About the प्रथमानुयोग category


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प्रथमानुयोग में तो संसार की विचित्रता, पुण्य-पापका फल, महन्तपुरुषोंकी प्रवृत्ति से जीवों को धर्म में लगाया है।
जो जीव तुच्छबुद्धि हों वे भी उससे धर्म क्योंकि वे जीव सूक्ष्म निरूपणको नहीं पहिचानते, लौकिक कथाओं को उनका उपयोग लगता है। तथा प्रथमानुयोग में लौकिक प्रवृतिरूप ही निरूपण होने से उसे वे भली-भाँति समझ जाते हैं।
तथा लोकमें तो राजादिककी कथाओं में पापका पोषण होता है। यहाँ महन्तपुरुष राजादिककी कथाएँ तो हैं, परन्तु प्रयोजन जहाँ तहाँ पापको छुड़ा कर धर्ममें लगानेका प्रगट करते हैं, इसलिये वे जीव कथाओंके लालच तो उन्हें पढ़ते-सुनते हैं और फिर पापको बुरा, धर्मको भला जानकर धर्ममें रुचिवंत होते हैं।