआ खजाना इस प्रकार आप खर्च करेंगे तो खाली हो जाएगा। यह आप कैसे करते हैं? राजा बोला- 'कैसे कह रहे हो? क्या मैं चौकीदार हूं? रखवाली करना चौकीदार का काम है। मैं चौकीदारी के लिए पैदा नहीं हुआ हूं। रखवाली करना मेरा काम नहीं है। मेरा काम है- बढ़ाना। खजाना खाली होगा तो फिर बढ़ेगा, इसकी मुझे चिन्ता नहीं। यह चौकीदारी मुझसे नहीं हो सकती।

अनोखी कथाएँ

मित्रों से परामर्श

आंख का एक बीमार व्यक्ति वैद्य के पास गया। उसकी आंखों में मोतिया हो गया। वैद्य ने ‘कांच’ की। आंख ठीक हो गयी। उसे दीखने भी लग गया। एक दिन वैद्य आया। उससे कहा, ‘अब तुम्हारी आंखें ठीक हो गयी हैं। तुम चलते-फिरते हो। तुम्हें दीखने भी गया है। मेरी फीस चुकाओ।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘मैं ऐसे नहीं मानता। पहले मैं अपने मित्रों से परामर्श करूंगा। उनसे पूछूंगा कि मुझे दीखने लगा है या नहीं। यदि वे कहेंगे कि दीखने लग गया है तो मैं तुम्हारी फीस चुकाऊंगा, यदि वे कहेंगे कि दीखने नहीं लगा तो एक पैसा भी नहीं दूंगा।’

स्वधर्म : राजधर्म

सेनापति था जैन। राजा कहीं बाहर गया हुआ था और पीछे से शत्रु राजा ने आक्रमण कर दिया। अब सेनापति अपनी सेना लेकर युद्ध के मैदान में गया। कल से लड़ाई शुरू होने वाली है। संयोग ऐसा मिला कि क्षमापणी का दिन आ गया। सेनापति जैन था। बड़ा श्रावक था। धर्म का जानकार था। सायंकाल वह प्रतिक्रमण करने बैठ गया। प्रतिक्रमण शुरू किया। उसने प्रतिक्रमण पढ़ा- 'ईंदिया, तेइंदिया, तेइंदिया, आदि

अनोखी कथाएँ

एकेन्दिय की हिंसा की हो तो मिच्छामि दुक्कड़म् आदि-आदि। पास में सहायक सेनापति और सैनिक सुन रहे थे। उन्होंने सोचा कि जो कहता है कि चींटी-मकौड़ी को मारो तो हो मिच्छामि दुक्कड़म्, वह हमें क्या निहाल करेगा यहां? वे सब घबरा गये। वे रानी के पास पहुंचे। उन्होंने कहा, ‘महारानी! इस सेनापति के भरोसे कल हम पराजय का मुंह देखना पड़ेगा, क्योंकि यह सेनापति हिंसा से घबराता है।’ रानी ने सेनापति को बुलाया। बुलाकर पूछा ‘तुम जीवों को मारने से डरते हो तो शत्रुओं को कैसे मारोगे?’ सेनापति ने कहा, ‘मैं जैन धर्म को मानने वाला हूं। मैं महावीर का अनुयायी हूं। महावीर का यह आदेश है कि बिना मतलब एक चींटी को भी मत मारो, मत सताओ। अहिंसा का पालन करो, करुणा करो, अनुकम्पा करो- यह मेरा स्वधर्म है। किन्तु लड़ना मेरा राज-धर्म है। दोनों अपने-अपने स्थान पर हैं। कोई शत्रु मुझ पर आक्रमण करता है तो मैं अपनी सुरक्षा के लिए स्वतंत्र हूं। आप चिन्ता न करें। निश्चिन्त रहें। कल जो होगा, वह सामने आ जायेगा।’ युद्ध का मैदान बताया। कि एक जैन सेनापति कितने पराक्रम से लड़ सकता है। रानी को विश्वास था पहले से ही। सूर्योदय हुआ, लड़ाई शुरू हुई। सेनापति पूर्ण पराक्रम से लड़ा सेनापति का साहस देख योद्धाओं का शौर्य दुगुना हो गया। भयंकर युद्ध हुआ। शत्रु पराजित हो पहले ही दिन भाग खड़ा हुआ।

