अमृत कुमार के अनोखे कारनामे
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जैन चित्र कथाएँ
सुनो सुनाये सत्य कथाएं
प्रकाशक : आचार्य धर्मश्रुत ग्रन्थ माला
कृति : अभय कुमार के अनोखे कारनामें
© : सर्वाधिकार सुरक्षित
सम्पादक : ब्र. धर्मचन्द शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य
पुष्प नं : 35
मूल्य : 20.00
प्राप्ति स्थान : जैन मंदिर गुलाब वाटिका लोनी रोड़
जिला गाजियाबाद (उ.प्र.)
: 914-600074
S.T.D. 0575-4600074
छठा पट्टाचार्य पदारीहोण
मंगल दिवस
के पुण्य अवसर पर जैन चित्र कथा ‘अभय कुमार के अनोखे कारनामे’
अंक का प्रकाशन
10-2-2000 वसंत पंचमी
सनमार्ग दिवाकर आचार्य विमल सागर जी महाराज के
पट्टशिष्य
प्रशान्त मूर्ति मर्यादा पुरुषोत्तम ज्ञान दिवाकर
वाणीभूषण आचार्य 108
परम पूज्य श्री भरत सागर जी महाराज
के
आचार्य पदारीहोण दिवस के पुनीत अवसर पर
प्रकाशन समिति आपके चरणों में विनय पूर्वक नमोस्तु करते है।
प्रकाशक
श्री भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद्
एवं
आचार्य धर्म श्रुत ग्रन्थ माला
सम्पादक
ब्र. धर्मचंद शास्त्री
ज्योतिषाचार्य, प्रतिष्ठाचार्य
जैन मन्दिर गुलाब वाटिका लोनी रोड दिल्ली (गाजियाबाद)
फोन : 0575-4600074
जैन चित्र कथाएँ
सुनो सुनाये सत्य कथाएँ
प्रकाशक : आचार्य धर्मश्रुत ग्रन्थ माला
कृति : अभय कुमार के अनोखे कारनामे
© : सर्वाधिकार सुरक्षित
लेखक : ब्र. धर्मचन्द शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य
पृष्ठ नं : 43
मूल्य : 20.00
प्राप्ति स्थान : जैन मंदिर गुलाब वाटिका लोनी रोड़
जिला गाजियाबाद (उ.प्र.)
: 914-600074
: S.T.D. 0575-4600074
सम्पादकीय
समाज में लाखों बच्चे जैन कथानकों से अनभिज्ञ हैं, उन्हें जैन धर्म, संस्कृति, साहित्य के साथ कथानकों की जानकारी हेतु आचार्य धर्म श्रुत ग्रन्थमाला से प्रकाशित जैन चित्र कथा को अब तक ५० अंकों में प्रकाशित किए है तथा इस प्रकार की श्रृंखला आगे बढ़ रही है।
संस्था के द्वारा नयी भाषा एवं नई शैली में सुनो सुनाएँ सत्य कथाएँ के नाम से नया प्रकाशन शुरू किया है। इस सीरीज में अनेक पुस्तकों का सेट तैयार हो रहा है जो बच्चों के भविष्य को उज्जवल बना सके।
भारत वर्ष में सर्वत्र जैन गुरुओं के निर्देशन में बाल साहित्य प्रकाशित किया जा रहा है। तथा प्रकाशित होता रहेगा।
संस्था का उद्देश्य बाल साहित्य का प्रकाशन कर जन जन तक पहुँचाकर ज्ञान का प्रचार-प्रसार करना।
समाज के उदारमना दानवीर विशिष्ट सहयोगियों से भी अनुरोध है कि पत्रिका के स्थायित्व के लिए हमें अपना संरक्षण प्रदान करें एवं परिचितों, मित्रों आदि को पढ़ने हेतु प्रेरणा दें।
संस्थापक
गुलाब वाटिका लोनी रोड़ दिल्ली
जिला० गाजियाबाद
संचालक
ब्र० धर्मचंद शास्त्री
प्रतिष्ठाचार्य
अभय कुमार
मगध की राजधानी गिरिव्रज के राजमहल में महाराज उपश्रेणिक का दरबार लगा था। महाराज उपश्रेणिक अपने मंत्रियों से विचार विमर्श में संलग्न थे। उसी समय द्वारपाल ने आकर सूचना दी कि चंद्रपुर के राजा सोमशर्मा का सामंत विचित्र वर्मा, दरबार में उपस्थित होने की आज्ञा चाहता है।
महाराज उपश्रेणिक की आज्ञा पाकर विचित्र वर्मा उपस्थित हुआ। उसने कहा-
विचित्र वर्मा महाराज! मेरे राजा सोमशर्मा की एक सर्वलक्षण सम्पन्न अश्व रत्न की प्राप्ति हुई है। वह अश्व रत्न उन्होंने आपके लिए भेंट स्वरूप भेजा है।
महाराज उपश्रेणिक ने वह भेंट स्वीकार की। अगले दिन उस अश्व की परीक्षा के लिए महाराज स्वयं अश्वशाला आए। किन्तु, यह क्या? अश्व पर सवार होते ही, वह हवा से बातें करने लगा। महाराज ने अश्व को बहुत रोकने का प्रयत्न किया, किन्तु वह न रूका। अंत में वह अश्व महाराज उपश्रेणिक को काँटों भरे गड्ढे के पास गिराकर भाग गया।
महाराज बहुत देर तक वहाँ पड़े रहे। तब एक भील आया वह महाराज को उठाकर घर ले गया। उनकी बहुत सेवा कई दिनों तक वहाँ रहे। उनकी सेवा का भार भील की कन्या तिलकावती पर था महाराज के हृदय में तिलकावती के प्रति प्रेम जाग उठा। अस्तु एक दिन उन्होंने भील से उसकी कन्या से विवाह करने की इच्छा प्रकट की। भील ने प्रस्ताव स्वीकार करते हुए एक शर्त रखी की युवराज का पद तिलकावती से उत्पन्न पुत्र को ही मिलेगा। उस समय महाराज के ज्येष्ठ पुत्र बिंबिसार इस पद के अधिकारी थे। किन्तु महाराज उपश्रेणिक ने भील को वचन दे दिया इसके बाद तिलकावती से विवाह करके उपश्रेणिक उसे राजमहल में ले आए।
एक वर्ष बाद तिलकावती ने एक पुत्र को जन्म दिया पुत्र जन्म के बाद महाराज उपश्रेणिक, राज्य के उत्तराधिकारी के प्रश्न को लेकर चिंतित रहने लगे। उधर राजकुमार बिंबिसार की प्रतिमा दिन दूनी रात चौगुनी विकसित हो रही थी।
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किन्तु यह क्या? अभी पर स्याही ही वह हवा से बातें करने लगा
समय बीतता गया। फिर वह दिन भी आया जब राजकुमार बिंबसार और तिलकवती
पुत्र चिल्लाती बड़े हो गए। जनता अपने युवराज की घोषणा सुनना चाहती थी। महाराज
के सामने विकट समस्या उत्पन्न हो गयी। वह समझ नहीं पा रहे थे कि बिंबसार
से छीनकर युवराज पद चिल्लाती को कैसे दें? आखिर उन्होंने महामात्य कल्पक को
बुलाकर अपनी समस्या बतायी। कल्पक ने कहा- 'महाराज! आप उत्तराधिकारी चुनने
के लिए एक प्रतियोगिता करें। जो राजकुमार चुना जाय, उस पर राजद्रोह का आरोप
लगाकर उसे देश-निकाला दे दें। इसके बाद राजकुमार चिल्लाती को उत्तराधिकारी
बना दें।
महाराज उपश्रेणिक को यह उपाय ठीक लगा। अगले ही दिन प्रतियोगिताओं की
घोषणा की गयी। संयोगवश उन प्रतियोगिताओं में राजकुमार बिंबसार ही प्रथम रहे।
बिंबसार वैसे भी हर तरह से योग्य थे। किंतु अब उन पर राजद्रोह का अभियोग
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लगाकर उन्हें देश-निकाला दिया जाना था।
महामात्य कल्पक ने कहा- 'महाराज! राजकुमार बिंबसार ने अपने पास पाँच सौ
सैनिक रख रहे हैं। उसी आधार पर राजद्रोह का अभियोग लगाया जा सकता है।
अब राजा को करनी पड़े बहू व जिया गया एक भील उन्हें अपने पर ले गया, उसकी कन्या
तिलकवती ने राजा को बहुत सेवा की।
महाराज उपश्रेणिक ने तब राजकुमार बिंबसार को बुलवाया। उन्होंने जब उसे
पाँच सौ सैनिक रखने के कारण राजद्रोह का अभियोग लगाकर देश-निकाले का आदेश
सुनाया तो बिंबसार घबरा गये। किंतु फिर बड़े धैर्य से बिंबसार ने कहा- 'पिता जी!
