अमर विश्वास — जैन स्वाध्याय सामग्री | Amar Vishwas

अमर विश्वास

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अमर विश्वास

अमर विश्वास

(कहानी संग्रह)

अपनी विकृत सोच को छोड़ें।

(1) माता-पिता, गुरुजनों का सम्मान, सेवा अवश्य करें।
(2) मात्र धन के लोभ वश विदेशों में न रहें। स्वदेश की और लौटने का मन बनायें।
(3) अपने कार्य, व्यापार में ईमानदारी रखें।
(4) शहरों के विलासिता पूर्ण, दूषित वातावरण से गाँव के स्वच्छ वातावरण में लौटें।
(5) गाँव को स्वच्छ, स्वाधीन और समग्र, सामान्य सुविधाओं से युक्त बनाने में जुट जाएँ।
(6) मादक द्रव्यों के सेवन एवं नशा से दूर रहें।
(7) सच्चे अर्थों में शिक्षित बनें।
(8) सात्विक आहार, विचार बनाए और मैत्री भावना को गंगा बहाएँ।
(9) स्वयं का व्यसन, नियंत्रण व प्रशस्त रखें।
(10) सम्पदा का वात्सल्य, धैर्य और विवेक पूर्ण स्थाई समाधान करें।
(11) किसी भी प्रसंग में उन्मोचन न हो।
(12) किसी भी प्रसंग में उन्मोचन न हो।

  • द. रवीन्द्र जी ‘आलम’

संकलन-
अनिल जैन, भिण्ड

प्रकाशकीय

कहानी साहित्य की सरसता विशेष है। यह एक ऐसा दर्पण है, जिसमें व्यक्ति और समाज के परम्परा सम्मत, क्रिया विधियों, उनके सुख-दुख के क्षणों को यथार्थ रूप में देखा जा सकता है। मनुष्य हृदय को छू जाती है और पाठकों को मंत्र मुग्ध कर देती है।

सुदूर परिपाटी पर ही आभूषण शोभा देते हैं। नीति शास्त्र में धर्म पहले है, जीवन में नैतिकता नहीं होती तो धर्म की सुरक्षा कैसे संभव है? आज आत्मा से जीवन जीना है। भोगवाद, कंप्यूटर, इंटरनेट से मुक्त रहना ही श्रेय है।

समग्रता प्रेरक मानवीय संवेदना को बल प्रदान कर सरसता व नैतिकता से ओत प्रोत कहानी संकलन प्रस्तुत है।

‘अमर विश्वास’ संकलन को भावनात्मक एवं विस्मय अताग को अंगीकार किया और अपने सभी सोपान के लिये उच्च पुरुषार्थ को 1000 तीनों लोकों से सभी तत्वों को, उनकी संवेदना सभी के हाथों में बाँध दी है। इस कार्यवाह तक एक भी प्राणी प्रेम से नहीं जा सका। अतः तीन माह में ही तीन नवीन कहानियों के भाव पूर्ण प्रकाशन करता आपको हृदय गोष्ठी का परिचायक है।

मित्रता के साथ रहकर भोग मोक्ष की विकास को ही लेखक के क्रम को संयोजित है। सभी संप्रदायियों के हृदय में आभारी है। नेक इंसान रहे। अपनी अपनी ज्ञान और आचरण निर्माण का संप्रदाय में कदम बढ़े, ऐसी भावना के साथ।
श्री रवीन्द्रनाथ ‘आलम’ (भिण्ड) म.प्र.

विशेष सूचना

प्रकाशन : 2,000 प्रतियाँ जनवरी 2023
द्वितीय संस्करण : 3,000 प्रतियाँ 22 अप्रैल 2023
(अध्ययन शोध एवं के गहन मनन व प्रकाशन)

सहयोगी :

  1. श्री परमानंद रस्त, कोलकाता
  2. श्री परमानंद रस्त, परमानंद रस्त महिला दिल्ली
  3. श्री अनिल जैन, भिण्ड
  4. श्री अनिल जैन, भिण्ड
  5. श्री अनिल जैन, भिण्ड
  6. श्री अनिल जैन, भिण्ड
  7. श्री अनिल जैन, भिण्ड
  8. श्री अनिल जैन, भिण्ड
  9. श्री अनिल जैन, भिण्ड
  10. श्री अनिल जैन, भिण्ड
  11. श्री अनिल जैन, भिण्ड
  12. श्री अनिल जैन, भिण्ड

अमर विश्वास

Editor: Anil Jain, Bhind
Price: 30.00

श्री रवीन्द्रनाथ ‘आलम’

(अध्ययन शोध एवं के गहन मनन व प्रकाशन)
(अध्ययन शोध एवं के गहन मनन व प्रकाशन)
मो. 0982625580

