आओ जाने जीव को - जैन स्वाध्याय सामग्री | Aao Jane Jeev Ko

बच्चों के लिए बनी ३५ स्लाइड की प्रस्तुति — जीव और अजीव की पहचान, जीव का लक्षण (जिसमें चेतना गुण पाया जाता है), जीव को जानने से लाभ, और सरल उदाहरणों के साथ “कर्म बलवान है या जीव?” प्रश्न का उत्तर। अंत में बहिरात्मा-अंतरात्मा-परमात्मा का स्वरूप। प्रस्तुतकर्ता — श्रीमती पूजा प्रकाश छाबड़ा।


मैं ज्ञानानन्दस्वभावी हूँ

मैं ज्ञानानंद स्वभावी हूँ

अपनी निधी तो अपने में है, बाहृय वस्तु में व्यर्थ प्रयास
जग का सुख तो मृग तृश्णा है, झूठे हैं इसके पुरुषार्थ
मैं ज्ञानानन्दस्वभावी हूँ

मैं जीव हूँ।
मुझमें ज्ञान है।
मैं ज्ञान से जानता हूँ।
शरीर अजीव है।
शरीर में ज्ञान नहीं है।
शरीर कुछ नहीं जानता है।

जीव अजीव की
एक और पहचान

जीव को जानने से लाभ

गेंद खेलने में
सुख मिलता है या नहीं

जीव कौन है ?
जो सुख दुख का अनुभव कर्ता है वह जीव है

कर्म बलबान है या जीव ?
पुण्य के उदय से सबकुछ मिलता है तो क्या कर्म बलवान है?
पाप के उदय में प्रतिकूलता मिलती है जीव दुखी होता है तो क्या कर्म बलबान है?
पारस नाथ मुनिराज को भी कर्मो ने नहीं छोड़ा तो क्या कर्म बलवान है ?
कर्म के उदय से सब भूल जाते है तो क्या कर्म बलबान है
पुण्य के उदय से सबकुछ मिलता है लेकिन जीव का ज्ञान होने से केवलज्ञानी हो जाते है अत: जीव
पाप के उदय में प्रतिकूलता मिलती है पर स्वाभाव सन्मुख होने पर प्रतिकूलता भासित ही नहीं होती
पारस नाथ मुनिराज को भी कर्मो ने नहीं छोड़ा फिर भी कर्मो का नाश किया अत: जीव बलवान है |
कर्म के उदय से सब भूल जाते है पर जीव का ज्ञान होने पर केवलज्ञानी हो जाते है अत जीव बलवान है|

कर्म बलबान है या जीव ?
कर्म विचरे कौन भूल मेरी अधिकाई
अग्नि सहे घनघोर लोग की संगती पाई
कर्म का उदय आया तो ये कोरोना की
स्थिति बनी तो क्या कर्म बलबान है?

कर्म बलबान है या जीव ?
अनंत कर्म एक साथ बंधे फिर ही जीव को कुछ नहीं होता
उनसे बचके निकल जाता है तो कौन बलवान हुआ
जीव या कर्म?
1000 पुलिस वाले हो और एक आदमी उनसे
उनसे बच के निकल जाये तो कौन बलवान?

कर्म बलबान है या जीव ?
बलवान तो जीव ही है
स्वाभाव की कमजोरी के
जीव को ना जानने के कारण
कर्म बलवान दिखने लगते है

त्रस
जीव
संसारी
मुक्त
स्थावर
2, 3, 4, 5 इन्द्रिय
पृथ्वी जल अग्नि वायु वनस्पति
संज्ञी
असंज्ञी
प्रत्येक वनस्पति साधारण वनस्पति
सप्रतिष्ठित अप्रतिष्ठित नित्य निगोद इतर निगोद

ॐ
मेरा धाम
शुद्धातम है मेरा नाम,
मात्र जानना मेरा काम।
मुक्तिपुरी है मेरा धाम,
मिलता जहाँ पूर्ण विश्राम ।।
जहाँ भूख का नाम नहीं है,
जहाँ प्यास का काम नहीं है।
खाँसी और जुखाम नहीं है,
आधि व्याधि का नाम नहीं है।।
सत् शिव सुन्दर मेरा धाम,
शुद्धातम है मेरा नाम ।।१।।
स्व-पर भेदविज्ञान करेंगे,
निज आतम का ध्यान धरेंगे।
राग-द्वेष का त्याग करेंगे,
चिदानन्द रसपान करेंगे।।
सब सुखदाता मेरा धाम,
शुद्धातम है मेरा नाम ।।२।।

३
द्रव्य
जीव
द्रव्य छह होते हैं।
जिसमें चेतनागुण पाया जाता है
अर्थात् जो जानता-देखता है,
वह जीवद्रव्य है।
जिसमें स्पर्श, रस, गन्ध और
वर्ण पाये जाते हैं, उसे
पुद्गलद्रव्य कहते हैं।
पुद्गल

पांचो परमेष्ठी में से
जीव कितने है और अजीव कितने?

मोक्षमार्गस्य नेतारं भेत्तारं कर्मभूभृताम् ।
ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये

जीव किसे कहते है ?
जिसमे चेतना गुण पाया जाता है
उसे जीव कहते है

( दूहा-६ )
ति-पयारो अप्पा मुणहि, परु अंतरु बहिरप्पु ।
पर झायहि अंतर-सहिउ, बाहिरु चयहि णिभंतु ।।
( हरिगीत )
बहिरातमापन त्याग जो बन जाय अन्तर-आतमा ।
ध्यावे सदा परमातमा बन जाय वह परमातमा ।।
आत्मा तीन प्रकार का है - परमात्मा, अन्तरात्मा और बहिरात्मा ।
इनमें से अन्तरात्मा होकर परमात्मा का ध्यान करो और भ्रान्ति-रहित
होकर बहिरात्मा का त्याग कर दो।

सकल परमात्मा
निकल
परमात्मा
अंतरात्मा
बहिरात्मा

बहिरात्मा, अंतरात्मा,
परमात्मा
बहिरात्मा अंतरात्मा परमात्मा
१-३
प्रस्तुतकर्ता - श्रीमती पूजा प्रकाश छाबडा

प्रूफरीडिंग बाकी है


मूल प्रस्तुति (PDF)

Aao Jane Jeec ko.pdf (7680 KB)