मैंने जो सैनिक रखे हैं, उनका वेतन मैं देता हूँ। उनको मैंने विद्रोह करने के लिए
नहीं रखा। फिर भी आपने जो आदेश दिया है, उसका मैं अवश्य पालन करूँगा।
और बिंबसार प्रणाम करके वहाँ से चले आए।
अगले दिन महाराज उपश्रेणिक ने राजकुमार चिल्लाती को युवराज पद देने की
घोषणा कर दी। उधर राजकुमार बिंबसार ने गिरिव्रज छोड़ दिया। वहां से चलने
से पहले उन्होंने अपने पांच सौ सैनिकों से कहा कि जब मेरे दिन फिर लौटेंगे तो
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मैं तुम सबको अपने पास बुला लूँगा।
राजकुमार बिंबसार ने उस दिन गिरिव्रज में भोजन भी नहीं किया। पैदल ही
चल पड़े राह में एक सेठ भी मिल गया। दोपहर होते-होते वे नन्दिग्राम पहुंचे। वहां
एक सुंदर धर्मशाला थी। वहां यात्रियों को मुफ्त भोजन दिया जाता था। वहां का
जमींदार नन्दिनाथ उस समय अतिथियों को भोजन करा रहा था। बिंबसार और
उनका साथी सेठ- दोनों वहां पहुंचे। दोनों को बहुत भूख लगी थी।
बिंबसार ने नन्दिनाथ से कहा- हम लोग गिरिव्रज से आ रहे हैं। राज्य कर्मचारी
हैं। हम यहां भोजन करना चाहते हैं।
किन्तु राज्य कर्मचारी को तो हम पानी तक नहीं पिलाते! भोजन तो बाद की
बात है।
नन्दिनाथ का ऐसा दो टूक उत्तर राजकुमार बिंबसार और सेठ वहां से चल दिए।
राजकुमार ने अपना छाता खोला और पेड़ की छाया में बैठ गये
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सेठ सोचने लगा कि यह कैसा युवक है। बड़े हुए गाँव को देखकर भी सवाल नन्दिग्राम से बाहर आकर राजकुमार ने सेठ से पूछा- ‘यह गाँव बसा हुआ है या उजड़ा हुआ है?’
पूछ रहा है, उसने कुछ नहीं कहा।
आगे जाने पर एक गाँव मिला। वहां एक पुरुष अपनी स्त्री को मार रहा था। दोनों ने यह दृश्य देखा और आगे बढ़ गए। तब राजकुमार ने सेठ से पूछा- ‘वो आदमी अपनी बँधी हुई स्त्री को मार रहा था या खुली हुई को?’
सेठ एक बार फिर इस विचित्र प्रश्न को सुनकर चौंका, किन्तु चुप ही रहा, सोचने लगा कि इसने उस पिटने वाली स्त्री को देखा है, फिर भी यह सवाल क्यों?
कुछ दूर और जाने पर एक किसान खाली खेत में हल चलाता दिखा। राजकुमार ने सेठ से पूछा- ‘ये किसान अपने खेत की उपज को खा चुका है या लगाएगा?’ सेठ इस बार भी चुप रहा, उसे समझ में नहीं आया कि जब खेत जोत लेगा तभी तो अनाज उगाएगा, फिर उससे पहले फसल कैसे खा लेगा।
आगे के रास्ते में बालू अधिक थी चलने में कठिनाई हो रही थी। इसीलिए राजकुमार ने जूते उतारकर हाथ में ले लिए। पर सेठ ने नहीं उतारे। इसके बाद नदी पड़ी, जिसके उस पार सेठ का गाँव था। नदी पार करने के लिए सेठ ने अपने जूते उतारकर हाथ में ले लिए। किन्तु राजकुमार ने जूते पहन लिए उस विचित्र बात को देखकर सेठ ने समझ लिया कि यह युवक मूर्ख है।
दोनों ने नदी पार की फिर वे एक बाग में पहुंचे सेठ ने कहा- ‘सुनो! ये वेदन पद्म नगर है। मैं यहीं रहता हूँ, तुम थोड़ी देर इस पेड़ के नीचे विश्राम करो। मैं घर जाकर तुम्हें अभी बुलवा लूँगा।’
राजकुमार ने अपना छाता खोला और पेड़ की छाया में बैठ गए। यह देखकर सेठ को हँसी आ गयी और उसकी मूर्खता पर कोई संदेह न रहा।
सेठ को नाम इन्द्रदत्त था। उसकी एक कन्या थी- नन्दिश्री। वह अत्यंत रूपवती और गुणवती थी। सेठ इन्द्रदत्त घर पहुंचे तो नन्दिश्री ने पूछा- पिताजी! आप अकेले आए या कोई साथ भी आया है?’
