ऐतिहासिक नाटक जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य — जैन स्वाध्याय सामग्री | Aitihasik Natak Jain Samrat Chandrgupt Maurya

ऐतिहासिक नाटक जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

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ऐतिहासिक नाटक

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
श्रीमती रूपवती ‘किरण’, जबलपुर

प्रथम संस्करण : 3100 प्रतियाँ

( श्री दश लक्षण पर्व, दिनांक 10 सितम्बर से
19 सितम्बर 2021 के अवसर पर प्रकाशित )

सहयोगी

  • स्व. श्रीमती रूपवती जी ‘किरण’ ध.प.स्व. श्री कोमलचन्द जी जैन की पुण्य स्मृति में उनके सुपुत्र श्री नरेन्द्र कुमार जैन, जबलपुर
  • स्व. श्रीमती सरोज जैन की स्मृति में श्री स्वतन्त्र मोहन जैन ‘कुमुद’, करहल (उ.प्र.)
  • स्व. श्रीमती लक्ष्मी जैन मातु श्री की स्मृति में श्री दीपक जैन, आगरा (उ.प्र.)
  • श्रीमती कुसुम जैन ध. प. श्री भागचन्द जैन, अहमदाबाद (गुज.)

प्रकाशक:

श्री वर्द्धमान न्यास
( पब्लिक चेरिटेबल ट्रस्ट )
अमायन, भिण्ड (म.प्र.)-477 227
मोबा.-98262 25580
कीमत : 30/-

Jain Samrat Chandragupta Maurya (Hindi)
by Smt. Roopwati “Kiran”
Price : ₹ 30.00

प्रकाशकीय

अखण्ड भारत के संस्थापक, जैनेश्वरी दीक्षा लेने वाले अन्तिम जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य बाल्यावस्था से ही उनकी प्रतिभा सूर्य की लालिमा की भाँति प्रगट होने लगी।

प्रभुत्व- बचपन से ही राज दरबार का खेल-खेलने और राजा का अभिनय करते समय आपकी विशेषता, शौर्य, न्याय देख गुरुदेव विप्र चाणक्य आपकी बालसभा में पहुँच गौस हेतु गाय की याचना करने लगे, सामने के खेत में चरती हुई गायों में से कोई भी एक गाय लेने का आपने फरमान कर दिया। कृत्रिम घबराहट पूर्वक गाय के मालिक द्वारा रोके जाने की बात विप्र ने कही, तब चन्द्रगुप्त ने दाँस बँधाते हुए कहा- ‘किसमें साहस है जो राजा चन्द्रगुप्त की आज्ञा की अवहेलना कर सके।’

निर्भीकता (वीरता)- अकेले अपरिचित हेलन को फिलिप्स के दुस्साहस से छुड़ा कर नारी जाति की रक्षा करना। अलक्षेन्द्र की सभा में चुनौती देना और स्वयं सभा से बाहर चले जाना। वनराज सिंह द्वारा सुषुप्त वनराज चन्द्रगुप्त के तन के स्वेद को जिह्वा से पोछना।

गुरुभक्ति- चाणक्य, चन्द्रगुप्त को सरोवर में कमल मयूर पत्रों के नीचे छिपा देते हैं और स्वयं रक्षक का कार्य करने लगते हैं। सैनिक को युवक चन्द्रगुप्त का पता पूछने पर सरोवर की ओर संकेत कर कहते हैं कि वस्त्र उतार कर पकड़ लो। सैनिक शस्त्र-वस्त्र उतार कर सरोवर में जैसे ही प्रवेश करने को होता है, चाणक्य उसी के शस्त्र से सैनिक को मारकर चन्द्रगुप्त को सुरक्षित बाहर निकाल लेते हैं और उसी के अश्व पर चढ़कर आगे चलाते हुए चन्द्रगुप्त से पूछते हैं कि बेटा! जब सैनिक को हमने तुम्हारा पता बताया था, तब तुम्हारे मन में क्या प्रतिक्रिया हुई थी? गुरुदेव के प्रत्येक कथन में कोई न कोई रहस्य विद्यमान रहता है अत: आपके प्रति नि:शंक, निश्चिंत, इसमें भी कोई हित होगा, ऐसा अटूट विश्वास था।

दीक्षागुरु श्री भद्रबाहु स्वामी की समाधि के लिये चन्द्रगिरि गुफा में रुक कर श्री गुरु की समाधि कराना। इत्यादि प्रसंगों को पढ़कर अपने इतिहास एवं गौरव को पहचानें।

लेखिका का अकथनीय श्रम हमारे लिये प्रेरणादायक है, शिक्षा लें! हम सभी सहयोगियों के हृदय से आभारी हैं।
मन्त्री, अखिल जैन
श्री वर्द्धमान न्यास, अमायन (भिण्ड, म.प्र.)

प्रस्तावना

  • प्रो. वीरसागर जैन

जैन राजाओं का इतिहास अत्यन्त गौरवशाली रहा है। प्रारम्भ में राजा नाभिराय ने प्रजा की इतनी सेवा की कि उनके नाम पर इस देश का नाम ‘अजनाभवर्ष’ रखा गया। इसके बाद राजा ऋषभदेव हुए, जो प्रजा को उभयलोक कल्याणकारी उपदेश देने के कारण प्रजापति, स्वयम्भू, आदिब्रह्मा आदि हजारों नामों से विश्वविख्यात हुए। इसके बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र भरत ने सम्पूर्ण षट्खण्ड वसुधा को सम्भाल कर चक्रवर्ती पद प्राप्त किया और उनके नाम पर इस देश का नाम ‘भारतवर्ष’ रखा गया। भरत चक्रवर्ती का समग्र जीवन ही अद्भुत है, आदर्श है। जल में कमल की भाँति रहकर जीने की कला उन्होंने ही सिखाई।

इसके बाद प्रायः सभी तीर्थंकर ही इस देश के महान राजा हुए तथा उनके लम्बे शासनकाल में उनके अनेकानेक भक्त भी बड़े राजा हुए। यदि इन सबके बारे में जानना हो तो हमें जैन पुराणों का अध्ययन करना चाहिए, उनमें इनके जीवन एवं कार्यों की सुन्दर झाँकी देखने को मिलती है।

चौबीस तीर्थंकरों के बाद भी सैकड़ों वर्षों तक जैन राजाओं की परम्परा अविच्छिन्न रूप से चलती रही। इनमें श्रेणिक, बिम्बसार, कुणिक, अजातशत्रु, महाराज जीवन्धर, चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार, अशोक, कुणाल, सम्प्रति, खारवेल, विक्रमादित्य आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। यद्यपि इनके अतिरिक्त भी हजारों जैन राजा विभिन्न क्षेत्रों एवं विभिन्न कालों में हुए हैं, जिनका विवरण अज्ञात है। इसीप्रकार गंग, पल्लव, चोल, चालुक्य, राष्ट्रकूट, कलचुरी, होयसल आदि ऐसे अनेक राजवंश हैं, जिनमें जैनधर्म की महती आराधना एवं प्रभावना होती रही।

जैन राजाओं की यह मुख्य विशेषता रही है कि ये स्वयं को प्रजा के स्वामी नहीं, सेवक मानते हैं और पूर्ण मनोयोग से उनकी सर्वोत्तम सेवा करने का प्रयास करते हैं। वे प्रजा पर किसी प्रकार की कोई जबरदस्ती नहीं करते हैं, उन्हें बलात् धर्म परिवर्तन आदि भी नहीं करवाते हैं अपितु सभी के धार्मिक स्वतन्त्रता के अधिकार की रक्षा करते

हैं। जैन राजा सुरा-सुन्दरी में डूबे रहने वाले नहीं अपितु उच्च कोटि के आध्यात्मिक योगी होते हैं। जीवन के अंत में तो वे निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनि हो ही जाते, राज्यावस्था में भी जल में कमल की तरह निर्लिप्त रहते थे।

