अञ्जना पवनंजय नाटकम् | Anjana Pavananjaya Natakam — रूपककार हस्तिमल्ल कृत शास्त्रीय संस्कृत जैन नाटक (अंश)

प्रसिद्ध रूपककार हस्तिमल्ल कृत शास्त्रीय संस्कृत जैन नाटक अञ्जना पवनंजय नाटकम् — जिसमें विद्याधर राजकुमारी अञ्जना का स्वयंवर, विद्याधर राजकुमार पवनंजय के साथ विवाह, व हनुमान के जन्म तक की कथा सात अङ्कों में वर्णित है। यह अंश ग्रन्थ की प्रस्तावना, रूपककार हस्तिमल्ल का परिचय, वेश-परम्परा, तथा सातों अङ्कों की सम्पूर्ण कथावस्तु व मूल स्रोत प्रस्तुत करता है। :red_circle: यह ग्रन्थ लगभग ७४ पृष्ठों का व स्कैन रूप में है — यहाँ केवल प्रारंभिक भाग (प्रस्तावना व अङ्कवार कथासार) का अंश प्रस्तुत है।

An excerpt of the classical Sanskrit Jain drama Anjana Pavananjaya Natakam by the renowned playwright Hastimalla — narrating (across seven acts) the svayamvara of the Vidyadhara princess Anjana, her marriage to prince Pavananjaya, and the birth of Hanuman. This excerpt reproduces the work’s introduction, a profile of Hastimalla, and the full act-by-act synopsis. The source is a ~74-page scan; only the opening portion (introduction & act-wise summary) is reproduced here.


अञ्जना पवनंजयनाटकम्

प्रकाशन

चिरंतन काल से भारत मानस समाज के लिये मूल्यवान विचारों की खान बना हुआ है। इस भूमि से प्रकट आत्माविद्या एवं तत्व ज्ञान में सम्पूर्ण विश्व का नव उदात्त दृष्टि प्रदान कर उसे पतोन्मुखों होने से बचाया है। इस देश से एक के बाद एक प्राणवान प्रवाह प्रकट होते रहे। इस प्राणवान बहुमूल्य प्रवाहों की गति की अविरलता में जैनाचार्यों का महान योगदान रहा है। उन्नीसवीं शताब्दी में पाश्चात्य विद्वानों द्वारा विश्व की आदिम सभ्यता और संस्कृति के जानने के उपक्रम में प्राचीन भारतीय साहित्य की व्यापक खोजबीन एवं गहन अध्यनादि कार्य सम्पादित किये गये। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ तक प्राच्यवाङ्मय की शोध, खोज व अध्ययन अनुशीलनादि में अनेक जैन-अजैन विद्वान भी अग्रणी हुए। फलतः इस शताब्दी के मध्य तक जैनाचार्य विरचित अनेक अंधकाराच्छादित मूल्यवान अनमोल प्रकाश में आये। इन बहुमुल्य ग्रन्थों ने मानव जीवन की युगीन समस्याओं को सुलझाने का अपूर्व सामर्थ्य है। विद्वानों के शोध-अनुसंधान-अनुशीलन कार्यों को प्रकाश में लाने हेतु अनेक साहित्यिक संस्थाएं उदित भी हुईं, संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती आदि भाषाओं में साहित्य सागर अवगाहनरत अनेक विद्वानों द्वारा नवसाहित्य भी सृजित हुआ है, किन्तु जैनाचार्य-विरचित विपुल साहित्य के सकल ग्रन्थों के प्रकाशनार्थ/अनुशीलनार्थ उक्त प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। सकल जैन वाङ्मय के अधिकांश ग्रन्थ अब भी अप्रकाशित हैं, जो प्रकाशित भी हैं तो शोधार्थियों को बहुपरिश्रमोपरान्त भी प्राप्त नहीं हो पाते हैं। और भी अनेक बाधायें/समस्यायें जैन ग्रन्थों के शोध-अनुसन्धान-प्रकाशन के माध्यम में हैं, अतः समस्याओं के समाधान के साथ-साथ विविध संस्थाओं-उपक्रमों के माध्यम से समेकित प्रयासों की आवश्यकता एक लम्बे समय से विद्वानों द्वारा महसूस की जा रही थी।

