अञ्जना पवनंजय नाटकम् | Anjana Pavananjaya Natakam - रूपककार हस्तिमल्ल कृत शास्त्रीय संस्कृत जैन नाटक

अञ्जना पवनंजय नाटकम्

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अनुक्रमणिका

उभयभाषा कवि चक्रवर्ती श्री हरिमल्लविरचितं
अञ्जना पवनञ्जयनाटकम्

ISBN 81-87362 20-0

हिन्दी अनुवाद
डॉ. रमेशचन्द जैन, एम. ए., पी. एच. डी.
डी. लिट्, जैनदर्शनाचार्य
अध्यक्ष, संस्कृत विभाग
वर्द्धमान कॉलेज, बिजनौर, उ. प्र.

प्रकाशक
आचार्य ज्ञानसागर वागर्थ विमर्श केन्द्र,
ब्यावर

प्रकाशकीय

चिरंतन काल से भारत मानस समाज के लिये मूल्यवान विचारों की खान बना हुआ है। इस भूमि से प्रकट आत्मविद्या एवं तत्व ज्ञान में सम्पूर्ण विश्व का नव उद्घाटित दृष्टि प्रदान कर उसे पतनोनुखी होने से बचाया है। इस देश से एक के बाद एक प्राणवान प्रवाह प्रकट होते रहे हैं। इस प्राणवान बहुमूल्य प्रवाहों की गति की अविच्छिन्नता में जैनाचार्यों का महान् योगदान रहा है। उन्नीसवीं शताब्दी में पाश्चात्य विद्वानों द्वारा विश्व की आदिम सभ्यता और संस्कृति के जानने के उपक्रम में प्राचीन भारतीय साहित्य की व्यापक खोजबीन एवं गहन अध्ययनादि कार्य सम्पादित किये गये। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ तक प्राच्यवाङ्मय की शोध, खोज व अध्ययन अनुशीलनादि में अनेक जैन-अजैन विद्वान् भी अग्रणी हुए। फलतः इस शताब्दी के मध्य तक जैनाचार्य विरचित अनेक अंगकारच्छादिक लुप्तप्राय ग्रन्थरल प्रकाश में आये इन महनीय ग्रन्थों ने मानव जीवन की युगीन समस्याओं को सुलझाने का अपूर्व सामर्थ्य है। विद्वानों के शोध-अनुसंधान-अनुशीलन कार्यों को प्रकाश में लाने हेतु अनेक साहित्यिक संस्थाएं उदित भी हुई, संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती आदि भाषाओं में साहित्य सागर अवगाहनरत अनेक विद्वानों द्वारा नवसाहित्य भी सृजित हुआ है, किन्तु जैनाचार्य-विरचित विपुल साहित्य के सकल ग्रन्थों के प्रकाशनार्थ/अनुशीलनार्थ उक्त प्रयास पर्याप्त नहीं है। सकल जैन वाङ्मय के अधिकांश ग्रन्थ अब भी अप्रकाशित हैं, जो प्रकाशित भी है तो शोधार्थियों को बहुपरिश्रमोंपरान्त भी प्राप्त नहीं हो पाते हैं। और भी अनेक बाचार्य/तपस्वीजन जैन ग्रन्थों के शोध-अनुसन्धान-प्रकाशन के माध्यम में है, अतः समस्याओं के समाधान के साथ-साथ विविध संस्थाओं-उपक्रमों के माध्यम से समेकित प्रयासों की आवश्यकता एक लम्बे समय से विद्वानों द्वारा महसूस की जा रही थी।

राजस्थान प्रान्त के महाकवि ब्र. भूरामल शास्त्री (आ. ज्ञानसागर महाराज) की जन्मस्थली एवं कर्म स्थली रही है। महाकव ने चार-चार संस्कृत महाकाव्यों के प्रणयन के साथ हिन्दी संस्कृत में जैन दर्शन सिद्धान्त एवं अध्यात्म के लगभग २५ ग्रन्थों की रचना करके अवरुद्ध जैन साहित्य-वाग्गोष्ठी के प्रवाह को प्रवर्तित किया। यह एक विविध संयोग कहा जाना चाहिये कि रणसिंद्ध कवि की काव्यरस धारा का प्रवाह राजस्थान की मरुधरा से हुआ। इसी राजस्थान के भाग्य से श्रमण परम्परोपोषक सन्तशिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज के सुशिष्य जिनवाणी के परमार्थ उद्घोषक, अनेक ऐतिहासिक उपक्रमों के समर्थ सूत्रधार, अध्यात्मयोगी युवामनीषी पू. मुनिश्री सुधासागर जी महाराज का यहाँ पदार्पण हुआ। राजस्थान की धरा पर राजस्थान के अमर साहित्यकार के समग्रकृति पर एक अखिल भारतीय विद्वत/संगोष्ठी सांगानेर में दिनांक ९ जून से ११ जून, १९९५ तथा अजमेर नगर में महाकवि महनीय कृति “वीरौदय” महाकाव्य पर अखिल भारतीय विद्वत् संगोष्ठी दिनांक १३ से १५ अक्टूबर १९९५ तक आयोजित हुई व इसी सुअवसर पर दि. जैन समाज, अजमेर ने आचार्य ज्ञानसागर के सम्पूर्ण २५ ग्रन्थ मुनिश्री के १९९५ के चातुर्मास के दौरान प्रकाशित कर/लोकार्पण कर अभूतपूर्व ऐतिहासिक काम करते श्रुत की महत प्रभावना की। पू. मुनि श्री के सानिध्य में आयोजित इन संगोष्ठियों में महाकवि के कृतित्व पर अनुशीलनात्मक आलोचनात्मक, शोधग्रन्थों के वाचन सहित विद्वानों द्वारा जैन साहित्य के शोध क्षेत्र में अवगत अनेक समस्याओं पर चिन्ता व्यक्त की गई तथा शोध छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान करने, शोधार्थियों को शोध विषय सामग्री उपलब्ध कराने, ज्ञानसागर वाङ्मय सहित सकल जैन

प्रस्तावना

आर्यों पर प्रख्यात अधिकारी विद्वानों द्वारा निबन्ध लेखन - प्रकाशनादि के विद्वानों द्वारा प्रस्ताव आये। इसके अनन्तर मास 22 से 24 जनवरी तक 1995 में ब्यावर (राज.) में मुनिश्री के संघ सान्निध्य में आयोजित " आचार्य ज्ञानसागर राष्ट्रीय संगोष्ठी" में पूर्व प्रस्तावों के क्रियान्वयन की जोरदार माँग की गई तथा राजस्थान के अमर साहित्यकार, सिद्धसारस्वत महाकवि ब्र. भूरामल जी की स्टेच्यू स्थापना पर भी बल दिया गया, विद्वत् गोष्ठियों में उक्त कार्यों के संयोजनाचार्य डॉ. रमेशचन्द्र जैन बिजौली और सहसंयोजक क्षमा गणा। ब्यावर नगर के अनेक उदार दाताओं के उक्त कार्यों हेतु मुक्त हृदय से सहयोग प्रदान करने के भाव व्यक्त किये।

दिनांक 18.3.95 को त्रैलोक्य तिलक महामण्डल विधान के शुभप्रसंग पर सेठ चम्पालाल रामस्वरूप को नसियाँ में जनोदय महाकाव्य (2 खण्डों में) के प्रकाशन सौजन्य प्रदाता आर. के. मार्बल्स किशनगढ़ के रतनलाल केवललाल पाटनी श्री अशोक कुमार जी एवं जिला प्रमुख श्रीमान् पुखराज पहाड़िया, पोसींगण के करकमलों द्वारा इस संस्था का श्रीगणेश आचार्य ज्ञानसागर वागर्थ विमर्श केन्द्र के नाम से किया गया।

आचार्य ज्ञानसागर वागर्थ विमर्श केन्द्र के माध्यम से जैनाचार्य प्रणीत ग्रन्थों के साथ जैन संस्कृति के प्रतिपादक ग्रन्थों का प्रकाशन किया जायेगा एवं आचार्य ज्ञानसागर वाङ्मय का व्यापक मूल्यांकन-समीक्षा-अनुशीलनादि कार्य कराये जायेंगे। केन्द्र द्वारा जैन विद्या पर शोध करने वाले शोधार्थी छात्र हेतु 10 छात्रवृत्तियों की भी व्यवस्था की जा रही है।

केन्द्र का अर्थ प्रबन्ध समाज के उदार दातारों के सहयोग से किया जा रहा है। केन्द्र का कार्यालय सेठ चम्पालाल रामस्वरूप की नसियाँ में प्रारम्भ किया जा चुका है। सम्प्रति 10 विद्वानों को विविध विषयों पर शोध निबन्ध लिखने हेतु प्रस्ताव भेजे गये, प्रस्तावना का विषय है 25 विद्वान् अपनी स्वीकृति प्रदान कर चुके हैं तथा केन्द्र स्थापना के प्रथम मास में ही निम्न पुस्तकें प्रकाशित की -

प्रथम पुष्प - इतिहास के पन्ने आचार्य ज्ञानसागर जी द्वारा रचित
द्वितीय पुष्प - हिल सम्पादक आचार्य ज्ञानसागरजी द्वारा रचित
तृतीय पुष्प - तीर्थ प्रवर्तक मुनिश्री सुधासागरजी महाराज के प्रवचनों का संकलन
चतुर्थ पुष्प - जैन राजनैतिक चिन्तन धारा डॉ. श्रीमती विजयलक्ष्मी जैन
पंचम पुष्प - अज्जणा पवनंजयनाटकम संस्कृत भाषा में हस्तिमल्ल द्वारा रचा गया है। जिसका हिन्दी अनुवाद डॉ. रमेशचन्द्र जैन-बिजौली द्वारा किया गया है। यह अनुवाद आधुनिक हिन्दी सरल भाषा में किया गया है।

अस्तु।

अरुण कुमार शास्त्री,
ब्यावर

‘श्री वीतरागाय नमः’

प्रस्तावना

दिगम्बर जैन ऐतिहासिक कथाओं के आधार पर संस्कृत नाटकों की रचना करने वालों में रूपककार हस्तिमल्ल का प्रथम स्थान है। उन्होंने अनेक नाटकों की रचना की होगी, किन्तु वर्तमान में मैथिली कल्याण, विक्रान्त कौरव, अज्जणा पवनंजय और सुभद्रा (नाटिका) ये चार नाटक ही प्राप्त होते हैं। कुछ लोगों के अनुसार उन्होंने ‘अर्जुनराज नाटक’ नामक एक अन्य नाट्य ग्रन्थ की रचना की थी। भरतराज और मेघेश्वर नामक नाटक भी इनके द्वारा रचे गए कहे जाते हैं। तथापि इनके लेखक का नाम हस्तिमल्ल के स्थान पर हस्तिमल्लपेण हुआ हुआ है। चूंकि हस्तिमल्लपेण नामक दूसरे नाटककार का पता अब तक नहीं चला है, इसलिए ये नाटक इन्हीं हस्तिमल्ल द्वारा लिखित होना चाहिए। विक्रान्त कौरव का दूसरा नाम नायक मेघेश्वर (जयकुमार) के कारण मेघेश्वर हो सकता है।

हस्तिमल्ल कन्नड और संस्कृत के प्रौढ़ विद्वान् थे। कन्नड आदिपुराण की भूमिका में कवि ने अपने आपको ‘उभयभाषाकवि चक्रवर्ती’ कहा है। हस्तिमल्ल द्वारा लिखित श्रीपुराण को अनेक प्रतियों को उपलब्ध होने के कारण भी यही है।

हस्तिमल्ल का समय - हस्तिमल्ल के समय की अवधि नौवीं शताब्दी ईसवी से पूर्व की नहीं हो सकती; क्योंकि नौवीं शताब्दी में हुए आचार्य जिनसेन के आदिपुराण के आधार पर हस्तिमल्ल ने विक्रान्तकौरव नाटक और सुभद्रा नाटिका की रचना की थी?

हस्तिमल्ल के समय की उत्तरावधि चौदहवीं शताब्दी मानी जा सकती है; क्योंकि अय्यचार्य के जिनकल्याणोदय में हस्तिमल्ल का उल्लेख है। जिनेंद्र कल्याणोदय की रचना शक संवत् 1241 (वि. सं. 1376) में पूर्ण हुई थी।

स्व. नाथूराम प्रेमी का कहना है कि श्री जुगलकिशोर मुख्तार ने ब्रह्मसूरि को 15वीं शती का विद्वान् माना है, ब्रह्मसूरि हस्तिमल्ल के पौत्र के पौत्र थे। ब्रह्मसूरि हस्तिमल्ल के 100 वर्ष बाद हुए होंगे। अतः हस्तिमल्ल 14वीं शती में हुए है।

डॉ. ज्योतिप्रसाद जैन ने हस्तिमल्ल का समय 1250 स्वीकार किया है।

हस्तिमल्ल द्वारा रचित अज्जणपवनंजय नाटक की एक हस्तलिखित प्रति में नाटक की समाप्ति के पश्चात् प्रभेन्दुमुनि की नमस्कार किया गया है, इसी प्रकार समुद्र नाटिका की दो पाण्डुलिपियों की प्रशस्ति में प्रभेन्दु मुनि का उल्लेख वर्तमान काल को लट् लकार में

  1. डॉ. कस्तुरेलाल जैन शास्त्री: रूपककार हस्तिमल्ल : एक समीक्षात्मक अध्ययन पृ. 33
  2. मैसूरैकवि विस्मरणयति गुणान सोमप्रभय - विक्रान्त कौरव पृ. 28
  3. इयमुभयभाषा चक्रवर्ती हस्तिमल्लविरचित पूर्वपुराण महाकथायां दशम पर्वम्।
  4. कन्नड प्रान्तीय ताडपत्रीय ग्रन्थ सूची पृ. 148-149.
  5. जैन साहित्य और इतिहास पृ. 265
  6. The Jain sources of history of India page 228

है। सन् 1131 में विष्णुवर्द्धन राजा की पत्नी शान्तला ने समाधिमरण किया था, उस समय प्रभेन्दु या प्रभाचन्द्र उपस्थित थे। हस्तिमल्ल ने उन्हें योगिराज कहा है। उस समय वे वृद्ध हो गए होंगे। इस प्रकार हस्तिमल्ल का जन्म लगभग 1160 ई. होना चाहिए।

अप्पयार्य नामक विद्वान् ने जो प्रतिष्ठा पाठ शक संवत् 1241 (ई. 1320) में लिखा था, उसमें उन्होंने आरम्भिक प्रशस्ति में पं. आशाधर और हस्तिमल्ल का उल्लेख किया है। इस प्रकार हस्तिमल्ल आशाधर के समकालीन माने जा सकते हैं। पं. आशाधर का अन्तिम ग्रन्थ अणगार धर्मामृत है, जो संवत् 1300 (1244 ई.) में समाप्त हुआ था।

हस्तिमल्ल का जन्म स्थान - ब्रह्मसूरि के प्रतिष्ठा सारोद्धार की प्रशस्ति से तीर्थहल्लि का परिचय दिया गया है। इसके आसपास हस्तिमल्ल का निवास होना चाहिए। यह स्थान हुम्मच हो सकता है। प्रशस्ति में के गुम्मटवन द्वीप के नाम से इस स्थान का उल्लेख हुआ है। यहाँ वृषभेश्वर मंदिर था। हुम्मच में वीर सान्तर या सान्तर वंशी राजाओं द्वारा 11वीं शती के अनेक मन्दिर हैं। उनमें जैन मठ के सामोव का आदिनाथ (वृषभेश्वर) का मन्दिर विशेष उल्लेखनीय है। सान्तर वंशी जिनदत्त के पुत्र तोलपुरुष विक्रम सान्तर ने हुम्मच में एक वसदि बनवायी थी, उसमें भगवान् बाहुबलि की मूर्ति प्रतिष्ठित करायी थी, उस वसदि का नाम रुद्ध (या गुद्ध) था।
मार्गदर्शक : अञ्जन पन्नवञ्जय नाटक की प्रशस्ति में लिखा गया है कि हस्तिमल्ल कर्नाटक की भूमि में संतराम में रहते थे और वह सत्तरग्राम जैनगारों से युक्त था।

वंश परम्परा

हस्तिमल्ल गोविंद के पुत्र थे। गोविंद का उल्लेख उन्होंने चारों नाटकों की प्रस्तावना में किया है। उनको विदुषा का मुकुट भृंगार, भट्टारक, भट्ट या स्वामी शब्द नाम के पूर्व जुड़ा हुआ है। गोविंद प्रारम्भ में जैन नहीं थे। वे समन्तभद्राचार्य के देवागम स्तोत्र को सुनकर जैन हुए थे। गोविंद यत्सगोत्रीय थे। विक्रान्त कौरव की प्रशस्ति के अनुसार वे 63 शलाका पुरुषों के चरित्र का वर्णन करने वाले उत्तरपुराण के रचयिता गुणभद्र की परम्परा में उत्पन्न हुए थे। गुणभद्र आचार्य जिनसेन के शिष्य थे। जिनसेन के गुरु बहुश्रुत विद्वान् वीरसेन थे।

वीरसेन आचार्य समन्तभद्र के दो प्रधान शिष्य शिवकोटि और शिवायन की आध्यात्मिक परम्परा में उत्पन्न हुए थे। इस प्रकार हस्तिमल्ल को गुरु परम्परा आचार्य समन्तभद्र तक जाती है। हस्तिमल्ल के पिता के सुदूर पूर्ववर्ती गुरु समन्तभद्र थे।

हस्तिमल्ल अपने पिता के छह पुत्रों में एक थे। विक्रान्त कौरव की अन्तिम प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि वे सभी दाक्षिणात्य थे। सभी कवि और विद्वान् थे। उनके नाम ये हैं - श्री कुमार कवि, सत्यवाक्य, देवरत्नल्लभ, उदयभूषण, हस्तिमल्ल और वर्द्धमान। अञ्जना पन्नवञ्जय तथा मैथिलीकल्याण की प्रस्तावना तथा चारों नाटकों के अन्त की पुष्पिका में हस्तिमल्ल के भाईयों के विषय में यही सूचना दी गयी है। मैथिली कल्याण नाटक की प्रस्तावना के अनुसार सत्यवाक्य ने श्रीमती और दूसरी कृतियाँ लिखीं।

शरभपुर पाण्ड्य राजा के द्वारा छोड़े हुए एक मतवाले हाथी को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से वश में करने के कारण हस्तिमल्ल यह नाम पड़ा। विक्रान्त कौरव के प्रथम अङ्क

के चालीसवें पद्य में कहा गया है कि हाथी से मुठभेड में जीतने से पाण्ड्य राजा ने सौ श्लोकों में उनकी उपलब्धि का गुणगान कर गौरवान्वित किया। इस प्रकार लेखक की उपाधि हस्तिमल्ल थी। इस बात का पता नहीं चलता कि हाथी को पराजित करने से पूर्व उनका असली नाम क्या था ? अप्पयार्य ने हाथी सम्बन्धी घटना का उल्लेख जिनेन्द्र कल्याण चम्पू में किया है। नेमिचन्द्र या ब्रह्मसूरि के प्रतिष्ठातिलक के अनुसार हस्तिमल्ल अपने विरोधी रूपी गज को पराजित करने वाले सिंह थे। इससे यह बात सन्देहास्पद लगती है कि हस्तिमल्ल नाम पागल हाथी को वश में करने के कारण पड़ा था, अपितु इससे यह द्योतित होता है कि शास्त्रों में सुप्रसिद्ध विरोधी विद्वानों को पराजित करने के कारण वे हस्तिमल्ल कहलाए।