श्रीमती रूपवती ‘किरण’ द्वारा रचित प्रस्तुत नाटक के नायक सम्राट चन्द्रगुप्त भी एक ऐसे ही दैदीप्यमान जैन सम्राट हैं। जैन ग्रन्थों में उनका विस्तृत वर्णन उपलब्ध होता है। न केवल इस जन्म का अपितु उनके पूर्व जन्म की भी कहानी रामचन्द्र कृत ‘पुण्यास्त्रव-कथाकोश’ में मिलती है। इसके अतिरिक्त हरिवेष कृत कथाकोश, श्रुतावतार, भद्रबाहुचरित, तिलोयपण्णत्ति आदि में भी उनका वर्णन उपलब्ध होता है। तिलोयपण्णत्ति में उन्हें अंतिम मुकुटबद्ध सम्राट बताया गया है, जिन्होंने अन्तिम श्रुतकेवली भद्रबाहु से निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनि दीक्षा अंगीकार करके उन्हीं के साथ दक्षिण भारत के कटवप्र या कुमारी पर्वत पर आत्मसाधना की थी। इसी कारण आज उस पर्वत से चाणक्य का भी मुनि दीक्षा ग्रहण करने का उल्लेख प्राप्त होता है।

श्रीमती रूपवती ‘किरण’ द्वारा रचित प्रस्तुत नाटक के माध्यम से पाठकों को चन्द्रगुप्त के विषय में कुछ जानकारी मिलेगी और विशेष जानने की प्रेरणा भी मिलेगी। वर्तमान में जैन समाज को ही अपने जैन राजाओं का ज्ञान नहीं है, यह बड़े खेद का विषय है। प्रस्तुत नाटक के माध्यम से इस दिशा में भी समाज में कुछ जाग्रति आएगी। अतः नाटक की लेखिका एवं प्रकाशक दोनों ही अभिनन्दन के पात्र हैं।

अन्त में, मैं निम्नलिखित श्लोक के माध्यम से सभी को अपनी समाज के गौरवशाली इतिहास-पुरुषों को जानने की प्रेरणा देता हुआ अपनी बात को पूर्ण करता हूँ-

स्वजातिपूर्वजानां तु यो न जानाति सम्भवम्।

स भवेत पुंश्चलीपुत्रसदृशः पित्रवेदकः॥

अर्थात् जो अपने पूर्वजों के इतिहास को नहीं जानता है, वह ऐसे कुलटा-पुत्र के समान है जो अपने पिता को ही नहीं जानता।

ऐतिहासिक नाटक

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

पात्रानुक्रमणिका

चाणक्य - तक्षशिला विद्यालय के प्रधानाध्यापक
चन्द्रगुप्त - चाणक्य के प्रमुख प्रिय शिष्य तथा भावी सम्राट
जयदेव - चन्द्रगुप्त का अभिन्न मित्र
चित्रवर्मा - कुलूट नरेश
पुष्कराक्ष - काश्मीर नरेश
सिंहनाद - मलय नरेश
सिंधुषेण - सैंधव नरेश
गणकराय - ज्योतिषाचार्य (चाणक्य का शिष्य)
अलक्षेन्द्र सिकन्दर - यूनानी सम्राट
शैलाक्ष (सैल्यूकस) - अलक्षेन्द्र का प्रमुख सेनाध्यक्ष
हेलन - शैलाक्ष की पुत्री
पालक, सैनिक, सभासद इत्यादि

[पहला दृश्य]

तक्षशिला नगर

(आँगन में दो स्त्रियाँ सम्भाषण कर रही हैं। जल भरने के लिए दोनों जाने वाली थी कि जाने से पूर्व वे वहीं बैठकर अपनी बात पूरी करती हैं। एक चाणक्य पत्नी यशोमति और दूसरी उसकी सखी सुभद्रा।)

सुभद्रा- सखी यशोमति! तुम आज-कल बहुत उदास रहने लगी हो। जान पड़ता है, आर्य चाणक्य का वियोग तुम्हें संतप्त कर रहा है। (मंद-मंद मुस्कराकर) क्यों है न यही बात?

यशोमति- (दुःखित हो) तुम भले ही विनोद करो सखी, पर मुझे तो उन्हीं की चिन्ता व्याकुल किये रहती है। तुम्हीं बताओ, क्या वृक्ष के बिना लता हरी-भरी रह पाई है?

सुभद्रा- ठीक कहती हो बहिन! लता की शोभा वृक्ष है। प्रियतम के अभाव में मुरझाएगी ही। हम नारियों का सुख-सुहाग पति ही तो है।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

यशोमति- देखो न, उन्हें गये एक अयन¹ हो गया अभी तक नहीं लौटे। मुझे अहर्निश उनकी चिन्ता व्याकुल किये रहती है।

सुभद्रा- बहिन पाटलीपुत्र दूर भी तो है।

यशोमति- सो तो है किन्तु दुःख इस बात का है कि मेरी बात उन्हें लग गई। कुछ व्यथित-से होकर गये हैं। मैंने उन्हें बहुत रोका परन्तु वे जो ठान चुके फिर उनके ब्रह्म वाक्य ही हो जाते हैं।

सुभद्रा- तो क्या तुमने कुछ अनुचित कह दिया है?

यशोमति- हाँ सुभद्रा! बात सचमुच ऐसी ही हो गई है। दरिद्रता कभी-कभी विवेक नष्ट कर देती है। कर्तव्य भुला देती है।

सुभद्रा- (स्नेहासिक्त स्वर में) बताओगी नहीं, क्या हुआ था? मुझे तो आश्चर्य इस बात का है कि इतने दिनों तक तुमने अपने मन की गोपनीयता की गाँठ मुझसे भी न खोली। कह तो सही, क्या बात हुई?

यशोमति- लाज जो लगती थी।
हृदय की बात मुँह तक आकर अटक जाती थी।

सुभद्रा- अरी, अपनों से कैसी
लज्जा? (आग्रह से) बात क्या हुई?

यशोमति- तुम्हें स्मरण होगा कि
मैं भाई के विवाह में पीहर गई थी। वहाँ सबने मेरी दरिद्रता का खूब उपहास उड़ाया। सच बहिन, मुझे बहुत दुःख हुआ। जानती हूँ, सांसारिक वैभव आदि सभी कर्म-जनित उपाधियाँ हैं। इनसे हमारी आत्मा का कल्याण नहीं होने वाला। न ही लोगों के उपहास करने से आत्मा की क्षति होती है, अतः मैंने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया किन्तु जब पतिदेव के प्रति अपमान-सूचक वचन कहे जाने लगे तब मेरा धैर्य किनारा कर गया। उसी समय में वहाँ से चली आई।

  1. छह महीने का समय

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

सुभद्रा- अच्छा, उनकी धृष्टता! आर्य चाणक्य जैसे मतिमान पंडित का भी तिरस्कार!

यशोमति- यहाँ आने पर उन्होंने मेरी उदासी का कारण पूछा। मैंने कुल हाल बतला दिया। साथ ही अपने को न रोक सकी। बातों ही बातों में कह गई कि यदि आपने अन्य लोगों की तरह संपत्ति संचित की होती तो मुझे सबके वाक्बाण न सहने पड़ते। संतोष ही संतोष का उपदेश सुनते-सुनते ऊब गई हूँ।

सुभद्रा- अर्थात् तुमने भी उनका अनादर कर दिया।

यशोमति- कहने को तो कह गई सखी! पर घोर पश्चाताप होता है। काश! अपने वचन लौटों सकती। (आह भरकर) पर निशाना साध कर छोड़ा हुआ तीर कभी वापस नहीं लौटा। सुभद्रा! मुझे जो आशंका थी, वही हुआ।

सुभद्रा- तो क्या तुम्हें पहिले से कुछ आभास हो गया था।

यशोमति- तुम ही बताओ भगिनी! उन जैसे दृढ़ प्रतिज्ञ, उग्र स्वभावी पुरुष सुनकर कैसे चुप रह सकते थे? उसी दिन से उधेड़बुन में लगे रहे। अन्न-पान तो जैसे त्याग ही दिया हो। एक-दो ग्रास खा लिया तो बहुत है।

सुभद्रा- तुमने अच्छा नहीं किया यशोमति। बुद्धिमती होकर इतने महान् विद्वान् से मर्मभेदी वचन कहकर उनका हृदय दुखाया। धन संपत्ति तो बाह्य निधि है। तुम्हारी भी उनके आंतरिक गुणों के अक्षय कोष की ओर दृष्टि नहीं गई?

