ऐतिहासिक नाटक जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य — जैन स्वाध्याय सामग्री | Aitihasik Natak Jain Samrat Chandrgupt Maurya

ऐतिहासिक नाटक जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

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ऐतिहासिक नाटक

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
श्रीमती रूपवती ‘किरण’, जबलपुर

प्रथम संस्करण : 3100 प्रतियाँ

( श्री दश लक्षण पर्व, दिनांक 10 सितम्बर से
19 सितम्बर 2021 के अवसर पर प्रकाशित )

सहयोगी

  • स्व. श्रीमती रूपवती जी ‘किरण’ ध.प.स्व. श्री कोमलचन्द जी जैन की पुण्य स्मृति में उनके सुपुत्र श्री नरेन्द्र कुमार जैन, जबलपुर
  • स्व. श्रीमती सरोज जैन की स्मृति में श्री स्वतन्त्र मोहन जैन ‘कुमुद’, करहल (उ.प्र.)
  • स्व. श्रीमती लक्ष्मी जैन मातु श्री की स्मृति में श्री दीपक जैन, आगरा (उ.प्र.)
  • श्रीमती कुसुम जैन ध. प. श्री भागचन्द जैन, अहमदाबाद (गुज.)

प्रकाशक:

श्री वर्द्धमान न्यास
( पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट )
अमायन, भिण्ड (म.प्र.)-477 227
मोबा.-98262 25580
कीमत : 30/-

Jain Samrat Chandragupta Maurya (Hindi)
by Smt. Roopwati “Kiran”
Price : ₹ 30.00

प्रकाशकीय

अखण्ड भारत के संस्थापक, जैनेश्वरी दीक्षा लेने वाले अन्तिम जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य बाल्यावस्था से ही उनकी प्रतिभा सूर्य की लालिमा की भाँति प्रगट होने लगी।

प्रभुत्व- बचपन से ही राज दरबार का खेल-खेलने और राजा का अभिनय करते समय आपकी विशेषता, शौर्य, न्याय देख गुरुदेव विप्र चाणक्य आपकी बालसभा में पहुँच गौस हेतु गाय की याचना करने लगे, सामने के खेत में चरती हुई गायों में से कोई भी एक गाय लेने का आपने फरमान कर दिया। कृत्रिम घबराहट पूर्वक गाय के मालिक द्वारा रोके जाने की बात विप्र ने कही, तब चन्द्रगुप्त ने दाँस बँधाते हुए कहा- ‘किसमें साहस है जो राजा चन्द्रगुप्त की आज्ञा की अवहेलना कर सके।’

निर्भीकता (वीरता)- अकेले अपरिचित हेलन को फिलिप्स के दुस्साहस से छुड़ा कर नारी जाति की रक्षा करना। अलक्षेन्द्र की सभा में चुनौती देना और स्वयं सभा से बाहर चले जाना। वनराज सिंह द्वारा सुषुप्त वनराज चन्द्रगुप्त के तन के स्वेद को जिह्वा से पोछना।

गुरुभक्ति- चाणक्य, चन्द्रगुप्त को सरोवर में कमल मयूर पत्रों के नीचे छिपा देते हैं और स्वयं रक्षक का कार्य करने लगते हैं। सैनिक को युवक चन्द्रगुप्त का पता पूछने पर सरोवर की ओर संकेत कर कहते हैं कि वस्त्र उतार कर पकड़ लो। सैनिक शस्त्र-वस्त्र उतार कर सरोवर में जैसे ही प्रवेश करने को होता है, चाणक्य उसी के शस्त्र से सैनिक को मारकर चन्द्रगुप्त को सुरक्षित बाहर निकाल लेते हैं और उसी के अश्व पर चढ़कर आगे चलाते हुए चन्द्रगुप्त से पूछते हैं कि बेटा! जब सैनिक को हमने तुम्हारा पता बताया था, तब तुम्हारे मन में क्या प्रतिक्रिया हुई थी? गुरुदेव के प्रत्येक कथन में कोई न कोई रहस्य विद्यमान रहता है अत: आपके प्रति नि:शंक, निश्चिंत, इसमें भी कोई हित होगा, ऐसा अटूट विश्वास था।

दीक्षागुरु श्री भद्रबाहु स्वामी की समाधि के लिये चन्द्रगिरि गुफा में रुक कर श्री गुरु की समाधि कराना। इत्यादि प्रसंगों को पढ़कर अपने इतिहास एवं गौरव को पहचानें।

लेखिका का अकथनीय श्रम हमारे लिये प्रेरणादायक है, शिक्षा लें! हम सभी सहयोगियों के हृदय से आभारी हैं।
मन्त्री, अखिल जैन
श्री वर्द्धमान न्यास, अमायन (भिण्ड, म.प्र.)

प्रस्तावना

  • प्रो. वीरसागर जैन

जैन राजाओं का इतिहास अत्यन्त गौरवशाली रहा है। प्रारम्भ में राजा नाभिराय ने प्रजा की इतनी सेवा की कि उनके नाम पर इस देश का नाम ‘अजनाभवर्ष’ रखा गया। इसके बाद राजा ऋषभदेव हुए, जो प्रजा को उभयलोक कल्याणकारी उपदेश देने के कारण प्रजापति, स्वयम्भू, आदिब्रह्मा आदि हजारों नामों से विश्वविख्यात हुए। इसके बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत ने सम्पूर्ण षट्खण्ड वसुधा को सम्भाल कर चक्रवर्ती पद प्राप्त किया और उनके नाम पर इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ रखा गया। भरत चक्रवर्ती का समग्र जीवन ही अद्भुत है, आदर्श है। जल में कमल की भाँति रहकर जीने की कला उन्होंने ही सिखाई।

इसके बाद प्रायः सभी तीर्थंकर ही इस देश के महान राजा हुए तथा उनके लम्बे शासनकाल में उनके अनेकानेक भक्त भी बड़े राजा हुए। यदि इन सबके बारे में जानना हो तो हमें जैन पुराणों का अध्ययन करना चाहिए, उनमें इनके जीवन एवं कार्यों की सुन्दर झाँकी देखने को मिलती है।

चौबीस तीर्थंकरों के बाद भी सैकड़ों वर्षों तक जैन राजाओं की परम्परा अविच्छिन्न रूप से चलती रही। इनमें श्रेणिक, बिम्बसार, कुणिक, अजातशत्रु, महाराज जीवन्धर, चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार, अशोक, कुणाल, सम्प्रति, खारवेल, विक्रमादित्य आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। यद्यपि इनके अतिरिक्त भी हजारों जैन राजा विभिन्न क्षेत्रों एवं विभिन्न कालों में हुए हैं, जिनका विवरण अज्ञात है। इसीप्रकार गंग, पल्लव, चोल, चालुक्य, राष्ट्रकूट, कलचुरी, होयसल आदि ऐसे अनेक राजवंश हैं, जिनमें जैनधर्म की महती आराधना एवं प्रभावना होती रही।

जैन राजाओं की यह मुख्य विशेषता रही है कि ये स्वयं को प्रजा के स्वामी नहीं, सेवक मानते हैं और पूर्ण मनोयोग से उनकी सर्वोत्तम सेवा करने का प्रयास करते हैं। वे प्रजा पर किसी प्रकार की कोई जबरदस्ती नहीं करते हैं, उन्हें बलात् धर्म परिवर्तन आदि भी नहीं करवाते हैं अपितु सभी के धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार की रक्षा करते

हैं। जैन राजा सुरा-सुन्दरी में डूबे रहने वाले नहीं अपितु उच्च कोटि के आध्यात्मिक योगी होते हैं। जीवन के अंत में तो वे निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनि हो ही जाते, राज्यावस्था में भी जल में कमल की तरह निर्लिप्त रहते थे।

श्रीमती रूपवती ‘किरण’ द्वारा रचित प्रस्तुत नाटक के नायक सम्राट चन्द्रगुप्त भी एक ऐसे ही दैदीप्यमान जैन सम्राट हैं। जैन ग्रन्थों में उनका विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है। न केवल इस जन्म का अपितु उनके पूर्व जन्म की भी कहानी रामचन्द्र कृत ‘पुण्यास्त्रव-कथाकोश’ में मिलती है। इसके अतिरिक्त हरिवेष कृत कथाकोश, श्रुतावतार, भद्रबाहुचरित, तिलोयपण्णत्ति आदि में भी उनका वर्णन उपलब्ध होता है। तिलोयपण्णत्ति में उन्हें अंतिम मुकुटबद्ध सम्राट बताया गया है, जिन्होंने अन्तिम श्रुतकेवली भद्रबाहु से निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनि दीक्षा अंगीकार करके उन्हीं के साथ दक्षिण भारत के कटवप्र या कुमारी पर्वत पर आत्मसाधना की थी। इसी कारण आज उस पर्वत से चाणक्य का भी मुनि दीक्षा ग्रहण करने का उल्लेख प्राप्त होता है।

श्रीमती रूपवती ‘किरण’ द्वारा रचित प्रस्तुत नाटक के माध्यम से पाठकों को चन्द्रगुप्त के विषय में कुछ जानकारी मिलेगी और विशेष जानने की प्रेरणा भी मिलेगी। वर्तमान में जैन समाज को ही अपने जैन राजाओं का ज्ञान नहीं है, यह बड़े खेद का विषय है। प्रस्तुत नाटक के माध्यम से इस दिशा में भी समाज में कुछ जाग्रति आएगी। अतः नाटक की लेखिका एवं प्रकाशक दोनों ही अभिनन्दन के पात्र हैं।

अन्त में, मैं निम्नलिखित श्लोक के माध्यम से सभी को अपनी समाज के गौरवशाली इतिहास-पुरुषों को जानने की प्रेरणा देता हुआ अपनी बात को पूर्ण करता हूँ-

स्वजातिपूर्वजानां तु यो न जानाति सम्भवम्।

स भवेत पुंश्चलीपुत्रसदृशः पित्रवेदकः॥

अर्थात् जो अपने पूर्वजों के इतिहास को नहीं जानता है, वह ऐसे कुलटा-पुत्र के समान है जो अपने पिता को ही नहीं जानता।

ऐतिहासिक नाटक

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

पात्रानुक्रमणिका

चाणक्य - तक्षशिला विद्यालय के प्रधानाध्यापक
चन्द्रगुप्त - चाणक्य के प्रमुख प्रिय शिष्य तथा भावी सम्राट
जयदेव - चन्द्रगुप्त का अभिन्न मित्र
चित्रवर्मा - कुलूट नरेश
पुष्कराक्ष - काश्मीर नरेश
सिंहनाद - मलय नरेश
सिंधुषेण - सैंधव नरेश
गणकराय - ज्योतिषाचार्य (चाणक्य का शिष्य)
अलक्षेन्द्र सिकन्दर - यूनानी सम्राट
शैलाक्ष (सैल्यूकस) - अलक्षेन्द्र का प्रमुख सेनाध्यक्ष
हेलन - शैलाक्ष की पुत्री
पालक, सैनिक, सभासद इत्यादि

[पहला दृश्य]

तक्षशिला नगर

(आँगन में दो स्त्रियाँ सम्भाषण कर रही हैं। जल भरने के लिए दोनों जाने वाली थी कि जाने से पूर्व वे वहीं बैठकर अपनी बात पूरी करती हैं। एक चाणक्य पत्नी यशोमति और दूसरी उसकी सखी सुभद्रा।)

सुभद्रा- सखी यशोमति! तुम आज-कल बहुत उदास रहने लगी हो। जान पड़ता है, आर्य चाणक्य का वियोग तुम्हें संतप्त कर रहा है। (मंद-मंद मुस्कराकर) क्यों है न यही बात?

यशोमति- (दुःखित हो) तुम भले ही विनोद करो सखी, पर मुझे तो उन्हीं की चिन्ता व्याकुल किये रहती है। तुम्हीं बताओ, क्या वृक्ष के बिना लता हरी-भरी रह पाई है?

सुभद्रा- ठीक कहती हो बहिन! लता की शोभा वृक्ष है। प्रियतम के अभाव में मुरझाएगी ही। हम नारियों का सुख-सुहाग पति ही तो है।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

यशोमति- देखो न, उन्हें गये एक अयन¹ हो गया अभी तक नहीं लौटे। मुझे अहर्निश उनकी चिन्ता व्याकुल किये रहती है।

सुभद्रा- बहिन पाटलीपुत्र दूर भी तो है।

यशोमति- सो तो है किन्तु दुःख इस बात का है कि मेरी बात उन्हें लग गई। कुछ व्यथित-से होकर गये हैं। मैंने उन्हें बहुत रोका परन्तु वे जो ठान चुके फिर उनके ब्रह्म वाक्य ही हो जाते हैं।

सुभद्रा- तो क्या तुमने कुछ अनुचित कह दिया है?

यशोमति- हाँ सुभद्रा! बात सचमुच ऐसी ही हो गई है। दरिद्रता कभी-कभी विवेक नष्ट कर देती है। कर्तव्य भुला देती है।

सुभद्रा- (स्नेहासिक्त स्वर में) बताओगी नहीं, क्या हुआ था? मुझे तो आश्चर्य इस बात का है कि इतने दिनों तक तुमने अपने मन की गोपनीयता की गाँठ मुझसे भी न खोली। कह तो सही, क्या बात हुई?

यशोमति- लाज जो लगती थी।
हृदय की बात मुँह तक आकर अटक जाती थी।

सुभद्रा- अरी, अपनों से कैसी
लज्जा? (आग्रह से) बात क्या हुई?

यशोमति- तुम्हें स्मरण होगा कि
मैं भाई के विवाह में पीहर गई थी। वहाँ सबने मेरी दरिद्रता का खूब उपहास उड़ाया। सच बहिन, मुझे बहुत दुःख हुआ। जानती हूँ, सांसारिक वैभव आदि सभी कर्म-जनित उपाधियाँ हैं। इनसे हमारी आत्मा का कल्याण नहीं होने वाला। न ही लोगों के उपहास करने से आत्मा की क्षति होती है, अतः मैंने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया किन्तु जब पतिदेव के प्रति अपमान-सूचक वचन कहे जाने लगे तब मेरा धैर्य किनारा कर गया। उसी समय में वहाँ से चली आई।

  1. छह महीने का समय

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

सुभद्रा- अच्छा, उनकी धृष्टता! आर्य चाणक्य जैसे मतिमान पंडित का भी तिरस्कार!

यशोमति- यहाँ आने पर उन्होंने मेरी उदासी का कारण पूछा। मैंने कुल हाल बतला दिया। साथ ही अपने को न रोक सकी। बातों ही बातों में कह गई कि यदि आपने अन्य लोगों की तरह संपत्ति संचित की होती तो मुझे सबके वाक्बाण न सहने पड़ते। संतोष ही संतोष का उपदेश सुनते-सुनते ऊब गई हूँ।

सुभद्रा- अर्थात् तुमने भी उनका अनादर कर दिया।

यशोमति- कहने को तो कह गई सखी! पर घोर पश्चाताप होता है। काश! अपने वचन लौटों सकती। (आह भरकर) पर निशाना साध कर छोड़ा हुआ तीर कभी वापस नहीं लौटा। सुभद्रा! मुझे जो आशंका थी, वही हुआ।

सुभद्रा- तो क्या तुम्हें पहिले से कुछ आभास हो गया था।

यशोमति- तुम ही बताओ भगिनी! उन जैसे दृढ़ प्रतिज्ञ, उग्र स्वभावी पुरुष सुनकर कैसे चुप रह सकते थे? उसी दिन से उधेड़बुन में लगे रहे। अन्न-पान तो जैसे त्याग ही दिया हो। एक-दो ग्रास खा लिया तो बहुत है।

सुभद्रा- तुमने अच्छा नहीं किया यशोमति। बुद्धिमती होकर इतने महान् विद्वान् से मर्मभेदी वचन कहकर उनका हृदय दुखाया। धन संपत्ति तो बाह्य निधि है। तुम्हारी भी उनके आंतरिक गुणों के अक्षय कोष की ओर दृष्टि नहीं गई?