सेठ इन्द्रदत्त ने कहा- 'बेटी! मैं अकेला तो नहीं आया। एक युवक साथ आया था। देखने में तो तेजस्वी राजकुमार-सा है, पर बातें मूर्खों-सी करता है।
अमय कुमार के अनोखे कारनामें
क्या कहा उसने? नन्दिश्री ने पूछा।
सेठ इन्द्रदत्त ने तब वे सारे प्रश्न बता दिए जो राजकुमार ने पूछे थे।
नन्दिश्री ने कहा- ‘पिताजी! नन्दिग्राम में जब भोजन नहीं मिला तो आप लोगों के लिए वह उजड़ा जैसा ही था, जो पुरुष अपनी स्त्री को मार रहा था, तो यदि वह विवाहित (बँधी हुई) को मार रहा था, तो वह घर में रह जायेगी यदि स्थील हुई तो भाग जाएगी। यदि किसान ने उपज से पूर्व ऋण ले रखा है तो उपज पहले ही खा चुका है क्योंकि उसे ऋण अदा करना पड़ेगा। उपज का लाभ उसे नहीं मिलेगा। अगर ऋण नहीं लिया तो फिर उपज उसकी होगी। इसी तरह नदी के कंकर आदि की चोट से बचने के लिए उसने जूते पहने, और पंख पर बैठे पक्षियों की बीट से बचने के लिए छाता लगा लिया।’
इसके बाद नन्दिश्री ने अपनी दासी लंबनश्री को बुलाया, उसके नाखून लंबे थे। नन्दिश्री ने कहा- ‘तू अपने नाखूनों में तेल भरकर नदी किनारे वाले बाग में चली जा। वहां ऐ नवयुवक बैठा है उसने कहना- नन्दिश्री ने आपको बुलाया है। आने से पहले तेल लगाकर स्नान कर लेना, फिर तू घर का पता न बताकर सिर्फ कान दिखलाकर चली आना।’
नन्दिश्री ने वही किया। किंतु राजकुमार भी समझदार था। उसने तत्काल एक गड्ढा खोदा। उसमें पानी भरा। फिर लंबनश्री के नाखूनों में भरा तेल उसमें डलवा दिया। जाते समय लंबनश्री ने सिर्फ कान दिसला दिया।
राजकुमार ने गड्ढे के जल से स्नान किया। फिर कान का अर्थ ताड़ वृक्ष समझकर चल दिया। वह उस घर को खोजने लगा जिसके द्वार पर ताड़ वृक्ष लगा हो। आखिर वह घर मिल गया। पर द्वार के बाहर बहुत कीचड़ था। घर के अंदर जाने के लिए कुछ-कुछ दूरी पर पत्थर रखे थे। राजकुमार पत्थरों को छोड़कर कीचड़ में पैर धँसाते हुए द्वार पर पहुंचे।
नन्दिश्री ने उनका स्वागत किया और आधा गिलास जल देकर कहा- ‘पहले आप पैर धो लें।’
राजकुमार समझ गया कि उसकी परीक्षा ली जा रही है। वह एक नाली के पास बैठे। एक लकड़ी लेकर सारा कीचड़ साफ किया। फिर जल से पैर धोए और बचा हुआ जल नन्दिश्री को दे दिया।
सुनो सुनाएँ सत्य कथाएँ
नन्दिश्री, राजकुमार के रूप, यौवन और गुणों को देखकर उससे मन ही मन प्रेम करने लगी। उसने अब तक जान लिया था कि राजकुमार असाधारण रूप से बुद्धिमान् है। नन्दिश्री स्वयं भी अत्यंत बुद्धिमान् थी। फिर भी, राजकुमार से विवाह की बात सोचने के पहले उसने हर तरह से उसकी परीक्षा लेने का निश्चय
नन्दिश्री ने तत्काल उन चावलों को पीसकर पाँच गुलगुले बनाए फिर लंबनश्री को देकर बोली- ‘इन्हें बाजार में जाकर यह कहकर बेचना कि ये वशीकरण -गुलगुले हैं। जिस स्त्री को ये गुलगुले खिलाए जाएंगे, वह वश में हो जाएगी।’
लंबनश्री ने जाकर वे गुलगुले सौ रुपये में बेच दिये। फिर उन रुपयों से नन्दिश्री ने भोजन सामग्री मंगवाकर उत्तम भोजन तैयार किया। राजकुमार वह भोजन खाकर अत्यंत प्रसन्न हुए। इस तरह राजकुमार और नन्दिश्री दोनों एक दूसरे के प्रति आसक्त हो गए। किंतु सेठ इन्द्रदत्त को इसका पता न था।
सेठ इन्द्रदत्त अपने कक्ष में विचारमग्न बैठे हुए थे। तभी नन्दिश्री वहां आयी। सेठ इन्द्रदत्त ने कहा- ‘बेटी! क्या इतने दिनों में तू इस युवराज को जान सकी है कि यह कौन है?’
‘पिता जी! इतना तो जान सकी हूँ कि यह किसी उच्चकुल का है। किंतु कहां का रहने वाला है, कौन है, यह उसने आज तक रहस्य ही बना रखा है।
किंतु इस रहस्य को मैंनें जान लिया है। यह मगध का निर्वासित भूतपूर्व युवराज बिंबसार है।’
‘राजकुमार बिंबसार? पर यहां? इस दशा में क्यों?’
‘क्योंकि राजा उपश्रेणिक ने एक भी कन्या से इस शर्त पर विवाह किया था कि वह उसके पुत्र को युवराज बनाएंगे। इसके लिए उन्होंने बिंबसार पर राजद्रोह का झूठा कलंक लगाकर उसे निर्वासित कर दिया है और भील के पुत्र को युवराज बना दिया है।’
‘यह तो बड़ा अन्याय हुआ है, राजकुमार के साथ। तभी वह अक्सर गुमसुम और सोच में डूबा रहता है।’
'बेटी! यह राजकुमार वीर है, धीर गंभीर है। एक न एक दिन वह अवश्य अपना खोया हुआ अधिकार प्राप्त कर लेगा। मैंने अत्यंत गुप्त ढंग से इन बातों का पता लगाया है।
‘मैं भी ईश्वर से राजकुमार की सफलता की प्रार्थना करूंगी।’
‘बेटी! यदि राजकुमार से तेरा विवाह हो जाय तो मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी। तेरी सहमति तो है न?’
‘हां’ कहकर नन्दिश्री ने लज्जा से सिर झुका लिया।
अभी रात का पहला पहर ही बीता था। सेठ इन्द्रदत्त राजकुमार बिंबसार के कमरे में गए। वह जागा रहे थे। सेठ इन्द्रदत्त ने कहा- 'राजकुमार बिंबसार! मुझे आपका
सुनहरे सत्य कथाएँ
असली परिचय मिल गया है। यह भी जानता हूँ कि आप निर्वासित और गुप्त जीवन क्यों बिता रहे हैं।’
‘तब तो मुझे यहां से चला जाना चाहिए।’
‘नहीं राजकुमार! मैं आपकी सफलता चाहता हूँ और आपको सहयोग दूंगा। क्या आप नन्दिश्री से विवाह करेंगे?’
‘यदि नन्दिश्री को स्वीकार हो तो? साथ ही एक शर्त भी है यह विवाह बिना किसी दिखावे के हो और मेरा असली परिचय न दे।’
‘नन्दिश्री को भी आपसे विवाह करना स्वीकार है और आपकी शर्त भी मुझे स्वीकार है। किंतु एक शर्त मेरी भी है। जब तक आप अपने कार्य में सफल नहीं हो जायं, आप यहीं रहें? मैं तन, मन, धन से आपकी हर सहायता करूंगा।’
राजकुमार बिंबसार ने शर्त स्वीकार कर ली। फिर खूब धूमधाम से विवाह हुआ। राजकुमार ने सेठ इन्द्रदत्त का घर ही अपनी गुप्त मंत्रणा एवं योजना निर्माण का केन्द्र बना लिया। धीरे-धीरे सेना के संगठन का काम पूरा होने लगा। उधर राजा उपश्रेणिक के बाद राजकुमार चिलाती मगध का राजा बन गया था। किंतु प्रजा उससे बहुत दुःखी थी।
कुछ समय बाद नन्दिश्री ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया। उसका नाम रखा था- अभय कुमार।
