अक्षरनिधि / तंबोला
अक्षयनिधि / तंबोला
(संकलन - सुदीप शास्त्री, बरनी, जबलपुर)
१. आप सभी तंबोला का गेम खिलाते ही हैं, पर उससे कुछ सीखने को नहीं मिलता, लेकिन इस तंबोला/अक्षयनिधि में आनन्द के साथ सीखने को बहुत मिलता है।
२. सबसे पहले आप कम से कम एक दिन पहले इस गेम की सूचना दे दें, ताकि लोग गेम के दिन पेन या पेंसिल ले आएं।
३. आप एक ए 4 साइज़ अन्यथा कोई भी रजिस्टर के पेज के ४ या ६ हिस्से बना लें और प्रत्येक हिस्से को पेन/पेंसिल से ९ खंडों में विभाजित कर लें। इस प्रकार आप अपने स्थान के लोगों के हिसाब ५० - १०० - १५० - २०० पर्ची बना सकते हैं।
४. प्रत्येक पर्ची के ९ खण्ड में नीचे दिए १३० शब्दों में से खण्ड-क (लेफ्ट साइड) के कोई एक-एक शब्द लिख लें। इसप्रकार एक पर्ची में ९ अलग-अलग शब्द लिख सकते हैं। आप ये न सोचें कि कुछ शब्द तो दूसरी पर्ची में रिपीट हो रहे हैं, उससे निश्चित रहें।
जीव ! कषाय ! जम्बूद्वीप
पदार्थ ! पाप ! समयसार
लेश्या ! स्वर्ग ! द्रव्य
५. एक सदस्य को एक पर्ची दें।
६. प्रतियोगिता के नियम -
१. एक से ज्यादा पर्ची किसी को न दें।
२. सभी अपनी पर्ची के पीछे अपना नाम लिख लें।
३. कोई भी बिना कहे पर्ची में कुछ भी न लिखे।
सभी की पर्ची में ९ शब्द दिए हैं, हम यहां के एक शब्द बोलेंगे, यदि आपकी पर्ची में वह शब्द है तो आप उस पर टिक कर लें, उसके बारे में हम कुछ संख्याएं आपकों बताएँगे, वह आपको लिखनी है और उसे याद करना है। जो शब्द बोले उसी में टिक करना है। कर्म और घाति कर्म या अघाति कर्म अलग-अलग है। अतः जो शब्द बोले उसी पर टिक करें।
४. गेम के बाद कोई भी पर्ची यहां न फेंके। (एक या दो बॉक्स रख दें, ताकि बाद में सभी अपनी पर्ची उसमें ही डालें)
५. जिस सदस्य के पर्ची की प्रथम लाइन (सबसे ऊपर) के तीनों शब्द सबसे पहले पूरे हो जाये उसे एक पुरस्कार। इस लाइन को कहते है सम्यग्दर्शन।
६. जिसके दूसरी लाइन (बीच) के तीनों शब्द सबसे पहले पूरे हो जाये, उसे पुरस्कार। इस लाइन को कहते है सम्यक्ज्ञान।
७. जिसके अंतिम लाइन के तीनों शब्द पूरे हो जाये, उसे पुरस्कार। इस लाइन को कहते है सम्यक्चारित्र।
८. जिनके चारों कोनों के शब्द सबसे पहले पूरे हो जाये, उसे पुरस्कार। इसे कहते है अनंत चतुष्टय।
इन चार में जो भी पहले पूर्ण हो जाये उसे पुरस्कार दे सकते हैं। ऐसा जरूरी नहीं कि पहले पहली लाइन ही पूरी हो, किसी की सबसे पहले दूसरी या तीसरी लाइन भी पूरी हो जाये तो उसे पुरस्कार देना है।
९. जिनके सारे खण्ड के सभी शब्द पूरे हो जाये, उसे मोक्ष का पुरस्कार।
१०. सांत्वना पुरस्कार - आप तीन पर्ची ऐसी बनाना, जिसके अन्दर, एक में सभी शब्द ‘स’ से हों, एक में सभी शब्द ‘प’ से हों, और एक में सभी शब्द ‘अ’ से हों। जब मोक्ष वाला सदस्य आ जाये। तब सबसे लास्ट में आप कहना कि वह सदस्य खड़े हो जाये, जिसकी पर्ची में सभी शब्द स, प, अ वाले हों। उनको भी पुरस्कार दे सकते हैं। - इसकी सांत्वना पुरस्कार की जानकारी सबसे लास्ट में ही दें।
११. विशेष बात - जिनके कोई भी लाइन पूरी होती है, वह सदस्य हमको बताये कि हमारी ये लाइन पूरी हो गई है, हम उसे मंच पर बुलाएंगे, उसे १ या २ मिनिट का टाइम दिया जाएगा।
तब तक वह इनके उत्तर याद कर ले। जब तक वे याद करें, आप अपनी प्रतियोगिता चालू रखें। १-२ मिनिट का समय पूरा होने पर उनसे पूछें, यदि उनसे उत्तर दे दिए तो उनका ईनाम पक्का। उत्तर नहीं दिए, तो वापिस बैठ जाएँ, उनकी वह लाइन कैंसिल।
१२. यदि एक सदस्य का एक ईनाम पक्का हो गया है, तो उसे आगे के ईनाम नहीं दिए जाएंगे -
१३. आप कोई भी लेफ्ट साइड का एक शब्द बोले - जैसे आपने बोला - जीव - फिर एक बार और बोलना है जीव। फिर बोलना है - जीव २ प्रकार के होते हैं, एक बार पुनः बोलना है, जीव २ प्रकार के होते हैं। ! जिनकी पर्ची में जीव होगा, वह उसमें २ लिख लेंगे। इस तरह सभी शब्दों को और उनकी संख्या को कम से कम दो - दो बार बोलना है।
१४. आप लिस्ट में कहीं से भी कोई भी शब्द बोल सकते हैं। जो शब्द आप बोले, उसमें निशान जरूर लगा लें, ताकि वह शब्द आगे रिपीट न हो पाए।
१५. बोलने के लिए आप लिस्ट के आगे के पेज अपने पास रख लें और बाद के कुछ पेज अपने ही सहयोगी साथी को दे दें। एक शब्द आप बोल दें, अगला शब्द दूसरा साथी बोल दें। कृपया साथी ऐसे हो जिनकी आवाज़ स्पष्ट हो।