यशोमति- बस यही भूल का शूल तो मुझे चुभ रहा है। मैंने क्षमा याचना की। बहुत-बहुत समझाया, पर वे दृढ़ प्रतिज्ञ रहे। पाटलीपुत्र प्रस्थान कर गये।

सुभद्रा- वहाँ जाकर क्या करेंगे? है बड़ा ही समृद्ध संपत्तिशाली देश। विद्या का केन्द्र है। अपनी तक्षशिला नगरी के बाद उसी का नाम लिया जाता है।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

यशोमति- और भी सुना है। वहाँ के नरेश महापद्मनन्द कुशल
शासक के साथ ही अहिंसाधर्मी एवं दानशीलता के लिए विश्रुत हैं।
विद्याव्यसनी हैं और विद्वानों का आदर करते हैं।
सुभद्रा- (भूली हुई सी याद आती है) मगध नरेश! हाँ वे सचमुच ही
महादानी हैं। क्यों यशोमति! कार्तिक पूर्णिमा के समय तुम्हारा कोई महापर्व
भी होता है क्या?
यशोमति- हाँ भगिनी! आठ दिन तक अष्टाह्निका पर्व मनाये जाते हैं
जो पूर्णिमा के दिन समाप्त होते हैं।
सुभद्रा- उन पर्वों में नरेश सदावर्त खोल देते हैं। सुयोग है यशोमति।
समझो, तुम्हारे भाग्य का शुभोदय हुआ है।
यशोमति- जो हो, भाग्य का लिखा अमिट है। पर उनके बिना मुझे
अच्छा नहीं लगता। कोई संवाद भी नहीं आया।
सुभद्रा- चिंता तो होती ही है किन्तु धैर्य-धरना होगा सखी! सुना है
कुछ मागध यहाँ स्नातक बन कर आये हैं अध्ययन हेतु। कदाचित् उनसे कुछ
संवाद मिल जाये।
यशोमति- (अधीर हो) चल न सुभद्रा! मेरे साथ उन तक। आर्यपुत्र
के समाचार जानने की मेरी तीव्र उत्कंठा है।
सुभद्रा- चल। (दोनों का उसी क्षण विद्यालय की ओर प्रस्थान)
मार्ग में-
यशोमति- क्या बताऊँ बहिन! वे बड़े संतोषी व्यक्ति रहे हैं। संतोष
ही तो उन्हें माता-पिता से उत्तराधिकार में मिला है।
सुभद्रा- सो तो इस बात की सभी प्रशंसा करते हैं। वे निर्लोभी
सज्जन अध्यापक हैं।
यशोमति- उनके बचपन की घटना मेरी श्वश्रू¹ सुनाया करती थीं।

  1. आदर सूचक शब्द
    10 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

जन्म समय में ही आर्यपुत्र के मुख में दाँत थे। सबको बड़ा आश्चर्य हुआ।
उसी समय जैन साधु वहाँ आये तो उन्होंने बतलाया कि यह बालक बड़ा होने
पर भावी राजा होगा।
सुभद्रा- तब यह मिथ्या कैसे हो गया? मैंने सुना है कि तुम्हारे जैन
साधुओं के वचन अन्यथा नहीं होते।
यशोमति- साधु की बात कब मिथ्या हुई है भगिनी! सुन तो सही।
मेरे श्वसुर संतोषी धर्मात्मा व्यक्ति थे। राज्य वैभव को वे पाप समझते थे। सो
उन्होंने दाँत उखड़वा डाले। पुनः उन साधु ने भविष्य वाणी की कि अब यह
बालक स्वयं राजपद तो न पावेगा किन्तु किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से
अवश्य राज्य करेगा।
सुभद्रा- कदाचित् यह भविष्यवाणी अब सत्य हो।
यशोमति- समय आने पर ही कार्य संपन्न होते हैं। जाने वह अवसर
कब आयेगा?

पटाक्षेप
[ दृश्य-दूसरा ]
(चाणक्य पाटलीपुत्र से निष्कासित होकर वन पथ पर-)
चाणक्य- (स्वगत क्रोधाभिभूत हो) अपमान, घोर अपमान। मैंने
शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त कर पाटलीपुत्र के पंडितों पर अपनी छाप अंकित
कर दी। तदुपलक्ष्य में महाराज महापद्मानन्द ने मेरी विद्वत्ता पर मुग्ध हो दान
विभाग का अध्यक्ष पद प्रदान किया किन्तु उद्दण्ड युवराज धनानन्द ने केवल
मेरी कुरूपता और श्याम रंग को ही देखकर मेरा तिरस्कार किया। मैं क्यों
किसी के व्यंग्य बाण सहन करूँ। मैंने भी उसे प्रत्युत्तर दिये। तिस पर उस
अभिमानी ने मेरे केशों को पकड़कर मुझे सेवकों से बाहर निकलवा दिया।
पर याद रख धनानन्द! जिस राज्यमद में तूने मेरा घोर तिरस्कार किया; उसी
राज्य से हटाकर मैंने तेरे वंश को जड़मूल से ने उखाड़ फेंका तो मेरा नाम
जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य 11

चाणक्य नहीं। जिन केशों को तूने खोला है, वे केश तभी बँधेंगे, जब यह
भीषण प्रतिज्ञा पूर्ण होगी। मुझे ऐसे पुरुष को खोजना होगा, जो राजा होने के
उपयुक्त हो।
मुझे याद है, जब मातुश्री कहती थीं- पुत्र! तेरा राजयोग हमने ही भंग
किया है। काश! मुझे राजपद मिलता परन्तु भवितव्यता ऐसी नहीं थी। राजा
बनना होता तो बुद्धि के साथ मेरा रंग रूप निखरता। नरेशों का सुन्दर होना
अनिवार्य है। प्रशस्त ललाट, सौम्य मुखाकृति वाले भूपति ही चिरकाल तक
राज्य कर सकते हैं। उनकी निर्मल विचारधारा, आकर्षक व्यक्तित्व, सुन्दरता
शासित वर्ग का मन लुभा लेती है। अपनी कल्पना को मूर्तरूप देने के लिए ये
आज से मेरा अभियान प्रारम्भ हो जायेगा। चाणक्य आज प्रतिज्ञा करता है कि
जब तक योग्य पुरुष न मिलेगा; तब तक चैन से नहीं बैठूँगा।

पटाक्षेप
[ दृश्य-तीसरा ]
मयूर नगर के राजा देवसेन का गृह
समय- प्रातःकाल, द्वितीय प्रहर
(देवसेन चिन्तित मुद्रा में विराजे हैं। चाणक्य साधु के रूप में भिक्षा
हेतु उपस्थित होते हैं।)
चाणक्य- द्वार पर साधु आया है माँ! (सहसा देवसेन को देखकर)
राजन् उदास प्रतीत होते हैं।
देवसेन- (साधु की अभ्यर्थना हेतु खड़े होकर उच्चासन देते हुए)
अतिथि देव का स्वागत है गुरुदेव! कृपया, विराजकर कुटिया को पवित्र करें।
चाणक्य- (बैठकर) क्या कष्ट है तुम्हें? साधु से बतलाने में हानि
की संभावना नहीं है।
देवसेन- नहीं महाराज! आप से हानि कैसे हो सकती है? आप ठहरे
रमता जोगी। हम गृहस्थों से आपको क्या प्रयोजन?
12 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

चाणक्य-वत्स! हम किसी को कष्टमय नहीं देख सकते। तत्काल उसकी व्यथा निवारण करने का कार्यक्रम बनाते हैं।

देवसेन- धन्य है महाराज! आप जैसे साधु सन्तों का स्वभाव ही परम दयालु होता है इसीलिए तो हम लोग आपको करुणासागर कहते हैं। कहिये, आपकी क्या सेवा की जाये?