आवरण : 30/- रुपये

विषय सूची

क्र. नाम लेखक पृष्ठ
1. अन्य विचार अज्ञात 05
2. पुत्र का मान अज्ञात 14
3. गर्व अज्ञात 20
4. आकृति अज्ञात 23
5. उपदेश अज्ञात 27
6. नेत्र वैद्य अज्ञात 32
7. गुरु दक्षिणा अज्ञात 39
8. खेती अज्ञात 50
9. अज्ञान का परिणाम अज्ञात 63
10. क्षमा अज्ञात 69
11. दीक्षा श्री ऋषभचन्द्र जैन 75
12. दान पं. रतनलाल सिंघई 84
13. योग्यता की परख अज्ञात 103
14. भ्रातृप्रेम अज्ञात 108
15. सेठपुत्रों का पिशाच अज्ञात 111
16. भवानी निकेतन श्रीमती पुष्पा देवी, विदिशा 114
17. इन्द्रजाल पं. ऋषभचन्द्र 133
18. सच्ची बात कोठिया सुदर्शन जैन 141
19. सहन अज्ञात 149
20. छोटे बन अज्ञात 158
21. पुत्र के प्रति पिता का पत्र श्री ऋषभराम राय (बिछला) 168
22. भारतीय पिता-पुत्र की जोड़ी अज्ञात (काव्य) 170

1. अन्य विचार

बेटी की सगाई के कार्यक्रम में इधर-से-उधर भागदौड़, मेहमानों के बीच में अपना अपनी सूझ से बहुधा दिखा रहा था, तभी किसी ने एक लिफाफा दिया। महेश ने खोलकर देखा है कि एक सामान्य-सी नजर लिफाफे पर डाली और लिफाफा जेब में डाल लिया। कार्यक्रम सम्पन्न हुआ, मेहमानों के जाने के बाद भोजन निपटा, पत्नी के साथ विवाह की तैयारियों को विचार-विमर्श करने बैठ गया।

हमारी खुशी के लिए लड़का और परिवार तो अच्छा मिल गया है, उसकी कोई माँग भी नहीं है। फिर भी हमें अपनी लाड़ली की खुशी और दामाद जी के परिवार के सम्मान में कुछ तो करना ही पड़ेगा। इस महंगाई के युग में कम-से-कम 8-10 लाख रुपयों की व्यवस्था करनी ही होगी। जबकि हमारे पास तो कुल मिलाकर करीब पाँच लाख तक की व्यवस्था हो होगी। बाकी के रुपयों का इंतजाम कैसे करें, कुछ समझ नहीं आ रहा। शादी नजदीक आती ही है, सारी व्यवस्था भी करनी है।

अन्य विचार

(6)

मैं तो आज से हमेशा ही कहती रही कि भविष्य के लिए मैं कुछ बचा कर रखूँ, परन्तु आप तो बड़े दानवीर बने हो। किसी को देख नहीं कि चल दिए मदद करने, अब आपकी मदद कौन करेगा भला…?

अरे पगली! परेशान क्यों होती हो, सबको अपना-अपना भाग्य होता है, कोई किसी को भाग्य ही नहीं बनाता।

हाँ! एक कारण यह है। हमारे लाड़लों की भी सद्भाव है कि उसे धार्मिक, सुसंस्कृत एवं सुयोग्य परिवार मिला है, तब निश्चित ही कोई भी विपत्ति उसे विचलित न कर सकेगी। हमारी लाड़ली ने कभी भी हमसे, अपने लिए खर्च करने को नहीं कहा, वह सदा परोपकारार्थ अपनी लाड़ली की सहायता के लिए ही प्रेरित करती रही। उनके इन परिणामों ने, सद्भावनाओं ने उसे इस मुकाम तक बाहर निकाला है। सद्भावनाओं से सौभाग्य पनपता है, दुर्भावनाओं से दुर्भाग्य। इसलिए हमें अपने विचारों को सदा आत्म-मुखी रखना चाहिए।

तीन माह हो गए हैं अब विश्राम करना चाहिए। अरे हाँ! याद आया। 1 माह एक कोरियर आया था, मैंने उसे खुशी की जेब में रख दिया था, देखो लिफाफा है?