यशोमति- बस यही भूल का शूल तो मुझे चुभ रहा है। मैंने क्षमा याचना की। बहुत-बहुत समझाया, पर वे दृढ़ प्रतिज्ञ रहे। पाटलीपुत्र प्रस्थान कर गये।

सुभद्रा- वहाँ जाकर क्या करेंगे? है बड़ा ही समृद्ध संपत्तिशाली देश। विद्या का केन्द्र है। अपनी तक्षशिला नगरी के बाद उसी का नाम लिया जाता है।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

यशोमति- और भी सुना है। वहाँ के नरेश महापद्मनन्द कुशल
शासक के साथ ही अहिंसाधर्मी एवं दानशीलता के लिए विश्रुत हैं।
विद्याव्यसनी हैं और विद्वानों का आदर करते हैं।
सुभद्रा- (भूली हुई सी याद आती है) मगध नरेश! हाँ वे सचमुच ही
महादानी हैं। क्यों यशोमति! कार्तिक पूर्णिमा के समय तुम्हारा कोई महापर्व
भी होता है क्या?
यशोमति- हाँ भगिनी! आठ दिन तक अष्टाह्निका पर्व मनाये जाते हैं
जो पूर्णिमा के दिन समाप्त होते हैं।
सुभद्रा- उन पर्वों में नरेश सदावर्त खोल देते हैं। सुयोग है यशोमति।
समझो, तुम्हारे भाग्य का शुभोदय हुआ है।
यशोमति- जो हो, भाग्य का लिखा अमिट है। पर उनके बिना मुझे
अच्छा नहीं लगता। कोई संवाद भी नहीं आया।
सुभद्रा- चिंता तो होती ही है किन्तु धैर्य-धरना होगा सखी! सुना है
कुछ मागध यहाँ स्नातक बन कर आये हैं अध्ययन हेतु। कदाचित् उनसे कुछ
संवाद मिल जाये।
यशोमति- (अधीर हो) चल न सुभद्रा! मेरे साथ उन तक। आर्यपुत्र
के समाचार जानने की मेरी तीव्र उत्कंठा है।
सुभद्रा- चल। (दोनों का उसी क्षण विद्यालय की ओर प्रस्थान)
मार्ग में-
यशोमति- क्या बताऊँ बहिन! वे बड़े संतोषी व्यक्ति रहे हैं। संतोष
ही तो उन्हें माता-पिता से उत्तराधिकार में मिला है।
सुभद्रा- सो तो इस बात की सभी प्रशंसा करते हैं। वे निर्लोभी
सज्जन अध्यापक हैं।
यशोमति- उनके बचपन की घटना मेरी श्वश्रू¹ सुनाया करती थीं।

  1. आदर सूचक शब्द
    10 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

जन्म समय में ही आर्यपुत्र के मुख में दाँत थे। सबको बड़ा आश्चर्य हुआ।
उसी समय जैन साधु वहाँ आये तो उन्होंने बतलाया कि यह बालक बड़ा होने
पर भावी राजा होगा।
सुभद्रा- तब यह मिथ्या कैसे हो गया? मैंने सुना है कि तुम्हारे जैन
साधुओं के वचन अन्यथा नहीं होते।
यशोमति- साधु की बात कब मिथ्या हुई है भगिनी! सुन तो सही।
मेरे श्वसुर संतोषी धर्मात्मा व्यक्ति थे। राज्य वैभव को वे पाप समझते थे। सो
उन्होंने दाँत उखड़वा डाले। पुनः उन साधु ने भविष्य वाणी की कि अब यह
बालक स्वयं राजपद तो न पावेगा किन्तु किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से
अवश्य राज्य करेगा।
सुभद्रा- कदाचित् यह भविष्यवाणी अब सत्य हो।
यशोमति- समय आने पर ही कार्य संपन्न होते हैं। जाने वह अवसर
कब आयेगा?

पटाक्षेप
[ दृश्य-दूसरा ]
(चाणक्य पाटलीपुत्र से निष्कासित होकर वन पथ पर-)
चाणक्य- (स्वगत क्रोधाभिभूत हो) अपमान, घोर अपमान। मैंने
शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त कर पाटलीपुत्र के पंडितों पर अपनी छाप अंकित
कर दी। तदुपलक्ष्य में महाराज महापद्मानन्द ने मेरी विद्वत्ता पर मुग्ध हो दान
विभाग का अध्यक्ष पद प्रदान किया किन्तु उद्दण्ड युवराज धनानन्द ने केवल
मेरी कुरूपता और श्याम रंग को ही देखकर मेरा तिरस्कार किया। मैं क्यों
किसी के व्यंग्य बाण सहन करूँ। मैंने भी उसे प्रत्युत्तर दिये। तिस पर उस
अभिमानी ने मेरे केशों को पकड़कर मुझे सेवकों से बाहर निकलवा दिया।
पर याद रख धनानन्द! जिस राज्यमद में तूने मेरा घोर तिरस्कार किया; उसी
राज्य से हटाकर मैंने तेरे वंश को जड़मूल से ने उखाड़ फेंका तो मेरा नाम
जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य 11

चाणक्य नहीं। जिन केशों को तूने खोला है, वे केश तभी बँधेंगे, जब यह
भीषण प्रतिज्ञा पूर्ण होगी। मुझे ऐसे पुरुष को खोजना होगा, जो राजा होने के
उपयुक्त हो।
मुझे याद है, जब मातुश्री कहती थीं- पुत्र! तेरा राजयोग हमने ही भंग
किया है। काश! मुझे राजपद मिलता परन्तु भवितव्यता ऐसी नहीं थी। राजा
बनना होता तो बुद्धि के साथ मेरा रंग रूप निखरता। नरेशों का सुन्दर होना
अनिवार्य है। प्रशस्त ललाट, सौम्य मुखाकृति वाले भूपति ही चिरकाल तक
राज्य कर सकते हैं। उनकी निर्मल विचारधारा, आकर्षक व्यक्तित्व, सुन्दरता
शासित वर्ग का मन लुभा लेती है। अपनी कल्पना को मूर्तरूप देने के लिए ये
आज से मेरा अभियान प्रारम्भ हो जायेगा। चाणक्य आज प्रतिज्ञा करता है कि
जब तक योग्य पुरुष न मिलेगा; तब तक चैन से नहीं बैठूँगा।

पटाक्षेप
[ दृश्य-तीसरा ]
मयूर नगर के राजा देवसेन का गृह
समय- प्रातःकाल, द्वितीय प्रहर
(देवसेन चिन्तित मुद्रा में विराजे हैं। चाणक्य साधु के रूप में भिक्षा
हेतु उपस्थित होते हैं।)
चाणक्य- द्वार पर साधु आया है माँ! (सहसा देवसेन को देखकर)
राजन् उदास प्रतीत होते हैं।
देवसेन- (साधु की अभ्यर्थना हेतु खड़े होकर उच्चासन देते हुए)
अतिथि देव का स्वागत है गुरुदेव! कृपया, विराजकर कुटिया को पवित्र करें।
चाणक्य- (बैठकर) क्या कष्ट है तुम्हें? साधु से बतलाने में हानि
की संभावना नहीं है।
देवसेन- नहीं महाराज! आप से हानि कैसे हो सकती है? आप ठहरे
रमता जोगी। हम गृहस्थों से आपको क्या प्रयोजन?
12 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

चाणक्य-वत्स! हम किसी को कष्टमय नहीं देख सकते। तत्काल उसकी व्यथा निवारण करने का कार्यक्रम बनाते हैं।

देवसेन- धन्य है महाराज! आप जैसे साधु सन्तों का स्वभाव ही परम दयालु होता है इसीलिए तो हम लोग आपको करुणासागर कहते हैं। कहिये, आपकी क्या सेवा की जाये?

चाणक्य- गृहपति! हम स्वयं सेवक हैं। स्वस्थ होकर अन्य से सेवा कराना घृणित कर्म और अपराध समझते हैं।

देवसेन- आप लोगों की बात लोकोत्तर होती है महाराज! चलिये भोजनशाला में भोजन ग्रहण कर हमें कृतार्थ करें।

चाणक्य- भद्र! प्रथम हमें अपनी व्यथा बतलायें जिससे उसे मिटाने का भरसक प्रयास करें।

देवसेन- आपकी वात्सल्यता देखकर हमें परम सन्तोष हुआ है गुरुदेव! बात यह कि मेरी पुत्री गर्भवती है। उसे चन्द्रमा पीने का दोहला हुआ है। दिनोंदिन वह कृशकाय होती जा रही है। इस दोहले की पूर्ति नितान्त असम्भव है। पुत्री की प्राण-रक्षा किस प्रकार हो? यही चिन्ता परिवार को आठों प्रहर सता रही है।

चाणक्य- (कुछ समय विचारमग्न हो पश्चात्) वत्स! चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं। तुम निश्चिन्त रहो। मैं दोहला पूर्ण कर तुम्हारी दुहिता को दीर्घायु करूँगा। वह बहुत भाग्यवान है।

देवसेन- (हर्षित हो आश्चर्य पूर्वक) महाराज!

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
13

चाणक्य- हाँ राजन्! तुम विश्वास रखो, दोहला पूर्ण होकर ही रहेगा। संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं जो मनुष्य न कर सके।

देवसेन- महाराज! आपके वचनों से ही हम मृतकों में जैसे प्राण लौट आये हैं।

चाणक्य- किन्तु एक शर्त है राजन्!

देवसेन- (नम्रता पूर्वक) कहिये गुरुदेव! हम अकिंचन आपकी क्या सेवा कर सकते हैं?

चाणक्य- कुछ कठिन और कठोर है भद्र! सोच-समझकर वचन दो।

देवसेन- अतिथि की सेवा करना हमारा धर्म है महाराज! सोचना समझना कैसा?

चाणक्य- फिर विचार कर लेना अत्युत्तम होगा।

देवसेन- गुरुदेव! बार-बार ऐसा सुनकर गृहस्थों की अतिथि-सेवा में लांछन लगता है। हम आपके कहने से पहले मन की बात जान पाते तो तुरन्त पूरी करते। पर दुर्भाग्य! ऐसी विद्या नहीं है हमारे पास।

चाणक्य- धन्य हो वत्स! तुम आर्य खण्ड के उज्ज्वल नक्षत्र हो। तुम्हें अपने दोहित्र को हमें दे देना होगा।

देवसेन- (किंचित् उदास हो (परन्तु तुरन्त ही आश्वस्त हो) तथास्तु महाराज!

चाणक्य- भद्र! हमारे वचनों से कष्ट हुआ हो तो क्षमा चाहेंगे।

देवसेन- नहीं महाराज! आप हमारे पूज्य हैं। हमें लज्जित न करें। जन्मते ही शिशु आपको सौंप दिया जायेगा।

चाणक्य- वत्स! ऐसा नहीं। तुम लालन-पालन करना जब तक वह आठ वर्ष का न हो जाए। तत्पश्चात् मैं ले जाऊँगा। उसका भविष्य सुन लो।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
14

तुम्हें अत्यन्त आनन्द होगा।

देवसेन- (हाथ जोड़कर) कृपा होगी गुरुदेव!

चाणक्य- भद्र! तुम देख रहे हो आज आर्य खण्ड की कितनी दुर्दशा है। इतनी स्वच्छन्दता परित्याप्त है कि समग्र देश अनेक भागों में विभक्त है। संगठन न होने के कारण हम शक्तिहीन दुर्बल हो रहे हैं। दुर्भाग्यवश किसी विदेशी शत्रु का आक्रमण हो गया तो हम कहीं के न रहेंगे। हमारा धर्म, हमारी संस्कृति सब नष्ट हो जायेगी। (दृढ़तापूर्वक एक निश्चित आवाज में) हम चाहते हैं वत्स! इस समस्या का समाधान हो, अतएव हमें ऐसे पुरुष की खोज है जो सम्पूर्ण आर्यखण्ड को एक सूत्र में बाँध ले। तुम्हारी रत्नावली के गर्भ में ऐसा ही रत्न छिपा है जो भविष्य में महान सम्राट होगा।

देवसेन- महाराज! कहीं आप उपहास तो नहीं कर रहे। हमारा दोहता (पोता) सम्राट बनने का स्वप्न कैसे देख सकता है स्वामिन्!

चाणक्य- इसे स्वप्न नहीं समझो भद्र! जो हम कह रहे हैं वह चिर सत्य और प्रत्यक्ष होने जा रहा है।

देवसेन- गुरुदेव!..

चाणक्य- हाँ महोदय! हम वह स्वप्न प्रत्यक्ष करके दिखलायेंगे। तुम्हें विदित होना चाहिये कि चंद्रमा पीने का इतना कठिन दोहला असाधारण माता को ही हो सकता है। जिसप्रकार पूर्णचंद्र तम विनाशक आह्लादकारी है उसी प्रकार गर्भस्थ शिशु भी भारत के लिये मंगलदायक होगा।

देवसेन- प्रभु करे आपके वचन सत्य हो। आर्य खण्ड का उद्धार हो।

चाणक्य- होगा (निश्चयात्मक स्वर में) ऐसा ही होगा।

देवसेन- आपके संरक्षण में ही हो सकता है गुरुदेव!

