अमर विश्वास
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अमर विश्वास
अमर विश्वास
(कहानी संग्रह)
अपनी विकृत सोच को छोड़ें।
(1) माता-पिता, गुरुजनों का सम्मान, सेवा अवश्य करें।
(2) मात्र धन के लोभ वश विदेशों में न रहें। स्वदेश की और लौटने का मन बनायें।
(3) अपने कार्य, व्यापार में ईमानदारी रखें।
(4) शहरों के विलासिता पूर्ण, दूषित वातावरण से गाँव के स्वच्छ वातावरण में लौटें।
(5) गाँव को स्वच्छ, स्वाधीन और समग्र, सामान्य सुविधाओं से युक्त बनाने में जुट जाएँ।
(6) मादक द्रव्यों के सेवन एवं नशा से दूर रहें।
(7) सच्चे अर्थों में शिक्षित बनें।
(8) सात्विक आहार, विचार बनाए और मैत्री भावना को गंगा बहाएँ।
(9) स्वयं का व्यसन, नियंत्रण व प्रशस्त रखें।
(10) सम्पदा का वात्सल्य, धैर्य और विवेक पूर्ण स्थाई समाधान करें।
(11) किसी भी प्रसंग में उन्मोचन न हो।
(12) किसी भी प्रसंग में उन्मोचन न हो।
- द. रवीन्द्र जी ‘आलम’
संकलन-
अनिल जैन, भिण्ड
प्रकाशकीय
कहानी साहित्य की सरसता विशेष है। यह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें व्यक्ति और समाज के परम्परा सम्मत, क्रिया विधियों, उनके सुख-दुख के क्षणों को यथार्थ रूप में देखा जा सकता है। मनुष्य हृदय को छू जाती है और पाठकों को मंत्र मुग्ध कर देती है।
सुदूर परिपाटी पर ही आभूषण शोभा देते हैं। नीति शास्त्र में धर्म पहले है, जीवन में नैतिकता नहीं होती तो धर्म की सुरक्षा कैसे संभव है? आज आत्मा से जीवन जीना है। भोगवाद, कंप्यूटर, इंटरनेट से मुक्त रहना ही श्रेय है।
समग्रता प्रेरक मानवीय संवेदना को बल प्रदान कर सरसता व नैतिकता से ओत प्रोत कहानी संकलन प्रस्तुत है।
‘अमर विश्वास’ संकलन को भावनात्मक एवं विस्मय अताग को अंगीकार किया और अपने सभी सोपान के लिये उच्च पुरुषार्थ को 1000 तीनों लोकों से सभी तत्वों को, उनकी संवेदना सभी के हाथों में बाँध दी है। इस कार्यवाह तक एक भी प्राणी प्रेम से नहीं जा सका। अतः तीन माह में ही तीन नवीन कहानियों के भाव पूर्ण प्रकाशन करता आपको हृदय गोष्ठी का परिचायक है।
मित्रता के साथ रहकर भोग मोक्ष की विकास को ही लेखक के क्रम को संयोजित है। सभी संप्रदायियों के हृदय में आभारी है। नेक इंसान रहे। अपनी अपनी ज्ञान और आचरण निर्माण का संप्रदाय में कदम बढ़े, ऐसी भावना के साथ।
श्री रवीन्द्रनाथ ‘आलम’ (भिण्ड) म.प्र.
विशेष सूचना
प्रकाशन : 2,000 प्रतियाँ जनवरी 2023
द्वितीय संस्करण : 3,000 प्रतियाँ 22 अप्रैल 2023
(अध्ययन शोध एवं के गहन मनन व प्रकाशन)
सहयोगी :
- श्री परमानंद रस्त, कोलकाता
- श्री परमानंद रस्त, परमानंद रस्त महिला दिल्ली
- श्री अनिल जैन, भिण्ड
- श्री अनिल जैन, भिण्ड
- श्री अनिल जैन, भिण्ड
- श्री अनिल जैन, भिण्ड
- श्री अनिल जैन, भिण्ड
- श्री अनिल जैन, भिण्ड
- श्री अनिल जैन, भिण्ड
- श्री अनिल जैन, भिण्ड
- श्री अनिल जैन, भिण्ड
- श्री अनिल जैन, भिण्ड
अमर विश्वास
Editor: Anil Jain, Bhind
Price: 30.00
श्री रवीन्द्रनाथ ‘आलम’
(अध्ययन शोध एवं के गहन मनन व प्रकाशन)
(अध्ययन शोध एवं के गहन मनन व प्रकाशन)
मो. 0982625580
आवरण : 30/- रुपये
विषय सूची
| क्र. | नाम | लेखक | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| 1. | अन्य विचार | अज्ञात | 05 |
| 2. | पुत्र का मान | अज्ञात | 14 |
| 3. | गर्व | अज्ञात | 20 |
| 4. | आकृति | अज्ञात | 23 |
| 5. | उपदेश | अज्ञात | 27 |
| 6. | नेत्र वैद्य | अज्ञात | 32 |
| 7. | गुरु दक्षिणा | अज्ञात | 39 |
| 8. | खेती | अज्ञात | 50 |
| 9. | अज्ञान का परिणाम | अज्ञात | 63 |
| 10. | क्षमा | अज्ञात | 69 |
| 11. | दीक्षा | श्री ऋषभचन्द्र जैन | 75 |
| 12. | दान | पं. रतनलाल सिंघई | 84 |
| 13. | योग्यता की परख | अज्ञात | 103 |
| 14. | भ्रातृप्रेम | अज्ञात | 108 |
| 15. | सेठपुत्रों का पिशाच | अज्ञात | 111 |
| 16. | भवानी निकेतन | श्रीमती पुष्पा देवी, विदिशा | 114 |
| 17. | इन्द्रजाल | पं. ऋषभचन्द्र | 133 |
| 18. | सच्ची बात | कोठिया सुदर्शन जैन | 141 |
| 19. | सहन | अज्ञात | 149 |
| 20. | छोटे बन | अज्ञात | 158 |
| 21. | पुत्र के प्रति पिता का पत्र | श्री ऋषभराम राय (बिछला) | 168 |
| 22. | भारतीय पिता-पुत्र की जोड़ी | अज्ञात (काव्य) | 170 |
1. अन्य विचार
बेटी की सगाई के कार्यक्रम में इधर-से-उधर भागदौड़, मेहमानों के बीच में अपना अपनी सूझ से बहुधा दिखा रहा था, तभी किसी ने एक लिफाफा दिया। महेश ने खोलकर देखा है कि एक सामान्य-सी नजर लिफाफे पर डाली और लिफाफा जेब में डाल लिया। कार्यक्रम सम्पन्न हुआ, मेहमानों के जाने के बाद भोजन निपटा, पत्नी के साथ विवाह की तैयारियों को विचार-विमर्श करने बैठ गया।
हमारी खुशी के लिए लड़का और परिवार तो अच्छा मिल गया है, उसकी कोई माँग भी नहीं है। फिर भी हमें अपनी लाड़ली की खुशी और दामाद जी के परिवार के सम्मान में कुछ तो करना ही पड़ेगा। इस महंगाई के युग में कम-से-कम 8-10 लाख रुपयों की व्यवस्था करनी ही होगी। जबकि हमारे पास तो कुल मिलाकर करीब पाँच लाख तक की व्यवस्था हो होगी। बाकी के रुपयों का इंतजाम कैसे करें, कुछ समझ नहीं आ रहा। शादी नजदीक आती ही है, सारी व्यवस्था भी करनी है।
अन्य विचार
(6)
मैं तो आज से हमेशा ही कहती रही कि भविष्य के लिए मैं कुछ बचा कर रखूँ, परन्तु आप तो बड़े दानवीर बने हो। किसी को देख नहीं कि चल दिए मदद करने, अब आपकी मदद कौन करेगा भला…?
अरे पगली! परेशान क्यों होती हो, सबको अपना-अपना भाग्य होता है, कोई किसी को भाग्य ही नहीं बनाता।
हाँ! एक कारण यह है। हमारे लाड़लों की भी सद्भाव है कि उसे धार्मिक, सुसंस्कृत एवं सुयोग्य परिवार मिला है, तब निश्चित ही कोई भी विपत्ति उसे विचलित न कर सकेगी। हमारी लाड़ली ने कभी भी हमसे, अपने लिए खर्च करने को नहीं कहा, वह सदा परोपकारार्थ अपनी लाड़ली की सहायता के लिए ही प्रेरित करती रही। उनके इन परिणामों ने, सद्भावनाओं ने उसे इस मुकाम तक बाहर निकाला है। सद्भावनाओं से सौभाग्य पनपता है, दुर्भावनाओं से दुर्भाग्य। इसलिए हमें अपने विचारों को सदा आत्म-मुखी रखना चाहिए।
तीन माह हो गए हैं अब विश्राम करना चाहिए। अरे हाँ! याद आया। 1 माह एक कोरियर आया था, मैंने उसे खुशी की जेब में रख दिया था, देखो लिफाफा है?
खुशी ने निकाल कर देखा, एक लाल रंग का लिफाफा खोलकर देखा। अरे! महेश यह तो दस लाख रु. का चेक एवं एक पत्र रखा था।
अन्य विचार
(7)
पिता-पुत्र, जीवन प्रयोग,
सदा सत्य सखा।
मिट्टी को चाहे रूप में बदलने वाले, मेरे जीवन रक्षक।
आपके उपकार को ऋण में खोलकर नहीं चुका पाऊँगा। परन्तु अपनी आँखों में बहुत की खुशी के लिए एक दृष्टांत भेज रहा हूँ। कृपया अवलोकन करें। मैं शीघ्र ही ऑस्ट्रेलिया से भारत वापस हो रहा हूँ, बहन की शादी में समय पर पहुँच जाऊँगा। आपका आशीर्वाद एवं प्यार के लिए लालायित-
-आपका अग्रज विश्वास
मन की उत्सुकता लिखे हुए अक्षरों के आगे बढ़ती जा रही थी। पत्र पढ़ने लगी। जब मैं लखनऊ के सेंट-मेरी विद्यालय में अपनी अध्यापिका थी। विषयों के अनुसार प्रतिदिन की भाँति भाषा के समय अपनी लाड़ली को साथ लेकर चलने के लिए निकल पड़ी। लाड़ली पार्क में खेल रही थी। मैंने एक बार भी सेवा बच्चों की दिनचर्याओं देखा व सुरक्षा रहा था। पार्क के दरवाजे पर लगभग पन्द्रह वर्ष का एक लड़का कुछ किताबें लिए हुए बैठे हुए देखा। मैं उसके चेहरे पर निराशा साफ झलक रही थी। उसके समीप से जो भी निकला, उसने उन किताबों को खरीदने के लिए अनुनय, विनय करता। लोगों उसे दुत्कारते हुए निकल जाते, कोई किताबों को उलट-पलटकर देखता और आगे बढ़ जाता। लड़का मायूस हो पुनः अपने स्थान पर आकर बैठ जाता। कुछ
(8)
क्षणों तक पुनः निराशा की गहन सोच में खो जाता और कभी के मायूस किसी राहगीर आगन्तुक के इंतजार में जो दौड़कर जाता। बहुत देर तक मुझे एक नया देखने वाले पर मेरी उत्सुकता बढ़ती गई, मैं एक बार भी वहाँ जाती और आती हुई देखा। देखकर उसकी आँखों में गरीबी का एक किरण चमकती, अपनी समस्त ऊर्जा प्रकाशित कर मेरे पढ़ने में पहले ही वह विचलित होकर मेरी ओर दौड़ा। अपनी भी निराशा मिटाकर मैं भी खुशी का विचार कर देखा। विश्वास ही परोपकार का प्रतीक है। लाड़ली बाबूजी! ये किताबें खरीद लें, आपके काम आएँगी।
मैंने एक बार तक उसकी ओर डाली, साफ-सुथरे चेहरे पर राघव की आत्मीयतापूर्ण लेकिन पश्चात्ताप बहुत ही साधारण। किताबों की उलट-पलटकर देखा-धर्म-विज्ञान, हिंदी, लघु-कथा आदि की 4-5 पुस्तकें थीं।
मेरे कहा। ये मेरे किसी काम की नहीं।
उसका सुनकर उसका चेहरा उतर गया। मैंने सोचा ही नहीं। मैंने पूछा कितने मेरे चाहिए?
उसने बोला। मेरे पास खरीद लो। इन्हें बेचकर कमाना चाहता हूँ। अपने लोगों को भी मदद चाहिए का रहा है, वह सुनकर चलने को हुआ। मैंने पूछा। क्यों? अच्छा! उन किताबों के कितने रुपये चाहिए तुम्हें? बोला। हजार!! अच्छा! यह उसके स्वर में दीनता थी। उसके मुँह में पाँच हजार शब्द भरकर भरका लगा। फिर लगा
(9)
कहाँ तो काम है? अपनों को कोई खुशी होगी? अपना उन पुरानी पुस्तकों के 3000/- देने को कौन देगा? मैंने बच्चे से उसके सिर पर हाथ रखकर ममता में हाथों से पूछा-तुम्हारा नाम क्या है? क्या था वह? बीमार है? बच्चे ने अपना नाम किया। वह फफककर फूट पड़ा।
मेरा नाम अनाथ है और मैं कोई बीमार भी नहीं।
मैंने क्या कहा है?
माह। काफी समय की निराशा का साफ-सुथरा अब उसकी बदहाली के बाहर था। मैंने और मुझे दोनों ने एक साथ कार्य करना प्रारम्भ किया। मैंने-मेरी लाड़ली सामने चाय के ठेले पर छूटते बर्तन साफ करते हैं और मैं भी लोगों के बीच में किताबें बेचता हूँ। मैं भी उसके साथ काम में हाथ बँटाऊँ। परन्तु मैं अभी पढ़ना चाहता हूँ। मैंने 12वीं कक्षा उत्तीर्ण कर ली है, अब बी.ए.पी.एम. की तैयारी के लिए भर्ती होना चाहता हूँ। मेरे स्वयं भरता करके और माँ, पिताजी की मदद से कुछ करने की जो भी है, परन्तु 5000/- कम है। कल फॉर्म जमा करने की अंतिम तिथि है, यदि कल तक फॉर्म जमा नहीं हुआ तो एक और लक्षा चाय के ठेले बर्तन साफ करता हुआ दिखाई देगा।
अपनी लाड़ली सुनकर एक बार तो मैं भी भावुक हो उठा। परन्तु तभी विश्वास आया कि आप ऐसे कैसे कह सकते हो पर मिलते हैं। किस्मत को विश्वास करें?
आत्म विश्वास
[10]
मेरे पुत्र! क्या किया- सोचा? ये बातों इन पाँच प्रकार
स्वर्गों में रहने वाली जिन बातों से मैंने प्रेरणा ली। कि संस्कार को
बदलना होगा। मैं अपनी मेहनत करूँगा। मैं अपनी मेहनत
स्वाध्याय शैली हो रहेगी। क्या मेरा कर्म होगा। लेकिन अभी
मुझे अपने अनुभव करके अपनी आत्मा में उत्पन्न विश्वास दिखाई
देगा। मेरे मन में स्वतः उत्पन्न प्रीति अनुभव कर रहा, अनजान
व्यक्ति भी विश्वास करने लगे और मैं तो एक सामान्य शिक्षक। मेरा
मन उस पर विश्वास नहीं कर रहा था और उसका विश्वास मुझे वहाँ से
हटा नहीं रहा था। यह आनन्द अनुभव था।
यह मैं अपने बच्चों को स्कूल कॉलेज के लिए ए.टी.एम.
में 5000 रु. निकाल कर जेब में रखे थे, अचानक ही मेरा हाथ उस
जेब में गया। मैंने सोचा था- आज हो सकता है वह बच्चा स्कूल
कॉलेज नहीं गया हो। मैंने रुपये बाहर नहीं निकाले- वह बच्चा मेरे
बगल में था, वह नहीं था और जब मैंने मेरे हाथ को बाहर इसकी
कदर नहीं की तब और भाव बढ़ा। पर भाव बढ़ने के लिए
मनुष्य होना तब मैंने अपनी मुट्ठी निकाल ली। मैं अपनी ही नजर
में अपराधी कहलाऊँगा। यदि मेरे बच्चे अच्छे नहीं होंगे तो मैं
भी बुरे काम करूँगा। तो फिर मैं तो किसी के साथ कुछ या
कुछ नहीं करूँगा। सब एक में जाने क्या बात थी कि मेरे मन में
उनके बच्चों को प्रेरणा नहीं लगी। भाइयों की भावना जब
हृदय में हो पर प्रत्यक्ष देख कर हृदय में हो तो बोलकर
उसका लाभ उठाना चाहिए।
आत्म विश्वास
[11]
मैंने जब से रुपये निकाले और रुपये और बढ़ाते हुए
बोला- बेटा! इन किताबों को इतनी कीमत नहीं दी और न ये
किसी काम की नहीं। मैंने पूछा- मेरे पास जो है और जो भी मैंने
अपनी बेटी खुशी को नहीं देने के लिए रुपये रखे थे, तब वह समझ
गया। जो जो ये रुपये मुझे लौटा देगा, उस धर्म पर मैं उसे दे दूँगा। वे
सब नहीं।
वह मुझे तैयार हो गया। बोला- सर! आप मुझे ये विश्वास
करके देख सकते हैं। मैं पिछले चार दिन से नहीं बोल रहा हूँ। आप
पहले बोलते थे। मैंने देखा। मैंने मना कर अपने में आपको अपना
विश्वास अपने हाथों दिखाई देगा।
रुपये देखने और आँख में चमक आ गई, तब मैंने
मन ही मन में श्रेष्ठ मार्ग अपने आप चुना। मैंने देखा कोई नहीं
हुए। नहीं कहा। मैंने पूछा- यह अपने और चैतन्य पर विश्वास किया
है। यह आत्म विश्वास ही हमारे पुण्य-कर्म का कारण है।
रुपये मिलते ही वह ऐसा हुआ जैसे मैंने चोरी करके
भगाता हो। मैं खड़ा रहता हूँ। वह मेरा मन सोचे- मैं आज
फिर चला गया हूँ। आज अब ये बच्चे नहीं वापस नहीं मिलेंगे।
तभी खुशी के रुपये में मैंने मेरी बेटी वापस नहीं दी। मैं
वापस आ गया। मैंने यह घटना किसी को भी नहीं बताई। नहीं
बताई क्योंकि मैं जानता था कि सब मेरा मजाक बनाएँगे। कोई
भी मुझे एक शिक्षक भी समझ नहीं सकेगा।
आत्म विश्वास
[12]
समय बदलता रहा। मैं भी उन घटनाओं को विश्वास का अंग
रख कर पढ़ता रहा। मैंने नहीं छोड़ा। मैंने भी नहीं लिखकर
रखा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं
[ अमर विश्वास
मैं तो आप से हमेशा ही कहती रही कि भविष्य के लिए भी कुछ बचत करके रखो, परन्तु आप तो बड़े दानवीर बनते हैं। किसी को देखा नहीं कि चल दिए मदद करने, अब आपकी मदद करने कौन आता है… ?