अभय कुमार चंद्र कलाओं के समान बढ़ने लगा। अपने पिता के समान वह भी अत्यंत प्रतिभा वाला सिद्ध हुआ। सात वर्ष की आयु पहुंचने पर अभय कुमार शास्त्र-विद्या सीखने लगा था। उसकी असाधारण प्रतिभा से सभी चकित थे। राजकुमार ने उसकी शिक्षा की श्रेष्ठतम व्यवस्था कर दी थी।
गिरिराज में चिलाती के अत्याचार बढ़ते जा रहे थे। इससे गिरिराज के निवासी भी दुखी और असंतुष्ट थे। सेना का प्रत्येक सैनिक चिलाती से घृणा करने लगा था। जनता यह चाहने लगी थी कि किसी प्रकार राजकुमार बिंबसार आएं और राज्य संभालें, नगर के श्रेष्ठ भी चिलाती को गद्दी से उतारने में सहयोग देने को तैयार थे। वे इसके लिए बड़ी से बड़ी धनराशि देने को तैयार थे।
गिरिराज में फैले इस असंतोष के कारण पाँच व्यक्तियों का एक प्रतिनिधि-मंडल वेण पद्मनागर गुप्ता ढंग से गया। इसमें महामात्य कल्लक, सेनापति भद्रसेन, ब्रह्मचारी वर्षकार, नगरसेठ धनंजय और नगराध्यक्ष कुसुमकांत सम्मिलित थे। इन लोगों ने राजकुमार बिंबसार को राज्य की पूरी स्थिति की जानकारी दी। यही उपयुक्त अवसर
है जबकि आप चढ़ाई करें तो रक्त की एक बूंद बहाए बिना ही राजसिंहासन पर आपका कब्जा हो जायगा। सारी योजना पर विचार करने के बाद राजकुमार बिंबसार ने सहमति दे दी।
राजकुमार ने नन्दिश्री से कहा- ‘तुम इस बालक कैलाश नहीं हो। मैं अनुपयुक्त समय पर तुम्हें वहां बुलाऊंगा।’
अगले दिन राजकुमार ने अपने विश्वासपात्र सैनिकों के साथ गिरिराज जाने की तैयारी की। अभय कुमार उस समय सात वर्ष का बालक था। राजकुमार ने नन्दिश्री से कहा- ‘तुम इस बालक के साथ यहीं रहो। मैं उपयुक्त समय पर तुम्हें वहां बुला लूंगा।’
गिरिराज के लिए राजकुमार बिंबसार ने प्रस्थान किया। सभी जगह उन्हें हर तरह का सहयोग मिला। गिरिराज पहुंचने पर उनका स्वागत हुआ। राजमहल में चिलाती सो रहा था। जब राजकुमार बिंबसार अपने सैनिक लेकर वहां पहुंचे तो किसी ने विरोध न किया। चिलाती को ज्यों ही समाचार मिला तो वह डरकर पीछे के दरवाजे
से भाग गया। राजमहल पर बिंबिसार का अधिकार हो गया।
अगले दिन राजसभा जुटी, बिंबिसार के आते ही राजसभा ने ‘राजकुमार श्रेणिक बिंबिसार की जय’ का नारा लगाया। इसके बाद पूरे विधि-विधान से राज्याभिषेक किया गया।
गिरिव्रज के इस सारे घटनाक्रम की सूचना वेणु पद्मनागर में नन्दिदत्त को मिली तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा, सेठ इन्द्रदत्त ने खूब खुशियाँ मनाई।
राजा बिंबिसार ने अगले दिन राज्य-व्यवस्था के बारे में अपने मंत्रियों से वार्तालाप किया। फिर जब नन्दिग्राम के ब्राह्मणों को अतिथि-सेवा के लिए दिये जाने वाले धन का प्रश्न उठा तो बिंबिसार कुछ गंभीर हो उठे। उन्होंने कहा- 'मैंने स्वयं नन्दिग्राम जाकर देखा है कि वहाँ इस धन का सदुपयोग नहीं होता है। राजकोष से यह धन इसलिए दिया जाता है कि उस ग्राम में जाने वाले प्रत्येक नागरिक को मुफ्त भोजन दिया जाय। किंतु वहाँ के लोग इस धन का उपयोग केवल अपने आदमियों के लिए
अमय कुमार के अनोखे कारनामे
करते हैं, और बाहर के अतिथियों को इससे भोजन नहीं दिया जाता, यहां तक कि उन्होंने हमको भी भोजन देने से इन्कार कर दिया था- इसलिए नन्दिग्राम के लोगों की आर्थिक सहायता बंद करके, उन्हें राजदंड देना चाहिए।’
महामात्य वर्षकार ने राजा बिंबिसार की इस बात को सुनकर कहा- ‘आपकी बात बिलकुल सही है, राजन! किंतु आप स्वयं सोचें कि सिंहासन पर बैठने के दूसरे ही दिन ऐसा आदेश देना क्या उचित है? आप यदि उन्हें दंड देना ही चाहते हैं तो किसी और तरह से दें जिससे उन्हें इस बात का आभास हो जाय कि राजा हमसे असंतुष्ट है।’
वर्षकार की बात पर बिंबिसार ने कुछ सोचा, फिर बोले ‘ठीक है आप एक बकरा तोलकर उनके यहां भिजवा दो। साथ ही यह कहलवा दें कि इसको खूब खिलाया-पिलाया जाय। एक सप्ताह बाद बकरे को वापस बुलाकर तोला जायगा। अगर बकरे का भार जरा भी कम या ज्यादा हुआ तो सभी ब्राह्मणों को दंड दिया जायगा और उनके गाँव छीन लिये जायंगे।
राजा बिंबिसार की आज्ञानुसार महामात्य वर्षकार ने एक बकरे को तुलवाया। फिर राजा के निर्देश के साथ उसे नन्दिग्राम भिजवा दिया। जब राजसेवक उसे बकरे को लेकर नन्दिग्राम में पहुंचे और उन्होंने राजाज्ञा सुनायी तो ब्राह्मण सकते में आ गए।
तब वहां के मुखिया आगे आए। उन्होंने राजसेवकों से पूछा- हे राजपुरुषो! हम ब्राह्मण हैं, ब्राह्मण सभी की सहायता का पात्र होता है। इसलिए आप कृपाकर हमें यह तो बता दें कि इस विपत्ति से छूटने का उपाय क्या है।
राजसेवकों ने कहा- हे नन्दिग्राम्य! हम इसमें आपकी कोई सहायता नहीं कर सकते- क्योंकि हमें तो वह कारण भी नहीं ज्ञात है, जिसने यह राजाज्ञा दिलवाई है। यह आज्ञा तो स्वयं राजा बिंबिसार ने दी है। हमारी समझ में तो यही आता है कि आप लोग राजा बिंबिसार को प्रसन्न करें। वही आपको इस विपत्ति से मुक्त कर सकते हैं। इसके अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं है।’
राजसेवक वह बकरा नन्दिग्राम्य को सौंपकर चले गए। साथ ही एक सप्ताह बाद उसे लौटा ले जाने की बात कहकर चले गए। इस बीच नन्दिग्राम वासियों को उस बकरे को खूब खिलाना-पिलाना था, साथ ही यह भी ध्यान रखना था कि वह बकरा न दुबला हो, न मोटा हो। उसका भार वही रहे, जो इस समय है। इस विचित्र समस्या का क्या हल हो सकता है, किसी की समझ में न आ रहा था। वे तो बस एक ही बात समझ पा रहे थे कि उन पर राजा बिंबिसार का कोप टूट पड़ा है। इस कारण
उनके हृदय शोक से भर गए थे। और सबसे दुखदायी बात तो यह थी कि राजा का यह कोप अभी न जाने कितने रूपों में प्रकट हो। इसलिए नन्दिग्राम के हर नागरिक का चेहरा दुःख और चिंता से कुम्हला गया था।
सेठ इन्द्रदत्त के लिए राजा बिंबिसार का सिंहासन पर बैठना, एक अत्यंत शुभ-समाचार था। राजा बिंबिसार की इस सफलता में सेठ इन्द्रदत्त भी तो सहयोगी बने थे। फिर वह उसके दामाद भी तो थे। इसलिए सेठ इन्द्रदत्त ने रथ तैयार किया और गिरिव्रज की ओर प्रस्थान किया। रथ में नन्दिदत्त और उसका सात वर्षीय पुत्र अंभय कुमार भी चला।