चाणक्य- शिक्षा तो मैं अपने ही संरक्षण में करूँगा, जन्म से ही बालक को माँ से पृथक करना महान अपराध होगा। यह अनर्थ हम न कर

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
15

सकेंगे। उसकी माँ की योग्यता के विषय में संदेह करना भूल है। अभी उसे
माँ की गोद में पनपने दो।
देवसेन- एवमस्तु! चलें गुरुदेव, आहार ग्रहण कर अतिथि सेवा का
सुअवसर प्रदान करें।
चाणक्य- अवश्यमेव। एक बात आवश्यक है। आज पूर्णिमा है,
आज की रात तुम्हारी पुत्री की मनोकामना पूर्ण होगी। एक काम करना होगा।
अपने उद्यान के बीचों-बीच एक छोटा मंडप बनवा लो। ऊपर का वितान
वस्त्र का नहीं बल्कि शाखा पत्तों का हो। साथ ही ऐसा प्रबंध करना होगा
ताकि मनचाहा आच्छादित कर सकें और हटा भी सकें। अरस्तु, इसी समय
सेवकों को समुचित आदेश दे दो ताकि यथा समय कार्य संपन्न हो सके।
देवसेन- आपकी आज्ञा शिरोधार्य
है महाराज, चलिये।
दोनों जाते हैं। परदा गिरना।
[ दृश्य-चौथा ]
( समय- द्वितीय प्रहर, मध्यरात्रि )
( उद्यान में एक छोटा सा मंडप है।
मंडप के ठीक बीचों-बीच एक काँसे की
थाली रखी है। चाणक्य, देवसेन विराजमान
हैं। आज्ञा पालन में सेवक भी तत्पर दिखाई देते हैं। निर्मल नीलाकाश में शरद
पूर्णिमा का चाँद मुस्करा रहा है। धवल दुग्ध फेनिल- चाँदनी इठलाती हुई
वसुन्धरा पर चारों ओर अपनी स्निग्धता बिखेर रही है।)
चाणक्य- सेवक! काँसे की थाली अमृतमय शर्करायुक्त दूध से
भर दो।
सेवक- (हाथ जोड़कर) आदेश पालन हो चुका है महाराज!
चाणक्य- (देवसेन से) भद्र! देख रहे हो चंद्र कितना शांत और
16 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

मनोरम प्रतीत हो रहा है।
देवसेन- हाँ गुरुदेव! ऐसा लगता है जैसे नील नभ में कोई शिशु
मुस्करा रहा है। चाँदनी भली सुहावनी लग रही है।
चाणक्य- कल्पना करो कि जैसा ये शशि इतने बड़े समस्त विश्व को
आनंददायी और इसी पूर्णचंद्र को कोई उदरस्थ कर ले तो क्या उस नारी के
गर्भ का शिशु शशि जैसा ही आनंदकारक न होगा?
देवसेन- (हर्ष से रोमांचित हो) आप जैसे साधुओं के आशीर्वाद से
सब कुछ संभव है महाराज!
चाणक्य- अच्छा, तो अब बुलाओ आयुषमति पुत्री को। प्राचीन
आचार्यों का कथन है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा में अमृत झरता है।
आज हम वही अमृत रत्नावली को पिलायेंगे ताकि समस्त आर्य खंड का
उद्धारक यशश्वी पुत्ररत्न उत्पन्न हो। (आदेश देते हैं) सेवक जाओ! देवी
रत्नावली को ले आओ। प्रथम अपना कार्य समझ लो।
सेवक- कहिये गुरुदेव! आज्ञा पालन में सेवक तत्पर है।
चाणक्य- जिस समय देवी दुग्धपान करें, उस समय तुम्हें चुपचाप
शनैः शनैः मंडप का ऊपरी खुला भाग इस प्रकार ढंकना होगा, जिससे थाली
में दिखता हुआ चंद्र का प्रतिबिंब क्रमशः लुप्त हो जाये और यह रहस्य गुप्त
रहे।
सेवक- ऐसा ही होगा महाराज! (जाता है पुन: रत्नावली को लेकर
प्रवेश)
चाणक्य- आओ देवी रत्नावली! बोलो तुम्हारी क्या अभिलाषा है?
हम उसे तत्क्षण पूरा करेंगे!
रत्नावली- महाराज! बस एक ही कामना है। मुझे प्रतिक्षण ऐसा
लगता है कि इस खिले हुये आकाश कुसुम को समूचा निगल जाऊँ।
जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य 17

चाणक्य- एवमस्तु! उठो, आओ हम आज मंत्र-बल से तुम्हें
चंद्रपान करायेंगे। (मंडप के पास सब आते हैं) पुत्री! देख रही हो थाली!
रत्नावली- गुरुदेव! मुझे थाली नहीं अपितु पूर्णचंद्र प्रतिभाषित हो
रहा है। क्या सचमुच चंद्र है?
चाणक्य- हाँ पुत्री! निस्संदेह यह चन्द्र है।
देवसेन- रत्नावली गुरुदेव पहुँचे हुये साधु हैं। मंत्रबल से उन्होंने इस
थाली में चंद्र को उतारा है।
चाणक्य- आयुषमति रत्नावली! तुम प्रसन्नता पूर्वक इस चंद्रमय
दुग्ध का पान कर सकती हो।
रत्नावली- (हर्षित हो) सच पी लूँ!
चाणक्य- हाँ, हाँ निःसंकोच।
(रत्नावली दूध पीने लगती है। ज्यों-ज्यों दूध कम होता जाता है,
त्यों-त्यों सेवक मंडप को शाखा पत्रों से आच्छादित करता जाता है। रत्नावली
दुग्धपान कर आश्वस्त होती है)

रत्नावली- आपके आशीर्वाद से आज मुझे बहुत काल के पश्चात्
तृप्ति मिली है गुरुदेव! अब मैं पूर्णतः संतुष्ट हुई।
देवसेन- महाराज! आपने आज मेरी बड़ी भारी चिंता का निवारण
किया है। मैं हर्ष विह्वल हूँ। आपका चिर-कृतज्ञ रहूँगा गुरुदेव! (पुत्री से)
तुम विश्राम करो रत्ना।
रत्नावली- (जाती हुई) नमस्कार गुरुदेव!
चाणक्य- हमारा कार्य समाप्त हुआ भद्र! हम जाना चाहेंगे।
देवसेन- इतने शीघ्र गुरुदेव! कुछ दिन इस अकिंचन का आतिथ्य
ग्रहण करें।
चाणक्य- नहीं भद्र! हमारा चिर-अभिलाषित उद्देश्य पूर्ण हुआ। हम
पुनः अपने आश्रम लौट जायेंगे। हमें आर्य खंड के विस्तृत साम्राज्य की नींव
18 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

डालनी है।

देवसेन- इस अहोरात्रि में कहाँ जायेंगे? सूर्योदय तक तो रुके महाराज!

चाणक्य- तक्षशिला पहुँचने तक कई अहोरात्रि चलना होगा भद्र! रुक कर समय नष्ट करना व्यर्थ है। अच्छा, चलते हैं!
देवसेन- (दुखित हो) नमस्कार गुरुदेव! अपने पुत्र का ध्यान रखें।
चाणक्य- अवश्यमेव। तुम निश्चित रहो।
(चाणक्य जाते हैं। देवसेन, सेवक हाथ जोड़ कर अन्यमनस्क से खड़े विदाई देते हैं)

[दृश्य-पाँचवाँ]

(9 वर्ष पश्चात्)

आर्य चाणक्य मयूर नगर में-

(मयूर नगर के उद्यान में बालक खेल रहे हैं। एक शिला पर चंद्रगुप्त आकर बैठता है। कई बालक क्रमशः अमात्य, प्रतिहारी, सभासद, अभियोगी, अंगरक्षक आदि का अभिनय कर रहे हैं। दो बालक अंगरक्षक के रूप में ताड़ वृक्षों के पंखे लेकर नरेश चंद्रगुप्त पर मंद-मंद व्यजन¹ डुला रहे हैं। दो-चार बालक अंगरक्षक बनकर हाथ में लाठी लिये हुये नियुक्त हैं। कुछ बालक जमीन पर पालथी मारे बैठे हैं जो कि सभासद बनकर सभा की शोभा बढ़ा रहे हैं। पास ही दूसरी शिला अमात्य जयदेव के लिये है। सभा प्रारम्भ होती है। कुछ बालक प्रार्थी बनकर नरेश से न्याय कराने हेतु प्रस्तुत होते हैं) (चाणक्य ओट से देखते हैं)।

प्रतिहारी- (उच्च स्वर में) सावधान! राज-राजेश्वर प्रतापी सम्राट चंद्रगुप्त पधार रहे हैं।
(पूरी सभा खड़ी हो जाती है। चंद्रगुप्त का प्रवेश। सब अभिवादन करते हैं)

  1. पंखा

जैन सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य
19

चंद्रगुप्त- (सिंहासन पर बैठकर) सभासदो! अब हमारी सभा प्रारम्भ हो रही है। प्रतिहारी, उन अभियोगी नागरिकों को उपस्थित करो। उनका न्याय होगा।

प्रतिहारी- जो आज्ञा महाराज! (जाता है)

चंद्रगुप्त- (सभासदों से) उपस्थित सदस्यगण! आप लोग भी ध्यान पूर्वक अनुयोग सुनें। न्याय करने में आपकी सम्मति अपेक्षणीय है।

सभासद- (समवेत स्वर से) अवश्यमेव महाराज!

(प्रतिहारी का एक बालक को लिये हुए प्रवेश)

बालक- राजन्! मेरी माँ अस्वस्थ है। उनसे कृषिकार्य नहीं सम्भल रहा। आप हमारे माई-बाप हैं। हमें उड़बाना कराना है। मजदूरी देने के लिये हमारे पास पैसे नहीं हैं।

चंद्रगुप्त- घबराओ नहीं नागरिक! जब तक तुम्हारी माता पूर्णतः स्वस्थ नहीं हो जाती तब तक राज्य की ओर से कुछ कर्मचारी नियत कर दिये जायेगे जो तुम्हारी खेती का कार्य निपटवा देंगे। उनका वेतन राज्यकोष से दिया जायेगा।

बालक- धन्य हो महाराज! आपने मेरी बड़ी भारी चिंता का निवारण क्षण मात्र में कर दिया। मैं आपका अनुग्रही हूँ। (जाना)

(द्वितीय बालक का प्रवेश)

चंद्रगुप्त- कहो नागरिक! तुम क्या चाहते हो?

बालक- महाराज! समस्या बड़ी कठिन हो गई। शासन से कुछ सहायता की अपेक्षा है।

चंद्रगुप्त- किस प्रकार की सहायता चाहते हो जीवक!

बालक- बुआ का विवाह है। बारातियों को ठहराने के लिये योग्य वसंतिका की आवश्यकता है।

जैन सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य
20

चंद्रगुप्त- अवश्यमेव! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। प्रबंध की चिंता मत करो।

बालक- कृतज्ञ हुआ राजन्! (प्रस्थान)

चाणक्य- (स्वगत ओट में खड़े होकर) कितना सुन्दर प्रतिभाशाली बालक है। बिल्कुल राजाओं जैसा अभिनय कर रहा है। भव्य ललाट, विशाल वक्षस्थल, कीर जैसी नासिका, अजानु बाहें सभी लक्षण चक्रवर्ती सम्राट के द्योतक हैं।

(प्रतिहारी एक बालक को लाता है। बालक देवपाल बहुत रोष में है)

देवपाल- (क्रोधित होकर) राजन्! मेरी छोटी बहिन रामवती को सुमित्र ने अपशब्द कहे हैं। मुझे उस पर रोष आ रहा है। आपके शासन काल में स्त्री जाति का अपमानित होना घोर अनर्थ है।

जयदेव- शांत हो देवपाल, शांत हो। अपराधी को अवश्य दण्ड मिलेगा।

चंद्रगुप्त- स्पष्ट कहो देवपाल! क्या बात हुई? सुमित्र तो तुम्हारा मित्र है।

देवपाल- (क्रोधित अवस्था में) था, अब नहीं है। कल संध्याकाल बहिन रामवती बालू के घरौंदे बना रही थी, सुमित्र ने उसके घरौंदे में लात मार दी, रामवती रोने लगी तो सुमित्र हँस पड़ा, दोनों में कुछ कहा-सुनी हो गई। इसी बीच सुमित्र ने दुर्बचन कहे।

चंद्रगुप्त- प्रतिहारी! सुमित्र को इसी समय उपस्थित करो!

प्रतिहारी- जो आज्ञा महाराज! (जाता है)

चंद्रगुप्त- (जयदेव से) महामात्य! सुमित्र को क्या दण्ड दिया जाये?

जैन सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य
21

नाटक

जयदेव- महाराज! आप स्वयं समझदार हैं, यदि आज्ञा हो तो सभासदों की सम्मति ले ली जाये!

चन्द्रगुप्त- अवश्यमेव मंत्रिवर! (सभासदों से) सदस्यगण! नारी की मर्यादा का उल्लंघन करने वाला कौन सा दण्ड का पात्र है?

पहला सभासद- महाराज! उसकी जीभ कटवा देना उचित है।

दूसरा सभासद- महाराज! उसे मल्लों से मूँसे लगवाना चाहिये।

तीसरा सभासद- उसके मुँह में मिर्च भरनी चाहिये। (प्रतिहारी सुमित्र को लिये हुये प्रवेश)

प्रतिहारी- आर्य सुमित्र उपस्थित है महाराज! (सुमित्र नतमस्तक है)

चन्द्रगुप्त- आर्य सुमित्र! क्या तुमने आर्य देवपाल की भगिनी को दुर्वचन कहे?

सुमित्र- (सहते हुये) राजन्!..

चन्द्रगुप्त- (कड़ककर) सच-सच कहो सुमित्र।

सुमित्र- महाराज!..

चन्द्रगुप्त- तुमने नारी मर्यादा का उल्लंघन कर अनैतिक कार्य किया है सुमित्र! कठोर दण्ड भुगतने के लिये तैयार हो जाओ।

सुमित्र- (साहस से भरकर) राजन्! दण्ड सहर्ष स्वीकार है किन्तु अपराध की क्षमा भी चाहता हूँ, भविष्य में पुनः ऐसी भूल करने का दुस्साहस नहीं करूँगा।

चन्द्रगुप्त- विश्वास हेतु प्रमाण दो सुमित्र!

सुमित्र- राजन्! साक्षी की क्या आवश्यकता? जबकि मैं स्वयं आपसे वचनबद्ध हूँ और फिर आप जैसे न्यायप्रिय नृपेन्द्र की सभा में कोई पुरुष अनैतिक आचरण करने का साहस भी कैसे कर सकता है महाराज! एक बात और भी है, मनुष्य दुनियाँ की आँखों में धूल झाँक सकता है पर अपनी में नहीं। (दृढ़ता पूर्वक) राजन्! मेरी साक्षी में मैं और मेरे वचन हैं।

चन्द्रगुप्त- साधु सुमित्र! तुमने अपराध स्वीकार कर महानता का परिचय दिया है। जिस राज्य में ऐसे महापुरुष हों, उस राज्य की दिनों-दिन उन्नति होगी। हम तुम्हें क्षमा करते हैं, आशा है कि तुम अपने वचनों के प्रति जागरूक रहोगे।

सुमित्र- आप आश्वस्त रहें सम्राट।

चन्द्रगुप्त- सभासदो! आपकी क्या सम्मति है?

सभासद- (समवेत) आपका निर्णय मान्य है राजन्!

चन्द्रगुप्त- सभा की कार्यवाही अब समाप्त होती है।

चाणक्य- (सहसा सभा में प्रवेश कर) राजन् मेरी भी आपसे प्रार्थना है।

चन्द्रगुप्त- निःसंकोच कहें। आप कौन हैं एवं किस हेतु यहाँ पधारे हैं?

चाणक्य- राजन् मैं ब्राह्मण हूँ। गोधन न होने के कारण मैं गौरस से वंचित हूँ, कृपया एक गाय प्रदान करें।

चन्द्रगुप्त- (उदारता पूर्वक) विप्रवर! सामने गायें चर रही हैं, अपनी इच्छानुसार चुन लीजिये।

चाणक्य- (कृत्रिम भीत होते हुये) नहीं राजन्! ये गायें हम कैसे ले सकते हैं? इनका स्वामी रोकेगा तो?..

चन्द्रगुप्त- भयभीत मत होओ ब्राह्मण (किंचित् रोष पूर्वक) किसमें साहस है जो राजा चन्द्रगुप्त की आज्ञा की अवहेलना कर सके।

चाणक्य- (मुस्कराकर) ओह! चन्द्रगुप्त! आप यहाँ के राजा हैं! (कुछ याद करते हुये) स्वागत चन्द्रगुप्त?। धृष्टता क्षमा हो राजन्! मुझे विस्मरण हो गया था।

चन्द्रगुप्त- कोई बात नहीं विप्रवर! आप हमारे गुरु तुल्य हैं। अच्छा अब हमारी सभा की कार्यवाही समाप्त होती है। हम लोग अभी राजसभा का अभिनय कर रहे थे। यहाँ मैं आपकी और सेवा कर सकता हूँ। मेरे निवास-स्थान को चलें तो यथायोग्य अतिथि सत्कार कर अपने को कृतार्थ कर सकूँगा। (सब खड़े हो जाते हैं)

चाणक्य- बालक! एक बात बता सकोगे? तुमने हमें गुरु कहा है। क्या हमारे साथ चलकर विद्या अध्ययन करोगे? हम तुम्हें पूर्ण शिक्षित बना देंगे।

चन्द्रगुप्त- (सहर्ष) सच! मुझे पढ़ने की लालसा है गुरुदेव! मैं आपके साथ अवश्य चलूँगा।

चाणक्य- कहीं तुम्हारे माता-पिता ने नहीं जाने दिया तो?