अरी पगली ! परेशान क्यों होती हो, सबका अपना-अपना भाग्य होता है, कोई किसी का भाग्य छीन नहीं सकता। हम तो एक कारण मात्र हैं। हमारी लाड़ली का भी सद्भाग्य है कि उसे धार्मिक, सुसंस्कृत एवं कुलीन परिवार मिला है, तब निश्चित ही कोई भी विपत्ति उसे विचलित न कर सकेगी। हमारी लाड़ली ने कभी भी हमसे, अपने लिए खर्च करने को नहीं कहा, वह सदा गरीब, असहाय लोगों की सहायता के लिए ही हमें प्रेरित करती रही। उसके इन परिणामों ने, सद्विचारों ने उसे हर मुश्किल से बाहर निकाला है। सद्विचारों से सौभाग्य पनपता है, दुर्विचारों से दुर्भाग्य। इसलिए हमें अपने विचारों को सदा आत्मोन्मुखी रखना योग्य है।
रात्रि बहुत हो गई है अब विश्राम करना चाहिए। अरे हाँ याद आया.. 1 आज एक कोरियर आया था, मैनें उसे कुर्ते की जेब में रख दिया था, देखूँ तो किसका है ?
कुर्ते से निकाल कर देखा, एक लाल रंग का लिफाफा
खोलकर देखा ! आँखे स्तब्ध रह गईं। दस लाख रु. का चेक एवं एक पत्र रखा था। पढ़ा-
अमर विश्वास]
पिता तुल्य, जीवन प्रणेता,
सादर चरण स्पर्श ।
मिट्टी को घड़े रूप में ढालने वाले, मेरे जीवन रक्षक! आपके उपकार का ऋण मैं जीवनभर नहीं चुका पाऊँगा परन्तु अपनी अनदेखी बहन की खुशी के लिए एक तुच्छ भेंट भेज रहा हूँ, कृपया अस्वीकार न करें। मैं शीघ्र ही ऑस्ट्रेलिया से भारत शिफ्ट हो रहा हूँ। बहन की शादी में समय पर पहुँच जाऊँगा। आपके आशीर्वाद एवं प्यार के लिए लालायित-
- आपका अमर विश्वास
मन की उत्सुकता लिखे हुए अक्षरों के साथ आगे बढ़ती जा रही थी। पत्र पढ़ते ही आँखों में बीस वर्ष पूर्व की वह घटना चलचित्र की भांति झलकने लगी। जब मैं लखनऊ के सैकेन्ड्री विद्यालय में अध्यापक था। दिनचर्या के अनुसार प्रतिदिन की भांति शाम के समय अपनी लाड़ली को साथ लेकर टहलने के लिए निकला था। लाड़ली पार्क में खेल रही थी, मैं एक बैंच पर बैठा बच्चों की किलकारियाँ देख व सुन रहा था। पार्क के दरवाजे पर लगभग पन्द्रह वर्ष का एक लड़का कुछ किताबें लिए बहुत देर से खड़ा था। उसके चेहरे पर निराशा स्पष्ट झलक रही थी। उसके समीप से जो भी निकलता, उससे उन किताबों को खरीदने के लिए अनुनय, विनय करता। लोग उसे दुत्कारते हुए निकल जाते, कोई किताबों को उलट-पलटकर देखता और आगे बढ़ जाता। लड़का मायूस हो पुनः अपने स्थान पर आकर ठहर जाता। कुछ क्षण बाद पुनः निराशा का दामन छोड़ एक नई आशा और ऊर्जा के साथ किसी नवीन आगन्तुक के इन्तजार में नजरें दौड़ाने लगता। बहुत देर तक मूक दर्शक सा देखते रहने पर मेरी उत्सुकता बढ़ती गई, मैं उसकी ओर बढ़ा। मुझे अपनी ओर आता हुआ देखकर उसकी
आँखों में रोशनी की एक किरण चमकी, अपनी समस्त ऊर्जा एकत्रित कर मेरे पहुँचने से पहले ही वह किताबें लेकर मेरी ओर दौड़ा। आशा और विश्वास निष्क्रिय में भी ऊर्जा का संचार कर देता है। विश्वास ही पुरुषार्थ का प्रेरक है। बाबूजी-बाबूजी ! ये किताबें खरीद लें, आपके काम आयेंगी।
मैने एक नजर उसकी ओर डाली, साफ-सुथरे चेहरे पर
गजब का आत्मविश्वास लेकिन पहनावा बहुत ही साधारण।
किताबों को उलट-पलटकर देखा-उसमें विज्ञान, हिन्दी, लघुकथा आदि की 4-5 पुस्तकें थीं।
मैनें कहा ! ये मेरे किसी काम की नहीं।
उत्तर सुनकर उसका चेहरा उतर गया। नजरें नीचीं हो गईं। मैंने पूछा ! कितने पैसे चाहिए ?
मुझे भीख नहीं चाहिए। मैं इन्हें बेचकर कमाना चाहता हूँ। उसने सोचा ये मेरा समय बर्बाद कर रहे हैं, वह मुड़कर चलने को हुआ। मैने पुनः कहा ! अच्छा इन किताबों के कितने रुपये चाहिए तुम्हें ? पाँच हजार !! अबकी बार उसके स्वर में दीनता थी। उसके मुँह से पाँच हजार शब्द सुनकर एकदम धक्का लगा। फिर लगा [अमर विश्वास]
कुछ तो कारण है ? अवश्य ही कोई मजबूरी होगी ? अन्यथा इन पुरानी रद्दी पुस्तकों के 5000/- इसे कौन देगा ? मैनें स्नेह से उसके सिर पर हाथ रखकर सांत्वना भरे शब्दों में पूछा- तुम्हारा नाम क्या है ? क्या घर में कोई बीमार है ? स्नेह ने अपना काम किया। वह फफककर फूट पड़ा।
मेरा नाम अमर है और घर में कोई बीमार भी नहीं।
फिर क्या बात है ?
शायद काफी समय की निराशा का उतार-चढ़ाव अब
उसकी बरदाश्त के बाहर था। नेत्र और मुख दोनों ने एक साथ कार्य करना प्रारंभ किया। बोला-मेरे पिताजी सामने चाय के ठेले पर झूठे बर्तन साफ करते हैं और मेरी माँ लोगों के घरों में। पिताजी चाहते हैं मैं भी उनके साथ काम में हाथ बटाऊँ परन्तु मैं अभी पढ़ना चाहता हूँ। मैंने 12वीं कक्षा उत्तीर्ण कर ली है, अब यू.पी.एस.सी. की तैयारी के लिए फॉर्म भरना चाहता हूँ। मैंने स्वयं मेहनत करके एवं माँ- पिताजी की मदद से कुछ रकम एकत्रित कर ली है परन्तु 5000/- कम हैं। कल फॉर्म जमा करने की अंतिम तिथि है, यदि कल तक फॉर्म जमा नहीं हुआ तो एक और लड़का चाय के जूठे बर्तन साफ करता हुआ दिखाई देगा।
उसकी कहानी सुनकर एक बार तो मैं भी भावुक हो उठा
परन्तु तभी विचार आया कि आये दिन ऐसे कई लड़के सड़कों पर मिलते हैं। किसका विश्वास करें ?
[ अमर विश्वास
मैन पुनः प्रश्न किया- अच्छा ! ये बताओ इन पांच हजार रुपयों से इतनी कठिन पढाई कैसे संभव होगी ?
वह एकदम बोला ! मैं इतनी मेहनत करूँगा कि सरकार को स्कॉलरशिप देनी ही पडेगी। बस मेरा काम हो जाएगा। लेकिन अभी फॉर्म भरना अत्यावश्यक है। उसकी आवाज में अटल विश्वास दिखाई दिया परन्तु मेरे मन में उथल-पुथल थी कि अनजान राह पर, अनजान व्यक्ति पर विश्वास कैसे करूँ ? और मैं भी एक सामान्य शिक्षक । मेरा मन उस पर विश्वास नहीं कर रहा था और उसका विश्वास मुझे वहाँ से हटने नहीं दे रहा था। बस अन्तर्द्वन्द मचा था।
पार्क में आते समय खुशी की स्कूल फीस के लिए ए.टी.एम से 5000 रु. निकालकर जेब में रखे थे, अनायास ही मेरा हाथ उन रुपयों पर पहुँच गया। विचार आया-हो सकता है यह लड़का झूठ बोल रहा हो, मेरे रुपये चले जायें, सब मुझे भला-बुरा कहें परन्तु कदाचित् यह सही हो और सब मेरी तरह सोच कर कोई इसकी मदद न करे तो एक और बालक सड़कों पर भीख मांगने के लिए मजबूर होगा। तब मेरी आत्मा मुझे धिक्कारेगी। मैं अपनी ही नजरों में अपराधी कहलाऊँगा। यदि मेरे रुपये बर्बाद भी चले जाते हैं तब भी मुझे इतना संतोष तो रहेगा कि मैनें तो किसी के साथ छल या दुर्भाव नहीं किया। उसके स्वर में जाने क्या बात थी कि मेरे मन में उसके सहयोग की भावना तैरने लगी। सहयोग की भावना जब हृदय के द्वार पर दस्तक दे तब हमें सदैव हृदय का द्वार खोलकर उसका स्वागत करना चाहिए।
अमर विश्वास]
मैनें जेब से रुपये निकाले और उसकी ओर बढ़ाते हुए
बोला-बेटा! इन किताबों की इतनी कीमत भी नहीं और ये मेरे किसी काम की भी नहीं। इन्हें तुम अपने पास रखो और ये भी। मैंनें अपनी बेटी खुशी की फीस के लिए ये रुपये रखे थे, जब तुम समर्थ हो जाओ तो ये रुपये मुझे लौटा देना, इस शर्त पर मैं तुम्हें ये रुपये दे सकता हूँ ।
वह सहर्ष तैयार हो गया, बोला-सर! आप मुझ पर विश्वास करके देख सकते हैं। मैं पिछले चार दिन से यहाँ आ रहा हूँ। आप पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने इतना पूछा। समय आने पर आपको अपना विश्वास अमर होता दिखाई देगा।
रुपये देखकर उसकी आँखों में चमक आ गई, लगा जैसे वह मेरे हाथ से झपट लेगा। मैनें रुपये और अपना कार्ड उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा ! बेटा ! तुम्हारा नाम अमर है और मैंनें तुम पर विश्वास किया है, यह अमर विश्वास ही हमारे तुम्हारे नये संबंध का नाम है। रुपये मिलते ही वह ऐसा भागा जैसे चोर, चोरी करके
भागता है। मैं खड़ा देखता ही रह गया। मैनें सोच लिया-मैं आज फिर छला गया हूँ, शायद अब ये रुपये कभी वापस नहीं मिलेंगें। तभी खुशी के हाथ के स्पर्श ने मेरी चेतना वापस लौटाई। मैं घर वापस आ गया। मैंनें यह घटना किसी को भी बताना उचित नहीं समझा क्योंकि मैं जानता था कि सब मेरा मजाक ही बनायेंगें। कोई भी मुझे एक भावुक मूर्ख से ज्यादा कुछ नहीं समझेगा। [ अमर विश्वास
समय चलता रहा, मैं भी उस घटना को विस्मृत कर अपनी राह पर चल पड़ा। सेवा निवृत्ति हुई। बेटी ने भी पढ़-लिखकर नौकरी करने की अपेक्षा समाज सेवा में अपना समय और उपयोग लगाना उचित समझा। मुझे खुशी के इस निर्णय की बहुत खुशी हुई। हम दोनों अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार एक छोटा सा ग्रुप बनाकर समाज सेवा में जुट गये।
एक दिन अमर का एक पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें मात्र चार पंक्तियाँ थीं, जिनमें से ऊपर की दो पंक्ति मेरी कुशल क्षेम के लिए, एक पंक्ति में खुशी को स्नेह एवं अंतिम पंक्ति में आस्ट्रेलिया में पदस्थ होने की बात लिखी थी।
पत्र पढ़कर आँख के कोने से एक बूँद निकलकर उस पत्र को भिगो गई। मुझे आज अपनी मूर्खता में कुछ मानवता नजर आई। मुझे लगा भले वो 5000/ रु. वापस नहीं मिले परन्तु समय पर लिया गया वह निर्णय सफल हो गया। अमर के प्रति सारे गिले- शिकवे दूर हो गये। उसके प्रति एक आत्मीयता बन आई। तब घर के सभी सदस्यों को भी उस घटना से अवगत कराया।
खुशी के विवाह के लिए जब निमंत्रण पत्र लिखने बैठा तो एक पत्र अमर के लिए भी भेज दिया। यद्यपि भारत से इतनी दूर, अपरिचित व्यक्ति, जिसके आने की संभावना क्या ? आशा भी नहीं थी, फिर भी.. !
और आज उस पत्र के जबाब में यह लिफाफा मेरे हाथ में था। जो अब भी एक सपना था।
अमर विश्वास]
खुशी के विवाह का वह शुभ दिन आ गया। प्रातः ही घर के बाहर एक बड़ी सी कार आकर रुकी, ड्राइवर ने दरवाजा खोला, एक सभ्रांत सा युवक बाहर निकला। उसने मेरे पैर छुए और अविरल अश्रुधारा से मेरा पाद-प्रक्षालन कर दिया। इतने वर्षों बाद मिलने पर भी उस अश्रुधारा ने हम दोनों को एक-दूसरे के परिचय की आवश्यकता महसूस न होने दी। वह अश्रुधारा ही परिचय के शब्द बन बैठी जो अब भी जारी थी। मैनें उसे गले से लगा लिया। घर में दोगुनी खुशियाँ छा गई। उसने बताया-भारतीय दूतावास में उच्च राजनयिक के पद पर पदस्थ हुआ हूँ। खुशी के विवाह का समाचार सुन मैनें अपना ट्रान्सफर दिल्ली में ही करा लिया है। मेरे माता-पिता अपनी आँखों से मेरी सफलता देखने से पूर्व ही चल बसे। अब मैं आपकी सेवा करके अपने माता-पिता का ऋण उतारने की कोशिश करना चाहता हूँ। क्या आप एक बार पुनः मुझ पर विश्वास करके इस सौभाग्य को प्रदान कर मुझे उपकृत करेंगें ? सभी के नेत्र सजल हो उठे। लगा भागीरथी को निकलने के लिए कैलाश पर्वत की क्या आवश्यकता ? वह तो सजल नेत्रों में भी बसती है। कौन किसके अश्रु पौंछे ? पहली बार एहसास हुआ कि खुशियाँ भी अश्रुधारा के प्रवाह में बहकर आ जाती हैं। किसी ने सच ही कहा है कि- “किया गया उपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता।”
खुशी को अनेक उपहारों के साथ स्नेह देकर भाई धर्म निभाया। खुशी भी भाई पाकर बहुत खुश थी। खुशी की माँ को तो एक बेटा मिल गया था, उसका क्या कहना ?
मैं अपनी मूर्खता पर एक बार पुनः गर्वित था। सोच रहा था-इस नश्वर संसार में एक विश्वास ही अटल है।
आज मेरा विश्वास “अमर-विश्वास” बन गया
[ अमर विश्वास
- गुरु का मोल
वेदान्त की 12वीं कक्षा की परीक्षायें नजदीक आ रही थीं परन्तु प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष परीक्षा की तैयारी में उसका मन नहीं लग रहा था। वह अकसर भविष्य की कल्पनाओं में खोकर खेद खिन्न हो जाता। यही कारण था कि प्री बोर्ड परीक्षाओं में उसके अंक देखकर उसके कॉमर्स की शिक्षिका को आश्चर्य हुआ। उन्होंने वेदान्त को बुलाकर पूछा-वेदान्त ! क्या बात है ? मैं बहुत दिनों से देख रही हूँ तुम गुमसुम से रहने लगे हो। प्रीबोर्ड परीक्षा में प्राप्ताकों से भी यही दिख रहा है कि तुम्हें कोई चिन्ता अन्दर ही अन्दर खाये जा रही है। पढ़ाई से तुम्हारा मन ऊबने लगा है। आखिर क्या बात है ? तुम कक्षा के सबसे होनहार छात्र हो। इस वर्ष 12वीं में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होकर अपने भविष्य की नींव को पक्की करने के अवसर को क्यों चूकना चाहते हो ?
