अनोखी कथाएँ - जैन स्वाध्याय सामग्री | Anokhi Kathayen

अनोखी कथाएँ

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अनुक्रमणिका

संपादक
ब्र० धर्मचंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य

भाग 1

प्रकाशक
आचार्य धर्मश्रुतग्रन्थमाला
दिल्ली

समय के साथ

विश्व के प्रत्येक राष्ट्र के कोने कोने में बच्चों और जन-सामान्य के लिए कथा कहानियों का साहित्य सृजित होता रहा है। भारत में भी विभिन्न भाषाओं में ऐसी अनेकों कहानियाँ हैं। संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं में लेखक इन्हें लिखने में पीछे नहीं रहे।
भारतीय संस्कृति की सामाजिक, सहिष्णुता और सामंजस्य की भावना को लक्ष्य में रखकर भारतीय लोक कथाओं का संकलन किया।
जैन कथाओं का योग दान महत्त्वपूर्ण है ही किन्तु जैनेतर कथाओं का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक कथा के पीछे कुछ न कुछ रहस्य जरूर होता है जिसके कारण कथा प्रचलित होती है।
कथा साहित्य हजारों वर्षों से मौखिक चलना आ रहा है उसका संकलन करके प्रकाशित करने का एक छोटा सा प्रयास किया जा रहा है। जो लगभग सभी को पढ़ने में रुचिवृद्ध होगा। कथा ऐसी सरस विद्या है जिसको बाल-गोपाल रुचि से पढ़ते हैं और सुनते ही नहीं उनके अन्तः करण को संस्कारित भी करते हैं।
मुझे आशा है कि आप इन अनोखी कहानियों को पढ़ कर ज्ञान प्राप्त कर दूसरों को पढ़ायें या सुनायें।
धर्मचंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य

  • प्रेरणा : शु० राजमति माता जी
  • संकलन एवं संपादन : धर्मचंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य
  • प्रकाशन वर्ष : 2000
  • पृष्ठ नं : 1
  • मूल्य : 20 रुपये
  • प्रकाशक : आचार्य धर्म श्रुतग्रन्थ माला
  • प्राप्ति स्थान : जैन मंदिर गुलाब वाटिका
    लोनी रोड दिल्ली

अनुक्रम

विषय पेज सं विषय पेज सं
उत्तराधिकारी 1 शराब का नशा 25
पुरस्कार की जीत 3 मतलब 26
संकल्प के प्रति समर्पण 5 रक्स चाइल्ड 26
सन्यासी को सोने में गा 6 मैं क्या बताऊँ 27
चमत्कार 8 लाद दिया 28
दर्द का भान 9 दादी में आग 28
जीवन्त चित्र 9 जरूरत 30
पुद्गल का स्वभाव 13 जज अपराधी 30
मेरी सीमा 14 कौरा कागज 31
तुम मान लो 15 राजा और संन्यासी 32
आवरण हटा 17 यमराज 33
स्टोर खाली हो जाये 18 देखा देखी 34
चौकीदारी 19 घृणा और प्रेम 35
मित्रों से परामर्श 20 तुम मूर्ख हो 36
स्वधर्म सुधर्म 20 नीयत का असर 37
पसीना सुखाओं 22 आना और जाना 38
आज पूर्णिमा 22 गधे का घोडा 40
तर्कबाज 23 बातों से प्रसन्न 41
पता ही नहीं लगता 24 आस्था 42
नीचे भी देख लो 43 पानिकाता कितनी 62
नाटक 44 दासी के दास 63
बुखार 44 आपत्ति 65
खुदा के साथ 45 सोने की सीमा 65
विदेश जाने की आवश्यकता नहीं 46 मन की परिणति 66
प्रतीक्षा 47 दरवाजे पर लिखा 68
सम्राट सिकन्दर 48 घर की प्रतीक्षा 69
शास्त्रीय संगीत 49 मैं मेरे बाप का स्वामी 69
सलाह 50 डबल रोटी खान 69
लाभदायक 50 तुम एक काम करो 70
मैं नहीं मानता 52 आप हंस रहे हो 71
मैं तो छोटा हूँ 52 गप्पू की मां 72
डाक्टर का परामर्श 52 कार्य में मस्त 72
वाणी का चमत्कार 53 कुरूप ही कुरूप 73
एकाग्रम आधी करदें 54 कंजूसी का असर 74
धन्यवाद 55 तुम ठीक कहते हो 75
अपराध 55 पारस पत्थर 75
पशु की तरह 56 राजा भोज 85
श्रम का मूल्य 57 सच्चा का फल 89
लोड सकते है जोव नहीं 58 महाजयामुंडइणकोफिश 93
आशा 59
रूप में परिवर्तन 59

उत्तराधिकारी

प्रसेनजित्त मगध का राजा था। उसने सोचा-मुझे अपने उत्तराधिकारी को नियुक्त करना है। पुरानी परंपरा थी कि जो बड़ा लड़का होता वह राज्य का उत्तराधिकारी बन जाता प्रसेनजित्त ने सोचा-मैं ऐसा नहीं करूंगा। मैं इस परम्परा को तोड़कर, मेरे सी गुण है उनमे जो योग्यतम होगा उसे अपना उत्तराधिकारी सौंप दूंगा। उन्होंने उपाय सोचा कि परीक्षा करू, योग्यता को परखू। उन्होंने अपने सारे अधिकारियो को सारी योजना बता दी। किस प्रकार व्यवस्था करनी है यह भी उन्हे अच्छी तरह समझा दिया। उसी दिन पचास राजकुमारों को भोजन के लिए एक पंक्ति में बैठा दिया गया। पचास थाल परोस दिए गए। भोजन की तैयारी होने वाली है। सब राजकुमार भोजन की प्रतीक्षा में बैठे है।

महाराज ऊपर बैठे है झरोखे में। सब देख रहे है। जैसे ही भोजन की तैयारी हुई, आदेश था कि जैसे ही सूचना मिले सबको भोजन शुरू करना है। इधर भोजन की सूचना मिली और उधर दरवाजे खुले। चारो तरफ शिकारी कुत्ते झपट पड़े। बड़े खूंखार कुत्ते ! भगदड़ मच गई। सभी राजकुमार प्रभावित हो गए। मनःस्थिति का सन्तुलन समाप्त हो गया। भोजन छोड़-छोड़कर वे

भागने लगे। सारे राजकुमार भाग गये। केवल एक बचा, जो सबसे छोटा था। उसका नाम था श्रेणिक। वह बैठा रहा, भागा नहीं। भोजन कर लिया, पूरा भोजन किया। भोजन के बाद उठा और चला गया, दूसरा दिन हुआ। राजकुमार जुड़ें। पचास राजकुमार सामने बैठे है। पूरी मंत्री परिषद्, अधिकारी, संसद के और नगर के कुछ प्रतिष्ठित लोग बैठे है। राजा ने कहा कि मैं आज अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करना चाहता हूं। लोगों को आश्चर्य हुआ। घोषणा की कौन-सी बात है! बड़ा राजकुमार ही तो होगा। राजा ने और स्पष्ट करते हुए कहा- मैं इस परम्परा को तोड़ना चाहता हूं। मैं उसे अपना उत्तराधिकारी बनाऊंगा जो सबसे योग्य होगा और मैंने योग्यता की कसौटी कर ली है। वह कसौटी अब आपके सामने प्रस्तुत करना चाहता हूं। सारे राजकुमार भी चौकन्ने हो गये। हर व्यक्ति सोचने लगा कि किसका नाम आयेगा। शायद यही सोचने लगे कि मेरा नाम आएगा। व्यक्ति के मन में एक भावना होती है, आकांक्षा होती है। सब एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। लोगों में भी बड़ा कुतूहल पैदा हो गया, सब में जिज्ञासा जाग गई। बड़ी उत्कंठा पैदा हो गई कि क्या होगा? राजा ने कहा- तुम लोग कल भोजन करने बैठे। भोजन किया? सब के सब एक साथ बोले- महाराजा! भोजन कैसे करते? आपके अधिकारी बिल्कुल व्यवस्था को जानते ही नहीं।

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व्यवस्था का कोई पता नहीं। इतने गैर जिम्मेदार है कि अपना दायित्व भी नहीं निभाते। हम तो भोजन करने बैठे और उधर से शिकारी कुत्ते भीतर आ गये। उन्होंने कोई व्यवस्था ही नहीं की, कैसे भोजन करते?

क्या किसी ने भी भोजन नहीं किया?

श्रेणिक बोला- महाराजा मैंने किया। राजा बोला- तुम मूर्ख हो। ये तो सारे समझदार है। शिकारी कुत्ते आये। भोजन छोड़-छोड़ कर भाग गये। तुम वहां कैसे रहे? कुत्ते काट खाते तो क्या होता? श्रेणिक बोला- मैं मूर्ख नहीं। जो अकेला खाना चाहता है, कुत्ते उसे काटते है। जो दूसरों को खिलाना जानता है, कुत्ते उसे कभी नहीं काटते। मेरे सामने पचास थाल पड़े थे। कुत्ते आते गये। थाल सरकाता रहा। वे भी खाते रहे, मैं भी खाता रहा। जो अकेला खाता है, उसे कुत्ते काटते है। जो दूसरों को खिलाना जानता है, उसे कुत्ते कभी नहीं काटते।

राजा ने श्रेणिक को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया।


पुरस्कार की जीत

राजा भोज बहुत विद्वान् थे। वे विद्वानों का बहुत सम्मान करते थे। एक बार राजा भोज ने राजसभा में घोषणा की-कोई भी विद्वान्, पंडित मुझे स्वरचित नया

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श्लोक सुनायेगा। उसे एक लाख रुपये पुरस्कार में दूंगा।
दूसरे ही दिन अनेक पंडित राजा भोज की सभा में श्लोक
सुनाने के लिए प्रस्तुत हो गये। राजा भोज का मंत्री उन
सबको देखकर चिंतित हो उठा। वह बुद्धिमान् था।
उसने सोचा-यदि इस प्रकार पंडित प्रतिदिन श्लोक
सुनायेंगे तो खजाना खाली हो जायेगा और राजा की
घोषणा रद्द करना असंभव है। गहन चिंतन के बाद मंत्री
ने एक उपाय ढूंढ निकाला।
प्रत्येक विद्वान् खड़ा होकर पहले राजा को आशीर्वाद
देता, फिर राजाज्ञा प्राप्त कर श्लोक पढ़ता। मंत्री प्रत्येक
विद्वान् के श्लोक को सुनकर कहता, ‘यह श्लोक नया
नहीं है, मैंने इसे अनेक बार सुना है।’ मंत्री की प्रतिभा
इतनी तेज थी वह प्रत्येक श्लोक को एक बार सुनकर
वैसा का वैसा याद कर लेता और उसे उसी शैली में
उसी प्रकार सुना देता। सारे विद्वान् निरुत्तर हो जाते।
वे अपना मुंह दिखाने योग्य भी नहीं रहते। पंडितों ने
अनेक प्रकार के अनेकानेक रागों में तथा विविध विधाओं
में बहुत परिश्रम करके नये-नये श्लोक बनाये, किंतु मंत्री
ने प्रत्येक बार उनकी आशाओं पर घुड़सवारी कर दिया।
सारे विद्वान् दीन-हीन, निराश हो गये। उनके मन में
मंत्री के प्रति भारी रोष व्याप्त हो गया। एक बार एक
विद्वान् बहुत सारे विद्वान् साथ लेकर आया। उसने राजा
को श्लोक में ही आशीर्वाद देते हुए कहा-

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स्वस्ति श्री भोजराज! त्रिभुवनविदितो धार्मिकस्ते पितामू।
मित्रां तेनदमाहृता नवमतिललिता रत्नाकोट्यो मदीया।।
ता में देहीति राजन्! सकलवधजनैः श्रायते तत्त्वतेन।
नो वा आननि केचित् ममकृतिरथा देहि चेत्तं ततो माम्।।
‘राजन् आपका कल्याण हो। आपके पिता बहुत
धार्मिक थे और जगत् विख्यात थे। एक बार आपके पिता
ने मेरे से नित्यानये करोड़ रत्न-मुद्राएं ली थीं। राजन्
आप वे मुद्राएं मुझे दें क्योंकि सारे विद्वान् इस सत्य को
जानते हैं। यदि कोई नहीं जानता है तो मेरी कृति नयी
है इसलिए आप मुझे एक लाख रुपये पुरस्कार में दें।’
सारे विद्वान् सारे सभासद खिलखिला उठे। मंत्री भी
एकदम चुप हो गया। विद्वान् एक लाख का पुरस्कार
जीत गया।

संकल्प के प्रति समर्पण

एक छोटा लड़का साहसी काम करने के लिए उद्यत
हुआ। वह महाराज शिवाजी की हत्या करने आया।
सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। उसके हाथ में शस्त्र था।
उसे शिवाजी के सम्मुख उपस्थित किया गया। शिवाजी
ने पूछा, ‘क्यों आये हो यहाँ? हाथ में तलवार क्यों ली
है?’ वह बालक साहस के साथ बोला, ‘शिवाजी को मारने
आया हूं।’

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शिवाजी ‘क्यों मारना चाहते हो शिवाजी को?’
बालक ‘मैंने एक व्यक्ति को वचन दे दिया था। उसी की
पूर्ति के लिए आया हूं।’
शिवाजी ‘अरे, तुम किसको वचन दे चुके हो?’
बालक ‘मैंने शिवाजी के शत्रु राजा तुमाराय को वचन दे
दिया था। मैं उसकी पूर्ति से बंध गया था। मैं मारने के
लिए आया हूं।’
शिवाजी उसकी स्पष्टवादिता और निर्भयवादिता से
बहुत प्रसन्न हुए। छोटी अवस्था और इतना पराक्रम,
साहस और स्पष्टवादिता। उन्होंने बच्चे के साहस को,
पराक्रम को पहचान लिया। वे बोले, ‘तुम्हें इस जघन्यतम
अपराध के लिए क्या दण्ड मिलना चाहिए?’

बालक ‘जो आपकी इच्छा हो वह दण्ड मुझे स्वीकार है।
इसका दण्ड है मृत्यु।’
शिवाजी ‘स्वीकार है! मैं आपकी पकड़ में आ गया। मैं विवश
हूं। पर एक बार आप मुझे मेरी मां से मिलने के लिए
जाने दें। मैं मां से मिलकर लौट आऊंगा, फिर आप मुझे
मौत के घाट उतार देना।’
शिवाजी ‘अरे, वापस कौन आयेगा? मौत के मुंह में जाने के
लिए कौन आयेगा? तुम मुझे बहका रहे हो।’
बालक ‘महाराज, विश्वास करें। मैं मां से मिलकर लौट
आऊंगा। मुझे मरने का भय नहीं है।’
लड़के को मुक्त कर दिया।
वह मां से मुलाकात कर ठीक समय पर आ गया।

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संन्यासी को सोने में गंध

गांव में एक संन्यासी आया। वह तेजस्वी और
शक्तिशाली था। राजा ने उसकी प्रशंसा सुनी। वह दर्शन
करने आया। उसे अपूर्व शांति की अनुभूति हुई। उसने
कहा, ‘महाराज! कुछ दिन के लिए आप मेरे महल में
चलें।’ संन्यासी ने कहा, ‘महलों में मुझे सोने की गंध
आती है। मैं वहां नहीं रह पाऊंगा।’ राजा बोला, ‘कैसी
बात करते हो? सोने की गंध कहां है? लोग सोने का
नाम लेते ही उस ओर दौड़ पड़ते हैं। आप उससे दूर
जाना चाहते हैं। मैं वहां रहता हूँ, मुझे आज तक गंध
नहीं आयी।’ संन्यासी ने कहा, ‘चलो मेरे साथ।’ संन्यासी
राजा को चमारों की बस्ती में ले गया। राजा को चमड़े
की दुर्गंध सताने लगी। उसने अपनी नाक कपड़े से ढक
ली। संन्यासी एक चमार के घर पर जा रुका। राजा
ने कहा, ‘महाराज! कहां ले आये आप? बड़ी दुर्गंध आ
रही है। मेरी जीभ सूंघ रही है। जल्दी चलें।’ संन्यासी
बोला, 'कैसी दुर्गंध! आप भी बड़ी विचित्र बात कर रहे
हैं। आप इस घर के मालिक से पूछें। घर का स्वामी
आया। संन्यासी ने पूछा, ‘अरे, तुम्हें यहां दुर्गंध नहीं
आती?’ घर के स्वामी ने कहा, ‘नहीं दुर्गंध है कहां? मुझे
यहां रहते पचास वर्ष हो गये। कभी दुर्गंध की अनुभूति
नहीं हुई।’ संन्यासी राजा को लेकर महल में आ गया।
वह राजा से बोला, 'महाराज! आपको वहां चमड़े की

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दुर्गंध आ रही थी। वहां रहने वालों को उसका अनुभव
ही नहीं हो रहा था। इसी प्रकार यहां आपके महलों में
मुझे सोने की गंध आती है, आपको इसका अनुभव ही
नहीं होता जो जिससे रच-पच जाता है, वह वैसा ही
हो जाता है।

चमत्कार

एक आदमी बीमार था। बहुत घबरा रहा था। एक
वैद्य आया। रोगी को देखा। उसकी घबराहट को देखा।
वैद्य बोला, ‘घबराओ मत। सात होते-होते तुम स्वस्थ
हो जाओगे, घूमने-फिरने लग जाओगे। तुम्हारी
घबराहट मिट जायेगी। मैं ऐसी दवा दूंगा कि रोग मिट
जायेगा।’ वैद्य बाहर गया। रात और नमक की पुड़िया
बांधी। रोगी को पुड़िया देते हुए कहा, 'यह बहुत कीमती
दवा है। दो पुड़िया लेते ही बीमारी शांत हो जायेगी।
रोगी को इतना विश्वास दिलाया कि स्वस्थ होने की बात
आत्मा तक पहुंच गयी। रोगी ने पुड़िया ली। दूसरी
पुड़िया लेते ही उसे स्वस्थता का अनुभव होने लगा और
संध्या से पहले ही वह चलकर वैद्य के घर चला गया।
न बीमार और न घबराहट। पुड़िया का चमत्कार नहीं
था, चमत्कार था बात का भाव तक पहुंच जाना।