चन्द्रगुप्त- यह असंभव है गुरुदेव! मेरी आकांक्षाओं पर नियंत्रण नहीं है।

चाणक्य- दृढ़प्रतिज्ञ दिखते हो।

चन्द्रगुप्त- यदि मनुष्य अपना लक्ष्य निर्धारित कर ले एवं उसकी प्राप्ति में कटिबद्ध हो जाये तो निश्चय ही वह अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है।

चाणक्य- तुम्हें विश्वास है वत्स! कि तुम्हारे माता-पिता तुम्हें अनुमति देंगे?

चन्द्रगुप्त- नहीं देंगे तो मैं उन्हें अनुमति के लिये बाध्य करूँगा, उन्हें देना ही पड़ेगी गुरुदेव! मेरे पिता हैं नहीं, मातृश्री और मातामह हैं। पिता मेरे

जन्म के पूर्व ही युद्ध क्षेत्र में वीर गति को प्राप्त हो गये थे।
चाणक्य- वत्स! तुम मेरे लिये पहेली बनते जा रहे हो, तनिक अपना दाहिना हाथ तो दिखाओ?
चन्द्रगुप्त हाथ बढ़ा देता है, चाणक्य हाथ देखकर
चाणक्य- ओह! चक्रवर्ती सम्राट के सभी लक्षण मिल रहे हैं। चन्द्रपान का दोहला! (विचारते हुए) कदाचित इसी की माता को हुआ होगा।
चन्द्रगुप्त- आप क्या कह रहे हैं गुरुदेव? (सरलता और बचपन का भोलापन मुख पर झलक रहा है)।
चाणक्य- (सावधान हो) कुछ नहीं वत्स! यूँ ही कुछ पुरानी स्मृतियाँ जाग गई थीं। … हाँ तुम हमारे साथ चलो। हम आर्य देवसेन से भेंट कर तुम्हारी माता से मिलेंगे।
चन्द्रगुप्त- (मुस्कुराकर) गुरुदेव मेरे मातामह से मिलना चाहते हैं? चलें, मुझे जानकर प्रसन्नता हुई।
चाणक्य- (हँसते हुए) ओह! तो तुम उनके दोहित्र हो? निश्चय ही देवी रत्नावली तुम्हारी माता हैं।
चन्द्रगुप्त- गुरुदेव का अनुमान सत्य है। ज्ञात होता है हमारे घराने से आपका पूर्व परिचय है?
चाणक्य- निःसंदेह! तुम्हारा चन्द्रगुप्त नामकरण मैंने ही तुम्हारे जन्म के पूर्व किया था। (प्यार से पीठ थपथपाते हुए)
चन्द्रगुप्त- चलें गुरुदेव! मैं यह शुभ संवाद शीघ्रातिशीघ्र सबको सुनाना चाहता हूँ।
चाणक्य- चलो। (सब जाते हैं)

पटाक्षेप

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
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[दृश्य-छठवाँ]

अलक्षेन्द्र सिकंदर का सेनापति शैलाश सेल्यूकस है। सिकंदर काबुल आदि देश विजित करता हुआ इस समय पारस देश में है। सेना कुछ दिन यहाँ विश्राम करेगी। सेल्यूकस सिकंदर का मुख्य सेनापति तो है, साथ ही अत्यंत विश्वस्त साथी भी है। सिकंदर के भारत विजय अभियान में उसका एक निकट संबंधी है जो क्षुद्रवृत्ति का है, नाम है फिलिप्स। सिकंदर पारस से अपने विश्वस्त सेनापति सेल्यूकस और फिलिप्स के साथ कुछ सैनिकों को गुप्तवेश में तक्षशिला की राजनीति आदि का पता लगाने भेजता है। सेल्यूकस पत्नी के निधन के उपरांत एक मात्र प्रिय पुत्री हेलेन को कभी आँखों से ओझल नहीं होने देता। इस समय भी वह साथ में है।

तक्षशिला में

विश्वविद्यालय के पास नदी किनारे पुत्री हेलेन के साथ शैलाश अश्वों पर आता है। दोनों अपने घोड़े एक पास ही वृक्ष से बाँध देते हैं और नदी किनारे टहलने लगते हैं।

हेलेन- (आनंदातिरेक से) कितना रम्य प्रदेश है। यहाँ की नदी पर्वतमालायें कितनी सुहावनी लगती हैं। बर्फ से ढँकी चोटियाँ चाँदनी में ऐसी लग रही हैं जैसे इन पर धुली श्वेत चादर बिछी हो, किंवा¹ इन चोटियों को किसी कुशल स्वर्णकार ने चाँदी से मढ़ दिया हो।
शैलाश- हाँ बेटी! यहाँ का सब अनोखा ही है। प्रकृति की सभी विचित्र विलक्षणतायें यहाँ पर निष्पार पा रही हैं।
हेलेन- सचमुच प्रकृति सुन्दरी नवोढ़ा के रूप में सदा सर्वत्र विचरती रहती है। कैसा शांत मनोरम वातावरण है यहाँ का।
शैलाश- यह क्षेत्र विद्यापीठ के अंतर्गत आता है हेलेन! यहाँ राजनीति का नाम भी सुनाई नहीं पड़ता। आभराज यहाँ का राजा होते हुए भी

  1. अथवा/या

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
26

विद्यालय में उसकी कोई सत्ता नहीं है, कोई शासन नहीं। अद्भुत है यह देश।
विद्यालयों में नरेश भी साधारणजन की तरह हैं।
हेलेन- यह तो सबसे बड़ा आश्चर्य है पिदर! जहाँ अपने राज्य में भी राजा की कोई महत्ता न हो।
शैलाश- पहिले तो मुझे इस बात का विश्वास ही नहीं हुआ किन्तु छानबीन करने के पश्चात् यही सत्य ज्ञात हुआ। विद्यापीठ का महत्त्व यहाँ पर सबसे अधिक है। समूचे आर्यावर्त के राजकुमार यहाँ जन साधारण की तरह सुख वैभव से दूर रहकर विद्या अध्ययन करते हैं।
हेलेन- (आश्चर्य पूर्वक) राजकुमार!
शैलाश- हाँ हाँ राजकुमारों के महलों में आचार्य नहीं जाते बल्कि राजकुमार विद्यार्थी बनकर यहाँ शिक्षा प्राप्त करते हैं। बड़े-बड़े राजे महाराजाएँ पाँव प्यादे चलकर विनय पूर्वक आचार्य के पास आते हैं। विद्यालय के क्षेत्र में वाहनों का उपयोग निरी मूर्खता ही समझा जाता है। वाहनों के अतिरिक्त राजा लोग अपनी राजसी प्रतीकों को भी पृथक् कर देते हैं।
हेलेन- अध्यापकों का पद सर्वश्रेष्ठ ही नहीं महानतम भी माना जाता है।

शैलाश- यह सब बड़ा विचित्र ज्ञात होता है। यद्यपि गुरुकुल राजनीति से दूर रहता है तथापि राजनीति सीखने सब यहाँ नहीं आते हैं।
हेलेन- अच्छा! यहाँ केवल राजनीति ही सिखाई जाती है?
शैलाश- नहीं बेटी! सब कुछ। शास्त्र संचालन से लेकर लौकिक पारलौकिक सभी प्रकार की विद्या का केन्द्र है तक्षशिला। छन्द, व्याकरण,

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
27

दर्शन, तर्क, ज्योतिष, वैद्यक, राजसी चिकित्सा इत्यादि जाने क्या-क्या पढ़ाया जाता है।

हेलन- आपने कितने नाम गिना दिये पिदर! क्या एक ही विद्यार्थी इतनी सब विद्या ग्रहण कर लेता है?
शैलाक्ष- यों तो सब विद्यार्थी अपनी-अपनी योग्यतानुसार अध्ययन करते हैं परन्तु राजकुमारों का सभी विद्याओं में पारंगत होना अनिवार्य है। यहाँ का शिक्षित विद्यार्थी सर्वोत्कृष्ट माना जाता है।
हेलन- आश्चर्य है पिदर! मालूम होता है प्रकृति ने सभी वरदान यहाँ पर उड़ेल दिये हैं। प्राकृतिक सौंदर्य के साथ यहाँ के मानव का आंतरिक सौन्दर्य भी प्रशंसनीय है। पर… (विचार मग्न हो जाती है)
शैलाक्ष- अरे! अभी-अभी चहकने वाली चिड़िया अचानक चुप क्यों हो गई? किस विचार में पड़ गई हेलन!
हेलन- मुझे युद्ध की सुधि आ गई पिदर! देव-पुत्र ऐसी सुरम्य शस्य श्यामला वसुन्धरा पर रक्त की सरिता बहा देंगे। कहाँ होंगे ये आदर्श? कहाँ रहेगी इनकी संस्कृति? सब कुछ युद्ध की दाहक ज्वाला में भस्मीभूत हो जायेगा। मुझे अत्यन्त हृदय विदारक दुःख हो रहा है, मेरा जी घबराने लगा है।
शैलाक्ष- तू बहुत मृदु स्वभाव की है हेलन! तुझे तो मैं यूनान में छोड़ आता तो अच्छा रहता। पर मेरे अतिरिक्त घर में है भी कौन? अकेली किसके सहारे छोड़ता, यह कठिन समस्या थी। नहीं-नहीं तुझे मैं अपनी आँखों से ओझल नहीं रख सकता, तू अपनी माँ की एक मात्र निशानी है, पर यहाँ लाकर भी मैं पछता रहा हूँ, युद्ध से तू आतंकित हो उठी है।
हेलन- हे पिदर! यदि आप मुझे न लाते तो इस सुनहले देश के दर्शन कैसे होते? … अच्छा ये बताइये कि किसी तरह भी यह युद्ध, नरसंहार रोका नहीं जा सकता है?

28 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

शैलाक्ष- पागल है हेलन तू! भला विजेता की चाह कभी समाप्त हुई है। यह देवपुत्र अलक्षेन्द्र का विजय अभियान है। वे भारत विजय करके ही रहेंगे।
हेलन- (दुखित हो) तब तो बड़ा ही अनिष्ट होगा पिदर! युद्ध की विभीषिका अत्यन्त भयंकर होगी! उफ़ नर संहार कहाँ तक देखेगी ये आँखें। सुना है इस देश की अहिंसा में आस्था है। ऐसे अहिंसक सरल मानवों का संहार निश्चय ही करुणाजनक एवं निम्नकोटि का होगा। (आग्रह पूर्वक स्नेहासिक्त स्वर से) पिदर! रोकिये न इस युद्ध को। समझाइये देवपुत्र को।
शैलाक्ष- वीर शैलाक्ष की पुत्री के मुख से ऐसी कायरता पूर्ण बातें शोभा नहीं देती हेलन।
हेलन- नर संहार ही यदि वीरता का लक्षण है तो मैं बाज आई ऐसी वीरता से।
शैलाक्ष- बेटी! राजधर्म बड़ा कठोर है और उससे भी अधिक है मनुष्य की लिप्सा। ये कभी शांत नहीं होती। किसी भी कीमत पर इसकी प्रज्ज्वलित आग में ईंधन झोंकना ही पड़ता है।
हेलन- तब तो इसे ठंडी कर देना ही उपयुक्त है ताकि मानवता की क्षति न हो।

शैलाक्ष- तू पागल है हेलन! एकदम पागल है! लक्ष्मीपति ही दुनियाँ में सर्वश्रेष्ठ कहलाते हैं। ये दार्शनिक विचार तेरे मन में कहाँ से प्रवेश कर गये? जान पड़ता है इस भूमि का प्रभाव तुझ पर भी पड़ गया है। छोड़ व्यर्थ की बातों को। तनिक सी आयु में वृद्धों जैसी उदासीनता की बातें ले बैठी। (अचानक याद आती है) मैं बिल्कुल भूल गया हेलन खबररसां (गुप्तचर) मेरी राह देख रहा होगा। मैं यहाँ बातों में लग गया। तुम यहीं ठहरो, मैं थोड़ी देर में आता हूँ।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य 29

हेलन- मुझे यहाँ बहुत आनन्द आ रहा है। आप निश्चिंत हो अपना कार्य कर आइये।

(पूर्णिमा की चाँदनी पूर्ण रूप से खिल चुकी है। हेलन बालू पर लेट जाती है। यह अपना सिर एक हाथ के सहारे रखे है।)

हेलन- (स्वगत) सांध्य दृश्य देखा था, तब सूर्य ऐसा लग रहा था जैसे विशाल आग का गोला शांतेः शनैः ठंडा होता जा रहा है। दूसरी ओर उसका प्रतिद्वंद्वी चंद्र अपनी शीतलता लिये सर्वत्र शांति बिखेरता हुआ क्रमशः ऊँचा उठ रहा है। अब वह पूर्ण यौवन प्राप्त कर रहा है। सूर्य की उष्णता पूर्ण रूप से विलुप्त हो गई है… कदाचित इसी प्रकार अलक्षेन्द्र रूपी सूर्य का अवसान होकर कोई ऐसा ही पूर्ण चंद्ररूपी मानव यहाँ के निर्मल नभ में उदित हो जाये तो? भूमि का कोना-कोना चमत्कृत हो जन-जन शांति का आस्वादन कर सके। (दूसरे ही क्षण विषाद पूर्ण मुद्रा में) पर नहीं, युद्ध की विनाशकारी घटाओं का विघटन सहसा संभव नहीं। … मुझे इस देश से, यहाँ की संस्कृति से बेहद प्यार है। मुझे यूनान में जन्म न देकर यहाँ भारत में उत्पन्न किया होता तो कितना सुन्दर होता। प्रकृति ने कहीं भूल कर दी है।

(अचानक फिलिप्स का प्रवेश)

फिलिप्स- उस भूल को मैं सुधारूँगा। तुम्हारी अभिलाषा भारत को निवास-स्थल बनाने की है। तुम्हारा स्वप्न मैं साकार करूँगा। देवपुत्र भारत विजय कर लौटेंगे तब इस महान् साम्राज्य का महाक्षत्रप’ मुझे नियुक्त करेंगे ही। हम तुम दोनों इस देश के स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करेंगे। तुम यहाँ की साम्राज्ञी कहलाओगी और राजा होते हुये भी मैं तुम्हारा गुलाम।
हेलन- (व्यंग्य से) अपना सुन्दर भाषण एक ही साँस में कह गये
फिलिप्स! अब और कुछ कहना शेष है अथवा नहीं?

  1. वरिष्ठ शासक

30 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

कार्य कर आइये।

(अचानक फिलिप्स का प्रवेश)

फिलिप्स ! अब और कुछ कहना शेष है अथवा नहीं?

  1. वरिष्ट शासक

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

फिलिप्स- (हर्ष विभोर हो) कहना तो मुझे बहुत कुछ है पर तुम्हें देखकर सब कुछ भूल जाता हूँ। आँखें तुम्हारे सौंदर्य को पी लेना चाहती हैं। प्रत्यक्ष देखते हुये भी मन तृप्त नहीं हो पाता मेरी प्यारी हेलन ! हेलन- (क्रोध पूर्वक) अपनी मर्यादा के भीतर रहो फिलिप्स। सावधान ! यदि तुमने एक भी अनुचित शब्द कहा तो ।

फिलिप्स- तो क्या प्रिये !

हेलन- (क्रोधित हो) फिलिप्स !