वेदान्त मेघना मैम का बहुत सम्मान करता था, उनकी दी हुई शिक्षा, संस्कार और सहयोग से वह विद्यालय का सबसे होशियार विद्यार्थी था। उसके पिता बनवारीलाल की स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे परिवार के भरण-पोषण के साथ बच्चों की पढाई का खर्च भी वहन कर सकें। एक समय था जब वेदान्त आठवीं कक्षा के बाद पढाई छोड़ रहा था उस समय मेघना मैम के सहयोग ने ही उसे आगे अमर विश्वास]
पढ़ने के लिए प्रेरित किया। मेघना मैम के सामने वह कुछ नहीं बोल पा रहा था। वह आँखों में अश्रु भरे सिर झुकाए खड़ा था। मेघना मैम ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-
क्या तुम मुझसे भी कुछ छिपाना चाहते हो ? क्या बात है बताओ और अपने मन को हल्का करो। पहले तो वेदान्त टालता रहा परन्तु उनके स्नेह के आगे, उसके नयनों का बांध फूट पड़ा, उसकी आँखों में भरे अश्रु कपोलों के रास्ते बिखर पड़े। मैम ! मैं आप पर और बोझ नहीं बनना चाहता। मुझे ज्ञात है कि आपने किन परिस्थितियों में मेरी और मेरे परिवार की सहायता की है मेरा सपना था कि मैं सी.ए. का कोर्स करके एक अधिकारी बनकर देश की सेवा करूँगा परन्तु पिताजी की स्थिति देखकर सपनों का साकार होना दिखाई नहीं देता। अब पिताजी का स्वास्थ्य भी खराब रहने लगा है, अतः सोचता हूँ कि पढ़ाई छोड़कर कुछ काम धंधा करूँ जिससे परिवार की गुजर-बसर हो सके। कभी- कभी तो परिस्थितियों से हार कर आत्मघात का विचार आ जाता है। देखो वेदान्त ! आत्मघात महापाप है और आत्मघात
किसी समस्या का समाधान भी नहीं। आत्मघात तो कायर करते हैं, क्या तुम अपने को कायर कहलवाना पसंद करोगे । दूसरी बात जो दूसरों की आँखों से सपने देखते हैं, उनके सपने कभी सच नहीं होते। मन में सपनों को सच करने की ललक और उल्लास होना चाहिए। योग्य पुरुषार्थ व्यक्ति को मंजिल, लक्ष्य तक [ अमर विश्वास
पहुंचाता ही है। हाँ उसके कर्मोदय अनुसार राह में व्यवधान आ सकते हैं परन्तु कर्मठ व्यक्ति उनसे विचलित नहीं होते अपितु उसमें से मार्ग खोजकर और दुगुने उत्साह से आगे बढ जाते हैं। मुझे तुमसे ऐसे विचारों की अपेक्षा नहीं थी। मैनें तुम्हें जो ज्ञान और नैतिकता सिखाई उसका ये परिणाम – ? ओह ! शायद मेरी शिक्षा में कहीं चूक हो गई।
वेदान्त की आँखों से पश्चाताप का निर्झर फूट पड़ा। वह अपने गुरु (मेघना मैम) के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा फिर संभलकर.. मैं आज प्रण लेता हूँ कि अपने गुरु की शिक्षा को कभी लज्जित नहीं होने दूंगा। मैं इतनी मेहनत करूँगा कि परिवार के कर्त्तव्यों का भी पालन करूँ और देश सेवा भी। 12वीं का परीक्षा परिणाम आया, वेदान्त का प्रदेश मैरिट लिस्ट में प्रथम स्थान देखकर आज मेघना मैम की आँखों में खुशी के अश्रु थे। आगे की पढ़ाई के लिए उसकी छात्रवृत्ति स्वीकृत हो गई जिससे उसकी आगे की पढ़ाई का बोझ तो कम हुआ परन्तु घर- परिवार की चिंता अब भी यथावत थी, तभी मेघना मैम का ट्रांसफर भी अन्यत्र शहर हो गया। यह वेदान्त के लिए एक मुश्किल समय था क्योंकि मेघना मैम के सानिध्य एवं प्रेरणा के अभाव में वह अपनी सफलता की कल्पना करने में भी असहज महसूस कर रहा था। जाते समय मेघना मैम ने कहा-कभी भी अपने को कमजोर महसूस मत करना। विश्वास और दृढ़ता सबसे बड़ा अस्त्र है जो अमर विश्वास]
सदैव तुम्हारे पास है। उसके अवलंबन से कोई भी जंग जीत सकते हो। प्राणों का संकट आने पर भी ईमानदारी और
कर्त्तव्य पथ से विमुख मत होना। एक बात और वेदान्त ! वैसे तो गुरु अपनी साधना से प्राप्त सर्वस्व को अपने योग्य शिष्यों पर बिना अपेक्षा ही न्यौछावर करते हैं परन्तु मुझे तुमसे एक अपेक्षा है कि जीवन में कभी ऐसा कार्य मत करना कि मुझे लगे कि काश ! मैं तुम्हारी गुरु न होती ।
मैम ! मैं सदैव आपकी दी हुई शिक्षा को शिरोधार्य करके जीवन में आगे बढ़ने का प्रयत्न करूँगा। कभी अपने गुरु के गुरुत्व का अपमान नहीं होने दूंगा।
समय बढ़ता गया वेदान्त का सी.ए. के लिए चयन हो गया, साथ ही उसने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना प्रारंभ कर दिया जिससे घर का खर्च चलने लगा।
गुरुओं द्वारा दर्शाये पथ का अनुसरण करने पर
सफलता खिंची चली आती है। ऐसा ही वेदान्त के साथ हुआ। कठोर परिश्रम लग्न और विश्वास से वेदान्त एक योग्य इन्कमटैक्स अधिकारी बन गया।
एक दिन वेदान्त को उच्च अधिकारी का संदेश प्राप्त हुआ कि एक नेताजी के यहाँ इन्कमटैक्स का छापा पड़ना है जिसके लिए मुख्य अधिकारी के रूप में वेदान्त का चयन किया गया है। वेदान्त ने फाइल का सूक्ष्म अध्ययन किया समकक्ष अधिकारियों के साथ [ अमर विश्वास
रणनीति बनाकर नेताजी के सभी ठिकानों को घेर लिया। सोच से भी अधिक धन, आभूषण एवं अवैध कागजात जब्त किए गये।
नेताजी का शहर में बहुत नाम था, उन्हें इज्जत एवं संपत्ति दोनों जाने का डर सता रहा था। वेदान्त की ईमानदारी के चर्चे वे सुन चुके थे फिर भी करोड़ों रु. के प्रलोभन का प्रस्ताव दिया गया। एक क्षण को इतनी बड़ी राशि ? मन में सोच की रेखा खींच गई। बचपन की परेशानियाँ नजरों के सामने तैर गईं। दिन बीत गया शेष कार्यवाही अगले दिन के लिए छोड़ दी। नेताजी भी प्रभुत्व वाले व्यक्ति थे। शाम-दाम-दण्ड-भेद में कुशल। उन्होंने वेदान्त की स्त्री के सामने भय और प्रलोभन दोनों पासे पलट दिए। आभूषणों की चमक स्त्रियों को लोभी बना देती है। रात्रि में स्त्री की जिद और मन में उत्पन्न शिथिलता ने प्रस्ताव के सामने घुटने टेक दिए । अगले दिन पुनः शेष कार्य के लिए नेताजी के घर पहुँचे। नेताजी को विश्वस्त सूत्रों से सब ज्ञात हो चुका था। पाँच करोड़ रु. में बात तय हुई। छापे की खबर शहर में फैल चुकी थी पत्रकार (मीडिया कर्मचारी) आदि सब एकत्रित हो गये। उन्हें कार्यवाही पूर्ण होने तक बाहर ही रोक दिया गया। जहाँ नेताजी को अपना सम्मान बचाने की खुशी थी वहीं वेदान्त को पाँच करोड़ की बड़ी रकम की।
पत्रकार वार्ता के लिए पत्रकारों को एक साथ बैठाया गया। नेता जी ने अपनी बेटी को आवाज देते हुए कहा - बेटी मेघना। अमर विश्वास]
साहब के लिए मिठाई और पानी तो लाओ ! " मेघना" नाम सुनते ही वेदान्त की आँखों में बिजली कौंध गई। उसे अपनी नजरों के सामने मेघना मैम पानी का गिलास लिए खड़ी दिखाई देने लगीं और बोलीं- वेदान्त ! जीवन में कभी ऐसा कार्य मत करना कि मुझे लगे कि काश ! मैं तुम्हारी गुरु न होती। अचानक वेदान्त की चीख निकल पड़ी। सारा शरीर पसीने से तर हो गया। देखा सामने नेताजी की 12 वर्ष की बेटी मेघना मिठाई और पानी लिए खड़ी थी। वेदान्त ने मिठाई का एक टुकड़ा लेकर मेघना को खिलाया और पत्रकारों के सामने नेताजी की पूर्ण स्थिति स्पष्ट कर दी । नेताजी अवाक् रह गये। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। वेदान्त को एक बार पुनः खुशी का अनुभव हुआ परन्तु इस बार वह खुशी आत्म संतोष एवं कर्त्तव्य निर्वहन की थी।
अनुकूलताएँ व्यक्ति को कर्त्तव्य पथ से विचलित तो
कर सकती है परन्तु संयम एवं दृढ निश्चय उसे विचलित
होने से रोक लेते हैं।
उसने मन ही मन मेघना मैम को धन्यवाद दिया। मैम !
आज आपने मुझे गिरने से बचा लिया। मुझे गर्व है कि मुझे आप जैसा गुरु मिला।
“गुरु जीवन की एक लाठी है।” (जो कठोर रहकर
अनुशासित करती है, स्खलित होने पर सहारा बन जाती है) 3. शर्म
[ अमर विश्वास
बी./207 के आगे एक पुलिस की गाड़ी आकर रुकी।
इंस्पेक्टर सा. ने बाहर आकर देखा, एक अच्छी कॉलोनी दो मंजिला इमारत, कुछ समझ नहीं आया, मोबाइल निकालकर फोन किया। हैलो ! जी आपने भोजन सामग्री के लिए फोन किया था, मैं कॉलोनी में खड़ा हूँ आप कहाँ हैं ?-जी साहब मैनें ही फोन किया था-अभी आता हूँ। एक 62 वर्षीय बुजुर्ग निकलकर बाहर आये, नमस्कार साहब। देखते ही इन्सपेक्टर चीख पड़ा। यह मकान तुम्हारा है ?-जी साहब ।
शर्म नहीं आती तुम्हें ? इतना बड़ा आलीशान मकान होते हुए भी गरीबों का हक छीनना चाहते हो, गरीब और भूखे लोगों के लिए वितरण किए जाने वाले भोजन की लालसा रखते हो, तुम जैसे लोगों ने ही देश को बदनाम किया है। मेरे कीमती समय को बर्बाद किया, अरे कुछ तो शर्म करो। लोग बुजुर्गों का सम्मान करते हैं और तुम… ।
आँखों से अश्रु छलक पड़े, हाथ जुड़ गये, हकलाते स्वर, से एक धीमी सी आवाज निकली, साहब ! शर्म ही तो आती है इसीलिए तो आपके आगे हाथ फैलाने पड़े। नाम के पीछे जैन लगा होने से लोग समझते हैं ये ‘जैन’ साहब हैं। जब तक हाथ-पैर चले, जो कुछ कमाया, बच्चों की पढ़ाई, पालन-पोषण में चला गया, अमर विश्वास]
पढ़ने के बाद भी बेटा बेरोजगार ही रहा। बेटी की शादी के लिए जमा रकम और पत्नी के जेवर बेचकर बेटे को काम-धंधे पर लगाया। रहने को जगह नहीं थी इसलिए बेटे की शादी नहीं हो रही थी, सो बैंक से लोन लेकर मकान बनवा लिया। एक मंजिल किराये पर उठा दी जिससे लोन की किस्त जमा होती रहे। लॉकडाउन होने से बच्चों का काम-धन्धा और मकान का किराया तो बन्द हो गया परन्तु लोन की किस्त और घर का खर्चा बन्द नहीं हुआ। राशन कार्ड बनवाया था परन्तु बहु-बेटियों को लाइन में लगने में शर्म आती थी सो वह भी निरस्त हो गया। बहू के नाम से जन-धन खाता खुलवाया था परन्तु इतनी हैसियत नहीं थी कि उसमें कुछ जमा-निकासी की जा सके, अत: वह भी बन्द हो गया। इतना बड़ा मकान देखकर कोई संस्था या मददगीर भी इधर नजर नहीं करते। जैन होने के कारण किसी के सामने हाथ फैलाने में शर्म आती है, करें तो क्या करें ?
इतना सुनते-सुनते इंस्पेक्टर साहब की आँखें भी छलक उठीं, तुरन्त चश्मा आँखों पर चढ़ा लिया।
साहब ! हम तो आज भी भूखे रह लेते परन्तु तीन वर्ष का पोता, दो दिन से आम खाने के लिए मचल रहा था, जैसे-तैसे समझाया परन्तु आज सुबह जब वह भूख से तिलमिला उठा तो सारी शर्म चली गई। बेटे के मना करने पर भी बेटी से कहकर डायल 112 पर फोन लगवा दिया। इतना कहकर वृद्ध मकान की ओर मुड़ [ अमर विश्वास
गया। इसी बीच इंस्पेक्टर की आँखों के दो मोती उस जगह झड़ गये जहाँ वृद्ध खड़े थे। उनकी आँखों से वृद्ध का वह चेहरा अभी भी ओझल नहीं हुआ था।
इंस्पेक्टर साहब ने गाड़ी में से राशन की दो बोरी उठवाकर अन्दर पहुँचाई। वृद्ध के बेटे को बुलाकर अपनी जेब से 2000/- निकालकर देते हुए कहा-देखो ! आदमी और काम कोई छोटा नहीं होता। ईमानदारी, संतोष और स्वाभिमान से कोई भी बड़ा बन सकता है। ये कुछ रु. रखो, इनसे कुछ फल-सब्जी खरीदकर मोहल्ले में बेच दिया करो। उन्हें भी कहीं नहीं जाना पडेगा और तुम्हारा घर खर्च भी चल जाएगा ! मेरे ऑफिस आ जाना मैं तुम्हें पास बनाकर दे दूँगा, जिससे बाजार आने-जाने में परेशानी न हो। हाँ एक ग्लास पानी मिलेगा ? हाँ-हाँ जी साहब, अभी लाया। (दर असल पानी तो मात्र बहाना था उन बुजुर्ग की छवि को एक बार फिर से देखने का) पानी लीजिए साहब ! तब तक बुजुर्ग भी बाहर निकल आये थे। पानी पीते हुए (बनावटी रोष दिखाते हुए) ये कोई खैरात नहीं है, उधार दिए हैं, इन्हें लेने मैं वापस आऊँगा। एक बार पुनः बुजुर्ग और इंस्पेक्टर सा. की आँखों में अदृश्य अश्रु छलक उठे परन्तु इस बार वे खुशी के आंसू थे। इंस्पेक्टर सा. चल पडे अपने अगले पड़ाव की ओर, अन्तर में आत्म संतोष लिए।
अमर विश्वास]
- आकृति
ग्रामीण परिवेश, छोटा सा पिछड़ा गाँव जहाँ शिक्षा का कोई विशेष महत्व नहीं था, उसमें भी बेटियों के प्रति तो किसी के मन में नहीं। गाँव में दसवीं कक्षा तक ही विद्यालय था। दसवीं कक्षा तक पढ़ने के बाद लड़कियों को विवाह की जंजीरों में जकड़ दिया जाता।
इन सबके बीच भी सुन्दर, सुशील आकृति को पढ़ाई से
विशेष रुचि थी, वह अपनी सखियों के साथ खेलती तो उसमें भी कुछ नया सीखने की कोशिश करती। बुद्धि कुशाग्र थी, अपना पाठ बहुत जल्दी पढ़ लेती, शेष समय में मास्टर जी से पुस्तकें लेकर पढ़ती रहती। जिससे दसवीं में आते-आते उसने बहुत कुछ सीख लिया था। घर पर भी माँ के कार्यों में हाथ बटाते समय वह कुछ नया करने की सोचती जिस कारण कभी-कभी उसे डांट भी मिलती। दसवीं की परीक्षायें हो चुकीं थी, पिताजी शादी के लिए लड़का देखने लगे। आकृति को जब मालूम हुआ तो उसने मना कर दिया। पिताजी ! मुझे अभी शादी नहीं करनी, मैं अभी बहुत छोटी हूँ; मुझे अभी और पढ़ना है।
पिता ने मना कर दिया। घर में क्लेश हुआ परन्तु आकृति अपनी जिद पर अड़ी थी। तभी दसवीं का परीक्षा परिणाम आया। मास्टर जी ने आकर खबर दी कि आकृति जिले में प्रथम स्थान में [ अमर विश्वास
उत्तीर्ण हुई है उसे 5000/- रु. का पुरुस्कार दिया गया है। कल के समाचार पत्र में उसका नाम लिखकर आयेगा। पिता को आश्चर्य हुआ। मास्टर जी के समझाने एवं 18 वर्ष से पहले शादी के अपराध के भय से जब तक योग्य लड़का नहीं मिलता तब तक पढ़ने की स्वीकृति मिल गई परन्तु गाँव में विद्यालय नहीं है, क्या करें? आकृति ने मास्टर जी से कहा- आप मुझे पुस्तकें लाकर दे दीजिए, मैं गाँव में ही पढ़ लूँगी। परीक्षा देने शहर चली जाऊँगी। समय बीतता गया, आकृति ने बी.ए. की पढ़ाई पूरी कर ली। इसी बीच आकृति की सगाई मेजर अनुज के साथ हो गई। आकृति का मन अभी भी और पढ़ाई करने का था परन्तु ससुराल के नियम- कायदों के कारण उसे शान्त रहना पड़ा। एक दिन उसने अपने पति के सामने पढ़ाई जारी रखने का प्रस्ताव रखा। पहले तो अनुज माँ के स्वभाव के कारण मना करता रहा फिर आकृति की लगन के आगे उसे झुकना पड़ा। अनुज ने पुस्तकें लाकर दे दीं। आकृति घर का कार्य समाप्त करने के बाद शेष समय पुस्तकें पढ़ने में लगाती। इस बीच उसे सासू माँ के कटु वचनों का भी सामना करना पड़ता परन्तु विनय से सब कुछ जीता जा सकता है। यही मंत्र उसने भी अपनाया।
शादी को अभी एक वर्ष ही हुआ था अनुज छुट्टियाँ लेकर आया था। आकृति की खुशियों का ठिकाना नहीं था। लेकिन कब छुट्टियाँ पूरी हो गई, पता ही नहीं चला। अनुज को जम्मू कश्मीर के पंचकूला सेक्टर में ट्रेनिंग के लिए बुलाया गया। एक रात्रि ट्रेनिंग अमर विश्वास]
कैंप में चार आतंकवादी घुस आये, उन्होनें सोते हुए सैनिकों पर गोलियों की बौछार कर दी। बहुत से सैनिक आँखे ही न खोल सके, अनुज ने अपने साथियों के साथ मिलकर बड़ी सूझ-बूझ से आतंकियों से लड़ाई की। चारों आतंकवादियों को मार दिया गया। इसी बीच दो गोलियाँ अनुज के सीने को भेदती हुई निकल गई। “भारत माता की जय - -” के अंतिम शब्दों के साथ अनुज की आँखे सदा के लिए बंद हो गईं।
पूरे राजकीय सम्मान के साथ तिरंगे में लिपटकर मेजर अनुज को जब सलामी दी जा रही थी तब भी मन के समन्दर में उछाल भरने वाले अश्रु आकृति की आंखों से रास्ता बनाने में असमर्थ हो रहे थे। उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया, सारे सपने चकनाचूर हो गये। उसने सैनिकों के शौर्य की बहुत कथाएँ पढ़ी थीं पर आज अपने पति के बलिदान से बैचेन हो उठी थी। गर्भ में पलने वाले शिशु को कमजोर नहीं होने दूँगी। उसे भी पति की शौर्य गाथा सुनाकर देश के लिए तैयार करना मेरा धर्म है-ऐसा विचार कर मेजर अनुज को श्रद्धांजली अर्पित की। आँखों से अश्रुधारा बहते भले ही किसी को न दिखी हो परन्तु हृदय सागर में शोर मचाने वाली तरंगों से कौन अपरिचित था। छोटी सी उम्र में वैधव्य का दुःख किससे छिपा था ?