चाणक्य- गृहपति! हम स्वयं सेवक हैं। स्वस्थ होकर अन्य से सेवा कराना घृणित कर्म और अपराध समझते हैं।

देवसेन- आप लोगों की बात लोकोत्तर होती है महाराज! चलिये भोजनशाला में भोजन ग्रहण कर हमें कृतार्थ करें।

चाणक्य- भद्र! प्रथम हमें अपनी व्यथा बतलायें जिससे उसे मिटाने का भरसक प्रयास करें।

देवसेन- आपकी वात्सल्यता देखकर हमें परम सन्तोष हुआ है गुरुदेव! बात यह कि मेरी पुत्री गर्भवती है। उसे चन्द्रमा पीने का दोहला हुआ है। दिनोंदिन वह कृशकाय होती जा रही है। इस दोहले की पूर्ति नितान्त असम्भव है। पुत्री की प्राण-रक्षा किस प्रकार हो? यही चिन्ता परिवार को आठों प्रहर सता रही है।

चाणक्य- (कुछ समय विचारमग्न हो पश्चात्) वत्स! चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं। तुम निश्चिन्त रहो। मैं दोहला पूर्ण कर तुम्हारी दुहिता को दीर्घायु करूँगा। वह बहुत भाग्यवान है।

देवसेन- (हर्षित हो आश्चर्य पूर्वक) महाराज!

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
13

चाणक्य- हाँ राजन्! तुम विश्वास रखो, दोहला पूर्ण होकर ही रहेगा। संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं जो मनुष्य न कर सके।

देवसेन- महाराज! आपके वचनों से ही हम मृतकों में जैसे प्राण लौट आये हैं।

चाणक्य- किन्तु एक शर्त है राजन्!

देवसेन- (नम्रता पूर्वक) कहिये गुरुदेव! हम अकिंचन आपकी क्या सेवा कर सकते हैं?

चाणक्य- कुछ कठिन और कठोर है भद्र! सोच-समझकर वचन दो।

देवसेन- अतिथि की सेवा करना हमारा धर्म है महाराज! सोचना समझना कैसा?

चाणक्य- फिर विचार कर लेना अत्युत्तम होगा।

देवसेन- गुरुदेव! बार-बार ऐसा सुनकर गृहस्थों की अतिथि-सेवा में लांछन लगता है। हम आपके कहने से पहले मन की बात जान पाते तो तुरन्त पूरी करते। पर दुर्भाग्य! ऐसी विद्या नहीं है हमारे पास।

चाणक्य- धन्य हो वत्स! तुम आर्य खण्ड के उज्ज्वल नक्षत्र हो। तुम्हें अपने दोहित्र को हमें दे देना होगा।

देवसेन- (किंचित् उदास हो (परन्तु तुरन्त ही आश्वस्त हो) तथास्तु महाराज!

चाणक्य- भद्र! हमारे वचनों से कष्ट हुआ हो तो क्षमा चाहेंगे।

देवसेन- नहीं महाराज! आप हमारे पूज्य हैं। हमें लज्जित न करें। जन्मते ही शिशु आपको सौंप दिया जायेगा।

चाणक्य- वत्स! ऐसा नहीं। तुम लालन-पालन करना जब तक वह आठ वर्ष का न हो जाए। तत्पश्चात् मैं ले जाऊँगा। उसका भविष्य सुन लो।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
14

तुम्हें अत्यन्त आनन्द होगा।

देवसेन- (हाथ जोड़कर) कृपा होगी गुरुदेव!

चाणक्य- भद्र! तुम देख रहे हो आज आर्य खण्ड की कितनी दुर्दशा है। इतनी स्वच्छन्दता परित्याप्त है कि समग्र देश अनेक भागों में विभक्त है। संगठन न होने के कारण हम शक्तिहीन दुर्बल हो रहे हैं। दुर्भाग्यवश किसी विदेशी शत्रु का आक्रमण हो गया तो हम कहीं के न रहेंगे। हमारा धर्म, हमारी संस्कृति सब नष्ट हो जायेगी। (दृढ़तापूर्वक एक निश्चित आवाज में) हम चाहते हैं वत्स! इस समस्या का समाधान हो, अतएव हमें ऐसे पुरुष की खोज है जो सम्पूर्ण आर्यखण्ड को एक सूत्र में बाँध ले। तुम्हारी रत्नावली के गर्भ में ऐसा ही रत्न छिपा है जो भविष्य में महान सम्राट होगा।

देवसेन- महाराज! कहीं आप उपहास तो नहीं कर रहे। हमारा दोहता (पोता) सम्राट बनने का स्वप्न कैसे देख सकता है स्वामिन्!

चाणक्य- इसे स्वप्न नहीं समझो भद्र! जो हम कह रहे हैं वह चिर सत्य और प्रत्यक्ष होने जा रहा है।

देवसेन- गुरुदेव!..

चाणक्य- हाँ महोदय! हम वह स्वप्न प्रत्यक्ष करके दिखलायेंगे। तुम्हें विदित होना चाहिये कि चंद्रमा पीने का इतना कठिन दोहला असाधारण माता को ही हो सकता है। जिसप्रकार पूर्णचंद्र तम विनाशक आह्लादकारी है उसी प्रकार गर्भस्थ शिशु भी भारत के लिये मंगलदायक होगा।

देवसेन- प्रभु करे आपके वचन सत्य हो। आर्य खण्ड का उद्धार हो।

चाणक्य- होगा (निश्चयात्मक स्वर में) ऐसा ही होगा।

देवसेन- आपके संरक्षण में ही हो सकता है गुरुदेव!

चाणक्य- शिक्षा तो मैं अपने ही संरक्षण में करूँगा, जन्म से ही बालक को माँ से पृथक करना महान अपराध होगा। यह अनर्थ हम न कर

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
15

सकेंगे। उसकी माँ की योग्यता के विषय में संदेह करना भूल है। अभी उसे
माँ की गोद में पनपने दो।
देवसेन- एवमस्तु! चलें गुरुदेव, आहार ग्रहण कर अतिथि सेवा का
सुअवसर प्रदान करें।
चाणक्य- अवश्यमेव। एक बात आवश्यक है। आज पूर्णिमा है,
आज की रात तुम्हारी पुत्री की मनोकामना पूर्ण होगी। एक काम करना होगा।
अपने उद्यान के बीचों-बीच एक छोटा मंडप बनवा लो। ऊपर का वितान
वस्त्र का नहीं बल्कि शाखा पत्तों का हो। साथ ही ऐसा प्रबंध करना होगा
ताकि मनचाहा आच्छादित कर सकें और हटा भी सकें। अरस्तु, इसी समय
सेवकों को समुचित आदेश दे दो ताकि यथा समय कार्य संपन्न हो सके।
देवसेन- आपकी आज्ञा शिरोधार्य
है महाराज, चलिये।
दोनों जाते हैं। परदा गिरना।
[ दृश्य-चौथा ]
( समय- द्वितीय प्रहर, मध्यरात्रि )
( उद्यान में एक छोटा सा मंडप है।
मंडप के ठीक बीचों-बीच एक काँसे की
थाली रखी है। चाणक्य, देवसेन विराजमान
हैं। आज्ञा पालन में सेवक भी तत्पर दिखाई देते हैं। निर्मल नीलाकाश में शरद
पूर्णिमा का चाँद मुस्करा रहा है। धवल दुग्ध फेनिल- चाँदनी इठलाती हुई
वसुन्धरा पर चारों ओर अपनी स्निग्धता बिखेर रही है।)
चाणक्य- सेवक! काँसे की थाली अमृतमय शर्करायुक्त दूध से
भर दो।
सेवक- (हाथ जोड़कर) आदेश पालन हो चुका है महाराज!
चाणक्य- (देवसेन से) भद्र! देख रहे हो चंद्र कितना शांत और
16 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