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पसीना-सुखाओ

विद्यालयी स्कूल से आया। कड़ी धूप थी। कपड़े तर-बतर हो गये। घर पहुँचा और धूप में आकर खड़ा हो गया। माँ ने कहा, ‘बेटा! क्या कर रहे हो? पसीना सुखाओ, छाया में आ जाओ।’ वह बोला, ‘माँ! पसीना ही सुखा रहा हूँ।’ माँ ने कहा, ‘इतनी कड़ी धूप में पसीना कैसे सूखेगा?’ वह बोला, ‘माँ, जब कपड़ा गीला होता है, तुम धूप में सुखाती हो या नहीं? जब कपड़ा धूप में सूख सकता है तो पसीना क्यों नहीं सूखेगा?’

अर्द्ध पूर्णिमा

एक शिष्य भिक्षा के लिए गया। एक बहन ने पूछा, ‘महाराज! आज तिथी क्या है?’ शिष्य बोला था। उसने कहा, ‘आज पूर्णिमा है।’ बहन बोली, ‘महाराज! आज तो अमावस्या होनी चाहिए, पूर्णिमा कैसे?’ शिष्य बोला, ‘कुछ भी हो। आज पूनम ही है।’ वह स्थान पर आ गया। गुरु से बोला, ‘आज है तो अमावस्या, पर मैंने कह दिया आज पूर्णिमा है। अब मेरी लाज आपके हाथ में है।’ मैं भूखा न पड़ जाऊँ। आचार्य बोले, ‘ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए। अच्छा जाओ कह दो कि आज पूर्णिमा है और रात को आकाश में पूरा चांद दीखेगा।’ आचार्य ने

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मन-बल से अमावस्या की घोर अंधेरी रात में भी चांद उगा दिया। यह शक्ति जागरण का परिणाम है।

तर्कबाज

कोल्लू का बैल चल रहा था। एक वकील आया। वह कोल्लू के स्वामी के पास बैठा। उसने देखा कि स्वामी चुपचाप बैठा है और कोल्लू का बैल स्वतः घूम रहा है। कुछ क्षणों बाद वह बोला, ‘बैल के गले में फंदा क्यों बांध रखा है?’
स्वामी बोला, ‘कही भाग न जाये, इसलिए।’
‘इसकी आँखों पर पट्टी क्यों बांधी है?’
‘इसे यह पता न चले कि मैं एक परिधि में घूम रहा हूँ, अन्यथा यह रुक जायेगा।’
‘इसके गले में घंटी क्यों है?’
‘घंटे की घंटी बजती है तो पता चल जाता है कि यह घूम रहा है। घंटी बंद होती है तो उसके रुकने का आभास हो जाता है।’
‘अच्छा किन्तु यह बैल खड़ा-खड़ा भी घंटी बजा सकता है और तुमको भ्रम में डाल सकता है।’
‘नहीं, बैल आदमी जितना तर्कबाज नहीं है।’ उसने तर्कशास्त्र नहीं पढ़ा है।

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पता ही नहीं लगता

राजा ने अपने गुरु से कहा, ‘गुरुदेव! एक दिन आपने कहा था कि देवता हजारों-लाखों करोड़ों वर्ष बीत जाते हैं।’ क्या वे देते-देते थक नहीं जाते? उनके लम्बे आयुष्य की बात बुद्धिमय नहीं होती।’
आचार्य बालयती थे। उन्हें वयोवृद्धि उपलब्ध थी। वे वीतरागलब्धि के धनी थे। इस लब्धि के योग से उनकी वाणी का निवास बहुत बढ़ गया था। वे बोले, ‘राजन्! मैं तुम्हारे प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करूँगा। पहले तुम कुछ समय के लिए प्रवचन सुनो।’ आचार्य ने प्रवचन प्रारम्भ किया। सारी सभा तन्मय होकर प्रवचन सुनने लगी। समय बीतता गया। किसी को पता नहीं चला। आचार्य की वाणी से मानो निवास झर रहा था। सभी उनके ध्यान में निमग्न थे। एक प्रहर काल बीता। आचार्य ने प्रवचन सम्पन्न किया। आचार्य ने पूछा, ‘राजन्! कितनी देर से प्रवचन सुन रहे हो?’ बहुत विलम्ब हो गया है।’ राजा बोला, ‘गुरुदेव! यह क्या? अभी दो क्षण पूर्व ही तो आपने प्रारम्भ किया था, विलम्ब कहाँ हुआ है?’ आपने प्रवचन को इतनी जल्दी कैसे सम्पन्न कर डाला?’ आचार्य बोले, 'राजन्! मैंने एक प्रहर तक प्रवचन दिया है, किन्तु उसने तुमको इतना रस आ गया कि तीन घंटे का काल दो क्षण जितना लगा। इसी प्रकार देवता