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दर्द का भान

बर्नार्ड शॉ के जीवन की एक घटना है। वे बहुत
मजाक करने वाले व्यक्ति थे। एक बार उनके हृदय में
दर्द हो गया। डॉक्टर को बुलाया और कहा, ‘हार्ट में
दर्द हो गया है।’ डॉक्टर जानता था। वह बोला, ‘शॉ!
मुझे बहुत पीड़ा हो रही है। क्या करूँ?’ डॉक्टर ने ऐसा
आकार बताया कि शॉ घबरा गये। वे तत्काल उठे।
पानी लाये। पानी पिलाया, उपचार किया। डॉक्टर ठीक
हो गया। वह उठा और बोला, ‘शॉ! मुझे फीस दें।’ शॉ
ने कहा, ‘किस बात की फीस दूं?’ डॉक्टर ने कहा, ‘इलाज
तो मैंने तुम्हारा इलाज किया है। उसकी फीस चुकाओ।’
शॉ बोला, ‘इलाज तो मैंने तुम्हारा किया। उपचार कर
मैंने तुम्हें स्वस्थ बनाया।’ डॉक्टर ने कहा, ‘शॉ, मैंने यह
सारा नाटक आपके लिए ही तो रचा था। बर्नार्ड, आपका
दर्द कहां है?’ वास्तव में शॉ दर्द को भूल ही गये थे।
उन्हें आत्मविस्मृति हो गयी थी। दर्द का उन्हें भान ही
नहीं रहा।

जीवन्त चित्र

राजा ने चित्रकारों को आमंत्रित किया। देश-भर के
चित्रकार एकत्रित हुए। राजा ने कहा, 'राज्य-मुद्रा

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बनानी है। उसमें मांग देते हुए मुर्गी का चित्र होगा। ऐसा जीवन्त चित्र बनाओ जिससे मुर्गा की श्रेष्ठता सिद्ध हो सके। सर्वश्रेष्ठ चित्र पुरस्कृत किया जायेगा। चित्रकार बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा की सब शर्तों को स्वीकार कर लिया। कुछ दिन बाद वे चित्र बनाकर लाये और राजा के सामने प्रस्तुत किए। राजा ने देखा। उसे चित्र बहुत अच्छे लगे। उसने सोचा, ‘मैं कोई कलाकार तो हूँ नहीं। किस चित्र को प्राथमिकता दी जाये, इसका निर्णय कौन करे?’ राजा ने सोच-विचारकर एक बूढ़े चित्रकार को बुलाया। किसी समय वह राज्य का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार था, किन्तु अब बूढ़ा हो चला था। राजा ने कहा, ‘इन चित्रों में कौन प्रथम है, इसका निर्णय करो।’ चित्रकार सारे चित्रों को ले गया। दूसरे दिन आकर बोला, ‘महाराज! मुद्रा में देने लायक एक भी चित्र नहीं है। सब बेकार है।’ यह कैसे कहते हो? चित्र बहुत सुन्दर है।’ राजा ने आश्चर्य की मुद्रा में कहा। चित्रकार बोला, ‘सुन्दर तो है, किन्तु आपने कहा था कि जीवन्त चित्र होना चाहिए। इसमें जीवन्त चित्र एक भी नहीं है।’ राजा कठिनाई में पड़ गया। राज्य के सारे मूर्धन्य कलाकार आ गए। ‘उनका एक भी चित्र पसन्द नहीं आया तो फिर तुम बनाओ’ – राजा ने कहा। चित्रकार बोला, 'मैं बूढ़ा हो गया हूँ, कैसे बनाऊँ? फिर भी यदि आप चाहते हैं तो मैं चित्र बनाऊँगा। पर मुझे तीन वर्ष का समय

चाहिए।’ तीन वर्ष का समय?’ राजा ने विस्मय के साथ पूछा। चित्रकार ने कहा, ‘श्रेष्ठता साधन के बिना प्राप्त नहीं होती। तात्कालिकता कामचलाऊ हो सकती है, किन्तु वह श्रेष्ठता का संस्पर्श नहीं कर सकती।’
चित्रकार तीन वर्ष की अवधि लेकर वहाँ से चला गया। वह मास बीत गये। चित्रकार कभी राजा से मिला नहीं। राजा ने उसके कार्य की जानकारी लेने के लिए अपने विश्वस्त कर्मचारी को भेजा। वह चित्रकार के घर गया। वह घर में नहीं मिला। खोजते-खोजते वह जंगल में गया। उसने देखा, वह बाग रहा है। उसने पयासी मुर्गे हैं। बूढ़ा चित्रकार मुर्गों के बीच में बैठा है। राजा के कर्मचारी ने पूछा, ‘क्या चित्र बन गया?’ बूढ़ा बोला, ‘चित्र बना रहा हूँ।’
‘कब तक बनेगा?’
‘अभी ढाई वर्ष लगेंगे।’
‘ढाई वर्ष बीत गये।’ राजा ने फिर जांच करवाई। चित्रकार को बुलाकर कहा, ‘चित्र लाओ।’
‘चित्र अभी बना नहीं है।’
‘तीन वर्ष बीत गये, फिर चित्र क्यों नहीं बना? अब तक क्या किया?’
‘क्या किया, यह बताऊँ?’
‘मैं अवश्य जानना चाहूँगा।’
राजसभा में चारों ओर मुर्गे की आवाज होने लगी।

इधर-उधर मुर्गा दौड़ने लगा। सभासदों ने देखा, यह कैसा आदमी? यह तो मुर्गा है। वही भाषा, वही व्यवहार और वही आचरण। राजा ने कहा, ‘यह क्या कर रहे हो?’
‘महाराज! तीन वर्षों में मैंने क्या किया, यह बता रहा हूँ, मैं मुर्गा हो गया हूँ।’
‘मुझे तुम्हें मुर्गा नहीं बनाना है, मुझे मुर्गी का चित्र चाहिए।’
‘मुर्गी बने बिना मुर्गी का चित्र नहीं बन सकता।’
‘तो तुम मुर्गी बन गए? अब चित्र लाओ।’
‘चित्र बनाने में क्या कठिनाई हो आधा घंटे का काम है। तूलिका लाओ, रंग लाओ, कागज लाओ, अभी चित्र तैयार कर देता हूँ।’
सारी सामग्री लायी गयी और देखते-देखते चित्र तैयार हो गया।
राजा ने पूछा, ‘क्या यह जीवन्त चित्र है?’
‘महाराज! हाँ।’
‘इसकी कसौटी क्या है? ये जीवन्त क्यों नहीं थे और यह जीवन्त क्यों है?’
चित्रकार ने मुर्गा मंगाया। पहले के चित्रों को रखा और उसके सामने मुर्गे को छोड़ा। मुर्गा चित्रों के सामने गया और मुंह फेरकर लौट आया। सबके बाद अपना चित्र रखा। उसे देखते ही मुर्गा सक्रिय हो गया। लड़ने की मुद्रा में आ गया। उसने चित्र के मुर्गे पर आक्रमण

कर दिया। चित्रकार बोला-
‘महाराज! यह जीवन्त चित्र है। मुर्गा मुर्गी से लड़ रहा है।’
‘इतना जीवन्त चित्र! इतनी जल्दी कैसे बनाया तुमने?’ राजा ने पूछा।
चित्रकार ने कहा, ‘महाराज! मैंने तीन वर्ष का समय मुर्गा बनने में लगाया। अगर मैं मुर्गा नहीं बनता तो जीवन्त मुर्गा नहीं बना पाता।’

पुर्तगाल का स्वभाव

राजा जितशत्रु नगर के बाहर जा रहा था। मंत्री सुबुद्धि उसके साथ था। एक खाई आयी। उसमें जल भरा था। वह कूड़े-करकट से सड़ा हो रहा था। उसमें मृत पशुओं के कलेवर सड़ रहे थे। दूर तक दुर्गन्ध फूट रही थी। राजा ने कपड़ा निकाला और नाक को दबा लिया। ‘कितनी दुर्गन्ध आ रही है!’ राजा ने मंत्री की ओर मुड़कर कहा। मंत्री तत्परता थी। उसने कहा, ‘महाराज! यह पुर्तगालों का स्वभाव है।’ उसने राजा के भाव की तीव्रता को अपनी भावमयी से मंद कर दिया। बात वहीं समाप्त हो गयी। कुछ दिनों बाद मंत्री ने राजा को अपने घर भोजन के लिए निमंत्रित किया। भोजन के मध्य राजा ने पानी पीया, अत्यन्त निर्मल, अत्यन्त मधुर और अत्यन्त

सुगन्धित। राजा बोला, ‘मंत्री! यह पानी तुम कहाँ से लाये हो? इच्छा होती है कि एक गिलास और पीऊँ। मैं तुम्हें अभिनन्दन मानता हूँ, किन्तु तुम मुझे वैसा नहीं मानते। तुम इतना अच्छा पानी पीते हो, मुझे कभी नहीं पिलाते।’ मंत्री मुस्कराया और बोला, ‘महाराज! यह पानी उस खाई से लाया हूँ जहाँ आपने नाक-भी सिकोड़ी थी और कपड़े से नाक ढकी थी।’ राजा ने कहा, ‘यह नहीं हो सकता। यह पानी उस खाई का कैसे हो सकता है?’ मंत्री अपनी बात पर अटल रहा। राजा ने उसका प्रमाण चाहा। मंत्री ने उस खाई का पानी मंगवाया। राजा की देख-रेख में सारी प्रक्रिया चली और वह पानी वैसा ही निर्मल, मधुर और सुगन्धित हो गया जैसा राजा ने मंत्री के घर पीया था। केवल पानी ही क्या, हर वस्तु बदलती है।

मेरी सीमा

एक पक्षी कुएँ की मेड़ पर आकर बैठा। कुएँ में मेंढक था। मेंढक ने उस पक्षी को देखा और पूछा, ‘कहाँ से आया है?’ पक्षी ने उत्तर दिया, ‘मानसरोवर से।’ कितना बड़ा है तुम्हारा मानसरोवर?’ मेंढक का अगला प्रश्न था। ‘एक छलांग भरी-इतना बड़ा?’ ‘नहीं, और बड़ा।’ फिर कूदा- ‘क्या इतना बड़ा?’ ‘नहीं, और बहुत बड़ा।’ मेंढक बोला- 'झूठ बोलता है। मेरे घर से बड़ा तुम्हारा

मानसरोवर नहीं हो सकता।’ पक्षी ने सोचा- ‘जब मूर्ख से पाला पड़े तो भाग जाना ही अच्छा है।’ वह उड़ गया। ‘जो नीचे रहने वाला होता है, जिसने कुएं के बाहर जाकर इस दुनिया को नहीं देखा, जिसने अपनी सीमा को तोड़कर विराट् सत्य को नहीं देखा, वह अहंकारी बन जाता है और यह समझता है जो मेरी रेखा है वही सत्य है। उसके सिवाय दुनिया में कोई सत्य नहीं।’

तुम मान लो

एक नौकर था सेठानी के घर। एक बार कोई स्थिति आयी। रात का समय। काफी अंधेरा हो गया। सेठानी ने नौकर से कहा, ‘पी ले आओ बाजार से।’ नौकर ने कहा, ‘कैसे जाऊँ, डर लगता है, बाहर बहुत अंधेरा है।’ मुझे बहुत डर लगता है। मैं तो नहीं जा सकता।’ सेठानी ने कहा, ‘अरे, डर कुछ भी नहीं होता। तुम मान लो, डर कुछ भी नहीं होता इस दुनिया में, तुम्हें डर नहीं लगेगा।’ क्या करे बेचारा नौकर, विवश था। मालकिन का आदेश जो था। गया। दो-चार सीढ़ियां ही उतरा होगा कि अंधेरा आ गया, डर लगा और वापस दौड़ आया। मालकिन के पास आकर बोला, 'तुम कुछ भी कहो, मुझे

तो डर लगाता है, मैं तो नहीं जा सकता।’ मालकिन ने फिर समझाया। कहा, ‘तुम बहुत भोले हो। दुनिया में डर नाम की कोई चीज नहीं होती, ऐसा मान लो।’ बहुत दबाव दिया। आखिर नौकर था, फिर चला। पांच-दस कदम गया और फिर दौड़ आया। सेठानी ने फिर लंबा उपदेश दिया। उसने एक ही धुन पकड़ा दिया कि तुम मान लो, दुनिया में डर नाम की कोई चीज नहीं है। बेचारा बहुत परेशान था। नीचे गया और पांच-सात मिनट में वापस लौट आया। बेचैन भरा हुआ मालकिन के सामने रख दिया- ‘लो तुम्हारा घी।’ उसने देखा और कहा कि इतनी जल्दी क्यों ले आये? नौकर ने जवाब दिया, ‘इससे तुम्हें क्या मतलब! ले आया, ले आया- देख लो।’ डक्कन उठाकर देखा तो पीला-पीला रंग। थोड़ा सूघा तो बदबू आयी। शंका तो कड़वा। कि- ‘यह क्या ले आये?’ ‘कुछ भी नहीं, घी है।’ ‘यह घी नहीं है, यह तो मृत लगाना है।’ (वास्तव में वह नीचे खड़े एक गधे को मूत्र ही भरकर लाया था।) नौकर ने कहा, ‘तुम मान लो यह घी है।’ सेठानी ने कहा, ‘जब घी नहीं तो मैं कैसे मान लूं यह घी है!’ नौकर ने कहा, ‘मुझे जब डर लगाता है तो कैसे मान लूं कि डर नहीं है?’

आवरण हटा

एक राजकुमार को संगीत की शिक्षा देनी थी। वीणा-वादन और संगीत के लिए राजकुमार उदयन का नाम सर्वत्र काफी चमक रहा था। राजा ने कूट-प्रयोग से उदयन को उपलब्ध कर दिया। राजा राजकुमारी को संगीत सिखाना चाहता था और दोनों को सम्पर्क से बचाना भी चाहता था। इसलिए दोनों के बीच में यवनिका बांध दी। दोनों के मन में भी यवनिका बांधने की चेष्टा थी। उदयन से कहा गया, ‘राजकुमारी अंधी है, यह तुम्हारे सामने आने में सकुचाती है।’ अतः वह यवनिका के भीतर बैठेगी।’ राजकुमारी से कहा गया, ‘उदयन कोढ़ी है। वह तुम्हारे सामने बैठने में सकुचाता है।’ अतः वह यवनिका के बाहर बैठेगा।’ शिक्षा का क्रम चालू हुआ और कई दिनों तक चलता रहा। एक दिन उदयन संगीत का अभ्यास करा रहा था। राजकुमारी बार-बार दखलित हो रही थी। उदयन ने कई बार टोका, फिर भी राजकुमारी उसकी स्वरों को पकड़ नहीं सकी। उदयन कुछ क्रुद्ध हो गया। उसने आवेश में कहा, ‘जरा संभलकर चलो। कितनी बार बता दिया, फिर भी ध्यान नहीं देती हो। आखिर अंधी हो हो।’ राजकुमारी के मन पर चोट लगी। वह चीखना उठी। उसने जो आवेश में कहा, ‘कोढ़ी! जरा संभलकर बोलो!’ उदयन ने सोचा, 'कोढ़ी

कौन है? मैं तो कोढ़ी नहीं हूं। फिर राजकुमारी ने कोढ़ी कैसे कहा?’ राजकुमारी ने भी इसी भाषा में सोचा, ‘मैं तो अंधी नहीं हूं। फिर उदयन ने अंधी कैसे कहा?’ सचाई को जानने के लिए दोनों तरफ उठे। यवनिका हटाकर देखा, कोई अंधी नहीं है और कोई कोढ़ी नहीं है। बीच का आवरण यह धारणा बनाए हुए था कि यवनिका के इस पार अन्धापन और उस पार कोढ़। आवरण हटा और दोनों बातें हट गयी।

स्टोर खाली हो जाये

एक बार जयप्रकाश नारायण और उनके मित्र उत्तर प्रदेश की यात्रा पर जा रहे थे। कई स्थानों पर लोग बड़े हास्य और बातें कर रहे थे। थोड़ी देर बाद जापानी मित्र ने कहा- 'जे० पी०! तुम्हारा भारत तो बड़ा समृद्ध लगता है। जयप्रकाश ने कहा- ‘इतना व्यंग्य क्यों करते हो? यहां तो टूटी-फूटी झोपड़ियां हैं, फटे कपड़े और नंगे बदन वाले आदमी हैं। देखने से ही गरीब लगते हैं।’ जापानी मित्र ने कहा- 'देखो, ये कितने लोग खाली हाथ बैठे हैं। जापान में कोई भी निकम्मा नहीं मिलेगा। निकम्मापन समृद्ध देश में ही हो सकता है। एक ओर

गरीबी है, खाने को नहीं है, फिर भी खाली बैठे बातें करते हैं। जापान में जनरल स्टोर में चले जाइए। जो वस्तु पसन्द आए, उसको बता दीजिए। वह आपको दे देगा। वह चेक नहीं करेगा कि कितनी वस्तु आपने ली है और कितनी बची रहे है। भारत में यदि ऐसे न पूछे तो चार दिन में स्टोर खाली हो जाए।

चौकीदारी

राजा बहुत खर्च करने लगा। खजाने में से बहुत बांटने लगा। खर्चीची आया और बोला- 'महाराज! आपके पुरखों का इकट्ठा किया हुआ खजाना इस प्रकार आप खर्च करेंगे तो खाली हो जाएगा। यह आप कैसे करते हैं? राजा बोला- 'कैसे कह रहे हो? क्या मैं चौकीदार हूँ? रखवाली करना चौकीदार का काम है। मैं चौकीदारी के लिए पैदा नहीं हुआ हूं। रखवाली करना मेरा काम नहीं है। मेरा काम है- बढ़ाना। खजाना खाली होगा तो फिर बढ़ेगा, इसकी मुझे चिन्ता नहीं। यह चौकीदारी मुझसे नहीं हो सकती।