मनोरम प्रतीत हो रहा है।
देवसेन- हाँ गुरुदेव! ऐसा लगता है जैसे नील नभ में कोई शिशु
मुस्करा रहा है। चाँदनी भली सुहावनी लग रही है।
चाणक्य- कल्पना करो कि जैसा ये शशि इतने बड़े समस्त विश्व को
आनंददायी और इसी पूर्णचंद्र को कोई उदरस्थ कर ले तो क्या उस नारी के
गर्भ का शिशु शशि जैसा ही आनंदकारक न होगा?
देवसेन- (हर्ष से रोमांचित हो) आप जैसे साधुओं के आशीर्वाद से
सब कुछ संभव है महाराज!
चाणक्य- अच्छा, तो अब बुलाओ आयुषमति पुत्री को। प्राचीन
आचार्यों का कथन है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा में अमृत झरता है।
आज हम वही अमृत रत्नावली को पिलायेंगे ताकि समस्त आर्य खंड का
उद्धारक यशश्वी पुत्ररत्न उत्पन्न हो। (आदेश देते हैं) सेवक जाओ! देवी
रत्नावली को ले आओ। प्रथम अपना कार्य समझ लो।
सेवक- कहिये गुरुदेव! आज्ञा पालन में सेवक तत्पर है।
चाणक्य- जिस समय देवी दुग्धपान करें, उस समय तुम्हें चुपचाप
शनैः शनैः मंडप का ऊपरी खुला भाग इस प्रकार ढंकना होगा, जिससे थाली
में दिखता हुआ चंद्र का प्रतिबिंब क्रमशः लुप्त हो जाये और यह रहस्य गुप्त
रहे।
सेवक- ऐसा ही होगा महाराज! (जाता है पुन: रत्नावली को लेकर
प्रवेश)
चाणक्य- आओ देवी रत्नावली! बोलो तुम्हारी क्या अभिलाषा है?
हम उसे तत्क्षण पूरा करेंगे!
रत्नावली- महाराज! बस एक ही कामना है। मुझे प्रतिक्षण ऐसा
लगता है कि इस खिले हुये आकाश कुसुम को समूचा निगल जाऊँ।
जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य 17

चाणक्य- एवमस्तु! उठो, आओ हम आज मंत्र-बल से तुम्हें
चंद्रपान करायेंगे। (मंडप के पास सब आते हैं) पुत्री! देख रही हो थाली!
रत्नावली- गुरुदेव! मुझे थाली नहीं अपितु पूर्णचंद्र प्रतिभाषित हो
रहा है। क्या सचमुच चंद्र है?
चाणक्य- हाँ पुत्री! निस्संदेह यह चन्द्र है।
देवसेन- रत्नावली गुरुदेव पहुँचे हुये साधु हैं। मंत्रबल से उन्होंने इस
थाली में चंद्र को उतारा है।
चाणक्य- आयुषमति रत्नावली! तुम प्रसन्नता पूर्वक इस चंद्रमय
दुग्ध का पान कर सकती हो।
रत्नावली- (हर्षित हो) सच पी लूँ!
चाणक्य- हाँ, हाँ निःसंकोच।
(रत्नावली दूध पीने लगती है। ज्यों-ज्यों दूध कम होता जाता है,
त्यों-त्यों सेवक मंडप को शाखा पत्रों से आच्छादित करता जाता है। रत्नावली
दुग्धपान कर आश्वस्त होती है)

रत्नावली- आपके आशीर्वाद से आज मुझे बहुत काल के पश्चात्
तृप्ति मिली है गुरुदेव! अब मैं पूर्णतः संतुष्ट हुई।
देवसेन- महाराज! आपने आज मेरी बड़ी भारी चिंता का निवारण
किया है। मैं हर्ष विह्वल हूँ। आपका चिर-कृतज्ञ रहूँगा गुरुदेव! (पुत्री से)
तुम विश्राम करो रत्ना।
रत्नावली- (जाती हुई) नमस्कार गुरुदेव!
चाणक्य- हमारा कार्य समाप्त हुआ भद्र! हम जाना चाहेंगे।
देवसेन- इतने शीघ्र गुरुदेव! कुछ दिन इस अकिंचन का आतिथ्य
ग्रहण करें।
चाणक्य- नहीं भद्र! हमारा चिर-अभिलाषित उद्देश्य पूर्ण हुआ। हम
पुनः अपने आश्रम लौट जायेंगे। हमें आर्य खंड के विस्तृत साम्राज्य की नींव
18 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

डालनी है।

देवसेन- इस अहोरात्रि में कहाँ जायेंगे? सूर्योदय तक तो रुके महाराज!

चाणक्य- तक्षशिला पहुँचने तक कई अहोरात्रि चलना होगा भद्र! रुक कर समय नष्ट करना व्यर्थ है। अच्छा, चलते हैं!
देवसेन- (दुखित हो) नमस्कार गुरुदेव! अपने पुत्र का ध्यान रखें।
चाणक्य- अवश्यमेव। तुम निश्चित रहो।
(चाणक्य जाते हैं। देवसेन, सेवक हाथ जोड़ कर अन्यमनस्क से खड़े विदाई देते हैं)

[दृश्य-पाँचवाँ]

(9 वर्ष पश्चात्)

आर्य चाणक्य मयूर नगर में-

(मयूर नगर के उद्यान में बालक खेल रहे हैं। एक शिला पर चंद्रगुप्त आकर बैठता है। कई बालक क्रमशः अमात्य, प्रतिहारी, सभासद, अभियोगी, अंगरक्षक आदि का अभिनय कर रहे हैं। दो बालक अंगरक्षक के रूप में ताड़ वृक्षों के पंखे लेकर नरेश चंद्रगुप्त पर मंद-मंद व्यजन¹ डुला रहे हैं। दो-चार बालक अंगरक्षक बनकर हाथ में लाठी लिये हुये नियुक्त हैं। कुछ बालक जमीन पर पालथी मारे बैठे हैं जो कि सभासद बनकर सभा की शोभा बढ़ा रहे हैं। पास ही दूसरी शिला अमात्य जयदेव के लिये है। सभा प्रारम्भ होती है। कुछ बालक प्रार्थी बनकर नरेश से न्याय कराने हेतु प्रस्तुत होते हैं) (चाणक्य ओट से देखते हैं)।

प्रतिहारी- (उच्च स्वर में) सावधान! राज-राजेश्वर प्रतापी सम्राट चंद्रगुप्त पधार रहे हैं।
(पूरी सभा खड़ी हो जाती है। चंद्रगुप्त का प्रवेश। सब अभिवादन करते हैं)

  1. पंखा

जैन सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य
19

चंद्रगुप्त- (सिंहासन पर बैठकर) सभासदो! अब हमारी सभा प्रारम्भ हो रही है। प्रतिहारी, उन अभियोगी नागरिकों को उपस्थित करो। उनका न्याय होगा।

प्रतिहारी- जो आज्ञा महाराज! (जाता है)

चंद्रगुप्त- (सभासदों से) उपस्थित सदस्यगण! आप लोग भी ध्यान पूर्वक अनुयोग सुनें। न्याय करने में आपकी सम्मति अपेक्षणीय है।

सभासद- (समवेत स्वर से) अवश्यमेव महाराज!