अपने कुछ नाटकों की प्रस्तावना में हस्तिमल्ल ने अत्यधिक आत्मश्लाघा की है। वे अपने आपको सरस्वती का स्वयंघृत पति तथा कविश्रेष्ठ कहते हैं। मैथिली कल्याण नाटक में उनके बड़े भाई सत्यवाक्य उन्हें कविता साम्राज्य लक्ष्मीपति कहते हैं। अञ्जना पन्नवञ्जय के अन्त में एक पद्य है, जहाँ लेखक को कविकल्पलता कहा गया है। मैथिली कल्याण नाटक की प्रशस्ति में उन्हें विभिन्न विषम बुद्धि सृष्टि रत्नाकर और दिष्ट प्रथित विभवकीर्ति कहा गया है। एक पद्य में उन्हें ‘मुक्तिरत्नाकर’ नाम को प्राप्त कहा गया है। अप्पयार्य हस्तिमल्ल को अशोकचक्रराज चक्रवर्ती कहते हैं इन सब विशेषणों से स्पष्ट द्योतित होता है कि हस्तिमल्ल को उनके समकालीन और पश्चाद्वर्ती द्वारा क्या प्रतिष्ठा प्राप्त थी।

प्रतिष्ठा तिलक के रचयिता ब्रह्मसूरि (या नेमिचन्द्र) जो कि हस्तिमल्ल के वंश से सम्बन्धित है, के अनुसार हस्तिमल्ल के एक पुत्र था, जिसका नाम पार्श्व पण्डित था। श्रीमन्नोहलशास्त्री का कहना है कि राजबल्ली कथा के अनुसार हस्तिमल्ल के अनेक पुत्र थे, जिनमें पार्श्वपण्डित सबसे बड़े थे। उनके एक शिष्य का नाम लोकचालार्य था। किसी कारण पार्श्व पण्डित होयसल राज्य के अन्तर्गत छत्रपुर में अपने सम्बन्धियों के साथ आकर रहने लगे। उनके तीन पुत्र थे चन्द्रप, चन्द्रनाथ तथा विजय्य। चन्द्रनाथ और उसका परिवार हेमबाल में रहा, जबकि अन्य भाई अन्यत्र चले गए। ब्रह्मसूरि चन्द्रप के पौत्र थे। चन्द्रप हस्तिमल्ल के पौत्र थे। हस्तिमल्ल गृहस्थ थे, वे मुनि नहीं हुए थे। नेमिचन्द्र के प्रतिष्ठातिलक में उन्हें गृहाश्रमी कहा है।

अञ्जनापवनञ्जय नाटक की कथावस्तु

इस नाटक में विद्याधर राजकुमारी अञ्जना का स्वयंवर तथा उसका विद्याधर राजकुमार पवनञ्जय के साथ विवाह वर्णित है। उन दोनों के हनुमान् का जन्म होता है। प्रथम अङ्क- महेन्द्रपुर में अञ्जना के स्वयंवर की तैयारी हो रही है। विद्याधर राजा प्रह्लाद के पुत्र नामक पवनञ्जय ने एक बार नायिका अञ्जना को देखा था और वह उसे प्रेम करने लगा था। अञ्जना अपनी सखी वसन्तसेना और परिचारिका मधुकरीका तथा मालविका के साथ प्रवेश करती है। उनकी बातचीत का विषय आगामी स्वयंवर और उसका परिणाम है। बालिकाएँ एक कृत्रिम स्वयंवर का अभिनय करती हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि वसन्तमाला, जो कि अञ्जना का अभिनय कर रही है, पवनञ्जय बनी हुई अञ्जना के गले में माला पहिना देती है। पवनञ्जय, जो कि अपने मित्र प्रमितदत्त (विदूषक) के साथ इस दृश्य को छिपकर देख रहा था, अब आगे आ जाता है और अञ्जना का हाथ पकड़ लेता है, किन्तु अञ्जना को माँ उसे स्नान के लिए बुला लेती है और वह अपनी सखियों के साथ चली जाती है। पवनञ्जय और विदूषक भी भोजन करने चले जाते हैं।

द्वितीय अङ्क

स्वयंप्रभ के सुका है तथा अञ्जना पवनंजय को अपने पति के रूप में वरण कर लेती है। विवाह के बाद अञ्जना तथा उसकी सखी वसन्तमाला पवनंजय के पिता राजा प्रहलाद की राजधानी आदिलपुर में आती है, उनका यथोचित आदर होता है।

पवनंजय और अञ्जना प्रमदवन में बहुलधान में भ्रमण करते हैं। उन दोनों में प्रेमलाप होता है। पवनंजय को अपने पिता प्रहलाद के मन्त्री विजयशर्मन् से यह ज्ञात होता है कि राजा प्रह्लाद वरुण के विरुद्ध युद्ध करने के लिए प्रयाण करने वाले हैं। वरुण, रावण दक्षिण समुद्र में स्थित लङ्का के राजा रावण का शत्रु है और पश्चिम समुद्र में ठहरा हुआ है। उसने रावण के दो सेनानायकों को बन्दी बना लिया है।

दोनों सेनानायकों को छुड़ाने के लिए रावण की प्रार्थना पर प्रहलाद को जाना है। उनकी इच्छा है कि उनकी अनुपस्थिति में पवनंजय को राजधानी की रक्षा करना है, किन्तु अन्त में पवनंजय स्वयं को वरुण के विरुद्ध प्रयाण करने हेतु तैयार कर लेते हैं।

तृतीय अङ्क

वरुण और पवनञ्जय में चार माह से युद्ध हो रहा है। पवनंजय वरुण को शीघ्र और अचानक हराने के लिए धीरे धीरे युद्ध कर रहे हैं। उन्हें आशङ्का है कि रावण के दोनों सेनानायकों का जीवन खतरे में न पड़ जाय। पवनंजय दिन भर अपनी सेना का निरीक्षण करने के बाद कुमुदनी तीर पर विश्राम कर रहे हैं।

चन्द्रमा पूर्व में उदित हो रहा है। पवनंजय एक चक्रवाकी को देखते हैं, जो कि चक्रवाक के वियोग में व्याकुल हो रही है। तत्काल उन्हें अञ्जना की याद आ जाती है। वह प्रेम के कारण बहुत व्याकुल हो जाते हैं। अन्त में वे शीघ्र ही विमानाद पर्वत पर जाकर अञ्जना से शीघ्र ही उसके महल में गुप्त रूप से मिलने का निश्चय कर लेते हैं। एक विमान में बैठकर वे आदिलपुर पहुँचते हैं और वहाँ अञ्जना के महल में प्रविष्ट हो रात्रि उसके साथ बिताते हैं तथा दूसरे दिन प्रातःकाल युद्धभूमि में लौट आते हैं।

चतुर्थ अङ्क

वसन्तमाला के स्वायत्त कथन तथा केतुमती की परिचारिका युक्तिमती के साथ उसकी बातचीत से हमें ज्ञात होता है कि पवनंजय को अञ्जना से गुप्त रूप से मिले हुए चार माह बीत गए हैं। अञ्जना में गर्भ के लक्षण प्रकट होने लगे हैं। दोनों पवनंजय की माँ केतुमती की प्रतिक्रिया के विषय में चिन्तित हैं। वे आशा करती हैं और प्रार्थना करती हैं कि केतुमती अञ्जना के प्रति क्रूर और कठोर नहीं होगी। वसन्तमाला गर्भ का औचित्य सिद्ध करने के लिए युक्तिमती से पवनंजय के चार मास पूर्व आकर चले जाने की बात बता देती है। केतुमती पवनंजय के आने का विश्वास न करके अञ्जना को शराबी क्रूर भैरव के द्वारा निर्वासित करा देती है और उसके पिता राजा महेन्द्र के यहाँ भिजवा देती है, किन्तु अञ्जना को जो लाञ्छन लगाकर भेजा था, उसके कारण वह पिता के यहाँ न जाकर मार्ग में भूध्रखाट वीथि में उतर जाती है। क्रूर भैरव से कह देती है कि तुम कह देना कि हम महेन्द्रपुर में छोड़ आये हैं और हम वहाँ चले जायेंगे।

पञ्चम अङ्क

पवनंजय अन्त में वरुण को पराजित कर रावण के दोनों सेनानायक खर और दूषण को मुक्त करा देते हैं। वरुण के साथ मैत्री की सन्धि कर पवनंजय विद्याधरों के साथ विजयार्द्ध को लौट रहे हैं। पवनंजय और विदूषक विजयार्द्ध पर आकर अपने विमान से रत्नशिखर पर उतरते हैं। पवनंजय को अपनी माँ सुफिमती, जो कि उनका स्वागत करने के लिए आयी थी, से पता चलता है कि अञ्जना गर्भवती है और अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए महेन्द्रपुर गई है। पवनंजय अब सर्वप्रथम महेन्द्रपुर जाकर अञ्जना से मिलने का निश्चय करता है। कालमेघ नामक हाथी पर सवार होकर पवनंजय और विदूषक महेन्द्रपुर की ओर प्रस्थान करते हैं। रास्ते में वे सरोवरसरसी के किनारे ठहरते हैं। सरोवरसरसी नाभिगिरि पर स्थित है। पवनंजय को एक वन्यक तथा उसकी पत्नी मिलती है। उनके वर्णन से वे निश्चय करते हैं कि अञ्जना और वसन्तमाला एक भयानक दिखाई देने वाले व्यक्ति के साथ महेन्द्रपुर की ओर गई हैं। यह व्यक्ति केतुमती के निर्देशानुसार उन्हें महेन्द्रपुर ले जाना चाहता था। अञ्जना ने अपने माता-पिता के यहाँ जाने से मना कर दिया तथा वन्य क्षेत्र में रहना पसन्द किया। वह और उसकी सखी मालूम मालिनी वन में प्रविष्ट हो गई है। यह सुनकर पवनंजय मूर्छित हो जाता है। पुनः चेतना आने पर वह अपनी प्रिय पत्नी के लिए विलाप करता है। वह अत्यधिक तनावग्रस्त हो जाता है और उसी वन में प्रविष्ट होता है, जहाँ अञ्जना गयी है। वह विदूषक को विजयार्द्ध पर्वत से विद्याधरों को अञ्जना की खोज के लिए बुलाने हेतु भेजता है। वह अपने हाथी कालमेघ के साथ गहन वन में प्रविष्ट हो जाता है।

षष्ठ अङ्क

गन्धर्वराज मणिचूड तथा उसकी पत्नी रत्नचूडा से ज्ञात होता है कि अञ्जना उनके संरक्षण में रह रही है तथा उसने एक पुत्र को जन्म दिया है। वह अपने पति के वियोग के कारण अत्यधिक दुःखी है।

पवनंजय, जो कि अञ्जना के वियोग में पागल हो गया है, माङ्गमालिनी वन में घूम रहा है। वह चेतन और अचेतन सभी वस्तुओं से अञ्जना का समाचार देने की प्रार्थना करता है। किसी जानकारी के अभाव में अत्यधिक हताश होकर वह किसी चन्दन वृक्ष के नीचे बैठ जाता है। उसकी वाणी अवरुद्ध हो गयी है तथा आँखें आँसुओं से भीगी हुई हैं तथा मन अत्यधिक घबड़ाया हुआ और तनावग्रस्त है।

प्रतिसूर्य, जिसे प्रहलाद ने पवनंजय की खोज में भेजा था, उसे मकरन्द वाटिका के किनारे की लताओं के बीच पाते हैं। वह गहरा ध्यान लगाए हुए था, उसके नेत्र बन्द थे तथा शरीर भावनाओं के कारण रोमाञ्चित हो रहा था। प्रतिसूर्य यह निश्चय कर लेता है कि स्थिति में केवल अञ्जना ही पवनंजय को प्रसन्न कर सकती है तथा उसकी चेतना वापिस आ सकती है। अतः वह घर वापिस आता है तथा अञ्जना और वसन्तमाला (जो कि उसके साथ रह रही थी) को भेजता है। चन्दन लताओं के मध्य प्रविष्ट हुए पवनंजय को देखकर अञ्जना उसके समीप शीघ्रता से जाकर उसका आलिङ्गन कर लेती है। पवनंजय अञ्जना को देखकर अत्यधिक प्रसन्न होता है। प्रतिसूर्य जो कि मणिचूड को पवनंजय के मिलने का समाचार देने गया हुआ था, अब पवनंजय से मिलने आता है। पवनंजय अपनी प्रिय पत्नी के मामा से मिलकर अत्यधिक प्रसन्न होते हैं।

सप्तम अङ्क

अदितिपुर के राजभवन में मौर्यराज्याभिषेक की तैयारी हो रही है। पवनंजय, अंजना, विद्रुमक और वसन्तमाला सभा भवन में प्रविष्ट होते हैं। पवनंजय राजकीय सिंहासन पर रत्नमय छत्र के नीचे बैठा है। सभी उनके पूर्णमिलन पर बधाई देते हैं। प्रतिसूर्य छोटे बालक हनुमान् के साथ आते हैं और पवनंजय को उसका परिचय देते हैं। प्रतिसूर्य मातृप्रेमलिनी वन में जो घटित हुआ था, उसे सविस्तार बतलाते हैं। अंजना और वसन्तमाला को जो कठिनाईयाँ झेलनी पड़ीं, किस प्रकार वे रत्नकुट के पूर्व में स्थित पद्मद्रु गुहा में पहुँचीं तथा वहाँ महान् मुनि अमितगति से मिलीं तथा उनके द्वारा उन्हें सान्त्वना दी गई कि उनको मुशीबते शीघ्र ही दूर होने वाली हैं, इत्यादि का वर्णन प्रतिसूर्य ने किया। वसन्तमाला और अंजना जब उस गुफा में ठहरी हुई थीं तो उन पर एक भयानक सिंह ने आक्रमण किया। उनकी चीख पुकार पर गन्धर्वराज मणिचूड़ तथा उसकी पत्नी रत्नचूड़ा ने उन्हें बचाया। अंजना ने उचित समय पर अपने पुत्र को जन्म दिया। प्रतिसूर्य ने उन्हें पहचाना और वह उन्हें अनुरूद्धद्वीप ले गया, जहाँ नवजात शिशु का धार्मिक संस्कार किया गया। बाद में राजा प्रहलाद और महेन्द्र के अनुरोध पर प्रतिसूर्य मकरन्द द्वीप गए और मातृप्रेमलिनी वन में पवनंजय को पाया। पुनः वे अनुरूद्ध द्वीप जाकर अंजना तथा वसन्तमाला के साथ वापिस लौटे तथा अंजना और पवनंजय का मिलन हुआ इत्यादि घटनायें प्रतिसूर्य ने सुनाईं। सभी ने मणिचूड़ गन्धर्व को भगवान् सिंह से अंजना की रक्षा करने पर धन्यवाद दिया। मणिचूड़ ने वरुण और रावण के अनुरोध पर पवनंजय को विजयार्ध का सार्वभौम सम्राट घोषित किया। पवनंजय ने धन्यवाद् पूर्वक नया दिया हुआ पद ग्रहण किया। विद्याधरों ने उन्हें प्रणाम किया। अन्त में भरतवाक्य के साथ नाटक समाप्त हो जाता है।

अंजनापवनंजय नाटक का मूल स्रोत

हस्तिमल ने अपने सभी नाटकों को विषयवस्तु जैन पुराणों से ग्रहण की है। अंजना पवनंजय की कथा विमलसूरि के पउमचरिये से 18वें उद्देश्य में तथा रविषेण के पद्मचरित के 15वें पूर्व से 18 वें पूर्व तक आयी है। दोनों में समानता है। दोनों कथाओं और हस्तिमल की अंजना पवनंजय कथा में कुछ भिन्नता है। पद्मचरिय तथा पउमचरिय में पवनंजय के भिन्न भिन्न नाम हैं, जैसे - पवनगति, पवनवेग, वायुगति, वायुवेग, वायुकुमार इत्यादि। अंजना को अंजना सुन्दरी भी कहा है। राजा महेन्द्र की पत्नी का नाम पद्मचरिय और पउमचरिय में हृदयंगमा या हृदयसुन्दरी है, किन्तु हस्तिमल के नाटक में इसका नाम मनोवेगा है। पद्मचरिय और पउमचरिय में राजा महेन्द्र के अरिन्दम आदि 100 पुत्र कहे गए हैं, जबकि हस्तिमल ने अरिदम और प्रस्कन्दति दो का उल्लेख किया है। पद्मचरिय में पवनंजय की माँ केतुमती को कीर्तिमती कहा गया है। पद्मचरिय और पउमचरिय में अंजना का स्वयंवर नहीं है। मंत्रियों के सलाह के बाद राजा महेन्द्र अपनी पुत्री पवनंजय को देने का निश्चय करते हैं तथा उचित समय पर राजा प्रहलाद को स्वीकृति ले लेते हैं। विद्यारोत्सव के तीन दिन पूर्व पवनंजय का मन अंजनासुन्दरी, वसन्तमाला और मित्रकेशी के प्रति पक्षपात पूर्ण हो जाता है। वह पूरी परिस्थिति को गलत समझते हैं और किसी प्रकार निराधार निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अंजना सुन्दरी उनसे विवाह नहीं करना चाहती है; क्योंकि वह यथार्थ में विहृलुपम नामक दूसरे विद्याधर राजकुमार से प्रेम करती है। वे अंजना सुन्दरी को मारने के बिन्दु

तक पहुँच जाते हैं, किन्तु उनके मित्र प्रहसित उन्हें रोक लेते हैं। पवनंजय अंजना से घृणा करने लगते हैं तथा अंजना के साथ अपनी अकल्पित शादी को रद्द करना चाहते हैं, तथा अपने नगर की वापिस आ जाते हैं।

अपने पिता तथा राजा महेन्द्र के बार-बार अनुरोध पर वे अंजना सुन्दरी से विवाह करने का निश्चय करते हैं, किन्तु विवाह के बाद अंजनासुन्दरी को मार देने का वे मन ही मन निश्चय कर लेते हैं। अंजनासुन्दरी के प्रति घृणा के कारण वे उससे 22 वर्ष विमुख रहते हैं। अंजना दुःख सहन करती रहती है। यहाँ तक कि जब वे वरुण के प्रति युद्ध के लिए प्रस्थान करने लगते हैं, तब अंजना उन्हें विदा करने आती है, किन्तु वे उसे फटकार कर उसका तिरस्कार करते हैं।

पवनंजय का अंजना के प्रति यह दृष्टिकोण मानसरोवर पर चकवे के वियोग में दुःखी चकवी को देखकर परिवर्तित होता है, वे उसे अत्यधिक चाहने लगते हैं तथा उसके प्रति किए गए अपने कठोर व्यवहार पर पछतावा करते हैं। वे गुप्त रूप से अपने नगर जाते हैं तथा अपनी पत्नी से मिलकर उसके साथ कई दिन बिताते हैं। पद्मचरिय के अनुसार अंजना के साथ केवल एक रात बिताते हैं। वे अपने माता-पिता की अपने आगमन के विषय में बतलाना उचित नहीं समझते हैं। उनके माता-पिता को भी उनके आगमन की कोई जानकारी नहीं होती है। युद्ध क्षेत्र में लौटने से पूर्व पवनंजय को अंजना के गर्भ की जानकारी मिल जाती है। वह निश्चित रूप से कहते हैं कि गर्भ के लक्षण प्रकट होने से पूर्व ही वे युद्ध क्षेत्र से वापिस आ जाएँगे। वे अंजना को अपने नाम से अंकित एक हार देते हैं, ताकि आवश्यकता पड़ने पर वह उसका उपयोग कर सके। पवनंजय की माँ को जब अंजना के गर्भ के विषय में मालूम होता है, तो उसका गहरा धक्का लगता है। उसे यह पता था कि पवनंजय अंजनासुन्दरी से कितनी घृणा करता है तथा वह इस बात पर विश्वास नहीं करती है कि पवनंजय गुप्त रूप से अंजना से मिलने आया था। इस कारण वह अंजना को उसके माता-पिता के यहाँ भेज देती है। राजा महेन्द्र अपनी पुत्री को जिसका चरित्र सन्दिग्ध है, अपने घर प्रवेश नहीं देते हैं। वे उसे अपने महल से बाहर निकाल देते हैं।