मित्रों से परामर्श

आंख का एक बीमार व्यक्ति वैद्य के पास गया। उसकी आंखों में मोतिया हो गया। वैद्य ने ‘कांच’ की। आंख ठीक हो गयी। उसे दीखने भी लग गया। एक दिन वैद्य आया। उससे कहा, ‘अब तुम्हारी आंखें ठीक हो गयी हैं। तुम चलते-फिरते हो। तुम्हें दीखने भी गया है। मेरी फीस चुकाओ।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘मैं ऐसे नहीं मानता। पहले मैं अपने मित्रों से परामर्श करूंगा। उनसे पूछूंगा कि मुझे दीखने लगा है या नहीं। यदि वे कहेंगे कि दीखने लग गया है तो मैं तुम्हारी फीस चुकाऊंगा, यदि वे कहेंगे कि दीखने नहीं लगा तो एक पैसा भी नहीं दूंगा।’

स्वधर्म : राजधर्म

सेनापति था जैन। राजा कहीं बाहर गया हुआ था और पीछे से शत्रु राजा ने आक्रमण कर दिया। अब सेनापति अपनी सेना लेकर युद्ध के मैदान में गया। कल से लड़ाई शुरू होने वाली है। संयोग ऐसा मिला कि क्षमापणी का दिन आ गया। सेनापति जैन था। बड़ा श्रावक था। धर्म का जानकार था। सायंकाल वह प्रतिक्रमण करने बैठ गया। प्रतिक्रमण शुरू किया। उसने प्रतिक्रमण पढ़ा- 'ईंदिया, तेइंदिया, तेइंदिया, आदि

एकेन्दिय की हिंसा की हो तो मिच्छामि दुक्कड़म् आदि-आदि। पास में सहायक सेनापति और सैनिक सुन रहे थे। उन्होंने सोचा कि जो कहता है कि चींटी-मकौड़ी को मारो तो हो मिच्छामि दुक्कड़म्, वह हमें क्या निहाल करेगा यहां? वे सब घबरा गये। वे रानी के पास पहुंचे। उन्होंने कहा, ‘महारानी! इस सेनापति के भरोसे कल हम पराजय का मुंह देखना पड़ेगा, क्योंकि यह सेनापति हिंसा से घबराता है।’ रानी ने सेनापति को बुलाया। बुलाकर पूछा ‘तुम जीवों को मारने से डरते हो तो शत्रुओं को कैसे मारोगे?’ सेनापति ने कहा, ‘मैं जैन धर्म को मानने वाला हूं। मैं महावीर का अनुयायी हूं। महावीर का यह आदेश है कि बिना मतलब एक चींटी को भी मत मारो, मत सताओ। अहिंसा का पालन करो, करुणा करो, अनुकम्पा करो- यह मेरा स्वधर्म है। किन्तु लड़ना मेरा राज-धर्म है। दोनों अपने-अपने स्थान पर हैं। कोई शत्रु मुझ पर आक्रमण करता है तो मैं अपनी सुरक्षा के लिए स्वतंत्र हूं। आप चिन्ता न करें। निश्चिन्त रहें। कल जो होगा, वह सामने आ जायेगा।’ युद्ध का मैदान बताया। कि एक जैन सेनापति कितने पराक्रम से लड़ सकता है। रानी को विश्वास था पहले से ही। सूर्योदय हुआ, लड़ाई शुरू हुई। सेनापति पूर्ण पराक्रम से लड़ा सेनापति का साहस देख योद्धाओं का शौर्य दुगुना हो गया। भयंकर युद्ध हुआ। शत्रु पराजित हो पहले ही दिन भाग खड़ा हुआ।

पसीना-सुखाओ

विद्यालयी स्कूल से आया। कड़ी धूप थी। कपड़े तर-बतर हो गये। घर पहुँचा और धूप में आकर खड़ा हो गया। माँ ने कहा, ‘बेटा! क्या कर रहे हो? पसीना सुखाओ, छाया में आ जाओ।’ वह बोला, ‘माँ! पसीना ही सुखा रहा हूँ।’ माँ ने कहा, ‘इतनी कड़ी धूप में पसीना कैसे सूखेगा?’ वह बोला, ‘माँ, जब कपड़ा गीला होता है, तुम धूप में सुखाती हो या नहीं? जब कपड़ा धूप में सूख सकता है तो पसीना क्यों नहीं सूखेगा?’

अर्द्ध पूर्णिमा

एक शिष्य भिक्षा के लिए गया। एक बहन ने पूछा, ‘महाराज! आज तिथी क्या है?’ शिष्य बोला था। उसने कहा, ‘आज पूर्णिमा है।’ बहन बोली, ‘महाराज! आज तो अमावस्या होनी चाहिए, पूर्णिमा कैसे?’ शिष्य बोला, ‘कुछ भी हो। आज पूनम ही है।’ वह स्थान पर आ गया। गुरु से बोला, ‘आज है तो अमावस्या, पर मैंने कह दिया आज पूर्णिमा है। अब मेरी लाज आपके हाथ में है।’ मैं भूखा न पड़ जाऊँ। आचार्य बोले, ‘ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए। अच्छा जाओ कह दो कि आज पूर्णिमा है और रात को आकाश में पूरा चांद दीखेगा।’ आचार्य ने

मन-बल से अमावस्या की घोर अंधेरी रात में भी चांद उगा दिया। यह शक्ति जागरण का परिणाम है।

तर्कबाज

कोल्लू का बैल चल रहा था। एक वकील आया। वह कोल्लू के स्वामी के पास बैठा। उसने देखा कि स्वामी चुपचाप बैठा है और कोल्लू का बैल स्वतः घूम रहा है। कुछ क्षणों बाद वह बोला, ‘बैल के गले में फंदा क्यों बांध रखा है?’
स्वामी बोला, ‘कही भाग न जाये, इसलिए।’
‘इसकी आँखों पर पट्टी क्यों बांधी है?’
‘इसे यह पता न चले कि मैं एक परिधि में घूम रहा हूँ, अन्यथा यह रुक जायेगा।’
‘इसके गले में घंटी क्यों है?’
‘घंटे की घंटी बजती है तो पता चल जाता है कि यह घूम रहा है। घंटी बंद होती है तो उसके रुकने का आभास हो जाता है।’
‘अच्छा किन्तु यह बैल खड़ा-खड़ा भी घंटी बजा सकता है और तुमको भ्रम में डाल सकता है।’
‘नहीं, बैल आदमी जितना तर्कबाज नहीं है।’ उसने तर्कशास्त्र नहीं पढ़ा है।

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पता ही नहीं लगता

राजा ने अपने गुरु से कहा, ‘गुरुदेव! एक दिन आपने कहा था कि देवता हजारों-लाखों करोड़ों वर्ष बीत जाते हैं।’ क्या वे देते-देते थक नहीं जाते? उनके लम्बे आयुष्य की बात बुद्धिमय नहीं होती।’
आचार्य बालयती थे। उन्हें वयोवृद्धि उपलब्ध थी। वे वीतरागलब्धि के धनी थे। इस लब्धि के योग से उनकी वाणी का निवास बहुत बढ़ गया था। वे बोले, ‘राजन्! मैं तुम्हारे प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करूँगा। पहले तुम कुछ समय के लिए प्रवचन सुनो।’ आचार्य ने प्रवचन प्रारम्भ किया। सारी सभा तन्मय होकर प्रवचन सुनने लगी। समय बीतता गया। किसी को पता नहीं चला। आचार्य की वाणी से मानो निवास झर रहा था। सभी उनके ध्यान में निमग्न थे। एक प्रहर काल बीता। आचार्य ने प्रवचन सम्पन्न किया। आचार्य ने पूछा, ‘राजन्! कितनी देर से प्रवचन सुन रहे हो?’ बहुत विलम्ब हो गया है।’ राजा बोला, ‘गुरुदेव! यह क्या? अभी दो क्षण पूर्व ही तो आपने प्रारम्भ किया था, विलम्ब कहाँ हुआ है?’ आपने प्रवचन को इतनी जल्दी कैसे सम्पन्न कर डाला?’ आचार्य बोले, 'राजन्! मैंने एक प्रहर तक प्रवचन दिया है, किन्तु उसने तुमको इतना रस आ गया कि तीन घंटे का काल दो क्षण जितना लगा। इसी प्रकार देवता

इतने आनन्द में रहते हैं कि उन्हें हजारों-लाखों वर्षों के बीतने का पता ही नहीं लगता।’ राजा को बात समझ में आ गयी।

शराब का नशा

आदमी शराब पीने मदिरालय में गया। शराब पीने के बाद नशे में चूर हो गया। लालटेन लेकर आया था। लालटेन लेकर चला। अंधेरी रात थी। रास्ता नहीं दिखायी दे रहा था। बोला, ‘देखो कैसा घोर कलिकाल आ रहा है कि लालटेन ने प्रकाश देना बंद कर दिया है।’ थोड़ा आगे चला। गड्ढा आया। गड्ढे में गिर गया। अंधेरे और नशे में चूर। लालटेन ने प्रकाश देना बंद कर दिया। गालियाँ दी। लड़खड़ाता हुआ घर पहुँचा। सो गया। सुबह उठा। कुल्ला कर रहा था तब मदिरालय का मेरा आया। उसने एक चिट्ठी हाथों में पकड़ा दी। उसमें लिखा था, ‘महाशय ! कल रात आप हमारे मदिरालय में शराब पीये आये थे। आप जाने लगे तो अपनी लालटेन छोड़ गए एवं हमारे तोते का पिंजड़ा ले गए। कृपया यह पिंजरा लौटा दीजिए। यह अपनी लालटेन सम्हाल ले।’
क्या तोते का पिंजड़ा भी प्रकाश करेगा? जो प्रकाश

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का साधन नहीं, वह प्रकाश कैसे करेगा? जो शुद्ध साधन नहीं, जो सचमुच धर्म नहीं वह कल्याण कैसे करेगा?

मतलब

मेरे पास एक मित्र आए और बोले, ‘महाराज! मेरा लड़का धर्म नहीं करता। आप जरा समझाओ।’ मैंने कहा, ‘आएगा तो समझाऊँगा।’ शाम को लड़का आया। मैंने पूछा, ‘धर्म को क्यों नहीं मानते हो? यह क्यों नहीं आते?’ उस लड़के ने कहा, ‘मैं एकान्त में बैठूंगा।’ पिता उठकर बाहर चला गया तब उस लड़के ने बताया कि मेरे माता-पिता आठ महाराज के जाते हैं, फिर भी दिन भर लड़ाई करते रहते हैं। अगर लड़ाई ही करनी है तो महाराज के आने की क्या आवश्यकता? जिस धर्म से मेरे माता-पिता ने कुछ नहीं पाया, कुछ नहीं सीखा, वैसे धर्म से मतलब क्या है?’

रुक्स चाइल्ड

रुक्स चाइल्ड एक अमीर अमेरिकन था। वह निरन्तर वातानुकूलित में रहता। मकान, कार्यालय, कार-सब वातानुकूलित, वातानुकूलन के अतिरिक्त कोई विकल्प

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नहीं था। स्थिति यह हो गयी कि वह बहुत नर्वस हो गया। नाड़ी-संस्थान बहुत कमजोर हो गयी और वह बेचैन रहने लगा। डॉक्टर से परामर्श किया। डॉक्टर ने कहा, ‘आप प्रतिदिन दो घंटा गर्म पानी के टब में बैठे रहें।’ रुक्स चाइल्ड ने वैसा ही किया। दो-चार दिन बीते। उसे यह विधि अच्छी लगी। उसने सोचा- ‘कितनी मूर्खतापूर्ण बात है। मैं पूरे दिन वातानुकूलित स्थिति में रहता हूँ और फिर बेचैनी मिटाने के लिए दो घंटा गर्म पानी के टब में बैठा रहता हूँ। इससे अच्छा तो यह है कि बेचैनी पैदा करने वाली वातानुकूलित स्थिति को ही छोड़ दूँ।’ उसने अपना क्रम बदला। धीरे-धीरे प्रकृति में आ गया। स्थिति बदल गयी। अब उसके बेचैनी नहीं रही।

मैं क्या बताऊँ

जुप बहुत विख्यात मनोवैज्ञानिक हुए हैं। एक बार वे बीमार हो गये। डॉक्टर के पास गये। डॉक्टर ने कहा- ‘लेट आओ।’ जुंग लेट गये। डॉक्टर ने कहा- ‘अब तुम अपने भीतर देखने का प्रयत्न करो। और अधिक गहराई में देखो। उस समय जो विकल्प उत्पन्न हो, वे मुझे कहते रहो।’ जुंग ने वैसा ही किया। ज्यों-ज्यों भीतर की गहराई में उतरते गये, विकल्प गायब होते गये। विकल्पों

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का उत्पन्न होना बंद हो गया। जुंग ने कहा, ‘डाक्टर! अन्दर देखने पर कोई विक्सता आता ही नहीं। मैं क्या बताऊँ?’

विकल या विचार तब उत्पन्न होते हैं, जब हम बाहर ही बाहर देखते हैं।

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लाद दिया

पिता ने अपनी लड़की की शादी की। लड़की बड़ी खुंखार और तेज-तर्रार थी। बड़ा भार अनुभव हो रहा था। शादी करते ही पिता से रहा नहीं गया। बोला- चलो, आज एक बहुत बड़े भार से मुक्त हुआ। दामाद पास में ही खड़ा था। उसने सुना और कहा- आप तो भार से मुक्त हुए लेकिन वह भार आपने मुझ पर लाद दिया।

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दाढ़ी में आग

एक बादशाह था। उसको एक नौकर की जरूरत थी। परीक्षण के लिए अनेक लोगों को बुलाया। आदमी रखना था जो परीक्षण जरूरी था। क्योंकि आदमी बहुत काम देने वाला होता है तो आदमी बहुत खतरनाक भी

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होता है। कोई खतरनाक आदमी न आ जाए इसके लिए परीक्षण जरूरी थे। उपस्थित लोगों में से बादशाह ने तीनों व्यक्तियों को सामने खड़ा कर कर कहा- बताओ, इत्तफाक से मेरी दाढ़ी में और तुम्हारी दाढ़ी में एक साथ आग लग जाए तो तुम क्या करोगे? पहला तत्काल बोल उठा- हुजूर! आपकी दाढ़ी की आग तत्काल बुझा दूंगा। अपनी दाढ़ी की आग की चिंता ही नहीं करूंगा। दूसरा बोला- ‘जहांपनाह! पहले मैं अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा और फिर आपकी दाढ़ी की चिंता करूंगा।’ तीसरा बोला- हुजूर! एक हाथ से आपकी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा और दूसरे हाथ से अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा।

बादशाह ने तीनों व्यक्तियों के उत्तर सुनकर कहा- 'पहला आदमी अव्यावहारिक है। दुनिया में ऐसा कोई भी आदमी नहीं होता जो कठिन समय आने पर अपनी बात न सोचकर दूसरे की बात सोचता हो। अपनी हित-चिंता न कर दूसरे की हित-चिंता करता हो। वह व्यक्ति सर्वथा अव्यावहारिक है। जो व्यक्ति अव्यावहारिक बात कहता है, वह हमेशा धोखा देता है। अज्ञानी व्यक्ति सदा अव्यावहारिक बात करता है। वह ऐसी बात करता है कि सामने वाले को लुभा लेती है, किन्तु उसे धोखा देता है।

दूसरा आदमी स्वार्थी है। स्वार्थी आदमी किसी का भला नहीं करता। वह खुदगर्ज होता है। वह सदा अपनी

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ही बात सोचता है, अपना ही भला करता है। दूसरे की बात को वह सोच ही नहीं सकता। वह आदमी भी खतरनाक होता है।

‘तीसरा आदमी व्यावहारिक है। वह व्यवहार की बात करता है, सच्चाई की बात करता है। वह न अव्यावहारिक है न स्वार्थी। वह व्यवहार के धरातल पर जीता है।’

बादशाह ने उस तीसरे व्यक्ति को नौकरी दे दी। दोनों को विदा कर दिया।

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जरूरत

पिता ने कहा- बेटा! बाजार में जाओ और भूसा ले आओ। वह बोला- ‘पिताजी! बाजार में जाने की क्या जरूरत है? स्कूल में मास्टराणी कह रहे थे कि तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है। पिताजी! आप उसी को काम में ले लो। बाहर से क्यों मंगा रहे हैं?’

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जज : अपराधी

जज ने अपराधी से कहा, 'तुम न्यायालय में खड़े हो। सच-सच कहना, झूठ मत कहना। अच्छा बताओ, झूठ बोलने से कहा जाओगे और सच बोलने से कहा

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जाओगे?’

‘जज साहब! जानता हूं। झूठ बोलने से नरक में जाऊंगा और सच बोलने से जेल में जाऊंगा।’

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कोरा-कागज

चित्रकारिता की परीक्षा हो रही थी। दस-दस, बारह-बारह वर्ष के बच्चे परीक्षार्थी थे। उनको तीन चित्र बनाने थे- एक चूहे का, दूसरा बिल्ली का और तीसरा कुत्ते का। विद्यार्थी ने तन्मयता के साथ चित्र बनाये। उनमें रंग भरे। परीक्षा का समय समाप्त हुआ। चित्रकार अध्यापक एक-एक विद्यार्थी के चित्रों का परीक्षण कर उनको नम्बर दे रहा था। एक विद्यार्थी ने कोरा कागज अध्यापक के हाथ में दे दिया। अध्यापक ने चिढ़ते हुए कहा- 'यह क्या? अभी तक एक भी चित्र नहीं बना पाए?