वेणु पद्मनागर से चलकर जब सेठ इन्द्रदत्त का रथ नन्दिग्राम के निकट पहुंचा तो संध्या हो चली थी। सेठ के रथ के साथ अनेक दास-दासी और पचास सैनिक भी साथ चल रहे थे। सेठ इन्द्रदत्त ने अंधेरा होते देखकर नन्दिग्राम के बाहर ही
डेरा डालने का निश्चय किया। दास-दासियों ने तत्काल तंबू लगा दिए और सैनिक चारों ओर से पहरा देने लगे।
जबकि एक तरफ उस डेरे पर भोजन आदि का प्रबंध हो रहा था, बालक अभय कुमार का मन कहीं घूमने-फिरने को विचलित होने लगा। तब नन्द श्री ने दो सैनिकों से कहा कि वे अभय कुमार को ले जाएँ और गाँव की सैर करा लाएँ।
दो सैनिकों के साथ गाँव में घूमते हुए अभय कुमार को बड़ा आश्चर्य हुआ कि चारों ओर बड़ा उदासी और दुःख का वातावरण छाया हुआ था, न कोई चहल-पहल थी, न कोई उत्सव और न कोई गीत-संगीत का स्वर, अभय कुमार आगे बढ़ते-बढ़ते गाँव की चौपाल पर पहुँचे। वहाँ नन्दिग्राम का मुखिया नन्दिनाथ बैठा रो रहा था। वह कह रहा था- 'इस देश के किसी राज्य में ऐसा नहीं हो रहा है जैसा मगध में हो रहा है। भला किसी ने सुना है कि राजा अपने राज्य के निरपराध ब्राह्मणों को दंड दे। यह केवल मगध में ही संभव है। वह राजा बिंबसार! क्या हम तुम्हारे आने की प्रतीक्षा इसीलिए करते रहे कि हमें ये दुर्दिन देखने पड़े।
नन्दि नाम के हर नागरिक का वेश दुःख और चिंता से कुम्हला गया था
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सुनी-सुनाई सत्य कथाएँ
अभय कुमार ने नन्दिनाथ का विलाप सुना तो उसका मन दुःख से भर गया। वह समझ नहीं पाया कि राजा बिंबसार ने इस ग्राम के निवासियों को क्यों कष्ट दिया है और क्यों! वह नन्दिनाथ के पास आए। ‘आपको क्या कष्ट है? भला राजा ने आपको क्या दंड दिया है और क्यों?’ अभय कुमार ने पूछा।
नन्दिनाथ ने जब इस बालक को देखा तो पहले तो आश्चर्य हुआ, किंतु फिर उसके साथ दो सैनिक देखकर वह समझ गया कि वह अवश्य ही किसी राजघराने से आया है।
नन्दिनाथ ने कहा- हे राजपुत्र! अभी कुछ देर पहले गिरिव्रज से दो राजसेवक आए थे। वे यह बकरा दे गए हैं और राजाज्ञा सुना गए हैं। राजाज्ञा यह है कि बकरे को खूब खिलाया-पिलाया जाए। इसका भार वहाँ लिख लिया है। एक सप्ताह बाद यह बकरा गिरिव्रज जाएगा जहाँ फिर से वजन लिया जाएगा। बकरे का भार अगर नहीं हुआ तो ठीक है, पर अगर कम या ज्यादा हुआ तो हमारी खैर नहीं। हमें न केवल राजदण्ड दिया जाएगा बल्कि हमसे यह गाँव भी छीन लिया जाएगा। हमारी समझ में नहीं आता कि इस राजकोप से बचने का क्या उपाय करें।
इस पर अभय कुमार बोले- हे ब्राह्मण! आपको मैं अभय देता हूँ। आप राजकोप से तनिक भी न घबराएँ, मैं आपको इस समस्या का उपाय बताता हूँ। आप इस बकरे को दिन भर खूब खिलाएँ-पिलाएँ केवल शाम को इसे एक भेड़िए के सामने बांध दिया करें। बस फिर देखिए क्या होता है।’
राजकुमार बालक से ऐसा सहज उपाय सुनकर ग्रामवासी अत्यंत प्रसन्न हुए उन्होंने अभय कुमार से कहा- ‘यदि आपने हमें अभय दिया है तो हमारी विनती भी सुन लें। इस राजकोप का अंत न समझें। निश्चय ही राजा बिंबसार बकरे के बाद कोई और समस्या भेजेंगे। उसे कौन हल करेगा? इसलिए हमारी आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि जब तक हम पर यह राजकोप है, आप नन्दिग्राम में ही रहें।’
अभय कुमार ने कहा- ‘हे ब्राह्मणो! जब मैंने आपको अभय दिया है तो उसकी रक्षा भी मैं ही करूँगा। आप निश्चिंत रहें। जब तक आपका कष्ट नहीं मिट जाता, मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा। मैंने गाँव के बाहर अपना शिविर बनवाया है।’
अभय कुमार अब वापिस शिविर में आया, उसने माता नन्दिश्री को सारी घटना सुना दी। माता नन्दिश्री बहुत प्रसन्न हुईं, वह बोली- बेटा, तुमने अभयदान दिया है तो उसकी रक्षा तो होनी ही चाहिए। मैं तुम्हारे वचनपालन में सहयोगी बनूँगी। हम तब तक नन्दिग्राम से नहीं जाएँगे, जब तक यहाँ के लोगों के दुःख दूर न हो जाएँ।
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उधर नन्दिनाथ ने वही किया जो अभय कुमार ने बताया था। नन्दिनाथ को जब यह पता चला कि अभय कुमार राजा बिंबसार का पुत्र है तो उसके मन में कुमार के प्रति अत्याधिक आदर एवं प्रेम भाव जागृत हो उठा। उसने गाँव की धर्मशाला खाली करवा दी और जाकर सेठ इन्द्रदत्त से प्रार्थना की कि वे सब धर्मशाला में आकर रहें। सेठ इन्द्रदत्त ने यह अनुरोध स्वीकार कर लिया और धर्मशाला में आकर रहने लगे।
एक सप्ताह बाद राजसेवक नन्दिग्राम आए और बकरा वापस ले गए। उसको तौला गया तो वह उतना ही निकला जितना उसे भेजा गया था। राजा बिंबसार के लिए यह एक आश्चर्य जनक समाचार था। उन्होंने नन्दिग्राम के लोगों को दंड देने के लिए दूसरा उपाय सोचा।
अबकी बार राजसेवक नन्दिग्राम पहुँचे और उन्होंने राजा बिंबसार का ऐसा विचित्र आदेश सुनाया कि सबके दिमाग चकरा गए। उन्होंने कहा- 'राजा ने कहा है कि अपने नन्दिग्राम की बावड़ी गिरिव्रज भेज दो। यदि एक सप्ताह में बावड़ी न आयी तो समस्त नन्दिग्रामवासियों को दंड दिया जायगा।
नन्दिनाथ और उसके साथियों ने जब आदेश सुना तो समझ गए कि अब उन्हें राजदंड से कोई नहीं बचा सकता, क्योंकि इस बार राजा ने एकदम असंभव कार्य करने को कहा है। इसे तो राजकुमार अभय कुमार भी नहीं हल कर पाएँगे। फिर भी मन में विश्वास की किरण लिए वे लोग अभय कुमार के पास आए और उन्हें नयी समस्या की जानकारी दी। वे इतने निराश और दुःखी थे कि चुपचाप सिर झुकाकर बैठे गए।
अभय कुमार ने पूछा- 'आप लोग इस आदेश से इतना घबराए हुए क्यों है? ‘क्योंकि यह कार्य असंभव है?’ नन्दिनाथ ने कहा।
'असंभव शब्द अभय कुमार ने नहीं जाना। ऐसा करो कि आपके गाँव में जितनी गाय भैंस, बैल आदि हों, सबको इकट्ठा करो। इतनी बड़ी संख्या में इकट्ठा करो कि यहाँ से गिरिव्रज तक उनकी पंक्ति बन जाय। उनके कंधों पर जुआ रखवा देना। फिर उन्हें रस्सियों से बांधकर जोड़ देना। गिरिव्रज उस समय पहुँचना जब राजा बिंबसार सो रहे हों। राजमहल में जाकर शोर करना कि ‘महाराज ने बावड़ी मंगवाई थी। उसे खींचकर यहाँ लाया जा रहा है। महाराज जल्दी बतावें कि बावड़ी कहाँ रखनी है?’