राजस्थान प्रान्त के महाकवि ब्र. भूरामल शास्त्री (आ. ज्ञानसागर महाराज) की जन्मस्थली एवं कर्म स्थली रही है। महाकवि ने चार-चार संस्कृत महाकाव्यों के प्रणयन के साथ हिन्दी संस्कृत में जैन दर्शन सिद्धान्त एवं अध्यात्म के लगभग 24 ग्रन्थों की रचना करके अवरुद्ध जैन साहित्य-वागीश्वरी के प्रवाह को प्रवर्तित किया। यह एक विचित्र संयोग कहा जाना चाहिये कि रससिद्ध कवि की काव्यरस धारा का प्रवाह राजस्थान की मरुधरा से हुआ। इसी राजस्थान के भाग्य से श्रमण परम्परानायक सन्तरशिरोमणी आचार्य विद्यासागर जी महाराज के सुशिष्य जिनकी के यथार्थ उद्बोधक, अनेक ऐतिहासिक उपक्रमों के समर्थ सूत्रधार, अध्यात्मयोगी युवामनीषी पू. मुनिपुंगव सुधासागर जी महाराज का यहाँ पदार्पण हुआ। राजस्थान की धरा पर राजस्थान के अमर साहित्यकार के समग्रकृतित्व पर एक अखिल भारतीय विद्वत/संगोष्ठी सागनेर में दिनांक 9 जून से 11 जून, 1994 तथा अजमेर नगर में महाकवि महनीय कृति “वीरोदय” महाकाव्य पर अखिल भारतीय विद्युत संगोष्ठी दिनांक 13 से 15 अक्टूबर 1994 तक आयोजित हुई व इसी सुअवसर पर दि. जैन समाज, अजमेर ने आचार्य ज्ञानसागर के सम्पूर्ण 24 ग्रन्थ मुनिश्री के 1994 के चार्तुमास के दौरान प्रकाशित कर/लोकार्पण कर अभूतपूर्व ऐतिहासिक काम करते श्रुत की महत् प्रभावना की। पू. मुनि श्री के सानिध्य में आयोजित इन संगोष्ठियों में महाकवि के कृतित्व पर अनुशीलनात्मक आलोचनात्मक, शोधपत्रों के वाचन सहित विद्वानों द्वारा जैन साहित्य के शोध क्षेत्र में अगत अनेक समस्याओं पर चिन्ता व्यक्त की गई तथा शोध छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान करने, शोधार्थियों को शोध विषय सामग्री उपलब्ध कराने, ज्ञानसागर वाङ्मय सहित सकल जैन विधा पर प्रख्यात अधिकारी विद्वानों द्वारा निबन्ध लेखन - प्रकाशनादि के विद्वानों द्वारा प्रस्ताव आये। इसके अनन्तर मास 22 से 24 जनवरी तक 1995 में ब्यावर (राज.) में मुनिश्री के संघ सानिध्य में आयोजित “आचार्य ज्ञानसागर राष्ट्रीय संगोष्ठी” में पूर्व प्रस्तावों के क्रियान्वयन की जोरदार माँग की गई तथा राजस्थान के अमर साहित्यकार, सिद्धसारस्वत महाकवि ब्र. भूरामल जी की स्टेच्यू स्थापना पर भी बल दिया गया, विद्वत् गोष्ठी में उक्त कार्यों के संयोजनाथ डॉ. रमेशचन्द्र जैन बिजनौर और मुझे संयोजक चुना गया। मुनिश्री के आशीष से ब्यावर नगर के अनेक उदार दातारों के उक्त कार्यों हेतु मुक्त हृदय से सहयोग प्रदान करने के भाव व्यक्त किये।

पू. मुनिश्री के मंगल आशिष से दिनांक 18.3.95 को त्रैलोक्य तिलक महामण्डल विधान के शुभप्रसंग पर सेठ चम्पालाल रामस्वरूप की नसियों में जनोदय महाकाव्य (2 खण्डों में) के प्रकाशन सौजन्य प्रदाता आर. के. मार्बेल्स किशनगढ़ के रतनलाल कंवरीलाल पाटनी श्री अशोक कुमार जी एवं जिला प्रमुख श्रीमान् पुखराज पहाड़िया, पौत्रीगण के करकमलों द्वारा इस संस्था का श्रीगणेश आचार्य ज्ञानसागर वागर्थ विमर्श केन्द्र के नाम से किया गया।

आचार्य ज्ञानसागर वागर्थ विमर्श केन्द्र के माध्यम से जैनाचार्य प्रणीत ग्रन्थों के साथ जैन संस्कृति के प्रतिपादक ग्रन्थों का प्रकाशन किया जावेगा एवं आचार्य ज्ञानसागर वाङ्मय का व्यापक मूल्यांकन-समीक्षा-अनुशीलनादि कार्य कराये जायेंगे। केन्द्र द्वारा जैन विधा पर शोध करने वाले शोधार्थी छात्र हेतु 10 छात्रवृत्तियों की भी व्यवस्था की जा रही है।