विद्यार्थी बोला- ‘मैंने तीनों चित्र बनाये हैं।’

‘कहाँ हैं चित्र? पन्ना खाली पड़ा है’- अध्यापक ने कहा।

विद्यार्थी बोला- ‘चूहा बनाया था किन्तु उसे बिल्ली खा गई।’

‘अरे, बिल्ली कहाँ है?’

‘कुत्ता बिल्ली को खा गया।’

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‘अच्छा, तो बताओ, कुत्ता कहाँ गया?’

‘एक बिल्ली से उसका पेट नहीं भरा तो दूसरी बिल्ली की खोज में चला गया।’ तीनों चले गये। मेरा कागज कोरा ही रह गया।

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राजा और संन्यासी

एक राजा था। उसने बहुत बड़ा महल बनवाया। वह भव्य, रमणीय और सुविधाजनक था। सब लोग आते, देखते और प्रशंसा करते। राजा उस प्रशंसा से तृप्त नहीं हुआ। प्रशंसा का मूल्य है किन्तु उससे भी अधिक मूल्य इस बात का है कि प्रशंसक कौन है? साधारण व्यक्ति की प्रशंसा का उतना मूल्य नहीं होता, जितना कि उस व्यक्ति का होता है, जो वस्तुतः प्रशंसा करने में कृपण होता है या जिसकी प्रशंसा सहज निकलती नहीं। उस नगर में एक तत्वज्ञानी मनुष्य रहता था। राजा ने सोचा, ‘जब तक वह प्रशंसा नहीं करेगा तब तक दूसरों की प्रशंसा का कोई मूल्य नहीं होगा।’ राजा ने उसे निमंत्रित किया। वह आ गया। राजा ने कहा, ‘देखो, कितना सुन्दर प्रासाद है। कितना भव्य! कितना सुविधाजनक! क्या आप इसमें कोई कमी देखते हैं?’ वह मुस्कराया। उसने धीमे स्वर में कहा, 'इस दुनिया में ऐसी कोई वस्तु नहीं होती, जिसमें कोई कमी न हो। कुछ भी पूर्ण हो नहीं सकता।

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हमारी अपूर्णता की दुनिया में कुछ भी पूर्ण नहीं होता। आप मुझे फिर क्यों पूछते हो?’ राजा ने आग्रह किया। तब तत्वज्ञानी ने कहा, ‘यदि आप जानना ही चाहते हैं तो मैं बताऊंगा। मुझे इसमें दो कमियां दिखाई देती हैं। एक कमी तो यह है कि एक दिन यह प्रासाद नष्ट हो जाएगा और दूसरी कमी यह कि इसको बनाने वाला भी नष्ट हो जाएगा।’

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यमराज

एक बूढ़ा आदमी जा रहा था। उसके सिर पर एक गट्ठर था। बोझ अधिक था, बूढ़ा परेशान था, वह थक गया। उसने सोचा, ‘देखो, मौत भी नहीं आती। यमराज मुझे भूल ही गया है। कितना अच्छा हो, यदि अभी मौत आकर मुझे उठा ले।’ यमराज आकर मुझे ले जाए।’ योग ऐसा मिला कि यम स्वयं आ गया। इधर बूढ़े का एक सहायक भी आ पहुंचा। उसने आते ही गट्ठर उठाकर अपने सिर पर रख लिया। यम ने पूछा, ‘बोलो, मुझे क्यों याद किया?’ अब बूढ़े का विचार बदल गया था। वह हल्का हो गया था। कष्ट में जो विचार था वह जैसे ही आराम मिला, सुख मिला, बदल गया। यम ने कहा, ‘जल्दी बताओ, तुमने मुझे क्यों याद किया?’ बूढ़े ने कहा, 'क्षमा करें, मैं गट्ठर के भार से दबा जा रहा था।

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घृणा और प्रेम

सन्त राबिया के घर एक फ़कीर आया। उसने मेज के पास पड़ी पुस्तक को देखा। उसके पन्ने उलटने शुरू किये। एक पन्ने में लिखा था- ‘शैतान से नफ़रत करो।’ राबिया ने उसे काट दिया। फ़कीर बोला- ‘यह क्या? इस पवित्र पुस्तक का वाक्य किसने काटा?’ सन्त राबिया ने कहा, ‘यह मैंने काटा है।’ फ़कीर ने पूछा, ‘क्यों?’ राबिया ने कहा, ‘अच्छा नहीं लगा।’
‘यह कैसे हो सकता है कि पवित्र पुस्तक की बात अच्छी न लगे? क्या यह सही नहीं है?’ फ़कीर ने पूछा। सन्त राबिया ने कहा, ‘एक दिन मुझे भी सही लगता था, किन्तु आज लगता है कि सही नहीं है।’
‘वह कैसे?’ फ़कीर ने पूछा।
सन्त राबिया ने कहा, ‘जब तक मेरा प्रेम जागृत नहीं था, मेरे प्रेम की आँख खुली नहीं थी, मुझे भी लगता था कि शैतान से नफ़रत करो, प्यार नहीं, यह वाक्य बहुत सही है। किन्तु अब मैं क्या करूँ? मेरे प्रेम की आँख खुल गई है। अब घृणा करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है। मैं घृणा कर ही नहीं सकती। प्रेम की आँख यह भेद करना नहीं जानती कि इसके साथ प्रेम करो और इसके साथ घृणा।’

देखादेखी

संस्कृत का बहुत बड़ा कवि माघ एक बार स्नान करने के लिए नदी पर गया। लोटा था पास में। सोचा- कल फिर आना है। चलो, इसे कहीं रेत के टीले में गाड़ दें, कल काम आ जाएगा। ऐसा किया। किसी ने देख लिया। लोगों ने सोचा, इतना बड़ा कवि है। लोटे को गाड़ रहा है, अवश्य कोई अर्थ है। दूसरे लोग जो नदी पर आये हुए थे, उन्होंने माघ का अनुकरण किया और स्थान-स्थान पर अपने लोटे नदी में गाड़ दिये। दूसरे दिन माघ आया। उसने अपने लोटे का स्थान ढूँढ़ना चाहा। किन्तु वह उसे ढूँढ़ नहीं सका, क्योंकि पचासों स्थान एक-से बन गये थे। यह हताश होकर बोला-
गतानुगतिको लोक, न लोकः परमार्थिकः।
गंगया बालुकामध्यै, गते तत्र संभ्रमम्।।
‘लोग गतानुगतिक होते हैं। पीछे चलने वाले होते हैं। इनके अनुकरण में मेरा लोटा और गंवा दिया।’

तुम मूर्ख हो

अनोखी कथाएँ

सुगन्धित । राजा बोला, मंत्री! यह पानी तुम कहां से लाते हो? इच्छा होती है कि एक गिलास और पीऊं। मैं तुम्हें अभिन्न मानता हूँ, किन्तु तुम मुझे वैसा नहीं मानते। तुम इतना अच्छा पानी पीते हो, मुझे कभी नहीं पिलाते ।’ मंत्री मुसकराया और बोला, ‘महाराज! यह पानी उस खाई से लाता हूँ जहां आपने नाक-भौं सिकोड़ी थीं और कपड़े से नाक ढंकी थी।’ राजा ने कहा, ‘यह नहीं हो सकता। यह पानी उसी खाई का कैसे हो सकता है?’ मंत्री अपनी बात पर अटल रहा। राजा ने उसका प्रमाण चाहा। मंत्री ने उस खाई का पानी मंगवाया। राजा की देख-रेख में सारी प्रक्रिया चली और वह पानी वैसा ही निर्मल, मधुर और सुगन्धित हो गया जैसा राजा ने मंत्री के घर पिया था। केवल पानी ही क्या, हर वस्तु बदलती है। -0-

मेरी सीमा

एक पक्षी कुएं की मेड़ पर आकर बैठा। कुएं में मेंढक था। मेंढक ने उस पक्षी को देखा और पूछा, कहां से आया है?’ पक्षी ने उत्तर दिया, ‘मानसरोवर से।’ कितना बड़ा है तुम्हारा मानसरोवर?’ मेंढक का अगला प्रश्न था। एक छलांग भरी- ‘इतना बड़ा?’ ‘नहीं, और बड़ा।’ फिर कूदा- ‘क्या इतना बड़ा?’ ‘नहीं, और बहुत बड़ा ।’ मेंढक बोला- 'झूठ बोलता है। मेरे घर से बड़ा तुम्हारा अनोखी कथाएँ

तुम मान लो

अनोखी कथाएँ

आवरण हटा

एक राजकुमारी को संगीत की शिक्षा देनी थी। वीणा-वादन और संगीत के लिए राजकुमार उदयन का नाम सर्य की भांति चमक रहा था। राजा ने कूट-प्रयोग से उदयन को उपलब्ध कर दिया। राजा राजकुमारी को संगीत सिखाना चाहता था और दोनों को सम्पर्क से बचाना भी चाहता था। इसलिए दोनों के बीच में यवनिका बांध दी। दोनों के मनों में भी यवनिका बांधने की चेष्टा थी। उदयन से कहा गया, ‘राजकुमारी अन्धी है, वह तुम्हारे सामने आने में सकुचाती है। अतः वह यवनिका के भीतर बैठेगी।’ राजकुमारी से कहा गया, ‘उदयन कोढ़ी है। वह तुम्हारे सामने बैठने में सकुचाता है। अतः वह यवनिका के बाहर बैठेगा।’ शिक्षा का क्रम चालू हुआ और कई दिनों तक चलता रहा। एक दिन उदयन संगीत का अभ्यास करा रहा था। राजकुमारी बार-बार स्खलित हो रही थी। उदयन ने कई बार टोका, फिर भी

राजकुमारी उसके स्वरों को पकड़ नहीं सकी। उदयन कुछ क्रुद्ध हो गया। उसने आवेश में कहा, ‘जरा संभलकर चलो। कितनी बार बता दिया, फिर भी ध्यान नहीं देती हो। आखिर अंधी जो हो।’ राजकुमारी के मन पर चोट लगी। वह बौखला उठी। उसने जो आवेश में कहा, ‘कोढ़ी! जरा संभलकर बोलो!’ उदयन ने सोचा, 'कोढ़ी अनोखी कथाएँ

स्टोर खाली हो जाये

चौकीदारी

राजा बहुत खर्च करने लगा। खजाने में से बहुत बांटने लगा। खजांची आया और बोला - महाराज!

अनोखी कथाएँ

मित्रो से परामर्श

आंख का एक बीमार व्यक्ति वैद्य के पास गया।

उसकी आंखों में मोतिया हो गया। वैद्य ने ‘कारी’ की। आंख ठीक हो गयी। उसे दीखने भी लग गया। एक दिन वैद्य आया। उससे कहा, ‘अब तुम्हारी आंखें ठीक हो गयी हैं। तुम चलते-फिरते हो। तुम्हें दीखने भी लगा है। मेरी फीस चुकाओ।’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘मैं ऐसे नहीं मानता। पहले मैं अपने मित्रों से परामर्श करूंगा। उनसे पूछूंगा कि मुझे दीखने लगा है या नहीं। यदि वे कहेंगे कि दीखने लग गया है तो मैं तुम्हारी फीस चुकाऊंगा, यदि वे कहेंगे कि दीखने नहीं लगा तो एक पैसा भी नहीं दूंगा।’ स्वधर्म : राजधर्म

सेनापति था जैन। राजा कहीं बाहर गया हुआ था

प्रतिक्रमण करने बैठ गया। प्रतिक्रमण शुरू किया। उसने प्रतिक्रमण पढ़ा-एइिदिया, वेइंदिया, तेइंदिया, आदि अनोखी कथाएँ

एकेन्द्रिय की हिंसा की हो तो मिच्छामि दुक्कड़म आदि-आदि। पास में सहायक सेनापति और सैनिक सुन रहे थे। उन्होंने सोचा कि जो कहता है कि चींटी-मकोड़ों को मारा हो तो मिच्छामि दुक्कड़म, वह हमें क्या निहाल करेगा यहां? वे सब घबरा गये। वे रानी के पास पहुंचे। उन्होंने कहा, ‘महारानी! इस सेनापति के भरोसे कल हमे पराजय का मुह देखना पड़ेगा, क्योंकि वह सेनापति हिंसा से घबराता है।’ रानी ने सेनापति को बुलाया। बुलाकर पूछा’ ‘तुम जीवों को मारने से डरते हो तो शत्रुओं को कैसे मारोगे?’ सेनापति ने कहा, 'मैं जैन धर्म को मानने वाला हूं। मैं महावीर का अनुयायी हूं। महावीर का यह आदेश है कि बिना मतलब एक चींटी को भी मत मारो, मत सताओ। अहिंसा का पालन करो, करुणा करो,

अनुकम्पा करो- यह मेरा स्वधर्म है। किन्तु लड़ना मेरा राज्य-धर्म है। दोनों अपने-अपने स्थान पर हैं। कोई शत्रु मुझ पर आक्रमण करता है तो मैं अपनी सुरक्षा के लिए स्वतंत्र हूं। आप चिन्ता न करें। निश्चिन्त रहें। कल जो होगा, वह सामने आ जायेगा। युद्ध का मैदान बतायेगा कि एक जैन सेनापति कितने पराक्रम से लड़ सकता है।’ रानी को विश्वास था पहले से ही। सूर्योदय हुआ, लड़ाई शुरू हुई। सेनापति पूर्ण पराक्रम से लड़ा सेनापति का साहस देख योद्धाओं का शौर्य दुगुना हो गया। भयंकर युद्ध हुआ। शत्रु पराजित हो पहले ही दिन भाग खड़ा हुआ। अनोखी कथाएँ

पसीना सुखाओं

विद्यार्थी स्कूल से आया। कड़ी धूप थी। कपडे तर-बतर हो गये। घर पहुंचा और धूप में आकर खड़ा हो गया। मां ने कहा, ‘बेटा! क्या कर रहे हो? पसीना सुखाओ, छाया में आ जाओ।’ वह बोला, ‘मां! पसीना ही सुखा रहा हूं।’ मां ने कहा, ‘इतनी कड़ी धूप में पसीना कैसे सूखेगा?’ वह बोला, ‘मां, जब कपड़ा गीला होता है, तुम धूप में सुखाती हो या नहीं? जब कपड़ा धूप में सूख सकता है तो पसीना क्यों नहीं सूखेगा?’ -0-

आज पूर्णिमा

एक शिष्य भिक्षा के लिए गया। एक बहन ने पूछा, ‘महाराज! आज तिथी क्या है?’ शिष्य भोला था। उसने कहा, ‘आज पूर्णिमा है।’ बहन बोली, ‘महाराज! आज तो अमावस्या होनी चाहिए, पूर्णिमा कैसे?’ शिष्य बोला, ‘कुछ भी हो। आज पूनम ही है।’ वह स्थान पर आया। गुरु से बोला, ‘आज है तो अमावस्या, पर मैंने कह दिया आज पूर्णिमा है। अब मेरी लाज आपके हाथ में है। मैं झूठा न पड़ जाऊं।’ आचार्य बोले, ‘ऐसी गलती नहीं करनी चाहिए। अच्छा जाओ कह दो कि आज पूर्णिमा है और रात को आकाश में पूरा चांद दीखेगा।’ आचार्य ने अनोखी कथाएँ

मंत्र-बल से अमावस्या की घोर अंधेरी रात में भी चांद उगा दिया। वह शक्ति जागरण का परिणाम है।

तर्कबाज

कोल्हू का बैल चल रहा था। एक वकील आया।

वह कोल्हू के स्वामी के पास बैठा। उसने देखा कि स्वामी चुपचाप बैठा है और कोल्हू का बैल स्वतः घूम रहा है। कुछ क्षणों बाद वह बोला, ‘बैल के गले में फंदा क्यों बांध रखा है?’

स्वामी बोला, ‘कहीं भाग न जाये, इसलिए ।’

‘इसकी आंखों पर पट्टी क्यों बांधी है?’

‘इसे यह पता न चले कि मैं एक परिधि में घूम रहा हूँ, अन्यथा यह रुक जायेगा।’

‘इसके गले में घंटी क्यों है?’

‘गले की घंटी बजती है तो पता चल जाता है कि यह घूम रहा है। घंटी बंद होती है तो उसके रुकने का आभास हो जाता है।’

अनोखी कथाएँ

पता ही नहीं लगता

आचार्य बाग्वली थे। उन्हें वचोलब्धि उपलब्ध थी। वे क्षीरास्तवलब्धि के धनी थे। इस लब्धि के योग से उनकी वाणी का मिठास बहुत बढ़ गया था। वे बोले, ‘राजन् ! मैं तुम्हारे प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करूंगा। पहले तुम कुछ समय के लिए प्रवचन सुनो।’ आचार्य ने प्रवचन प्रारम्भ किया। सारी सभा तन्मय होकर प्रवचन सुनने लगी। समय बीतता गया। किसी को पता नहीं चला। आचार्य की वाणी से मानो मिठास झर रहा था। सभी उसके पान में निमग्न थे। एक प्रहर काल बीता। आचार्य ने प्रवचन समपन्न किया। आचार्य ने पूछा, ‘राजन्! कितनी देर से प्रवचन सुन रहे हो? बहुत विलम्ब हो गया है।’ राजा बोला, 'गुरुदेव ! यह क्या? अभी दो क्षण पूर्व ही तो अपने प्रारम्भ किया था, बिलम्ब कहां हुआ है? आपने प्रवचन को इतनी जल्दी कैसे सम्पन्न कर डाला? आचार्य बोले, 'राजन्! मैंने एक प्रहर तक प्रवचन दिया है, किन्तु उसमें तुमको इतना रस आ गया कि तीन घंटे का काल दो क्षण जितना लगा। इसी प्रकार देवता अनोखी कथाएँ

शराब का नशा

मदिरालय में शराब पीने आये थे। आप जाने लगे तो अपनी लालटेन छोड़ गए एवं हमारे तोते का पिंजड़ा ले गये। कृपया वह पिंजरा लौटा दीजिए। यह अपनी लालटेन सम्हाल लें।’

मतलब

मेरे पास एक मित्र आए और बोले, ‘महाराज! मेरा लड़का धर्म नहीं करता। आप जरा समझाइए।’ मैंने कहा, आएगा तो समझाऊंगा।’ शाम को लड़का आया। मैंने पूछा, ‘धर्म को क्यों नहीं मानते हो? यहां क्यों नहीं आते?’ उस लड़के ने कहा, ‘मैं एकान्त में बताऊंगा।’ पिता उठकर बाहर चला गया तब उस लड़के ने बताया कि मेरे माता-पिता आठ बार महाराज के जाते हैं, फिर भी दिन भर लड़ाई करते रहते हैं। अगर लड़ाई ही करनी हैं तो महाराज के आने की क्या आवश्यकता? जिस धर्म से मेरे माता-पिता ने कुछ नहीं पाया, कुछ नहीं सीखा, वैसे धर्म से मतलब क्या है?