मुनि अमितगति, जिनके पर्यंकगुफा में अंजनासुन्दरी को दर्शन हुए थे, ने गर्भस्थ शिशु के पूर्वजन्म का हाल बतलाया तथा यह कारण भी बतलाया, जिसके कारण पवनंजय अंजना से घृणा करते थे तथा जिसके कारण अंजना का उनसे वियोग हुआ।

अंजना प्रतिसूर्य के विमान में बैठी हुई थी। उसके मुस्कराते हुए बालक ने छलाँग लगाई तथा वह नीचे स्थित पर्वत की चट्टानों के मध्य गिर गया। चट्टान के टुकड़े-टुकड़े हो गए, किन्तु बालक को कोई चोट नहीं पहुँची। इस कारण बालक का नाम श्रीशैल रखा गया। इसका दूसरा नाम हनुमत् भी रखा; क्योंकि इसे बचपन में प्रतिसूर्य के हनुहृष्ठ हो में लाया था।

वरुण के साथ युद्ध की परिसमाप्ति होने पर पवनंजय घर वापिस लौटते हैं, जब उन्हें ज्ञात होता है कि उनकी पत्नी को उसके माता-पिता के घर भेज दिया गया है तो वे राजा महेन्द्र के पास जाते हैं, किन्तु उन्हें यह जानकर बड़ा दुःख होता है कि वह वहाँ नहीं है? वे अंजना की खोज में भूतखाटकी में पहुँचते हैं। वे अपने माता-पिता को अपना निर्णय बतला देते हैं कि जब तक अंजना नहीं मिलती है, तब तक वे घर वापिस नहीं आयेंगे।

केतुमती की अपनी भूल मालूम पड़ती है। विद्याधर पवनंजय को मुनि के समान ध्यानमग्न और मौन पाते हैं। पवनंजय इशारे से अपने माता-पिता को बतला देते हैं कि जब तक वे अंजना को नहीं देख लेते हैं, तब तक आमरण उनका मौन और अनशन है।

उपर्युक्त मोड़ के अतिरिक्त हस्तिमल्ल ने पद्मचरित की कथा का श्रद्धापूर्वक अनुसरण किया है।

छन्द

हस्तिमल्ल ने अंजना पवनंजय नाटक में छन्दों का प्रचुर प्रयोग किया। इसमें कुल लगभग 188 हैं, जो निम्नलिखित छन्द में हैं- आर्या (37), शार्दूलविक्रीडित (30), अनुष्टुप (20), उपजाति (17), शिखरिणी (16), मालिनी (12), वसन्ततिलका (9), स्रग्धरा (6), वंशस्थ (5), मंदाक्रान्ता (5, वियोगिनी (5), हरिणी (3), औपच्छन्दसिक (3), इन्द्रवज्रा (2), पृथ्वीजात्या (2), पृथ्वी (2), शालिनी (2), दुतविलम्बित (2), उपेन्द्रवज्रा, प्रहर्षिणी, रथोद्धता, प्रमिताक्षरा, मंजुभाषिणी, चारु, अवन्तमध्य, तोटक तथा वैतालीय छन्द एक है। छन्दों का प्रयोग रसानुकूल किया गया है।

प्राकृत का प्रयोग

अंजना - पवनंजय यद्यपि संस्कृत नाटक है, किन्तु संस्कृत नाटकों की परम्परानुसार इसमें प्राकृत का भी प्रयोग किया गया है। विदूषक, अंजना, वसन्तमाला एवं युक्तिमती शौरसेनी प्राकृत का प्रयोग करते हैं। वनचर, चेट, भ्रूर, लवंतिका ये मागधी का प्रयोग करते हैं। चमुक वनेचर के कथन में ढक्की का प्रयोग हुआ है।

आभार प्रदर्शन

वीर निर्वाण संवत् 2476 (विक्रमाब्द 2006) में माणिकचन्द दिगम्बर जैन ग्रन्थमाला बम्बई से हस्तिमल्ल के दो नाटकों (अंजना पवनंजय तथा सुभद्रा नाटिका) का प्रकाशन श्री माधव वासुदेव पटवर्द्धन के संशोधन के साथ हुआ था। इसके प्रारम्भ में 61 पृष्ठ की विद्वत्तापूर्ण अंग्रेजी प्रस्तावना दी हुई है। इसके अतिरिक्त प्राकृत जैन शास्त्र एवं अहिंसा शोध संस्थान, वैशाली (बिहार) की ओर से मार्च 1980 में डॉ. कन्हैयालाल जैन शास्त्री का रूपकाकार हस्तिमल्ल - एक समीक्षात्मक अध्ययन ग्रन्थ प्रकाशित हुआ था। हस्तिमल्ल के विषय में समग्र जानकारी उपलब्ध कराने वाला यह एक मात्र प्रकाशित शोध प्रबन्ध है, जो कि स्व. डॉ. नेमिचन्द शास्त्री जैसे प्रख्यात मनीषी के निर्देशन में लिखा गया है और इसके लेखन में लेखक ने पर्याप्त श्रम किया है। यह प्रस्तावना प्रो. पटवर्द्धन एवं डॉ. कन्हैयालाल जैन के उपर्युक्त ग्रन्थों के आधार पर लिखी गयी है, इसमें मेरा अपना कुछ नहीं है। इन दोनों विद्वानों के प्रति मैं हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।

वर्ष 1994 के अक्टूबर मास की 13, 14 एवं 15 तारीख को अजमेर में सोनी जी की नसिया में पूज्य 108 आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज द्वारा विरचित वीरोदय महाकाव्य पर एक विद्वत् संगोष्ठी आयोजित की गयी, इसमें देश के कोने-कोने से आए हुए लगभग 50 विद्वानों ने भाग लिया। संगोष्ठी पूज्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के शिष्य पूज्य श्री 108 सुधासागरजी एवं क्षुल्लक द्वय श्री 105 गम्भीरसागरजी महाराज एवं धैर्यसागरजी

महाराज के चरण सान्निध्य में सम्पन्न हुई, जिसमें देश के जैनागम् मर्मज्ञ विद्वानों ने वीरोदय के विभिन्न पहलुओं पर अपने आलेखों का वाचन किया और प्रत्येक विषय पर विद्वानों में पर्याप्त ऊहापोह हुआ। इसी सुअवसर पर श्री सेठी, भैंसा व पाटनी परिवार के आर्थिक सहयोग से यह अंजना पवनंजय नाटक प्रकाशित किया जा रहा है। अर्थप्रदाता को मेरी ओर से हार्दिक धन्यवाद।

पूज्य मुनि श्री 108 सुधासागरजी महाराज एवं क्षुल्लक द्वय के चरणों में मेरा कोटि-कोटि नमन

हर्षत्यघं सम्प्रहितेष्टेष्टयतः शुभस्य पूर्वावसितेः कृतं शुभम्ः
शरीरभाजां भवदीय दर्शनं व्यक्ति कालंतितेऽपि योग्यतम्
(महाकवि माघ)

मार्गदर्शक : आचार्य श्री सुविधिसागर जी महाराज
धर्मानुरागी
रमेशचन्द जैन

नाट्यकार हस्तिमल्ल का परिचय

दिगम्बर-जैन-साहित्य में हस्तिमल्ल का एक विशेष स्थान है। क्यों कि जहाँ तक हम जानते हैं रूपक या नाटक उनके सिवाय और किसी दि. जैन कवि ने नहीं मिले हैं। श्रव्य काव्य तो बहुत लिखे गये परन्तु दृश्य काव्य की और किसी का ध्यान ही नहीं गया। हस्तिमल्ल ने साहित्य के इस अंग को खूब पुष्ट किया। उनके लिखे हुए अनेक सुन्दर नाटक उपलब्ध हैं।

वंश-परिचय

हस्तिमल्ल के पिता का नाम गोविन्दभट्ट था। वे सत्संगी ब्राह्मण थे और दाक्षिणात्य थे। स्वामी समन्तभद्र के देवागम-स्तोत्र को सुनकर उन्होंने मिथ्यात्व छोड़ दिया था और सम्यग्दृष्टि हो गये थे। उन्हें स्वर्ग, यज्ञो, नायक देवी के प्रसाद से छह पुत्र उत्पन्न हुए। श्री कुमारकवि, 2 सलवाक्य, 3 देवरत्नभल्ल, 4 उदयभूषण, 5 हस्तिमल्ल और 6 वर्धमान। अर्थात् वे अपने पिता के पाँचवें पुत्र थे। ये छहों के छहों पुत्र कवीश्वर थे इस तरह गोविन्दभट्ट का कुटुम्ब अतिशय सुशिक्षित और गुणी था।

सरस्वतीवरयवल्लभ, महाकविराज और सूक्ति-रत्नाकर उनके विरुद्ध थे। उनके बड़े भाई सत्यवाक्य ने उन्हें ‘कवितासाम्राज्यलक्ष्मीपति’ कहकर उनकी सूक्तियों को बहुत ही प्रशंसा की है। राजावली-कथा के कर्त्ता ने उन्हें उभय-भाषाकवि-चक्रवर्ती लिखा है।

हस्तिमल्ल ने विक्रान्त कौरव के अन्त में जो प्रशस्ति दी है, उसमें उन्होंने समन्तभद्र, शिवकोटि, शिवायन, वीरसेन, जिनसेन और गुणभद्र का उल्लेख करके कहा है कि उनको शिष्य-परम्परा में असंख्य विद्वान् हुए और फिर गोविन्दभद्र हुए जो देवागम को सुनकर सम्यग्दृष्टि हुए। पर इसका यह अर्थ नहीं कि वे उक्त मुनि परम्परा के कोई साधु या मुनि थे। जैसी कि जैन ग्रन्थ कर्त्ताओं की साधारण पद्धति है, उन्होंने गुरु परम्परा का उल्लेख करके अपने पिता का परिचय दिया है।

हस्तिमल्ल स्वयं भी गृहस्थ थे। उनके पुत्र-पौत्रादिका वर्णन ब्रह्मसूरि ने प्रतिष्ठा सारोद्धार में किया है। स्वयं ब्रह्मसूरि भी उनके वंश में ही है। वे लिखते हैं कि पाण्ड्य देश में गुंडिगत के शासक पाण्ड्य नरेन्द्र थे, जो बड़े ही धर्मात्मा, वीर, कलाकुशल और पण्डितों का सम्मान करने वाले थे। वहाँ वृषभतीर्थंकर का रत्नसुवर्णजटित सुन्दर मन्दिर था, जिसमें विश्वनन्दि आदि विद्वान् मुनिगण रहते थे। गोविन्द भट्ट यहीं के रहने वाले थे। उनके श्रीकुमार आदि छह लड़के थे। हस्तिमल्ल के पुत्र का नाम पार्श्वपंडित था जो अपने पिता के ही समान यशस्वी धर्मात्मा और शास्त्रज्ञ थे। ये अपने वशिष्ठ काश्यपगोत्र गोज ब्राह्मणों के साथ होयसल देश में जाकर रहने लगे, जिसकी राजधानी छत्रजयपुरी थी। पार्श्वपंडित के चन्द्रप, चन्द्रनाथ और वैजय्य नामक तीन पुत्र थे। इनमें चन्द्रनाथ अपने परिवार के साथ हेमाचल (होनूरु) में अपने परिवार सहित जा बसे और दो भाई अन्य स्थानों को चले गये। चन्द्रप के पुत्र विजयेंद्र हुए और विजयेंद्र के ब्रह्मसूरि, जिनके बनाये हुए तिर्वाचार और प्रतिष्ठा-तिलक ग्रन्थ उपलब्ध है।

कवि के भाई

हस्तिमल्ल के जो पाँच भाई थे, उनसे हम प्रायः अपरिचित हैं। सलवाक्य को हस्तिमल्ल ने ‘श्रीमती-कल्याण’ आदि कृतियों का कर्त्ता बतलाया है, परन्तु उनका न तो यह ग्रन्थ ही अभी तक प्राप्त हुआ है और अन्य कोई ग्रन्थ ही। नाम से ऐसा मालूम होता है कि ‘श्रीमती-कल्याण’ भी बहुत करके नाटक होगा।

श्रीकुमार कवि का ‘आभयदेव’ नाम का एक काव्य प्रकाशित हो चुका है, परन्तु वे हस्तिमल्ल के बड़े भाई हैं या कोई और, इसका निर्णय नहीं हो सका।

वर्धमान कवि को कुछ लोगों ने गग्गरलमहोदधि का ही कर्त्ता समझ लिया है किन्तु यह भ्रम है। गग्गरल के कर्त्ता श्वेताम्बर सम्प्रदाय के हैं और उन्होंने सिद्धराज जयसिंह (वि. सं. 1151-1200) की प्रशंसा में कोई काव्य बनाया था। दिगम्बर सम्प्रदाय पर उन्होंने कटाक्ष भी किये हैं, और वे हस्तिमल्ल से बहुत पहले हुए हैं।

कवि का नाम

हस्तिमल्ल का असली नाम क्या था, इसका पता नहीं चलता। यह नाम तो उन्हें एक मत हाथी की वश में करने के उपलक्ष्य में पाण्ड्य राजा के द्वारा प्राप्त हुआ था। उस समय उन का राजसभा में सैकड़ों प्रशंसा-वाक्यों से सत्कार किया गया था। इस हरित-युद्ध का उल्लेख कवि ने अपने सुभद्राहरण नाटक में भी किया है। और साथ ही यह भी बतलाया है कि कोई भूत जैनमुनि का रूप धारण करके आया था और उसकी भी हस्तिमल्ल ने परास्त कर दिया था।

पाण्ड्यमहेश्वर

हस्तिमल्ल ने पाण्ड्य राजा का अनेक जगह उल्लेख किया है। वे उनके कृपापात्र थे और उनकी राजधानी में अपने विद्वान् आप्तजनों के साथ जा बसे थे।

राजा ने अपनी सभा में उन्हें खूब ही सम्मानित किया था। वे पाण्ड्यमहेश्वर अपने भुजबल से कर्नाटक प्रदेशपर शासन करते थे।

कवि ने इन पाण्ड्य महीधर का कोई नाम नहीं दिया है। सिर्फ इतना ही मालूम होता है कि वे ये तो पाण्ड्य देश के राजवंश के, परन्तु कर्नाटक आकर राज्य करने लगे थे।

दशविधकनाटक के काकेल स्थगन पर उन दिनों पाण्ड्यवंश का ही शासन था। यह राजवंश जैनधर्म का अनुयायी था और इसमें अनेक विद्वान् तथा कलाकुशल राजा हुए हैं। ‘भव्यनन्द’ नामक सुभाषित ग्रन्थ के कर्त्ता भी अपने को ‘पाण्ड्यचक्रवर्ति’ लिखते हैं, कोई विशेष नाम नहीं देते। हमारी समझ में ये हस्तिमल्ल के आश्रयदाता राजा के ही वंश के अन्तरवर्ती कोई जैन राजा थे और इन्होंने ही शायद श. सं. 1353 (वि. सं. 1488) में काकेल का विशाल बाहुबलि प्रतिमाको प्रतिष्ठा कराई थी।

पाण्ड्यमहेश्वर की राजधानी मालूम नहीं कहाँ थी। अज्जन्ना पवनंजय के ‘श्रीमत्पाण्ड्यमहीधरेण’ आदि पद्य से तो ऐसा मालूम होता है कि संतरम या संततगम नामक स्थान में हस्तिमल्ल अपने कुटुम्बसहित जा बसे थे, इसलिए यह उनकी राजधानी होगी, यद्यपि यह पता नहीं कि यह स्थान कहाँ पर था।

हाथी का मद उतारने की घटना ‘सरवणपुर’ नामक स्थान में घटित हुई थी और वहाँ
की राजसभा में ही उन्हें संस्कृत किया गया था। इस स्थान का भी कोई पता नहीं है।
या तो यह संयोगगग का ही दूसरा नाम होगा या फिर किसी कारण से पाण्ड्य राजा हस्तिमल्ल
के साथ कहीं गये होंगे और वहीं यह घटना घटी होगी।

कवि का मूलनिवासस्थान

ब्रह्मसूरि ने गोविन्दभट्ट का निवासस्थान गुंडिपत्तन बतलाया है और पं. के. भुजबलि
शास्त्रों के अनुसार यह स्थान तंजौर का दीपगुंडि नाम का स्थान है, जो पाण्ड्य देश में है।
कर्नाटक का राज्य प्राप्त होने पर या तो वे स्वयं ही या उनका कोई वंशज कर्नाटक में आकर
रहने लगा होगा और उसी की प्रीति से हस्तिमल्ल कर्नाटक की राजधानी में आ बसे होंगे।

ब्रह्मसूरि के बतलाये हुए गुंडिपत्तन का ही उल्लेख हस्तिमल्ल ने विक्रान्त कौरव को
प्रशस्ति में दीपगुंडि नाम से किया है। उसमें भी वही के वृषभभजन के मन्दिर का उल्लेख
है जिनके पादपीठ या सिंहासनपर पाण्ड्यराजा के मुकुट की प्रभा पड़ती थी। वृषभजिन
के उक्त मन्दिर को ‘कुश-लवरचित’ अर्थात् रामचन्द्र के पुत्र कुश और लव के द्वारा निर्मित
बतलाया है।

हस्तिमल्ल का समय

अप्पय्य नामक विद्वान् ने अपने जिनेन्द्र कल्याणभ्युदय नामक प्रतिष्ठापाठ में लिखा
है कि मैंने यह ग्रन्थ वसुनांदि, इन्द्रनंदि, आशाधर और हस्तिमल्ल आदि की रचनाओं का
सार लेकर लिखा है और उक्त ग्रन्थ श. सं. 1241 (वि. सं. 1316) में समाप्त हुआ था।
अतएव हस्तिमल्ल 1316 से पहले हो चुके थे।

ब्रह्मसूरि ने अपनी जो चंपूपरम्परा दी है, उसके अनुसार हस्तिमल्ल उनके पितामह के
पितामह थे। यदि एक-एक पीढ़ी के पच्चीस-पच्चीस वर्ष गिन लिये जाँय, तो हस्तिमल्ल
उनसे लगभग सौ वर्ष पहले के हैं और पं. जुगलकिशोरजी मुख्तार ब्रह्मसूरि को विक्रम की
पन्द्रहवीं शताब्दि का विद्वान् मानते हैं, अतएव हस्तिमल्ल को विक्रमकी चौदहवीं शताब्दि
का विद्वान् मानना चाहिए।

कर्नाटक कविचरित्र के कर्ता आर. नरसिंहाचार्य ने हस्तिमल्ल का समय ई. सन् 1290
अर्थात् वि. सं. 1348 निश्चित किया है, और यह ठीक मालूम होता है।