केन्द्र का अर्थ प्रबन्ध समाज के उदार दातारों के सहयोग से किया जा रहा है। केन्द्र का कार्यालय सेठ चम्पालाल रामस्वरूप की नसियों में प्रारम्भ किया जा चुका है। सम्प्रति 10 विद्वानों को विविध विषयों पर शोध निबन्ध लिखने हेतु प्रस्ताव भेजे गये, प्रसन्नता का विषय है 25 विद्वान अपनी स्वीकृति प्रदान कर चुके हैं तथा केन्द्र स्थापना के प्रथम मास में ही निम्न पुस्तकें प्रकाशित की -
प्रथम पुष्प - इतिहास के पन्ने आचार्य ज्ञानसागर जी द्वारा रचित
द्वितीय पुष्प - हित सम्पादक आचार्य ज्ञानसागर जी द्वारा रचित
तृतीय पुष्प - तीर्थ प्रवर्त्तक मुनिश्री सुधासागरजी महाराज के प्रवचनों का संकलन
चतुर्थ पुष्प - जैन राजनैतिक चिन्तन धारा डॉ. श्रीमती विजयलक्ष्मी जैन
पंचम पुष्प - अञ्जना पवनंजयनाटकम् संस्कृत भाषा में हस्तिमल्ल द्वारा रचा गया है। जिसका हिन्दी अनुवाद डॉ. रमेशचन्द जैन-बिजनौर द्वारा किया गया है। यह अनुवाद आधुनिक हिन्दी सरल भाषा में किया गया है।

अस्तु।

अरुण कुमार शास्त्री,
ब्यावर

प्रस्तावना

‘श्री वीतरागाय नमः’
दिगम्बर जैन ऐतिहासिक कथाओं के आधार पर संस्कृत नाटकों की रचना करने वालों में रूपककार हस्तिमल्ल का प्रथम स्थान है। उन्होंने अनेक नाटकों की रचना की होगी, किन्तु वर्तमान में मैथिली कल्याण, विक्रान्त कौरव, अञ्जना पवनंजय और सुभद्रा (नाटिका) ये चार नाटक ही प्राप्त होते हैं। कुछ लोगों के अनुसार उन्होंने ‘अञ्जनेयराज नाटक’ नामक एक अन्य नाट्य ग्रन्थ की रचना की थी। भरतराज और मेघेश्वर नामक नाटक भी इनके द्वारा रचे गए कहे जाते हैं। तथापि इनके लेखक का नाम हस्तिमल्ल के स्थान पर हस्तिमल्लषेण हुआ हुआ है। चूँकि हस्तिमल्लषेण नामक दूसरे नाटककार का पता अब तक नहीं चला है, इसलिए ये नाटक इन्हीं हस्तिमल्ल द्वारा लिखित होना चाहिए। विक्रान्त कौरव का दूसरा नाम नामक मेघेश्वर (जयकुमार) के कारण मेघेश्वर हो सकता है।

हस्तिमल्ल कन्नड और संस्कृत के प्रौढ़ विद्वान थे। कन्नड आदिपुराण की भूमिका में कवि ने अपने आपको ‘उभयभाषाकवि चक्रवर्ती’ कहा है। हस्तिमल्ल द्वारा लिखित श्रीपुराण को अनेक प्रतियों का उल्लेख के केम्पय्या जी ने किया है।

हस्तिमल्ल का समय - हस्तिमल्ल के समय की अवधि नौवीं शताब्दी ईस्वी से पूर्व की नहीं हो सकती; क्योंकि नौंवी शताब्दी में हुए आचार्य जिनसेन के आदिपुराण के आधार पर हस्तिमल्ल ने विक्रान्तकौरव नाटक और सुभद्रा नाटिका की रचना की थी?

हस्तिमल्ल के समय की उपधअवि चौदहवीं शताब्दी मानी जा सकती है; क्योंकि अभ्यपार्थ के जिनेन्द्रकल्याणभ्युदय में हस्तिमल्ल का उल्लेख है। जिनेंद्र कल्याणभ्युदय की रचना शक संवत् 1241 (वि. सं. 1376) में पूर्ण हुई थी।

स्व. नाथूराम प्रेमी का कहना है कि श्री युगलकिशोर मुख्तार ने ब्रह्मसूरि को 15वीं शती का विद्वान माना है, ब्रह्मसूरि हस्तिमल्ल के पौत्र के पौत्र थे। ब्रह्मसूरि हस्तिमल्ल के 100 वर्ष बाद हुए होंगे। अतः हस्तिमल्ल 14वीं शती में हुए हैं।

डॉ. ज्योतिप्रसाद जैन ने हस्तिमल्ल का समय 1250 स्वीकार किया है।

हस्तिमल्ल द्वारा रचित अंजनपवनंजय नाटक की एक हस्तलिखित प्रति में नाटक की समाप्ति के पश्चात् प्रभेन्दुमुनि की नमस्कार किया गया है, इसी प्रकार समुद्र नाटिका की दो पाण्डुलिपियों की प्रशस्ति में प्रद्येंदु मुनि का उल्लेख वर्तमान काल को लट् लकार में