रक्स चाइल्ड

रक्स चाइल्ड एक अमीर अमेरिकन था। वह निरन्तर वातानुकुलित में रहता। मकान, कार्यालय, कार- सब वातानुकूलित, वातानुकूलन के अतिरिक्त कोई विकल्प अनोखी कथाएँ

नहीं था। स्थिति यह हो गयी कि वह बहुत नर्वस हो गया। नाड़ी-संस्थान बहुत कमजोर हो गया और वह वेचैन रहने लगा। डॉक्टर से परामर्श किया। डॉक्टर ने कहा, ‘आप प्रतिदिन दो घंटा गर्म पानी के टब में बैठे रहें।’ रक्स चाइल्ड ने वैसा ही किया। दो-चार दिन बीते। उसे यह विधि अच्छी लगी। उसने सोचा- ‘कितनी मूर्खतापूर्ण बात है। मैं पूरे दिन वातानुकूलित स्थिति में रहता हूँ और फिर वेचैनी मिटाने के लिए दो घंटा गर्म पानी के टब में बैठा रहता हूं। इससे अच्छा तो यह है कि बेचैनी पैदा करने वाली वातानुकूलित स्थिति को ही छोड़ दूं।’ उसने अपना क्रम बदला। धीरे-धीरे प्रकृति में आ गया। स्थिति बदल गयी। अब उसके बेचैनी नहीं रही।

मैं क्या बताऊं

जुंग बहुत विख्यात मनोचिकित्सक हुए हैं। एक बार वे बीमार हो गये। डॉक्टर के पास गये। डॉक्टर ने कहा- ‘लेट आजो।’ जुंग लेट गये। डॉक्टर ने कहा- ‘अब तुम अपने भीतर देखने का प्रयत्न करो। और अधिक गहराई में देखो। उस समय जो विकल्प उत्पन्न हों, वे मुझे कहते रहो।’ जुंग ने वैसा ही किया। ज्यों-ज्यों भीतर की गहराई में उतरते गये, विकल्प गायब होते गये। विकल्पों अनोखी कथाएँ

का उत्पन्न होना बंद हो गया। जुंग ने कहा, ‘डाक्टर! अन्दर देखने पर कोई विकल्प आता ही नहीं। मैं क्या बताऊं?’

विकल्प या विचार तब उत्पन्न होते हैं, जब हम बाहर ही बाहर देखते हैं।

लाद दिया

पिता ने अपनी लड़की की शादी की। लड़की बड़ी खूंखार और तेज-तर्रार थी। बड़ा भार अनुभव हो रहा था। शादी करते ही पिता से रहा नहीं गया। बोला- चलो, आज एक बहुत बड़े भार से मुक्त हुआ। दामाद पास में ही खड़ा था। उसने सुना और कहा- आप तो भार से मुक्त हुए लेकिन वह भार आपने मुझ पर लाद दिया।

दाढ़ी में आग

एक बादशाह था। उसको एक नौकर की जरूरत

होता है। कोई खतरनाक आदमी न आ जाए इसके लिए परीक्षा जरूरी थी। उपस्थित लोगों में से बादशाह ने तीनों व्यक्तियों को सामने खड़ा कर कहा- बताओ, इत्तफाक से मेरी दाढ़ी में और तुम्हारी दाढ़ी में एक साथ आग लग जाए तो तुम क्या करोगे? पहला तत्काल बोल उठा- ‘हूजूर! आपकी दाढ़ी की आग तत्काल बुझा दूंगा। अपनी दाढ़ी की आग की चिंता ही नहीं करूंगा।’ दूसरा बोला- ‘जहांपनाह! पहले मैं अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा और फिर आपकी दाढ़ी की चिन्ता करूंगा।’ तीसरा बोला- ‘हुजूर! एक हाथ से आपकी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा और दूसरे हाथ से अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा।’ बादशाह ने तीनों व्यक्तियों के उत्तर सुनकर कहा- 'पहला आदमी अव्यावहारिक है। दुनिया में ऐसा कोई भी आदमी नहीं होता जो कठिन समय आने पर अपनी बात न सोचकर दूसरे की बात सोचता हो। अपनी हित-चिन्ता न कर दूसरे की हित-चिन्ता करता हो। वह व्यक्ति सर्वथा अव्यावहारिक है। जो व्यक्ति अव्यावहारिक बात कहता है, वह हमेशा धोखा देता है। अज्ञानी व्यक्ति सदा अव्यावहारिक बात करता है। वह ऐसी बात करता है कि सामने वाले को लुभा लेता है, किन्तु उसे धोखा देता है।

खतरनाक होता है।

‘तीसरा आदमी व्यावहारिक है। वह व्यवहार की बात करता है, सचाई की बात करता है। वह न अव्यावहारिक है और न स्वार्थी। वह व्यवहार के धरातल पर जीता है।’ बादशाह ने उस तीसरे व्यक्ति को नौकरी दे दी। दोनों को विदा कर दिया।

जरूरत

पिता ने कहा- बेटा! बाजार में जाओ और भूसा ले आओ। वह बोला- पिताजी! बाजार में जाने की क्या जरूतर है? स्कूल में मास्टरजी कह रहे थे कि तुम्हारे दिमाग में भूसा भरा है। पिताजी! आप उसी को काम में ले लों। बाहर से क्यों मंगा रहे हैं? -0-

जज : अपराधी

जाओगे?’

कोरा कागज

‘अरे, बिल्ली कहां है?’

‘कुत्ता बिल्ली को खा गया।’

अनोखी कथाएँ

‘अच्छा, तो बताओ, कुत्ता कहां गया?’

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राजा और संन्यासी

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यमराज

एक बूढ़ा आदमी जा रहा था। उसके सिर पर एक

गट्ठर था। बोझ अधिक था, बूढ़ परेशान था, वह थक गया। उसने सोचा, ‘देखो, मौत भी नहीं आती। यमराज मुझे भूल ही गया। कितना अच्छा हो, यदि अभी मौत आकर मुझे उठा ले। यमराज आकर मुझे ले जाए।’ योग ऐसा मिला कि यम स्वयं आ गया। इधर बूढ़े का एक सहायक भी आ पहुंचा। उसने आते ही गट्ठर उठाकर अपने सिर पर रख लिया। यम ने पूछा, ‘बोलो, मुझे क्यों याद किया?’ अब बूढ़े का विचार बदल गया था। वह हल्का हो गया था। कष्ट में जो विचार था वह जैसे ही आराम मिला, सुख मिला, बदल गया। यम ने कहा,

‘जल्दी बताओ, तुमने मुझे क्यों याद किया है?’ बूढ़े ने कहा, 'क्षमा करें, मैं गट्ठर के भार से दबा जा रहा था। अनोखी कथाएँ

उसे उठाने के लिए आपको याद किया था। अब मेरा सहयोगी आ गया है। उसने गट्ठर उठा लिया है। अब आप चले जाइये। आपकी आवश्यकता नहीं है।’

देखादेखी

गंगाया बालुकामध्ये, गतं से ताम्रभाजनम् ।। ‘लोग गतानुगतिक होते हैं। पीछे चलने वाले होते हैं। इनके अनुकरण ने मेरा लोटा और गंवा दिया।’ -0-

अनोखी कथाएँ

घृणा और प्रेम

सन्त राबिया के घर एक फकीर आया। उसने मेज

‘यह कैसे हो सकता है कि पवित्र पुस्तक की बात अच्छी न लगे? क्या यह सही नहीं है?’ फकीर ने पूछा। सन्त राबिया ने कहा, 'एक दिन मुझे भी सही लगता था, किन्तु आज लगता है कि सही नहीं है।

‘वह कैसे?’ फकीर ने पूछा।

सन्त राबिया ने कहा, ‘जब तक मेरा प्रेम जागृत नहीं था, मेरी प्रेम की आंख खुली नहीं थी, मुझे भी लगता था कि शैतान से नफरत करो, प्यार नहीं, यह वाक्य बहुत सही है। किन्तु अब मैं क्या करूँ? मेरी प्रेम की आंख खुल गई है। अब घृणा करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है। मैं घृणा कर ही नहीं सकती। प्रेम की आंख यह भेद करना नहीं जानती कि इसके साथ प्रेम करो और इसके साथ घृणा ।’

अनोखी कथाएँ

तुम मूर्ख हो

एक युवक बोधिधर्म के पास गया। वे बहुत बड़े साधक थे। युवक ने पूछा, ‘भन्ते! मैं कौन हूँ?’ बोधिधर्म ने एक चांटा मारा और भर्त्सना के स्वर में कहा, ‘चले जाओ, मूर्ख!’ युवक विस्मय में डूब गया। इतना बड़ा साधक, इतना बड़ा ज्ञानी और मैंने छोटा-सा प्रश्न पूछा तो उसका उत्तर मिला चांटा। वह दूसरे साधक के पास जाकर बोला, ‘भन्ते!’ मैंने बोधिधर्म से पूछा कि मैं कौन हूं। उन्होंने उत्तर नहीं दिया, मुझे चांटा मारा।’ साधक ने कहा, ‘बोधिधर्म ने तुम्हें चांटा मारा और यदि वही प्रश्न मुझसे पूछते तो मैं डंडा मारता।’ वह कुछ समझ नहीं पाया। उसने कहा, ‘भन्ने ! मैंने आपसे प्रश्न पूछा था। आपने उसका उत्तर नहीं दिया और चांटा मारा। क्या उत्तर देने का यह भी कोई तरीका है? भन्ते! आपने यह क्या किया?’ बोधिधर्म ने कहा, ‘इस प्रश्न को मत छेड़ो। यदि छेड़ोगें तो कल चांटा पड़ा था और आज आज कुछ और पड़ सकता है।’ युवक घबरा गया। वह भर्राये स्वर में बोला, ‘भन्ते! तो मैं क्या करूँ?’ बोधिधर्म बोले, ‘तुम मूर्ख हो।’ ‘मैं मूर्ख कैसे?’ युवक ने पूछा। बोधिधर्म ने कहा, ‘जो बात अपने से पूछनी चाहिए, यह बात तुम दूसरे से पूछ रहे हो, इसलिए तुम मूर्ख हो। जाओ, यह प्रश्न अपने आप से पूछो कि मैं कौन हूँ?’ बात समाप्त हो गयी। युवक को समाधान मिल गया। ●●●

अनोखी कथाएँ

नीयत का असर

एक राजा जंगल में भटक गया। प्यास से

आकुल-व्याकुल होकर वह इधर-उधर घूमने लगा। उसे एक झोंपड़ी दिखाई दी। वह वहां पहुंचा। वहां एक बूढ़ा आदमी बैठा था। पास ही ईख का खेत था। राजा ने पानी मांगा। बूढे ने दो-चार ईख तोड़े, कोल्हू में उन्हें पेरा। ईख के रस से एक कटोरा भर गया। राजा ने वह पीया और उसका मन पुलकित हो गया। उसने बूढ़े से पूछा, ‘क्या ईख पर ‘कर’ भी लगता है?’ बूढे ने कहा, ‘नहीं। हमारा राजा दयालु है। वह भला हमसे क्या ‘कर’ लेगा?’ राजा ने मन ही मन सोचा, ऐसी मीठी चीज पर अवश्य ‘कर’ लगना चाहिए। मन में संकल्प-विकल्प उठने लगे। आखिर ‘कर’ लगाने का निश्चय कर लिया। राजा ने चलते-चलते बूढ़े से कहा, ‘एक प्याला रस और पिलाओ।’ बूढ़े ने फिर दो-चार ईख तोड़े। उन्हें कोल्हू में पेरा। पर रस से कटोरा नहीं भरा। राजा अचम्भे में पड़ गया। उसने पूछा, 'यह क्या? पहले ईख के रस से कटोरा भर गया था, अब नहीं भरा, यह क्यों? बूढ़ा दूरदर्शी था। उसने कहा, ‘लगता है मेरे राजा की नीयत बिगड़ गई, अन्यथा ऐसा नहीं होता।’ राजा मन-ही-मन पछताने लगा।

राजा की नीयत का इतना असर होता है। क्या

अनोखी कथाएँ

अधिकारियों और मंत्रियों के चरित्र का प्रभाव समाज पर नहीं पड़ता? क्या अग्रणी व्यक्तियों के आचरण का असर समाज पर नहीं होता? होता है, अवश्य ही होता है। हमे इसे व्यक्तिगत मामला कहकर नहीं टाल सकते। जहां इस प्रश्न को टाल देते हैं वहां नाना प्रकार की विकृतियां पैदा हो जाती हैं, अन्याय करने की खुली छूट मिल जाती है।

आना और जाना

बंगाल प्रान्त में भूपेश सेन रहता था। वह बंगाली गृहस्थ था। बहुत बड़ा भक्त था। इतना बड़ा भक्त था कि जब वह भक्ति में बैठता तब तन्मय हो जाता। बाहरी दुनिया से उसका सम्बंध टूट जाता। एक दिन वह भक्ति में बैठा और तन्मय हो गया। बाहर का भान समाप्त हो गया। अन्तर में पूरा जागृत किन्तु बाहर से सुप्त। एक व्यक्ति आया और चिल्लाया, ‘भूपेश! क्या कर रहे हो? उठो और संभलो।’ वह व्यक्ति बहुत जोर से चिल्लाया, ‘भूपेश! क्या कर रहे हो? उठो और संभलो।’ वह व्यक्ति बहुत जोर से चिल्लाया, किन्तु भूपेश को कोई पता नहीं चला। उसने भूपेश का हाथ पकड़ झकझोरा, तब भूपेश ने आंखें खोलीं और कहा, 'कहिये, क्या बात है? अनोखी कथाएँ

आगन्तुक बोला, ‘मुझे पूछते हो क्या बात है? यहां आंखें मूंदे बेठे हो। तुम्हें पता नहीं, तुम्हारे इकलौते बेटे को सांप काट गया और वह तत्काल ही मर गया।’ भूपेश ने कहा, ‘जो होना था सो हुआ’ आगन्तुक बोला, 'अरे! तुम कैसे पिता? मैने तो दुःख का संवाद सुनाया और तुम वैसे ही बैठे हो? लगता है कि पुत्र से तुम्हें प्यार नहीं है। तुम्हें शोक क्यों नहीं हुआ? तुम्हें चिन्ता क्यों नहीं हुई? तुम्हें दुःख क्यों नहीं हुआ? तुम्हारी आंखों में दो आंसू क्यों नहीं छलक पडे? भूपेश ने कहा, ‘जिस दिन बेटा आया था तो मुझे पूछकर नहीं आया था और आज वह लौट गया तो मुझे पूछकर नहीं लौटा। उस दिन मैंने कुछ नहीं किया था। आज भी मुझे कुछ नहीं करना है। यह जन्म और मरण की अनिवार्य श्रृंखला है, जिसमें मेरा हाथ नहीं है। मनुष्य आता है, चला जाता है। तुम्हें इतनी क्या चिन्ता है?’