ग्रन्थ-रचना

हस्तिमल्ल के अभीतक चार नाटक प्राप्त हुए हैं 1 विक्रान्तकौरव, 2 मैथिलीकल्याण,
3 अंजनापवनंजय 4 सुभद्रा। इनमें से पहले दो प्रकाशित हो चुके हैं।

इनके सिवाय 1 उदयराज, 2 भरतराज, 3 अर्जुनराज, और 4 मेघेश्वर इन चार नाटकों
का उल्लेख और मिलता है। इनमें से भरतराज सुभद्रा का ही दूसरा नाम मालूम होता है
। शेष तीन नाटक दक्षिण के भंडारों में खोज करने से मिल सकेंगे। ‘प्रतिष्ठा-तिलक’ नाम
का एक और ग्रन्थ आरा के जैन सिद्धान्त-भवन में है। यद्यपि इस ग्रन्थ में कहीं हस्तिमल्ल
का नाम नहीं दिया है परन्तु अप्पय्य ने अपने जिनेन्द्र कल्याणभ्युदय में जिन जिनके प्रतिष्ठापाठों

का सार लेकर अपने ग्रन्थ रचने का उल्लेख किया है। उनमें हस्तिमल्ल भी हैं। अतएव
निश्चय से हस्तिमल्ल एक प्रतिष्ठापाठ है और वह यही है।

आदिपुराण (पुरुचरित) और श्रीपुराण नाम के दो ग्रन्थ कन्नड़ी भाषा में भी हस्तिमल्ल
के बनाये हुए उपलब्ध हैं। संस्कृत के समान कन्नड़ीभाषा पर भी उनका अधिकार था और
शब्द-उभय कारण वे उभयभाषाचक्रवर्ती कहलाते थे। यदि उनका जन्मस्थान दीपगुंडि है,
जैसा कि ब्रह्मसूरि ने लिखा है तो उनकी मातृभाषा तामिल होगी और ऐसी दशा में कन्नड़ीपर
भी उन्होंने संस्कृत के समान प्रयत्नपूर्वक अधिकार प्राप्त किया होगा।

अञ्जनापवनंजयम्

नाम

नाटकम्

अञ्जनापवनंजयं

नाम

नाटकम्

चराचर गुरु, जिसके सामने आदि में सङ्गीत का आरम्भ किए हुए इन्द्र ने क्रम से नाट्यरसों का अभिनय करते हुए ताण्डव नृत्य किया। जिस वाणी के ईश्वर से अचिन्त्य महिमा वाली आरती प्रकट हुई । पुराण कवि श्रीमान् वह मुनिसुव्रत आपको कल्याण प्रदान करें (1) (नान्दी पाठ के अन्त में)

सूत्रधार - अतिप्रसङ्ग से बस करो। मारिष, जरा इधर आओ ।

(प्रवेश करके)

पारिपार्श्विक - महानुभाव, यह मैं हूं।

सूत्रधार - मुझे परिषद् ने आज्ञा दी है कि आज तुम सरस्वती के द्वारा स्वयं पति के रूप में वरण किए गए भट्टारक गोविन्दस्वामी के पत्र आर्य श्री कुमार, सत्यवाक्य, देवरवल्लभउदय भूषण आर्यमिश्र के अनुज कवि वर्द्धमान के अग्रज कवि हस्तिमल्ल के द्वारा रचे गए विद्याधरचरित का जिसमें निबन्धन किया गया है, ऐसे अंजनापवनजंय नामक नाटक का यथावत् प्रयोग करना है।

पारिपार्श्विक - महानुभाव, परिषद् का इस नाटक के विषय में बहुमान क्यों है ? सूत्रधार - निश्चित रूप से कवि परिश्रम ही यहाँ कारण है क्योंकि समीचीन वाणी हो, अत्यधिक सरल कोई अपूर्व रचना हो, वचन की युक्ति उत्कृष्ट हो, परिषद् की आराधना करने वाला कवि हो, बिना चबाया हुआ, गाढ़ तथा जो परम् गूढ़ न हो, ऐसा रस हो, इस प्रकार कवियों की सामग्री शीघ्र ही किसको चलित नहीं करती है ? अर्थात् सभी को करती है ॥12॥

पारिपार्श्विक - बात यही है। कवियों का अन्तिम छोर नाटक होता है, यह बात सत्य है। सूत्रधार - तो इस समय संगीत का आरम्भ किया जाय ।

पारिपार्श्वक - तो विलम्ब क्यों किया जा रहा है। ये महेन्द्र के पुत्र अरिंदम अपनी छोटी बहिन अंजना के चारों ओर से स्वयंवर महोत्सव के लिए नगर के समीप में आए हुए राजा लोगों की समुचित सत्कार के साथ अगवानी करने के लिए महाराज महेन्द्र के द्वारा नियुक्त होकर नगर की सजावट के लिए नागरिकों को प्रोत्साहित करते हुए इधर ही आ रहे हैं। इस महोत्सव में हम लोगों को भी वेषभूषा वगैरह ग्रहण करने का उचित ही अवसर है। हम लोग

कैसे सजाए हुए स्वयंवर मण्डप में पहुँचकर कुशल नटों के साथ सङ्गीत आरम्भ करें ।

पारिपार्श्वक - महानुभाव जैसी आज्ञा दें ।

(इस प्रकार दोनों चले जाते हैं)

प्रस्तावना

(अनन्तर अरिंदम प्रवेश करते हैं)

अरिंदम - पिताजी ने मुझे आज्ञा दी है कि वत्स अरिंदम पुत्री अंजना के स्वयंवर महोत्सव के लिए बुलाए गए पवनंजय, विद्युत्प्रभ मेघनाथ प्रमुख राजपुत्र इस समय हमारे नगर में प्रवेश कर रहे है। तो इस समय नगरी के प्रसाधन के लिए तथा राजाओं की अगवानी करने के लिए तुम्हें ही सावधान होना चाहिए। (चारों ओर देखकर) यह हमारे आदेश नगरी विशेष रूप से निर्मल बना दी गई है। जैसे कि अत्यधिक उत्सुक नगर निवासियों ने इन समस्त घरों के ऊपर ध्वजायें फहरा दी हैं। इस समय मणिनिर्मित फर्शों के चारों ओर द्वारों पर वन्दनमालिकायें लगा दी है ॥3॥

(परिक्रमा देकर और देखकर)

ओह, कैसे इस समय यहाँ नगर के बीच की चौड़ी सड़क को पारकर समस्त दिशाओं से आए हुए अपनी सेना के समूह की भीड़ के कोलाहल से दशों दिशाओं को रोके हुए दिक्पालों के समान राजा लोग गली में ही प्रवेश कर रहे हैं। (देखकर) यह कौन राजमार्ग का उल्लंघन कर प्रमदवन के सम्मुख अन्तःपुर की रखवाली करने वाले सेवकों के द्वारा भीड़ हटा दी जाने पर श्रेष्ठ घोड़े से उतरा है। (देखकर) ओह, तात के परम् मित्र प्रह्लादराज का यह पुत्र है ।

परिमित परिका बाला, नगा निवासियों के द्वारा दुसरे वसन्त के समात आदरपूर्वक देखा गया, इस समय प्रमदवन में पैदल क्रीड़ा करता हुआ सुन्दर कान्ति रूपी लक्ष्मी को धारण करता हुआ प्रवेश कर रहा है ।॥4॥

(सोचकर) पहले यहीं मिलते हुए स्वागत संकथा से, कुशल प्रश्न पूर्वक सुखपूर्वक वार्तालाप करते हुए औपचारिकता से मेरा बहुत समय बीत जाएगा। अतः इस समय समीपवर्ती शेष कार्य की परिसमाप्ति पर पुनः इसे देखूँगा। (इस प्रकार चला जाता है)

शुद्द विष्कम्भः

(अनन्तर पवनंजय और विदूषक प्रवेष करते हैं)

पवनंजय - मित्र, यह उद्यान रमणीय है। अतः यहीं पर मुहूर्त भर के लिए विश्राम कर पश्चात् आवासस्थल की ओर चलते हैं ।

विदूषक - ऐसा हो हो । यहाँ पर महाराज प्रहलाद और महेन्द्रराज की चिरकाल से वृद्धि को प्राप्त मैत्री से आत्मीय होने पर भी हम दोनों प्रमदवन के प्रदेशों में विश्वासपूर्वक विहार करें। अतः प्रिय मित्र इधर आईए, इधर आइए । (घूमते हैं)

पवनंजय - (देखकर) अरे प्रमदवन की उत्कृष्ट शोभा आश्चर्यजनक है । यहाँ पर - भौरों की झंकार रूप प्रत्यंचा का शब्द हो रहा है। तीक्ष्ण धारों वाले ये कामदेव के बाण भी गिर रहे हैं। यह सखा वसन्त स्वयं बगल में स्थित है। यह पुष्परूप बाणों को झुकाए हुए कामदेव सदा जोश में भरा हुआ घूमे रहा है ।15।।

विदूषक - हे मित्र, इधर से गिरते हुए किञ्जल्क के फूलों के समूह से जिसके पंखों का समूह पीला-पीला हो रहा है वेशभूषा को ग्रहण किए हुए सी कोयल आम के शिखर पर चढ़कर गा रही है, जरा देखो। इधर स्पष्ट रूप से अलग की हुई कली रूपी सैकड़ों प्यालों में भरे हुए शहद के रस को पान करने की महा से मद के समूह से युक्त राजकीय तोता वकुलवीथी में सहचरी के साथ विहार कर रहा है। इधर प्रत्येक नए विकसित फूलों के आसव के लोभ से घूमते हुए भौरों की झंकार से सुन्दर नवमालिका लुब्ध कर रही है। इधर हरी- हरी पत्रलता से दिन में रात्रि की आशंका से चकवे के समूहों के द्वारा आस- पास की भूमि छोड़ी जा रही है। नए-नए मेघों के उद्गम से लुब्ध हुए भोले-भाले पपीहों के बच्चों के द्वारा बहते हुए मधु की बूँदें पी जा रही है । आवाज से मुखर मोरों के समूह से भी इधर-उधर जहाँ ताण्डव रूप उपहार दिया जा रहा है, ऐसा यह नवीन तमाल सुशोभित हो रहा है । पवनंजय - हे मित्र, ठीक देखा। देखो चंचल किसलय रूपी हाथ के अग्रभाग के द्वारा उठायी हुई फूलों की माला को छोड़कर नवमलिका श्रेष्ठ तमाल का स्वयं वरण कर रही हैं ॥6॥

विदूषक - स्पष्ट रूप से क्यों नहीं कहते हो। तुम्हें निश्चित रूप से कहना चाहिए पवनंजय का स्वयं वरण करती हुई अंजना के समान ।

पवनंजय - (मुस्कुराहट के साथ) परिहास कर लिया ।

विदूषक - यह परिहास नहीं है। शीघ्र हो यह अनुभव कर लोगे । नहीं तो क्या राजहंस को छोड़कर हंसी नीच बगुले का अनुसरण करती है। पहले विजयाद्धं पर्वत रूपी हाथी की चूलिका का अनुसरण करने वाले सिद्धकूट सिद्धायतन में मन्दार निलय के भीतर गई हुई अन्य प्रिय सहचरी विद्याधर कन्याओं के साथ फूलों को चुनती हुई तुमने अंजना को देखा था ।

पवनंजय - और क्या ।

विदूषक - अनन्तर तुम्हें देखकर उसकी कुसुमाञ्जलिभी अपनी धीरता के साथ गिर गई थी। जब प्रिय सखियों ने उसका उपहास किया, तब समीप के मन्दार वृक्ष की ओट में छिपी हुई उसे मैंने तुम्हारे प्रति अभिलाषा से युक्त देखा था । अतः इस समय अन्यथा आशङ्का मत करो ।

पवनंजय - (उत्कंठा के साथ)

उस समय प्रिया के हस्तपल्लव के अग्रभाग से जो फूल गिरे थे। उन्हीं को अमोघ बाण बनाकर कामदेव आज भी मेरे ऊपर प्रहार करता है ॥7॥

(देखकर) हो सकता है सुन्दर हंस के समान गमन करने वाली अंजना मेरे इन दोनों उत्सुक नेत्रों का उत्सव करे ॥8॥

(नेपथ्य में)

मातलिके, मातलिके ।

विदूषक - यहाँ पर यह कौन बुला रही है। तब तक इस तमाल वृक्ष की ओट में छिपकर एक ओर होकर देखते हैं ।

पवनंजय - जैसा आप कहें। दोनों वैसा ही करते है ।

(प्रवेश करके),

मधुकरिका - मालसिके ।

(प्रवेश करके),

प्रमदवन पालिका - (राजकुमारी अंजना की नाटक सूत्रधारिणी मधुकरिका मुझे क्यों बुला रही है) (समीप में जाकर) सखि, मुझे क्यों बुला रही हो ?

प्रथमा - सखि, तुम शीघ्र कहाँ जा रही हो ?

द्वितीय - मुझे स्वामिनी मनोवेगा ने आज्ञा दी है कि पुत्री अंजना का कल स्वयंवर है। अतः औषधिमाला को गूँथने के लिए संतान प्रमुख विकासोन्मुक मङ्गल पुष्पों को चुनकर लाइए ।

प्रथमा - सखी, इसे रहने दो। यहाँ पर तुमने राजकुमारी अंजना को देखा ? द्वितीया - सखि । वह प्रियसखी वसन्तमाला के साथ केलीवन में संगीतशाला में प्रविष्ट हो गई है।

प्रथमा - तो मैं जाती हूँ।

द्वितीया - सखि ! जरा ठहरो । फिर से जाना सम्भव है ।

प्रथमा - सखि ! क्या ?

द्वितीया - सखि, तुम क्या मानती हो। कौन महाभाग्यशाली इस माला को धारण करेगा? प्रथमा - यहाँ विचार क्या करना ? तीनों लोकों में जिसका विशेष रूप सौभाग्य प्रशंसनीय है, ऐसा प्रह्लाद का पुत्र पवनंजय यहाँ समर्थ है।

द्वितीया - सखी, मैंने भी यहो सोचा था। चन्द्र हो चाँदनी के योग्य है । विदूषक - मित्र सुनो, सुनो। जैसा मैंने कहा था, वैसा ही ये दोनों कर रही हैं। पवनंजय - कौन निश्चय करने में समर्थ है। भाग्यों का परिपाक जानना कठिन है । प्रथमा - सखि, तुम जाओ। मैं भी राजकुमारी की समीपवर्तिनी होती हूँ । द्वितीया - वैसा ही होगा। (चली जाती है)

मधुकरिका - जब तक मैं केलीवन को जाती हूँ ।

(घूमती है)

पवनंजय - मित्र, हम भी बिना दिखाई दिए इसके पीछे चलते है ।

विदूषक - तो इधर आइए, इधर (दोनों घूमते हैं)

मधुकरिका - यह वन है, तो प्रवेश करती हूँ।

(अनन्तर अञ्जना और सखी प्रवेश करती हैं)

अंजना - हे सखी वसन्तमाला, तुम चुप क्यों बैठी हो। कुछ कहो ।

वसन्तमाला - यदि यह बात है तो सुनने योग्य सुनो ।

अंजना - (मन ही मन) मैं सावधान हूँ ।

वसन्तमाला - विजयार्द्ध के छोर पर विद्याधर लोक में अप्रतिम शोभा वाला आदित्यपुर नामक नगर है। उसमें समस्त विद्याधरों के द्वारा धारण किए गए चरणों वाले प्रह्लाद नामक राजर्षि हैं ।

उसके वसुमती (पृथ्वी) के साथ दूसरी पत्नी केतुमती है ।

वसन्तमाला - उन दोनों का विद्याधर लोक की प्रशंसा का एक स्थान भूत पवनंजय नामक पुत्र है।

अंजना - कहाँ से यह उस व्यक्ति का वर्णन करती है।

वसन्तमाला - यह एक दूसरी बात यहाँ प्रस्तुत है। पूर्व सागर के समीप में स्थित दन्ति पर्वत पर रहने वाला महेन्द्र के समान विद्याधर राज महेन्द्र है । अंजना - है।

वसन्तमाला - उस महेन्द्र राज के अनुरूह द्वीप के स्वामी विद्याधर प्रतिसूर्य की बहिन मनोवेगा से असाधारण कान्ति रूपी लक्ष्मी से समस्त अप्सराओं के रूप की हँसी उड़ाने वाली अंजना उत्पन्न हुई ।

अंजना - अप्रियभाषिणि ! मेरी अधिक प्रशंसा मत करो ।

वसन्तमाला - जैसी कथा स्थित है, उसी प्रकार कहना चाहिए ।

अंजना - ठीक है, फिर ।

वसन्तमाला - अनन्तर वह कन्या अन्य विद्याधर कन्याओं के साथ फूलों के चुनने का मन बनाए हुए सिद्धकूट के बाहर मन्दार उद्यान में प्रविष्ट हुई । अंजना - सखि ! तुम क्या कहना चाहती हो ।

वसन्तमाला - अनन्तर वही प्रविष्ट उस कामदेव के द्वारा नियुक्त पवनंजय ने अपनी इच्छा से चुने हुए नए-नए फूलों से जिसकी अञ्जलि भरी हुई है, ऐसी अंजना को देखा ।

अंजना - इस प्रलाप से बस करो ।

वसन्तमाला - (मुस्कराकर) इससे अधिक क्या । तुम्हीं जानती हो । अंजना - (मन ही मन) क्या इसने तत्र मेरे हृदय को जान लिया । मधुकरिका - (देखकर) यह राजकुमारी है। इसके समीप में जाती हूँ (समीप में जाकर) राजकुमारी की जय हो ।

अंजना - सखि, बैठो ।

मधुकरिका - जो राजकुमारी की आज्ञा । (बैठती है)

वसन्तमाला - सखि मधुकरिका, कुछ कहना चाहती हो, ऐसी लक्षित हो रही हो । अंजना - वह क्या ।

मधुकरिका - इस समय तुम्हारे स्वयंवरोत्सव के लिए पवनंजय, विद्युत्प्रभ, मेघनाद प्रमुख राजपुत्र आए हुए हैं ।

अंजना - (मन ही मन) क्या वह भी आया है।

(लज्जा का अभिनय करती है)

वसन्तमाला - कल कैसे लज्जित नहीं होगी ।

विदूषक - (कान लगाकर) - मित्र निकट में स्त्री का शब्द है ? पवनंजय - तो केले के झुरमुट में छिपकर देखते हैं। (दोनों वैसा ही करते हैं) । पवनंजय - (अंजना को देखकर) सौभाग्य से इस समय दर्शनीय वस्तु देख ली। (अनुराग सहित)

जो सुकुमार विलास का हावभाव है, जो कामदेव की आराधना का साधन रूप धन है। मेरा जो शरीरधारी प्राण है, वह यह इस समय सम्मुख आ गया है । ॥9॥

विदूषक - मित्र, सही बात तो यह है कि यह तुम्हारे ही योग्य है। मधुकरिका - राजकुमारी, तुमने समस्त राजकुमारों के चित्र देख लिए। तो जरा कहदे किस महाभाग्यशाली के प्रति तुम्हारा हृदय उत्कण्ठित है ।

अंजना - (मन ही) कल ही निश्चिय रूप से जान जाओगी। लज्जा के साथ चुप रहती है ।

पवनंजय - और, स्त्रियों को लज्जा भूषित करती है, यह बात उचित ही है। सुन्दर भौंहवाली की अन्तरङ्ग के भाव को न कहने में असमर्थ सी मन्द मुस्कराहट लज्जा के समान दूसरा प्रसाधन हो गई है ॥10॥

वसन्तमाला - सखी मधुकरिका, राजकुमारी ने अपने भावों को छिपा लिया है। तुम भावों को जानने वाली नाटक की सूत्रधारिणी हो। अतः स्वयं जानने में क्यों समर्थ नहीं हो ।

मधुकरिका - सखि, ठीक ही कहा है। अतः समीवती इस स्वयंवर का अभिनय करती हुई मैं हो तुम्हें दिखला दूँगी ।

वसन्तमाला - सखि, ठीक कहा ।

मधुकरिका - मैं नायिका की सखी मिश्रकेशी होती हैं। तुम राजकुमारी हो जाओ । वसन्तमाला - इस समय राजपुत्र की भूमिका कौन ग्रहण करेगी ?