नन्दिनाथ ने बात समझ ली। अगले दिन वही किया गया। आधी रात के बाद राजा गिरिव्रज जानवरों के शोर से गूँज उठा। उन्हें ऐसे हाक रहे थे जैसे वे कोई
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सुनी सुनाई सत्य कथाएँ
भारी चीज लीज रहे हो। शोर सुनकर महाराज बिंबसार की नींद खुल गयी। उन्होंने पूछा-कौन है? तो द्वारपाल ने बताया कि नन्दिग्राम से वहां के लोग, आपकी आज्ञानुसार बावड़ी खींचकर लाए हैं और पूछ रहे हैं कि उसे कहां रखें? महाराज पूरी तरह जागे न थे, सो बोले- ‘जहां से लाए हैं, वहीं ले जाकर उसे रख दे और यहां से जाएं शोर न करें।’
राजा बिंबसार की यह आज्ञा जैसे ही नन्दिग्राम वासियों को सुनायी गयी- वे खुश होकर नन्दिग्राम लौट गए। उन्होंने अभय कुमार की बुद्धि का लोहा मान लिया।
किंतु प्रातः काल जब राजा बिंबसार जागे तो उन्होंने बावड़ी के बारे में पूछा। द्वारपाल ने कहा कि वो तो आपकी आज्ञानुसार जहां से लायी गयी थी, वहीं भेज दी गयी। फिर जब उन्होंने उसे गाय, भैंसों, बैलों आदि द्वारा खींचकर लाए जाने की बात सुनी तो समझ गए कि इस बार फिर नन्दिग्राम वासियों ने उन्हें अपनी
अभय कुमार के अनोखे कारनामें
बुद्धि से हरा दिया है। किंतु बिंबसार हार मानने वाले न थे। उन्होंने फिर एक नयी आज्ञा जारी कर दी, ‘नन्दिग्राम जाकर वहां के लोगों से कहो कि वे शीघ्र ही गांव के हाथी का वजन करके मेरे पास भेज दें।’
राजसेवक को नन्दिग्राम की ओर आते देखकर नन्दिनाथ समझ गया कि फिर कोई मुसीबत आ रही है, राजसेवक ने निकट आकर जब राजा का आदेश सुना तो नन्दिनाथ और उनके साथियों के चेहरे कुम्हला गए। ऐसा लगा जैसे उनके खुश रहने के दिन बीत चुके हैं। हर क्षण एक न एक समस्या सिर पर सवार रहने लगी थी।
वे अभय कुमार के पास गए नयी राजाज्ञा सुनायी। फिर चिंतित होकर बोले- ‘आप ही बताइए कुमार! क्या हाथी का तोलना संभव है! भला इतना बड़ा तराजू कहां से आएगा। फिर हाथी उस तराजू में कैसे चढ़ेगा?’
'यह आपकी चिंता का विषय नहीं है नन्दिनाथ, मैंने आपको अभयदान दिया है।
सुनी सुनाई सत्य कथाएँ
मैं अभी हाथी का भार आपको बता दूंगा।’
अगले दिन एक नाव लेकर अभय कुमार नदी किनारे पहुंचे। उसे नाव पर हाथी सवार कर दिया। इससे नाव का जितना हिस्सा पानी में डूबा, उसमें निशान लगा दिया। अब हाथी को उतारकर नाव में पत्थर भरे जाने लगे। इतने पत्थर भर गए कि नाव उस निशान तक डूब जाय। इसके बाद उन पत्थरों को तोल लिया गया। अब उन पत्थरों को हाथी के भार के साथ महाराज बिंबसार को भेज दिया गया। उन्होंने जब हाथी के भार को देखा तो चकित रह गए। कुछ देर सोचकर उन्होंने राजसेवक को बुलाकर एक लकड़ी दी। बोले- ‘इसे नन्दिग्राम ले जाओ। कहना महाराज जानना चाहते हैं कि इस लकड़ी का सिरा और पिछला कौन-सा है। यदि हमें सही उत्तर न मिला तो पूरा गांव राजदंड भोगेगा।’
इस बार जब राजसेवक आता दिखा तो नन्दिनाथ ने साथियों से कहा- लगता है महाराज हमें सताने पर तुले हुए हैं। वह किसी न किसी तरह हमें पराजित करके ही चैन लेंगे। फिर भी, जब तक हमें अभयकुमार का अभयदान प्राप्त है, तब तक तो प्रयत्न करना ही चाहिए।’
नन्दिनाथ चौपाल से उठे और वह लकड़ी लेकर अभय कुमार के पास पहुंचे। अभय कुमार ने कहा- यह तो कोई समस्या ही नहीं है। आइए मेरे साथ वह उन्हें तालाब के पास ले आए। उन्होंने वह लकड़ी पानी में डाल दी तो बहने लगी। अभय कुमार ने कहा- जिस तरफ का हिस्सा आगे को बह रहा है, वही इसका अगला भाग है और दूसरा हिस्सा पिछला भाग है। आप जाकर यह उत्तर राजा बिंबसार को बता सकते हैं।
नन्दिग्राम के ब्राह्मणों ने राजदरबार में पहुंचकर राजा बिंबसार के प्रश्न का उत्तर दे दिया था। इससे राजा को थोड़ी खीझ हुई। उन्होंने एक सेवक के हाथ में कुछ दाने तिल के रख दिए, बोले- ‘नन्दिग्राम के ब्राह्मणों को ये तिल देना और कहना, महाराज का आदेश है कि इन तिलों के बराबर ही इनका तेल निकालकर भेजें। यदि आज्ञा का पालन न हुआ तो परिणाम उन्हें मालूम है।’
नन्दिनाथ को जब यह आदेश मिला तो वह परेशान हुआ, अपने साथियों को लेकर वह फिर अभय कुमार के पास पहुंचा। अभय कुमार ने उन तिलों को एक दर्पण पर फैला दिया। फिर उन्हें नन्दिनाथ को देकर कहा- अब जाकर इनका जितना तेल निकले, निकलवा लाओ।’ नन्दिनाथ तेल निकलवा लाए तो जितने स्थान पर तिल फैलाए गए थे, उतने में उस तेल को फैलाकर नन्दिनाथ को दे दिया। अभय कुमार ने कहा- ‘अब इसे महाराज के पास गिरिज्वज भिजवा दो।’
अभय कुमार के अनोखे कारनामे
बिंबसार के सामने तेलपुष्प दर्पण आया तो वह चकित रह गए। उन्हें लगा कि इन ब्राह्मणों में अवश्य ही कोई अत्यंत बुद्धिमान् व्यक्ति है। अस्तु उसकी परीक्षा लेनी चाहिए। उन्होंने राजसेवक को बुलाकर कहा- ‘तुम इसी समय नन्दिग्राम जाओ। हमारा आदेश सुनाओ कि महाराज ने भोजन योग्य दूध मँगाया है। किंतु वह दूध न तो चार घन वाले पशु जैसे गाय, भैंस का हो, न बकरी आदि दो घन वाले का हो। नारियल या किसी फल का न हो। किंतु मीठा हो, स्वादिष्ट हो और बहुत-सा हो।’
राजसेवक ने नन्दिग्राम पहुँचकर महाराज बिंबसार का आदेश सुना दिया। इस विचित्र दूध की बात सुनकर लोग घबरा गए। उनके समक्ष में न आया कि दूध किस प्रकार का हो? आखिर महाराज क्या चाहते हैं जो हर बार एक नयी उन्नयन खड़ी कर देते हैं? वे यहीं सब सोचते हुए फिर से अभय कुमार के पास पहुँचे, जब उन्होंने अपनी समस्या बतायी तो अभय कुमार ने कहा- ‘दूध और भी कई तरह से बनता है। आप कच्चे धान की बालें मँगवाकर उन्हें पिसवा लें, उनका उत्तम दूध बनेगा। धान इतनी मँगवाएँ कि तीन-चार घड़े दूध बन जाये।’
नन्दिनाथ ने वैसा ही किया। दूध बनाकर महाराज बिंबसार को भेजा गया। उन्होंने उसे पिया तो वह अत्यंत स्वादिष्ट और मीठा लगा। पर वह तो परीक्षा लेने लगे थे। उन्होंने फिर से राजसेवक भेजा और कहलवाया कि हमारे सामने एक मुर्गे को लड़ाकर ‘मुर्गों की लड़ाई’ दिखाएँ, नन्दिग्राम के लोगों ने सुना तो उन्हें हँसी आ गयी कि कहीं एक मुर्गे से, मुर्गे की लड़ाई दिखा सकते हैं? किंतु राजा की आज्ञा थी और असंभव को संभव करके दिखाना था। वह पाति केवल अभय कुमार में थी। अभय कुमार के पास जाने पर उन्होंने कहा- ‘आप केवल एक ही मुर्गा लेकर जाइये। साथ में एक दर्पण ले जाइए। उसमें मुर्गे को उसी की तस्वीर दिखाकर उसे लड़वा दीजिए।’
बात तो ठीक थी। बस नन्दिग्राम वासी राजदरबार में उपस्थित हुए और एक मुर्गा लड़ाकर दिखा दिया। महाराज बिंबसार एक मुर्गे की लड़ाई देखकर चकित रह गए।
नन्दिग्राम वासियों के जाने के बाद महाराज बिंबसार समझ नहीं पा रहे थे कि इन लोगों को कैसे पराजित किया जाय? लगता है इनमें से कोई बहुत बुद्धिमान् है। फिर भी उन्होंने परीक्षा लेने का निश्चय किया। इस बार उन्होंने नन्दिग्राम संदेश भिजवाया कि बालू की रस्सी बनाकर भेजें निःसंदेह यह असंभव कार्य था और अभय कुमार जैसे चतुर बुद्धि वाले के लिए भी हल कर पाना असंभव था। अस्तु इस बार
ग्रामवासी बड़े निराश मन से अभय कुमार के पास पहुँचे उनके झुके हुए सिर और उदास चेहरे देखकर अभय कुमार समझ गया कि इस बार कोई कठिन समस्या है। फिर भी उसने उनकी हिम्मत बंधाई तो वे बोले- ‘हमें मालूम है कि इस बार आप भी हमारी मदद नहीं कर सकते। क्या कभी बालू से रस्सी बन सकती है?’