आगन्तुक चुप हो गया। उसके पास बोलने के लिए कुछ नहीं बचा। कुछ क्षण रुककर वह बोला, ‘अब उसकी चिता जलानी है, साथ चलो।’ भूपेश उसके साथ गया। पुत्र की अर्थो श्मशान में पहुंची। चिता में पुत्र को सुला, आग लगाकर कहा, बेटे, ‘बेटी, तुम जिस घर से आये थे, उसी घर में जा रहे हो। आज से हमारा सम्बन्ध विच्छिन्न हो गया है।’

अनोखी कथाएँ

गधे का घोड़ा

एक धोबी का गधा चला जा रहा था। पीठ पर कपड़ों का गट्ठर था। एक आदमी ने पूछा, ‘अरे गधे! इतना भार क्यों ढोते हो? तुम्हें खाना भी अच्छा नहीं मिलता, थोड़ी-बहुत सूखी घास मिल जाती है। ऐसी बेवकुफी क्यों करते हो? मेरा कहा मानो और राजा की घुड़साल में चले जाओ। वहां जाकर मजे से रहना। वहां कोई काम नहीं करना पड़ेगा।’ गधा बोला, ‘तुम्हारा कथन लुभावना है, किन्तु राजा की घुड़साल में मेरा प्रवेश कैसे होगा? यदि चला भी जाऊंगा तो मुझे मारपीटकर लोग निकाल देंगे।’ आदमी बोला, 'इसकी चिन्ता मत करो। तुमको वहां से कोई नहीं भगाएगा। क्योंकि वहां के सभी अधिकारी यह मानकर चलते हैं कि जिसके पूंछ होती है वह घोड़ा होता है। तुम चले आओ और सुखपूर्वक जीवन बिताओ। गधा बोला, ‘अधिकारी तो मान लेंगे, किन्तु राजा इसको कैसे मानेगा? एक गधे को घोड़ा कैसे मानेगा?’ आदमी ने कहा, ‘चिन्ता मत करो। राजा स्वतंत्र रूप से कुछ नहीं सोचता। वह वही मानता है जो अधिकारी कहते हैं। अधिकारी यदि गधे को घोड़ा कह देंगे तो राजा गधे को घोड़ा मान लेगा। तुम बेफिक्र रहे।’ गधा बोला, ‘अरे! इतना तो ठीक है, किन्तु दूसरे नागरिक इसे कैसे स्वीकार करेंगे?’ आदमी बोला, 'इस राष्ट्र के अनोखी कथाएँ

सारे लोग तटस्थ हैं, उदासीन हैं। वे यह मानते है कि हमें क्या, कोई कुछ भी माने।’

आज की राजनीति ने इस तटस्था को जन्म दिया

है। इससे अनेक विकृतियां पैदा हुई हैं। समाज का बहुत बड़ा भाग राजनीति में भाग नहीं लेता, तटस्थ रहता है, कोई चिन्ता नहीं करता। यदि सब चिन्ता करने लग जाएं तो जो स्थिति चल रही है, वह चल नहीं सकती। उसमें अनिवार्यतः परिवर्तन आ जाता है। किन्तु सब उदासीन हैं और यही कहते हैं, ‘हमें क्या! जो कुछ हो, होने दो। हम क्यों चिन्ता करें?’ आदमी इसका परिणाम भी भुगत लेता है, पर उदासीनता नहीं तोड़ता।

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बातों से प्रसन्न

एक कवि किसी सेठ के पास गया। सेठ की काफी

प्रशंसा की। सेठ ने खुश होकर कहा, ‘मेरे पास रुपये नहीं हैं। अनाज का भंडार भरा हुआ है। तुम कल आना। मैं तुम्हें अन्न के भंडार में से कुछ आनाज दे दूंगा।’ कवि भी प्रसन्न होकर चला गया। दूसरे दिन सबेरे-सबेरे कवि सेठ के घर आया। कवि को देखकर सेठ बोला, ‘इतने सबेरे आ गए, कैसे आए?’ कवि ने कहा, ‘आपने कल कहा था कि अभी मेरे पास कुछ नहीं है, कल आना, मैं अन्न-भंडार से आनाज दूंगा। इसीलिए आया हूं।’ सेठ अनोखी कथाएँ

बोला, ‘अच्छे समझदार हुए तुम, अच्छे कवि बने। अनाज कहां है?’ कवि ने कहा, ‘आपने ही तो कहा था कि आज नहीं, कल दूंगा।’ सेठ बोला, ‘इतना भी नहीं समझ सके। तुमने मुझे बातों से प्रसन्न किया था और मैंने भी तुम्हें प्रसन्न कर दिया। दोनों ओर से समान बात ही है। तुमने मुझे दिया क्या था, केवल बातों से ही तो प्रसन्न किया था। मैंने भी तुम्हें बातों से राजी किया। चले जाओ।’ -0-

आस्था

माता ने कहा, बेटा, यह लड्डू का बरतन पड़ा है। रोज एक लड्डू खा लेना। दो मत निकालना। जिस दिन दो निकालोगे उस दिन भूत तुम्हारा हाथ पकड़ लेगा।’ बच्चा गया। लड्डू का लोभ और खुली छूट थी उसे कि लड्डू चाहे जितने खां लो उसमें से निकालकर अपने आप। उसने हाथ डाला और दो-तीन लड्डू निकालने का प्रयत्न किया। दो या तीन लड्डू पकड़े और निकालना शुरू किया। हाथ निकल नहीं पाया बर्तन से। बच्चे ने सोचा- जरूर भूत ने हाथ पकड़ लिया है। हाथ नहीं निकल रहा है। उसने सारे लड्डू डाल दिए। एक लड्डू निकाला और खा लिया। मां के पास आया और आकर बोला, 'मां. तुमने ठीक कहा था। तेरी बात बहुत सच्ची होती है। मैंने दो लड्डू निकालने का प्रयत्न किया अनोखी कथाएँ

तो भूत आया, मेरा हाथ पकड़ लिया।’ एक आस्था बन गई- एक आस्था का भ्रम हो गया। बर्तन का मुंह छोटा था। दो निकाल कैसे सकता था? नहीं निकाल सकता था, पर बच्चे के मन में एक ऐसा भ्रम पैदा हो गया कि मां जो कहती है वह बात ठीक कहती है।

नीचे भी देख लो

एक था ज्योतिषी, खगोलशास्त्री। वह इतना आकाश से सम्बद्ध था कि उसकी दृष्टि और उसका सारा व्यवहार आकाश-दर्शन में ही लगता था। रात होती और उसकी भावनाएं उमड़ जातीं। चाहे वह बैठता, चाहे खड़ा रहता, चाहे टहलता, चाहे खाता, दृष्टि आकाश पर लगी रहती। वह चल रहा था, आंखें आकाश में थीं। चलता चला, चलता चला। थोड़ा आगे गया और गड्ढा आ गया। वह गड्ढे में गिर पड़ा। गड्ढे में कीचड़ था। गड्ढा गहरा भी था। उसमें गिरते ही वह चिल्लाया, ‘बचाओ, बचाओ!’ पड़ोसी अ या, उसने देखा, स्वयं ज्योतिषी गड्ढे में गिरे पड़े हैं। उसने उन्हें यह कहते हुए निकाला, ‘महाशय! आकाश को इतना देखते हैं, इतनी ऊंचाई पर देखते हैं तो जरा पैरों की तरफ भी नीचे देख लिया करें।’ -0-

अनोखी कथाएँ

नाटक

नाटक हो रहा था। अनेक दृश्य सामने आ रहे थे। एक अभिनेता आया और उसने इतनी कुशलता से

अभिनय किया, ऐसा दृश्य बना कि जार्ज बर्नाडे शॉ दशकों में से उठकर आये और अभिनेता को चांटा जड़ दिया। उसने कहा- यह क्या किया आपने? दूसरे ही क्षण बर्नाडे शॉ संभले। उन्होंने कहा, ‘भूल हो गई। मुझे भान ही नहीं रहा कि तुम नाटक कर रहे थे। मैंने तो तुमको असली ही समझ लिया था। मैंने सोचा- तुम बुरा काम कर रहे हो, इसलिए मैंने चांटा लगा दिया।’ -०-

बुखार

डॉक्टरों ने एक प्रयोग किया। एक स्वस्थ आदमी था। एक डॉक्टर आया। उसकी नब्ज देखकर

कहा-‘अरे! तुम्हें तो ज्वर हो गया है।’ वह घर से बाहर निकला। दूसरा डाक्टर रास्ते में मिला। उसने कहा- ‘यह क्या, लगता है तुम्हें ज्वर हो गया है।’ आगे चला। एक तीसरा डॉक्टर मिला। उसने कहा- ‘अरे भाई, तुम्हें ज्वर कब से हो गया है।’ वह व्यक्ति घबरा गया। वह घर गया। अपने घरेलू डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर आया। उसने कहा- ‘बुखार हो गया है।’ बुखार बढ़ता ही गया। अनोखी कथाएँ

वह १०४ डिग्री तक पहुंच गया। व्यक्ति घबरा गया। यह तो आत्मशोधन का प्रयोग था। प्रयोग का चक्कर घूमा। नया डाक्टर आया, उसने सारी परीक्षा कर कहा- ‘अरे! किसने कहा तुम्हें ज्वर है? तुम तो स्वस्थ हो। तुम्हारी नाड़ी स्वस्थ है। बुखार नहीं है। जिसने बुखार बतलाया वह डॉक्टर पागल था। तुम चिन्ता मत करो। कोई ज्वर नहीं है। तुम ज्वर की बात मन से निकाल दो।’ कुछ घंटों बाद परीक्षण किया गया। बुखार नहीं था। -०-

खुदा के साथ

एक सूफी सन्त थे- सन्त सैयाद। बहुत बड़े साधक थे। जा रहे थे घोर जंगल से। शिष्य साथ में था। समय हुआ, वे नमाज पढ़ने बैठे। कम्बल बिछाया। उस पर बैठ गये। शिष्य भी बैठ गया। इतने में शेर के दहाड़ने की आवाज आयी। शिष्य डरा। उसने अपना कम्बल समेटा और वह तत्काल पैड़ पर चढ़कर बैठ गया। किन्तु सन्त सैयाद अविचल भाव से वैसे ही बैठे रहे। नमाज पढ़ते रहे। शेर वहां आ पहुंचा। आसपास में सूंघकर चला गया। नमाज पूरी की। शिष्य पेड़ से नीचे उतरकर आया। दोनों आगे बढ़ गए। जा रहे थे, इतने में एक जंगली कुत्ता सामने आ गया। जैसे ही कुत्ता सामने आया, सन्त खैयाद अनोखी कथाएँ

ने अपना डंडा संभाला, और डंडा लेकर प्रतिरोध की मुद्रा में खड़े हो गये। शिष्य देखता रहा। वह पूछ बैठा, ‘गुरुदेव! यह क्या? जब शेर आया तब तो आप अविचल भाव से बैठे रहे और एक कुत्ता सामने आया तो आप प्रतिरोध की मुद्रा में खड़े हो गए। मैं रहस्य समझ नहीं पाया।’ सन्त खैयाद बोले-‘उस समय खुदा मेरे साथ था और अब तुम मेरे साथ हो। उस समय मैं परमात्मा की शरण में था, खुदा मेरी रक्षा कर रहा था। अब तुम मनुष्य मेरे साथ हो।’

विदेश जाने की आवश्यकता नहीं

एक व्यक्ति ने दारिद्रय से कहा-’ मैं कमाने के लिए परदेश जा रहा हूँ, यात्रा करना चाहता हूँ, तुम यहीं रहकर मेरे घर की देखभाल करो।’ दारिद्रय बोला- ‘यह कैसे हो सकता है? आज तक मैंने तुम्हारा साथ निभाया है। आज मैं तुम्हें अकेले विदेश कैसे जाने दूं? तुम विदेश में रहो और मैं यहां रहूं, यह कैसे संभव हो सकता है? मैं कच्चा मित्र नहीं हूं। मैं सर्वत्र साथ ही रहूंगा।’ तब उस व्यक्ति ने कहा-‘मुझे तब विदेश जाने की जरूरत ही नहीं है।’

अनोखी कथाएँ

प्रतीक्षा

एक व्यक्ति ने किसी जौहरी से कहा- ‘तुम मेरे घर पर चलो। मेरे पास एक बहुमूल्य हीरे की अंगूठी है। उसका सही मूल्यांकन कराना है।’ जौहरी उसके घर गया। पहले दरवाजे में प्रवेश किया। वह व्यक्ति बोला- ‘देखो, यह राजस्थानी शिल्प है। कितनी सुन्दर कारीगरी है! शिल्पी ने कितना गजब का शिल्प प्रस्तुत किया है।’ दूसरे दरवाजे में प्रवेश किया। व्यक्ति ने जौहरी से कहा- 'देखो, कितना सुन्दर वातायन है। इसकी

चित्रकला को देखो। कितने भव्य और सुन्दर चित्र हैं। चित्रकार ने अपनी सारी कला यहां अभिव्यक्त कर दी है।’ जौहरी बोला- ‘भले आदमी! मुझे इन सब चीजों को देखने-परखने का समय नहीं है। मैं तो हीरे की अंगूठी देखने आया हूँ। बताओ, वह कहां है?’ वह बोला- ‘धैर्य रखो। जब तुम आ ही गये हो तो मेरी सारी चीजें देखो। यह नहीं होगा कि मैं सबसे पहले हीरे की अंगूठी दिखा दूं। घर आ ही गए तो सब कुछ देखना होगा’। दोनों ने तीसरे दरवाजे में प्रवेश किया। वह बोला- ‘जौहरीजी! देखो, कितना सुन्दर स्थापत्य है! दुनिया में अन्यत्र ऐसा स्थापत्य देखने को नहीं मिलेगा।’ इस प्रकार वह सातों दरवाजों का वर्णन करते-करते जौहरी को घुमाता रहा। एक-दो घंटा बीत गया। फिर अनोखी कथाएँ

उसने कहा- ‘यह हमारा अतिथिगृह है। यह हमारा स्वागत-कक्ष है। यह भोजन्गृह और शयन-कक्ष है। तुम स्वागत-कक्ष में बैठो। मैं नाश्ते की तैयारी करता हूं। घर आये हो तो बिना खाये कैसे जाओंगे?’

इस प्रकार वह जौहरी का समय लेता रहा। नाश्ता कराया। फिर घर की छत पर ले गया। वहां से नगर का दृश्य दिखाया। फिर से भूमिगृह (भोंहरे) में ले गया। वहां उसे एक आसन पर बैठाया। अलमारी खोली। एक डिब्बी निकाली। डिब्बी को खोला। उसमें थी वह हीरे की अंगूठी। उस पर अनेक वस्त्र लपेट रखे थे। एक-एक वस्त्र-खंड को अलग किया। फिर अंगूठी ले जाकर जौहरी से कहा- ‘यह है मेरी हीरे की अंगूठी।’ -०-

सम्राट सिकन्दर

एक घटना है- सिकन्दर महान् विश्व-विजय के लिए जा रहा था। एक फकीर मिला। पूछा- कहां जा रहे हो?

  • भारत को जीतने के लिए जा रहा हूँ- सिकन्दर ने कहा।

  • फिर क्या करोगे?

  • फिर एशिया को जीतूंगा।

  • एशिया को जीतने के बाद क्या करोगे?

अनोखी कथाएँ

  • फिर विश्व को जीतूंगा। विश्वविजयी बनूंगा। - विश्वविजयी बनने के बाद फिर क्या करोगे? - फिर शान्ति से रहूंगा, आराम करूंगाँ।

फकीर बोला- भले आदमी! हिन्दुस्तान को जीतोगे, एशिया को जीतोगे, सारे संसार को जीतोगे, इसमें कितना खून खराबा होगा, कितना युद्ध करना पड़ेगा, कितने लोग मरेंगे। जब शान्ति से जीना है, आराम से जीना है तो अभी क्यों नहीं जी लेते शान्ति और आराम के साथ!

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शास्त्रीय संगीत

शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम था। लोगों को निमंत्रित किया गया था। हॉल खचाखच भर गया। संगीत शुरू हुआ। कोई सिनेमा तो था नहीं। अब अलाप शुरू हुआ तो आधा-पौन घंटा तो आ… आ… करने में ही लग गया। लोगों ने सोचा कि अरे, यह क्या हो रहा है, सब उठकर चलते बने। सभी चले गये। एक आदमी बैठा रहा। आधा-पौन घंटा तो संगीतज्ञ की आंख ही नहीं खुली। जब आख खुली तो देखा कि हॉल तो खाली है। केवल एक आदमी बैठा है। उसने कहा- चलो, कोई बात नहीं। शास्त्रीय संगीत बड़ा दुरूह होता है। लोग चले गये, कोई बात नहीं, लेकिन मुझे संतोष है, कम-से-कम एक अच्छा अनोखी कथाएँ

श्रोता तो मुझे मिला। वह बोला- ‘बाबूजी! मैं तो संगीत-वंगीत कुछ नहीं जानता। यह जो दरी बिछी हुई है उसे ले जाने के लिए बैठा हूं।’

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सलाह

एक बहुत मार्मिक व्यंग्य है- छोटा मुन्ना और छोटी ही बहन, दोनों खेल रहे थे। इतने में एक हल्ला सुनाई दिया घर में। मुन्ने ने अपनी बहन से पूछा- यह क्या हो रहा है? उसने कहा- मां और पिताजी दोनों लड़ रहे हैं? वह बोली- यह तो मुझे पता नहीं लेकिन मैंने सुना कि पिताजी कह रहे हैं कि मैंने तुम्हारे साथ शादी करके बड़ी भूल की। और मां भी कह रही हैं कि मैंने तुम्हारे यहां आकर बड़ी भूल की। दोनों कह रहे हैं कि भूल की। मुन्ना बोला- बिलकुल ठीक कह रहे हैं। मुझसे सलाह किए बिना कोई काम करेंगे तो भूल ही होगी, कभी अच्छा काम नहीं होगा।

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लाभदायक

एक अनुभवी संन्यासी था। उसके पास एक शिष्य

आया। शिष्य ने संन्यासी की सेवा की। संन्यासी ने प्रसन्न होकर कहा- लो, यह तेल देता हूं। यह चमत्कारी तेल अनोखी कथाएँ

है। इसे शरीर में चुपड़ लेना। शरीर सिद्ध हो जाएगा। संन्यासी चला गया। उसने शरीर पर तेल चुपड़ लिया। भक्त लोग आते हैं और शिष्य के शरीर को देखकर दूर से ही भाग जाते हैं। एक दिन बीता, दो दिन बीते, तीन दिन बीते। उसने सोचा, यह क्या हो गया? सैकड़ों भक्त आते, बैठते, प्रवचन सुनते, अब दूर से ही भाग जाते हैं। यह क्यों? वह अपने गुरु के पास गया और बोला- गुरुदेव! यह कैसे परिवर्तन आ गया भक्तजनों में? कोई पास आता ही नहीं। गुरु ने कहा- इन दिनों तुमने कोई प्रयोग किया था? शिष्य बोला- कोई प्रयोग नहीं किया। एक संन्यासी आया था। बस, इतना ही किया था। गुरु ने उसके शरीर को सूंघा और सूंघकर कहा- अरे, गजब कर दिया तुमने। यह तो सुदर्शन तेल था। उसको लगाने से शरीर पारदर्शी हो जाता है और मन का प्रतिबिम्ब उसमें निखर आता है। तेरा मन अभी सधा नहीं है। उसमें अनेक दोष हैं। यह विकृत है। गन्दा है। इतने दिन तक वह ढंका पड़ा था। कोई उसे जान नहीं पाता था। इस तेल के प्रभाव से तेरा अन्तःकरण शरीर में प्रतिबिम्बत हो गया। भक्त आता है, देखता है और सोचता है- जिन्हें हम प्रमाण करते हैं भगवान् मानते हैं वे हृदय से इतने गन्दे हैं, मन से इतने विकृत हैं, तो हम इन्हें कैसे प्रमाण करें? कैसे इनकी भक्ति करें? वे देखते ही भाग जाते हैं। शिष्य! इसे उतारो। तुम्हारे लिए तो तिलों का या सरसों का तेल ही लाभदायक है।