(प्रतिहारी का एक बालक को लिये हुए प्रवेश)

बालक- राजन्! मेरी माँ अस्वस्थ है। उनसे कृषिकार्य नहीं सम्भल रहा। आप हमारे माई-बाप हैं। हमें उड़बाना कराना है। मजदूरी देने के लिये हमारे पास पैसे नहीं हैं।

चंद्रगुप्त- घबराओ नहीं नागरिक! जब तक तुम्हारी माता पूर्णतः स्वस्थ नहीं हो जाती तब तक राज्य की ओर से कुछ कर्मचारी नियत कर दिये जायेगे जो तुम्हारी खेती का कार्य निपटवा देंगे। उनका वेतन राज्यकोष से दिया जायेगा।

बालक- धन्य हो महाराज! आपने मेरी बड़ी भारी चिंता का निवारण क्षण मात्र में कर दिया। मैं आपका अनुग्रही हूँ। (जाना)

(द्वितीय बालक का प्रवेश)

चंद्रगुप्त- कहो नागरिक! तुम क्या चाहते हो?

बालक- महाराज! समस्या बड़ी कठिन हो गई। शासन से कुछ सहायता की अपेक्षा है।

चंद्रगुप्त- किस प्रकार की सहायता चाहते हो जीवक!

बालक- बुआ का विवाह है। बारातियों को ठहराने के लिये योग्य वसंतिका की आवश्यकता है।

जैन सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य
20

चंद्रगुप्त- अवश्यमेव! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। प्रबंध की चिंता मत करो।

बालक- कृतज्ञ हुआ राजन्! (प्रस्थान)

चाणक्य- (स्वगत ओट में खड़े होकर) कितना सुन्दर प्रतिभाशाली बालक है। बिल्कुल राजाओं जैसा अभिनय कर रहा है। भव्य ललाट, विशाल वक्षस्थल, कीर जैसी नासिका, अजानु बाहें सभी लक्षण चक्रवर्ती सम्राट के द्योतक हैं।

(प्रतिहारी एक बालक को लाता है। बालक देवपाल बहुत रोष में है)

देवपाल- (क्रोधित होकर) राजन्! मेरी छोटी बहिन रामवती को सुमित्र ने अपशब्द कहे हैं। मुझे उस पर रोष आ रहा है। आपके शासन काल में स्त्री जाति का अपमानित होना घोर अनर्थ है।

जयदेव- शांत हो देवपाल, शांत हो। अपराधी को अवश्य दण्ड मिलेगा।

चंद्रगुप्त- स्पष्ट कहो देवपाल! क्या बात हुई? सुमित्र तो तुम्हारा मित्र है।

देवपाल- (क्रोधित अवस्था में) था, अब नहीं है। कल संध्याकाल बहिन रामवती बालू के घरौंदे बना रही थी, सुमित्र ने उसके घरौंदे में लात मार दी, रामवती रोने लगी तो सुमित्र हँस पड़ा, दोनों में कुछ कहा-सुनी हो गई। इसी बीच सुमित्र ने दुर्बचन कहे।

चंद्रगुप्त- प्रतिहारी! सुमित्र को इसी समय उपस्थित करो!

प्रतिहारी- जो आज्ञा महाराज! (जाता है)

चंद्रगुप्त- (जयदेव से) महामात्य! सुमित्र को क्या दण्ड दिया जाये?

जैन सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य
21

नाटक

जयदेव- महाराज! आप स्वयं समझदार हैं, यदि आज्ञा हो तो सभासदों की सम्मति ले ली जाये!

चन्द्रगुप्त- अवश्यमेव मंत्रिवर! (सभासदों से) सदस्यगण! नारी की मर्यादा का उल्लंघन करने वाला कौन सा दण्ड का पात्र है?

पहला सभासद- महाराज! उसकी जीभ कटवा देना उचित है।

दूसरा सभासद- महाराज! उसे मल्लों से मूँसे लगवाना चाहिये।

तीसरा सभासद- उसके मुँह में मिर्च भरनी चाहिये। (प्रतिहारी सुमित्र को लिये हुये प्रवेश)

प्रतिहारी- आर्य सुमित्र उपस्थित है महाराज! (सुमित्र नतमस्तक है)

चन्द्रगुप्त- आर्य सुमित्र! क्या तुमने आर्य देवपाल की भगिनी को दुर्वचन कहे?

सुमित्र- (सहते हुये) राजन्!..

चन्द्रगुप्त- (कड़ककर) सच-सच कहो सुमित्र।

सुमित्र- महाराज!..

चन्द्रगुप्त- तुमने नारी मर्यादा का उल्लंघन कर अनैतिक कार्य किया है सुमित्र! कठोर दण्ड भुगतने के लिये तैयार हो जाओ।

सुमित्र- (साहस से भरकर) राजन्! दण्ड सहर्ष स्वीकार है किन्तु अपराध की क्षमा भी चाहता हूँ, भविष्य में पुनः ऐसी भूल करने का दुस्साहस नहीं करूँगा।

चन्द्रगुप्त- विश्वास हेतु प्रमाण दो सुमित्र!

सुमित्र- राजन्! साक्षी की क्या आवश्यकता? जबकि मैं स्वयं आपसे वचनबद्ध हूँ और फिर आप जैसे न्यायप्रिय नृपेन्द्र की सभा में कोई पुरुष अनैतिक आचरण करने का साहस भी कैसे कर सकता है महाराज! एक बात और भी है, मनुष्य दुनियाँ की आँखों में धूल झाँक सकता है पर अपनी में नहीं। (दृढ़ता पूर्वक) राजन्! मेरी साक्षी में मैं और मेरे वचन हैं।

चन्द्रगुप्त- साधु सुमित्र! तुमने अपराध स्वीकार कर महानता का परिचय दिया है। जिस राज्य में ऐसे महापुरुष हों, उस राज्य की दिनों-दिन उन्नति होगी। हम तुम्हें क्षमा करते हैं, आशा है कि तुम अपने वचनों के प्रति जागरूक रहोगे।

सुमित्र- आप आश्वस्त रहें सम्राट।

चन्द्रगुप्त- सभासदो! आपकी क्या सम्मति है?

सभासद- (समवेत) आपका निर्णय मान्य है राजन्!

चन्द्रगुप्त- सभा की कार्यवाही अब समाप्त होती है।

चाणक्य- (सहसा सभा में प्रवेश कर) राजन् मेरी भी आपसे प्रार्थना है।

चन्द्रगुप्त- निःसंकोच कहें। आप कौन हैं एवं किस हेतु यहाँ पधारे हैं?

चाणक्य- राजन् मैं ब्राह्मण हूँ। गोधन न होने के कारण मैं गौरस से वंचित हूँ, कृपया एक गाय प्रदान करें।

चन्द्रगुप्त- (उदारता पूर्वक) विप्रवर! सामने गायें चर रही हैं, अपनी इच्छानुसार चुन लीजिये।

चाणक्य- (कृत्रिम भीत होते हुये) नहीं राजन्! ये गायें हम कैसे ले सकते हैं? इनका स्वामी रोकेगा तो?..