‘जानता हूँ, इस बार प्रश्न एकदम ही टेढ़ा है किंतु घबराने की बात नहीं है। इसका भी एक सीधा जवाब है!’
एक मुर्गा लड़ाकर दिखा दिया
‘क्या? बालू से रस्सी बन सकती है?’ नन्दिनाथ खुशी से चिल्लाया!
‘नहीं नन्दिनाथ उपाय यह है कि तुम महाराज के पास जाओ, उनसे कहो कि हम रस्सी बनाना तो जानते हैं, पर पहले एक बार बनी बनाई वैसी ही रस्सी दिखा दें। आपके सजाने में तो होगी।’
यह उपाय बहुत अच्छा था। ब्राह्मणों ने जाकर बिंबसार से बालू की रस्सी बतौर नमूने के-देखने को माँगी। अब तो बिंबसार अपने ही जाल में फँस गए थे। अंत में उन्हें कहना ही पड़ा- ‘ठीक है बालू की रस्सी न बनाओ’ यह आदेश सुनते ही
नन्दिग्राम के लोग खुशी-खुशी वापस गाँव में आ गए।
किंतु राजसेवक तो पीछे-पीछे ही पहुँच गया। उसके पास फिर एक कठिन सवाल था। नन्दिग्रामवासी इन कठिन परीक्षाओं से तंग और दुखी हो चुके थे। वे अभय कुमार के पास आए और बोले- ‘हे राजकुमार! हम तो महाराज की इन परीक्षाओं से दुखी हो उठे हैं। हमें एक पल का भी चैन नहीं है। ऐसा लगता है कि जब महाराज हमें नन्दिग्राम से हटा नहीं देंगे, वह शांत नहीं होंगे। इसलिए अच्छा यही है कि हम यहाँ से चले जाएँ।’
नन्दिनाथ के इन दुःखभरे शब्दों को सुनकर अभय कुमार ने उन्हें धैर्य रखने के लिए कहा। फिर उस नयी समस्या के बारे में पूछा जो अब उनके सामने थी। नन्दिनाथ ने बताया कि महाराज ने एक ऐसा सफेद कद्दू मंगवाया है जो घड़े के आकार का हो और उसी में बंद हो।
‘यह कोई कठिन कार्य नहीं है। अच्छी जाति के सफेद कद्दू के बीज लाइए।’
अच्छी जाति के सफेद कद्दू के बीज लाइये उन्हें खाद पानी देकर उगाकर फिर उसका फल घड़े में डाल दीजिये
उन्हें खाद पानी देकर उगाइए। फिर उसका फल घड़े में डाल दीजिए। ताकि वह उसी में बढ़े, पूरा कट्ठू होने पर बड़ा महाराज को भेज दीजिए।’
नन्दिग्राम वासियों ने उसी तरह कट्ठू उगाया और फल तैयार होने पर वह बड़ा महाराज को भिजवा दिया।
महाराज बिंबसार देख रहे थे कि वे कठिन से कठिन समस्या नन्दिग्राम भेजते हैं। वहां से वह बड़ी सुगमता से हल होकर आ जाती है। इसके पीछे कोई रहस्य अवश्य है। वह इस रहस्य को जानने के लिए उत्सुक हो उठे। तब उन्होंने कुछ बुद्धिमान् व्यक्तियों को बुलाया और कहा- 'आप लोग नन्दिग्राम जायं। वहां गुप्तरीति से पता लगाएं कि वह कौन व्यक्ति है जो हमारे कठिन प्रश्नों के उत्तर देता है।
गिरिराज के बुद्धिमान् की टोली जब नन्दिग्राम पहुंची तो वहां एक बाग में अभय कुमार कुछ लड़कों के साथ खेल रहे थे। वह दूर से ही देखकर उन लोगों को पहचान गए। उन्होंने लड़कों से कहा- ‘अब जरा खेल हो जाए! वह लोग इधर आ रहे हैं। इस बाग के मीठे फल देखकर उनका मन ललचाएगा। पर कोई, उन्हें फल नहीं देगा। जैसा मैं कहूं वैसा करना।’
तो जरा गरम फल खिलाओ ना?
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वे सब पेड़ों पर चढ़ गए। इधर बुद्धिमानों की टोली बाग में पहुंची थके और भूखे तो थे ही, मीठे फल देखकर मन ललचाया गया। एक व्यक्ति ने कहा- ‘ए लड़को! क्या तुम लोग हमारे लिए कुछ फल तोड़कर दे सकते हो?’
उत्तर दिया अभय कुमार ने- ‘हां… हां… पर हमारे पास दो तरह के फल हैं। एक गरम दूसरे ठंडे। कैसे फल खाएंगे आप?’