मेजर अनुज को पराक्रम के लिए वीर चक्र प्रदान किया गया एवं आकृति को फौज में नौकरी। घर वाले नौकरी के लिए तैयार [ अमर विश्वास
नहीं थे परन्तु आकृति की जिद के आगे वे चुप रहे। आकृति मात्र बी. ए. पास थी इसलिए उसे सेना में उच्च पदवी नहीं मिल सकती थी परन्तु बच्चे के जन्म लेने तक के आठ माह उसके लिए काफी थे। उसने संकल्प लिया कि मैं इस समय का पूरा उपयोग करूँगी। उसने सिविल सेवा का फार्म भर दिया और तैयारी में जुट गई। घर में क्लेश बढ़ता गया। पिताजी ने मायके आने के लिए कहा परन्तु उसने इन्कार कर दिया। अनुज की जननी और जन्मभूमि ही मेरा घर है। एक ओर जहाँ गर्भकाल का समय पूर्ण हो रहा था, वहीं दूसरी ओर परीक्षा की तिथियाँ घोषित हो चुकी थी।
घर के सारे कार्य करने के बाद समय निकाल कर पढ़ना बहुत कठिन था परन्तु हार मानना उसने नहीं सीखा था। नये मेहमान के जन्म लेते ही घर में खुशियाँ छा गईं। परिवारजन का व्यवहार बदल गया, सब सहयोग करने लगे। प्रसव के बीस दिन बाद ही परीक्षा थी, बहुत उत्साह से परीक्षा दी और अच्छे अंक प्राप्त कर मिलिट्री में उच्च पद के लिए चयन हो गया। जो अश्रु अनुज की अर्थी पर झलकने के लिए बने थे वे आज सब एक साथ झर पड़े सुना था समन्दर कभी खाली नहीं होता परन्तु नयनपथ से सारा समन्दर आज खाली हो चला था।
पति वियोग में स्वयं की रक्षा के लिए चिंतित रहने वाली नारी आज देश की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित थी।
अमर विश्वास]
- उपहार
चुनाव का समय था। ऑफिस जाने को देर हो रही थी, इस कारण थोड़ा चिड़चिड़ा रहा था तभी मानसी ने आकर बताया कि आज सुलभ का जन्मदिवस है, वह अपने मित्रों को बुलाकर पार्टी करने के लिए बोल रहा है। मैं और चिड़चिड़ा गया। तुम भी क्या ? समझती नहीं हो, हमारे यहाँ यह सब नहीं चलता। वैसे भी चुनाव का समय है, मुझे ऑफिस से आने में देर हो जाएगी। सुलभ कमरे के बगल से खड़ा सुन रहा था, मायूस होकर अन्दर चला गया। मैनें एक नजर डाली और घर से बाहर ऑफिस के लिए निकल गया। दिन भर काम के बोझ से थक कर शाम को जब घर
निकलने को हुआ तो सुलभ का मायूस चेहरा आँखों के सामने आ गया। लगा शायद मैं गलत था ? बच्चा ही तो है और आज जन्मदिन भी है। अन्य बच्चों को देखकर बालमन मचल ही जाता है। मुझे नाराज नहीं होना चाहिए था। मन हुआ कुछ अनोखा उपहार दूँ। पर क्या दूँ समझ नहीं पा रहा था। बैठे-बैठे ही अचानक कागज और कलम ने गति पकड़ी, शब्दों ने एक छोटी सी कविता का रूप ले लिया -
अपना ईमान नहीं खोना, अपना ईमान नहीं खोना।
चाहे कितने ही आएँ प्रलोभन, चाहे कितने भय आएँ ।। टेक ।। अपने को अब तो पहिचानो, कर्तव्यों के प्रति सजग रहो। पर को देख नहीं ललचाओ, अपने में संतुष्ट रहो ।। 1 ।। [ अमर विश्वास
नेक कमाई ही सुखदाई, तृष्णा में तुम नहीं पड़ो।
चिन्तित अरु भयभीत रहोगे, ईर्ष्या अरु अभिमान तजो ।।2।। सदा सादगी को अपनाओ, मन में श्रेष्ठ विचार करो।
सेवा का अवसर मत खोना, सहज शिष्ट व्यवहार करो ।। ३ ।। भाग्य भरोसे मत बैठो, सदा योग्य पुरुषार्थ करो।
दोष किसी को भी मत देना, सम्यक् भाग्य विचार करो ।।4।। तजो प्रदर्शन आडम्बर अब, नहीं धर्म बदनाम करो।
सच्चा वस्तुस्वरूप समझकर, सत्पथ अंगीकार करो ।।5।। अपनाओ तुम सत्य-अहिंसा, मिथ्या माया मोह तजो।
हो निरपेक्ष जगत् से भाई, अपने में ही मग्न रहो ।। 6।। मन प्रसन्न हो गया। उठा, घर की ओर चल दिया। रास्ते में एक घड़ी की दुकान दिखाई दी, अनायास ही कदम दुकान की ओर बढ़ गये। एक अच्छी सी घड़ी खरीदकर पैक करा ली, उसी में कविता का वह कागज भी रख दिया। उपहार हाथ में लेकर घर की ओर चल दिया। मन के विचारों की गति मेरी गति से कहीं अधिक थी। सोचा घर जाकर सुलभ को यह उपहार दूँगा तो वह प्रसन्न हो गले से लग जाएगा। मैं भी अपने काम की व्यस्तता के चलते उसे डाँटता रहता हूँ जिससे वह मुझसे डरकर दूर-दूर सा रहने लगा है। अचानक एक झटके ने मुझे पुनः सड़क पर ला दिया। कोई मेरे हाथ से थैली छुड़ाकर भाग रहा था, मैं चिल्लाया, उसके पीछे भागा परन्तु तब तक वह ओझल हो चुका था, मैं अवाक् सा खड़ा देखता रह अमर विश्वास]
गया। प्रसन्नता, सपना एक क्षण में टूट गया। मन उदास हो गया धीरे-धीरे घर की ओर बढ़ गया।
घर पहुँचते ही मैंनें सबसे पहले सुलभ के बारे में पूछा। मानसी ने बताया मैनें उसे समझा दिया था और शाम को मंदिर के दर्शन के बाद उसके मित्रों को साथ लेकर मोहल्ले के गरीब बच्चों को फल एवं कपडे वितरण करा दिए थे जिससे उसका मन अच्छा हो गया था। अभी वह अपनी पढ़ाई कर रहा है। मैनें सुलभ के कमरे में झाँककर देखा, वह पढ़ाई में मग्न था, मैं वापस लौट आया। मैनें मानसी को रास्ते की घटना से अवगत कराया। मन दुखी था। बच्चे के लिए कुछ लेकर आया, वह भी चोरी हो गया। चोर पर मन ही मन गुस्सा आ रहा था, अचानक दरवाजे की घण्टी बजी, मैनें दरवाजा खोला, सामने एक अपरिचित व्यक्ति खड़ा था। वह कुछ भयभीत सा था, बोलने की कोशिश कर रहा था परन्तु बोल नहीं पा रहा था, उसके गले से आवाज नहीं निकल पा रही थी। मैनें पूछा कौन हो भाई और क्या चाहते हो? उसने पीछे किए हुए हाथों को मेरी ओर बढ़ा दिया। चौककर-अरे ये तो वही थैली है जो मेरी चोरी चली गई थी परन्तु आप कौन हैं? और ये कहाँ से मिली ? साहब ! क्षमा करें, मैं वही चोर हूँ जो आपके हाथ से थैली छुड़ाकर भागा था।
क्या ? (थैली खोलकर देखा, सामान सुरक्षित था) पर तुम पहले छुड़ाकर भागे और अब वापस करने आये हो, कुछ समझ में [ अमर विश्वास
नहीं आया और तुम्हें हमारे घर का पता किसने दिया। मैं एक ही साँस में सब कुछ कह गया।
क्षमा कीजिए साहब दरअसल मैं एक गरीब, बेरोजगार
व्यक्ति हूँ। कविता - कहानी लेखन का शौक होने के कारण कोई व्यापार-धंधा करने में मन नहीं लगा। जैसे-तैसे घर का खर्च चलता है। आज बच्चे का जन्म दिन था, बच्चा सुबह से उपहार के लिए जिद कर रहा था, आपको उस दुकान पर घड़ी लेते देखा तो अपने पर काबू न रख सका। घर जाकर खोलकर देखा तो उपहार के साथ एक पत्र दिखाई दिया। पढ़ा तो एक अद्भुत कविता सामने थी जो शायद आपने अपने बेटे के लिए लिखी हो। "अपना ईमान नहीं खोना "
पढ़ते-पढ़ते आँखों से पश्चाताप के अश्रु छलक पड़े और निश्चय किया कि ईमान से बढ़कर कुछ नहीं इसलिए बस चल दिया आपको ढूँढने। उसी दुकान पर पहुँचा, दुकान मालिक से ज्ञात हुआ, आप शहर के चुनाव अधिकारी हैं, समीप ही मकान में निवास करते हैं। अब आपके सामने हूँ। मैंनें अपराध किया है, दण्ड स्वीकार्य है। आप जो उचित समझें दण्ड दे सकते हैं। मेरे नयनों से भी अश्रु की दो बूँदें, अपनी सीमा उल्लंघन करने के लिए बढ़ीं परन्तु स्वयं पर काबू रखकर बोला-अपराध तो तुमसे हुआ है, उसका दण्ड भी मिलेगा। वह सकपका गया। मैनें उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा-भाई ! इस संसार में कितने मनुष्य ऐसे हैं जिनके अमर विश्वास]
घर सुबह चूल्हा जल जाए तो शाम का भरोसा नहीं होता। बच्चों को भूखा सोना पड़ता है, परन्तु सब तो चोरी नहीं करने लगते। चोरी तो अपराध है, इससे तुम्हारा बच्चा तुमसे क्या सीखेगा ? तुम्हारे हाथ में कलम का जादू है, कलम की ताकत को पहिचानो। कलम वह
तलवार है जिससे समस्त बुराइयों को नष्ट किया जा सकता है। न्याय-नीति और संतोष जब कलम के साथ मिलते हैं तो धन ऐश्वर्य तो स्वयमेव समीप आ जाते हैं। अपनी इस कलम की धार को व्यर्थ बर्बाद मत करो। समाज में पनप रही बुराइयों को दूर करने के लिए आगे बढ़ो। बच्चों के लिए नैतिकता के प्रेरक बनो। इससे बड़ा उपहार तुम्हारे बच्चों के लिए कुछ नहीं होगा। आपका बहुत-बहुत उपकार है। आपने मेरी आँखें खोल दी अन्यथा मैं एक गलत पथ पर चलकर अपने परिवार को बर्बाद कर देता, आपने मुझे बचा लिया। (दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार कर वापस जाने के लिए मुडता है तभी..) रुकिये अंकल जी। (सुलभ सामने खड़ा है) मैनें आप लोगों की सारी बातें सुन लीं। आज आपके बच्चे का भी जन्म दिन है और मेरा भी। पिताजी ने आपको सत्पथ दिखलाकर और मुझे इतनी सुन्दर कविता लिखकर सबसे अच्छा उपहार दिया है। ये घड़ी आप ले जाकर अपने बेटे को दे दीजिए।
नहीं-नहीं बेटा! यह आपके लिए है। आपके पिताजी ने
आपके लिए खरीदी है। मैं उसे समझा दूँगा और आगे से गलत काम भी नहीं करूँगा। अपना ईमान नहीं डिगने दूँगा।
[ अमर विश्वास
नहीं अंकल जी आप संकोच न करें। पिताजी ! क्या मैं ये घड़ी इन्हें दे सकता हूँ।
हाँ बेटा! ये घड़ी इनके बच्चे के लिए ही है। तुम्हारे लिए मैं दूसरी घड़ी ला दूँगा।
नहीं पिताजी, मुझे घडी की आवश्यकता नहीं। इस
कविता में दी गई सीख ही मेरा उत्तम उपहार है और सुलभ पिताजी की वाँहों में सिमट गया।
- नेक हृदय
गाँव के हाट बाजार में अपनी दुकान पर बैठे सेठ दुर्गादास जी के चेहरे की झुर्रियाँ उनके बुढ़ापे का संकेत अवश्य देने लगी थी फिर भी उनकी बुलंद आवाज और चेहरे का तेज आज भी युवाओं के जोश को मात देने के लिए काफी था।
चोट के कारण एक पैर से जरूर लंगडाने लगे थे परन्तु आवाज की कठोरता से अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाते थे। आवाज जितनी कठोर थी, हृदय उतना ही नरम। नारियल की उपमा उनके लिए अतिशयोक्ति न थी।
हर दिवाली के दिन सबसे पहले मिठाई का टोकरा लेकर गरीबों की वस्ती में जाकर बाँटते, इसके बिना उनकी दीवाली अमर विश्वास]
अंधेरी थी। घर में कैसा भी उत्सव हो, विवाह या पुत्र जन्म का अवसर, गरीब बच्चों को मिठाई के साथ दो-दो आना देने से कभी पीछे नहीं हटे।
हाथ से दान और मन से ईमान उनसे कोई नहीं छीन सकता था। जब से पत्नी का देहान्त हुआ तब से मंदिर के समीप एक कमरे में ही रहते। दिन भर दुकान पर और शाम को मंदिर पर। एक दिन दुकान पर बैठे थे। लड़का केदार बोला- बापू जी ! कल शहर जा रहा हूँ। इस बार किसानों ने पूरा सूद भी अदा नहीं किया है, वकील से बात करके उनकी जमीनों के नोटिस भिजवाता हूँ।
अरे बेटा ! पिछली फसल भी ज्यादा अच्छी कहाँ हुई थी, एक फसल और देख ले। हाँ हाँ। आपको तो बस देना-ही देना आता है, उन्हीं के लिए तो सब कमा के रखा है। जरूरत के समय तो सब पैर पकड़कर रोते हैं, बाद में आँखे फेर लेते हैं। हाँ-हाँ ! तू ठीक ही कहता है, पैसा लेकर देने का नाम ही नहीं लेते। नोटिस पहुँचेगा तब अक्ल ठिकाने आयेगी। कठोर आवाज में बोले ।
केदार बोला-उसमें आपके रामदयाल काका भी शामिल हैं जिन्हें आपने सिर पर चढ़ा रखा है। तीन साल हो गये, अभी तक पूरा ब्याज भी जमा नहीं किया। आपके कारण आज तक कुछ नहीं कहा, फिर आप कहेंगें पूछा तक नहीं।
[ अमर विश्वास
अरे ! इसमें पूछने की क्या बात है ? रुपया लिया है, देना तो पड़ेगा ही। नहीं देगा तो जमीन से जाएगा। तू जा वकील से बात कर केदार के जाने के कुछ देर बाद ही रामदयाल आ गया। सिर पर मोटा साफा, बदन पर पुरानी कमीज, घुटनों तक की धोती और आँखों में बेबसी ।
आओ भाई रामदयाल कैसे हो ?
रामदयाल-सुना है छोटे सेठ नोटिस देने के लिए शहर जा रहे हैं इस फसल तक और रुक जाते तो…!
तो… तो क्या ?
आप उसे जरा कहकर देखते ।
मैं ना कहूँ। मैं किसी के झगड़े में नहीं पड़ता। लेकिन तुम देते क्यों नहीं। धीरे-धीरे तीन साल हो गये।
सेठ ये आप कह रहे हैं, होते तो नहीं देता क्या ?
तो मैं क्या करूँ तू जाने वह जाने। किसी तरह कुछ रुपये दे जा, बात टल जायेगी। रामदयाल ने कुछ कहना चाहा परन्तु मुँह से कुछ न निकला। चुपचाप आँखों से छलकते अश्रुओं को रोकने की विफल चेष्टा करता हुआ चला गया।
रामदयाल के जाते ही सेठ जी विचार मग्न हो गये। 20 वर्ष पहले की घटना उनकी आँखों के सामने तैर गई। जब पूरा गाँव बाढ़ की चपेट में आ गया था तब रामदयाल ही था जिसने अपनी जान जोखिम में डालकर सेठ के इकलौते बेटे केदार की जान बचाई थी। अमर विश्वास]
घटना याद आते ही सेठजी की आँखों से आँसू की दो बूंदे छलक पड़ीं जो उनके प्रपौत्र मनु की आँखों से छिपी न रह सकीं। वह तुरन्त बोला-दादा जी क्या हुआ ? (आँसू पौछकर बच्चे को वहलाने की कोशिश करते हुए) अरे ! पता नहीं सुबह से आँख दर्द कर रही है। तू घर चला जा, अपनी माँ से मेरी सुरमा की डिब्बी ले आ। ठहर जा, मैं ही ले आऊँगा पता नहीं कहाँ रखी होगी ? दुकान बंद कराकर दादा जी अपनी लाठी टेकते हुए घर की ओर चल दिए।
प्रभा, मनु से पूछ रही थी बेटा! तेरे दादा जी कैसे हैं? उनकी तबियत कैसी है ? माँ ! आज पता नहीं दादा जी को क्या हुआ था ? उनकी आँख से पानी भी गिर रहा था ? कह रहे थे कि सुबह से दर्द हो रहा है (प्रभा चिंतित होते हुई) अच्छा ! तुमने उनसे तबियत की नहीं पूछी ? तभी प्रभा बेटी… प्रभा बेटी । प्रभा तुरन्त उठकर बाहर आई। सोचा अवश्य ही बाबूजी का स्वास्थ्य बिगड़ा है। भोजन के अलावा वे किसी तीज-त्यौहार या बीमारी होने पर ही घर आते हैं, अन्यथा नहीं। आज… वह भी इस समय…?
दरवाजा खोलते ही पूछ बैठी- बाबूजी आप इस समय ?
सब खैर तो है ?
अरे ! घबराने की कोई बात नहीं है बेटी। वो क्या है कि..! अच्छा ! मेरी गोलक में कितने रुपये हैं, जरा देख के बता-प्रभा वोली-अभी दो दिन पहले ही तो आपने हजार रुपये मंगाये थे। हाथ खुला रखने से भी कहीं रुपया जुड़ता है क्या ?
[ अमर विश्वास
सेठ जी हँसते हुए बोले-बेटी ! सच है !! हाथ खुला रखने से रुपया जुड़ता नहीं परन्तु बंद रखने से भी तो जंग लग जावे है। धन की तीन गतियाँ होती हैं-दान, भोग, नाश। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जितना बना, उतना दान दिया, अब जो थोड़ा सा बचा है वह किसी के काम आ जावे तो ठीक, नहीं तो धरा ही रह जायेगा। अच्छा बेटी ! ऐसा कर, तेरी सास के बक्से में एक गुलबंद पड़ा होगा, तू उसे ले आ।
परन्तु इस समय आप रुपयों का क्या करेंगें ?
अब तुझ से क्या छिपा है बेटा! एक तू ही तो है जो मेरा हृदय जाने है, वो अपना रामदयाल है, उसने तीन वर्ष पहले केदार से पांच हजार रुपये जमीन के कागजों पर लिए थे। चुका नहीं पाया, फसल भी खराब हो गई। देने को कुछ न है उसके पास । केदार कल शहर जा रहा है, जमीन के नोटिस दिलवाने के लिए।
प्रभा बोली-आगे की फसल तक और इंतजार नहीं किया
जा सकता क्या ?