अक्षयनिधि प्रश्नावली
१. जीव - २ प्रकार के होते हैं।
२. उपयोग - २ प्रकार के होते हैं।
३. प्रमाण - २ भेद हैं
४. योग - ३ प्रकार के होते हैं।
५. काल - ३ प्रकार के होते हैं।
६. गुप्ति - ३ होती हैं।
७. लोक - ३ होते हैं।।
८. शल्य - ३ होती हैं।
९. आत्मा - ३ प्रकार के होती हैं।
१०. बल - ३ प्रकार के होते हैं।
११. जन्म - ३ प्रकार के होते हैं।
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मकार - 3 होते हैं।
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कषाय - 4 होती हैं।
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गति - 4 होती हैं।
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अनुयोग - 4 होते हैं।
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निक्षेप - 4 होते हैं।
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देव - 4 प्रकार के होते हैं।
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संज्ञा - 4 प्रकार की होती हैं।
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मंगल - 4 होते हैं।
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उत्तम - 4 होते हैं।
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शरण - 4 होती हैं।
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दान - 4 प्रकार के होते हैं।
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घाति कर्म - 4 भेद हैं।
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अघाति कर्म - 4 भेद हैं।
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ध्यान - 4 प्रकार के होते हैं।
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संघ - 4 प्रकार के होते हैं।
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हिंसा - 4 प्रकार की होती हैं।
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आराधना - 4 प्रकार की होती हैं।
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शिक्षाव्रत - 4 प्रकार के होते हैं।
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पुरुषार्थ - 4 होते हैं।
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परमेष्ठी - 5 होते हैं।
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पाप - 5 होते हैं।
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शरीर - 5 प्रकार के होते हैं।
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स्थावर - 5 भेद हैं।
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कल्याणक - 5 होते हैं।
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इन्द्रिय - 5 होती हैं।
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ज्ञान - 5 प्रकार के होते हैं।
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समिति - 5 होती हैं।
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महाव्रत - 5 होते हैं।
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अणुव्रत - 5 होते हैं।
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लब्धि - 5 होती हैं।
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अंतराय कर्म - 5 प्रकार के होते हैं।
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उदम्बर फल - 5 प्रकार के होते हैं।
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मेरु - 5 होते हैं।
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स्वाध्याय - 5 भेद हैं।
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अनर्थदंड - 5 प्रकार के होते हैं।
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पाण्डव - 5 हैं।
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अभक्ष्य - 5 प्रकार के होते हैं।
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अनुत्तर - 5 हैं।
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पूजन-अंग - 5 होते हैं।
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द्रव्य - 6 होते हैं।
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लेश्या - 6 होती हैं।