फिलिप्स- क्रोध में भी तुम अत्यन्त सुन्दर और प्रिय लगती हो हेलन ! तुम्हारे गुस्से पर भी मैं न्योछावर हूँ प्रियतमे ! हेलन- मैं बार-बार सावधान करती हूँ फिलिप्स ! तुमसे बोलना तो दूर, मुझे तुम्हारी छाया से भी घृणा है।

फिलिप्स- (समझाते हुये) क्यों? क्या नहीं है मुझ में? विश्व विजेता देवपुत्र अलक्षेन्द्र का प्रेम पात्र होना सरल नहीं है हेलन ! मेरी पत्नी बनने पर तुम्हें भी यह सौभाग्य प्राप्त होगा।

हेलन- मैं कहती हूँ तुम यहाँ से शीघ्रातिशीघ्र चले जाओ। फिलिप्स- (हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचकर आलिंगन-बद्ध

करना चाहता है) तो इस यौवन का उपयोग कौन करेगा प्रिय? हेलन- (जोर से चिल्लाती है) अरे नीच अधम !.. पिदर फिलिप्स- चाहे जैसे अपशब्द कहो प्यारी ! पर एक बार ही सही, स्पर्श का सुख तो लेने दो।

(चंद्रगुप्त दौड़कर पीछे से पकड़ लेता है। हेलन और फिलिप्स आश्चर्य चकित रह जाते हैं)।

चंद्रगुप्त- तू कौन है नरपिशाच ! आश्रम के इस पवित्र स्थल में

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

एकांत में एकाकी नारी पर अत्याचार करने का तुझे दुस्साहस कैसे हुआ? फिलिप्स- (अपने छुड़ाने का दुष्प्रयास करते हुए) छोड़ दो मुझे। असमय में तुम राहु बनकर कहाँ से टपक पड़े?

चंद्रगुप्त- (व्यंग्यात्मक हास्य पूर्वक) छोड़ दो मुझे। क्यों अपने बाहुओं को भी छुड़ाने की सामर्थ्य नहीं है तुम में? इसी बल पर अकड़ रहे हो कायर कहीं के। मूर्ख ! तुम नारी मर्यादा भी नहीं जानते ! तो जान लो कि तुम्हें यही सिखाने मुझे नियति ने भेजा है। (छोड़ देता है)

फिलिप्स- (हाथ मलते हुए) यह हमारी आपसी बात थी। दो के

बीच में तीसरे का आ पड़ना असभ्यता है।

चंद्रगुप्त- चोरी और सीनाजोरी । नराधम ! लज्जा नहीं आती एक निःशस्त्र अबला नारी का सतीत्व हरण करते। (छोड़ देता है) देवी ! आप इस एकांत में अकेली क्यों विचरण कर रही हैं?

हेलन- वीरवर ! आपने ठीक समय पर आकर मेरी इस दुष्ट से रक्षा की है। मैं किन शब्दों में आपको धन्यवाद दूँ।

चंद्रगुप्त- धन्यवाद की आवश्यकता नहीं है देवी! यह तो प्रत्येक मानव का कर्तव्य है। मुझे आप लोग विदेशी ज्ञात होते हैं अन्यथा हमारे आर्यावर्त में ऐसे निकृष्ट काण्ड देखने-सुनने में नहीं आते विशेषकर गुरुकुल के वातावरण में तो असंभव ही है।

हेलन- मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे देश के प्रति भी विनम्र हूँ। यहाँ की पवित्र रज माथे पर चढ़ाती हूँ।

चंद्रगुप्त- देवी ! आपका परिचय?

हेलन- मैं देवपुत्र अलक्षेन्द्र सिकन्दर के सेनापति शैलाक्ष सेल्यूकस की पुत्री हूँ। पिता के साथ भ्रमणार्थ यहाँ तक्षशिला आई हूँ। यह फिलिप्स भी देवपुत्र का कुटुम्बी है। संध्या समय मैं और पिता यहीं सरिता के किनारे सांध्य 32 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

दृश्य अवलोकनार्थ आये थे कि रात्रि हो गई। अनायास किसी विशेष कार्यवश वे यहाँ से चले गये। इसी बीच यह फिलिप्स भी यहाँ आ धमका। मेरी रक्षा हेतु मानो देवी जोन ने आपको भेजा है।

चंद्रगुप्त- चलिये मैं आपके निवास स्थान तक पहुँचा दूँ। तनिक ठहरें मैं इससे निबट लूँ। (मुड़ कर फिलिप्स की ओर देखते हैं, वह भागता हुआ दिखता है) भाग गया। (व्यंग्य से मुस्कराते हैं) कायर पुरुष ! डर गया। अब इससे द्वन्द - युद्ध क्या किया जाये? (सैल्यूकस का प्रवेश) हेलन- पिदर, पिदर ! अभी-अभी मुझे अकेला पाकर वह आपका

फिलिप्स मुझसे अनुचित व्यवहार कर रहा था। अच्छा हुआ कि ये महोदय आ गये और मेरी रक्षा हो गई अन्यथा न जाने आज क्या होता? शैलाक्ष - अच्छा ! फिलिप्स? बधाई हो युवक ! तुमने मेरी पुत्री की रक्षा कर बड़ा उपकार किया है। मैं तुम्हारा आजीवन उपकृत एवं चिरऋणी रहूँगा।

चंद्रगुप्त- यह आपका सौजन्य है पर मेरा ही नहीं प्रत्येक भारतीय का यही कर्तव्य है। कर्तव्य प्रशंसा हेतु नहीं अपितु आंतरिक शान्ति हेतु किया जाता है।

शैलाक्ष- यह भी तुम्हारी महानता है युवक ! सुना था यहाँ की धरती सोना उगलती है पर मुझे अनुभव हुआ कि स्वर्ण से भी कहीं अधिक तुम जैसे संयमी वीर पुरुष भी उत्पन्न करती है। धन्य हैं, यहाँ के समस्त चेतन-अचेतन पदार्थ अनुपम श्लाघनीय हैं।

चंद्रगुप्त - कहिये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?

शैलाक्ष- नहीं, अब तुम्हें और अधिक कष्ट नहीं दूँगा। यदि आपत्ति न हो तो अपना परिचय दो ताकि हम अपने उपकर्त्ता को जान सकें । चंद्रगुप्त - आपत्ति क्या हो सकती है महोदय ! निर्भय सिंह की संतानों को भला छिपाव-दुराव से क्या प्रयोजन?

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

चन्द्रगुप्त- मैं इसी विद्यापीठ तक्षशिला का ब्रह्मचारी स्नातक हूँ। मेरा नाम चन्द्रगुप्त है। (हेलन की ओर संकेत कर) इनकी चीख मुझे यहाँ तक खींच लाई ।

शैलाक्ष- विशेष परिचय?

चंद्रगुप्त- तक्षशिला का विद्यार्थी होना हमारा गौरव है और यही परिचय भी। आप हमारे अतिथि हैं, आश्रम तक चलें, हमारे आचार्य देव से साक्षात्कार करें और हमारा आतिथ्य ग्रहण करें।

शैलाक्ष- तुमसे मिलकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई चंद्रगुप्त ! चलो हम तुम्हारे निर्माता गुरुओं का दर्शन कर अपना सौभाग्य समझेंगे। साथ ही हम तुम्हें भी अपने शिविर में आतिथ्य ग्रहण करने के लिये आमंत्रित करते हैं। कभी अवकाश निकालकर अवश्य आना। हम यूनानी भी अपने अतिथि का स्वागत करना जानते हैं।

चंद्रगुप्त- अवश्यमेव, आचार्यश्री की आज्ञा लेकर आऊँगा।… चलिये आश्रम !

(तीनों का प्रस्थान)

(मार्ग में शैलाक्ष एवं हेलन अपने-अपने अश्वों की वल्गा थामे हैं। तीनों मंथरगति से आश्रम की ओर बढ़ रहे हैं।)

शैलाक्ष- चंद्रगुप्त ! फिलिप्स हमारे देवपुत्र का निकटतम सम्बन्धी है। हो सकता है यहाँ से अपमानित होकर वह कोई उत्पात करे और तुम्हें परेशान करे।

चंद्रगुप्त- कायर में कितना साहस होता है हम भारतवासी खूब अच्छी तरह जानते हैं।

शैलाक्ष- (चिन्तित हो) मैं जानता हूँ तुम वीर हो फिर भी क्षुद्र वृत्ति का कायर जबकि उसे महान् शक्ति का आश्रय मिल जाये तो कुछ भी अनर्थ जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

करने में पीछे नहीं हटता।

चंद्रगुप्त- मैं हर समय प्रस्तुत

हूँ महोदय! आप दुश्चिंता से निवृत्त हों।

शैलाक्ष- मैं तुम्हारे शौर्य

साहस से प्रभावित हुआ हूँ चंद्रगुप्त!

फिर भी सावधान रहने का अनुरोध

स्वीकार करो क्योंकि कभी-कभी गीदड़ सिंह से भी अधिक भयानक हो उठते हैं।

चंद्रगुप्त- आप आश्वस्त हों, आपकी बात का ध्यान रखूँगा किन्तु नियतिचक्र अलख और अमिट भी है।

पटाक्षेप

[ दृश्य-सातवाँ ]

( तक्षशिला में चाणक्य अपनी शिष्य मंडली के साथ )

स्थान- विश्वविद्यालय का गुप्त मंत्रणा कक्ष

(प्रमुख शिष्य उपस्थित हैं। पार्वत्य प्रदेशों के राजकुमारों को जो कि यहीं अध्ययन रत हैं विशेष रूप से आचार्य चाणक्य ने मंत्रणागृह में आमंत्रित किया है)

चाणक्य- शिष्यो! अभी तक तुम शस्त्रास्त्र की शिक्षा पाते रहे हो। मुझे हर्ष है कि तुम सभी सर्व कलाओं में दक्ष हो चुके हो, अब तुम्हारे सन्मुख परीक्षा का कठिन अवसर उपस्थित है।

सब- (समवेत स्वर से) हम इस स्वर्ण अवसर का स्वागत करते हैं आचार्यश्री! परीक्षा हेतु सहर्ष प्रस्तुत हैं।

जयदेव- जिस घड़ी की हम प्रतीक्षा करते थे वह हमें अनायास ही प्राप्त हो गई है, विद्यार्थी के लिये इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है? आचार्यश्री आदेश दें।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

चाणक्य- तुम्हारा उत्साह देखकर हमें अत्यंत प्रसन्नता हुई है, आशा है तुम सब अपने कार्य में सफलता प्राप्त करोगे। तुम सिंह की संतान हो, सिंह स्वतंत्र और शूरवीर होता है, अकेला ही वन में राज्य करता है, तुम सब ऐसे ही वीर बनो।

सब- पूज्य आचार्यश्री का आशीर्वाद पाकर हम कृतकृत्य हुए। चाणक्य- हमारा आर्यावर्त सदा से स्वतंत्र रहा है किन्तु अब हमारी स्वतंत्रता को ग्रसने अलक्षेन्द्र सिकंदर राहु के समान चला आ रहा है। सिंहरण- हाँ गुरुदेव ! सुना है कि वह विपुल सेना लेकर विश्वविजय करने निकला है।

पुष्पभद्र- (गर्व पूर्वक) किन्तु हमारा देश इतना विशाल है कि वह डरकर स्वयं भाग जायेगा।

चाणक्य- तुम्हारा अनुमान गलत है पुष्पभद्र ! वह भागने वालों में से नहीं है। उसने लघु एशिया, मध्य एशिया, सीरिया, ईराक आदि देशों को जीत लिया है। ईरान में अखमनी वंश का विशाल शक्तिशाली साम्राज्य भी नष्ट- भ्रष्ट कर दिया, वहाँ सिकन्दर की विजय पताका फहरा रही है। पुण्डरीक- (साश्चर्य) सत्य ही अखमनीवंश भू-लुण्ठित हो गया? चाणक्य- विश्वस्त सूत्रों से ऐसा ही ज्ञात हुआ है कि अलक्षेन्द्र की महत्वाकांक्षा बहुत बढ़ी-चढ़ी है, वह छोटे से मकदूनिया राज्य के नायक फिलिप का पुत्र है। बचपन से ही विलक्षण बुद्धि वाला था परन्तु अब सब उसे देवपुत्र कहने लगे हैं।

(चंद्रगुप्त का प्रवेश)

चंद्रगुप्त- (जोश के साथ) वह देवपुत्र कहलाये अथवा साक्षात् ईश्वर, हम उसके ईश्वरत्व को चुनौती देंगे, उसकी अभिलाषाओं को कुचल देंगे। यह देश भारतवर्ष है, यहाँ के निवासी स्वातन्त्र्य प्रिय हैं, भारतीयों की जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

स्वतंत्रता का अपहरण करना खेल नहीं, लोहे के चने चबाना है, जो चबाने पर बिना चबे ही दाँतों को तोड़कर मुख के साथ-साथ नयनों से भी रक्तधार बहा देते हैं।

जयदेव- कुमार चंद्रगुप्त का कथन यथार्थ है गुरुदेव ! हम कंधे से कंधा मिलाकर लड़ेंगे।

चाणक्य- अभी तक तुम कहाँ थे चंद्रगुप्त ?

चंद्रगुप्त- आचार्यश्री ! क्षमा करें। मुझे आने में विलंब हुआ। चाणक्य- यह हमारे प्रश्न का उत्तर तो नहीं हुआ।

चंद्रगुप्त- आचार्यश्री ! मैं विषम परिस्थितियों से विवश था। (चारों ओर सतर्क हो देखते हैं)

चाणक्य- निःशंक होकर कहो सौम्य !

चंद्रगुप्त- गुरुवर ! मुझे विश्वस्त सूत्र से ज्ञात हुआ है कि नरेश आंभिराज सिकंदर से लोहा नहीं लेना चाहते, वह कायर है।

चाणक्य- ओह ! तुम इस रहस्योद्घाटन में लगे थे। तुम्हारी सूचना के पूर्व हम यही अनुमान लगा रहे थे, तुमने उसकी पुष्टि कर संशय को नष्ट कर दिया। हम आंभिराज के स्वभाव से परिचित हैं।

चंद्रगुप्त- (क्रोधावेश को संयत कर) अब हमें आदेश दें प्रभु ! कि हम उसके विरोध में अपने बल का उपयोग कर जीवन को सार्थक बनायें। चाणक्य- (समझाते हुए स्नेह पूर्वक) शीघ्रता न करो चंद्रगुप्त ! इस समय बलप्रयोग निरी मूर्खता होगी, हम अभी संख्या में बस इतने ही तो हैं, अभी से शत्रुता मोल लेना उचित नहीं, समय की प्रतीक्षा करनी होगी। चन्द्रगुप्त- प्रतीक्षा का परिणाम भयानक होगा गुरुदेव ! चाणक्य- बलप्रयोग उससे भी भयंकर होगा चन्द्रगुप्त ! नादानी से क्षति हाथ लगेगी, धैर्य पूर्वक सोच समझ कर एक-एक पग आगे बढ़ाना जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

होगा।

जयदेव- आचार्यश्री ! यद्यपि हम सब वीर हैं तथापि अन्य सभी बातों का अभाव है जो कि एक रणकुशल योद्धा के लिये होना अनिवार्य है। चाणक्य- क्या तुम उन अभावों को बतला सकते हो?

जयदेव- अवश्य गुरुदेव ! यह तो निश्चित हो गया कि आंभिराज में वह शौर्य नहीं कि वह सिकंदर का सामना कर सके। वह अलक्षेद्र का स्वागत लड़कर नहीं, हँसकर करेगा। हमें कोई प्रमुख व्यक्ति चाहिए। चाणक्य- हम सब जिसे योग्य समझेंगे उसी को मुखिया मान लें तो हमारा लक्ष्य सिद्ध हो सकता है।

पुष्पभद्र- आपका सुझाव सुन्दर है आचार्यवर ! पर अन्य समस्याओं का समाधान कैसे हो?