  1. डॉ. कन्डछेदीलाल जैन शास्त्री:रूपककार हस्तिमल्ल : एक समीक्षात्मक अध्ययन पृ. ३३
  2. मैसूरैखंपि विस्मारयति गुणान् सोमप्रभश्च - विक्रान्त कौरव पृ. २४
  3. इभ्यधयभाषा चक्रवर्ती हस्तिमल्लविरचित पूर्वपुराण महाकथायां दशम पर्वम्।
  4. कन्नड प्रान्तीय ताडपत्रीय ग्रन्थ सूची पृ. 148-149.
  5. जैन साहित्य और इतिहास पृ. 265
  6. The Jain sources of history of India page 228

सन् 1131 में विष्णुवर्द्धन राजा की पत्नी शान्तला ने समाधिमरण किया था, उस समय प्रभेन्दु या प्रभाचन्द्र उपस्थित थे। हस्तिमल्ल ने उन्हें योगीराज कहा है। उस समय वे वृद्ध हो गए होंगे। इस प्रकार हस्तिमल्ल का जन्म लगभग 1160 ई. होना चाहिए।

अभ्यपार्थ नामक विद्वान ने जो प्रतिष्ठा पाठ शक संवत् 1241 (ई. 1320) में लिखा था, उसमें उन्होंने आरम्भिक प्रशस्ति में पं. आशाधर और हस्तिमल्ल का उल्लेख किया है। इस प्रकार हस्तिमल्ल आशाधर के समकालीन माने जा सकते हैं। पं. आशाधर का अन्तिम ग्रन्थ अनगार धर्मामृत है, जो संवत् 1300 (1244 ई.) में समाप्त हुआ था।

हस्तिमल्ल का जन्म स्थान - ब्रह्मसूरि के प्रतिष्ठा सारोद्धार की प्रशस्ति से तीर्थहळ्ळि का परिचय दिया गया है। इसके आसपास हस्तिमल्ल का निवास होना चाहिए। यह स्थान हुम्मच हो सकता है। प्रशस्ति के में गुडिभवन द्वीप के नाम से इस स्थान का उल्लेख हुआ है। यहाँ वृषभेश्वर मंदिर था। हुम्मच में वीर सान्तर या सान्तर वंशी राजाओं द्वारा 11वीं शती के अनेक मन्दिर हैं। उनमें जैन मठ के समीप का आदिनाथ (वृषभेश्वर) का मन्दिर विशेष उल्लेखनीय है। सान्तर वंशी जिनदत्त के पुत्र तोलपुरुष विक्रम सान्तर ने हुम्मच में एक वसदि बनवायी थी, उसमें भगवान् बाहुबलि की मूर्ति प्रतिष्ठित करायी थी, उस वसदि का नाम गुड्ड (या गुड्डइ) था।

अंजन पवनञ्जय नाटक की प्रशस्ति में लिखा गया है कि हस्तिमल्ल कर्नाटक की भूमि में संतग्राम में रहते थे और वह संतग्राम जैनागारों से युक्त था।

वेश परम्परा

हस्तिमल्ल गोविंद के पुत्र थे। गोविन्द का उल्लेख उन्होंने चारों नाटकों की प्रस्तावना में किया है। इनकी विद्वत्ता का सूचक भट्टार, भट्टारक, भट्ट या स्वामी शब्द नाम के पूर्व जुड़ा हुआ है। गोविन्द प्रारम्भ में जैन नहीं थे। वे समन्तभद्राचार्य के देवागम स्तोत्र को सुनकर जैन हुए थे। गोविन्द यत्संगोष्ठीय थे। विक्रान्त कौरव की प्रशस्ति के अनुसार वे 63 शलाका पुरुषों के चरित्र का वर्णन करने वाले उत्तरपुराण के रचियता गुणभद्र की परम्परा में उत्पन्न हुए थे। गुणभद्र आचार्य जिनसेन के शिष्य थे। जिनसेन के गुरु बहुश्रुत विद्वान् वीरसेन थे।

वीरसेन आचार्य समन्तभद्र के दो प्रधान शिष्य शिवकोटि और शिवायन की आध्यात्मिक परम्परा में उत्पन्न हुए थे। इस प्रकार हस्तिमल्ल की गुरु परम्परा आचार्य समन्तभद्र तक जाती है। हस्तिमल्ल के पिता के सुदूर पूर्ववर्ती गुरु समन्तभद्र थे।

हस्तिमल्ल अपने पिता के छह पुत्रों में से एक थे। विक्रान्त कौरव की अन्तिम प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि वे सभी दाक्षिणात्य थे। सभी कवि और विद्वान थे। उनके नाम ये हैं - श्री कुमार कवि, सत्यवाक्य, देवखल्लभ, उदयभूषण, हस्तिमल्ल और वर्द्धमान। अञ्जना प्रवनञ्जय तथा मैथिलीकल्याण की प्रस्तावना तथा चारों नाटकों के अन्त की पुष्पिका में हस्तिमल्ल के भाईयों के विषय में यही सूचना दी गयी है। मैथिली कल्याण नाटक की प्रस्तावना के अनुसार सत्यवाक्य ने श्रीमती और दूसरी कृतियाँ लिखीं।