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श्रावक आवश्यक - 6 होते हैं।
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पर्याप्ति - 6 होती हैं।
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संस्थान - 6 होते हैं।
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संहनन - 6 होते हैं।
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रस - 6 प्रकार के होते हैं।
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कारक - 6 होते हैं।
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बाह्य तप - 6 प्रकार के हैं।
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अंतरंग तप - 6 प्रकार के हैं।
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तत्व - 7 होते हैं।
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नरक - 7 होते हैं।
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भय - 7 होते हैं।
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कर्म - 8 हैं।
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सिद्ध मूलगुण - 8 हैं।
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प्रातिहार्य - 8 होते हैं।
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मंगल द्रव्य - 8 होते हैं।
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पूजन द्रव्य - 8 होते हैं।
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व्यंतर देव - 8 प्रकार के होते हैं।
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समवसरण भूमि - 8 होती है।
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मद - 8 प्रकार के होते हैं।
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सम्यक्दर्शन अंग - 8 हैं।
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पदार्थ - 9 होते हैं।
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नारायण - 9 होते हैं।
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प्रतिनारायण - 9 होते हैं।
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बलभद्र - 9 होते हैं।
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नारद - 9 होते हैं।
- अनुदिश - 9 होते हैं।
- ग्रैवेयिक - 9 होते हैं।
- निषि - 9 होती है।
- नव देवता - 9 होते हैं।
- शील बाड़ - 9 होती है।
- धर्म - 10 लक्षण हैं।
- प्राण - 10 प्रकार के होते हैं।
- भवनवासी देव- 10 प्रकार के होते हैं।
- कल्पवृक्ष - 10 प्रकार के होते हैं।
- बहिरंग परिग्रह - 10 होते हैं।
- प्रतिमा - 11 होती है।
- रुद्र - 11 होते हैं।
- भावना - 12 होती है।
- तप - 12 प्रकार के होते हैं।
- समवसरण सभा - 12 होती है।
- चक्रवर्ती - 12 होते हैं।
- चारित्र - 13 प्रकार के हैं।
- गुणस्थान - 14 होते हैं।
- जीव समास - 14 होते हैं।
- कुलकर - 14 होते हैं।
- पूर्व - 14 होते हैं।
- अंतरंग परिग्रह - 14 प्रकार के होते हैं।
- प्रमाद - 15 होते हैं।
- कारण भावना - 16 होती हैं।
- स्वर्ग - 16 होते हैं।
- रिद्धियां - 64 होती हैं।
- परीषह - 22 होते हैं।
- तीर्थंकर - 24 होते हैं।
- परिग्रह - 24 होते हैं।
- कामदेव - 24 होते हैं।
- उपाध्याय मूलगुण - 25 होते हैं।
- जम्बूद्वीप - 1 लाख योजन का है।
- सुमेरु पर्वत - 1 लाख 40 योजन ऊँचा है।
- ढाई द्वीप - 45 लाख योजन का है।
- तीन लोक - 14 राजू ऊँचा है।
- तत्त्वार्थ सूत्र - 357 सूत्र हैं
- भक्तामर स्तोत्र - 48 काव्य है।
- रत्नकरंड श्रावकाचार - 150 श्लोक है।
- समयसार - 415 गाथा है।
- द्रव्य संग्रह - 58 गाथा है।
- अवसर्पिणी काल - 10 कोड़ाकोड़ी सागर का होता है।
- पंचम काल - 21000 वर्ष का है।
- अकृत्रिम चैत्यालय - 8, 56, 97, 481 हैं।
- पहर - 3 घंटे होता का है।
- मुहूर्त - 48 मिनिट का होता है।
- घड़ी - 24 मिनिट की होती है।
- कर्म भूमि - 15 होती है।
- भोग भूमि - 30 होती है।
- साधु मूलगुण - 28 होते हैं।
- अरहंत मूलगुण - 46 होते हैं।
- आचार्य मूलगुण - 36 होते हैं।
- उत्सर्पिणी काल - 10 कोड़ाकोड़ी सागर का होता है।
- समवसरण सीढ़ी - 20000 होती है।
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3492.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है