सिंहरण- पुष्पभद्र का कथन उचित है गुरुदेव ! यदि हम किसी को राजा मान लें तो उसके लिये हमें सेना चाहिये। सेना के भरण-पोषण के अर्थ आर्थिक व्यवस्था अनिवार्य है।

चाणक्य- तुम्हारे विकल्प उचित हैं शिष्यो ! निहत्थे निर्धन होकर रणक्षेत्र में नहीं कूदा जाता। चंद व्यक्तियों से शासनतंत्र नहीं चल सकता। हमने दोनों उपाय कर लिये हैं। तुम सबको शिक्षा देने के शेष अवकाश में हम चुप नहीं बैठे हैं।

जयदेव- आचार्यश्री ! क्या हम सब उन उपायों से अवगत होने के पात्र हैं?

चाणक्य- अवश्य, अवश्य। हमने आदिवासियों की बहुत बड़ी सेना का संगठन किया है जो कि समय पर काम आयेगी।

सिंहरण- सेना का संगठन !

पुष्पभद्र- तब हम अकेले नहीं हैं।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

चाणक्य- बिल्कुल नहीं। सैकड़ों सहस्रों की संख्या में तुम्हारे साथी अनेकों वीर हैं किन्तु अभी हम उनसे तुरन्त ही संपर्क नहीं करेंगे। (दृढ़ता से) अन्य योजनाएँ समय आने पर ही जान सकोगे जयदेव ! संप्रति इतना ही समझ लो कि हमें समस्त लघु राज्यों का संगठन कर एक अखंड राज्य की स्थापना करनी है। राष्ट्र को आचूल परिवर्तन कर सुव्यवस्थित शक्तिशाली बनाना है ताकि आर्यखंड गौरवशाली होकर दिग्-दिगंत में अपनी कीर्ति प्रसारित कर सके।

सिहंरण- आपका स्वप्न अत्यधिक उत्कृष्ट है गुरुदेव ! साकार होना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है।

चाणक्य- हाँ, हमें भगीरथ प्रयत्न करने होंगे आयुष्मान् ! समय आने पर अकेला चना भी भाड़ फोड़ सकता है।

चन्द्रगुप्त- केवल लगन की आवश्यकता होती है। हमें प्रथम लघु राज्यों के पारस्परिक वैमनस्यों को नष्ट कर उन्हें संगठित करना होगा। एक राज्य की पुनः नये सिरे से नींव रखनी होगी। हमें ही अपनी सबल भुजाओं से उसकी एक-एक ईंट चुननी होगी सिंहरण।

जयदेव- हम प्रतिज्ञा करते हैं कि जब तक हम अपने राष्ट्र से विदेशी आक्रांताओं को खदेड़ नहीं देंगे तब तक चैन नहीं लेंगे।

सब- (समवेत स्वर में) हम सभी प्रतिज्ञाबद्ध हैं।

चाणक्य- (उत्साहित हो) तुम्हारा उत्साह देखकर हमें अत्यन्त प्रसन्नता है। हम तुम्हारा अभिनन्दन करते हैं। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि तुम अपने-अपने उत्तरदायित्व का योग्यता पूर्वक निर्वाह कर सकोगे। हमारा आशीर्वाद है कि तुम कृत संकल्प हो पूर्ण विजयी बनो। चन्द्रगुप्त- आपका आशीर्वाद हमारा संबल रहेगा। आप हमें आदेश दें ताकि हम सब आपके पूर्व नियोजित पथ पर अग्रसर हों।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

चाणक्य- इसलिये सबको एकत्रित किया है । (आदेशात्मक स्वर से) चंद्रगुप्त !

चंद्रगुप्त- जो आज्ञा !

चाणक्य- अलक्षेन्द्र संभवतः दो अहोरात्रि में तक्षशिला में प्रवेश करेगा। तुम्हें हम आदेश देते हैं कि उसके शिविर में जाकर यूनानी सैनिक पद्धति सीखो ताकि भविष्य में हमारे काम आ सके। साथ ही सेना का अनुमान लगाना न भूलना ।

चंद्रगुप्त- आपकी आज्ञा शिरोधार्य

है महामन् !

जयदेव- आचार्यश्री सेना का

अनुमान लगाना तो समझ में आया पर

उसकी सैनिक पद्धति कैसे सीखी जायेगी?

क्योंकि रंग-रूप में, पूर्व-पश्चिम में

अत्यन्त भिन्नता है । कुमार चंद्रगुप्त

सीखना तो क्या उल्टे शत्रु के शिकंजे में

फँसकर बेमौत मारे जायेंगे ।

चाणक्य- यह असंभव है जयदेव !

चंद्रगुप्त का जीवन बड़ा लम्बा है । अभी उसे महान् कार्यों की लम्बी अनुक्रमणिका विश्व के सम्मुख प्रस्तुत करनी है । उसे मारने वाला कहीं उत्पन्न नहीं हुआ ।

जयदेव- गुरुदेव ! फिर भी कार्य कठिन है । वहाँ पर चंद्रगुप्त को भेजना साक्षात् काल के मुख में भेजने के समान है । कृपया आप मुझे आदेश दें, यह कार्य मैं सम्पन्न करूँगा ।

चंद्रगुप्त- (निर्भय हो) जयदेव ! आचार्यश्री के आदेश से भ्रमित मत जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

बनो। हमें उनके इंगित पर चलना ही श्रेयस्कर है। फल की ओर लक्ष्य अनुचित है।

जयदेव- (विनीतभाव से) क्षमा करें प्रभु ! धृष्टता हुई। स्नेह कभी- कभी पथ से स्खलित कर देता है।

चाणक्य- (मुस्कराकर) युगल मित्रों की जोड़ी अमर रहे।

चंद्रगुप्त - मैं चलता हूँ गुरुदेव ! (चरण स्पर्श करना)

चाणक्य- चिरंजीव रहो वत्स ! तुम्हारा पथ निष्कंटक हो ।

(प्रस्थान)

पटाक्षेप

[ दृश्य-आठवाँ ]

(चंद्रगुप्त शैलाक्ष के शिविर में अतिथि बनकर आया है। इस समय वह मैदान में एक वृक्ष की छाया में बैठा है। संध्या समय है।) चन्द्रगुप्त- (स्वगत) आज मुझे यूनानी पद्धति से पूरी सैनिक शिक्षा दे दी। अलक्षेन्द्र को भी मेरा अभी तक विशेष परिचय नहीं मिला। शिविर के समस्त कर्मचारी मुझे केवल शैलाक्ष का सामान्य अतिथि समझते हैं। आचार्यश्री के आदेशानुसार सभी कार्य समाप्त हो गये, अब शीघ्रातिशीघ्र यहाँ से चल देना उपयुक्त है ताकि गुरुदेव से मिलकर भविष्य की रूपरेखा बनाई जा सके। कल शैलाक्ष से धन्यवाद पूर्वक विदा ले लेनी चाहिये। (हेलन का प्रवेश, वह चंद्रगुप्त को ढूँढ रही है।)

हेलन- अहा ! कैसा सुन्दर दृश्य है। प्रतीची दिशा माँग में सिन्दूर भरे कौसुम्बिका चीनांशुक पहिने वघूटी सी प्रतीत हो रही है। (सहसा चंद्रगुप्त को देख) मैं कब से तुम्हें ढूँढ़ रही हूँ अतिथि और तुम यहाँ बैठे हो? चंद्रगुप्त- कल मुझे जाना है हेलन ! (मुस्कराते हुये) अतः आज से जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

अकेले रहने का अभ्यास कर रहा हूँ।

हेलन- (दुखित हो) सच ! कल चले जाओगे? रहो न कुछ दिन

और। ऐसी भी क्या जल्दी है?

चंद्रगुप्त- नहीं रह सकता हेलन ! बस इतना ही अवकाश मिला था। नहीं पहुँचूँगा तो अध्ययन की क्षति होगी और गुरु आज्ञा की अवहेलना । हेलन- परन्तु मुझे अच्छा नहीं लगेगा।

चंद्रगुप्त- एक दिन तो जाना ही होगा हेलन ! हमारे देश में कहावत है ‘पाहुन आये न घर बसे, गये न ऊजड़ होय’ । अच्छे-बुरे का प्रश्न ही नहीं उठता।

हेलन- पुरुष सचमुच बड़े निर्मम होते हैं।

चंद्रगुप्त- ये दोषारोपण मिथ्या हैं हेलन ! मैं यहाँ से चला जाऊँगा पर तुम्हारा आतिथ्य भूल न सकूँगा। तुम्हारी सुधि विवश हो आती ही रहेगी। हेलन- (उदास हो) मुझे तो बहुत सूना-सूना लगेगा चंद्रगुप्त। मुझे तुम्हारे देश से प्रेम है। तुम्हारे रहने से ऐसा लगता है जैसे सारा आर्यावर्त सिमट कर तुममें ही साकार हो गया हो इसलिये मैंने तुम्हारे देश की भाषा, साहित्य, धर्म आदि का भी तुमसे अध्ययन किया है।

चन्द्रगुप्त - हेलन ! तुमने यूनानी होते हुये भी भारतीय हृदय पाया है, अद्भुत है तुम्हारी रुचि ।

हेलन- राजकुमार चंद्रगुप्त ! मुझे यहाँ की संस्कृति अत्यन्त प्रिय है। जब मैं यहाँ की बातें सुनती हूँ तो हर्ष विभोर हो उठती हूँ। ऐसा प्रतीत होता है मानों यह जादू का देश है। इसमें सब कार्य अप्रतिहत गति से स्वचलित होते रहते हैं। मधुर-मधुर निस्पंद शांति का मन्द-मन्द प्रवाह बह रहा है। सब जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

अलौकिक सम्मोहक शक्ति की छाया से सम्मोहित हैं।

चंद्रगुप्त- राजकन्या…!

हेलन- (बात काटकर) मैं कितनी बार तुमसे अनुरोध कर चुकी हूँ अतिथि कि मुझसे राजकन्या न कहा करें। मैं तुम्हारे मुख से केवल हेलन ही सुनना चाहती हूँ। मुझे यही सम्बोधन प्रिय है।

चंद्रगुप्त- राजकन्या कहने से तुम्हारी क्या क्षति होती है? हेलन- बहुत बड़ी! इसमें स्नेह का पुट नहीं अपितु परायेपन का आभास होता है जैसे कोई मुझसे आत्मीयता छीन रहा हो, मैं तुम्हारी पुजारिन हूँ अतिथि।

चंद्रगुप्त- (मुस्कराते हुये) इससे लाभ?

हेलन- भक्त देवता का उपासक होता है, लाभ-हानि पर विचारने का उसके पास अवकाश कहाँ? ना ही उसे इससे कुछ प्रयोजन है। चंद्रगुप्त- विवेक की आँखों से सोच कर देखो हेलन! चार दिन की चाँदनी में लीन हो जाने को बुद्धिमानी तो नहीं कहा जा सकता? हेलन- क्यों? जीवन में कभी दैव दुर्लभ अमृत की बूँदें प्राप्त होने पर केवल इसीलिए उसका आस्वादन न किया जाये कि वे पुनः प्राप्त न होंगीं तो इससे बढ़कर और कौन-सी मूर्खता होगी? अमृत की एक बूँद विष भरे कुम्भ में लक्ष-लक्ष गुनी उत्कृष्ट एवं तृप्तिदायक होती है।

चंद्रगुप्त- यदि भ्रम से तुम विष को ही अमृत समझ बैठी हो तो? हेलन- (दृढ़ता से) नहीं, आर्यावर्त जैसे पवित्र देश से मैं पूर्णतः इस ओर से आश्वस्त हूँ राजकुमार! मैं यहाँ रम जाना चाहती हूँ। चंद्रगुप्त- तुम्हारी विचारधारा सुन्दर है किन्तु भारतीय और यूनानी जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

संस्कृति अत्यन्त भिन्न है, दोनों का मिलन असम्भव है और जो कार्य असंभव है, बुद्धिमान उसका विचार भी नहीं करते।

हेलन- (उदास किंतु दृढ़ स्वर से) राजकुमार चंद्रगुप्त ! मैं एक बात से आपको अवगत करा देना चाहती हूँ कि देवपुत्र अलेक्जेंडर ने असंभव को संभव कर दिखाया है। एक छोटे से राज्य के अधिपति होकर आज वे विश्व विजेता नाम सार्थक कर रहे हैं।

चंद्रगुप्त- परन्तु मैं तुम्हारे अलक्षेन्द्र का स्वप्न धूमिल कर दूँगा हेलन ! जब तक जीवित हूँ तब तक उत्तरापथ की वसुन्धरा उसके पदक्रांत से आघात न पा सकेगी।

हेलन- (हर्ष से पुलकित हो) सच ! मैं आपका कोटि-कोटि

अभिनन्दन करती हूँ राजकुमार ! आप अपनी संस्कृति व देश के एकमात्र रक्षक होंगे। आप मेरे स्नेह के केन्द्र तो थे ही श्रद्धास्पद भी हो गये। मैं विनम्र आपको नमन करती हूँ।

चंद्रगुप्त- तब तुम अपने रत्नेश अलक्षेन्द्र के प्रति विद्रोहिणी कहलाईं हेलन ।

हेलन- नहीं, आपका आरोप मुझे स्वीकार नहीं। (किंचित् क्रोधित हो) बल्कि मानवों की नृशंस हत्या तथा मानवीय, आध्यात्मिक संस्कृति नष्ट करने वाले से मेरा विरोध है। आप देशभक्त हैं। देश रक्षा के विचारों का प्रवाह आपकी रग-रग में प्रवाहित हो रहा है, अतः आप मेरे लिये आदरणीय भी हैं। चंद्रगुप्त- तुम्हारे उदार विचार सम्मान के पात्र हैं हेलन ! किन्तु… हेलन- किन्तु क्या अतिथि? किस बात की चिंता है?

चंद्रगुप्त- मुझे तुम्हारी सरलता पर करुणा आती है हेलन ! तुम्हारे अंतर में बचपन का भोलापन निवास करता है। जीवन के कंटकाकीर्ण पथ जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

की बाधाओं से तुम नितांत अनभिज्ञ हो ।

हेलन- विघ्न बाधाओं को पार करना दुःसाध्य है, असाध्य तो नहीं। चंद्रगुप्त- ये पूर्वीय पश्चिमीय दो संस्कृतियों का प्रश्न है हेलन। तुम समझ नहीं पा रही हो।

हेलन- फिर भी दोनों संस्कृतियों में मानवता को आश्रय है

राजकुमार ! मैं समझती हूँ कि संस्कृतियों में मत भिन्नता होते हुये भी कलह को स्थान नहीं है।

चंद्रगुप्त- तुम्हारे मत स्वागत योग्य हैं हेलन ! परंतु विचार करो क्या एक ही सरिता के दोनों तट कभी मिल पाये हैं?

हेलन- आपका कथन उचित है। तट न मिलें परन्तु दोनों के मध्य

सेतु तो बाँधा जा सकता है और इस प्रकार हमारे अभीष्ट की पूर्ति हो जाती है। चंद्रगुप्त- रूढ़ियों का भयानक विस्फोट उसे ध्वस्त भी कर

सकता है।

हेलन- हानि क्या है? सेतु टूट जायेगा और उस पर चलने वाले

पथिक जन आपस में घुल मिल जायेंगे। जो निर्बल हैं अस्तित्व खो देंगे जिनकी भुजायें सबल हैं वे अपने पुरुषार्थ से पार होंगे और ज्ञात है अतिथि ! बलवान का कोई विरोधी नहीं होता, उसके सामने सिर उठाने का साहस किसी में नहीं है।

चन्द्रगुप्त- तुम यूनानी नारी हो हेलन ! क्या कर सकोगी?