अनोखी कथाएँ

मैं नहीं मानता

आदमी आया। रुपया चुकाना था। सामने लाकर

साठ रुपये रख दिए। उसने पूछा कि भाई! मैंने सत्तर रुपये दिये थे, पैंतीस एक बार और पैंतीस एक बार। ये साठ कैसे लाये? उसने कहा- नहीं, पैंतीस-पैंतीस साठ होते हैं। उसने कहा- तुम हजार बार कहो पर मैं तो नहीं मानता। मैं तो यही मानूंगा कि पैंतीस और पैंतीस साठ होते हैं। और ये साठ रुपये मैंने तुम्हारे ला दिये। -0-

मैं तो छोटा हूँ

मालिक ने झुंझलाकर अपने नौकर से कहा- तुम

बड़े गधे हो। नौकर ने हाथ जोड़कर कहा- मालिक! बड़े तो आप है, मैं तो छोटा हूं।

डाक्टर का परामर्श

एक डॉक्टर ने बीमार से कहा, कि तुम तम्बाकू छोड़ दो। पास में खड़े व्यक्ति ने पूछा- डॉक्टर साहब! तम्बाकू नहीं पीएगा तो क्या इससे ठीक हो जाएगा? डॉक्टर ने कहा-ठीक होगा या नहीं मुझे नहीं पता, किन्तु मेरा बिल चुकाने की स्थिति में जरूर आ जाएगा। इतना तो होगा। अनोखी कथाएँ

इतना धूम्रपान करता है, अर्थशक्ति तो सारी धूम्रपान में ही चुक जाती है। फिर हम बिल चुकाने की स्थिति में ही नहीं रहते।

वाणी का चमत्कार

अंग्रेज पानी में डूब रहा था। एक भारतीय ने देखा। उसके मन में करुणा जागी। वह तैरना जानता था। वह पानी में कूदा और अंग्रेज को बचा लिया। तट पर आकर अंग्रेज ने कृतज्ञता का भाव प्रकट करते हुए कहा- थैंक्यू। बचाने वाला अनपढ़ था। वह समझा नहीं। उसने समझा- कह रहा हैं फेंक दो। उसने अंग्रेज को उठाकर पुनः पानी में फेंक दिया। बोला- मैंने ही निकाला और मुझे ही कह रहा है फेंक दो। यह सारा वाणी का चमत्कार था, और कुछ नहीं। निकालनेवाला भी वही था, फेंकने वाला भी वही था। करुणा गायब हो गयी उसके मन से। मन में आक्रोश जाग गया। करुणा का स्थान क्रूरता ने ले लिया। अंग्रेज पानी में तड़पता रहा। वह तट पर खड़ा उसे तड़पते देखता रहा।

अनोखी कथाएँ

एक काम आप ही कर दें

गुरु और शिष्य दोनों सो रहे थे। वर्षा का मौसम था। गुरु ने करवट बदलकर शिष्य से कहा- बाहर जाकर देखो कि वर्षा आ रही है या रुक गयी है? शिष्य आलसी था। उठने की इच्छा नहीं थी। उसने तर्क का प्रयोग करते हुए कहा- गुरुदेव! अभी अभी यह कुत्ता बाहर से आया है। आप इसके शरीर पर हाथ फेरकर देख लें। यदि इसका शरीर भीगा हुआ है तो वर्षा आ रही है, यदि वह सूखा हो तो वर्षा बन्द हो गयी है। सरल उपाय है। थोड़ी देर बाद गुरु ने कहा- शिष्य! रात बहुत चली गयी है। नींद नहीं ले पा रहा हूं। दीये का प्रकाश सीधा मुंह पर पड़ रहा है। उठो, दीये को बुझा दो। शिष्य बोला- गुरुदेव! दीया क्यों बुझाएं, आप अपने मुंह पर कपड़ा ओढ़ लें, प्रकाश नहीं दीखेगा, नींद आ जाएगी। कुछ समय बीता, हवा तेज चलने लगी। गुरु ने

कहा-‘अरे, उठकर दरवाजा बन्द कर दो। सर्दी के मारे ठिठुर रहा हूं।’ शिष्य ने सोते-सोते ही कहा- ‘गुरुदेव! मैं दरवाजे से बहुत दूर सोया हुआ हूं। आप पास में ही हैं। पैरों से धक्का दें, दरवाजे बन्द हो जायेंगे।’ गुरु ने वैसा ही किया। फिर दरवाजे खुलने लगे। गुरु ने कहा- ‘शिष्य! अब उठकर दरवाजे के आगल लगा दो।’ शिष्य तड़ककर बोला- ‘तीन काम कर दिये तो एक काम आप ही कर दें।’ -०-

अनोखी कथाएँ

धन्यवाद

एक डॉक्टर जा रहा था। एक युवक दौड़ा-दौड़ा आया और बोला- ‘धन्यवाद डॉक्टर साहब, आपने मेरी भाभी का सफल इलाज किया, उसके लिए धन्यवाद देने के लिए आ गया।’ डॉक्टर ने पूछा- तुम्हारी भाभी एकदम स्वस्थ हो गयी?

युवक बोला- हां, डॉक्टर साहब! वह समस्त रोगों से मुक्त हो गयी। रोगों से ही नहीं, इस संसार से भी मुक्त हो गयी।

'डॉक्टर बोला- फिर धन्यवाद कैसे?

‘डॉक्टर साहब! उसका वारिस मैं हूं। उसकी सारी सम्पत्ति मुझे मिल गयी। अच्छा इलाज किया आपने कि वह जल्दी ही चल बसी। अन्यथा उसकी सम्पति को पाने के लिए मुझे दो-चार वर्ष और रुकना पड़ता। आपने बड़ा उपकार किया। धन्यवाद!’

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अपराध

रोम में घटित एक घटना है। दस वर्ष का एक बालक अपराधी बन गया। अपराध करना उसका स्वभाव जैसा बन गया। पचास वर्ष तक उसने अनेक अपराध किये। चालीस बार जेल गया। यातनाएं सहीं। पर वह अपराध अनोखी कथाएँ

को छोड़ नहीं सका। उसके अपराध-वृत्ति के कारणों की खोज प्रारम्भ हुई। अनेक वैज्ञानिक संलग्न हुए। पूछताछ प्रारम्भ हुई। एक वैज्ञानिक ने पूछा- क्या तुम्हें कभी चोट आयी? उसने कहा- एक बार कार का

एक्सीडेंट हो गया था। कनपटी के पास चोट आयी थी। वैज्ञानिक ने उसकी कनपटी का एक्सरे लिया। उससे ज्ञात हुआ कि कनपटी के पास एक नाड़ी में कुछ फंसा हुआ है। आपरेशन किया। उस नाड़ी में कांच का सूक्ष्म टूकड़ा फंसा हुआ था। वह जब भी अवरोध पैदा करता, उस व्यक्ति में अपराध की भावना उभरती और वह कोई-न-कोई अपराध कर लेता। उस टुकड़े को

निकाल दिया। उसकी अपराध वृत्ति समाप्त हो गयी। वह एक सभ्य व्यक्ति की गिनती में आ गया।

पशु की तरह

एक डॉक्टर ने भोज का आयोजन किया। नगर के

संभ्रान्त व्यक्ति भोज में सम्मिलित हुए। भोज के प्रारम्भ में डॉक्टर ने कहा- ‘सबके सामने भोजन परोस दिया गया है। भोजन प्रारम्भ करने से पूर्व हम सब एक बात सोच लें कि हमें पशु की तरह खाना है या मनुष्य की तरह।’ सारे लोग असमंजस में पड़ गये। वे डॉक्टर के आशय को समझ नहीं सके। डॉक्टर ने अपने कथन अनोखी कथाएँ

को स्पष्ट करते हुए कहा- ‘पशु की तरह खाने का तात्पर्य है जितनी भूख है उतना ही खाना और मनुष्य की तरह खाने का तात्पर्य है भूख न होने पर भी खाते जाना।’

श्रम का मूल्य

तीन भाई थे। मां ने एक बेटे से कहा- ‘जाओ, बाजार से तेल ले आओ।’ शीशी लेकर गया, तेल भरा, घर की ओर रवाना हुआ। ऐसा योग अकस्मात् हुआ कि शीशी हाथ से गिरी, कांच की थी, फूट गयी। सारा तेल ढुल गया। रोने लग गया- अब कैसे होगा? मां उलाहना देगी। रोता हुआ घर पहुंचा और रुआंसे स्वर में मां से बोला- ‘शीशी गिर गयी, तेल भी गिर गया और पैसे भी गये।’ वह रोने लग गया। मां ने दूसरे लड़के से कहा- ‘तुम जाओ। तेल जरूरी है तेल ले आओ।’ वह गया, तेल भरा। आने लगा। आकस्मिक घटनाएं ऐसी होती हैं कि जिनकी व्याख्या करना कठिन होता है। ऐसी ही कोई आकस्मिक घटना घटी कि उसके हाथ से भी शीशी गिर गयी। पर इतना हुआ कि शीशी फूटी नहीं, तेल ढुल गया। पूरा नहीं दुला, कुछ ढुला। शीशी उठाई। उसने बड़ी संतोष की सांस ली। दौड़ा-दोड़ा आया और मां से बोला- 'देखो मां! कैसी घटना घटी। कितनी खुशी अनोखी कथाएँ

की बात है कि शीशी गिरी किन्तु फूटी नहीं। तेल ढुला पर पूरा नहीं दुला। आधा बच गया।’ उछलने लगा। बड़ी प्रसन्नता का अनुभव किया। मां ने कहा- ‘काम पूरा नहीं हुआ। तेल और चाहिए, इतने से काम नहीं होगा।’ अब मां ने तीसरे लड़के से कहा- ‘अब तुम जाओ। ऐसा मत करना जैसा इन्होंने किया है। तेल लाना है।’ उसने भी तेल भरा, आने लगा और उसके साथ भी वही बीता। शीशी गिर गयी, फूटी नहीं, पूरा का पूरा तेल खाली हो गया। ऐसी औंधी पड़ी की तेल गिर गया। उसने सोचा कि बड़ी विचित्र बात है। मां ने तेल लाने के लिए कहा था, मां की बड़ी समस्या है, पर अब तक शीशी पूरी नहीं भर लूंगा तब तक घर नहीं जाऊंगा। वहीं से गया बाजार। श्रम का काम खोजा। पूरी शीशी भरी और मां के पास पहुंचा। बोला- ‘यह लो तेल।’ ‘इतना समय?’ बोला- ‘इतना समय ज्योति प्रज्वलित करने में लगा। मैंने ज्योति जलाई है, उसमें इतना समय लगा है।’

तोड़ सकते हैं जोड़ नहीं

महात्मा बुद्ध के पास डाकू आये। बुद्ध ने पूछा- कौन हो? हम डाकू हैं। कैसे आये? आपके पास आये हैं। डाका क्यों डालते हो? समाज की विवशता है।

बुद्ध ने सोचा- यह समाज के विघटन का काम है, अनोखी कथाएँ

ध्वंस का काम है- ऐसा नहीं होना चाहिए। उनको समझाने के लिए बुद्ध ने कहा- सामने वाले वृक्ष की चार पत्तियां तोड़ लाओ। वे पत्तियां तोड़कर ले आये। बुद्ध ने डाकुओं के मुखिया से कहा- इन्हें लो और वापस जोड़ आओ। मुखिया बोला- हम तोड़ सकते हैं, जोड़ नहीं सकते। बुद्ध ने उन्हें समझाया- देखो, ध्वंस सरल होता है, निर्माण कितना कठिन होता है?

आशा

लार्ड माउण्टबेटन नौ-सेना में भर्ती होने के लिए परीक्षा देने गये। परीक्षक ने कहा- युवक ! जब तुम जहाज लेकर जाओगे, उस समय तूफान आ जाएगा तो

क्या करोगे? उत्तर दिया, लंगर डाल दूंगा। फिर आएगा तो? फिर लंगर डाल दूंगा। इतने लंगर कहां से आएंगे? युवक ने उत्तर दिया - जहां से तूफान आएगा, वहीं से लंगर भी आ जाएगा।

रूप में परिवर्तन

चक्रवर्ती सम्राट सनत्कुमार अपने रूप के लिए विख्यात था। उसकी तुलना में रूपवान मनुष्य कोई दूसरा नहीं था। उसके रूप की चर्चा देवताओं तक पहुंची अनोखी कथाएँ

और वे भी उसे देखने को लालायित हो गये। देवों में भी इन्द्रदेव उसे देखने को आतुर थे। वे देखने के लिए आये और एक बूढ़े का रूप बनाकर चौकीदार से बोले- सम्राट सनत्कुमार का दर्शन करना चाहता हूं। स्वीकृति मिल गयी। भीतर पहुंचा और सनत्कुमार को देखा तो देखता ही रह गया। ऐसा सुन्दर मनुष्य तो क्या, देवताओं में भी कोई नहीं था। बात करने की इच्छा जागी । बोले- सम्राट! बहुत दूर से आया हूं। मेरी चिरकाल की आकांक्षा आज पूरी हुई। सम्राट ने पूछा- भाई! क्या चाहते हो? कहा- चाहता तो कुछ भी नही। आपको देखने की चाह थी वह आज पूरी हो गयी। आपके रूप की चर्चा चारों दिशाओं में गूंज रही है इसलिए आपको देखने का लोभ संवरण नहीं कर सका। आपको देखा, मेरी भावना पूरी हो गयी, मुझे और कुछ नहीं चाहिए।

सम्राट सनत्कुमार में अहंकार प्रवेश कर गया। अहंकार ही दृष्टिकोण को गलत बनाता है। वह

बोला-‘अभी तो न मैंने स्नान किया, न राजसी वस्त्र और आभूषण पहने। अभी तो आपने कुछ भी नहीं देखा। देखो जब तक मैं तैयार होकर राजसभा में आऊं। चक्रवर्ती सम्राट की वेशभूषा में वस्त्रालंकार से सज्जित हो सिंहासन पर बैठूं तब देखो मुझे।’ बड़े गर्व से यह बात कही सनत्कुमार ने। बूढे ने कहा- ‘अच्छी बात है, उस समय भी देख लूंगा।’ यह कहकर वह बाहर निकल अनोखी कथाएँ

गया। चक्रवर्ती सम्राट सनत्कुमार ने इतनी साजसज्जा की बूढे को दिखाने के लिए, जितनी वह कभी नहीं करता था। राजसभा में आकर सिंहासन पर बैठा ऐसे गर्व से जैसे चक्रवर्ती सम्राट नहीं, अहंकार की कोई सजीव मूर्ति बैठी हो। बूढ़े को बुलवाया। बूढ़ा आया सनत्कुमार ने कहा-’ अब देखो! रूप इसे कहते हैं।’ बूढ़े ने नाक-मुंह सिकोड़ते हुए कहा-‘चक्रवर्ती सम्राट ! खूब अच्छी तरह देख लिया तुम्हें, बस अब बात समाप्त हो गयी।’ सम्राट ने कहा- कैसा बेहूदा आदमी है? इतना सज्जित रूप मेरा और देखकर नाक-मुंह टेढ़ा करता है। क्या हो गया? बूढ़ा बोला-‘जो होना था हो गया, रूप आपका चला गया, समाप्त हो गया।’ कैसे’ बूढ़े ने कहा- ‘हां, समाप्त हो गया।’ जरा आप थूकें तो सही।’ चक्रवर्ती सम्राट ने थूका तो पीकदानी में देखा कि उसमें कीड़े बिलबिला रहे हैं। बूढ़े ने कहा- ‘देखा, आपका सारा शरीर बीमार हो गया, रोग से भर गया। बाहर से आप अपने को सौन्दर्यवान समझते हैं तो समझें, भीतर से आपका सौन्दर्य समाप्त है। प्रमाण रखा किन्तु प्रत्यक्ष देख रहे हैं। आपके अहंकार ने आपकी चमड़ी को सुन्दर रखा किन्तु भीतर से खोखला कर दिया।’

चक्रवर्ती की आंखें खुल गयीं। अहंकार समाप्त हो गया। तपस्वी बनकर इतनी तेज तपस्या की कि कहा जाता है वही देव एव वैद्य का रूप बनाकर आया। आकर अनोखी कथाएँ

बोला- ‘राजर्षि! शरीर आपका इतना बीमार, इतना अस्वस्थ और ऐसे में आप घूम रहे हैं? मेरे पास बहुत मूल्यवान और तेज असर वाली औषधियां हैं। मेरे अनुग्रह को स्वीकार कर उनका सेवन करें। ठीक हो जाएंगे।’ मुनि ने कहा, ‘मुझे दवा की आवश्यकता नहीं।’ लेकिन वैद्य आग्रह करता ही रहा। मुनि ने कहा- ‘तुम मुझे क्या दवा दोगे?’ यह कहकर उन्होंने अपनी एक अंगुली पर थूका। जो अंगुली रोग से सड़-गल गयी थी, थूक लगते ही वह कंचनमयी बन गयी। मुनि ने कहा- ‘मैं चाहूं तो सारी बीमारियों को मिटाकर सम्पूर्ण शरीर को कंचनमय बना सकता हूं। पर इस नश्वर शरीर ने मुझे इतना धोखा दिया कि अब इससे मेरा कोई वास्ता नहीं, कोई अपेक्षा नहीं। मुझे मतलब है उस आत्मा से, उस चेतना से, जिसे पाकर वह नश्वर शरीर मेरे लिए कुछ भी मूल्य नहीं रखता।’