किया तो जा सकता है, पर कहे कौन ? उसने न माना तो मैं किसी को मुँह दिखाने लायक न रहूँगा। सोचता हूँ क्यों झगड़े में पड़ूँ। केदार का भी मन दुखेगा और रामदयाल भी तो वक्त वे-वक्त हाथ बांधे हाजिर खड़ा रहता है। जब मैं फेरी लगाता था तब यही एक आदमी था जिसने मेरी सहायता की थी। महीनों इसकी झोंपड़ी में बसेरा किया। मैं फेरी लगाने जाऊँ तो केदार का ख्याल वही रखे । अमर विश्वास]
केदार का असली अम्मा-बापू तो वह रामदयाल ही है। केदार की अम्मा तो बाढ़ में ही चल बसी थी।
प्रभा का गला भर आया। रूंधे स्वर में बोली- आपको
कितने रुपये चाहिए ? अभी तो चार हजार से काम चल सकता है। तू तो बक्से में से गुलबन्द ले आ।
'उस गुलबंद में तो सासू माँ के जेवर रखे है- विचार से ही प्रभा कांप उठी। कुछ सोचकर, आप बैठिये, मैं आई…! इस बात का जिक्र किसी से मत करना, मैं तो भावनाओं में बहकर स्वयं की रोक नहीं पाता !
‘कुछ देर बाद’! बाबूजी ! मेरे पास ये 3500/ रु. हैं। सासू माँ की निशानी को बना रहने दीजिए। जब आपकी गोलक में हो जाऐगें तो मैं रख लूँगी। आप चिंता क्यों करते हैं ? यह सब भी तो आप ही का है।
दुर्गाप्रसाद जी हैरानी से कुछ सोचते रहे, आशीर्वाद दिया, मुड़ गये, तभी सहसा उनसे कोई टकरा गया, वह केदार था जो कुछ सोचता हुआ तेजी से आया और बाबूजी को देख नहीं पाया। बाबूजी आप ! इस समय सब ठीक तो है न ?
बाबूजी एकाएक अकड़कर बोले-अरे ! मुझे क्या हुआ है । तुझे ही ढूँढता चला आया इधर ! ले संभाल अपनी संपत । इस बुढ़ापे में इस रामदयाल ने भी जान आफत में डाल दी है। कुछ समझा नहीं बाबूजी, आखिर क्या किया काका ने ? अरे इसमें समझने की क्या [ अमर विश्वास
बात है ? तू नोटिस जारी करवाने जा रहा था ना, सो वह रामदयाल ये साढ़े तीन हजार रुपये हथेली पर रख गया है। कह रहा था छोटे बाबू को दे देना और कहना फसल आने पर बकाया भी देने का प्रयास करूँगा। बहुत कहा, मुझे बीच में न ले, पर तेरे सामने आने की उसकी हिम्मत ही न पड़े। अब भाई गिन लेना। किसी का भरोसा न है। मैं तो चला, भजन का समय हो गया पर बेटा वह आदमी बड़ा नेक है, समय पड़े पर वही काम आवे है। यह कहकर सेठजी अपनी लाठी खट-खट करते हुए चल दिए। जिस भारी मन से आये थे वह बोझ उतर चुका था शायद इसीलिए उनके जाने की गति आने की अपेक्षा बढ़ गई थी।
इधर केदार विस्मित नेत्रों से कभी रुपयों को देखता कभी बाबूजी की बातों का विचार करता। खट-खट की आवाज जितनी धीमी पड़ रही थी, अन्तर का तूफान उतना ही उद्वेलित होता जा रहा था। कदम वापस मुडे, दौड़कर बाबूजी के पास पहुँचा, रुपये चरणों में रखे। हाथ जोड़कर बोला-क्षमा करना बाबू जी ! मैने आज तक आपको पहचानने में भूल की। आँखों से अश्रुधारा बह चली, बाबूजी ने उसे लपककर छाती से लगा लिया बेटा ! रुपया ही सब कुछ नहीं होता। पता नहीं कब-कौन हमारे ऊपर एहसान कर जाये। जिसे हम अपनी सारी धन-सम्पत्ति से भी न उतार सकें। झरोखे से प्रभा भी देख रही थी। इधर बाबूजी ने केदार को गले लगाया उधर प्रभा ने मनु को, आँखों का मोती मनु के कपोलों पर गिरा। मनु अचम्भित सा ममता की गोद में समा गया !! [ अमर विश्वास]
- गुरु दक्षिणा
छुट्टी की घंटी बजते ही समस्त कक्षाओं के छात्र प्रार्थना के लिए विद्यालय प्रांगण में पंक्तिबद्ध हो गये। समस्त अध्यापक गण भी अपने-अपने स्थान पर आ चुके थे। प्रार्थना हुई, कुछ दिशा- निर्देश एवं चिंतन बिन्दु दिए गये। मास्टर ब्रजमोहन जी, जो विद्यालय के वयोवृद्ध अध्यापक हैं उनका मन आज कहीं और ही लग रहा था। वे अपनी कलाई पर बंधी घड़ी को बार-बार निहार रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उन्हें आज कार्य विशेष से घर जाने की जल्दी है। उनके चेहरे पर खुशी मिश्रित व्यग्रता स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी। सभा समाप्त होते ही मास्टर जी ने अपना छाता खोला और तेज कदमों से घर की ओर चल दिए।
आज वे इतनी उतावली (जल्दी) में थे कि रास्ते में अनुभव के घर छाछ पीना भी उन्हें याद न रहा। अनुभव के घर से अभी कुछ कदम ही आगे बढ़े होंगे कि किसी की आवाज कानों में पड़ते ही ठिठककर रुके और पीछे मुड़कर देखा। अनुभव दौड़ता हुआ आया और चरण स्पर्श करते हुए बोला-मास्टर जी ! माँ जी… अरे बेटा ! मैं तो भूल ही गया था और मास्टर जी अनुभव के साथ उसके घर की ओर मुड़ गये।
दरवाजे की आड़ में अनुभव की माँ खड़ी थी। मास्टर जी समीप पहुँचे तो बोली- “पाँए लागू मास्टर जी।"
सुखी रहो बेटी। आज जल्दी में था सो आगे निकल गया। [ अमर विश्वास
अनुभव की माँ-तभी मैं भी विचार कर रही थी कि हमसे ऐसी क्या भूल हो गई जो मास्टर जी बिना रुके सीधे निकल गये। ना… बेटी… ना। ऐसी कोई बात नहीं। तुम्हारे स्वर्गवासी स्वसुर के तो बड़े उपकार हैं हम पर, तुम लोग भी कितना, सम्मान देते हो हमें, वरना, इस गाँव में अब कौन है हमारा। अनुभव की माँ कुर्सी डालते हुए बोली-आले में लोटा रखा है मास्टर जी ! आप हाथ-पैर धोकर बैठिए मैं छाछ लेकर आती हूँ। मास्टर जी ने लोटा लेकर हाथ-पैर धोए, कुल्ला किया और कंधे पर पड़े अंगोछा (तैलिया) से हवा करने लगे, तभी अनुभव की माँ छाछ लेकर आयी और मास्टर जी के सामने रख दी। मास्टर जी अनुभव के सिर पर हाथ फेरते हुये बोले-क्यों रे ! माँ को परेशान तो नहीं करता ? माँ-नहीं मास्टर जी ! आपकी मेहनत और कृपा से ये बहुत समझदार होता जा रहा है।
देख लेना बेटी ! एक दिन ये संस्कार अनुभव को बहुत योग्य आदमी बनायेंगें। इस उम्र में बच्चों में जो संस्कार पड़ जाते हैं वे आगे चलकर उनके चरित्र निर्माण में सहायक होते हैं। बड़े-बड़े पदों पर बैठकर जब वे न्याय-नीति ईमानदारी से अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हैं तो वे और भी बड़े हो जाते हैं। एक अध्यापक होने के नाते बड़ा संतोष होता है कि वे मुझसे कुछ सीख पाये और मैं उन्हें कुछ दे पाया। अनुभव के बापू जगन्नाथ को ही देखो फौज में केप्टन बनकर देश की सेवा कर रहा है। एक अध्यापक को और क्या चाहिए। बेटी ! बस…!
अमर विश्वास]
तभी समय का विचार कर छाछ पीकर बोले-अब मैं चलता
हूँ बेटी ! देर हो रही है और जगन्नाथ का कोई समाचार आया। अनुभव बीच में ही बोल पड़ा- हाँ मास्टर जी ! आज ही पिताजी का पत्र आया है। उन्होने आपको चरण स्पर्श लिखा है, वे अगले हफ्ते गाँव आने वाले हैं।
चलो अच्छा है। बहुत दिनों से नहीं आया था और तू भी खूब पढ़कर अपने पिता की तरह अच्छा इंसान बनना, देश, धर्म की सेवा करना। अच्छा ! अपनी माँ का ध्यान रखना। जी मास्टर जी। तेज धूप और लू के कारण मास्टर जी घर तक आते-आते
हाँफने लगे। छाता बंद करते हुए सांकल खटखटाई। कंधे से अंगोछा उतारकर चेहरे और गर्दन का पसीना पौंछा। तब तक दरवाजा खुल गया। जूते उतारे, पैर धोये और बरामदा पार कर सीधे अन्दर वाले कमरे में चारपाई पर धम्म से जाकर बैठ गये। इस गर्मी ने तो अधमरा कर दिया है। तब तक अम्मा जी एक ग्लास पानी ले आयीं। मास्टरजी-आज एक खुशखबरी सुनानी है। खुशखबरी ! कैसी खुशखबरी ? खुशखबरी नाम सुनकर अम्मा जी ऐसी हैरानी से देखने लगीं जैसे कोई अनहोनी हो गई हो। उनसे रहा न गया, बोलीं-क्या खुशखबर लाये हो ?
बताता हूँ - । जरा दम तो लेने दो। मास्टर जी ने कमरे की छत पर लगा कई साल पुराना पंखा खोल दिया, जो खचर-खचर की आवाज़ करता हुआ चल पड़ा।
[ अमर विश्वास
अम्मा जी की बैचेनी भी बढ़ती जा रही थी और मास्टर जी भी बताने को बेताब थे। अंततः कुछ सोचते हुए बोले- “मैं बिजली दफ्तर का बाबू बनने के बजाय अध्यापक क्यों बना ? रुपया पैसा ही सब कुछ नहीं है जिन्दगी में। अध्यापक को राष्ट्र का निर्माता कहा जाता है। बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं। कच्ची मिट्टी को रूप देना और फिर तपाकर सोना बना देना ही अध्यापक का काम है। अम्मा जी चुपचाप सुन रहीं थीं, बोलीं-इसमें खुशखबरी कौन सी है ?
अरे… सुनो तो सही। अपनी जमीन अब मिली समझो।
अम्मा जी का चेहरा एकदम खिल उठा। क्या कहा, कैसे - ? अपने विद्यालय में गणित के मास्टर हैं न मधुकर जी। वे कल ही शहर से लौटे हैं। उन्होंने बताया कि राजस्व विभाग (जमीन के महकमे ) में रामचरण नाम का एक बड़ा अधिकारी आया है। मधुकर जी उससे मिलकर भी आये हैं। वह रामचरन यहीं मुझसे पढ़ा है। कौन रामचरन ?
अरे… वही। नटखट, शैतान। जिसके पिता विद्याराम जी हमारे पास लेकर आये थे और कहा था-मास्टर जी ! मैं इसकी रोज-रोज की शिकायतों से परेशान हो गया हूँ अब आपको ही इसे ठीक करना है। प्रधानाध्यापक साहब ने उसे विद्यालय से निकाल दिया था। मेरे बहुत जोर देने पर (दाखिला) प्रवेश हो पाया था। सब मुझे ताने दिया करते थे क्यों उस बुद्ध के पीछे पड़े हो, यह पढ़ अमर विश्वास]
नहीं सकता। बहुत परिश्रम करना पड़ा है परन्तु आज इस पद पर पहुँचकर उसने सबका मुँह बंद कर दिया और मेरी लाज रख ली। आज मैं बहुत खुश हूँ।
ज्ञान की हीनाधिकता भले हो परन्तु ज्ञान तो सभी में है और योग्य परिश्रम (उपाय) करने पर सफलता चरण चूमती ही है। कुछ सोचते हुए-ये वही तो नहीं है जिसे आप दोपहर के बाद घर पर पढ़ाते थे और शाम को उसके बापू लेने आते थे । हाँ… वही। उस समय उसे सही रास्ता मिल गया। डूबते को तिनके का सहारा है।
चौधरी मेरे पुरखों की जमीन हड़पकर बैठ गया है। इंसाफ मांगने गया तो मुझे भला-बुरा कहकर घर से निकाल दिया। मैं कल ही रामचरन के पास जाकर उससे अपनी बात कहता हूँ।
भगवान् की भक्ति के प्रसाद से लगता है हमारे अच्छे दिन लौटने वाले हैं अन्यथा रिटायरमेंट के बाद हम कहाँ भटकते ? और मास्टर जी की आँखे भर आई ।
अम्मा जी भी रुंधे कंठ से बोली-अपना खून यहाँ होता तो क्या मजाल थी कि कोई हमें परेशान कर सके, लेकिन उसने तो कभी सुध तक नहीं ली कि हम जिंदा भी हैं या नहीं। मास्टर जी को गुस्सा आ गया-तुमने फिर उसका नाम लिया। मैनें कितनी बार कहा- मेरे सामने उसकी चर्चा मत किया करो। अब रोना-धोना बंद करो ।
[ अमर विश्वास]
भोजन करने के बाद मास्टर जी चारपाई पर ही लेट गये, तभी उन्हें अपने बेटे की याद आने लगी। उन्होंने भी अपने बेटे से बहुत आशायें लगा रखी थीं। सोचा था, वह भी पढ़कर
अध्यापक, बड़ा प्रोफेसर बनेगा और ज्ञान दान के कार्य को आगे बढ़ायेगा परन्तु वह तो बी.ए. करते ही बैंक में बाबू हो गया और फिर गाँव से ऐसा गया कि सबसे नाता ही तोड़ बैठा। तीज- त्यौहार पर भी उसे घर परिवार की याद नहीं आती। खैर भला हो उसका। मैं तो यही चाहता हूँ कि खुश रहे।
मैंनें तो सबर कर लिया, पर माँ तो माँ है। नौ माह कोख में रखा, पाला-पोसा, बड़ा किया, कुछ करने लायक हुआ तो किनारा कर गया।
अगले दिन दोपहर का समय मास्टर जी एक बड़े से दफ्तर के चार मंजिला भवन के सामने खड़े थे। तभी पास से एक पुलिस की जीप निकली। थोड़ी ही दूर जाकर रुकी और वापस घूम आई। जीप ठीक उनके पास आकर रुक गई। मास्टर जी हैरान हुए। अगले ही पल जीप में से एक रौबीला अफसर उतरकर
सामने आ खड़ा हुआ। पूछा-मास्टर जी, पहचाना मुझे ? कहकर मास्टर जी के चरणों में झुक गया।
मास्टर जी उसके चेहरे को पढ़ने के लिए अपने दिमाग पर जोर डालने लगे, फिर धीरे से बोले- तुम जमना प्रसाद के बेटे वेद प्रकाश तो नहीं…?
अमर विश्वास]
जी मास्टर जी मैं वेद प्रकाश ही हूँ, आपका छात्र और नगर का एस.पी.।
आप कैसे हैं? गाँव में सब कुशल-मंगल है ? मास्टर जी गर्व और खुशी से फूले न समाये। बोले- वहाँ सब ठीक है। तू बता…।
मास्टर जी आपका आशीर्वाद है। मैं अब चलता हूँ। ड्यूटी पर जाना है। आप सब से मिलने जल्दी आऊँगा।
ठीक है बेटा ! तू जा। वेद प्रकाश ने मास्टर जी से आशीर्वाद लिया और चला गया। मास्टर जी की छाती गर्व से चौड़ी हो गई। कुछ कदम चलकर मास्टर जी दफ्तर के मुख्य दरवाजे के सामने आये, अंगोछा से चेहरा पौंछा और सीढ़ियाँ चढ़कर पहली मंजिल पर पहुँच गये।
दरवाजे पर बैठे चपरासी से पूछा- क्यों भाई ! रामचरन साहब कहाँ बैठते हैं? चपरासी ने कहा- बड़े साहब से आप सीधा नहीं मिल सकते। उनके (पी.ए.) बाबू के पास जाना होगा। वो, सामने वाले कमरे में हैं।
आगे बढ़े, देखा एक कुर्सी पर एक बाबू बैठा है, मास्टर जी पहले भी दो-चार बार इन बाबू के पास आ चुके थे परन्तु बाबू उन्हें चार-छह चक्कर लगवाता रहा, तभी बगल के कमरे के दरवाजे पर रामचरन के नाम की तख्ती लगी दिखाई दी। मास्टर जी की सारी [ अमर विश्वास
थकान दूर हो गई एवं खुशी छा गई। मास्टर जी किसी से पूछे बिना ही दरवाजा धकेलकर अन्दर चले गए ।
सामने बड़ी सी मेज के उस पार रामचरन किन्ही कागजों को उलट-पलट कर देख रहे थे। अचानक दरवाजा खुलने का आवाज सुनकर सिर उठाकर देखा और जैसे कुछ याद करने लगा–। अगले ही पल रामचरन अपनी कुर्सी (सीट) से उठकर आया और मास्टर जी के चरण स्पर्श किए। मास्टर जी आप ?