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इतने आनन्द में रहते हैं कि उन्हें हजारों-लाखों वर्षों के बीतने का पता ही नहीं लगता।’ राजा को बात समझ में आ गयी।

शराब का नशा

आदमी शराब पीने मदिरालय में गया। शराब पीने के बाद नशे में चूर हो गया। लालटेन लेकर आया था। लालटेन लेकर चला। अंधेरी रात थी। रास्ता नहीं दिखायी दे रहा था। बोला, ‘देखो कैसा घोर कलिकाला आ रहा है कि लालटेन ने प्रकाश देना बंद कर दिया है।’ थोड़ा आगे चला। गड्ढा आया। गड्ढे में गिर गया। अंधेरे और नशे में चूर। लालटेन ने प्रकाश देना बंद कर दिया। गालियाँ दी। लड़खड़ाता हुआ घर पहुँचा। सो गया। सुबह उठा। खुल्ला कर रहा था तब मदिरालय का मेरा आया। उसने एक चिट्ठी हाथों में पकड़ा दी। उसमें लिखा था, ‘महाशय ! कल रात आप हमारे मदिरालय में शराब पीये आये थे। आप जाने लगे तो अपनी लालटेन छोड़ गए एवं हमारे तोते का पिंजड़ा ले गए। कृपया यह पिंजरा लौटा दीजिए। यह अपनी लालटेन सम्हाल ले।’
क्या तोते का पिंजड़ा भी प्रकाश करेगा? जो प्रकाश

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का साधन नहीं, वह प्रकाश कैसे करेगा? जो शुद्ध साधन नहीं, जो सचमुच धर्म नहीं वह कल्याण कैसे करेगा?

मतलब

मेरे पास एक मित्र आए और बोले, ‘महाराज! मेरा लड़का धर्म नहीं करता। आप जरा समझाओ।’ मैंने कहा, ‘आएगा तो समझाऊँगा।’ शाम को लड़का आया। मैंने पूछा, ‘धर्म को क्यों नहीं मानते हो? यह क्यों नहीं आते?’ उस लड़के ने कहा, ‘मैं एकान्त में बैठूंगा।’ पिता उठकर बाहर चला गया तब उस लड़के ने बताया कि मेरे माता-पिता आठ महाराज के जाते हैं, फिर भी दिन भर लड़ाई करते रहते हैं। अगर लड़ाई ही करनी है तो महाराज के आने की क्या आवश्यकता? जिस धर्म से मेरे माता-पिता ने कुछ नहीं पाया, कुछ नहीं सीखा, वैसे धर्म से मतलब क्या है?’

रुक्स चाइल्ड

रुक्स चाइल्ड एक अमीर अमेरिकन था। वह निरन्तर वातानुकूलित में रहता। मकान, कार्यालय, कार-सब वातानुकूलित, वातानुकूलन के अतिरिक्त कोई विकल्प

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नहीं था। स्थिति यह हो गयी कि वह बहुत नर्वस हो गया। गाड़ी-संस्थान बहुत कमजोर हो गयी और वह बेचैन रहने लगा। डॉक्टर से परामर्श किया। डॉक्टर ने कहा, ‘आप प्रतिदिन दो घंटा गर्म पानी के टब में बैठे रहें।’ रुक्स चाइल्ड ने वैसा ही किया। दो-चार दिन बीते। उसे यह विधि अच्छी लगी। उसने सोचा- ‘कितनी मूर्खतापूर्ण बात है। मैं पूरे दिन वातानुकूलित स्थिति में रहता हूँ और फिर बेचैनी मिटाने के लिए दो घंटा गर्म पानी के टब में बैठा रहता हूँ। इससे अच्छा तो यह है कि बेचैनी पैदा करने वाली वातानुकूलित स्थिति को ही छोड़ दूँ।’ उसने अपना क्रम बदला। धीरे-धीरे प्रकृति में आ गया। स्थिति बदल गयी। अब उसके बेचैनी नहीं रही।