विदूषक - यह यहाँ पर एक निकटवर्ती है ।

पवनंजय - मूर्ख, विश्वासपूर्वक की गई लीला को भङ्गमत करो ।

मधुकरिका - स्वयं यह राजकुमारी एक राजपुत्र होगी ।

वसन्तमाला - अन्य राजपुत्र कौन होंगे ?

मधुकरिका - ये प्रत्येक स्तम्भ की शालभञ्जिकायें अन्य राजपुत्र होंगे । वसन्तमाला - सखि, ठीक है, ठीक है। राजकुमारी किस राजपुत्र की भूमिका ग्रहण करें। मधुकरिका - यह पवनंजय की भूमिका ग्रहण करें। ये शालभञ्झिकायें (पुतलियाँ) विद्युत्प्रभ, मेघनाद प्रमुख राजपुत्रों की भूमिका ग्रहण करें ।

वसन्तमाला - सखि, वैसा ही होगा ।

अंजना - (मन ही मन) सखि, ठीक है। (प्रकट में) मुझे क्यों परेशान कर रही हैं। दोनों - तुम्हें कौन परेशान करता है। आप विश्वासपूर्वक जायें । (अंजना मुस्कराती है)

पवनंजय - (हर्ष पूर्वक) मुझे यहाँ भी अपने बहुत मानना चाहिए। निश्चिय रूप से मेरा आज यह मिलन के बिना प्राण के समान समागम हो गया है। जो कि यह

अंजना ‘मैं पवनंजय हूँ’, इस प्रकार बैठी हुई है ॥11॥

विदूषक - जैसा मैंने सोचा था, उसी प्रकार यह भी समर्थन कर रही है, यह मैं अनुमान करता हूँ ।

वसन्तमाला - सखि, यह औषधिमाला कौन है ।

मधुकरिका - यह मोतियों की माला औषधिमाला हो ।

वसन्तमाला - सखि, ठीक है। अब देर क्या है। तो हम अभिनय करें । मधुकरिका - सखि, वैसा ही होगा। (संस्कृत का आश्रय लेकर) पुत्री इधर से (आओ)। अंजना - ओह, स्वयं आर्या मिश्रकेशी के स्वर का योग है।

(बनावटी मिश्रकेशी और अंजना घूमती है)

मार्गदर्शक :- अचार्य श्री सुविधिसागर जी महाराज

बनावटी मित्रकेशी-हम लोग स्वयंवरमण्डप में प्रविष्ट हो गए हैं । (चारों ओर देखकर), ओह, स्वयंवर मण्डप की उत्कृष्ट शोभा है । क्योंकि। इधर-उधर चलते हुए वन्दियों के समूह के जय शब्द के कोलाहल से मिश्रित, घबड़ाए हुए सैकड़ों द्वारपालों के द्वारा हटाने की आवाज के कोलाहल से, प्रारम्भ किए जाते हुए मङ्गल संगीत और पीटे गए कोमल मृदङ्ग की गम्भीर ध्वनि से किन्नरी स्त्रियों के द्वारा बजाई गई वीणा के तार की झंकार का अनुसरण करने वाले विद्याधर स्त्रियों को गीत के स्वर से श्रवणपथ शब्दमय के समान हो रहा है । अन्तःपुर के कमरे वेत्रयुक्त से दिखलाई पड़ रहे हैं । रत्नमयी फर्श से युक्त भूमिभाग सिंहासन युक्त से दिखाई पड़ते हैं । दशों दिशायें डुलाए जाते हुए चंवर की वायु से बिखेरे गए पटवास के चूर्ण से युक्त सी सुशोभित हो रही है । आभूषणों की प्रभा के समूह से युक्त सा आकाशतल सुशोभित हो रहा है । स्वयंवर मण्डप राजाओं से युक्त सा प्रतीत हो रहा है ।

निश्चित रूप से यहाँ मणिमय मञ्च पर गए हुए राजा लोग चारों ओर परिजनों से घिरे होकर इस समय मानों तुम्हारें ही आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥12॥ तो राजकुमारी इस ओषधिमाला को ग्रहण करें ।

(कृतक अंजना लज्जापूर्वक लेती है)

कृतकमिश्रकेशी- (हाथ से प्रत्येक शालभञ्जिका की ओर इशारा करती हुई) यह कौशलों का नाथ है, यह मगधपति है, यह पाञ्जाक्तराज है, यह वङ्गों का स्वामी है, यह मलयपति है, यह केकय देश का अधीश्वर है, यह हरिवंशियों का स्वामी है, यह कुरुराजा है, यह वल्मीक देश का राजा है । पुत्री ! इनमें से इस समय कौन तुम्हारा पति हो सकता है ॥13॥

(कृतक अंजना चुप रहती है)

कृतकमिश्रकेशी -(दूसरी ओर जाकर नाटकीयतापूर्वक शालभञ्जिका की ओर निर्देश करके) समस्त राक्षससमुदाय को क्षुब्ध करने वाला अपनी भुजाओं के युगल के बल से खेल ही खेल में शत्रुओं के समूह को जीतने वाला, पिता के मुख के समान जिसका प्रभाव दिखाई देता है । ऐसा राक्षसों के स्वामी रावण का यह प्रियपुत्र यहाँ विद्यमान है ॥14॥

(कृतक अंजना चुप रहती है)

कृतकमिश्रकेशी -(दूसरी ओर जाकर नाटकीयतापूर्वक शालभञ्जिका की ओर निर्देश करके) जो विद्याधरों में विख्यात है, समस्त विद्याओं में विशारद है ऐसा हिरण्यप्रभु का पुत्र यह विद्युत्प्रभ है ॥15॥

(कृतक अंजना चुप रहती है)

कृतकमिश्रकेशी -(दूसरी ओर जाकर मुस्कराकर अंजना की ओर निर्देश कर) स्वाभाविक रूप से जिसका सुन्दर शरीर है, जो गुणों का उत्पत्ति स्थल है, भगवान् कामदेव का जो प्रशंसनीय स्थान है, अधिक कहने से क्या, जो तुम्हारे योग्य है ऐसा प्रहलाद राज का पुत्र यह पवनंजय है ॥16॥

(कृतक अंजना लज्जा और अनुरागपूर्वक अंजना के कण्ठ में हार छोड़ती है)

अंजना - (मुस्कराकर मन ही मन) वसन्तमाला ठीक है, ठीक है।

पवनंजय - (हर्षपूर्वक) भद्र ठीक है, ठीक है। श्री सुविधिसागर जी महाराज विदूषक - ठीक है।

मधुकरिका - वसन्तमाला ठीक है, तुमने राजकुमारी के हृदय का ठीक पता लगाया। वसन्तमाला - राजकुमारी के पति की भूमिका को धारण करती हुई यहाँ मेरी तुम ही गुरु हो।

अंजना - (मुस्कराकर) मेरे हृदय को जान लिया।

दोनों - कैसे नहीं जाना। पहले मन्दारोधान में जाना। इस समय जिसे पसीना आ रहा है। ऐसे पुलकित अङ्गों से तुम्हारा सानुराग हृदय स्पष्ट हुआ था। पवनंजय - हृदय का भली भाँति अनुमान होता है क्योंकि - फैलते हुए पसीने के जल के सिंचन से अन्तरङ्ग में मानों अनुराग अङ्कुरित हो रहा हो, इस प्रकार इसकी अङ्गयष्टि विकसित रोमों को धारण कर रही है ॥17॥

अंजना - (मुस्कराकर) सामान्य हृदय सखी जनों के लिए क्या जानना कठिन है। विदूषक - मित्र ! और यहां ठहरने से क्या ? आओ हम दोनों चलें। पवनंजय - जैसा मित्र ने कहा।

(दोनों चले जाते हैं)

वसन्तमाला - अधिक कहने से क्या। और सब तैयार है। पवनंजय यहाँ देर कर रहा है।

विदूषक - देर नहीं कर रहा है। यह शीघ्रता कर रहा है।

(अंजना देखकर लज्जापूर्वक उठकर दूसरी ओर चली जाती है)

वसन्तमाला और मधुरिका - (देखकर) ओह स्वामी (समीप में जाकर) स्वामी की जय हो।

पवनंजय - (मधुकरिका के प्रति मुस्काकर अंजना और वसन्तमाला की ओर निर्देश कर) आर्ये मिश्रकेशि, क्या पाणिग्रहण महोत्सव के बाद पवनंजय का अंजना को छोड़कर जाने का समय है।

सभी - क्या आदि से लेकर सब देख लिया।

मधुकरिका - (मुस्कराकर) तो हाथ पकड़कर इन्हें रोको।

पवनंजय - आप जैसा कहें। (अंजना के समीप जाकर, हाथ से पकड़कर, मुस्कराकर) प्राणों के समान इस व्यक्ति को छोड़कर यहाँ से तुम्हारा जाना ठीक नहीं है। निश्चित रूप से अंजना-पवनंजय की विहारभूमि है ॥18॥

अंजना - (मन ही मन) ओह, वचनों की गम्भीरता।

मधुकरिका और वसन्तमाला - (मुस्कराकर) स्वामी ने ठीक कहा।

विदूषक - पाणिग्रहण महोत्सव हो गया।

(नेपथ्य में)

राजकुमारी इधर से, इधर से। स्नान करने का समय बीत रहा है। इस समय कन्यान्तःपुर में ही आना चाहिए। प्रसाधन हाथ में लिए हुए तुम्हारी सारी मातायें प्रतीक्षा कर रही है।

वसन्तमाला - राजकुमारी जल्दी करें। यह आर्या मिश्रकेशी बुला रही है। स्वामी, इस समय हाथ छोड़ो। कल ही निश्चित रूप से ग्रहण करना ।

पवनंजय - जैसा आप कहें (अभिलाषा पूर्वक छोड़ देता है)

दोनों - राजकुमारी, इधर से इधर से ।

सभी घूमकर निकल जाती है।

पवनंजय - (उस मार्ग की ओर दृष्टिपात करता हुआ, उत्कण्ठा सहित) क्या बात है, प्रिया के चले जाने पर भी प्रौढ स्मृति मानों साक्षात्‌कार कर रही है। क्योंकि- मेरे द्वारा हाथ से पकड़ी जाने पर भी वह लज्जापूर्वक सखी जनों से मानों छिप रही है। कहीं जाने पर भी बहाने से विलम्ब करती हुई चञ्चल दृष्टि को मानों हरती है । ॥19॥

विदूषक - मित्र, यह सूर्य आकाश के मध्य आरुढ हो गया और भोजन का समय बीत रहा है, अतः हम भी चलते है।

पवनंजय - जो आपको अच्छा लगे । ओह मध्याह्न हो गया है। इस समय निश्चित रूप से -

मार्गदर्शक :- जलपक्षी तालाब के जल में ताप को दूर करें किनारे के वृक्षों की छाया का आश्रय ले रहे हैं। मोर पंखों को सटाकर गाढ़ निद्रा पाकर उद्यान के वृक्षों की शाखा रूप निवासयष्टि का सेवन कर रहे हैं। ॥20॥

(परिक्रमा देकर दोनों चले जाते हैं)

इस प्रकार हस्तिमल्ल रचित अंजना पवनंजय नामक नाटक में पहला अङ्क समाप्त हुआ ।

द्वितीय अङ्क

(अनन्तर वसन्तमाला प्रवेश करती है)

वसन्तमाला - ओह महाराज प्रह्लाद की राजधानी असाधारण रूप से सुन्दर लग रही है। अधिक कहने से क्या विद्याधर लोग इस आदित्यपुर का आलंकारिक वर्णन कर रहे हैं कि अमरावती के सदृश महेन्द्र की राजधानी को छोड़कर हम यहाँ पर सुख से रह रहे हैं। ओह, स्वामी के बन्धुजन की उदारता, जिससे हम लोगों का भी राजकुमारी के सदृश आदर सत्कार हो रहा है। यह बात यहीं रहे। यह बात विशेष रूप से आश्चर्य के योग्य है कि राजकुमारी के स्वयंवर के दिन इन दोनों का सुयोग्य मिलन है, इस प्रकार समल (दूषित अभिप्राय वाले) राजाओं ने प्रतिकूलता को छोड़कर स्वामी का और राजुकमारी का सत्कार किया है अथवा कौन स्वामी के प्रतिकूल हो सकता है। निश्चित रूप से कभी भी राजसिंह हाथी के बच्चों के द्वारा नियुक्त नहीं होता है। राजकुमारी सर्वथा महान् भाग्यशालिनी है। यहाँ पर अधिक क्या कहा जाय। स्वामी के साथ बहुत समय तक वृद्धि को प्राप्त होओ। (परिक्रमा देकर) इस समय स्वामी कहाँ है ? (सामने देखकर) ओह, क्या यह यहाँ बैठे हैं? (अनन्तर बैठा हुआ विदूषक प्रवेश करता है)

विदूषक - माननीया वसन्तमाला ।

वसन्तमाला - क्या आर्य प्रहसित है ?

(समीप में जाता है)

विदूषक - माननीया, मुझे बिना देखे ही क्यों जा रही है ?

वसन्तमाला - मैंने आर्य को नहीं देखा। इस मृदङ्ग के सदृश कुक्षि से छिप गए थे । विदूषक - दासी की पुत्री, क्या तुम्हारे समान मेरा ही उदर अत्यधिक दुर्बल हो । वसन्तमाला - हम तुम्हारे सदृश पाने वाली कौन होती है । आर्य आप बैठे । कैसे आप यहाँ बैठे हुए है ?

विदूषक - माननीया, मित्र की आज्ञा से उन्हें बुलाने के लिए आता हुआ इस कठिनाई से भरे जाने वाले पेट के भार से आक्रान्त होकर मुहूर्त भर के लिए यहाँ बैठा हुआ हूँ ।

वसन्तमाला - आर्य, आज तुम्हारा यह विशेष रूप से बढ़ा हुआ और कठिनाई से भरा जाने वाला उदर कहाँ से है ? (मुस्कराकर) क्या बढ़ा पेट है अथवा गर्भ है । विदूषक - अरी कुम्भदासी, ऐसा नहीं है । बीत रात मैंने भी अनुदारता पूर्वक उन माननीया के अपने हाथ से दी हुई स्वस्तिवाचन पूर्वक पूरियों से यह पेट भर दिया था । आज पुनः प्रातःकाल स्वामिनी के द्वारा अन्तःपुर में जीरे और मिर्च की बहुलता वाला दही से मिश्रित नाश्ता खा लिया । तुम इस समय कहाँ जाओगी ?

वसन्तमाला - इस समय स्वामी कहाँ है, यह जानने के लिए कुमार के भवन में जा रही हैं ।

(नेपथ्य में)

उद्यान के दो अध्यक्ष - अरे अरे, उद्यान के अधिकारी समस्त पुरुषों, आप लोग सुनिए । पहला - सरस मलय वायु की छटा से युक्त प्रमदवन के मध्य चित्रमण्डपों में मणिनिर्मित शालभञ्जिकाओं के स्तनकलशों में पुनः लेप लगा दीजिए ।।1।।

दूसरी बात यह कि - निरन्त अत्यन्त मात्रा में मिले हुए कपूर के चूर्णों से जिनके पत्तों के समूह विकसित हैं ऐसी केतकियों के पराग से उपवन के तालाबों के तीरवर्ती आँगन में शीघ्र ही इच्छानुसार रेतीले तट बनाओ ।।2।। द्वितीय - विशेष रूप से दर्शनीय उपवन की वृक्षों के नीचे के चबूतरों पर मरकत मणि से निर्मित फर्शों पर नए-नए कुङ्कुम के पराग से पत्र रचना कर दो ।।3।। और भी - सुगन्धित फूलों की गन्ध को प्रकट करने वाले जल के प्रवाह से जिसका परिसर भरा हुआ है, ऐसे नवीन अशोक वृक्षों के थावलों से युक्त बहते हुए चन्द्रकान्त मणि से युक्त फव्वारों (धारागृहों) में तत्क्षण ही भली प्रकार कृत्रिम नहरों को तैयार करो ।।4।।

(दोनों सुनते हैं)

वसन्तमाला - आर्य, यह क्या है ?