हाँ. रे.. मैं। पहचान लिया। मुझे विश्वास था तुम मुझे भूल नहीं सकते। ये आप क्या कह रहे हैं मास्टर जी आपके बहुत उपकार हैं हम पर ! बैठिए आप। स्वयं अपनी कुर्सी पर बैठ गया, घंटी बजाई चपरासी उपस्थित हुआ।
पहले ठंडा पानी लाओ, फिर कुछ मिठाई नमकीन आदि।
गाँव से मेरे गुरुजी आए हैं। चपरासी बाहर गया तो मास्टर जी बोले-क्यों तकलीफ करते हो बेटा ! मिठाई की क्या जरूरत थी ? अपनी सींची कोंपल को भरा-पूरा पेड़ बना देख मास्टर जी को परम सुख मिल रहा था। सोचने लगे “सच में, शिक्षा दान से महान् और कोई काम नहीं।” गुरु और शिष्य के बीच घर, परिवार, गाँव, विद्यालय आदि संबंधी कितनी ही बातें होती रहीं। पश्चात् मास्टर जी ने अपनी जमीन के बारे में सारी बात राम चरण के सामने कह सुनाई। राम चरण ने घंटी बजाकर बाबू को बुलाया और मास्टर जी की जमीन संबंधी फाइल लाने को कहा, फिर मास्टर जी से बोले-आप चिन्ता छोड़ दें मास्टर जी ! अब ये मेरी चिंता है…। अमर विश्वास]
मास्टर जी यह देख-सुनकर फूले नहीं समा रहे थे। रामचरन कितना अच्छा इंसान बन गया है। मास्टर जी ने रामचरन के स्वर्गवासी पिता को याद करते हुए कहा- मेरा कार्य आज पूरा हुआ। तेरा बेटा एक उत्तम मानव है। बचपन के साथ ही इसकी बुरी आदतें भी छूट गई। तब तक बाबू फाइल ले आया। रामचरन ने पूरी फाइल देखी, एक दूसरे बाबू को बुलाया। उन्होने आते ही एक रजिस्टर खोलकर रामचरन के सामने रख दिया। उसके बाद बाबू और रामचरन अंग्रेजी में कुछ देर बातें करते रहे। फिर बाबू रजिस्टर एवं अन्य कागजात लेकर चला गया।
रामचरन-मास्टर जी ! आपका काम हुआ ही समझिए
बस बेटा ! अब तो तुम्हारा ही सहारा है, मैं तो इस दफ्तर के चक्कर काट-काट कर थक-हार चुका हूँ, अब तो तुम्हीं को करना है सब ।
आपने अभी देखा न मैंने समस्त कागजात, फाइल आदि
देख-समझ लिए हैं, बाबू से भी जरूरी बात कर ली है। बाबू का कहना है काम थोड़ा टेढ़ा है, दफ्तर में कई लोगों की मदद से होगा और कोई होता तो अलग बात थी। पर आप तो घर के आदमी हैं इसलिए… देखिए, समझने की कोशिश कीजिए.. आप बस दस हजार का इन्तजाम कर दीजिए। देखिए मुझे गलत मत समझिए ! मास्टर जी को यह सुनकर लगा जैसे उन्हें लकवा मार गया है। वह हाँ या ना कुछ भी नहीं कह सके। आँखों में आँसू छलछला [ अमर विश्वास
आए। सब कुछ धुंधला दिखने लगा। उन्हें अपने सपनों और विश्वास का महल टूट-फूट कर बिखरता हुआ दिखाई दे रहा था। क्या हुआ मास्टर जी ? कुछ नहीं… कुछ नहीं… ! मास्टर जी बस इतना ही कह सके ।
अगले ही पल मास्टर जी उठ खड़े हुए और दरवाजे की ओर मुड़े। दरवाजा खोलकर कुछ पल के लिए रुके और एक गहरा निःश्वास भरते हुए मंद स्वर में बोले-बेटा ! ये तू क्या से क्या बन गया ? लालच के इस राक्षस को अपने अन्दर क्यों जन्म लेने दिया ? अच्छी शिक्षा तो आदमी को अच्छा इंसान बनाने के लिए दी जाती है। क्या मैनें शिक्षा (ज्ञान) देकर कोई गलत काम किया। मैनें तो सोचा था तू इंसान बन गया परन्तु मैं गलत निकला बेटा ! तेरी खूब उन्नति हो पर एक अच्छा इन्सान बनकर । इतना कहकर वे कमरे से बाहर निकल आये और रामचरन उन्हें देखता रह गया।
गाँव आकर बिना किसी से कुछ कहे अपनी खाट पर लेट
गये क्योंकि आज उनके समस्त अरमान धूमिल हो गये थे। अम्मा जी ने कारण पूछा तो बोले-कुसंस्कार और भ्रष्ट अधिकारी सब कुछ स्वाह कर देते हैं।
मास्टर जी की रात्रि खुली आँखों में ही व्यतीत हो गई। प्रातः किसी गाड़ी के रुकने की आवाज सुनकर हड़बड़ाकर उठे। देखा तो घर के सामने एक गाड़ी आकर रुकी और उससे उतरकर एक
व्यक्ति उनके घर की ओर ही चला आ रहा है।
अमर विश्वास]
रामचरन तुम ? यहाँ, इतने सबेरे ? मास्टर जी के पैरों में गिरकर। मुझे क्षमा कर दें गुरु जी ! मैनें आपकी दी शिक्षा को कलंकित किया है, उसका दुरुपयोग किया है। रात भर आपके द्वारा कहे शब्द मेरे कानों में गूंजते रहे। मुझे बहुत पश्चाताप हुआ। अब मैं अच्छा इंसान बनना चाहता हूँ। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज से अपने कर्त्तव्य का पूर्ण- ईमानदारी एवं नैतिकता से निर्वहन करूँगा। मास्टर जी उसे उठाते हुए कोई बात नहीं बेटा ! सुबह का भूला शाम को वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। मुझे आज मेरी गुरु दक्षिणा मिल गई। मास्टर जी ! ये आपकी फाइल, आप यहाँ हस्ताक्षर कर दीजिए, आपका काम हो जाएगा।
बेटा ! एक बात हमेशा याद रखना। धन से भी ऊँची होती है इंसानियत । इसे कभी मत भूलना और पैसा ही सब कुछ नहीं है। मास्टर जी ने आलमारी में से एक स्टीकर निकालकर दिया, जिस पर लिखा था-
“भ्रष्टाचार शिष्टाचार नहीं, अक्षम्य अपराध है।”
तभी अम्मा हाथ में मिठाई और पानी लेकर आई
और बोली-अरे बेटा ! कितने दिनों बाद घर आया है, मुँह तो मीठा कर ले ।
अम्मा ! मिठाई ही नहीं, मैं तो भोजन भी यहीं करूँगा। सारा माहौल खुशी में बदल गया।
- देहरी
[ अमर विश्वास
विद्यालय की छुट्टी होते ही अश्विन अपने घर की ओर
चल दिया। अपनी धुन में मस्त अश्विन लापरवाह हो चला जा रहा था, अचानक ही किसी ने उसे जोर से धक्का दिया। वह दूर जा गिरा, उसकी समझ में कुछ न आया। जब वह संभला तो सड़क पर बहुत भीड़ एकत्रित हो चुकी थी और उसे यह भासित हो चुका था कि किसी ने उसे एक बड़ी दुर्घटना का शिकार होने से बचा लिया है परन्तु वह है कौन ? इस प्रश्न ने उसे भागने की ताकत दी, वह दौड़कर, भीड़ को चीरता हुआ अन्दर जा पहुँचा। देखा एक व्यक्ति जिसे कुछ लोग रघु काका कहकर संबोधित कर रहे थे, सड़क पर लहुलुहान अवस्था में पड़ा है। उसके कपड़े रक्त में रंग चुके थे। कुछ लोग उन्हें उठाकर चिकित्सालय ले गये। जानकारी करने पर ज्ञात हुआ कि रघु अपने ठेले पर प्रतिदिन की भाँति फल बेच रहा था तभी एक बच्चे के पीछे तीव्र गति से वाहन को आता हुआ देखकर वह आवाज देता हुआ भागा और बच्चे को धक्का दे दिया परन्तु स्वयं उस वाहन की चपेट में आ गया। अश्विन घबरा गया वह शीघ्र ही घर पहुँचा, पिताजी को समस्त घटनाक्रम से अवगत कराया एवं चिकित्सालय चलकर रघु को देखने के लिए मचल उठा।
अमर विश्वास]
चिकित्सालय जाकर देखा, दुर्घटना में रघु का एक हाथ अब कार्य नहीं कर रहा एवं पैर में भी फैक्चर होने से प्लास्टर चढ़ा हुआ है। अपना परिचय देते हुए अश्विन के पिता बोले-मेरे बच्चे की लापरवाही के कारण यह दुर्घटना घटित हुई है, इसकी ओर से मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ, मैं आपका अपराधी हूँ, मुझे एवं मेरे बेटे को क्षमादान दें। रघु बोला-इसमें क्षमा की क्या बात ? यह तो मेरा कर्त्तव्य था, आखिर इन्सान ही इन्सान के काम आता है। यदि मैं देखकर भी या अपनी सोचकर यह कदम न उठाता तो क्या मेरी इन्सानियत न मर जाती ? और आपके बच्चे को सकुशल देखकर ही मेरी पीड़ा कम हो गई। रघु के इलाज का सारा खर्च भी अश्विन के पिता ने उठाया। अश्विन अब प्रतिदिन स्कूल की छुट्टी के बाद रघु को देखने जाता। धीरे-धीरे दोनों को परस्पर एक-दूसरे के प्रति लगाव बढ़ने लगा। अश्विन रघु को रघु काका कहकर पुकारता। एक दिन अश्विन जब अपने पिता के साथ रघु काका को
देखने आया तो रघु की आँखों में आँसू देखकर पूछ बैठा-काका ! अब तो आप स्वस्थ हो चले हैं, कुछ ही दिनों में यहाँ से छुट्टी मिल जाएगी। आप अपने घर जा सकते हैं फिर आपकी आँखों में आंसू किसलिए ? पहले तो रघु टालता रहा परन्तु अश्विन की जिद ने उन्हें बोलने के लिए मजबूर कर दिया। बोले-बेटा! कैसा घर [ अमर विश्वास
किसका घर ? मेरे पास कोई घर नहीं। एक ठेला है, वही मेरा घर, वही मेरी दुकान है। तुम्हारे जैसा ही मेरा भी एक बेटा है, उसकी माँ बचपन में ही उसे अकेला छोडकर चल बसी । अभी मोहल्ले की ही एक काकी के पास बना रहता है। इतने दिनों से कोई काम न करने के कारण जो जमा पूजा थी वह भी अब समाप्त हो चुका है। मैं हाथ-पैरों से अपाहिज हो चुका हूँ, मैं अब अधिक काम करने लायक नहीं रहा। इस बच्चे का क्या होगा ? यही सोच-सोच कर आँखें भर आती है।
रघु काका की बात सुनकर अश्विन व उसके पिताजी भी
अपने अश्रुओं को न रोक सके। अश्विन ने रघु काका को अपने घर ले चलने के लिए अपने पिता से अनुरोध किया। एक अपरिचित एवं निर्धन व्यक्ति को अपने घर ले चलने के लिए पहले तो वे असमंजस में रहे फिर सोचा इसने मेरे बच्चे का जीवन बचाया है कुछ समय के लिए मैं आश्रय दे दूँ, जब यह पूर्ण स्वस्थ हो जायेंगें तो स्वतः ही चले जायेगें। अश्विन की जिद एवं रघु काका के प्रति उसके लगाव को देखते हुए उन्होंने रघु से घर चलने के लिए कहा। रघु बोला- एक अपरिचित को अपने घर में शरण देना कहीं आपके पारिवारिक कलह का कारण न बन जाए, अतः आप मुझे मेरे हाल पर ही छोड़ दीजिए। आपका अपनत्व भरा व्यवहार एवं इस बच्चे का प्यार ही मुझे सांत्वना देने के लिए बहुत है।
अमर विश्वास]
सेठजी-इसकी चिंता तुम मत करो और परिचय-अपरिचय
क्या है ? हम सभी तो एक इंसान हैं। परिचित-अपरिचित की संकुचित सीमायें तो हम बना लेते हैं। आप विकल्प न करें, आपको कोई तकलीफ नहीं होगी।
'इष्ट की संगति में दुख के क्षण भी शीघ्रता से कट जाते हैं। हॉस्पिटल से छुट्टी हुई तो अश्विन, रघु काका और उनके बेटे को घर ले आया। उसके पिता ने बाहर ही एक कमरा दे दिया, जिसका आवागमन घर से अलग था एवं समस्त व्यवस्थायें जुटा दीं। कुछ ही दिनों में रघु काका अपने कुशल व्यवहार से अश्विन के परिवार के सदस्यों से हिल-मिल गये। स्वास्थ्य भी अनुकूल हो चला था, अतः सामर्थ्य अनुसार रघुकाका सेठ जी के घर के कार्यों को करने लगे। रघु काका अश्विन का पूरा ख्याल रखते, उसे स्कूल ले जाते, अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुनाते, लोक व्यवहार एवं नैतिक कर्त्तव्यों से परिचित कराते । अश्विन को एक बार पुनः अपने दादा जी मिल गये थे। धीरे-धीरे परिवार के सभी सदस्य रघु की व्यवहारिकता, ईमानदारी, कार्य कुशलता, विनय आदि गुणों की प्रशंसा करने लगे थे। सो उचित ही है क्योंकि गुणों की सर्वत्र प्रशंसा होती है और दोषों की निंदा। सेठ जी का मुनीम रघुवंशी काम- काज के संबंध में अक्सर ही आया करता था। वह कुशल होने के [ अमर विश्वास
साथ-साथ सेठ जी का विश्वास पात्र भी था। मुनीम को रघु का सेठ जी के घर में आना अच्छा न लगा। सच ही है 'प्रीति समान गुणवालों का अनुसरण करती है, असमान गुण वालों का
नहीं।’ मुनीम को रघु फूटी आँख न सुहाता था। वह सदैव रघु के कार्यों में कभी निकालकर सेठ जी के कान भरा करता। जिससे कभी-कभी सेठजी भी मुनीम की बातों पर विश्वास करके रघु को डाँट देते परन्तु अश्विन के कारण अधिक न कह पाते। रघु भी अपनी विनय-सरलता से सेठ जी का मन जीतने में कोई कसर नहीं छोड़ता। जिस कारण मुनीम का मनोरथ पूर्ण नहीं हो पाता था। अश्विन के पिता दो-तीन दिन से परेशान नजर आ रहे थे। रघु काका ने देखा तो पूछा-सेठ जी आप कुछ अस्वस्थ से नजर आ रहे हैं, कोई चिन्ता या परेशानियाँ आपके चेहरे की प्रसन्नता को प्रगट होने में अवरुद्ध कर रही हैं क्या कारण है? यदि आप मुझे इस योग्य समझें तो कृपया बतायें। परेशानियाँ कह देने से मन का भार भी कम होता है एवं समाधान की संभावना प्रबल होती है। नहीं ! रघु काका ऐसी कोई विशेष बात नहीं है। वह क्या है कि अश्विन की परीक्षायें चल रही हैं, मुझे अचानक ही किसी आवश्यक कार्य से सपरिवार अन्यत्र जाना है। सोच रहा था यदि अश्विन को लेकर जाता हूँ तो वह परीक्षा से वंचित हो जाएगा और अमर विश्वास]
अकेला छोड़कर कैसे जाएं ? इसका निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ। अश्विन अचानक बोल पड़ा- पिताजी आप निश्चिंत होकर जाइए, रघु काका के रहते हुए मुझे कोई परेशानी नहीं होगी। रघु काका- सेठ जी ! यदि आप बुरा न मानें, आप को मेरे ऊपर विश्वास है तो आप कोई विकल्प न करें, मुझे कोई परेशानी नहीं होगी। रघु काका के विनत स्वभाव के कारण वे इंकार नहीं सके और अश्विन को रघु काका के पास छोड़कर चल दिए। जाते समय मुनीम से भी घर की देख रेख के लिए बोलकर चले गये। उनके जाने के बाद रघु ने पूरे घर का निरीक्षण किया, दरवाजे खिड़कियाँ बन्द किए, घर के कार्यों से निवृत हो अश्विन के कमरे में आ गया। कुछ देर बाद मुनीम आया, बोला-सेठ जी घर की सुरक्षा हेतु कहकर गये हैं सो आज रात यहाँ हॉल में विश्राम कर लेता हूँ। रघु ने हॉल में मुनीम के सोने का इंतजाम कर दिया और स्वयं अश्विन के कमरे में लेट गया। दूसरे दिन सेठ जी आये तो देखा-कमरे का सामान इधर-उधर बिखरा पड़ा है। जिसका उन्हें डर था वही हुआ। घर में कोहराम मच गया तुरन्त रघु को बुलाया। सब कुछ देखने पर ज्ञात हुआ कि गहनों बाला डिब्बा गायब है। मुनीम को भी बुलाया गया। खोजबीन करने पर वह डिब्बा रघु के कमरे से प्राप्त हुआ। डिब्बा देखते ही रघु पसीने से तर हो गया। सेठ [ अमर विश्वास
जी के पैरों में गिरकर गिडगिडाने लगा। क्षमा याचना करने लगा। सेठ जी मैंने चोरी नहीं की, मुझे नहीं मालूम यह डिब्बा मेरे कमरे में कैसे आया ? मैं तो रात भर मुन्ना के कमरे में ही था, आप मुन्ना से पूछ लीजिए। मेरी बात का यकीन कीजिए साहब, मैं चोर नहीं हूँ। सेठ जी-मैने तुम पर विश्वास किया, तुम्हारे विश्वास पर पूरा घर छोड़ दिया। अपने घर में शरण दी और तुमने मेरे साथ ही विश्वासघात किया। मुनीम बोला-बड़ा ही ढोंगी बना फिरता था। सेठ जी एक दिन के लिए क्या गये, तुमने अपना रंग दिखा दिया। इसे तुरन्त पुलिस के हवाले कर देना चाहिए तब इसकी अकल ठिकाने आयेगी। मैं तो साहब पहले ही कहता था परन्तु इसके कपट व्यवहार के आगे मेरी एक न चली परन्तु आज सब पोल खुल गई। मुनीम ने उसे दो-चार चाँटे भी लगा दिए। तब तक अश्विन भी आ चुका था। उसकी जिद से सबने रघु को छोड़ तो दिया परन्तु बहुत तिरस्कार करके घर से निकाल भी दिया। बेबस, वेसहारा पिता-पुत्र फुटपाथ पर आकर अपने कर्मों को कोसते हुए रोने लगे। रघु अपमान और लज्जा से तिलमिला उठा। वह सोचने लगा-ऐसा कलंक लगाकर जीने से तो मर जाना ही उचित है। अब मैं कहाँ जाऊँ ? किसे मुहँ दिखाऊँ ? अपमान का घाव, आत्मघात के लिए प्रेरित करने लगा परन्तु मेरे मर जाने पर इस बच्चे का क्या होगा ? अमर विश्वास]
सब इसे चोर का लड़का कहकर ताने मारेंगे। जीवन भर यह चोर का बच्चा कहलाएगा। आत्मघात से मेरी भी कुगति होगी और बच्चे का भविष्य भी बर्बाद होगा। नहीं, नहीं मैं आत्मघात नहीं कर सकता और आत्मघात कोई उपाय भी नहीं। मुझे अपनी निर्दोषता सिद्ध करनी ही होगी, तभी मेरे बच्चे को न्याय मिलेगा परन्तु मैं क्या करूँ ? सेठ जी कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं। सच है इसमें सेठ जी का क्या दोष ? कितने विश्वास से वे मुझे घर और अश्विन की जिम्मेदारी सौंप कर गये थे और मैं उनका विश्वास कायम न रख सका। मैं सो कैसे गया ? अतः मैं दण्ड का ही पात्र हूँ। मन में ये विचार सागर में भूचाल के समान उथल-पुथल मचाये हुए थे तभी सामने जिनमंदिर की दीवाल पर उसकी नजर पड़ी, जिस पर मोटे- मोटे अक्षरों में लिखा था- “दुःख से बचने का उपाय आत्मघात नहीं, आत्म साधना है।”
आत्मघात तो समझ आया पर आत्म साधना क्या होती है ?