मैं क्या बताऊँ

जुप बहुत विख्यात मनोवैज्ञानिक हुए हैं। एक बार वे बीमार हो गये। डॉक्टर के पास गये। डॉक्टर ने कहा- ‘लेट आओ।’ जुंग लेट गये। डॉक्टर ने कहा- ‘अब तुम अपने भीतर देखने का प्रयत्न करो। और अधिक गहराई में देखो। उस समय जो विकल्प उत्पन्न हो, वे मुझे कहते रहो।’ जुंग ने वैसा ही किया। ज्यों-ज्यों भीतर की गहराई में उतरते गये, विकल्प गायब होते गये। विकल्पों

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का उत्पन्न होना बंद हो गया। जुंग ने कहा, ‘डाक्टर! अन्दर देखने पर कोई विक्सता आता ही नहीं। मैं क्या बताऊँ?’

विकल या विचार तब उत्पन्न होते हैं, जब हम बाहर ही बाहर देखते हैं।

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लाद दिया

पिता ने अपनी लड़की की शादी की। लड़की बड़ी खुंखार और तेज-तर्रार थी। बड़ा भार अनुभव हो रहा था। शादी करते ही पिता से रहा नहीं गया। बोला- चलो, आज एक बहुत बड़े भार से मुक्त हुआ। दामाद पास में ही खड़ा था। उसने सुना और कहा- आप तो भार से मुक्त हुए लेकिन वह भार आपने मुझ पर लाद दिया।

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दाढ़ी में आग

एक बादशाह था। उसको एक नौकर की जरूरत थी। परीक्षण के लिए अनेक लोगों को बुलाया। आदमी रखना था जो परीक्षण जरूरी था। क्योंकि आदमी बहुत काम देने वाला होता है तो आदमी बहुत खतरनाक भी

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होता है। कोई खतरनाक आदमी न आ जाए इसके लिए परीक्षण जरूरी थे। उपस्थित लोगों में से बादशाह ने तीनों व्यक्तियों को सामने खड़ा कर कर कहा- बताओ, इत्तफाक से मेरी दाढ़ी में और तुम्हारी दाढ़ी में एक साथ आग लग जाए तो तुम क्या करोगे? पहला तत्काल बोल उठा- हुजूर! आपकी दाढ़ी की आग तत्काल बुझा दूंगा। अपनी दाढ़ी की आग की चिंता ही नहीं करूंगा। दूसरा बोला- ‘जहांपनाह! पहले मैं अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा और फिर आपकी दाढ़ी की चिंता करूंगा।’ तीसरा बोला- हुजूर! एक हाथ से आपकी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा और दूसरे हाथ से अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा।

बादशाह ने तीनों व्यक्तियों के उत्तर सुनकर कहा- 'पहला आदमी अव्यावहारिक है। दुनिया में ऐसा कोई भी आदमी नहीं होता जो कठिन समय आने पर अपनी बात न सोचकर दूसरे की बात सोचता हो। अपनी हित-चिंता न कर दूसरे की हित-चिंता करता हो। वह व्यक्ति सर्वथा अव्यावहारिक है। जो व्यक्ति अव्यावहारिक बात कहता है, वह हमेशा धोखा देता है। अज्ञानी व्यक्ति सदा अव्यावहारिक बात करता है। वह ऐसी बात करता है कि सामने वाले को लुभा लेती है, किन्तु उसे धोखा देता है।

दूसरा आदमी स्वार्थी है। स्वार्थी आदमी किसी का भला नहीं करता। वह खुदगर्ज होता है। वह सदा अपनी

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ही बात सोचता है, अपना ही भला करता है। दूसरे की बात को वह सोच ही नहीं सकता। वह आदमी भी खतरनाक होता है।

‘तीसरा आदमी व्यावहारिक है। वह व्यवहार की बात करता है, सच्चाई की बात करता है। वह न अव्यावहारिक है न स्वार्थी। वह व्यवहार के धरातल पर जीता है।’

बादशाह ने उस तीसरे व्यक्ति को नौकरी दे दी। दोनों को विदा कर दिया।

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जरूरत

पिता ने कहा- बेटा! बाजार में जाओ और मूसा ले आओ। वह बोला- ‘पिताजी! बाजार में जाने की क्या जरूरत है? स्कूल में मास्टराणी कह रहे थे कि तुम्हारे दिमाग में मूसा भरा है। पिताजी! आप उसी को काम में ले लो। बाहर से क्यों मंगा रहे हैं?’