शरणपुर पाश्र्वय राजा के द्वारा छोड़े हुए एक मतवाले हाथी को अपनी आध्यात्मिक शक्ति से वश में करने के कारण हस्तिमल्ल यह नाम पड़ा। विक्रान्त कौरव के प्रथम अङ्क के चालीसवें पद्य में कहा गया है कि हाथी से मुठभेड़ में जीतने से पाण्ड्य राजा ने सौ श्लोकों में उनकी उपलब्धि का गुणगान कर गौरवान्वित किया। इस प्रकार लेखक को उपाधि हस्तिमल्ल थी। इस बात का पता नहीं चलता कि हाथी को पराजित करने से पूर्व उनका असली नाम क्या था? अभयपार्थ ने हाथी सम्बन्धी घटना का उल्लेख जिनेन्द्र कल्याण चम्पू में किया है। नेमिचन्द्र या ब्रह्मसूरि के प्रतिष्ठांतक के अनुसार हस्तिमल्ल अपने विरोधी रूपी गर्जों को पराजित करने वाले सिंह थे। इससे यह बात सन्देहास्पद लगती है कि हस्तिमल्ल नाम पागल हाथी को वश में करने के कारण पड़ा था, अपितु इससे यह द्योतित होता है कि शास्त्रार्थों में सुप्रसिद्ध विरोधी विद्वानों को पराजित करने के कारण वे हस्तिमल्ल कहलाए।

अपने कुछ नाटकों की प्रस्तावना में हस्तिमल्ल ने अत्यधिक आत्मश्लाघा की है। वे अपने आपको सरस्वती का स्वयंदूत पति तथा कवित्रल्ल कहतें हैं। मैथली कल्याण नाटक में उनके बड़े भाई सत्यवाक्य उन्हें कविता साम्राज्य लक्ष्मीपति कहते हैं। अञ्जना पवनञ्जय के अन्त में एक पद्य है, जहाँ लेखक को कविकवलवर्ती कहा गया है। मैथली कल्याण नाटक की प्रशस्ति में उन्हें विजित त्रिभुवन बुद्धि सूक्ति रत्नाकर और दिष्ट प्रथित विमर्वकीर्ति कहा गया है। एक पद्य में उन्हें ‘मुक्तिरत्नाकर’ नाम को प्राप्त कहा गया है। अभयापार्थ हस्तिमल्ल को अनेकमकविराज चक्रवर्ती कहते हैं इन सब विशेषणों से स्पष्ट द्योतित होता है कि हस्तिमल्ल को उनके समकालीन और पश्चाद्वातियों द्वारा क्या प्रतिष्ठा प्राप्त थी।

प्रतिष्ठा तिलक के रचयिता ब्रह्मसूरि (या नेमीचन्द्र) जो कि हस्तिमल्ल के वंश से सम्बन्धित है, के अनुसार हस्तिमल्ल के एक पुत्र था, जिसका नाम पार्श्व पण्डित था। श्रीमन्नोहनलाल शास्त्री का कहना है कि राजवली कथा के अनुसार हस्तिमल्ल के अनेक पुत्र थे, जिनमें पार्श्वपण्डित सबसे बड़े थे। उनके एक शिष्य का नाम लोकलाचार्य था। किसी कारण पार्श्व पण्डित होयसल राज्य के अन्तर्गत छन्नरायपुरी में अपने सम्बन्धियों के साथ आकर रहने लगे। उनके तीन पुत्र थे चन्द्रप, चन्द्रनाथ तथा चैजय्य। चन्द्रनाथ और उसका परिवार हेमाचल में रहा, जबकि अन्य भाई अन्यत्र चले गए। ब्रह्मसूरि चन्द्रप के पौत्र थे। चन्द्रप हस्तिमल्ल के पौत्र थे। हस्तिमल्ल गृहस्थ थे, वे मुनि नहीं हुए थे। नेमिचन्द्र के प्रतिष्ठातिलक में उन्हें गृहाश्रमी कहा है।