धार्मिकता कितनी

रूस के सम्राट पीटर ने एक बहुत बड़ा चर्च बनवाया। उसमें लोगों के साथ स्वयं भाग लेने लगा। उसके साथ चर्च में चालीस हजार आदमी इकट्ठा होते। इतनी विशाल उपस्थिति देखकर पीटर ने पादरी से कहा- 'हमारे देश में धर्म के प्रति लोगों की बड़ी आस्था है। अनोखी कथाएँ

जनता ने प्रभोभक्त होने का सबसे बड़ा प्रमाण है चर्च में चालीस हजार लोगों की उपस्थिति ।’ पादरी तो सचाई को जानता था। सम्राट की बात को काटना ठीक नहीं था, इसलिए कुछ बोला नहीं। उसे एक उपाय सूझा और दूसरे दिन उसने लोगों के पास एक सूचना पहुंचा दी कि आज सम्राट प्रार्थना में भाग नहीं लेंगे। सम्राट निश्चित समय पर आये तो देखा प्रार्थना में केवल छह आदमी उपस्थित हैं। सम्राट को बड़ा आश्चर्य हुआ। बोला- कल तो चालीस हजार आदमी थे, आज छह ही क्यों? पादरी बोला-सम्राट! हमारे राज्य की जनता प्रभू-भक्त नहीं, राजभक्त है, स्वामिभक्त है। आप को देखने आते हैं सब। आज मैंने सूचना प्रसारित करवा दी कि सम्राट नहीं आएंगे तो चालीस हजार में केवल छह आदमी आये।

दासी के दास

सिकन्दर महान् जब फारस के राजा दारा को

जीतकर नगर में प्रवेश कर रहा था तो हजारों-हजारों लोग दोनों ओर पंक्तिबद्ध स्वागत में खड़े थे। वे सब एकटक सिकन्दर की ओर देख रहे थे कि उसकी एक दृष्टि पड़ जाये और हम निहाल हो जायें। सिकन्दर ने देखा यह दृश्य और बहुत प्रसन्न हुआ यह देखकर कि अनोखी कथाएँ

लोगों में मेरे प्रति प्रति कितनी भक्ति है, कितनी श्रद्धा है और कितना आकर्षण है कि एकटक मुझे निहार रहे हैं। लोगों का अभिवादन स्वीकार करते हुए वह आगे बढ़ा। थोड़ी दूर गया और देखा कि सामने से फकीरों की एक टोली आ रही है। सिकन्दर उधर से गुजरा तो देखा कि उन फकीरों ने उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया, अभिवादन तो दूर। सिकन्दर को बड़ा क्रोध आया कि ये कितने बेहूदे हैं। तत्काल आदेश दिया कि इन्हें बन्दी बनाकर लाओ! सिपाही गये और उन्हें पकड़कर लाये सिकन्दर के सामने। फिर भी वे निर्विकार खड़े हैं, न अभिवादन, न नमस्कार, कुछ भी नहीं। सिकन्दर ने कुपित दृष्टि से देखा और कहा- तुम नहीं जानते कि विश्व-विजेता सिकन्दर तुम्हारे सामने से जा रहा है, फिर तुम सम्मान नहीं करते, अभिवादन नहीं करते।’ बड़े आवेश में सिकन्दर ने कहा- तुम्हें पता नहीं चला? उन्होंने कहा- हमें क्या जरूरत है पता रखने की? तुम्हें पता नहीं कि मैं कौन हूँ? हमें क्या पता तुम कौन हो ! आदमी हो तुम, इतना ही पता है। मैं महान् सिकन्दर हूँ- सिकन्दर महान् । तुम्हें करना चाहिए था हमें सम्मान के साथ अभिवादन। वे बोले- क्यों करें हम अभिवादन? हमें तुमसे क्या लेना-देना है। मैं विश्व-विजयी हूं। क्यों करते हो विश्व विजय? इसीलिए न कि तुम्हारे मन में एक प्यास है, तृष्णा है और हमने उस तृष्णा को मिटा अनोखी कथाएँ

दिया है। जो तृष्णा तुम्हारे सिर पर सवार है, वह तृष्णा हमारे पैरों की दासी है और तुम हमारी उस दासी के दास हो, फिर हम क्यों नमस्कार करें तुम्हें? बात सिकन्दर के मन में इतनी चुभ गयी कि सारा गर्व चूर हो गया। उसने तत्काल उन्हें मुक्त कर दिया। तथा क्षमा मांगी।

आपत्ति

ब्रिटिश असेम्बली में सर जोन्स का भाषण चल रहा था। ब्रिस्टल चर्चिल अपनी कुर्सी पर बैठे असहमति भाव से अपना सिर हिला रहे थे। जोन्स ने कहा- स्पीकर महोदय! जो कुछ मैं कह रहा हूँ वो मेरे व्यक्तिगत विचार हैं, फिर चर्चिल साहब इनकार की मुद्रा में अपना सिर क्यों हिला रहे हैं? चर्चिल ने तुरन्त खड़े होकर कहा- महोदय! मिस्टर जोन्स अपने व्यक्तिगत विचार प्रकट कर रहे हैं और मैं अपना व्यक्तिगत सिर हिला रहा हूँ तो उन्हें क्यों आपत्ति है?

सोने की सीमा

एक बुढ़िया ने ढाबा खोल रखा था। जो यात्री

आते-जाते, उन्हें भोजन करती और रात्रि को विश्राम के अनोखी कथाएँ

लिए स्थान की व्यवस्था करती। एक यात्री आया। ठहरा। भोजन किया। सोने का समय हुआ। उसने पूछा- क्या लोगी? बुढ़िया ने कहा-खाट पर सोने के चार आने। उसने सोचा- खाट पर सोने के चार आने लगेंगे। वह व्यर्थ का खर्च है। नीचे आंगन में लेट जाऊंगा। उसने कहा- मुझे खाट नहीं चाहिए। मैं तो ऐसे ही लेट जाऊंगा। बुढ़िया ने कहा- आंगन में लेटोगे तो एक रुपया। बड़ी अजीब बात कि खाट के चार आने और आंगन पर लेटने का एक रुपया। यह बात समझ में नहीं आयी। बुढ़िया ने कहा- खाट की सीमा है कि तुम इतना स्थान रोकोगे। नीचे लेटोगे तो पता नहीं सारा आंगन ही रोक लोगे मेरा। कहां सोओगे, कोई सीमा ही नहीं है।

मन की परिणति

राजा की सवारी निकल रही थी। सर्वत्र जय-जयकार हो रहा था। सवारी बाजार के मध्य से गुजर रही थी। राजा की दृष्टि एक व्यापारी पर पड़ी। वह चन्दन का व्यापार करता था। राजा ने व्यापारी को देखा। मन में घृणा और ग्लानि उभर आयी। उसने मन-ही-मन

सोचा- ‘यह व्यापारी बुरा है। इसे मृत्युदंड दे देना चाहिए।’ नगर-परिभ्रमण कर राजा महलों में पहुंचा। मंत्री को बुलाकर कहा- मंत्रीवर ! न जाने क्यों उस अनोखी कथाएँ

व्यापारी को देखकर मेरा मन उद्विग्न हो गया और मन में आया कि उसको मार डाला जाये। मंत्री ने कहा- राजन्! मैं सारी व्यवस्था करता हूं। मंत्री उस व्यापारी के पास गया। औपचारिक बातें हुई। व्यापारी ने कहा- ‘मंत्रीवर्य ! चन्दन का भाव प्रतिदिन कम होता जा रहा है। मेरे पास चन्दन का बहुत संग्रह है। लाखों रुपयों का घाटा हो रहा है। मन आकुल-व्याकुल है, चिन्ता से भरा है। राजा के सिवाय चन्दन को कौन खरीदे? राजा भी क्यों खरीदेगा? यह प्रतिदिन काम में आने वाली वस्तु नहीं है। यह तो मरणवेला में प्रचुर मात्रा में काम आती है। मैं घाटे से दबा जा रहा हूं। सच कहूं, आज जब राजा की सवारी निकल रही थी तब राजा को देखकर मेरे मन में आया कि यदि आज राजा की मृत्यु हो जाये तो मेरा सारा चन्दन बिक जाये, अच्छे मूल्य में बिक जाये।’

मंत्री ने सुना। राजा के उदास होने या व्यापारी को मृत्युदंड देने की भावना के जागने का रहस्य समझ गया। मंत्री ने व्यापरी से कहा- हमें चन्दन की आवश्यकता है। तुम्हारे पास जितना चन्दन हो, वह हमारे पास भेज देना। राजकोष से उसका मूल्य मंगवा लेना।

व्यापारी यह सुनकर प्रफुल्लित हो गया। उसका मन आनन्द से भर गया। उसके मन में आया कि राजा चिरायुं हो। वह कृपालु है। वह हजार वर्ष जीये।

अनोखी कथाएँ

राजा की मरण-कामना करने वाला व्यापारी राजा को आशीष देने लगा। उसके लम्बे जीवन की सतत कामना करने लगा।

कुछ समय बीता। एक दिन राजा पुनः नगरावलोकन के लिए निकला। उसी व्यापारी की ओर उसकी दृष्टि गयीं मन में सोचा—कितना भला लगता है यह आदमी! ऐसे अच्छे आदमियों से ही हमारे नगर की शोभा है, श्री है। व्यापारी की भावना के साथ-साथ राजा की भावना भी बदल गयी। यह है भावों की परिणति। दोनों ने आपस में बातचीत नहीं की, पर अशब्द के शब्द ने सब कुछ बता डाला।

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दरवाजे पर लिखा

आदमी एक होटल में ठहरा। कमरे में गया। सारी खिड़कियां खोल कर बैठ गया। खिड़की से बन्दर आ गया। आदमी ने उसे निकाला। थोड़े समय पश्चात् वह वापस आ गया। एक नहीं, अनेक बन्दर आने-जाने लगे। वह परेशान हो गया। वह मैनेजर के पास जाकर बोला— बन्दर बहुत परेशान कर रहे हैं। कैसे रहा जा सकता है यहां? मैनेजर बोला— चिंता मत करो। बिना अनुमति लिए दरवाजे से कोई अन्दर नहीं आ सकता, मैंने दरवाजे पर लिख दिया है।

अनोखी कथाएँ

घर की प्रतीक्षा

एक शराबी सड़क के किनारे खड़ा था। वह नशे में धुत्त था। पुलिस ने पूछा— यहां क्यों खड़े हो? उसने कहा— मेरे सामने पूरा नगर घूम रहा है। ज्यों ही मेरा घर आएगा, मैं घर में घुस जाऊंगा। घर की प्रतीक्षा में खड़ा हूं। -०-

मैं मेरे भाग्य का स्वामी हूँ

एक ज्योतिषी हस्त रेखाओं का जानने वाला,

सुकरात के पास आया और बोला— ‘मैं आपका हाथ देखना चाहता हूँ और आपके भविष्य की घोषणा करना चाहता हूं।’ सुकरात ने कहा— ‘ज्योतिषी! मेरा भाग्य पलट चुका है। मैं मेरे भाग्य का निर्माता बन गया हूं। जब जैसा चाहूं वैसा पलट सकता हूं। तुम क्या देखोगे मेरी कुंडली को और क्या देखोगे मेरी हस्तरेखा को! मैं अपने भाग्य का स्वामी हूं।’

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डबल रोटी खाना

कोई कमजोर आदमी था, बीमार था, पूरा पचा नहीं पा रहा था। डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने कहा— ‘तुम और खाना एक बार छोड़ दो, केवल डबलरोटी खाओ।’ अनोखी कथाएँ

उस आदमी ने किसी से पूछा कि ‘भई ! डबल रोटी का क्या मतलब होता है?’ रोटी तो वह जानता था। उसे डबल का अर्थ बताना-दूना। घर आया। रोज चार रोटी खाता था। पत्नी से बोला- ‘आज आठ रोटी खिलाना। डॉक्टर ने डबल रोटी खाने को कहा है।’

तुम एक काम करो

कोई संन्यासी था। बड़ा आश्रम था। बहुत धन और बहुत लोगों की भीड़। वह परेशान हो गया। गुरु के पास जाकर बोला, ‘गुरुदेव ! और तो सब ठीक है, पर एक बड़ी समस्या है। भीड़ बहुत हो जाती है, इतने लोग आते हैं कि मैं अपनी साधना पूरी तरह नहीं कर पाता, समय नहीं मिलता। रात-दिन चक्र-सा चलता है।’ गुरु ने कहा, ‘तुम एक काम करो, गरीब लोग आयें तो उनको कर्ज देना शुरू कर दो और जो धनवान लोग आयें तो उनसे मांगना शुरू कर दो।’ उपाय हाथ लग गया। उसने प्रयोग करना शुरू कर दिया- जो निर्धन आते, उन्हें कर्ज देना शुरू किया और धनी आते उनसे धन मांगना शुरू किया। पांच-दस दिन में भीड़ बिलकुल छंट गयी। क्योंकि जिन्होंने कर्ज लिया वे वापस किसलिए आते? सामने आना नहीं चाहते थे, क्योंकि वापस तो देना नहीं था, मुफ्त में मिला है। और धनियों से मांगना शुरू किया अनोखी कथाएँ

तो उन लोगों ने सोचा कि अब तो जाना ठीक नहीं है। जाते ही पहले यह होगा कि ‘लाओ-लाओ’। भीड़ कम हो गयी।

आप हंस रहे हो।

एक संन्यासी को किसी सन्देहवश दंड मिला। राजा ने दंड दिया कि कोड़े लगाये जाएं। पतला-दुबला था बूढ़ा संन्यासी। अब कोड़े लगने लगे। इधर कोड़ों की सजा समाप्त हो गयी। एक आदमी देख रहा था, पूछा, ‘महाराज! आपके इस क्षीण, जर्जर शरीर पर कोड़े बरस रहे थे और आप मुस्करा रहे थे। यह क्या है? आपके शरीर में कहा ताकत है, कहां शक्ति है कि उनको सह सकें? फिर भी आप हंस रहे थे।’ संन्यासी बोला, ‘विपदा को शरीर-बल से नहीं सहा जा सकता। उसे सहा जाता है - आत्मबल से।’ फिर प्रश्न पूछा, ‘महाराज ! रहस्य बतलाएं कि कैसे उपलब्ध होता है आत्मबल? उसका रहस्य क्या है, जानना चाहता हूं।’ संन्यासी बोला, 'अच्छे विचार से पैदा होता है आत्मबल । निरन्तर शुभ विचार किया जाए, पोजीटीव विचार किया जाए, विधायक विचार किया जाए, धनात्मक विचार किया जाए, अमंगल विचार कभी न किया जाए तो आत्मबल उत्पन्न होता है।

अनोखी कथाएँ

पप्पू की मां

एक शराबी था। शराब का बहुत बड़ा शौकीन। शराब पी ली पर डर था पत्नी को पता न चल जाए। शराब में धुत्त होकर आया। सोचा, आज पत्नी को बिल्कुल पता नहीं चलने दूंगा। पत्नी द्वार के पास खड़ी थी। वह घर में घुसा। घर में भैंस बंधी थी। वह भैंस के पास गया और पूंछ को पकड़कर बोला, ‘पप्पू की मां! तुम सदा तो दो चोटियां बनाती हो, आज तो तुमने एक ही चोटी बनायी है।’ पत्नी समझ गयी कि पतिदेव पीकर आये हैं। -o-

कार्य में मस्त

रवीन्द्रनाथ पत्र लिख रहे थे। एक व्यक्ति आया मारने के लिए। हाथ में छुरा था। आकर खड़ा हो गया। उन्होंने देखा कि कोई व्यक्ति आया है, देख लिया। अपना काम करते रहे। उन्होंने कहा, ‘क्या चाहते हो?’ उत्तर मिला, ‘मैं तुमको मारना चाहता हूं।’ रवीन्द्रनाथ ने कहा, ‘जरा ठहर जाओ। मुझे जरूरी पत्र लिखने हैं। पत्र लिख लूं, फिर तुम मार डालना’ वह पीछे खड़ा है छुरा लिये और रवीन्द्रनाथ अपना काम करते चले जा रहे हैं। निश्चल भाव से काम करते रहे। कोई विचलन नहीं। व्यक्ति दंग रह गया। उसने सोचा, यह भी कोई आदमी है, मैं कैसे अनोखी कथाएँ

मारूं? जो जीना जानता है उसे मारने से कोई लाभ नहीं। सामने आकर पैरों में पड़ गया और छुरा हाथ से गिर पड़ा। यह अभय उस व्यक्ति में विकसित होता है जिसने आन्तरिक शक्ति का स्रोत विकसित कर लिया हो। -o-

कुरूप ही कुरूप

एक गुरु के पास कोई डंडा था। उस डंडे की

विशेषता थी कि जिधर घुमाओ उधर उस व्यक्ति की सारी खामियां दीखने लग जाएं। अच्छा साधन मिल गया। शिष्य को दे दिया डंडा। कोई भी आता, शिष्य डंडा उधर कर देता। सब कुरूप-ही-कुरूप सामने दीखते। अब भीतर में कौन कुरूप नहीं है? हर आदमी कुरूप लगता। किसी में क्रोध ज्यादा, किसी में अहंकार ज्यादा, किसी में घृणा का भाव, किसी में ईर्ष्या का भाव, किसी में द्वेष का भाव, किसी में वासना की उत्तेजना। हर आदमी कुरूप लगता। बड़ी मुसीबत, कोई भी अच्छा आदमी नहीं आ रहा है। उसने सोचा- गुरुजी को देखूं, कैसे हैं? गुरु को देखा तो वहां भी कुरूपता नजर आयी। गुरु के पास गया और बोला कि महाराज! आप में भी यह कमी है, यह कमी है। गुरु ने सोचा कि यह मेरे ऊपर भी प्रयोग हो गया। मेरे अस्त्र का मेरे पर ही प्रयोग! बताता गया, कई दिन तक बताता गया। गुरु आखिर गुरु था।

  • अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -

:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3040.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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