अंगारक
अंगारक
चित्रकन - त्रिभुवन सिंह
सहयोग - सरोज डी. एम.०
आलेख - डॉ० योगेश जैन०
आज सेठानी ईर्ष्या से जली-भुनी जा रही थी और पड़ोसिन को नीचा दिखाने की सोच रही थी, तभी उसके पति ने प्रवेश किया।
सेठानी अरे भगवान् ! सुनो
अभी तक भोजन नहीं..
सेठ मुझे भूख लगी है
तुम्हारी बकवास से पेट नहीं भरता है।
चंडमुराली से ज्वालामुखी बनी पत्नी की खुशामद करते हुए भोलू बोला -
सेठ अरे बावली ! कैसी बातें करती हो ! नारी के गले की शोभा तो मधुर वाणी, व्यवहार और उसका शील है।
सेठ रानी कुछ कहो भी,
बात क्या हुई है? कोई बिना दम फुँके
पता चले ?
सेठानी क्या कहूँ ? मुहल्ले की सारी औरतें तो राजू, नये-नये गहने पहनें-
और मैं बस वही सालों पुराना हार, चूड़ियाँ -।
सेठ तुम कुछ समझते हो?
बिना सुंदर गहने पहने
समाज के सम्मान नहीं
मिलता।
मुक्ति कॉमिक्स
सेठ तुम्हें क्या हो गया है?
जैसे के गले में बंधी
साँकल की तरह गले
में हर बात लेने से
समाज में इज्जत
होती है।
सेठानी मुझे उपदेश नहीं
हार-चाहिये हार-
फलस्वरूप पत्नी पीड़ित भोलूराम सराफ की दुकान पर जा पहुँचा।
सेठ सेठ जी ! कोई ऐसा, सुन्दर
हार दिखाओ जो किसी
के पास न हो।
सराफ अच्छा ! बैठो, लाता हूँ।
ऐसा हार जो संसार में कोई
न बना सके -।
सेठ ये लो बस एक ही है
अंगारक ने बनाया था,
जो राजा का विशेष
कुमार था, पर अब
वह कभी नहीं
बनायेगा --।
सेठानी पर ऐसा क्यों?
पूरी बात कहो।
अंगारक.
और अंगारक की
कथा सुनकर भोलू
अपने घर आया।
सेठ वो प्यारी, संसार
का सबसे सुन्दर हार…
सेठानी वाह ! सचमुच
कितना सुन्दर…
तुम बहुत अच्छे हो।
दूसरे दिन जब हार पहनकर उत्सव में गई।
सेठानी ये कितनी निर्दयी दुष्ट
औरतें ! मेरे हार कंगन
को कोई देख ही नहीं रही…
ना कोई पूछ रही…
दुःखी सेठानी ने
गहने दिखाने की
एक तरकीब निकाली।
अपने घर में स्वयं ही
आग लगाकर-
सेठानी आग-आग…
बचाओ-बचाओ!
मुक्ति कॉमिक्स
स्त्री तभी एक महिला ने पूछा.
महिला वाह सेठानी! ये कंगन हार बहुत सुन्दर हैं, कब खरीदे? किसने बनाया?
सेठानी अरे मुई! अब तक कहाँ थी? जब सारा घर जल-कर राख हो गया, तब हार कंगन की तारीफ़ कर रही है!
महिला पर बताओ तो सही… ऐसे गहने तो मैंने अब तक नहीं देखे.
सेठानी आह! जिन गहनों के शौक ने मेरे सुख-चैन छीने, यहाँ तक कि घर में भी आग लगवा दी और तो और इसकी बनाने वाला अंगारक भी…
महिला अंगारक कौन है? जरा मैं भी तो सुनूँ.
सेठानी इस देश के राजा के यहाँ अत्यन्त बुद्धिमान् व चतुर अंगारक नाम का एक सुनार था। एक दिन राजा ने आदेश दिया—
अंगारक
राजा प्रिय अंगारक! अच्छी बात ऐसे आभूषण बनाओ, जो अब तक किसी ने न बनाये हों।
अंगारक जैसी आपकी इच्छा.