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जज : अपराधी

जज ने अपराधी से कहा, 'तुम न्यायालय में खड़े हो। सच-सच कहना, झूठ मत कहना। अच्छा बताओ, झूठ बोलने से कहा जाओगे और सच बोलने से कहा

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जाओगे?’

‘जज साहब! जानता हूं। झूठ बोलने से नरक में जाऊंगा और सच बोलने से जेल में जाऊंगा।’

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कोरा-कागज

चित्रकारिता की परीक्षा हो रही थी। दस-दस, बारह-बारह वर्ष के बच्चे परीक्षार्थी थे। उनको तीन चित्र बनाने थे- एक चूहे का, दूसरा बिल्ली का और तीसरा कुत्ते का। विद्यार्थी ने तन्मयता के साथ चित्र बनाये। उनमें रंग भरे। परीक्षा का समय समाप्त हुआ। चित्रकार अध्यापक एक-एक विद्यार्थी के चित्रों का परीक्षण कर उनको नम्बर दे रहा था। एक विद्यार्थी ने कोरा कागज अध्यापक के हाथ में दे दिया। अध्यापक ने चिढ़ते हुए कहा- 'यह क्या? अभी तक एक भी चित्र नहीं बना पाए?

विद्यार्थी बोला- ‘मैंने तीनों चित्र बनाये हैं।’

‘कहाँ हैं चित्र? पन्ना खाली पड़ा है’- अध्यापक ने कहा।

विद्यार्थी बोला- ‘चूहा बनाया था किन्तु उसे बिल्ली खा गई।’

‘अरे, बिल्ली कहाँ है?’

‘कुत्ता बिल्ली को खा गया।’

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अनोखी कथाएँ

‘अच्छा, तो बताओ, कुत्ता कहाँ गया?’

‘एक बिल्ली से उसका पेट नहीं भरा तो दूसरी बिल्ली की खोज में चला गया।’ तीनों चले गये। मेरा कागज कोरा ही रह गया।

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राजा और संन्यासी

एक राजा था। उसने बहुत बड़ा महल बनवाया। वह भव्य, रमणीय और सुविधाजनक था। सब लोग आते, देखते और प्रशंसा करते। राजा उस प्रशंसा से तृप्त नहीं हुआ। प्रशंसा का मूल्य है किन्तु उससे भी अधिक मूल्य इस बात का है कि प्रशंसक कौन है? साधारण व्यक्ति की प्रशंसा का उतना मूल्य नहीं होता, जितना कि उस व्यक्ति का होता है, जो वस्तुतः प्रशंसा करने में कृपण होता है या जिसकी प्रशंसा सहज निकलती नहीं। उस नगर में एक तत्वज्ञानी मनुष्य रहता था। राजा ने सोचा, ‘जब तक वह प्रशंसा नहीं करेगा तब तक दूसरों की प्रशंसा का कोई मूल्य नहीं होगा।’ राजा ने उसे निमंत्रित किया। वह आ गया। राजा ने कहा, ‘देखो, कितना सुन्दर प्रासाद है। कितना भव्य! कितना सुविधाजनक! क्या आप इसमें कोई कमी देखते हैं?’ वह मुस्कराया। उसने धीमे स्वर में कहा, 'इस दुनिया में ऐसी कोई वस्तु नहीं होती, जिसमें कोई कमी न हो। कुछ भी पूर्ण हो नहीं सकता।

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अनोखी कथाएँ

हमारी अपूर्णता की दुनिया में कुछ भी पूर्ण नहीं होता। आप मुझे फिर क्यों पूछते हो?’ राजा ने आग्रह किया। तब तत्वज्ञानी ने कहा, ‘यदि आप जानना ही चाहते हैं तो मैं बताऊंगा। मुझे इसमें दो कमियां दिखाई देती हैं। एक कमी तो यह है कि एक दिन यह प्रासाद नष्ट हो जाएगा और दूसरी कमी यह कि इसको बनाने वाला भी नष्ट हो जाएगा।’