विदूषक - इस समय माननीया के साथ प्रिय मित्र प्रमदवन के मध्य वकुल उद्यान में प्रवेश कर रहे हैं अतः उद्यानाध्यक्षों के द्वारा समस्त प्रमदवन भूमि सजाई जा रही है । अतः शीघ्र ही जाकर तुम वहीं पर उन्हें लाओ । मैं भी प्रिय मित्र के समीप जाऊँगा ।

वसन्तमाला - आर्य, ऐसा ही होगा । (दोनों चले जाते हैं)

प्रवेशक :

(अनन्तर पवनंजय प्रवेश करते हैं)

पवनंजय - ओह, नव वधू से मिलन का उत्सव कामीजनों के मन को आकृष्ट करने में एक रस, कामदेव की किसी अन्य रस में अनुरक्ति करता है । इस समय - अस्पष्ट अवलोकनों से, अविकसित दाँतों की किरणों से, मन्द मुस्कराहट मार्गदर्शक से, [[?]] मेरे मन को [[?]] औरी मधुर-अधविशिष्ट अक्षरों से, पुनः प्रार्थित वस्तुओं के पाने से, ललित आलिङ्गनों से, विशेष प्रकार की थकानों से विश्वस्त भी अंजना लज्जा को न तो अधिक छोड़ती है और लज्जा का न अधिक सेवन करती है ॥5॥

यहाँ बहुत क्या ? स्वभाव से ही नवसमागम स्वयं ही कामिनियों के न कहे हुए भावों को प्रकट करता है । क्योंकि -

मेरे समीप में स्तनों के समूह की आक्रान्ति की थकान से क्लेशित पसीना निकलने पूर्वक निरन्तर स्पर्शों से रोमाञ्चित, किसी बहाने से सखियों से छिपी हुई, जाने के लिए कदमों को अलसाए हुए रखने से अंजना मेरे मन को किसी अन्य ही दशा पर पहुँचा रही है ॥6॥

(सोचकर) निश्चित रूप से रात्रि की समाप्ति के समय ही हम लोग निवास भवन से निकले । आज- अत्यधिक जड़े सुवर्णमय प्रासाद के अग्रभाग पर सूर्य प्रायः चला गया है ।

यह प्रातः कालीन आतप गुण को दुगुना कर रहा है । यह कबूतरों का समूह एक महल से दूसरे महल की ओर विहार कर रहा है । बहुत सारे क्रीड़ा मयूर प्रेक्षाभवन की ओर जाने को प्रवृत्त हो गए हैं ॥7॥

प्रिया के बिना थोड़ा सा भी समय नहीं बिता सकता । निश्चित रूप से मेरे दोनों नेत्र उसके मुख कमल को देखने की उत्सुकता रूप स्वभाव वाले है। दोनों हाथ स्तनतटयुगल की क्रीडा में अत्यधिक चंचल हैं, दोनों स्कन्ध प्रदेश हठपूर्वक भुजलताओं के आरोपण की सम्पन्नता चाहते हैं उस सुकोमल नयन वाली अंजना के बिना मन क्षण भर के लिए भी व्यवहार करने में समर्थ नहीं है ॥8॥

(सोचकर) प्रातःकाल ही प्रिया को बुलाने के लिए मेरे पास से मित्र प्रहसित ने प्रस्थान किया था । तो अब भी क्यों विलम्ब कर रहा है । (प्रवेश कर) विदूषक - यह प्रियमित्र मेरे ही आगमन की प्रतीक्षा करते हुए स्वर्णमयी छज्जे पर बैठे हुए हैं । तो मैं इनके समीप जाता हूँ (समीप में जाकर) प्रिय मित्र की जय हो ।

पवनंजय - मित्र, क्या प्रिया आ गई ।

विदूषक - मित्र बकुलोद्यान में आएगी । दोनों वहीं चले ।

पवनंजय - (उठकर) तो प्रमद वन का मार्ग बतलाइए ।

विदूषक - प्रिय मित्र इधर से, इधर से ।

(घूमते है)

विदूषक - (सामने की ओर निर्देश कर) यह प्रमदवन का द्वार है । प्रिय मित्र प्रवेश करें ।

पवनंजय - आगे से प्रवेश करो । (दोनों प्रवेश करते हैं)

पवनंजय - (देखकर) अरे निश्चित रूप से नई तोड़ी हुई स्थल कमलिनी के पुष्प समूह से गिरे हुए अत्यधिक आसव से जिसका भूमिभाग सिंचित है, शुद्ध अन्तः पुर में भोली-भाली सुन्दर स्त्रियों के स्वयं सिंचन से जहाँ नवीन मन्दार का वृक्ष वृद्धि को प्राप्त है, अत्यधिक मधुपान के लम्पट भोरों के समूह से बिखरे गए नए विकसित सहकार (आम्म्र) पुष्प के गुच्छों के समूह से टपकते हुए मकरन्द की धूलिसमूह से आकाश रूपी आँगन जहाँ गुलाबी वर्ण का हो रहा है, मद से अत्यन्त शब्द करने वाले कोयलों के समूह की कूजन के कोलाहल निरन्तर जहाँ कामदेव जाग रहा है, सुन्दर विलासिनी स्त्रियों के बायें चरण कमल के प्रहार रूप अधिक लाड़ प्यार से निकलते हुए निरन्तर फूलों के गुच्छों से जहाँ लाल अशोक का वृक्ष पुलिकत हो रहा है मद के समूह से मन्थर तोता, मैना के पंखों से जहाँ के वृक्षों के शिखर कोमल हो गए हैं, सुखकर और शीतल मन्द पवन से इधर-उधर हिलने वाले हिम के जल कणों से आर्द्र स्पर्श वाले, वसन्त का समय आने से मनोहर प्रमदवन की विशेष रमणीयता आश्चर्यजनक है । यहाँ पर निश्चित रूप से - समीमवर्ती गाभागा छिद्र रहित कनैर के गिरे हुए फूलों के पराग से रंग गए हैं । चतुर्थांश वेदी के स्फटिक मणि निर्मित तटों पर सुवण का शोभा हो गई है । डंठलों से गिरे हुए फूलों से स्वयं रचे गए सुन्दर रत्न स्थलों वाले लतामण्डपों के अन्दर प्रत्येक दिशा में क्रीड़ा संभोग शय्या बन गई है ॥९॥ विदूषक - यह वकुल उद्यान का द्वार है । यहाँ पर बैठकर उनकी प्रतीक्षा करें । पवनंजय - आप जैसा कहें

(दोनों बैठते हैं)

पवनंजय - इतने समय तक अंजना को प्रमदवन भूमि में प्रविष्ट हो जाना चाहिए । (सोचकर) यहाँ कामियों के हृदयों में क्रम से हजारों उत्कण्ठाओं से बद्ध हजारों सोपान परम्पराओं पर काम अधिरोहण कर रहा है; क्योंकि

ललनाओं का चित्त सुनकर देखने की शीघ्रता करने वाला होता है । अनन्तर देखकर समागम की प्रार्थना करने वाली चिन्ता का सेवन करता है । समागम पाकर पुनः विरह न होने के उपाय को चाहता है । यह कामोन्माद प्रत्येक कदम पर वृद्धि को प्राप्त होता है ॥१०॥

(सुनकर) क्या प्रिया आ ही गई

यह उसका यथोयोग्य सुन्दर मणियों वाले मञ्जीरें के मनोहर शब्द से युक्त प्रवेश के समय के मङ्गल बाजे की ध्वनि सुनाई पड़ रही है ॥११॥ (अनन्तर अंजना और वसन्तमाला प्रवेश करती हैं)

वसन्तमाला - राजकुमारी इधर से आइए, इधर से

(घूमती हैं)

विदूषक -

पवनंजय -

विदूषक -

पवनंजय -

विदूषक -

वसन्तमाला -

पवनंजय -

पवनंजय -

विदूषक -

विदूषक -

वसन्तमाला -

पवनंजय -

विदूषक -

वसन्तमाला -

वसन्तमाला -

विदूषक -

विदूषक -

क्या माननीया आ गई ।

(देखकर) मञ्जरों की आवाज के लोभ से हंसों ने, निःश्वास की वायु के सुख सौरभ से भौरों ने, करधनी की आवाज के रस से सरसों ने यह प्रमदवन की अधिष्ठात्री देवी ही मानों प्राप्त की है ॥12॥

मित्र, आप उठें, जब तक बकुल नामक उद्यान में प्रवेश करें । जैसा आप कहें (दोनों उठते हैं) ।

(समीप में जाकर) आपका कल्याण हो । आचार्य श्री सुविधिसागर जी म (समीप में जाकर) स्वामी की जय हो ।

(अंजना को हाथ में पकड़कर) प्रिये इधर से, इधर से

(सभी घूमते हैं)

(देखकर) प्रिये बकुल नामक उद्यान की उत्कृष्ट लक्ष्मी को देखो। क्योंकि- यह नवीन बकुल आज पुष्पों से विद्याधरियों के कुरले के आसव के सिंचन रूप दोहले के रसास्वादन से उस सौरभ को धारण कर रहा है। गीले महावर से रंगे चरणकमल से सत्कार को प्राप्त लाल अशोक का वृक्ष फूलों से उसकी लालिमा की शोभा रूप गुण को धारण कर रहा है ॥13॥

मित्र चित्रमण्डप को ही चलते हैं। तो इस समय उसी की ही चरण चौकी का मार्ग बतलाइए ।

इधर से (घूमते हैं)

(सामने निर्देश कर) मित्र, यह चित्रमण्डप है। इसके समीप चलते हैं । (सभी प्रवेश का अभिनय करते हैं)

स्वामी, यह नए खिले हुए पुष्पों के पराग से स्वच्छु रेशमी वस्त्र के चादर से युक्त शय्या है। स्वामी इसे अलङ्कृत करें ।

(सभी यथायोग्य बैठते हैं)

(स्पर्श का अभिनय कर)

प्रिये ! तत्क्षण फूली हुई बकुल की कलियों से निकली हुई मदिरा के कणों को ले जाने वाली सुन्दर भ्रमरी का यह मधुर गीत है। तुम्हारे तत्क्षण गमन के थकान से उत्पन्न पसीने को हरने वाला ठंडा मलयपवन मन्द-मन्द चल रहा है ॥14॥

सुख से सेव्य यह प्रदेश मानों आँखों को घुमा रहा है।

स्वामी, यह आर्यप्रहसित इस समय बैठे-बैठे अत्यधिक ऊँघने के कारण अश्वशाला के बन्दर की लीला का अनुसरण कर रहा है।

(अंजना और पवनंजय मुस्कराकर देखते हैं)

क्या यह आकाश में जुगाली का अभ्यास कर रहा है।

(स्वप्न देखता है.) माननीया, ये लड्डू बड़े स्वादिष्ट हैं। (सभी हंसते हैं ।)

(गिरता हुआ जागकर और बैठकर लज्जापूर्वक) हे मित्र, अकारण क्यों हँस रहे हैं ?

पवनंजय - (मुस्कराकर) कुछ नहीं ! सविधिसागर जी महाराज

वसन्तमाला - (हँसी के साथ) अरे भूरे बेन्दर, स्वप्न में भी लड्डुओं को नहीं भूलते हो। विदूषक - (कोप के साथ) मित्र, यह दासी की पुत्री आप दोनों के आगे भी मेरा तिरस्कार करती है । अतः यहाँ ठहरने से क्या ?

(क्रोध के साथ उठता है)

अंजना - (मुस्कराहट के साथ) आर्य, मत, ऐसा मत करो। यह अविनीत है। क्षमा करो ।

पवनंजय - मित्र, प्रिया रोक रही है ।

(विदूषक मानों न सुन रहा हो, इस प्रकार शीघ्र चला जाता है)

वसन्तमाला - हूँ, कुपित हुए आर्य प्रहसित चले गए। सो चलकर इसे मनाती हूँ। (विदूषक के समीप जाकर) आर्य मत कुपित हो, मत कुपित हो ।

विदूषक - माननीया, यदि मेरी निद्रा भङ्ग नहीं करोगी तो कुपित नहीं होऊँगा । वसन्तमाला - (जो आर्य को रुचिकर लगे) ।

विदूषक - जब तक मैं इस बकुल के चबूतरे पर नींद लेता हूँ ।

वसन्तमाला - आर्य ठीक है। मैं भी इधर-उधर मलय पवन का सेवन करती हूँ। विदूषक - माननीया वसन्तमाला, मुझे यहाँ अकेले सोने में डर लग रहा है । अतः तुम दूर नहीं निकल जाना ।

वसन्तमाला - (मुस्कराकर) आर्य, वैसा ही करूँगी। विस्वस्त होकर सोइए । (विदूषक नींद लेता है)

पवनंजय - हूँ प्रिये, यह स्थान एकान्त और रमणीय है । तो इस समय भी अभिलषित विश्वास के अवरोधक लज्जारूपी रस में तुम्हारी यह अनुरक्ति कौनसी है। (अंजना लज्जा का अभिनय करती है ।)

पवनंजय - (अनुरोध पूर्वक)

तुम अपने अङ्गों को आलिङ्गन हेतु क्यों नहीं देती हो ? मुख रूपी चन्द्रमा को पान करने के लिए क्यों अर्पित नहीं करती हो ? मेरे दर्शन पथ में दृष्टि क्यों नहीं डालती हो ? बोलती क्यों नहीं हो, देवि ! निरुद्धकण्ठ क्यों हो? ॥15॥ (नेपथ्य में महान् कोलाहल होता है)

विदूषक - (घबड़ाहटपूर्वक जागकर और उठकर) वसन्तमाला बचाओ, बचाओ । (घबड़ाई हुई प्रवेश करके)

वस्तमाला - आर्य मत डरो ।

अंजना (घबड़ाहट के साथ) हूँ, यह क्या है।

विदूषक - मैं यहाँ ठहरने से डर रहा हूँ। तो महाराज के पास आओ । (समीप में जाते हैं।)

पवनंजय - (सोचकर) तात के प्रस्थान की भेरी का शब्द कहाँ से ।

विदूषक - ऐसा होना चाहिए ।

पवनंजय - विजयार्द्ध की गुफा से निकलने वाला, गुफा द्वार को प्रतिध्वनित करता हुआ, ऊपर की ओर गर्दन किए हुए मेघ की ध्वनि के उत्सुक पालतू मोरों को नचाता हुआ, शत्रुक्षत्रियों के कुलक्षय का एकमात्र सूचक, सम्पूर्ण रूप में आकाश को रोके हुए पिता के प्रस्थान की भेरी की यह ध्वनि कहाँ से फैल रही है ? ।।16।।

(प्रवेश करके)

प्रतीहारी - कुमार की जय हो । कुमार को देखने के लिए आए हुए ये अमात्य आर्य विजयशर्मा बकुल उद्यान के द्वार पर बैठे हैं ।

पवनंजय - (अंजना से) प्रिये, इस समय अपने भवन की ओर ही जाओ । अंजना - (उठती है) जो आर्य पुत्र आज्ञा दें।

वसन्तमाला - (उठकर) राजकुमारी, इधर से, इधर से ।

(परिक्रमा देकर दोनों चली जाती हैं ।)

पवनंजय - वैजयन्ति, शीघ्र ही प्रवेश कराओ ।

प्रतीहारी - जो कुमार आज्ञा दें। (निकल कर अमात्य के साथ प्रवेश कर) अमात्य मार्गदर्शक इधर से, इधर से । (दोनों घूमते हैं) महाराज

अमात्य - ओह, महाराज की महिमा । क्योंकि

राजा के प्रति अमात्य की निष्ठा कही जाती है, उसका व्यवहार यहाँ पर सदोष दिखाई दिया । स्वयं ग्रहण किए हुए उचित कार्य में लगे हुए, जोकि इसकी सेवा रूप मनोरंजन के लिए हैं । ।।17।।

प्रतीहारी - (सामने की ओर निर्देश कर) यह कुमार हैं, अमात्य, इनके समीप चलिए। अमात्य - (देखकर) अरे कुमार हैं, जो कि यह -

दुर्निरीक्ष्य समस्त पैतृक तेज को धारण करते हुए आकाश के मध्य भाग को उल्लंघन करने वाले सूर्य के अहाते पर आक्रमण कर रहे हैं । ।।18।। (दोनों समीप जाते हैं)

पवनंजय - आर्य, अभिवादन करता हूँ ।

अमात्य - कुमार, कुल की धुरा को धारण करने वाले होओ ।

पवनंजय - वैजयन्ति, इनके लिए आसन लाओ ।

प्रतीहारी - यह वेत का आसन समीप में है, अमात्य बैठिए । अमात्य - (बैठकर) वैजयन्ति, समस्त परिजनों को मनाकर दरवाजा बन्द कर दो । प्रतीहारी - जो अमात्य की आज्ञा । (चली जाती है)

पवनंजय - आपके आने का क्या प्रयोजन है ।

अमात्य - कुमार, सुनिए ।

पवनंजय - मैं सावधान हूँ।

अमात्य - कुमार ने सुना ही है कि दक्षिण समुद्र के मध्य में त्रिकूट पर्वत पर लङ्कापुरी में निवास करता हुआ राक्षसों का स्वामी दशग्रीव (रावण) है। पवनंजय - है, सुना जाता है ।

अमात्य - उसका पश्चिम समुद्र में स्थित पातालपुर में रहने वाले वरुण के साथ बहुत बड़ा विरोध था ।

पवनंजय - अनन्तर क्या हुआ ।

अमात्य - अनन्तर दशग्रीव ने भी खर और दूषण प्रभृति से अधिष्ठित बहुत बड़ी सेना को वरुण के प्रति नियोजित किया ।

पवनंजय - अनन्तर

अमात्य - बहुत बड़ा संग्राम छिड़ने पर वरुण ने खर, दूषण प्रभृति को पकड़ लिया। पवनंजय - अनन्तर

अमात्य - इस प्रकार के मानभङ्ग को धारण करते हुए दशमुख रावण ने खर दूषणादि को छुड़ाने के लिए दूत के मुख से महाराज से याचना की ।

पवनंजय - अनन्तर ।

अमात्य - इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर महाराज ने नगर की रक्षा के लिए कुमार को बुलाकर, उन्हें यहाँ ही ठहराकर स्वयं प्रस्थान प्रारम्भ कर दिया है । पवनंजय - (हास्य पूर्वक) आर्य अस्थान में पिताजी का यह प्रस्थान का आरम्भ कहाँ से ?

जिसने बहुत बड़े हाथी के मस्तक तट को विदीर्ण किया है, उस हाथी से छूटे हुए मोतियों की पंक्ति से जिसके दाँत रूपी भालों के छिद्र खुरदरे हो गए हैं ऐसा जो सिंह है, मान में महान् वह यह मृग के शिशु को मारने में लगा हुआ क्या प्रख्यात शौर्य के योग्य अपनी अन्य कीर्ति उत्पन्न कर रहा है ? ॥19॥

तो इतनी सी बात पर मेरा ही जाना पर्याप्त है।

अमात्य - कुमार ने ठीक ही कहा है । क्योंकि -

जिनका पराक्रम बुझा नहीं है ऐसे विद्या से विनीत आप जैसे पुत्रों के रहने पर यथायोग्य रूप से इच्छानुसार कार्यभार स्थापित किए हुए राजा लोग सुखी होते हैं । ॥20॥

फिर भी बिना विचार किए हुए, क्षुद्र है, ऐसा मानकर वरुण की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए । निश्चित रूप से उसके -

आवास स्थान की महिमा का उल्लंघन समुद्र भी नहीं कर सकता । सौ पुत्र शत्रुराजाओं के समूह को पीसने में कुशल है । स्वयंसेवी विद्याधर राजाओं का समूह भी प्रतीहार स्थान की अभिलाषा करता हुआ प्रतिदिन (अपने कार्यों को) पूर्ण करता है ।। ॥21॥

इस प्रकार प्रतिपक्ष के ऐसे पराजित होने पर महाराज का बहुत बड़ा यश होगा । तो अत्यन्त आवेग से बस करो । महाराज कुमार के राजधानी में वापिस आने की इच्छा करते हैं।

पवनंजय - (हंसकर) क्या यह आर्य को भी अनुमत है । तो शीघ्र ही देखिए - क्रोध से पाताल तल से बलात् वेगपूर्वक निर्मूल उखाड़ी गई उस पातालपुरी को मैं समुद्र के मध्य डाल दूँगा युद्ध में गाढ़ रूप से छोड़े हुए, गिरते हुए बाणों के अग्रभाग से उगली हुई चिनगारियों वाली अग्नि की ज्वालाओं से ग्रास बनाए हुए शत्रुओं के लहू सूखें ॥22॥

अमात्य - क्या यह कुमार के लिए बहुत भारी है ।

विदूषक - अमात्य ठीक कहा ।

अमात्य - क्या कुमार ने युद्ध की प्रतिज्ञा कर ली ।

पवनंजय -

और क्या ।

अमात्य -

तो महाराज ही यहाँ प्रमाण हैं। तो इस समय महाराज को ही देखते हैं । पवनंजय -

जी हाँ । प्रथम सङ्कल्प है ।

विदूषक -

तो प्रिय मित्र उठें ।

(सभी उठते हैं)

पवनंजय -

धारा प्रवाह निकलते हुए शत्रुओं के [[?]] के गले से निकलते हुए रक्त की धारा के प्रवाह में छिपे हुए पश्चिम समुद्र में असमय ही सन्ध्या की लालिमा रचती हुई, बिना किसी बहाने के प्रत्येक दिशा में निविड जलती हुई वाडवाग्नि की शङ्का करती हुई मेरी स्थिर खङ्गयष्टि इच्छानुसार संग्राम लीला का अनुभव करे । ॥23॥

विदूषक -

इधर से, इधर से ।

(परिक्रमा देकर सभी निकल जाते हैं)