हेलन- यदि आर्यावर्त की वीरांगना न बन सकी तो यहाँ की संस्कृति में आत्मसात् हो सकने में कौन सी बाधा है? नारी का प्रबल पवित्र स्नेह उसकी उदारता, अनुपम त्याग उसके ये प्रकृति प्रदत्त जन्मसिद्ध नैसर्गिक गुण भी छीनने में कोई समर्थ है?

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

चंद्रगुप्त- तुम्हारा उत्कट प्रेम, तर्क अकाट्य हैं। सचमुच नारी के धीरोदात्त स्वभाव पर मुझ जैसे सहस्रों चंद्रगुप्त न्योछावर हैं हेलन ! तुम अवश्य ही अपने लक्ष्य बिंदु तक पहुँच सकोगी।

हेलन- आपकी शुभ कामनाओं के लिये धन्यवाद देती हूँ और उसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा करूँगी।

(फिलिप्स का प्रवेश)

फिलिप्स- किस स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में हो हेलन?

हेलन- (क्रोधित हो) तुम छाया की तरह मेरे पीछे क्यों लगे रहते हो?

फिलिप्स- क्योंकि मैं अपने और तुम्हारे बीच किसी दूसरे प्रेमी को सहन नहीं कर सकता। (चंद्रगुप्त की ओर क्रूर दृष्टि से देखता है) हेलन- तुम बच नहीं सकते फिलिप्स ! तुम्हें हमारे अतिथि के अपमान करने का कोई अधिकार नहीं। अपनी सीमा से बाहर जाने का असफल प्रयास मत करो।

फिलिप्स- सीमा से बाहर तुम जा रही हो हेलन ! जबकि मैं तुम्हारे पिता से तुम्हें माँग चुका हूँ।

हेलन- किंतु मेरे पिता ने मुझे तुम्हारे हाथ में सौंपने का वचन नहीं दिया।

फिलिप्स- यह प्रश्न विचारार्थ प्रस्तुत है।

हेलन- तो कान खोल कर सुन लो फिलिप्स ! मैं तुम्हें स्पष्ट बता देना चाहती हूँ कि मेरा तुम्हारे साथ ब्याह नहीं होगा, मैं स्वतन्त्र हूँ। मैं तुम्हारी कभी नहीं हो सकती, कभी नहीं हो सकती। मेरे तुम्हारे विचार सर्वथा भिन्न हैं।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

फिलिप्स- (क्रोधान्ध हो) चुप रहो हेलन ! मैं अपने और तुम्हारे मध्य आने वाले को समाप्त कर दूँगा। तुम्हें अपना बनाकर ही रहूँगा। (चंद्रगुप्त पर तलवार से वार करता है। चंद्रगुप्त असावधान होते हुये भी अपने कौशल से वार बचा जाता है पश्चात् पीछे हट कर म्यान से तलवार निकाल लेता है। दोनों में युद्ध होने लगता है। दोनों में कुछ समय तलवारें चलती हैं। चंद्रगुप्त फिलिप्स की तलवार के दो टुकड़े कर देता है और स्वयं रुक जाता है)

चंद्रगुप्त- क्या इसी बल कौशल पर लड़ रहा था। दूसरा खड्ग हाथ में ले। हम भारतीय निहत्थों पर शस्त्र नहीं चलाते ।

(शैलाक्ष का प्रवेश)

शैलाक्ष- (दूर से) ये क्या हो रहा है? खड्ग के टुकड़े कैसे पड़े हैं? चंद्रगुप्त- (शांत भाव से) यूँ ही, फिलिप्स मुझसे द्वन्द्व युद्ध करना चाहता था।

हेलन- (बीच ही में) द्वन्द्व युद्ध नहीं। फिलिप्स अतिथि पर धोखे से वार कर उन्हें मार डालना चाहता था किन्तु ये अपने कौशल से वार को बचा गये पुनः फिलिप्स की तलवार दो टूक कर दी, अब राजकुमार चंद्रगुप्त, फिलिप्स को द्वन्द्व युद्ध के लिये ललकार रहे हैं।

शैलाक्ष- (फिलिप्स से) चंद्रगुप्त के हनन का कारण?

फिलिप्स - कारण स्पष्ट है सेनाध्यक्ष ! हेलन मेरी है और मेरी रहेगी। शैलाक्ष- (क्रोध में) किस अधिकार से अपनी कह रहे हो

फिलिप्स ! हेलन मेरी पुत्री है, उसके भविष्य के निर्माता तुम कौन? फिलिप्स - मैं कौन हूँ? यह समय बतलायेगा हेलन किसकी होगी? इसका निर्णय मेरी तलवार…

(तलवार कहते हुये उसकी दृष्टि तलवार के टुकड़ों पर जाती है जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

और वह चुप होकर लंबे-लंबे डग भरता हुआ जाने लगता है) शैलाक्ष- (मुस्कराते हुये) बोलते-बोलते चुप क्यों हो गये फिलिप्स! क्या यही लोहे के टुकड़े निर्णय करेंगे ? चंद्रगुप्त - (व्यंग्य पूर्वक) फिलिप्स ! द्वंद्व युद्ध किये बिना ही कैसे लौट पड़े? यों निमंत्रण देकर दूसरों को कोरा नहीं रखा जाता। खैर जाओ, अब आना तो शस्त्रास्त्रों से खूब लैस होकर ताकि हम दोनों को मिलने में सुविधा रहे। (फिलिप्स क्रोधित हो एक बार लौटकर देखता है और फिर तीव्र गति से चला जाता है)

शैलाक्ष- आज लक्षण शुभ नहीं दिख रहे । फिलिप्स उस चोट खाये सर्प की तरह है जो चोरी छिपे अवश्य अपने विष दाँतों को गड़ाये बिना न रहेगा।

चंद्रगुप्त - गड़ाने के पूर्व ही मैं उसके विष दंत उखाड़ दूँगा सेनाध्यक्ष । शैलाक्ष- मुझे विश्वास है कि तुम उसे अवश्य ही किये का फल चखा सकोगे।

हेलन- ये बातें हम यहीं भुलाकर समाप्त कर दें, वातावरण को परिवर्तित कर आनन्द में मुखरित कर लें।

शैलाक्ष- चलो ! अपने डेरे पर चला जाये।

(तीनों प्रस्थान)

पटाक्षेप

[ दृश्य-नौवाँ ]

समय- प्रातःकाल का प्रथम प्रहर

शैलाक्ष का शिविर

(शिविर में चंद्रगुप्त और हेलन बैठे हैं। हेलन भारतीय गीत गा रही है। उसका कंठ अत्यन्त मधुर एवं सुरीला है)

हेलन अपनी वीणा पर गा रही है-

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

अहा! यह कैसा रम्य प्रदेश ॥

हिम किरीट सम शुभ्र हिमांचल ।

चरणों में सागर जल चंचल ॥

खेल रहा है वक्ष स्थल पर।

लहर लहर सरिताओं का जल ॥

सुन्दर सा मन भावन पावन, देता शुभ सन्देश ! अहा! यह कैसा रम्य प्रदेश ॥

खेत यहाँ कैसे लहराते ।

कृषकगण फूले न समाते ॥

ढोल मंजीरे बज उठते जब ।

झूम-झूम सब मिलकर गाते ॥

सुख-वैभव धन-धान्य सुपूरित चिन्ता दुख नहीं लेश! अहा! यह कैसा रम्य प्रदेश ॥

यहाँ ज्ञान मंदाकिनि बहती।

जन-जन को संबोधन करती ॥

ईर्ष्या-द्वेष कलह को तज दो।

धारण करो सीख यह महती ॥

इस धरती से कभी न बिछडूं, वर दो यह देवेश! अहा! यह कैसा रम्य प्रदेश ॥

चंद्रगुप्त- हेलन! तुम्हारा कंठ कितना सुरीला है। सचमुच तुमने सतत् अभ्यास से हमारे देश का भी मधुर संगीत सीख लिया है। तुम्हारी लगन व बुद्धि अति तीक्ष्ण है।

हेलन- मेरी नहीं अतिथि! शिक्षण देने वाले की निपुणता है जिन्होंने अल्प समय में ही परिश्रम करके मुझे सिखाने का कष्ट किया। मैं आजीवन जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

आपकी आभारी हूँ अतिथि ।

चन्द्रगुप्त- हेलन…!

(चार सैनिकों का प्रवेश)

हेलन- (क्रोध में) सैनिको ! तुमने बिना मेरी अनुमति के मेरे कक्ष में प्रवेश करने की धृष्टता क्यों की?

पहला सैनिक- (विनम्र हो) क्षमा करें राजकन्या ! सम्राट की आज्ञा है।

हेलन- (कुछ शांत हो) सम्राट की आज्ञा है? (क्षणेक विचारकर) बोलो ! क्या चाहते हो?

पहला सैनिक- आप विश्राम

करें राजकन्या ! हमें केवल इनसे

(चन्द्रगुप्त की ओर संकेत कर)

प्रयोजन है। (अन्य सैनिकों से)

साथियो !..

(अन्य सैनिक तत्काल

चन्द्रगुप्त को बंदी बनाने के लिए बढ़ते हैं)

चन्द्रगुप्त- सावधान ! अगर एक भी पग आगे बढ़ाया तो सबको काट कर फेंक दूँगा। मुझे बन्दी बनाने का दुष्प्रयास मत करना। (तलवार चमका कर खड़ा हो जाता है। उसका रौद्र रूप देखकर सैनिक सकपका जाते हैं)। पहला सैनिक- आप रुष्ट न हों अतिथि ! सम्राट ने आपको इसी क्षण बुलाया है। हमें यही आदेश है। यद्यपि यह आतिथ्य के विरुद्ध है तथापि हम सम्राट के आदेश पालन के लिए बाध्य हैं।

चन्द्रगुप्त- जाओ ! अपने सम्राट से कह दो कि अतिथि बन्दी बनकर नहीं आ सकता।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

हेलन- सैनिको ! पिदर कहाँ हैं ? पहले उन्हें बुलाओ, इसके पश्चात् ही अतिथि को यहाँ से ले जा सकोगे।

पहला सैनिक- महासेनाध्यक्ष सम्राट के दरबार में उपस्थित हैं। उनका यहाँ आना असंभव है। (चन्द्रगुप्त से) आप हमारे जाने-माने अतिथि हैं। आपके पराक्रम से हम पूर्णतः परिचित हैं किन्तु हम सम्राट के सेवक हैं, उनकी आज्ञा पालन करना हमारा कर्तव्य है। हम आपको ससम्मान ले चलेंगे।

हेलन- (आँखों में आँसू भरे रुद्ध कण्ठ से) अतिथि ! तुम मत जाओ। मेरा जी घबरा रहा है। मत जाओ अतिथि ! मत जाओ।

चन्द्रगुप्त- मुझे जाना ही होगा हेलन ! सिंह चुनौती को कभी अस्वीकार नहीं करता।

हेलन- तब ठहरो सैनिक ! मैं भी चलूँगी। (अंतर्कक्ष में वस्त्र बदलने जाती है)

चन्द्रगुप्त - हेलन ! हम सब चलते हैं, विलंब उचित नहीं, तुम आ जाना।

हेलन- सैनिकों से भी अधिक शीघ्रता है तुम्हें अतिथि !.. अच्छा, चलो मैं अभी आई ।

पटाक्षेप

[ दृश्य-दसवाँ ]

(चन्द्रगुप्त सहित सैनिकों का प्रस्थान )

(विशाल प्रांगण में अलक्षेन्द्र की सभा भरी हुई है। अलक्षेन्द्र सिंहासन पर बैठे हैं। पास ही पीठिका पर महासेनाध्यक्ष शैलाक्ष विराजमान हैं। एक ओर सेनापति फिलिप्स है। अन्य दरबारी सामंतगण बैठे हैं। चारों जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

सैनिक चन्द्रगुप्त को लेकर पहुँचते हैं। हेलन भी तत्काल आकर अपने नियत स्थान पर बैठ जाती है)

अलक्षेन्द्र - (सरोष) सैनिको ! चन्द्रगुप्त को बन्दी क्यों नहीं बनाया? चन्द्रगुप्त- (उपहास के स्वर में) यह असम्भव है सम्राट ! चन्द्रगुप्त को जीवित कैद नहीं किया जा सकता। इसे बालकों का खेल मत समझिये । फिलिप्स- (खड़े होकर जोश के साथ) अच्छा ! तुम्हारा यह

दुस्साहस !.. चन्द्रगुप्त ! सम्राट की मर्यादा रखो।

चन्द्रगुप्त- मर्यादा तुम रखो फिलिप्स ! सम्राट तुम्हारे हैं, मेरे लिये एक आक्रांता से अधिक और कुछ नहीं।

अलक्षेन्द्र- (आवेश में) उद्धत युवक ! तुम पद की मर्यादा न रखो पर उम्र का तो तुम्हें ध्यान रखना ही चाहिये, क्या तुम्हारे देश में विनय शालीनता नहीं है।

चंद्रगुप्त- हमारे देश में विनय बालकों को घुट्टी में घोल कर पिलाई जाती है अथवा यों कहिये कि हमारे संस्कार विनय पर ही आधारित हैं किन्तु आक्रांता की विनय कैसी? युद्ध के अतिरिक्त उसके स्वागत का दूसरा कोई विकल्प शेष नहीं।

अलक्षेन्द्र- (प्रसन्न मुद्रा में) बधाई है युवक ! बधाई है ! तुम्हारा उत्तर प्रशंसनीय है। एक प्रश्न और है, आशा है तुम सच बताओगे कि आक्रांता के शिविर में आने का क्या प्रयोजन है?

चंद्रगुप्त- भारतवासी असत्य संभाषण करना नहीं जानते सम्राट ! आपके महासेनाध्यक्ष शैलाक्ष का मैं अतिथि हूँ। पूर्व आमंत्रण पर आतिथ्य हेतु यहाँ आया हूँ। आतिथ्य के साथ ही मुझे यूनानी पद्धति से सैनिक प्रशिक्षण सीखने का तथा देखने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

फिलिप्स- मैंने ठीक ही सूचना दी थी सम्राट! मुझे संदेह था कि अवश्य ही यह कोई गुप्त भेदिया है। महासेनाध्यक्ष का व्यवहार भी आपके प्रति उचित नहीं जान पड़ता।

शैलाक्ष- (क्रोधावेश में) विवेक से काम लो फिलिप्स! मैं अपनी स्वामी-भक्ति पर लांछन सहन नहीं कर सकता।

फिलिप्स- पद की ओट में आप यह कलंक छिपा नहीं सकेंगे

महासेनाध्यक्ष!

चंद्रगुप्त- (गम्भीर हो) महासेनाध्यक्ष सचमुच ही निष्कलंक हैं। कलंकी तुम हो फिलिप्स! तुम्हारा चारित्रिक पतन ही हमारे परिचय का साधन बना।

फिलिप्स- चुप रहो चंद्रगुप्त! चोरी और सीनाजोरी।

चंद्रगुप्त- (व्यंग्य से मुस्कराते हुये) ओह! मालूम पड़ता है ‘मेंढ़की को भी जुकाम हो गया है’। आज किस बल के संबल पर अकड़ रहे हो फिलिप्स! भूल गये दो-दो बार मैंने तुम्हें क्षमा किया है और तुम भीगी बिल्ली की नाईं सिर झुका कर चले गये हो। द्वंद्व युद्ध के नाम पर तुम सदैव भागे हो। भारतीय वीर बालक वृद्ध, नारी एवं युद्ध से भागे हुये कायर पर कभी वार नहीं करते, यही कारण है कि अब तक तुम सकुशल हो।

फिलिप्स- द्वन्द्व युद्ध! यह तो कभी भी किया जा सकता है। चंद्रगुप्त- तब मैं प्रस्तुत हूँ। निकालो अपनी तलवार।

अलक्षेन्द्र- द्वंद्व युद्ध की अनुमति मैं नहीं देता चंद्रगुप्त! तुम अपराधी हो। चंद्रगुप्त- (साश्चर्य) मैं अपराधी! किस अपराध पर मुझे सैनिक घेरे में रखा गया है। मैंने कोई अपराध नहीं किया।

अलक्षेन्द्र- हमारे शिविर में आकर गुप्त रहस्यों का लेना अपराध जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

नहीं है?