यह समझ से परे था। समीप पहुँचा, पुनः पुनः पढ़ने लगा। एक सज्जन को मंदिर से निकलते देखा तो उसका अर्थ पूछ बैठा-सज्जन ने ऊपर से नीचे तक एक नजर डाली और बोले-भाई ! इस संसार में सभी प्राणी दुखी हैं, प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी उलझन से दुखी है और सुख के लिए प्रयत्नशील रहता है, यहाँ तक कि सुख [ अमर विश्वास
प्राप्ति के लिए आत्मघात तक का विकल्प
सोचते हैं परन्तु आत्मघात
तो पाप है। आत्मघात से कभी कोई सुखी नहीं हो सकता। पाप नहीं पापों से धुलते। आत्म साधना अर्थात् आत्मा की प्राप्ति का उपाय, यही सुख का उपाय है और ज्ञानाभ्यास इसकी कुंजी है। यही जीवन का मंत्र है। डूबते को तिनके का सहारा है। बात कुछ-कुछ दिमाग में विश्राम पाने लगी। सोचा मरते तो सभी हैं, कलंक लगाकर मरना तो और भी शर्मनाक है। अब अमरता का मंत्र हाथ लग गया है। पुरुषार्थ से सिद्धि भी संभव है। उन सज्जन के सामने अपनी कहानी बताई। कहानी सुनकर सज्जन का मन द्रवित हुआ और भावना सुनकर प्रफुल्लित। बोले मेरा नाम विनीत है, आपकी भावनाओं की मैं अनुमोदना करता हूँ। समीप ही मेरा घर है मैं अकेला ही रहता हूँ; आप भी हमारे साथ रह सकते हैं। रघु की आँखें भी द्रवित हो उठी। सर्वप्रथम हर्ष पूर्वक मंदिर जी में प्रवेश किया। भगवत् दर्शन से हर्ष द्विगुणित हो गया। वहीं संकल्प किया-जहाँ से मुझे जीवन जीने की ज्योति मिली, उस देहरी को कभी नहीं छोडूंगा। कुछ प्रयत्न करके छोटा-मोटा काम तलाश किया। बच्चे को विनीत जी के घर छोड़ा और स्वयं मंदिर की देहरी को ही छत व विछौना बनाकर भगवद् भक्ति और ज्ञानाभ्यास में अमर विश्वास]
अपना जीवन जोड़ दिया। विनीत और रघु जल्द ही घुल-मिल गए, मानो पुराने परिचित पुनः मिल गये हों।
एक दिन मंदिर की देहरी पर दोनों आपस में चर्चा कर रहे थे कि अचानक कुछ फुसफुसाहट की आवाजों ने उनकी चर्चा में अवरोध उत्पन्न कर दिया। उन्होंने इधर-उधर देखा परन्तु कुछ समझ न आया परन्तु रघु को कुछ गडबड़ होने का एहसास हो रहा था। विनीत ने उठकर देखा, बगल की सुनसान गली, सांझ का अंधेरा, तीन परछाईयाँ आपस में कुछ बातें कर रहे हैं। दोनों धीरे- धीरे सावधानी पूर्वक छिपकर उनकी बातें सुनने का प्रयास करने लगे। अंधेरे के कारण किसी का चेहरा स्पष्ट नजर नहीं आ रहा था परन्तु आवाज कुछ जानी- पहिचानी सी प्रतीत हुई। दिमाग पर जोर देने पर रघु बोला-यह आवाज तो सेठ जी के मुनीम की है। वह यहाँ, इस समय क्या कर रहा है ? और साथ में कौन है ? एकाग्रता बढ़ाकर जब कोशिश की तो ज्ञात हुआ कि मुनीम अपने साथियों के साथ सेठ के बेटे अश्विन के मुँह पर पट्टी बांधकर कसकर पकड़े खड़ा था। अश्विन हाथ पैर मारकर बंधन से छूटने का असफल प्रयास कर रहा था। दूसरा व्यक्ति उसको थप्पड़ मार कर शांत कर देता था। मुनीम अपने साथियों से अश्विन के बदले कुछ लेन-देन [ अमर विश्वास
का सौदा कर रहा था। जिसमें आपसी मतभेद हो रहा था।
रघु ने विनीत को बताया- यह सेठ जी का मुनीम है, शायद अश्विन का अपहरण कर लाया है। मुझे इसे बचाना ही होगा ? विनीत बोला-रघु ! हम अकेले और निहत्थे क्या करेंगें ? चलो यहाँ से।
रघु-नहीं भाई ! आज मेरे सामने झूठा कलंक धोने का
अवसर है, मैं प्राण देकर भी अश्विन को इनसे बचाऊँगा। विनीत-परन्तु सेठ ने तो तुम्हारा अपमान करा था।
रघु-उन्होंने मेरे साथ जो बुरा किया उसकी अपेक्षा उन्होंने मेरे साथ जो अच्छा किया। मुझे अपने घर में आश्रय दिया, उसे मैं कैसे भूल जाऊँ ? यदि मैं इसकी रक्षा न करूँगा तब तो और बड़ा कलंक लग जाएगा। सारी मानवता ही मर जाएगी। बुराई करने वालों के साथ बुरा तो सब ही करते हैं, भलाई करने में अपना भी भला है। दूसरा बुराई करता है तो करें हम अच्छाई क्यों छोड़ें। विनीत-भाई ! तुम और तुम्हारी भावना दोनों ही महान् हैं। अब देर मत करो।
रघु-तुम कुछ लोगों को बुलाकर लाओ और हाँ अश्विन के पिताजी को भी खबर कर देना।
रघु ने रस्सी का एक फंदा बनाया व एक लकड़ी का टुकड़ा अमर विश्वास]
हाथ में लिया। फंदे को पूरी ताकत से उन लोगों की ओर उछाल दिया जिससे एक व्यक्ति उसमें फंस गया। अचानक हुए इस हमले से सभी सकपका गए। कुछ सोच पाते उससे पहले ही डंडे से जोर से वार किया। दूसरे व्यक्ति ने भी अपना चाकू निकालकर रघु पर प्रहार किया, रघु के हाथ में घाव हो गया, रघु दर्द से कराह उठा, तब तक मुनीम भी रघु पर हावी हो गया। घाव हो जाने पर भी रघु ने रस्सी का फंदा ढीला नहीं होने दिया। तब तक विनीत कुछ लोगों को लेकर आ पहुँचा। भीड़ देखकर मुनीम तो भाग गया परन्तु दोनों व्यक्ति दबोच लिए गए। तभी अश्विन के पिताजी भी पुलिस लेकर आ पहुँचे। समस्त घटना जानने पर सेठ जी को अपने किए का बहुत पछतावा हुआ, वे आत्मग्लानि से भर उठे। रुँधे स्वर से बोले- मुझे क्षमा कर दो रघु भैया। तुम निर्दोष थे और मैंने तुम्हारे ऊपर झूठा दोषारोपण किया। वह चोरी मुनीम ने ही की थी और तुम्हें फंसाने के लिए गहनों का डिब्बा तुम्हारे कमरे में छिपा दिया। जब मुझे ज्ञात हुआ तो मैनें उसे काम से निकाल दिया। उसी का बदला लेने के लिए उसने यह षड़यंत्र रचा है। तुमने एक बार फिर से मेरे बच्चे की जान बचाई है, मैं तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूल सकता। रघु के घाव से बहुत खून बह चुका था, सभी उसे अस्पताल ले जाने को उद्यत हुए तो रघु ने हाथ जोड़कर कहा-अब मेरा अंत समय समीप आ गया है, मुझे मंदिर की देहरी पर ले चलो। अब [ अमर विश्वास
मुझे अस्पताल नहीं जाना। सभी उसे मंदिर की देहरी पर ले आये। रघु ने देहरी पर माथा टेका और कहा-मेरी आयु पूर्ण होने जा रही है। अंत समय मुझे भगवान् की देहरी और भगवान् का सानिध्य प्राप्त हो गया, अब मुझे अन्य कुछ नहीं चाहिए। मेरे बच्चे को ऐसी संस्था में कर देना जहाँ वह कुसंग से बचकर शिक्षा और संस्कार प्राप्त कर सके। जिनचरणों का सेवक बन कर शासन की सेवा करके अपना जीवन संभाले। सेठ जी-रघु ऐसा मत कहो। तुम्हें कुछ नहीं होगा। तुम ठीक हो जाओगे और अपने मुन्ना की चिन्ता मत करो, आज से मेरे एक नहीं, दो बेटे हैं। मुन्ना अब हमारा बेटा है, जो अश्विन के लिए है, वह सब मुन्ना के लिए भी है। तुम भी जल्दी से अच्छे हो जाओ फिर हम सब एक साथ अपने घर रहेंगे। रघु-सेठ जी! आपका हृदय बहुत उदार है परन्तु अब
भगवान् की देहरी पकड़ने के बाद कोई दूसरी देहरी चढ़ने की भावना नहीं है। विनीत भाई मुझे वह भजन सुना दो।
“अब हम अमर भये न मरेंगें…”
भजन सुनते-सुनते, मंदिर की देहरी पर माथा रख शांत परिणामों से देह का परित्याग कर अपने पथ पर बढ़ चले । सभी के नेत्र विनम्र श्रद्धांजलि से अश्रुपूरित हो गए। अमर विश्वास]
- अवज्ञा का परिणाम
रात्रि का अंधकार ऊषा की किरण के आगमन की सूचना
से भयभीत हो पलायन के लिए तत्पर हो उठा है। पक्षियों का कलरव भी मानो उस अंधकार को दूर तक खदेड़ देने के लिए ही स्फुटित हुआ हो।
दिवा सम्राट की सुनहरी किरणों के वसुन्धरा को स्पर्शित करते ही पक्षीवृन्द सपरिवार नीलगगन के तले विचरण करने को उड़ चले। मानो दशों दिशाओं पर अधिकार ही कर लिया हो। दिन भर अन्न-पान की खोज एवं मस्ती से थकित होकर संध्या की गौधूलि बेला में वे पक्षी अस्ताचल के सूर्य के साथ पुनः अपनी- अपनी कोटरों की ओर वापिस चल दिए।
उन्हीं में एक युवा पक्षी (शुभमन) जो बचपन में ही किसी तूफान में अपने माता-पिता के हाथों से अपनी कोमल अंगुली छुड़ा बैठा था और अब एक बुजुर्ग, अनुभवी पक्षी वरदराज के साथ जीवन के रंगों को पहिचानने की कोशिश कर रहा था। उन्होंने ही उसका लालन-पालन किया, संसार की अनेक रीति-नीतियों से अवगत कराकर योग्य बनाया। अपने अनुभवों से परिचित कराया, शिक्षा-संस्कार दिए और संकट से बचने का मार्ग एवं गुरुमंत्र सुझाया। युवा पक्षी शुभमन अपने बुजुर्ग वरदराज का बहुत आदर- सम्मान करता था उनके लिए सब कुछ समर्पित था परन्तु भावुकता एवं मन की चपलता कभी-कभी वरदराज की बातों से विपरीत [ अमर विश्वास
सोचने को प्रेरित करने लगती जिस कारण खेद-खिन्नता सामने आकर खड़ी हो जाती।
वात्सल्य, आकर्षण का प्रमुख कारण है। वरदराज द्वारा वात्सल्य पूर्वक समझाने पर उसे अपनी गलती का एहसास होता और शुभमन क्षमा याचना पूर्वक अपने में सुधार का प्रयत्न करता। वात्सल्य पूर्वक दिया गया दण्ड घड़े की भांति मजबूती एवं शीतलता प्रदान करता है। शुभमन भी वरदाराज के मीठे-कठोर वचनों से निखरने की कोशिश करता।
आज शुभमन एक लंबी उड़ान से वापस लौट रहा था, समय अधिक हो चला था। सूर्य बादलों की ओट में छिपने की कोशिश कर रहा था। निशाचर पक्षी अपने घरों से निकल पड़े थे। शुभमन को भी थकान महसूस होने लगी, घर अभी दूर था, सोचा तनिक विश्राम कर लिया जाए और बैठ गया वृक्ष की एक शाखा पर। थकान के कारण शीघ्र ही निद्रा के आगोश में जा पहुँचा। आँख खुली तो देखा चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा है। वह छटपटाने लगा, अब क्या करें, कहाँ जायें ? मन बेचैन हो उठा, सोचा प्रभात बेला शीघ्र ही आगमन का संदेश देगी। थक हार कर उसी वृक्ष की शाखा पर बैठ गया।
जिस वृक्ष पर शुभमन बैठा था वह वृक्ष किसी मकान के आँगन में लगा था। मकान मालिक की नजर छटपटाते पक्षी शुभमन पर पड़ी। दयालु हृदयी मालिक ने विचारा-शायद कोई पक्षी राह भटकने से अपने घर नहीं जा सका है।
अमर विश्वास]
अपने आँगन में दाना-पानी रखकर वह चारपाई पर लेट
गया और आँख लग गई। पंखों के फड़फडाने की आवाज ने भोर होने की सूचना दी। उसने देखा एक पक्षी एक-एक दाना चुगने की कोशिश कर रहा है। उसे यह दृश्य बहुत अच्छा लग रहा था, वह बिना आहट किए देखता रहा। फिर धीरे-धीरे पक्षी के पास गया और बड़े प्यार से उसे सहलाने लगा। अचानक इस नवीन स्पर्श को पाकर शुभमन भय से काँप उठा, उसने उड़ने की कोशिश की परन्तु अपरिचित मनुष्य के नेत्रों में बसे प्यार वात्सल्य ने उसे उडने नहीं दिया। चेहरा भावों का दर्पण होता है। चेहरे की भाषा अन्तर के राक्षस-देवता को सामने लाकर खड़ा कर देती है। कुछ समय में ही उसे यह स्पर्श अच्छा लगने लगा। अब तो शुभमन उसके साथ खेलने लगा, कभी उसके कंधे पर बैठता, कभी हाथों पर। दिन चढ़ने पर युवक अपने काम पर चला गया और पक्षी आकाश में। शाम होते ही शुभमन पुनः उसी वृक्ष पर आ बैठा। युवक भी वृक्ष की ओर ही देख रहा था, युवक ने दाना-पानी डाला पक्षी कुछ देर ठहरकर अपने बसेरे की ओर उड़ चला। दोनों में दिन-दिन घनिष्टता बढ़ती जा रही थी। शुभमन ने अपनी समस्त बातें वरदराज को बताईं। उन्होंने सावधान किया, समझाया। तुम्हारी और उसकी जाति भिन्न-भिन्न है, तुम्हारी मित्रता असंभव है। तुम एक पक्षी हो और वह मनुष्य, दूर रहने में ही भलाई है। आज तुम्हें मिलने में जो प्रसन्नता हो रही है, कुछ ही समय में वह [ अमर विश्वास
शोक में बदल जायेगी। हम तो खुले गगन में विचरने वाले स्वतंत्र पक्षी हैं, आज यहाँ तो कल वहाँ। हमारा क्या ठिकाना। परतंत्रता दुखदायक है, स्वतंत्रता सुखरूप है; इसलिए ज्यादा मित्रता बढ़ाना उचित नहीं। अपनी सीमाओं, मर्यादाओं के बाहर कदम रखोगे तो पश्चाताप ही होगा। पश्चाताप की अग्नि से बचने के लिए विवेक का आश्रय लेना श्रेयस्कर है।
सकते ?