चन्द्रगुप्त- भयभीत मत होओ ब्राह्मण (किंचित् रोष पूर्वक) किसमें साहस है जो राजा चन्द्रगुप्त की आज्ञा की अवहेलना कर सके।

चाणक्य- (मुस्कराकर) ओह! चन्द्रगुप्त! आप यहाँ के राजा हैं! (कुछ याद करते हुये) स्वागत चन्द्रगुप्त?। धृष्टता क्षमा हो राजन्! मुझे विस्मरण हो गया था।

चन्द्रगुप्त- कोई बात नहीं विप्रवर! आप हमारे गुरु तुल्य हैं। अच्छा अब हमारी सभा की कार्यवाही समाप्त होती है। हम लोग अभी राजसभा का अभिनय कर रहे थे। यहाँ मैं आपकी और सेवा कर सकता हूँ। मेरे निवास-स्थान को चलें तो यथायोग्य अतिथि सत्कार कर अपने को कृतार्थ कर सकूँगा। (सब खड़े हो जाते हैं)

चाणक्य- बालक! एक बात बता सकोगे? तुमने हमें गुरु कहा है। क्या हमारे साथ चलकर विद्या अध्ययन करोगे? हम तुम्हें पूर्ण शिक्षित बना देंगे।

चन्द्रगुप्त- (सहर्ष) सच! मुझे पढ़ने की लालसा है गुरुदेव! मैं आपके साथ अवश्य चलूँगा।

चाणक्य- कहीं तुम्हारे माता-पिता ने नहीं जाने दिया तो?

चन्द्रगुप्त- यह असंभव है गुरुदेव! मेरी आकांक्षाओं पर नियंत्रण नहीं है।

चाणक्य- दृढ़प्रतिज्ञ दिखते हो।

चन्द्रगुप्त- यदि मनुष्य अपना लक्ष्य निर्धारित कर ले एवं उसकी प्राप्ति में कटिबद्ध हो जाये तो निश्चय ही वह अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है।

चाणक्य- तुम्हें विश्वास है वत्स! कि तुम्हारे माता-पिता तुम्हें अनुमति देंगे?

चन्द्रगुप्त- नहीं देंगे तो मैं उन्हें अनुमति के लिये बाध्य करूँगा, उन्हें देना ही पड़ेगी गुरुदेव! मेरे पिता हैं नहीं, मातृश्री और मातामह हैं। पिता मेरे

जन्म के पूर्व ही युद्ध क्षेत्र में वीर गति को प्राप्त हो गये थे।
चाणक्य- वत्स! तुम मेरे लिये पहेली बनते जा रहे हो, तनिक अपना दाहिना हाथ तो दिखाओ?
चन्द्रगुप्त हाथ बढ़ा देता है, चाणक्य हाथ देखकर
चाणक्य- ओह! चक्रवर्ती सम्राट के सभी लक्षण मिल रहे हैं। चन्द्रपान का दोहला! (विचारते हुए) कदाचित इसी की माता को हुआ होगा।
चन्द्रगुप्त- आप क्या कह रहे हैं गुरुदेव? (सरलता और बचपन का भोलापन मुख पर झलक रहा है)।
चाणक्य- (सावधान हो) कुछ नहीं वत्स! यूँ ही कुछ पुरानी स्मृतियाँ जाग गई थीं। … हाँ तुम हमारे साथ चलो। हम आर्य देवसेन से भेंट कर तुम्हारी माता से मिलेंगे।
चन्द्रगुप्त- (मुस्कुराकर) गुरुदेव मेरे मातामह से मिलना चाहते हैं? चलें, मुझे जानकर प्रसन्नता हुई।
चाणक्य- (हँसते हुए) ओह! तो तुम उनके दोहित्र हो? निश्चय ही देवी रत्नावली तुम्हारी माता हैं।
चन्द्रगुप्त- गुरुदेव का अनुमान सत्य है। ज्ञात होता है हमारे घराने से आपका पूर्व परिचय है?
चाणक्य- निःसंदेह! तुम्हारा चन्द्रगुप्त नामकरण मैंने ही तुम्हारे जन्म के पूर्व किया था। (प्यार से पीठ थपथपाते हुए)
चन्द्रगुप्त- चलें गुरुदेव! मैं यह शुभ संवाद शीघ्रातिशीघ्र सबको सुनाना चाहता हूँ।
चाणक्य- चलो। (सब जाते हैं)

पटाक्षेप

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
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[दृश्य-छठवाँ]

अलक्षेन्द्र सिकंदर का सेनापति शैलाश सेल्यूकस है। सिकंदर काबुल आदि देश विजित करता हुआ इस समय पारस देश में है। सेना कुछ दिन यहाँ विश्राम करेगी। सेल्यूकस सिकंदर का मुख्य सेनापति तो है, साथ ही अत्यंत विश्वस्त साथी भी है। सिकंदर के भारत विजय अभियान में उसका एक निकट संबंधी है जो क्षुद्रवृत्ति का है, नाम है फिलिप्स। सिकंदर पारस से अपने विश्वस्त सेनापति सेल्यूकस और फिलिप्स के साथ कुछ सैनिकों को गुप्तवेश में तक्षशिला की राजनीति आदि का पता लगाने भेजता है। सेल्यूकस पत्नी के निधन के उपरांत एक मात्र प्रिय पुत्री हेलेन को कभी आँखों से ओझल नहीं होने देता। इस समय भी वह साथ में है।

तक्षशिला में

विश्वविद्यालय के पास नदी किनारे पुत्री हेलेन के साथ शैलाश अश्वों पर आता है। दोनों अपने घोड़े एक पास ही वृक्ष से बाँध देते हैं और नदी किनारे टहलने लगते हैं।

हेलेन- (आनंदातिरेक से) कितना रम्य प्रदेश है। यहाँ की नदी पर्वतमालायें कितनी सुहावनी लगती हैं। बर्फ से ढँकी चोटियाँ चाँदनी में ऐसी लग रही हैं जैसे इन पर धुली श्वेत चादर बिछी हो, किंवा¹ इन चोटियों को किसी कुशल स्वर्णकार ने चाँदी से मढ़ दिया हो।
शैलाश- हाँ बेटी! यहाँ का सब अनोखा ही है। प्रकृति की सभी विचित्र विलक्षणतायें यहाँ पर निष्पार पा रही हैं।
हेलेन- सचमुच प्रकृति सुन्दरी नवोढ़ा के रूप में सदा सर्वत्र विचरती रहती है। कैसा शांत मनोरम वातावरण है यहाँ का।
शैलाश- यह क्षेत्र विद्यापीठ के अंतर्गत आता है हेलेन! यहाँ राजनीति का नाम भी सुनाई नहीं पड़ता। आभराज यहाँ का राजा होते हुए भी

  1. अथवा/या

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
26

विद्यालय में उसकी कोई सत्ता नहीं है, कोई शासन नहीं। अद्भुत है यह देश।
विद्यालयों में नरेश भी साधारणजन की तरह हैं।
हेलेन- यह तो सबसे बड़ा आश्चर्य है पिदर! जहाँ अपने राज्य में भी राजा की कोई महत्ता न हो।
शैलाश- पहिले तो मुझे इस बात का विश्वास ही नहीं हुआ किन्तु छानबीन करने के पश्चात् यही सत्य ज्ञात हुआ। विद्यापीठ का महत्त्व यहाँ पर सबसे अधिक है। समूचे आर्यावर्त के राजकुमार यहाँ जन साधारण की तरह सुख वैभव से दूर रहकर विद्या अध्ययन करते हैं।
हेलेन- (आश्चर्य पूर्वक) राजकुमार!
शैलाश- हाँ हाँ राजकुमारों के महलों में आचार्य नहीं जाते बल्कि राजकुमार विद्यार्थी बनकर यहाँ शिक्षा प्राप्त करते हैं। बड़े-बड़े राजे महाराजाएँ पाँव प्यादे चलकर विनय पूर्वक आचार्य के पास आते हैं। विद्यालय के क्षेत्र में वाहनों का उपयोग निरी मूर्खता ही समझा जाता है। वाहनों के अतिरिक्त राजा लोग अपनी राजसी प्रतीकों को भी पृथक् कर देते हैं।
हेलेन- अध्यापकों का पद सर्वश्रेष्ठ ही नहीं महानतम भी माना जाता है।