चंद्रगुप्त- अवश्य है सम्राट ! किन्तु मैंने इस निकृष्ट कार्य का विचार भी नहीं किया। मैं विद्यार्थी हूँ। मैंने केवल आपकी युद्धकला ही देखी सीखी है। मन में कुतूहल जागा कि जो एशिया के विशाल राज्यों को पददलित करता हुआ अनेक नदी हिमशिखरों को लाँघकर तक्षशिला तक आ पहुँचा है, जिसके नाम से आर्यों का महावीर्य भी विचलित हो उठा है, जिसकी भृकुटी देखकर महादेश उसके चरणों में लेटने लगे हों, उस पराक्रमी को देखने की आकांक्षा प्रबल हो उठी। मैं मैसिडन नरेश को देखने का लोभ संवरण न कर सका।

अलक्षेन्द्र- (मुख पर किंचित् मुस्कराहट आती है पर तुरन्त गम्भीर हो जाते हैं) नागजाल में फँसाने का प्रयास मत करो युवक ! तुम यहाँ बन्दी हो, अपने देश को भूल जाओ।

चन्द्रगुप्त - यह असम्भव है सम्राट ! मातृभूमि कभी भुलाई नहीं जा सकती। बंदी बनना न बनना मुझ पर निर्भर है, आप पर नहीं।

अलक्षेन्द्र- (उपहास करते हुये) जान पड़ता है अविवेकी भी हो। चन्द्रगुप्त- कदाचित् मैं नहीं, आप हैं।

अलक्षेन्द्र- (क्रोधपूर्वक) सैनिको ! कैद करो ।

(चारों सैनिकों में से बंदी बनाने का साहस किसी में नहीं होता, चंद्रगुप्त अपने दोनों हाथों में तलवार लिये चारों ओर सतर्क दृष्टि से देखता है)

चंद्रगुप्त - मुझे ज्ञात नहीं था कि विश्वविजय का महत्वाकांक्षी पुरुष इतना भीरु, कायर है कि एकाकी विद्यार्थी से भयभीत हो गया। अलक्षेन्द्र- (सरोष) एक युवक से हम भयभीत क्या हो सकेंगे? जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

किन्तु मुक्त करना भविष्य में संकट को निमंत्रण देना है। हमारे देश की युद्ध कला के प्रशिक्षण का और क्या अभिप्राय हो सकता है चंद्रगुप्त ? चंद्रगुप्त- आपसे युद्ध करने का अभिप्राय नहीं अपितु स्वदेश की रक्षा का ही अभिप्राय है।

अलक्षेन्द्र- हूँ… ऊँ… अपनी तलवारें हमें सौंप दो चंद्रगुप्त ! चंद्रगुप्त- किसलिये ?

अलक्षेन्द्र- (भेद भरी दृष्टि से देखते हुये) उफ् ! तुम बहुत उद्दंड हो युवक ! तुम्हें किस मूर्ख ने शिक्षा दी है।

चंद्रगुप्त- सावधान सम्राट ! मेरे पूज्यपाद आचार्य के प्रति आप अशिष्ट वचन नहीं कह सकते। अपने वचनों पर संयम रखें।

अलक्षेन्द्र- चल-चल बड़ा आया संयम सिखाने वाला। वही है न तेरा गुरु काला-कलूटा ब्राह्मण चाणक्य ।

चन्द्रगुप्त - (ललकारते हुये) सम्राट !

अलक्षेन्द्र - निर्लज्ज ! तुझे शर्म नहीं आती लाल-लाल आँखें दिखाते। हमें क्या समझा है? कुशल है कि अभी तक तू मुक्त है। हमारे एक संकेत मात्र पर तेरे खंड-खंड हो सकते हैं।

चंद्रगुप्त- (निर्भीकता से) जीवन में मृत्यु अनिवार्य है सम्राट ! आज और कल में कोई अंतर नहीं पड़ता। जो अनिवार्य है उससे क्या डरना? पर हाँ एक बात अवश्य जान सका हूँ कि साधारण जन की और एक सम्राट की बुद्धि में कोई अंतर नहीं। आपकी भरी सभा में सभी आपके सेवक हैं। चारों तरफ दूर तक आपका शिविर लगा हुआ है फिर भी मुझ जैसे अकेले युवक पर कई सैनिकों की तलवारें तनी हुई हैं। पिंजड़े में बंद कर सिंह को धमकी देने वाले गीदड़ यूनान में ही होते हैं। सिंह की खाल में छिपा हुआ

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

विजयी सम्राट् अलक्षेन्द्र भी एक भीगा गीदड़ ही है ।

अलक्षेन्द्र- (क्रोध से काँपते हुये) दूर हट जाओ सैनिको ! फिलिप्स ! इसे यूनान की वीरता दिखला दो । (सैनिक पीछे हट जाते हैं)

चंद्रगुप्त- (हँसकर) फिलिप्स ! बेचारा क्या खाकर वीरता

दिखलायेगा । (सरोप) सम्राट् ! वीरता लुटेरों, चरित्रहीनों में नहीं हुआ करती, वह तो केवल आर्यावर्त्त के वीरों को ही वरण करती है । (फिलिप्स इस चुनौती को सभा के सामने अस्वीकार नहीं कर पाता । वह तलवार से चन्द्रगुप्त पर वार करता है । पर चन्द्रगुप्त उसकी तलवार को दो टूक कर अपनी तलवार चमकाता हुआ विद्युत वेग से चला जाता है) (सारी सभा चित्रलिखित सी देखती रह जाती है । चंद क्षणों के पश्चात् अलक्षेन्द्र जैसे नींद से जागता है)

अलक्षेन्द्र- एक अकेला युवक तुम सबके सामने से निकल गया । छिः… फिलिप्स ! तुम भी न रोक सके?.. सैनिको ! चंद्रगुप्त को तत्काल जीवित या मृत पकड़ कर हमारे समक्ष लाओ । (सैनिकों का प्रस्थान) महासेनाध्यक्ष शैलाश ! तुमने शत्रु को अतिथि बनाकर उचित नहीं किया । शैलाश- सम्राट् ! मैं उसकी वीरता पर न्योछावर था । उसने दो-दो बार मेरी पुत्री हेलन की फिलिप्स से रक्षा की है । हेलन पर फिलिप्स की आँखें गड़ी हुई हैं । मैं चन्द्रगुप्त के प्रति कृतज्ञ हूँ फिर भी मैंने उसे अपने साम्राज्य विस्तार के विषय में ही अपना अतिथि बनाया । इस देश की विजय में हमें उससे बहुत कुछ सहयोग मिल सकता था । उसका हाथ से निकल जाना अनिष्ट की आशंका का सूचक है ।

अलक्षेन्द्र- किन्तु तुमने इसके पूर्व कुछ भी नहीं बताया । शैलाश- मैं उचित अवसर की प्रतीक्षा में था ।

56 जैन सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य

अलक्षेद्र- शीघ्र निर्णय कभी-कभी अनुचित भी हो जाता है। यदि मुझे किंचित् भी आभास मिला होता तो ऐसा अनर्थ न होता, न ही फिलिप्स का दुस्साहस बढ़ता ।

अलक्षेद्र- (सरोष) फिलिप्स ! तुमने अपने ही देश की बेटी के साथ दुर्व्यवहार कर जघन्यतम अपराध किया है, अतः दंड के पात्र हो। तुम्हें सेनापति पद से हटाया जाता है। आज से तुम साधारण सैनिक हो। स्मरण रहे यदि भविष्य में यह भूल पुनः दुहराई गई तो तुम्हें अपने जीवन से भी हाथ धोना पड़ेगा। जाओ, मेरी आँखों से ओझल हो जाओ। (फिलिप्स का प्रस्थान)

शैलाक्ष- सम्राट ! हमें यहाँ पर विलम्ब हो रहा है। पूर्व योजना के अनुसार हमें पंचनद प्रदेश पर शीघ्रातिशीघ्र आक्रमण करना होगा ताकि सैनिक प्रमादी न हों। आंभिराज की क्या खबर है?

अलक्षेद्र- (प्रसन्नता से) शुभ संवाद है महा सेनाध्यक्ष ! एक हजार टेलेंट में वह मूर्ख अपने हाथों बिक गया है। अब वह हमारी इच्छाओं का गुलाम है। आज तीसरे प्रहर यहाँ से पंचनद की ओर हमारे साथ रहेगा। उसकी पंचनद-नरेश पौरव से पुरानी वैमनस्यता है।

शैलाक्ष- (पुलकित हो) सुन्दर, अति सुन्दर सम्राट ! काँटा से काँटा निकल जायेगा, हमारी सेना पर आँच भी नहीं आएगी।

अलक्षेन्द्र- तब यहाँ से कूच की घोषणा कर दी जाये शैलाक्ष। शैलाक्ष- अवश्यमेव सम्राट ! इस संवाद को पाकर हमारी सेना प्रसन्न होगी। अब अपनी तलवार जौहर दिखाने के लिये उद्विग्न है। अलक्षेद्र- आज की सभा विसर्जित की जाये। निश्चित तीसरे प्रहर हमें तक्षशिला छोड़ देनी है।

पटाक्षेप

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

[ दृश्य-ग्यारहवाँ ]

(पंचनद नरेश महाराज पौरव की राजसभा महाराज पौरव

सिंहासनारूढ़ हैं। पास ही आसंदी पर अमात्यगण विराजमान हैं। अन्य सदस्यगण अपने-अपने आसनों पर बैठे हैं। सबके मुख उदास हैं। वातावरण में गम्भीरता व्याप्त है)

पौरव- (गम्भीर स्वर में) महामात्य व सदस्यगण सब सुनें। हमारी यह गुप्त मंत्रणा है। आप सब लोगों को ज्ञात ही है कि यूनानी सम्राट अलक्षेद्र सिकंदर ने अपने देश की ओर मुख कर लिया है, वह बहुत शीघ्र यहाँ आ जायेगा। हमें अपना कर्तव्य निर्धारित करना है, आप सब अपनी-अपनी सम्मति दें।

सदस्यगण- (समवेत स्वर में) हम रणभूमि में उसका स्वागत करेंगे महाराज !

पौरव- साधुवाद ! साधुवाद !!.. किन्तु यह नहीं भूलना चाहिये कि उसकी सेना बहुत है और हम अल्पसंख्यक हैं। चींटी और हाथी का मुकाबला है।

महामात्य- महाराज ! मस्त हाथी एक चींटी से ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, हम तो सिंह हैं महाराज ! हाथियों के झुण्ड को केवल एक सिंह ही परास्त कर देता है।

पौरव- आपका कथन स्पृहणीय है महामात्य ! हम शत्रु से रणक्षेत्र में भेंट करने के लिए अत्यन्त उत्सुक हैं। उसे बतला देना चाहते हैं कि आर्यखण्ड को विजित करना विनोद नहीं, लोहे के चने चबाना है। (क्षणेक विचारकर) तब फिर सर्व सम्मति से सेनापति को आदेश देना उपयुक्त रहेगा। सदस्यगण- (एक साथ) निःसंदेह !..

महामात्य- (सेनाध्यक्ष से) शीघ्रातिशीघ्र सेना को रणक्षेत्र में प्रस्थान जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

करने के लिये अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित किया जाये। सेनाध्यक्ष- महामात्य! हमारी सेना प्रस्तुत है, सैनिकों ने अपने शस्त्रास्त्र पुनः चमका लिये हैं। जिस समय

अलक्षेद्र और आंभिराज की मित्रता के

समाचार प्राप्त हुये, उसी समय हमारा माथा

ठनका कि आंभिराज अब पुरानी शत्रुता का

प्रतिशोध अवश्य लेगा। उसी समय से

हमने सैन्य तैयारी आरम्भ कर दी।

पूर्णरूपेण हम प्रत्येक संकट से निबटने के

लिये हर क्षण तत्पर हैं केवल आपके

आदेश की प्रतीक्षा है।

पौरव - (प्रसन्नता से) पूर्व नियोजित कार्यक्रम हेतु हम तुम्हारा सहर्ष अभिनन्दन करते हैं सेनाध्यक्ष! देश को तुम जैसे वीरों की ही आवश्यकता है। सेनाध्यक्ष- महाराज! आपकी प्रसन्नता ही हमें वरदान स्वरूप है। यह नश्वर तन देश के काम आ सके इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है? (प्रतिहारी का प्रवेश)

प्रतिहारी- महाराज! यूनानी सम्राट अलक्षेद्र के शिविर से एक दूत आया है, वह आपसे भेंट करना चाहता है।

(सभा के सभी सदस्यगण आश्चर्यान्वित हो उठते हैं)

महामात्य- (साश्चर्य) अलक्षेद्र का दूत?

प्रतिहारी- हाँ महामात्य! वह आदेश की प्रतीक्षा में द्वार पर उपस्थित है।

पौरव - दूत को हमारे समक्ष इसी समय उपस्थित किया जाये। प्रतिहारी- जी! जो आज्ञा। (जाना)

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

(तुरन्त प्रतिहारी के साथ दूत का प्रवेश)

(दूत के हाथ में एक रजतथाल है जो स्वर्ण रत्नों से भरा सुन्दर वस्त्र से आच्छादित है। दूत आकर महाराज को अभिवादन करता है)

दूत- (नमस्कार कर) पंचनद नरेश की सेवा में हमारी भावी साम्राज्ञी देवी रुखसाना ने यह तुच्छ भेंट प्रेषित की है, कृपया महाराज स्वीकार करें। (वस्त्र अलग कर थाल रख देता है)

पौरव - (अत्यन्त आश्चर्य से) भावी साम्राज्ञी ने? तुम्हारा अभिप्राय क्या है दूत? स्पष्ट कहो।

दूत - हाँ महाराज ! भावी साम्राज्ञी देवी रुखसाना सम्राट अलक्षेद्र की प्रेयसी हैं। इस यात्रा में वे भी साथ हैं। उन्होंने यह पत्र दिया है जो आपकी जिज्ञासा शांत करेगा, लीजिये ।

पौरव- महामात्य पत्र पढ़ें। यूनानी साम्राज्ञी का संदेश राजसभा को अवगत करायें।

महामात्य - तथास्तु महाराज ! (पत्र मुठिया में लिपटा है, महामात्य पत्र पढ़ते हैं)

स्वस्ति श्री महाशुभस्थाने पत्री श्री पंचनद नरेश श्रीयुत राजराजेश्वर महाराज पौरव को जोग लिखी वितस्ता पार से सम्राट अलक्षेद्र की अत्यन्त प्रिय प्रेयसी रुखसाना का सादर सविनय नमस्कार।

अपरंच आपके देश भारतवर्ष से मैं अत्यन्त प्रभावित हुई हूँ। यहाँ के वीरों की वीरता भरी गाथाएँ अनुपम निराली हैं। यद्यपि मैं आपके शत्रु की प्रेयसी हूँ तथापि आप जैसे वीर शिरोमणि पंचनद नरेश महाराज पौरव को अपना धर्मभ्राता मानती हूँ। दूत के हाथ भेजा हुआ रक्षासूत्र मेरे कथन का साक्ष्य है। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप मेरे स्नेहासिक्त कच्चे धागों का बंधन अवश्य स्वीकार कर मुझे अनुग्रहीत करेंगे।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3007.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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