अञ्जनापवनंजय नाटक की कथावस्तु

इस नाटक में विद्याधर राजकुमारी अञ्जना का स्वयंवर तथा उसका विद्याधर राजकुमार पवनंजय के साथ विवाह वर्णित है। उन दोनों के हनुमान का जन्म होता है। प्रथम अङ्क-महेन्द्रपुर में अञ्जना के स्वयंवर की तैयारी हो रही है। विद्याधर राजा प्रह्लाद के पुत्र नामक पवनंजय ने एक बार नायिका अञ्जना को देखा था और वह उससे प्रेम करने लगा था। अञ्जना अपनी सखी वसन्तसेना और परिचारिका मधुकरिका तथा मालिका के साथ प्रवेश करती है। उनकी बातचीत का विषय आगामी स्वयंवर और उसका परिणाम है। बालिकायें एक कृत्रिम स्वयंवर का अभिनय करती हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि वसन्तमाला, जो कि अञ्जना का अभिनय कर रही है, पवनंजय बनी हुई अञ्जना के गले में माला पहिना देती है। पवनञ्जय, जो कि अपने मित्र प्रहसित (विदूषक) के साथ इस दृश्य को छिपकर देख रहा था, अब आगे आ जाता है और अञ्जना का हाथ पकड़ लेता है, किन्तु अञ्जना की माँ उसे स्नान के लिए बुला लेती है और वह अपनी सखियों के साथ चली जाती है। पवनंजय और विदूषक भी भोजन करने चले जाते हैं।

द्वितीय अङ्क

स्वयंवर हो चुका है तथा अञ्जना पवनंजय को अपने पति के रूप में वरण कर लेती है। विवाह के बाद अञ्जना तथा उसकी सखी वसन्तमाला पवनंजय के पिता राजा प्रहलाद की राजधानी आदित्यपुर में आती हैं, उनका यथोचित आदर होता है।

पवनंजय और अञ्जना प्रमदवन में बकुलोद्यान में भ्रमण करते हैं। उन दोनों में प्रेमालाप होता है। पवनंजय को अपने पिता प्रह्लाद के मन्त्री विजयशर्मन् से यह ज्ञात होता है कि राजा प्रह्लाद वरुण के विरुद्ध युद्ध करने के लिए प्रयाण करने वाले हैं। वरुण, रावण दक्षिण समुद्र में स्थित लङ्का के राजा रावण का शत्रु है और पश्चिम समुद्र में ठहरा हुआ है। उसने राजा के दो सेनानायकों को बन्दी बना लिया है।

दोनों सेनानायकों को छुड़ाने के लिए रावण की प्रार्थना पर प्रहलाद को जाना है। उनकी इच्छा है कि उनकी अनुपस्थिति में पवनंजय को राजधानी की रक्षा करना है, किन्तु अन्त में पवनंजय स्वयं को वरुण के विरुद्ध प्रयाण करने हेतु तैयार कर लेते हैं।

तृतीय अङ्क

वरुण और पवनञ्जय में चार माह से युद्ध हो रहा है। पवनंजय वरुण को शीघ्र और अचानक हराने के लिए धीरे धीरे युद्ध कर रहे हैं। उन्हें आशङ्का है कि रावण के दोनों सेनानायकों का जीवन खतरे में न पड़ जाय। पवनंजय दिन भर अपनी सेना का निरीक्षण करने के बाद कुमुदती तीर पर विश्राम कर रहे हैं।

चन्द्रमा पूर्व में उदित हो रहा है। पवनंजय एक चक्रवाकी को देखते हैं, जो कि चक्रवाक के वियोग में व्याकुल हो रही है। तत्काल उन्हें अञ्जन की याद आ जाती है। वह प्रेम के कारण बहुत व्याकुल हो जाते हैं। अन्त में वे शीघ्र ही विजयार्द्ध पर्वत पर जाकर अंजना से शीघ्र ही उसके महल में गुप्त रूप से मिलने का निश्चय कर लेते हैं। एक विमान में बैठकर वे आदित्यपुर पहुँचते हैं और वहाँ अंजना के महल में प्रविष्ट हो रात्रि उसके साथ बिताते हैं तथा दूसरे दिन प्रातःकाल युद्धभूमि में लौट आते हैं।

चतुर्थ अङ्क

वसन्तमाला के स्वागत कथन तथा केतुमती की परिचारिका युक्तिमती के साथ उसकी बातचीत से हमें ज्ञात होता है कि पवनंजय को अंजना से गुप्त रूप से मिले हुए चार माह बीत गए हैं। अंजना में गर्भ के लक्षण प्रकट होने लगे हैं। दोनों पवनंजय की माँ केतुमती की प्रतिक्रिया के विषय में चिन्तित हैं। वे आशा करती हैं और प्रार्थना करती हैं कि केतुमती अंजना के प्रति क्रूर और कठोर नहीं होगी। वसन्तमाला गर्भ का औचित्य सिद्ध करने के लिए युक्तिमती से पवनंजय के चार मास पूर्व पवनंजय को चले जाने की बात बता देती है। केतुमती पवनंजय के आने का विश्वास न करके अञ्जना को शराबी क्रूर भैरव के द्वारा निर्वासित करा देती है और उसके पिता राजा महेन्द्र के यहाँ भिजवा देती है, किन्तु अञ्जना को जो लाञ्छन लगाकर भेजा था, उसके कारण वह पिता के यहाँ न जाकर मार्ग में भट्टारक वीधि में उतर जाती है। क्रूर भैरव से कह देती है कि तुम कह देना कि हम महेन्द्रपुर में छोड़ आये है और हम वहाँ चले जायेंगे।