शैलाश- यह सब बड़ा विचित्र ज्ञात होता है। यद्यपि गुरुकुल राजनीति से दूर रहता है तथापि राजनीति सीखने सब यहाँ नहीं आते हैं।
हेलेन- अच्छा! यहाँ केवल राजनीति ही सिखाई जाती है?
शैलाश- नहीं बेटी! सब कुछ। शास्त्र संचालन से लेकर लौकिक पारलौकिक सभी प्रकार की विद्या का केन्द्र है तक्षशिला। छन्द, व्याकरण,

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य
27

दर्शन, तर्क, ज्योतिष, वैद्यक, राजसी चिकित्सा इत्यादि जाने क्या-क्या पढ़ाया जाता है।

हेलन- आपने कितने नाम गिना दिये पिदर! क्या एक ही विद्यार्थी इतनी सब विद्या ग्रहण कर लेता है?
शैलाक्ष- यों तो सब विद्यार्थी अपनी-अपनी योग्यतानुसार अध्ययन करते हैं परन्तु राजकुमारों का सभी विद्याओं में पारंगत होना अनिवार्य है। यहाँ का शिक्षित विद्यार्थी सर्वोत्कृष्ट माना जाता है।
हेलन- आश्चर्य है पिदर! मालूम होता है प्रकृति ने सभी वरदान यहाँ पर उड़ेल दिये हैं। प्राकृतिक सौंदर्य के साथ यहाँ के मानव का आंतरिक सौन्दर्य भी प्रशंसनीय है। पर… (विचार मग्न हो जाती है)
शैलाक्ष- अरे! अभी-अभी चहकने वाली चिड़िया अचानक चुप क्यों हो गई? किस विचार में पड़ गई हेलन!
हेलन- मुझे युद्ध की सुधि आ गई पिदर! देव-पुत्र ऐसी सुरम्य शस्य श्यामला वसुन्धरा पर रक्त की सरिता बहा देंगे। कहाँ होंगे ये आदर्श? कहाँ रहेगी इनकी संस्कृति? सब कुछ युद्ध की दाहक ज्वाला में भस्मीभूत हो जायेगा। मुझे अत्यन्त हृदय विदारक दुःख हो रहा है, मेरा जी घबराने लगा है।
शैलाक्ष- तू बहुत मृदु स्वभाव की है हेलन! तुझे तो मैं यूनान में छोड़ आता तो अच्छा रहता। पर मेरे अतिरिक्त घर में है भी कौन? अकेली किसके सहारे छोड़ता, यह कठिन समस्या थी। नहीं-नहीं तुझे मैं अपनी आँखों से ओझल नहीं रख सकता, तू अपनी माँ की एक मात्र निशानी है, पर यहाँ लाकर भी मैं पछता रहा हूँ, युद्ध से तू आतंकित हो उठी है।
हेलन- हे पिदर! यदि आप मुझे न लाते तो इस सुनहले देश के दर्शन कैसे होते? … अच्छा ये बताइये कि किसी तरह भी यह युद्ध, नरसंहार रोका नहीं जा सकता है?

28 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

शैलाक्ष- पागल है हेलन तू! भला विजेता की चाह कभी समाप्त हुई है। यह देवपुत्र अलक्षेन्द्र का विजय अभियान है। वे भारत विजय करके ही रहेंगे।
हेलन- (दुखित हो) तब तो बड़ा ही अनिष्ट होगा पिदर! युद्ध की विभीषिका अत्यन्त भयंकर होगी! उफ़ नर संहार कहाँ तक देखेगी ये आँखें। सुना है इस देश की अहिंसा में आस्था है। ऐसे अहिंसक सरल मानवों का संहार निश्चय ही करुणाजनक एवं निम्नकोटि का होगा। (आग्रह पूर्वक स्नेहासिक्त स्वर से) पिदर! रोकिये न इस युद्ध को। समझाइये देवपुत्र को।
शैलाक्ष- वीर शैलाक्ष की पुत्री के मुख से ऐसी कायरता पूर्ण बातें शोभा नहीं देती हेलन।
हेलन- नर संहार ही यदि वीरता का लक्षण है तो मैं बाज आई ऐसी वीरता से।
शैलाक्ष- बेटी! राजधर्म बड़ा कठोर है और उससे भी अधिक है मनुष्य की लिप्सा। ये कभी शांत नहीं होती। किसी भी कीमत पर इसकी प्रज्ज्वलित आग में ईंधन झोंकना ही पड़ता है।
हेलन- तब तो इसे ठंडी कर देना ही उपयुक्त है ताकि मानवता की क्षति न हो।

शैलाक्ष- तू पागल है हेलन! एकदम पागल है! लक्ष्मीपति ही दुनियाँ में सर्वश्रेष्ठ कहलाते हैं। ये दार्शनिक विचार तेरे मन में कहाँ से प्रवेश कर गये? जान पड़ता है इस भूमि का प्रभाव तुझ पर भी पड़ गया है। छोड़ व्यर्थ की बातों को। तनिक सी आयु में वृद्धों जैसी उदासीनता की बातें ले बैठी। (अचानक याद आती है) मैं बिल्कुल भूल गया हेलन खबररसां (गुप्तचर) मेरी राह देख रहा होगा। मैं यहाँ बातों में लग गया। तुम यहीं ठहरो, मैं थोड़ी देर में आता हूँ।

जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य 29

हेलन- मुझे यहाँ बहुत आनन्द आ रहा है। आप निश्चिंत हो अपना कार्य कर आइये।

(पूर्णिमा की चाँदनी पूर्ण रूप से खिल चुकी है। हेलन बालू पर लेट जाती है। यह अपना सिर एक हाथ के सहारे रखे है।)

हेलन- (स्वगत) सांध्य दृश्य देखा था, तब सूर्य ऐसा लग रहा था जैसे विशाल आग का गोला शांतेः शनैः ठंडा होता जा रहा है। दूसरी ओर उसका प्रतिद्वंद्वी चंद्र अपनी शीतलता लिये सर्वत्र शांति बिखेरता हुआ क्रमशः ऊँचा उठ रहा है। अब वह पूर्ण यौवन प्राप्त कर रहा है। सूर्य की उष्णता पूर्ण रूप से विलुप्त हो गई है… कदाचित इसी प्रकार अलक्षेन्द्र रूपी सूर्य का अवसान होकर कोई ऐसा ही पूर्ण चंद्ररूपी मानव यहाँ के निर्मल नभ में उदित हो जाये तो? भूमि का कोना-कोना चमत्कृत हो जन-जन शांति का आस्वादन कर सके। (दूसरे ही क्षण विषाद पूर्ण मुद्रा में) पर नहीं, युद्ध की विनाशकारी घटाओं का विघटन सहसा संभव नहीं। … मुझे इस देश से, यहाँ की संस्कृति से बेहद प्यार है। मुझे यूनान में जन्म न देकर यहाँ भारत में उत्पन्न किया होता तो कितना सुन्दर होता। प्रकृति ने कहीं भूल कर दी है।

(अचानक फिलिप्स का प्रवेश)

फिलिप्स- उस भूल को मैं सुधारूँगा। तुम्हारी अभिलाषा भारत को निवास-स्थल बनाने की है। तुम्हारा स्वप्न मैं साकार करूँगा। देवपुत्र भारत विजय कर लौटेंगे तब इस महान् साम्राज्य का महाक्षत्रप’ मुझे नियुक्त करेंगे ही। हम तुम दोनों इस देश के स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करेंगे। तुम यहाँ की साम्राज्ञी कहलाओगी और राजा होते हुये भी मैं तुम्हारा गुलाम।
हेलन- (व्यंग्य से) अपना सुन्दर भाषण एक ही साँस में कह गये
फिलिप्स! अब और कुछ कहना शेष है अथवा नहीं?

  1. वरिष्ठ शासक

30 जैन सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3007.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है