खुशी ने निकाल कर देखा, एक लाल रंग का लिफाफा खोलकर देखा। अरे! महेश यह तो दस लाख रु. का चेक एवं एक पत्र रखा था।

अन्य विचार

(7)

पिता-पुत्र, जीवन प्रयोग,

सदा सत्य सखा।

मिट्टी को चाहे रूप में बदलने वाले, मेरे जीवन रक्षक।

आपके उपकार को ऋण में खोलकर नहीं चुका पाऊँगा। परन्तु अपनी आँखों में बहुत की खुशी के लिए एक दृष्टांत भेज रहा हूँ। कृपया अवलोकन करें। मैं शीघ्र ही ऑस्ट्रेलिया से भारत वापस हो रहा हूँ, बहन की शादी में समय पर पहुँच जाऊँगा। आपका आशीर्वाद एवं प्यार के लिए लालायित-

-आपका अग्रज विश्वास

मन की उत्सुकता लिखे हुए अक्षरों के आगे बढ़ती जा रही थी। पत्र पढ़ने लगी। जब मैं लखनऊ के सेंट-मेरी विद्यालय में अपनी अध्यापिका थी। विषयों के अनुसार प्रतिदिन की भाँति भाषा के समय अपनी लाड़ली को साथ लेकर चलने के लिए निकल पड़ी। लाड़ली पार्क में खेल रही थी। मैंने एक बार भी सेवा बच्चों की दिनचर्याओं देखा व सुरक्षा रहा था। पार्क के दरवाजे पर लगभग पन्द्रह वर्ष का एक लड़का कुछ किताबें लिए हुए बैठे हुए देखा। मैं उसके चेहरे पर निराशा साफ झलक रही थी। उसके समीप से जो भी निकला, उसने उन किताबों को खरीदने के लिए अनुनय, विनय करता। लोगों उसे दुत्कारते हुए निकल जाते, कोई किताबों को उलट-पलटकर देखता और आगे बढ़ जाता। लड़का मायूस हो पुनः अपने स्थान पर आकर बैठ जाता। कुछ

अन्य विचार

(8)

क्षणों तक पुनः निराशा की गहन सोच में खो जाता और कभी के मायूस किसी राहगीर आगन्तुक के इंतजार में जो दौड़कर जाता। बहुत देर तक मुझे एक नया देखने वाले पर मेरी उत्सुकता बढ़ती गई, मैं एक बार भी वहाँ जाती और आती हुई देखा। देखकर उसकी आँखों में गरीबी का एक किरण चमकती, अपनी समस्त ऊर्जा प्रकाशित कर मेरे पढ़ने में पहले ही वह विचलित होकर मेरी ओर दौड़ा। अपनी भी निराशा मिटाकर मैं भी खुशी का विचार कर देखा। विश्वास ही परोपकार का प्रतीक है। लाड़ली बाबूजी! ये किताबें खरीद लें, आपके काम आएँगी।

मैंने एक बार तक उसकी ओर डाली, साफ-सुथरे चेहरे पर राघव की आत्मीयतापूर्ण लेकिन पश्चात्ताप बहुत ही साधारण। किताबों की उलट-पलटकर देखा-धर्म-विज्ञान, हिंदी, लघु-कथा आदि की 4-5 पुस्तकें थीं।

मेरे कहा। ये मेरे किसी काम की नहीं।

उसका सुनकर उसका चेहरा उतर गया। मैंने सोचा ही नहीं। मैंने पूछा कितने मेरे चाहिए?

उसने बोला। मेरे पास खरीद लो। इन्हें बेचकर कमाना चाहता हूँ। अपने लोगों को भी मदद चाहिए का रहा है, वह सुनकर चलने को हुआ। मैंने पूछा। क्यों? अच्छा! उन किताबों के कितने रुपये चाहिए तुम्हें? बोला। हजार!! अच्छा! यह उसके स्वर में दीनता थी। उसके मुँह में पाँच हजार शब्द भरकर भरका लगा। फिर लगा

अन्य विचार

(9)

कहाँ तो काम है? अपनों को कोई खुशी होगी? अपना उन पुरानी पुस्तकों के 3000/- देने को कौन देगा? मैंने बच्चे से उसके सिर पर हाथ रखकर ममता में हाथों से पूछा-तुम्हारा नाम क्या है? क्या था वह? बीमार है? बच्चे ने अपना नाम किया। वह फफककर फूट पड़ा।

मेरा नाम अनाथ है और मैं कोई बीमार भी नहीं।

मैंने क्या कहा है?

माह। काफी समय की निराशा का साफ-सुथरा अब उसकी बदहाली के बाहर था। मैंने और मुझे दोनों ने एक साथ कार्य करना प्रारम्भ किया। मैंने-मेरी लाड़ली सामने चाय के ठेले पर छूटते बर्तन साफ करते हैं और मैं भी लोगों के बीच में किताबें बेचता हूँ। मैं भी उसके साथ काम में हाथ बँटाऊँ। परन्तु मैं अभी पढ़ना चाहता हूँ। मैंने 12वीं कक्षा उत्तीर्ण कर ली है, अब बी.ए.पी.एम. की तैयारी के लिए भर्ती होना चाहता हूँ। मेरे स्वयं भरता करके और माँ, पिताजी की मदद से कुछ करने की जो भी है, परन्तु 5000/- कम है। कल फॉर्म जमा करने की अंतिम तिथि है, यदि कल तक फॉर्म जमा नहीं हुआ तो एक और लक्षा चाय के ठेले बर्तन साफ करता हुआ दिखाई देगा।

अपनी लाड़ली सुनकर एक बार तो मैं भी भावुक हो उठा। परन्तु तभी विश्वास आया कि आप ऐसे कैसे कह सकते हो पर मिलते हैं। किस्मत को विश्वास करें?