पंचम अङ्क

पवनंजय अन्त में वरुण को पराजित कर रावण के दोनों सेनानायक खर और दूषण को मुक्त करा देते हैं। वरुण के साथ मैत्री की सन्धि कर पवनंजय विद्याधरों के साथ विजयार्द्ध को लौट रहे हैं। पवनंजय और विदूषक विजयार्द्ध पर आकर अपने विमान से रजतशिखर पर उतरते हैं। पवनंजय को अपनी माँ युक्तिमती, जो कि उसका स्वागत करने के लिए आयी थी, से पता चलता है कि अंजना गर्भवती है और अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए महेन्द्रपुर गई है। पवनंजय अब सर्वप्रथम महेन्द्रपुर जाकर अंजना से मिलने का निश्चय करता है। कालमेघ नामक हाथी पर सवार होकर पवनंजय और विदूषकमहेन्द्रपुर की ओर प्रस्थान करते हैं। रास्ते में वे सरोवरसरस्वती के किनारे ठहरते हैं। सरोवरसरस्वती नाशिनी पर स्थित है। पवनंजय को एक वनचर तथा उसकी पत्नी मिलती है। उनके वर्णन से वे निश्चय करते हैं कि अंजना और वसन्तमाला एक भयानक दिखाई देने वाले व्यक्ति के साथ महेन्द्रपुर की ओर गई हैं। यह व्यक्ति केतुमती के निर्देशानुसार उन्हें महेन्द्रपुर ले जाना चाहता था। अंजना ने अपने माता-पिता के यहाँ जाने से मना कर दिया तथा वन्य क्षेत्र में रहना पसन्द किया। वह और उसकी सखी मातङ्ग मालिनी वन में प्रविष्ट हो गई है। यह सुनकर पवनंजय मूर्छित हो जाता है। पुनः चेतना आने पर वह अपनी प्रिय पत्नी के लिए विलाप करता है। वह अत्यधिक तनावग्रस्त हो जाता है और उसी वन में प्रविष्ट होता है, जहाँ अंजना गयी है। वह विदूषक को विजयार्द्ध पर्वत से विद्याधरों को अंजना की खोज के लिए बुलाने हेतु भेजता है। वह अपने हाथी कालमेघ के साथ गहन वन में प्रविष्ट हो जाता है।

छठा अङ्क

गन्धर्वराज मणिचूड तथा उसकी पत्नी रत्नचूडा से ज्ञात होता है कि अंजना उनके संरक्षण में रह रही है तथा उसने एक पुत्र को जन्म दिया है। वह अपने पति के वियोग के कारण अत्यधिक दुःखी है।

पवनंजय, जो कि अंजना के वियोग में पागल हो गया है, माङ्गमालिनी वन में घूम रहा है। वह चेतन और अचेतन सभी वस्तुओं से अंजना का समाचार देने की प्रार्थना करता है। किसी जानकारी के अभाव में अत्यधिक हताश होकर वह किसी चन्दन वृक्ष के नीचे बैठ जाता है। उसकी वाणी अवरुद्ध हो गयी है तथा आँखें आँसुओं से भीगी हुई हैं तथा मन अत्यधिक धर्मग्लानि हुआ और तनावग्रस्त है।

प्रतिसूर्य, जिसे प्रहलाद ने पवनंजय की खोज में भेजा था, उसे मकरन्द वाटिका के किनारे की लताओं के बीच पाते हैं। वह गहरा ध्यान लगाए हुए था, उसके नेत्र बन्द थे तथा शरीर भावनाओं के कारण रोमाञ्चित हो रहा था। प्रतिसूर्य यह निश्चय कर लेता है कि स्थिति में केवल अंजना ही पवनंजय को प्रसन्न कर सकती है तथा उसकी चेतना वापिस आ सकती है। अतः वह घर वापिस आता है तथा अंजना और वसन्तमाला (जो उसके साथ रह रही थी) को भेजता है। चन्दन लताओं के मध्य प्रविष्ट हुए पवनंजय को देखकर अंजना उसके समीप शीघ्रता से जाकर उसका आलिङ्गन कर लेती है। पवनंजय अंजना को देखकर अत्यधिक प्रसन्न होता है। प्रतिसूर्य जो कि मणिचूड को पवनंजय के मिलने का समाचार देने गया हुआ था, अब पवनंजय से मिलने आता है। पवनंजय अपनी प्रिय पत्नी के मामा से मिलकर अत्यधिक प्रसन्न होते हैं।