हस्तिमल्ल के द्वारा विरचित अञ्जना पवनंजय नामक नाटक में द्वितीय अङ्क समाप्त हुआ ।

तृतीयो अङ्क

(अनन्तर विदूषक प्रवेश करता है)

विदूषक -

वरुण की निराबाध सामग्री आश्चर्यजनक है। जो कि इतने समय तक प्रतिदिन युद्ध की भीड़ बढ़ रही है। युद्ध की धुरा सौ पुत्रों में निक्षिप्त होने से युद्ध रूपी आँगन में कदाचित् घुसा नहीं जा सकता अथवा यहाँ मित्र की प्रशंसा करना चाहिए जो इस प्रकार राजीव प्रमुख महान् बलशाली वरुण के सौ पुत्रों के परस्पर में प्रयुक्त महान् विद्याओं से भयानक युद्ध के अग्रभाग में इन चार माह प्रतिदिन विशेष रूप से पराक्रम करते हुए विजय के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो रहे हैं। (सांस लेकर) यह समस्त संग्राम की घटना प्रहसित के ही दुश्चरित का परिपाक है जो इस प्रकार एक ओर इस कठिनाई से सुने जाने वाले समुद्र के घोष से, एक ओर कठोर, सन्नद्ध सेना के कोलाहल से, एक ओर भयानक रूप से गिरते हुए सैकड़ों बाणों के शब्द से, एक ओर कर्णकटु धनुष की प्रत्यञ्जा के गुंजार से, एक ओर भीषण विजय द्रिण्डिम निर्घोष से कानों के समूह को बहरा बनाता हुआ, रात-दिन अत्यधिक भयभीत हुआ, निद्रा के सुख को भूलकर, विश्वास पूर्वक भोजन का भी अवसर न पाकर यथार्थ रूप में रुग्ण स्थिति का आचरण कर रहा हूं। राजपुत्र की मित्रता सर्वधा उद्वेग उत्पन्न करने योग्य है। विशेषकर यहाँ खरदूषणादि के छोड़ने का उत्साह मुझे बाधा पहुँचा रहा है, जो कि हत आशा वाले खरदूषणादि के विघ्न की आशङ्का कर शीघ्र ही वरुण के मानभङ्ग का परिहार करते हुए विद्याबल से धीरे-धीरे ही मित्र युद्ध कर रहे हैं। अन्यथा कौन प्रतिपक्षी युद्ध के अग्रभाग में मित्र के सामने मुहुर्त पर भी व्यवहार करने में समर्थ हो सकता है। आज इस एक दिन मुझ ब्राह्मण के ही भाग्य से दोनों पक्षों के सेनापतियों के द्वारा पारस्परिक सेना के विश्राम के लिए सौभाग्य से युद्ध कार्य रोक दिया है। इस प्रकार प्रभात से इतने समय तक चतुरङ्ग सेना के दर्शन के उत्सुक होकर अवसर प्राप्त न होने से कभी मैंने प्रिय मित्र की सेवा नहीं की। इस समय सायंकालीन सन्ध्या के समुदाचार के लिए राजसभा से निकले हुए इस समय कहाँ है। (सामने देखकर) यह धनुष को धारण करने वाली शरावती है। तो इससे पूछता हूँ। (आकाश में) माननीया शरावति ! मित्र इस समय कहाँ है ? क्या कहते हो, सन्ध्या कार्य समाप्त करके, समस्त परिजनों को निषेध करके आर्य कुमुद्वती के तीर प्रदेश पर विद्यमान है। तो वहाँ जाता हूँ। (घूमता है ।)

(अनन्तर पवनंजय प्रवेश करता है)

पवनंजय - (देखकर) ओह सागर के परिसर प्रदेशों की सुख सेव्यता आश्चर्यजनक है। यहाँ पर निश्चय से –

सेना के हाथी रुग्णचन्दन रसों का कुरला करते हुए नदी के तीर के पास धीरे-धीरे तमाल पल्लवों के समूह को तोड़ते हुए तत्क्षण युद्ध के परिश्रम के अपहरण से सैनिकों के द्वारा सम्मानित होकर सुखकर शीतल और सुगन्धित समुद्र तट के वन के छोरों की वायु का सेवन कर रहे हैं । ।।1।। विदूषक - ये मित्र हैं। तो इनके समीप जाता हूँ (समीप जाकर) प्रिय मित्र की जय हो ।

पवनंजय - मित्र कैसे ?

विदूषक - हे मित्र, जिसमें चन्द्रमा का उदय निकटवर्ती है, ऐसे आकाश के भाग की दर्शनीयता को देखो ।

पवनंजय - (देखकर)

जिसका उदय समीपवर्ती है ऐसा चन्द्रमा की किरणों का समूह हठात् अन्धकार के मध्य प्रविष्ट होता हुआ, इस समय दर्शनीय है। जिसके अन्दर जल है, मरकतमणि की शिला के समान श्यामल जलराशि वाली मन्दाकिनी के समान चन्द्रकान्त मणि के द्रव का गौर प्रवाह है । ।।2।।

विदूषक - हे मित्र देखिए, यह विरही जनों के हृदय में स्नान करने से लगे हुए रुधिर से लाल कामदेव के भाले के समान, उत्कण्ठित कामिनीजन के हरिचन्दन से लिप्त ललाटपट्ट के समान, चक्रवाकमिथुन के विरही मयूर के प्रथम शिखोदगम के समान, चकोरों के ज्योत्स्ना रूप आसव के पान हेतु रत्नमयी प्याले के समान पूर्व दिशा रूपी वधू के मुख पर लगाए हुए तिलक के समान इस समय अद्धोंदित चन्द्रमा विशेष रूप से शोभित हो रहा है ।

पवनंजय - (देखकर)

मारे गए शत्रु हाथी के मस्तक पर सरुधिर गुलाबी मस्तिष्क से युक्त बड़े हाथी के दन्ताग्र के समान चन्द्रमा का बिम्ब उदित हो रहा है । ।।3।। विदूषक - हे मित्र, हम दोनों एक साथ ही कुमुद्वती के तीर प्रदेशों में चाँदनी का सेवन करें ।

पवनंजय - जैसा आपने कहा ।

(दोनों वैसा ही करते हैं ।)

पवनंजय - और इधर

शीघ्र ही पश्चिम समुद्र से चन्द्रमा की चंचल तरंग रूप हाथों से प्रचुर रूप से गिरते हुए यहाँ पर बिखरे हुए तारागण आकाश में लाए गए अर्घ्य रूप मोतियों की लक्ष्मी को धारण कर रहे हैं । ॥4॥

विदूषक - (सामने की ओर निर्देश कर) मित्र यहाँ सहचर को खोजती हुई अकेली चकवी को देखिए ।

पवनंजय - (देखकर) अरे बड़े कष्ट की बात है। सहचर को खोजती हुई बेचारी शोचनीय दशा का अनुभव कर रही है। देखिए -

विरह से दुःखी यह चकवी बार-बार चन्द्रमा से द्वेष करती है, बार-बार कुमुदवन मार्गदर्शक में प्रवेश करती है, बार-बार चुप रहती है, बार-बार अत्यधिक करुण क्रन्दन करती है, बार-बार दिशाओं की ओर देखती है, बार-बार रेत पर गिरती है, बार-बार मोहित होती है । ॥5॥

(मन ही मन) अतः कष्ट है। मेरे प्रवास से अंजना भी प्रायः इस प्रकार की दशा पर पहुँचती होगी। (निश्चल खड़ा रहता है)

विदूषक - क्या बात है, मित्र कैसे घिरे हुए से बैठे हैं। मित्र चुप क्यों बैठे हो (हाथ खींचकर) हे मित्र ! चुप क्यों बैठे हो ।

पवनंजय - (गला भरे हुए स्वर में)

काम के एक मात्र सारथी चन्द्रमा के चाँदनी बिखेर कर उदित होने पर कामिनी कौन अत्यधिक दुःसह विरह को सहती होगी । ॥6॥

विदूषक (मन ही मन) - प्रिय मित्र उत्कष्ठित से कैसे हैं ?

पवनंजय - संग्रामों में प्रतिदिन दुगने उत्साह से मेरे द्वारा बिताया गया यह दीर्घकाल भी चला गया, इसकी मैं पराधीनता के कारण परवाह नहीं की। कष्ट की बात है, इस समय स्वप्न में भी असंभव उस असहय विरह व्यथा को सहन करने में महेन्द्र राजा की पुत्री कैसे समर्थ होगी ।

विदूषक - हे मित्र ! तुम इस समय अत्यन्त रूप से दुःखी क्यों दिखाई दे रहे हो ? पवनंजय - (कामावस्था का अभिनय करता हुआ)

इधर से इलायची की लता को कँपाता हुआ मलयपवन धीरे-धीरे चल रहा है। इधर चन्द्रमा कुमुद के समान स्वच्छ चाँदनी के समूह को वर्षा रहा है। इधर कामदेव अत्यधिक रूप से छोड़े हुए बाणों से बींध रहा है। हे मित्र ! तुम निः शंक होकर कहो, मुझे किस प्रकार सान्त्वना दे रहे हो। ॥8॥

विदूषक - क्या बात है ? इस समय इसका कामोन्माद प्रवृत्त हो रहा है । पवनंजय - ओह, महान् आश्चर्य है।

इसके बाण पुष्पों के हैं और अत्यधिक निर्बल वे पाँच की संख्या को प्राप्त है, स्वयं यह अनङ्ग होकर कैसे जगत् को जीत रहा है । ॥9॥

विदूषक - (मन ही मन) यह बहुत अधिक खिन्न हैं, अतः इनका मन बहलाता हूँ। (हाथ में लेकर) हे मित्र, जरा अन्दर आओ। राजा लोग तुम्हारी सेवा करने के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं।

पवनंजय - (बिना सुने ही सांस लेकर बैठ जाता है)

विदूषक - (उपहास सहित) मेरे वचनों का ठीक पालन किया ।

पवनंजय - बिना स्थान के ही क्यों प्रलाप कर रहे हो । चुपचाप बैठ जाओ । विदूषक - क्या करूँ (बैठ जाता है) ।

पवनंजय - (उत्कण्ठा के साथ)

मार्गदर्शक - मेरे आगमन पर जिसे कोई अनोखी लज्जा उत्पन्न हुई थी, गाल रूपी फलक विकसित हो गए थे, अधर और ओठ फड़कने लगे थे ऐसी मेरे विरह की खिन्नता के समूह से दुःखी उसका मुखकमल कब देखूँगी । ॥10॥

विदूषक - यह उत्कण्ठा का अवसर नहीं है ।

पवनंजय - यह कार्योपदेश का अवसर नहीं है ।

विदूषक - इस समय मुझे क्या करना चाहिए ।

पवनंजय - मित्र, उपकरण के साथ चित्र बनाने की तख्ती ले आओ, जिससे कि इस समय चित्रगत भी प्रिया को देखें ।

विदूषक - क्या उपाय है । जो आप कहें । (उठकर चल देता है)

पवनंजय - मित्र, आओ ।

विदूषक - (समीप में जाकर) आज्ञा दीजिए ।

पवनंजय - जिससे कंप उत्पन्न हो रहा है, जो चाँदनी के आतप के संतप्त है, ऐसा यह हाथ कुछ लिखने में समर्थ नहीं है । ॥11॥

विदूषक - जैसा आप पसन्द करें, वह करूँ ।

पवनंजय - वत्स,

कुमुद के पत्तों की यहीं पर शय्या बना दो, शीतल स्पर्श वाले केले के पत्तों से मलयवायु से तप्त शरीर पर हवा करो । ॥12॥ अथवा

यह चाँदनी और यह मलय पवन भी जिस प्रकार मेरे सन्ताप के लिए हुआ, कहो कुमुदों से और केले के पत्तों से वह कौन से धैर्य को प्राप्त करेगा? अतः अधिक कहना व्यर्थ है। केवल महेन्द्र पुत्री अंजना के गाढ आलिङ्गन से ही मैं सान्त्वना प्राप्त करूंगा, ऐसा मैं मानता हूँ । ॥13॥ विदूषक - ठीक है, इस समय इसे अच्छी तरह किया जा सकता है। वह तो विजयार्द्ध पर है और आप यहाँ दक्षिण भूमि में विद्यमान हैं ।

पवनंजय - मित्र, हम इस समय विमान पर चढ़कर विजयार्द्ध की ओर ही चलते है (उठता है)

विदूषक - (उठकर) हे मित्र, जरा सुनो ।

पवनंजय - धीरे से कहो ।

विदूषक - यहाँ महाबली, तुम्हारे प्रतिपक्षी वरुण के स्थित रहने पर छावनी छोड़कर जा रहे हो, यह बात मेरे लिए अनुचित प्रतीत हो रही है।

पवनंजय - (कोप के साथ) ।

शीघ्र ही तीनों लोकों की भयभीत निजस्त्रियों के कण्ठग्रहण को देने वाले प्रत्यञ्चा के घोषों से आकाश में श्रोत्र मार्ग को बहिरा बनाती हुई फूलों की वर्षा हो । कान तक खींचकर छोड़े गए तीक्ष्ण सैकड़ों बाणों से दिशाओं के भाग को ढकता हुआ यह में आज समस्त शत्रुपक्ष को बलपूर्वक चूर्ण- चूर्ण करता हूँ । ।।14।।

विदूषक - क्या यह प्रहलाद के पुत्र के लिए असंभव है । फिर भी यह राजधर्म नहीं है।

पवनंजय - क्या संग्राम राजधर्म नहीं है ।

विदूषक - नहीं, जल्दी मत करो । इस समय दोनों सेनाओं ने एक दिन का युद्ध रोका हुआ है ।

पवनंजय - मित्र, तुमने मुझे ठीक याद दिलाया । ओह शत्रु समूह का जीवन अवशिष्ट है।

विदूषक - इस प्रकार यहाँ आपका जाना सर्वथा उचित नहीं है ।

पवनंजय - यदि यह बात है तो इसी समय जाकर हम लोग सूर्य के उगने से पूर्व ही लौट आयेंगे ।

विदूषक - यह भी उचित नहीं है । इस प्रकार शत्रु को जीतने के लिए गए हुए तुम कार्य समाप्त किए बिना नगर में प्रवेश करोगे तो महाराज और प्रजायें क्या कहेगी ।

पवनंजय - मित्र, तुमने ठीक कहा । जिसका आगमन विदित नहीं है, ऐसे हम लोग अंजना के समीपवर्ती उद्यान में उत्तर जाँयेगे ।

विदूषक - यहाँ ठहरते हुए सेनापति मुद्गर क्या तुम्हें नहीं खोजेंगे ? पवनंजय - तो मुद्गर से जाने गए ही जाँयेगे ।

विदूषक - इसके विषय में उससे कहना ठीक नहीं हैं।

पवनंजय - बात यही है । किसी बहाने से जाना चाहिए । अरे यहाँ पर कौन है ? (प्रवेश कर)

शरावती - कुमार आज्ञा दें ।

पवनंजय - शरावति, मेरे वचनों के अनुसार सेनापति मुद्गर से कहो कि प्रातःकाल से चार प्रकार सेना की सामग्री के दर्शन के दबाव से मेरा मन इस समय नींद को चाह रहा है । तो इस समय आप नियोजित सांग्रामिकों को सावधानी पूर्वक तैयार करना ।

शरावती - जो कुमार की आज्ञा । (चल पड़ती है)

पवनंजय - शरावती, जरा आओ ।

शरावती - (समीप में जाकर) आज्ञा दो ।

पवनंजय - मैं इसी कुमुद्वती के तीर प्रदेश पर रेशमी वस्त्र से बने पटमण्डप में शयन करता हुआ रात्रि बिताता हूँ । तुम भी प्रतिहारवर्ग के साथ समस्त परिजनों को रोककर प्रवेशद्वार को बन्द कर दो ।

शरावती - जो कुमार की आज्ञा (निकल जाती है)

पवनंजय - मित्र, अधिक विलम्ब क्यों कर रहे हो (विद्या की भावना कर) यह विमान आ गया । तो हम दोनों इस पर आरोहण करें ।

विदूषक - जो मित्र की आज्ञा ।

(दोनों चढ़कर विमान यान को देखते हैं)

पवनंजय - (विमान के वेग को देखकर)

कुटुम्ब का बच्चा यह चन्द्रमा आकाशजल रूप समुद्र के चाँदनी रूप जल में शीघ्र दौड़ता हुआ विमान रूपी जहाज पीछे दौड़ता हुआ सा प्रतीत हो रहा है ॥१५॥

विदूषक - तुम निश्चित रूप से पवनवेग हो । (सामने की ओर निर्देशकर) हे मित्र, यह रजतगिरि चन्द्रमा केवल रूप सादृश्य से जल सहित मेघ का आचरण करता हुआ श्रेणि रूप वन पंक्ति में विलीन दिखाई पड़ रहा है । पवनंजय - क्या चन्द्रमा गिर रहा है अथवा रजतगिरि पर ही चढ़ रहा है, यह विशद चाँदनी अब इस प्रकार मेरे मन में शंका उत्पन्न कर रही है ॥१६॥ विदूषक - हम लोग रजतगिरि को प्राप्त हो चुके हैं । यह विमान यहाँ स्थित है, तो उतरो ।

पवनंजय - जैसा आप कहें (उतरने का अभिनय करता है)

विदूषक - मित्र, वह उनकी चौशाला के मध्य में कौमुदीप्रासाद है, तो इसके भवनतले उतरें ।

पवनंजय - जैसा आप कहें ।

(दोनों उतरते हैं)

(अनन्तर विरहोत्कण्ठिता अंजना और उसके शीतल उपचार में व्यग्र वसन्तमाला प्रवेश करती है ।)

अंजना - (कामावस्था का नाट्य करती हुई, चाँदनी के स्पर्श का अभिनय कर) - सखि, इस चाँदनी को केले के पत्ते से रोको ।

वसन्तमाला - हूँ, यहाँ पर क्या करें । यह दिन में भी चाँदनी के अङ्कुर की आशङ्का करती हुई मृणालवलय से परिष्कृत होकर काँपती है । चन्द्रमा के बिम्ब की शंका कर मणिदर्पण नहीं देखती है । मलयवायु की आशंका करती हुई केले के पत्ते की वायु का निवारण करती है । कामदेव के सैकड़ों बाणों की शंका करती हुई फूलों की शय्या को नहीं सहती है । चन्दन के द्रव की शंका करती हुई चन्द्रकान्तमणि के प्रवाह का परिहार करती है ।

(दोनों सुनते हैं)

पवनंजय - निश्चिय रूप से इधर से वसन्तमाला बोल रही है ।

विदूषक - केवल वसन्तमाला ही नहीं है । तुम्हारे विरह से उत्कण्ठित वह भी इसी चन्द्रकान्त प्रासाद के द्वार पर विद्यमान है ।

अंजना - (बांयी आँख फड़कने की सूचना देकर) ओह यह बाईं आँख फड़क रही है ।

वसन्तमाला - राजकुमारी, शीघ्र ही पति को देखोगी ।

अंजना - संताप का अभिनय करती हुई । कितने काल तक मैं इस शिशिरोपचार के दुःख को सहूँगी ।

पवनंजय - (सुनकर और देखकर, मन ही मन) क्या इस समय प्रिया दूसरी ही अवस्था में विद्यमान है । यह निश्चित रूप से -