क्या हम उनके आँगन में स्थित वृक्ष पर बसेरा नहीं कर देखो बेटा! पुरखों के पसीने से सिंचित इस बसेरा को छोड़कर अन्यत्र जाना बुद्धिमानी भी नहीं और सरल भी नहीं। फिर मैं तो यहाँ से जाने में असमर्थ हूँ क्योंकि इस शरीर में इतनी शक्ति नहीं। शुभमन के चेहरे पर युवामन की भावुकता और यौवन का अतिरेक देख बुजुर्गमन अधिक कुछ न कह सका, पर भविष्य की कल्पना ने उदासी के रूप में मन के कोने में जन्म अवश्य ले लिया। बोले-तुम अपना भला-बुरा स्वयं समझते हो, कोई भी नवीन कदम बढ़ाने से पूर्व बहुत सोच विचारकर, विवेक से निर्णय लेना। मुझसे जो अपेक्षा रखते हो, मुझे बताना, योग्य-अयोग्य का विचार कर तुम्हारी खुशी का प्रयत्न करूँगा। जब भी मन हो अथवा विचार शून्य हो जाओ तो चले आना। यह बसेरा सदा तुम्हारे लिए है…। शुभमन का युवा चंचल मन उस युवक के लाड़-प्यार में
बंधा था, जो उससे मुक्त होने में असमर्थ महसूस कर रहा था। युवा अमर विश्वास]
मन नवीन आकर्षण में जिस गति से दौड़ता है उसी गति में पश्चाताप उसका पीछा करता है परन्तु योग्य समय निकल जाने के पश्चात् मात्र नयननीर ही शेष रह जाते हैं। आज उसका मन अन्तर्द्वन्द के झूले में झूल रहा था। एक ओर जीवन निर्माता, हर परिस्थिति से मुकाबला करने का बल देने वाले, असीम वात्सल्य के धनी और एक ओर नवीन मित्र जिसने कुछ ही समय में उसे अपनत्व व स्नेह की डोर में बांध लिया था। अब क्या करे ? किसे छोड़ किसके पास जाये। बड़ी मुश्किल है। दोनों में से किसी को छोड़ना भी नहीं चाहता और दोनों का साथ भी संभव नहीं क्योंकि मनुष्य और पक्षी असमान जातीय हैं, मनुष्य पक्षियों के साथ नहीं रह सकता और पक्षी, मनुष्य के साथ रहकर खुले आकाश की ऊँचाई को नहीं नाप सकता। अर्थात् निर्मुक्त उड़ान नहीं भर सकता। मुश्किल घड़ी में अनुभवियों का अनुभव योग्य मार्गदर्शक होता है, काश यह बात शुभमन समझ पाता।
समय बीता, क्षणिक सुखाभास में मोह का बंधन दृढ़ होता गया। अब शुभमन दाना भी वहीं चुगता, विश्राम भी वहीं करता, धीरे-धीरे उसी आँगन में कैद होता चला गया। बंधन तो बंधन है परन्तु अविवेक एवं स्नेह की प्रगाढ़ता में बंधन सुखरूप प्रतिभासित होने लगा। समय चल निकला अपनी गति की ओर। युवक मित्र अपनी पारिवारिक व्यस्तताओं में उलझता गया। शुभमन के प्रति ध्यान देना कम हो गया, मात्र दाना-पानी के लिए समय निकाल पाता। कुछ समय बाद वह भी नहीं रहा।
[ अमर विश्वास
शुभमन मित्र के इस उपेक्षा पूर्ण व्यवहार से घबराने लगा, कभी-कभी शुभमन का मन मित्र को देखने के लिए अधीर हो उठता। शुभमन अपने को अकेला महसूस करने लगा।
आकाश में उड़ते पक्षियों को देखकर वहाँ से उड़ जाने का मन करता परन्तु मोह की बेड़ी नाजुक होने पर भी अत्यंत कठोर प्रतीत होती है जो उसे उड़ने से रोक देती थी।
एक दिन वरदराज उधर से गुजरा। शुभमन का उदास चेहरा देखकर आवाज दी। दोनों मिले, नेत्रों की भाषा में शब्दों के लिए स्थान शेष न था। नयननीर ने अपनी गति बढ़ा दी। शुभमन अपने युग निर्माता के चरणों में गिर पड़ा। पश्चाताप के अश्रुओं से चरण प्रक्षालन का महोत्सव हुआ। वरदराज ने समस्त आलोचनाओं से परे हो अपने वरदहस्त के कोमल स्पर्श से सांत्वना दी और वात्सल्य पूर्वक गले लगाया। साथ ले जाने को उद्यत हुआ परन्तु… । तब तक बहुत देर हो चुकी थी। योग्य समय की अवहेलना पुरुषार्थ में भी बाधक हो जाती है। इतने समय से पिंजरे में कैद रहने, आकाश में न उड़ने के कारण ऊँचे गगन में दूर तक उड़ने की शक्ति क्षीण हो गई थी। उसने उड़ने की बहुत कोशिश की परन्तु थोड़ा उड़कर पुनः नीचे आ जाता। इसी कोशिश में अचानक कुछ ऊँचाई से गिर पड़ा और सब कुछ अंत हो गया।
वरदराज के पास मात्र एक आह… भरने के अतिरिक्त कुछ शेष न था।
बुजुर्गों की अवज्ञा और अपनी जिद में सब कुछ नष्ट हो गया। अमर विश्वास]
- अनाथ
खुले आसमान के तले अपने घर के आँगन में चारपाई पर लेटा सुजान आसमान की ओर निहार रहा था। आसमान एकदम साफ था, न बादल ही थे, न तारे टिमटिमा रहेथे। ऐसे सूने आकाश में सुजान की नजर मानो कुछ खोजती हुई बैचेन थी। नींद उसकी आँखों को स्पर्शित करने में भयभीत हुई दूर खड़ी सोच रही थी कि कब अवसर मिले और मैं सुजान के नेत्रों में प्रवेश पा सकूँ । वह कभी करवट बदलता, कभी आकाश को निहारने
लगता। रह-रहकर पिताजी की छवि सन्मुख आकर उसे
कचोटती-बेटा ! श्याम, तुमसे छोटा है, उसे अपने बेटे की तरह समझना, कभी उसे अपने से दूर मत होने देना। तेरे एक नहीं दो बेटे हैं, एक मोहन दूसरा श्याम उसके लिए तू ही माता-पिता है। कभी भूल-चूक भी हो जाए तो अपने बेटे की तरह क्षमा कर देना। उसे इतनी बड़ी सजा मत देना कि वह स्वयं को अनाथ महसूस करने लगे। पिताजी की बातें मन मस्तिष्क में कलरव कर ही रही थी कि दूर खड़ी निद्रा को पीछे धकेलती हुई भागीरथी आगे बढ़ी और सुजान के नयन द्वार से कपोलों तक पहुँच गई। सुजान बैचेन हो उठा। वह उठकर बैठ गया और हाथों से भागीरथी के प्रवाह को रोकने की कोशिश करता हुआ पुनः विचारों के उपवन में जा पहुँचा। आज एक छोटे से जमीन के टुकडे के लिए हम दोनों
अलग-अलग हो गये। इस जमीन के टुकड़े के कारण कचहरी में आमने-सामने खड़े होकर विरोधियों जैसा व्यवहार करते हैं। एक [ अमर विश्वास
दूसरे से गले मिलना तो दूर नजरें मिलाने में संकोच होने लगा है। क्या सोचता होगा वह मेरे बारे में…? अरे रे !
कैसा मेरा भ्रात प्रेम ? धिक्कार है मुझे । क्या जमीन मेरे लिए भाई से भी बड़ी हो गई। उसने जमीन मांग भी ली तो क्या हुआ? यादि मैंने इन छोटी-छोटी बातों के कारण ही आपसी प्रेम-व्यवहार, अपना धर्म-कर्म छोड़ दिया तो मैं किस बात का बड़ा हुआ। समाज में इतना नाम-सम्मान कमाया, वह एक छोटी सी बात के लिए धूमिल हो जाए तो कैसा बड़प्पन ? बड़े तो त्याग से होते हैं। बड़ों को तो चाहिए कि छोटों की गलतियों को भी क्षमा करें, हो सके तो उन्हें सज्ञान दें, वात्सल्य दें। इसी में बड़प्पन है। अन्यथा बड़े हुए तो क्या हुए ?
पिताजी के पास पन्द्रह बीघा जमीन थी जिसमें से सात- सात बीघा हम दोनों ने ले ली। बची एक बीघा के लिए क्या झगड़ना ? जमीन तो मिट्टी का टुकड़ा है, एक दिन इसी माटी में समा जाना है। संतोषी सदा सुखी होता है। लालच के कारण मेरा जीवन नरक सा बन गया है। धिक्कार है ऐसी लालची वृत्ति को जिसके लिए भाई-भाई आपस में लड़ें। ये चापलूसों की संगति का ही फल है जिनके बहकावे में आकर, पुत्र समान भाई से विद्रोहकर मैं उस जमीन पर अपना अधिकार जमाने के लिए कोर्ट-कचहरी तक पहुँच गया। सच ही कहा है-ऐसा कौन सा दोष है जो कुसंग से उत्पन्न नहीं होता। मैंने उसे पढ़ाया-लिखाया, नौकरी से लगाया, ये तो मेरा कर्त्तव्य था। क्या मैं अपने पुत्र मोहन को भी अपने पैरों पर खड़ा करने का हक माँगूगा। मैंने श्याम के लिए यह सब किया तो
अमर विश्वास]
क्या एहसान किया ? उसके बदले एक बीघा जमीन हड़पकर क्या कभी उसके सामने खड़ा हो सकूँगा ? कभी उसे अपने सीने से लगा सकूँगा ? कभी नहीं। कल ही वकील से कहकर केस को खत्म करूँगा और श्याम को जमीन के कागजात सौंप दूँगा, तभी मुझे चैन आयेगा। तब तक आँखों से झरने वाली भागीरथी का निर्मल नीर मन उपवन की समस्त कालिमा धोकर नवीन अंकुरण की तैयारी के लिए सिंचन कर चुका था। अवसर पाते ही निद्रा ने भागीरथी पर अधिकार करके सुजान को अपने आगोश में ले लिया।
उधर श्याम के घर में भी कलह अपनी प्रिय सखी
मोहिनी के साथ तांडव नृत्य कर रही थी। श्याम की पत्नी मोहिनी बोली- देखो जी ! वकील से कहकर कोई ऐसा चक्कर चलाओ कि वह जमीन हमारे हाथ आ जाये। बड़े भाई साहब तो उसे पूरा ही हड़प जाना चाहते हैं।
श्याम (खीजकर)-क्या तुम भी एक ही जिद पर अड़ी हो।
तुम्हें पता है कि कचहरी के चक्कर काटते-काटते पैरों में छाले पड़ गये। कितना रुपया वकीलों और बाबुओं को बाँटते-बाँटते बरबाद हो गया। आखिर उनका क्या जाता है? उन्हें तो मुफ्त में रुपये मिल रहे हैं, परेशान तो हम हो रहे हैं। रोटी-पानी सब छोड़कर समय- बेसमय, सर्दी, गर्मी, बरसात जब देखो उनके चक्कर काटते रहो। यदि एक बीघा जमीन बड़े भैया ने ले भी ली तो क्या हो गया ? सात बीघा तो हमें दी है। आखिर वे बड़े भाई हैं। उन्होंने हमें पाल-पोस कर बड़ा किया, पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़े होने [ अमर विश्वास
लायक बनाया, यह सब उन्हीं की तो देन है और हमने उन्हें क्या दिया ? उनकी अनुमति बिना तुमसे विवाह किया, छोटी सी जमीन के लिए उनके मन को सन्ताप दिया। एक जमीन के टुकडे के लिए उनकी सारी त्याग-तपस्या भूल गये। माँ का साया तो बचपन में ही दुर्देव ने छीन लिया था। पिताजी के स्वर्गारोहण के बाद बड़े भाई ही थे जिन्होंने माँ का प्यार और पिता का कर्त्तव्य दोनों मेरे ऊपर उड़ेल दिया। मेरे प्रेम में किसी प्रकार की कमी न आये, कोई तीसरा हकदार न बने इसके लिए मोहन के भाई-बहन को भी इस
दुनियाँ में लाने से इंकार कर दिया। बड़े भाई के इस निर्णय को माँ समान भाभी ने भी सहजता से स्वीकार कर अपनी ममता मोहन और मेरे लिए संजोकर रख ली। आज वे मेरे बारे में क्या सोचते होंगे ? उन्होने मुझसे क्या-क्या अपेक्षायें नहीं रखीं होंगी ? आज जब उनकी सेवा का समय आया तब हम उनसे
मुँह मोड़कर उन्हे त्रास दें, उनसे कचहरी के चक्कर कटवायें। अब मुझसे यह सब और न होगा।
तो क्या एक बीघा जमीन तुम यूँ ही छोड़ दोगे ?
जमीन कोई भाई से बढ़कर नहीं है मोहिनी, उनके लिए
एक बीघा क्या मैं सात बीघा भी छोड़ दूँ तो कम है। सुजान के नयनों में बसी भागीरथी, गंगा रूप में श्याम के नेत्रों तक आ पहुँची थी। उन्होंने तो मुकद्द्मा न लड़ने को बहुत समझाया था परन्तु तुम्हारी जिद और तुम्हारे घरवालों के बहकावे में आकर मैं उनके खिलाफ हो गया परन्तु अब सोचता हूँ कि उनके पैर पकड़कर क्षमा अमर विश्वास]
माँग लूँ और कह दूँ कि जो हुआ उसके लिए मैं आपका अपराधी हूँ, आप जो चाहें दण्ड दें परन्तु अपनी छत्र-छाया से वंचित करके मुझे अनाथ न बनाएँ। मुझे पता है उनका हृदय विशाल है, वे मुझे अवश्य क्षमा करेंगें।
मोहिनी-यदि उन्होने क्षमा न किया तो ? (अब तक मोहिनी भी श्याम के हृदय की व्याकुलता को पढ़ चुकी थी।)
ऐसा नहीं हो सकता। मुझे विश्वास है जब हमारा हृदय
पवित्र है तो उनके हृदय में भी करुणा का स्रोत उमड़े बिना नहीं रहेगा। मेरे नयनपथ से बहने वाली गंगा का पानी उनके हृदय उपवन को नम किए बिना न रह सकेगा। पिताजी कहा करते थे बेटा श्याम ! बड़े भैया का हमेशा मान-सम्मान रखना। मेरी तरह उनकी भी सेवा करना। उनके स्वाभिमान को कभी ठेस न पहुँचाना और कहते थे बेटा! “जिस घर में बुजुर्गों का, बड़ों का, गुरुजनों का सम्मान नहीं होता उस घर के समस्त पुण्य क्षीण हो जाते हैं।” यही कारण है आज हमारी क्या दशा हो गई है ? परन्तु अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। " जभी जाग जाओ तभी है सबेरा… । कल प्रातः ही भैया से क्षमा याचना करके मुकदमा
खारिज कराता हूँ। एक जमीन का टुकड़ा इतना शक्तिशाली नहीं हो सकता जो दो भाइयों के प्रेम, वात्सल्य और विश्वास के बीच दरारें पैदा कर सके ।
प्रातः दैनिक कर्त्तव्यों से निवृत्त हो दोनों मंदिर पहुँचे तो मंदिर की दहलीज पर ही दोनों की भेंट हो गई।
[ अमर विश्वास
एक पल के लिए दोनों की नजरों में झिझक थी, आँख
मिलाकर बात करने में असमर्थता महसूस कर रहे थे। परन्तु जब हृदय मिल चुके थे तब शब्दों की भाषा की क्या आवश्यकता ? हृदय की पवित्रता ने शब्दों को बाहर आने से रोक दिया, दोनों के गले रुध गये, हाथ स्वयमेव जुड गये, नयन नीर ने श्रावण मास के आगमन का समाचार देते हुए विपरीत विचारों की कालिमा को धो डाला। श्याम ने सुजान के पैर पकड़ लिए, सुजान ने उसे गले से लगा लिया। दोनों की तृप्ति का मूल्यांकन अकल्पनीय था। भैया मुझे क्षमा कर दो। आप सारी जमीन ले लो, पर अपने से दूर मत करो, मैं अनाथ हो जाऊँगा।
सुजान-छोटे ! गलती मेरी ही थी, जो मैं लोगों के बहकावे में आ गया। मैं इतनी जमीन का क्या करूँगा, वह तो तेरी ही है और वह जमीन किस काम की जो एक बच्चे को अपने काका के प्यार से दूर खींच ले जाए। एक माँ को अपने बेटे पर ममता लुटाने से वंचित कर दे। नहीं चाहिए ऐसी जमीन, तू घर चल, मुरझाई बगिया बसंत का इंतजार कर रही है। दोनों ने मंदिर में भक्ति पूर्वक दर्शन किए। एक निर्णय लिया-तीन बीघा जमीन में पिताजी के नाम से एक विद्यालय और एक अनाथालय खोला जाए। आज उस भागीरथी
का जाल अपनी पवित्रता सिद्ध कर चुका था।
अमर विश्वास]
- डाकिया
आप एक ऐसी स्त्री की कल्पना कीजिए, जो गरीबी के
सबब आँसू बहाया करती है, पति की अनुपस्थिति के कारण दिल मसोस कर जिन्दगी बिताती है, और आधी दर्जन बच्चों के मारे घड़ी भर चैन नहीं लेने पाती। इसके बाद भी जो कुछ रहता है, उसे उसका स्वास्थ्य पूरा करता है-कभी जुकाम, कभी बुखार, कभी कुछ और कभी कुछ ।
तो समझ लीजिये कि वह रूपा है। उसका पति अहमदाबाद
के किसी ‘मिल’ में नौकर है। तीस दिन, हाँ! पूरे तीस दिन बाद उसे पन्द्रह रुपये मिलते हैं, जिसमें दस रुपये का वह ‘मनि-आर्डर’ कर देता है। बचते हैं चार रुपये चौदह आने ! - अगर खुश किस्मती से कोई ‘फाइन’ न हो जाए तब ! वे बाकी तीस दिन तक पेट की ज्वाला बुझाने के काम आते हैं।
और इधर-छः बच्चे और उनकी माँ-रूपा, प्रतीक्षा की गोद में बैठकर तीस दिन काट पाते हैं। सैकड़ों अरमान मनि-आर्डर आने तक मन में कैद रहते हैं लेकिन आते ही किधर उड़ जाते हैं, पता नहीं। आखिर खर्च भी तो है, हल्के पूरे सात प्राणियों का पर रूपा… हाँ, रूपा उन दस रुपयों में पूरा एक महीना किस तरह काटती है, वह कौन जाने ?- किसे पर्वाह, जो उसके जीवन यापन पर नजर डाले । गाँव के एक कोने में उसका घर है। घर कहो या झोंपड़ी, जो कुछ है, वही है। सामने टूटा-सा छप्पर, फिर गिरती हुई मिट्टी की [ अमर विश्वास
जरा लम्बी-सी दहलीज। इसके बाद ऊबड़-खाबड़-सा चौक
और एक कोठा, जिसका पटाव ऐसा, जैसे अब गिरा, अब गिरा ! बरसात होती है तो घर में पाँव रखने भर को सूखी जगह नहीं रहती। बच्चों का घर और बेहद कीच, यह दोनों बातें उसे और भी घृणास्पद बना देती हैं। चौक में दीवारों की लगास से कुछ सब्जी हो पड़ी है, जो बजाय सुन्दरता बढ़ाने के-शायद कीड़ा-मकोड़ा न हो- - भय का उत्पादन करती है। रूपा का मन भय से भर जाता है, जब उसके बच्चे घास-पात की ओर खेलने लगते हैं। पर करे क्या ? - लाचारी है- - ! औरत का दिल इतना करता चला जा रहा है, वह क्या थोड़ा है ? और उस पर भी इस भरे-पूरे गाँव में कोई उसका हितू नहीं, दयालु नहीं।
(एक महीने बाद)-रात का वक्त है, मेघ बरस चुका है
लेकिन थोड़ी फुहारें अब शेष हैं। प्रकृतिस्थली अन्धकार की चादर में मुँह छिपाए पड़ी समीर की चंचल प्रवृत्ति अपने कार्य में व्यस्त है। घन-गर्जना भयानक आतंक कर रही है, दामिनी की अस्थिर ज्योति को उदभ्रान्त बना रही है।
मगर कहाँ…?
वहाँ, जहाँ पर अभागे प्राणी सोने के लिये जगह नहीं पा बैठे-बैठे रात बिता रहे हैं। कभी रोते हुए आकाश की ओर देखते हैं और कभी अपनी दशा की ओर ।
अमर विश्वास]
वे काले बादल कहीं उनसे स्पर्धा तो नहीं कर रहे…? गुदड़ों में लुके-छिपे बच्चे इधर-उधर लुढ़क रहे हैं-कुछ सोये, जागते से। बड़ा लड़का-‘मीना’, जिसकी आयु आठ नौ साल की होगी, मगर दुर्बल शरीर, सात आठ वर्ष से अधिक का समझने नहीं देता-रूपा के समीप, सर्दी के मारे ठिठुरता, छाती में घौंटू छिपाए बैठा है।
रूपा की दोनों आँखें पानी बरसा रही हैं। वह सोच रही- महीना हो गया, मगर मनि-आर्डर आज भी नहीं आया, नौ तरीख हो गई। क्या बात हुई ? पिछले महीने तो पाँचवीं को मिल गया था । छः, सात, आठ, नौ, चार दिन हो गये, जरूर कोई न कोई वजह हुई- नहीं, वे भला मनि-आर्डर न भेजते… ? कहीं बीमार तो नहीं हो गये-रिपोर्ट में…?
और दुखद, अज्ञान, भय ने उसे तड़पा दिया परन्तु-तुरन्त ही विचार मुड़ा ‘किसी नई नवेली के जाल में तो नहीं पड़ गये ? नया शहर है, क्या मुश्किल है ? तिस पर ठहरा मर्दों का मन, फिक्र किसे कि गाँव में बाल-बच्चे भूखे नंगे…’
ईर्ष्या की एक हल्की लहर उसके मुँह पर दौड़ गई ! स्त्री की शंकित मनोवृत्ति कुछ पनपती, अगर कुछ कारण पाती ! या स्थिति ठीक होती।
सामने बैठा था, मीना जाड़े के मारे सिकुड़ा हुआ ! फिर विचारों को फिरते क्या देर लगती !
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 1882.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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