‘अच्छा? ऐसी बात है? तो जरा गरम फल खिलाओ न?’ अभय कुमार जामुन के पेड़ पर चढ़े थे। वह वहीं से बढ़िया पकी हुई जामुन तोड़-तोड़कर गिराने लगे। राजा के आदमी उन्हें उठाने लगे। किंतु खाने के पहले उन फलों में लगी धूल को फूंफूंफूंकर झाड़ने भी लगे। तभी ऊपर से अभय कुमार ने कहा- ‘देखा, गरम फल है न! तभी तो फूंफूंफूंकर खा रहे हो।’
‘अच्छा तो अब ठंडे फलों का आनंद लेने दो।’ अब अभय कुमार ने उन्हें कच्चे जामुन तोड़कर दिये।
राजपुरुषों ने बालक अभय कुमार की बुद्धि चतुराई, उसके मुख पर राजसी तेज और साहस को देखा तो उन्हें यह समझने में देर न लगी कि यही वह व्यक्ति है जो नन्दिग्राम के लोगों की सहायता करता है। यह भी कि इस बालक को नन्दिग्राम का नहीं होना चाहिए। फिर जब वे नन्दिग्राम वासियों से मिले तो उन्हें सभी बातों का विस्तार से पता चल गया।
राजपुरुष गिरिराज लौटकर आए और उन्होंने महाराज बिंबसार से अभय कुमार के बारे में सारी बातें बता दीं। बिंबसार मन ही मन अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्हें यही आशा थी कि उनका पुत्र भी उनके जैसा ही तेजस्वी और बुद्धिमान् बनेगा। किंतु दूसरे ही क्षण उन्होंने सोचा कि अभय कुमार से सीधे-सीधे मिलने में कोई बात न होगी। पिता-पुत्र यदि एक दूसरे को चुनौती देकर मिलें तो इस मिलन का आनंद ही कुछ और होगा।
राजपुरुष और मंत्रियों तो यह सोच रहे थे कि वात्सल्य भाव में डूबकर पिता बिंबसार, अभय कुमार से मिलने के लिए बेचैन हो उठेंगे। सभी भी है, ऐसे प्रतिभावान, तेजस्वी बेटे से भला कौन पिता मिलने के लिए उत्सुक न होगा। किंतु बिंबसार अत्यंत गंभीर मुद्रा में कुछ सोचते रहे। फिर महामात्य वर्षकार से बोले- 'आप इसी समय एक राजसेवक को नन्दिग्राम भेजिए। उससे कहिए कि वह अभय कुमार को गिरिराज आने के लिए हमारी ओर से आमंत्रित करे। किंतु यह शर्त भी बता दें कि वह न तो मार्ग से आए, न उपमार्ग से, न दिन में आए, न रात में, न भूखे आए, न पेट भर कर आएं, न किसी सवारी में आए, न पैदल, किंतु गिरिराज
बड़ी शीघ्रता से आएं।
राजसेवक ने तत्काल नन्दिग्राम के लिए प्रस्थान किया। वहां पहुंचकर उसने अभय कुमार को राजा का आदेश सुना दिया।
जब नन्दिग्राम वासियों को पता चला तो वे दुखी हो उठे। ‘एक तो यह कि अब राजा के कोप से उनकी रक्षा कौन करेगा। दूसरे अभय कुमार किस प्रकार शीघ्रता से गिरिराज पहुंचेंगे?’ अभय कुमार ने उन्हें शांत किया कि अब नन्दिग्राम पर कोई मुसीबत नहीं आएगी। इसके बाद उन्होंने अपने नाना सेठ इंद्रदत्त से कहा कि सेवकों और सैनिकों से कहिए कि वे गिरिराज चलने की तैयारी करें।
रथ में एक और छींका बंधा दिया और उस पर स्वयं बैठ गए
संध्या समय अभय कुमार ने एक रथ में एक और छींका बंधा दिया और उस पर स्वयं बैठ गए। रथ का एक पहिया सड़क पर था, दूसरा सड़क के किनारे वाली जमीन पर। उन्होंने चने का आधा पेट भोजन किया था। सेठ इंद्रदत्त और नन्दिग्राम अलग रथों पर थे। वे लोग शीघ्र ही गिरिराज पहुंच गए।
गिरिराज में अभय कुमार के आने का समाचार फैल चुका था। अस्तु समस्त नगरवासी उनके स्वागत के लिए सड़कों पर खड़े थे। हर ओर भी भीड़ ही भीड़ थी।
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अपने प्रिय राजकुमार की झलक देखने को वे बेचैन थे।
अभय कुमार अपने नाना सेठ इन्द्रदत्त के साथ राजदरबार में पहुँचे। राजदरबार आज विशेष रूप से सजा हुआ था। सभी को राजकुमार अभय कुमार की प्रतीक्षा थी। अभय कुमार ने सभा में आकर पिता बिंबसार के चरण छुए तो उन्होंने बेटे को उठाकर हृदय से लगा लिया।
‘कहिए पिता जी! आपने जो शर्त रखी थी, उन्हें पूरा करके ही मैं आया हूँ न?’
‘हाँ बेटा! मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।’
अभय कुमार की उचित आसन पर बिठाया गया। अभय कुमार ने कहा- पिता जी! मैं आपसे एक प्रार्थना करना चाहता हूँ।’
‘कहो, निःसंकोच होकर कहो!’
‘नन्दिग्राम वासियों से अनजाने में जो अपराध हुआ हो, उसके लिए उन्हें क्षमा कर दें।’
‘तुमने प्रार्थना की है तो मैं उन्हें अवश्य ही क्षमा कर रहा हूँ। किंतु वे इस बात का ध्यान रखें कि उनके यहाँ अतिथि-शाला में, भोजन कराने में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। अतिथि तो है ही वह जिसके आने की तिथि निश्चित न हो, फिर वह चाहे राजकर्मचारी हो या कोई सामान्य व्यक्ति।’
‘महाराज! हम अपने इस अपराध के लिए बार-बार क्षमा मांगते हैं।’ नन्दिग्राम को वह घटना याद हो आयी थी कि वह तो स्वयं राजकुमार बिंबसार थे। मैंने उस समय आपको पहचाना नहीं था। अब कभी ऐसी भूल न होगी।
‘ठीक है! जाओ! तुम्हें पहले जैसी ही राज-सहायता मिलेगी और तुम्हारे सब अधिकार वापस किए जाते हैं।’
‘सम्राट बिंबसार की जय’ नन्दिग्राम वासियों ने जय घोष किया- ‘राजकुमार अभय कुमार की जय।’
अभय कुमार के आने से गिरिव्रज में खुशी ही वर्षा हो रही थी। महाराज ने उन्हें युवराज पद देने की घोषणा कर दी थी। राजदरबार विशेष रूप से सजाया गया था। सभी मंत्री, सभासद एवं जनता के प्रतिष्ठित लोग वहाँ उपस्थित थे। महाराज बिंबसार और अभय कुमार के दरबार में उपस्थित होने पर समारोह की कार्यवाही शुरू हो गयी।
महामात्य वर्षकार ने सभा को संबोधित करते हुए कहा- 'सभासद सुनें! यह हमारे परम सौभाग्य की बात है कि हमारे बीच राजकुमार अभय कुमार उपस्थित हैं। उनके गुणों
सुनो सुनाए सत्य कथाएँ
गुणों की चर्चा में किस प्रकार करूँ, समझ में नहीं आता। वह गुणी, बुद्धिमान्, साहसी, शास्त्र संचालन में कुशल- अत्यंत पराक्रमी है। नन्दिग्राम के ब्राह्मणों की रक्षा करने में उन्होंने अपनी बुद्धि चातुरी का जो परिचय दिया है, उससे सभी चकित रहे हैं। उन्होंने अपनी विलक्षण प्रतिभा से हम सबका हृदय जीत लिया है। उनके सर्वगुण संपन्न होने के कारण यह उचित ही होगा कि हम उन्हें युवराज बनाएं। आशा है आप लोग इस प्रस्ताव से सहमत होंगे। यदि किसी को यह प्रस्ताव ठीक न लगे तो वह अपनी बात कह सकता है।’
युवराज अभय कुमार का यशगान चारों ओर होने लगा। वह नगर में जिधर भी जाते लोग पुष्प वर्षा करके स्वागत करते और जय-जयकार करते। राजसभा में भी युवराज अभय कुमार अनेक गूढ़ प्रश्नों को सुगमता से हल कर देते थे। वह न्यायप्रिय, धीर-गंभीर और प्रजापालक युवराज के गुणों से पूर्ण थे।
यह हमारे परम सौभाग्य की बात है कि हमारे बीच राजकुमार अभय कुमार उपस्थित हैं।
अभय कुमार के अनोखे कारनामे
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3038.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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