और राजा ने सोना व अमूल्य नगीना देकर विदा किया।
इस तरह अंगारक सोना व नगीना लेकर अपने घर गहने बनाने लगा।
पत्नी अजी उठो! सुबह से काम कर रहे हो, दस बज गये, भोजन कर लो।
अंगारक हाँ-हाँ! अभी आता हूँ।
वह भोजन के लिये हाथ-मुँह धोने घर के बाहर आता है।
मुक्ति कॉमिक्स
अंगारक पर जैसे ही घर के बाहर आता है तो वह देखता है कि…
अंगारक अरे वाह! धन्य भाग हमारे! अतिथि-पूजा-सत्कार का महान् अवसर! मुनिराज! लगता है साक्षात् वैराग्य ही हमारे द्वार पर चलकर आ रहा हो!
अंगारक सुखोदय से अंगारक पत्नी सहित मुनिराज का पड़गाहन कर आहार देता है।
तभी घर के आँगन में वृक्ष पर बैठा भूखा मोर नीचे उतर आता है।
अंगारक
नंदवा- भक्त पूर्वक आहारदान के बाद अंगारक स्वयं भोजन करता है।
अंगारक- और फिर जब गहने बनाने आता है तो –
अंगारक- हाय! मैं लुट गया – अब क्या होगा – अभी तो यहीं था।
अंगारक- अरे! क्या हो गया? इतनी सर्दी में भी पसीना – क्या ढूँढ रहे हो?
अंगारक- चुप रह | मैं तो मर जाऊँगा, क्या मुँह दिखाऊँगा – | अभी तो यहीं रखकर गया था,
अंगारक- राजा का बेशकीमती नगीना, मैं यहीं रखकर गया था; नहीं मिला तो मर जाऊँगा …
नंदवा- क्या कह रहे हो? अब क्या होगा?
शक्ति-कॉमिक्स
अंगारक- मुनिराज के अलावा तो अभी तक यहाँ कोई नहीं आया, लगता है वही –
नंदवा- अरे! तुम्हें पता है कि तुम क्या कह रहे हो? हज़ारों महाव्रत के धारी मुनिराज क्या कभी ऐसा अधम कार्य कर सकते हैं?
अंगारक- नहीं – नहीं वही पापी अधम धूर्त – जो मेरे नगीने को –
नंदवा- आह! मैं क्या सुन रही हूँ? अरी धरती! तू फट क्यों नहीं – | काश! आज मैं बहरी होती।
और अत्यंत क्रुद्ध होकर अंगारक मुनिराज को मारने जंगल की ओर चल दिया।
अंगारक- अरे! वह देखो! वही है धूर्त – चोर – देखता हूँ –
अंगारक
पास आने पर जब अंगारक गाली-गलौच करने लगा, तो उपशमश्रेणी-मुनिराज ने आत्मशुद्धि मौन धारण कर लिया।
अंगारक- अरे चुप क्यों हो गया? बता मेरा नगीना कहाँ है? नहीं तो – छोडूँगा नहीं।
परन्तु डंडा पेड़ पर बैठे मोर के जा लगा।
अंगारक- अरे वाह! ये नगीना ऊपर पेड़ से गिरा..
अंगारक- परन्तु मुनि – बिल्कुल सही – मेरा नगीना – और मोर भी वही जो मेरे आँगन पर आकर बैठता है –
सारी बात समझकर अंगारक को बहुत पश्चाताप हुआ।
अंगारक- क्षमा करें भगवन! मुझसे भारी अपराध हुआ।
संवाद
अंगारक
अपराध क्षमा करें राजन !
ये लो अपना नगीना और
स्वर्ण …, इस जड़-रत्न को
लगाने में मैंने अमूल्य नर-
जन्म यूँ ही गंवाया।
राजा
अरे क्या हुआ ? क्या
तुमने रत्न लगाना बन्द
कर दिया ?
अंगारक
नहीं राजन ! रत्न लगाने का
काम तो अब शुरु कर रहा हूँ।
अपने शुद्धात्मद्रव्य में संयम-
रत्न — जिसके लिए ये
दुर्लभ मनुष्यजन्म मिला है।
राजा
हमारा पूरा राज्य
धन्य है, तुम्हारे
विचारों पर ।
धन्य है अंगारक
समाप्त
मूल दस्तावेज़ (PDF): 172.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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