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यमराज

एक बूढ़ा आदमी जा रहा था। उसके सिर पर एक गट्ठर था। बोझ अधिक था, बूढ़ा परेशान था, वह थक गया। उसने सोचा, ‘देखो, मौत भी नहीं आती। यमराज मुझे भूल ही गया है। कितना अच्छा हो, यदि अभी मौत आकर मुझे उठा ले।’ यमराज आकर मुझे ले जाए।’ योग ऐसा मिला कि यम स्वयं आ गया। इधर बूढ़े का एक सहायक भी आ पहुंचा। उसने आते ही गट्ठर उठाकर अपने सिर पर रख लिया। यम ने पूछा, ‘बोलो, मुझे क्यों याद किया?’ अब बूढ़े का विचार बदल गया था। वह हल्का हो गया था। कष्ट में जो विचार था वह जैसे ही आराम मिला, सुख मिला, बदल गया। यम ने कहा, ‘जल्दी बताओ, तुमने मुझे क्यों याद किया?’ बूढ़े ने कहा, 'क्षमा करें, मैं गट्ठर के भार से दबा जा रहा था।

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घृणा और प्रेम

सन्त राबिया के घर एक फ़कीर आया। उसने मेज के पास पड़ी पुस्तक को देखा। उसके पन्ने उलटने शुरू किये। एक पन्ने में लिखा था- ‘शैतान से नफ़रत करो।’ राबिया ने उसे काट दिया। फ़कीर बोला- ‘यह क्या? इस पवित्र पुस्तक का वाक्य किसने काटा?’ सन्त राबिया ने कहा, ‘यह मैंने काटा है।’ फ़कीर ने पूछा, ‘क्यों?’ राबिया ने कहा, ‘अच्छा नहीं लगा।’
‘यह कैसे हो सकता है कि पवित्र पुस्तक की बात अच्छी न लगे? क्या यह सही नहीं है?’ फ़कीर ने पूछा। सन्त राबिया ने कहा, ‘एक दिन मुझे भी सही लगता था, किन्तु आज लगता है कि सही नहीं है।’
‘वह कैसे?’ फ़कीर ने पूछा।
सन्त राबिया ने कहा, ‘जब तक मेरा प्रेम जागृत नहीं था, मेरे प्रेम की आँख खुली नहीं थी, मुझे भी लगता था कि शैतान से नफ़रत करो, प्यार नहीं, यह वाक्य बहुत सही है। किन्तु अब मैं क्या करूँ? मेरे प्रेम की आँख खुल गई है। अब घृणा करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है। मैं घृणा कर ही नहीं सकती। प्रेम की आँख यह भेद करना नहीं जानती कि इसके साथ प्रेम करो और इसके साथ घृणा।’

देखादेखी

संस्कृत का बहुत बड़ा कवि माघ एक बार स्नान करने के लिए नदी पर गया। लोटा था पास में। सोचा- कल फिर आना है। चलो, इसे कहीं रेत के टीले में गाड़ दें, कल काम आ जाएगा। ऐसा किया। किसी ने देख लिया। लोगों ने सोचा, इतना बड़ा कवि है। लोटे को गाड़ रहा है, अवश्य कोई अर्थ है। दूसरे लोग जो नदी पर आये हुए थे, उन्होंने माघ का अनुकरण किया और स्थान-स्थान पर अपने लोटे नदी में गाड़ दिये। दूसरे दिन माघ आया। उसने अपने लोटे का स्थान ढूँढ़ना चाहा। किन्तु वह उसे ढूँढ़ नहीं सका, क्योंकि पचासों स्थान एक-से बन गये थे। यह हताश होकर बोला-
गतानुगतिको लोक, न लोकः परमार्थिकः।
गंगया बालुकामध्यै, गते तत्र संभ्रमम्।।
‘लोग मतानुगतिक होते हैं। पीछे चलने वाले होते हैं। इनके अनुकरण में मेरा लोटा और गंवा दिया।’

अनोखी कथाएँ

तुम मूर्ख हो

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3040.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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