सप्तम् अङ्क

आदित्यपुर के राजभवन में यौवराज्याभिषेक की तैयारी हो रही है। पवनंजय, अंजना, विदूषक और वसन्तमाला सभा भवन में प्रविष्ट होते हैं। पवनंजय राजकोय सिंहासन पर रत्नमय छत्र के नीचे बैठा है। सभी उनके पुनर्मिलन पर बधाई देते हैं। प्रतिसूर्य छोटे बालक हनुमान के साथ आते हैं और पवनंजय को उसका परिचय देते हैं। प्रतिसूर्य माङ्गमालिनी वन में जो घटित हुआ था, उसे सविस्तार बतलाते हैं। अंजना और वसन्तमाला को जो कठिनाइयाँ झेलनी पड़ीं, किस प्रकार वे रत्नकुड के पूर्व में स्थित पञ्चगुहा में पहुँची तथा वहाँ महान् मुनि अमितगति से मिलीं तथा उनके द्वारा उन्हें सान्त्वना दी गई कि उनकी मुशीबतें शीघ्र ही दूर होने वाली हैं, इत्यादि का वर्णन प्रतिसूर्य ने किया। वसन्तमाला और अंजना जब उस गुफा में ठहरी हुई थीं तो उन पर एक भयानक सिंह ने आक्रमण किया। उनकी चीख पुकार पर गन्धर्वराज मणिचूड तथा उसकी पत्नी रत्नचूडा ने उन्हें बचाया। अंजना ने उचित समय पर अपने पुत्र को जन्म दिया। प्रतिसूर्य ने उन्हें पहिचाना और वह उन्हें अनुरहद्वीप ले गया, जहाँ नवजात शिशु का धार्मिक संस्कार किया गया। बाद में राजा प्रहलाद और महेन्द्र के अनुरोध पर प्रतिसूर्य मकरन्द द्वीप गए और माङ्गमालिनी वन में पवनंजय को पाया। पुनः वे अनुरह द्वीप जाकर अंजना तथा वसन्तमाला के साथ वापिस लौटे तथा अंजना और पवनंजय का मिलन हुआ इत्यादि घटनायें प्रतिसूर्य ने सुनाईं। सभी ने मणिचूड गन्धर्व को भयानक सिंह से अंजना की रक्षा करने पर धन्यवाद दिया। मणिचूड ने वरुण और रावण के अनुरोध पर पवनंजय को विजयार्द्ध का सार्वभौम सम्राट घोषित किया। पवनंजय ने धन्यवाद पूर्वक नया दिया हुआ पद ग्रहण किया। विद्याधरों ने उन्हें प्रणाम किया। अन्त में भरतवाक्य के साथ नाटक समाप्त हो जाता है।

अञ्जनापवनंजय नाटक का मूल स्त्रोत

हस्तिमल्ल ने अपने सभी नाटकों की विषयवस्तु जैन पुराणों से ग्रहण की है। अंजना पवनंजय की कथा विमलसूरि के पउमचरैय से 18वें उद्देश में तथा रविषेण के पद्मचरित के 15वें पर्व से 18 वें पर्व तक आयी है। दोनों में समानता है। दोनों कथाओं और हस्तिमल्ल की अंजना पवनंजय कथा में कुछ भिन्नता है। पद्मचरिय तथा पद्मचरित में पवनंजय के भिन्न भिन्न नाम हैं, जैसे - पवनगति, पवनवेग, वायुगति, वायुवेग, वायु कुमार इत्यादि। अंजना को अंजना सुन्दरी भी कहा है। राजा महेन्द्र की पत्नी का नाम पउमचरिय और पद्मचरित में हृदयवेगा या हृदयसुन्दरी है, किन्तु हस्तिमल्ल के नाटक में इसका नाम मनौवेगा है। पद्मचरिय और पद्मचरित में राजा महेन्द्र के अरिन्दम आदि 100 पुत्र कहे गए हैं, जबकि हस्तिमल्ल ने अरिंदम और प्रसन्नकीर्ति दो का उल्लेख किया है। पद्मचरिय में पवनंजय की माँ केतुमती को कीर्तिमती कहा गया है। पउमचरिय और पद्मचरित में अंजना का स्वयंवर नहीं है। मन्त्रियों से सलाह के बाद राजा महेन्द्र अपनी पुत्री पवनंजय को देने का निश्चय करते हैं तथा उचित समय पर राजा प्रहलाद की स्वीकृति ले लेते हैं। विचारोत्सेव के तीन दिन पूर्व पवनंजय का मन अंजनासुन्दरी, वसन्तमाला और चित्रलेखा के प्रति पक्षपात पूर्ण हो जाता है। वह पूरी परिस्थिति को गलत समझते हैं और किसी प्रकार निराधार निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अंजना सुन्दरी उनसे विवाह नहीं करना चाहती है; क्योंकि वह यथार्थ में विद्युत्प्रभ नामक दूसरे विद्याधर राजकुमार से प्रेम करती है। वे अंजना सुन्दरी को मारने के बिन्दु


स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मंचन-योग्य नाटक (जैन समुदाय पांडुलिपि)।

प्रूफरीडिंग बाकी है

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