दुर्बल शरीर वाली, शिथिल गाँठ वाली, आँसुओं से मैले नेत्र वाली, श्वास युक्त, केशपाश खुले हुई, विरह में संसर्ग युक्त सी हो गई है । ।।16।। अंजना - हाय आर्यपुत्र, मुझे कब दर्शन सुख दोगे । (इस प्रकार मोहित होता है) वसन्तमाला - (घबराहट के साथ) राजकुमारी धैर्यधारण कीजिए, धैर्य धारण कीजिए । पवनंजय - (घबराहट के साथ समीप में जाकर) प्रिये, धैर्य धारण करो । विदूषक - (घबराहट के साथ समीप में जाकर) आप धैर्य धारण करें । वसन्तमाला - (घबराहट के साथ) स्वामी कैसे, स्वामी की जय हो । अंजना - (आश्वस्त होकर और साँस लेती हुई देखकर) आर्यपुत्र कैसे ? (प्रस्थान करना चाहती है)

पवनंजय - हे दुर्बल अङ्गों वाली ! अत्यन्त कष्ट देने से बस करो, वहीं पर धीरे से बैठ जाओ । साक्षात् कटाक्ष से साध्य दासजन के प्रति यह कौन सा व्यवहार है । ।।18।।

(हाथ पकड़कर बैठ जाता है)

विदूषक - अवका कल्याण हो । म के सशत करो ।

अंजना - (विस्मक पूर्वक) सखि वसन्तमाला, क्या यह स्वप्न है या परमार्थ है । वसन्तमाला - अत्यन्त सरल, पति से पूछ ।

पवनंजय - पहले स्वप्न में अनेक बार आए हुए मेरे द्वारा ठगी गई । पुनः मेरे आ जाने पर यह मुग्धा आज विश्वास नहीं कर रही है । ।।19।।

वसन्तमाला ! हम दोनों को यहाँ आए किसी ने देखा नहीं है । तो इस समय जैसे कोई आगमन को न जाने, वैसा प्रयत्न करना चाहिए ।

वसन्तमाला - जो स्वामी की आज्ञा । आर्य प्रहसित, आओ द्वार की रक्षा करें । विदूषक - जो आप कहती हैं ।

(दोनों चले जाते हैं)

पवनंजय - (अंजना को देखकर)

कमलनाल से अलंकृत, घने चन्दन के द्रव से लिप्त, पीले मुखवाली वह यह चांदनी की अधिष्ठात्री देवी है, ऐसा मैं मानता हूँ । ।।20।। प्रिये इस समय भी विरह शमन का कष्ट उठाने से क्या ? तो इसी समीपवर्ती मणिचन्द्रकान्त वासगृह में प्रवेश करें । (हाथ पकड़कर) प्रिये, इधर से, इधर से ।

श्री हस्तिमल्ल विरिचित अंजना पवनंजय नामक

नाटक में तृतीय अङ्क

समाप्त

चतुर्थो अङ्क

(अनन्तर वसन्तमाला प्रवेश करती है)

वसन्तमाला - यहाँ कभी आए हुए स्वामी को चार माह हो गए। इस समय राजकुमारी का मानों दोहद है। उसके नील कमल के पत्ते के समान दोनों स्तनों के अग्रभाग नीले पड़ गए है। दोनों गाल इलायची के फल के समान पीले

पड़ गए हैं। उदर में रोमपंक्ति अंजन की रेखा के समान स्पष्ट रूप से नीली हो गई है। अतः इस सुन्दर वृत्तान्त को महारानी केतुमती से निवेदन करती हूँ। (परिक्रमा देकर, सामने देखकर) यह कौन इधर आ रही है। क्या बात है, महारानी केतुमती की सेविका युक्तिमती है।

(अनन्तर युक्तिमती प्रवेश करती है)

युक्तिमती - महारानी केतुमती ने आज्ञा दी है कि ‘बड़ी अंजना अस्वस्थ है।’ तो उसकी कुशल पूछकर आओ। तो स्वामिनी अंजना के चतुःशाल (चार खण्ड वाले

भवन) की ओर जाती हूँ ।

(घूमती है)

वसन्तमाला - यह प्रिय सखी युक्तिमती किसी अन्य कार्य में व्यग्र हृदय वाली होकर मुझे बिना देखे ही जा रही है। तो इसके पीछे चुपचाप जाकर आँख बन्द कर उपहास करूँगी । (वैसा ही करती है)

युक्तिमती - (देखकर, मुस्कराहट के साथ) - और कौन मेरे ऊपर इस प्रकार विश्वास करती है । प्रिय सखि वसन्तमाला, तुम पहचान ली गई हो ।

वसन्तमाला - (हाथ छोड़े हुए, हास्यपूर्वक) सखि, तुम निश्चित रूप से युक्तिमती हो। सखि, इस समय तुम कहाँ जा रही थी ?

युक्तिमती - सखि ! अंजना कुछ अस्वस्थ है, अतः महारानी केतुमती की आज्ञा से कुशलता पूछने के लिए जा रही हूँ।

वसन्तमाला - भोली भाली, वह अस्वस्था नहीं है। वह तो दोहद है ।

वसन्तमाला - सखि, जरा सुनो। एक बार अर्द्धरात्रि में प्रहसित के साथ स्वामी आकर चले गए ।

युक्तिमती - हम लोगों को कैसे ज्ञात नहीं हुआ ।

वसन्तमाला - वे युद्ध समाप्त हुए बिना नगर में प्रवेश हुआ हूँ, अतः वीरजनोचित लज्जा से आने को न प्रकट कर रात बिताकर प्रातःकाल हो चले गए ।

युक्तिमती - सखि, ठीक है। तुम कहाँ चल पड़ी थी ।

वसन्तमाला - इस सुन्दर वृत्तान्त को महारानी से निवेदन करने के लिए । युक्तिमती - सखि, स्वामिनी से निवेदन करना युक्त ही है। फिर भी मेरा हृदय कुछ व्याकुल सा है।

वसन्तमाला - क्यों ?

युक्तिमती - महारानी केतुमती स्वामिनी अंजना के अप्रतिम चरित्र को जानती ही है। तथापि विशेषतः स्त्रियों के अभिजात्य की रक्षा करने में महारानी एकान्त (अत्यन्त) सावधान है। अतः इस वृतान्त को सुनकर (न जाने) क्या करेंगी? वसन्तमाला - सखि, इस समय व्यर्थ में ही क्यों दुःखी हो रही हो । चार मास बाद युद्ध समाप्त होने पर आ जाऊँगा, ऐसा कहकर तब स्वामी चले गए थे। चार मास बीत गए । अतः कल या परसों स्वयं स्वामी यहाँ आ जायेगें । युक्तिमती - वह बात भी मानों दूर हो गई ।

वसन्तमाला - कैसे ?

युक्तिमती - वत्स, बिना बाधा के इस समय वरुण का मानभङ्ग नहीं कर सकते। क्योंकि खरदूषणादिका छुड़ाना अवरुद्ध नहीं होगा, उसी प्रकार विद्याबल से युद्ध में व्यवहार करना चाहिए। ऐसा मानकर महाराज सेनापति मुद्गर को लेख भेजेंगे । इस प्रकार कुमार देर करेंगे ।

वसन्तमाला - फिर भी क्या चन्द्रलेखा भी विष उगलती है अथवा क्या चन्दनलता अग्नि उगलती है। अतः स्वामिनी केतुमती के विषय में अन्यथा शङ्का मत करो। युक्तिमती - तो आप जाँय । मैं भी स्वामिनी अंजना के दोहला उत्पन्न होने से रमणीय रूप को देखकर आँखों के फल का अनुभव करूँगी ।

वसन्तमाला - सखि, वैसा ही हो। (चली जाती है) ।

युक्तिमती - (घूमती हुई, आकाश में लक्ष्य बाँधकर) स्वामिनी केतुमती, के प्रति तुम्हारे असाधारण प्रेम, चरित्र और सत्यपालन को मैं जानती ही हूँ। फिर भी केवल अपने दुःख के कारण निवेदन कर रही हूँ। दूसरे की निन्दा की शङ्का करती हुई मेरी निजी उदारता अनुचित न हो जाय ।

(नेपथ्य में)

माननीया युक्तिमती-1

युक्तिमती - मुझे कौन बुला रहा है। (पीछे देखकर) कञ्चुकी लब्धभूति कैसे ? (प्रवेश कर)

कञ्चुकी - माननीया उक्तिमती ।

युक्तिमती - (समीप में जाकर) आर्य मुझे क्यों बुला रहे है ? कञ्चुकी - अब आप वहाँ न जाँय । महारानी की ही समीपवर्तिनी होओ । युक्तिमती - (शङ्का सहित) आर्य, महारानी की आज्ञा से स्वामिनी अंजना की, जो इस समय कुछ अस्वस्थ हैं, कुशल पूछने के लिए मैं चली थी ।

कञ्चुकी - स्वयं महारानी तुम्हें बुला रही हैं।

युक्तिमती - (विषाद सहित, मन ही मन) हूँ जैसा मैने सोचा था, वैसा ही हो गया (प्रकट में) आर्य, यदि ऐसा है तो महारानी के पास जाऊँगी । (चली जाती है) कञ्चुकी - (परिक्रमा देता हुआ) अरे, बड़े खेद की बात है ।

अपने अभिजात्य के अधीन निर्दोष चरित्र जानकर भी कुलस्त्रियाँ प्रायः थोड़ी सी भी निन्दा से डरती हैं । ।॥

तो इस समय शाखानगर की ओर ही चलता हूँ। (घूमकर और अपने आपको देखकर)

अरे, अविशद वाणी को कठिनाई पूर्वक बाँधकर उपहास को प्राप्त हुआ कुकवि के समान पद-पद पर पुनः-पुनः स्खलित हो रहा हूँ। निराबाध मन वाला ही मैं मृदु कदम रखता हुआ वृद्धावस्था पाकर भी प्रौढ़ कवि की समता को प्राप्त हो गया हूँ। ।।2।।

अथवा - प्रत्येक नए आम से निकलते हुए कोमल पत्ते को चाहने वाली बाला सुकुमार हाथ के अग्रभाग से कर्णमूल में बिखरे हुए पत्ते से क्या बना रही है ? कहीं- कहीं पर वृद्धावस्था भी निन्दा के योग्य हो गई । ।।3।।

(सामने देखकर) यह गोपुर है। इससे निकलकर शाखानगर में प्रवेश करता हूँ। (घूमकर) मैं शाखानगर में प्रविष्ट हुआ हूँ। (सामने देखकर) यह क्रूर विद्याधर भैरव का सेवक हिन्तगलक प्रकट रूप से विकसित नीलकमल के ढेर के बन्धन से युक्त अग्रहस्त वाला शीघ्र ही इधर से दौड़ रहा है। तो मैं इसे बुलाता हूँ। रे-रे हिन्तालक ।

(यथानिर्दिष्ट वे पर्दा हटाकर प्रवेश) सुविसागर जी महाराज

चेट - (देखकर) कैसे आर्य लब्धभूति स्वयं आकर मुझे बुला रहे हैं। (समीप में जाकर) स्वामी, यह मैं नमस्कार करता हूँ (प्रणाम करता है) ।

कञ्चुकी - हिन्ताल, मेरे वचनों के अनुसार क्रूर को यही बुलाओ । चेट - स्वामी, उसका आप जैसों के बोलने का यह अवसर नहीं है । कञ्चुकी - क्या ?

चेट - (हाथ से निर्देश कर) भट्टारक, यह चन्द्रमा के बिम्ब के सदृश भैरवी चक्र के कपाल से युक्त बायें अग्रहस्त वाला, घर्घरिका के घर्घर निर्घोष से मुखर चरण युगल वाला, उमरु को पीटने में चञ्चल दक्षिण हाथ वाला, स्कन्ध प्रदेश पर त्रिशूलदणु, धारण किए हुए, लाल चन्दन के तिलक से शोभित ललाटपट्ट वाला, जपा कुसुम के समान भंयकर लाल नेत्रों वाला विद्याधर भैरव भैरव के समान विद्यमान है । और

यह क्रूर स्वामी सुदुर्लभ, सुगन्धित मदिरा को पीकर नाचता है, गाता है, घूमता है, स्खलित होता है और अकारण ही हँसता है ।।4।।

कञ्चुकी - (देखकर) कैसे मदोन्मोह उमड़ा हुआ है : क्योंकि

कुछ अन्तरङ्ग की चिन्ता से झुके हुए मुख वाले बैठे हुए हैं। पुनः मुहूर्त भर के लिए यो कुछ वस्तु ढूंढते हुए विहार कर रहे हैं। परस्पर में हाथ पीट कर अकस्मात् आश्चर्यान्वित हो हँसते हैं। हाथी के समान मदमत्त यह मदिरा के जलकणों को छोड़ रहा है । ।।5।।

(घृणा पूर्वक) दूसरे के भोजन के प्रति आसक्ति निश्चित रूप से उद्वेग उत्पन्न करने वाली होती है, जो कि मुझे भी इन निकृष्ट चेष्टा वालों के साथ बोलना पड़ता है । हे हिन्तालक यहाँ पर क्या करना चाहिए ।

चेट - भट्टारक, जब तक इसके मद की समाप्ति नहीं हो जाती, तब तक आपको इस पुराने उद्यान में प्रतीक्षा करना चाहिए ।

कञ्चुकी - वैसा ही करते हैं। (चला जाता है)

अनन्तर यथानिर्दिष्ट क्रूर विद्याधर भैरव प्रवेश करता है ।

क्रूर -

(मद का अभिनय करता हुआ, आदर पूर्वक) ।

जिसके नाम को सुनकर सुर और असुर काँपते है, वही क्रूर मैं विद्याधर भैरव हूँ ॥6॥

और भी -

इतने लोक में मेरे लिए मन्त्र, यन्त्र अथवा तन्त्र से कोई कार्य दुष्कर नहीं है। मेरे सदृश अन्य कौन पुरुष है । ॥7॥

चेट -

(समीप में जाकर) स्वामिन्, यह मैं प्रणाम करता हूँ।

क्रूर -

प्रिय शिष्य, जीवनपर्यन्त मेरी सेवा करते रहो ।

चेट -

यह दास अनुगृहीत हुआ। यह नए कमल हैं।

क्रूर -

अरे हिन्तालक - इतने समय तक तुमने क्यों विलम्ब किया । चेट -

स्वामिन्, आर्य लब्धभूति पुराने उद्यान में इस समय तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे है। उसे देखकर देर कर दी।

क्रूर -

इस समय चुप क्यों बैठे हो। नील कमलों से घड़े के आसव को सुवासित करो ।

चेट -

हँसी रोकते हुए, मन ही मन । भली प्रकार कथाओं का अवसर मुझे विदित हो गया। (प्रकट में) जो स्वामी की आज्ञा । (यथोक्त करता है) । क्रूर -

अरे हिन्तालक, जरा अओवकि - आचार्य श्री सुविधिसागर जी महा त्रिशूलक नृत्य को यथेष्ट रूप से उल्लसित करते हुए, मधुरा, ध्रुवा विद्या को गाते हुए इस समय विहार कर रहा हूँ । ॥8॥

(दोनों घूमते हैं)

क्रूर -

(हर्ष पूर्वक गाता है) ।

भले प्रकार प्रसन्न (मदिरा को) सुखपूर्वक पीते हुए, पद-पद पर विषम रूप में लड़खड़ाते हुए अत्यधिक मत्त, महान् प्रभाव वाला विद्याधर भैरव सदा विजयशील हो । ॥9॥

और -

सरस कमल जिस पर रखे हुए हैं, ऐसी मदिरा को पीकर, मद होने पर भी शुभ में विहार कर रहा हूँ, चलता हूँ, स्खलित होता हूँ, अरे मैं क्रूर, क्रूर क्रूर हूँ। ॥10॥

(लड़खड़ाते हुए)

अरे पृथ्वी कैसे चल रही है

(हास पूर्वक)

यह बात विदित हो रही है कि अत्यधिक मद के समूह से भरे हुए मुझे धारण करने में असमर्थ होकर सचमुच पृथ्वी चल रही है । ॥11॥ अरे हिन्तालक, इस पीने के प्याले में घड़े से मदिरा उड़ेल दो अथवा उसी कुम्भ से आकण्ठ पीता हूँ। (वैसा कर) अरे यह मदिरा विशेष रूप से उत्तम रस से युक्त है। (मद का अभिनय करते हुए) मेरे बिना लोक कैसे एक महापुरुष सामान्य मनुष्य की प्रशंसा कर रहा है। तो मैं जाग्रत करता हूँ। सुनो-सुनो, जो सर्वथा सज्जन हैं, वे मेरे ही दोनों चरणों की भली प्रकार सेवा करें। जो लीला पूर्वक हाला पी पीकर खेल-खेल में लड़खड़ाते हुए शरीर से चलता हुआ विहार कर रहा है। ॥12॥

चेट - (देखकर) स्वामी के मद का समूह कैसे भूमि का अतिक्रमण करता हुआ आरूढ़ है । क्योंकि -

इस समय मदिरा का कुरला कर विद्याधर भैरव स्वयं अपने समस्त शरीर में बार-बार पृथक-पृथक शीतल छटा को धूक रहा है । ॥13॥

क्रूर - (चारों ओर देखकर) अरे मदिरा का समुद्र चारों ओर से भी भाग रहा है। चेट - कैसे, मदिरामय भाव होने से इसे चारों ओर सुरासमुद्र प्रतिभासित हो रहा है।

क्रूर - (तरंग में गिरने का अभिनय करता है) क्या बात है, ये तरंगें तीर के ऊपर हैं। अरे हिन्तालक, आओ, दोनों तैरें [तैरने का अभिनय करते हुए] सैकड़ों लहरों के चलने से सहसा सुरासमुद्र में मग्न हूँ। अरे अरे मैं क्या करूँगा, क्या तैरूँगा अथवा पीऊँगा ? ॥14॥

(थकान का अभिनय करते हुए) अरे इस समय मैं बहुत थक गया हूँ।

अतः इस परिश्रम को इस मन्त्र के जाप से शमन करूँगा ।

शुण्डा, सुरा, प्रसन्ना, कल्या, कादम्बरी, मधु, शीधु, मदिरा, मद्य, मधुरा, भैरेयी, वारुणी, हाल । ॥15॥

(पुनः पुनः पढ़ता है)

चेट - क्या इस समय स्वामी थक गए हैं।

क्रूर - अरे इस समय कहाँ विश्राम करूँगा ।

चेट - (मन ही मन) स्वामी का मद मानों थक गया है। अतः मैं निवेदन करूँगा। (प्रकट में) स्वामिन्, आर्य लब्धभूति पुराने उद्यान में कौन से समय स्वामी की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

क्रूर - अरे हिन्तालक, इतने समय तक तमने क्यों नहीं कहा ?

चेट - स्वामी, मैंने पहले कहा था। स्वामी ने मद के समूह से परवश होकर सुना नहीं ।

क्रूर - हूँ, मेरा प्रमाद। तो वहाँ चलेंगे ।

चेट - इधर से, इधर से (दोनों घूमते हैं)

चेट - स्वामी, यह पुराना उद्यान है ।

(दोनों प्रवेश करते हैं)

चेट - (अङ्गुली से निर्देश कर) - स्वामिन् ! ये आर्य लब्धभूति तुम्हारे आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

(प्रवेश कर)

कञ्चुकी - भैरव देर कर रहे हैं। (देखकर) नृशंस समीप में ही कैसे है ? जो यह अत्यन्त भयानक शरीर को धारण करता हुआ क्रूर यह स्वयं शरीर धारिणी आरभटी वृत्ति के समान आ रहा है ।

  • अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -

:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2437.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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