आत्म विश्वास

[10]
मेरे पुत्र! क्या किया- सोचा? ये बातों इन पाँच प्रकार
स्वर्गों में रहने वाली जिन बातों से मैंने प्रेरणा ली। कि संस्कार को
बदलना होगा। मैं अपनी मेहनत करूँगा। मैं अपनी मेहनत
स्वाध्याय शैली हो रहेगी। क्या मेरा कर्म होगा। लेकिन अभी
मुझे अपने अनुभव करके अपनी आत्मा में उत्पन्न विश्वास दिखाई
देगा। मेरे मन में स्वतः उत्पन्न प्रीति अनुभव कर रहा, अनजान
व्यक्ति भी विश्वास करने लगे और मैं तो एक सामान्य शिक्षक। मेरा
मन उस पर विश्वास नहीं कर रहा था और उसका विश्वास मुझे वहाँ से
हटा नहीं रहा था। यह आनन्द अनुभव था।
यह मैं अपने बच्चों को स्कूल कॉलेज के लिए ए.टी.एम.
में 5000 रु. निकाल कर जेब में रखे थे, अचानक ही मेरा हाथ उस
जेब में गया। मैंने सोचा था- आज हो सकता है वह बच्चा स्कूल
कॉलेज नहीं गया हो। मैंने रुपये बाहर नहीं निकाले- वह बच्चा मेरे
बगल में था, वह नहीं था और जब मैंने मेरे हाथ को बाहर इसकी
कदर नहीं की तब और भाव बढ़ा। पर भाव बढ़ने के लिए
मनुष्य होना तब मैंने अपनी मुट्ठी निकाल ली। मैं अपनी ही नजर
में अपराधी कहलाऊँगा। यदि मेरे बच्चे अच्छे नहीं होंगे तो मैं
भी बुरे काम करूँगा। तो फिर मैं तो किसी के साथ कुछ या
कुछ नहीं करूँगा। सब एक में जाने क्या बात थी कि मेरे मन में
उनके बच्चों को प्रेरणा नहीं लगी। भाइयों की भावना जब
हृदय में हो पर प्रत्यक्ष देख कर हृदय में हो तो बोलकर
उसका लाभ उठाना चाहिए।

आत्म विश्वास

[11]
मैंने जब से रुपये निकाले और रुपये और बढ़ाते हुए
बोला- बेटा! इन किताबों को इतनी कीमत नहीं दी और न ये
किसी काम की नहीं। मैंने पूछा- मेरे पास जो है और जो भी मैंने
अपनी बेटी खुशी को नहीं देने के लिए रुपये रखे थे, तब वह समझ
गया। जो जो ये रुपये मुझे लौटा देगा, उस धर्म पर मैं उसे दे दूँगा। वे
सब नहीं।
वह मुझे तैयार हो गया। बोला- सर! आप मुझे ये विश्वास
करके देख सकते हैं। मैं पिछले चार दिन से नहीं बोल रहा हूँ। आप
पहले बोलते थे। मैंने देखा। मैंने मना कर अपने में आपको अपना
विश्वास अपने हाथों दिखाई देगा।
रुपये देखने और आँख में चमक आ गई, तब मैंने
मन ही मन में श्रेष्ठ मार्ग अपने आप चुना। मैंने देखा कोई नहीं
हुए। नहीं कहा। मैंने पूछा- यह अपने और चैतन्य पर विश्वास किया
है। यह आत्म विश्वास ही हमारे पुण्य-कर्म का कारण है।
रुपये मिलते ही वह ऐसा हुआ जैसे मैंने चोरी करके
भगाता हो। मैं खड़ा रहता हूँ। वह मेरा मन सोचे- मैं आज
फिर चला गया हूँ। आज अब ये बच्चे नहीं वापस नहीं मिलेंगे।
तभी खुशी के रुपये में मैंने मेरी बेटी वापस नहीं दी। मैं
वापस आ गया। मैंने यह घटना किसी को भी नहीं बताई। नहीं
बताई क्योंकि मैं जानता था कि सब मेरा मजाक बनाएँगे। कोई
भी मुझे एक शिक्षक भी समझ नहीं सकेगा।

आत्म विश्वास

[12]
समय बदलता रहा। मैं भी उन घटनाओं को विश्वास का अंग
रख कर पढ़ता रहा। मैंने नहीं छोड़ा। मैंने भी नहीं लिखकर
रखा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं छोड़ा। मैंने भी अपनी भावना में अपना मन और उपयोग
नहीं

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 1882.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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