आंकाग तालिका
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अक्षम निबंध
| 10 | 44 | 23 |
|---|---|---|
| 68 | 129 | 52 |
| 131 | 49 | 129 |
नियम
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यदि किसी व्यक्ति को सम्यग्दर्शन / सम्यग्दर्शन, सम्यग्चारित्र / अनन्त चतुष्टय इन में से एक प्राप्त हो जाता, फिर वह व्यक्ति मोक्ष को ही प्राप्त कर सकता है।
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यदि यहां से बोला गया शब्द आपके Card में हो, उस शब्द के साथ बोले गये पंक्ति को लिखल और याद कर ले।
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इस Card में पांच पड़ाव है।
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प्रथम पड़ाव का नाम सम्यग्दर्शन
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द्वितीय " सम्यग्ज्ञान
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तृतीय तीसरे " सम्यग्चारित्र
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जो चारकोने है वह अनंत चतुष्टय है
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- वह अन्तिम पड़ाव मोक्ष
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- सम्यग्दर्शन पहली पंक्ति
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- दूसरी पंक्ति सम्यग्ज्ञान
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- तीसरी सम्यग्चारित्र
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- अनंत चतुष्टय
14027
| क्रम | विषय | परिभाषा जो जीव करते हैं |
|---|---|---|
| 1 | जिन | जिसने मोह-राग-द्वेष और इन्द्रियों को जीत लिया हो। |
| 2 | सिद्ध | जिसने मोक्ष जाने की पात्रता नहीं हो पर सम्यक् है। |
| 3 | अरिहंत | जिसने मोक्ष को ही प्राप्त कर सकता है। |
| 4 | क्षमा | क्रोध का अभाव होना। |
| 5 | अकिंचन्य | भाह्यतत्वी राग का अप्रतीति राग कहते हैं। |
| 6 | अकिंचन्य | सब के अभाव स्वरूप होने से अकिंचन्य गुण कहते हैं। |
| 7 | ब्रह्मचर्य | आत्मा में विषय भोग की इच्छा का अभाव। |
| 8 | सम्यकचारित्र | अपने कुन्दकुन्द का भेद करना से के पक्ष |
| 9 | सम्यकज्ञान | अपने कुन्दकुन्द का भेद करना |
| 10 | श्रीगुरु | अष्ट प्रातिहार्य पद हेतुकर की प्राप्ति |
| 11 | मुद्रामीमांसा | अपनी उपलब्धि का प्रसिद्ध काव्य ग्रन्थ |
| 12 | मुद्रामीमांसा | अपनी उपलब्धि का प्रसिद्ध काव्य ग्रन्थ |
| 13 | दण्डवाला | दण्डवाला की सेवा |
| 14 | कुन्दकुन्द | सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान, सम्यकचारित्र, मोक्ष |
| 15 | जिनवाणी | सही से तीर्थंकर भगवान् ने मोक्ष प्राप्त की |
| 16 | सम्यकज्ञान | सही से तीर्थंकर भगवान् ने मोक्ष प्राप्त की |
| 17 | भावगुरु | महावीर भगवान् ने मोक्ष प्राप्त की थी |
| 18 | कुलाचार्य | तीर्थंकर भगवान् ने मोक्ष प्राप्त की थी |
| 19 | व्यवहार | वास्तविक सम्यकज्ञान के अभाव में मोक्ष प्राप्त किया |
| 20 | निश्चय | सम्यकज्ञान के अभाव में मोक्ष प्राप्त किया |
| 21 | पंचालकन | सम्यकज्ञान के अभाव में मोक्ष प्राप्त किया |
| 22 | पंचालकन | सम्यकज्ञान के अभाव में मोक्ष प्राप्त किया |
| 23 | पंच परमेष्ठी | सम्यकज्ञान के अभाव में मोक्ष प्राप्त किया |
| 24 | पंच परमेष्ठी | सम्यकज्ञान के अभाव में मोक्ष प्राप्त किया |
प्रश्नोत्तरी
- उत्कृष्ट
उत्तम से उत्तम, श्रेष्ठ या निर्दोष क्रिया की विशेष पूर्णता को कहते हैं। - अष्टकर्म
ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी, वेदनी, मोहनी, आयु, नाम, गोत्र, अंतराय। - अष्टदिशा
पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य। - अष्टद्रव्य
जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल, लोक, अलोक। - अष्टमंगलिक
स्वस्तिक, श्रीवत्स, नन्द्यावर्त, वर्धमान, भद्रासन, कलश, मीनयुगल, दर्पण। - अष्टमूर्ती
जो परम पद में स्थित हो। - अष्टसिद्धी
जो आठों सिद्धियों का अभ्यास करते हैं। - अष्टाह्निका
जो अष्टाह्निका तपस्या करके धर्म का उपमान करते हैं। - अनादि
जो आदि से रहित हो। - अनादिमरण
जो सदा से पाप-पुण्य के अधिकारी हैं। - अनादिभाव
जो रत्नत्रय की आराधना करते हैं। - अनादिमिथ्यात्व
जो धर्मभाव को प्राप्त करते हैं। - अनादिमोक्ष
जो जीवों को भव्य और भव्यपद उत्पन्न करे। - अनादिउत्तम
जो लोक में महान् हो। - अनादिगुण
जो भेद के कारण बने। - अनादिअभव्य
जो वैराग्यी एवं सम्यक् हो। - अनादिअनादि
जो वैराग्यी, शांत एवं जितेंद्रियी हो। - अनादिभावनी
सप्त तत्व की वाणी को चिंतवणी करते हैं। - अनादिमरण
सप्त तत्व का ग्रहण करना। - अनादिमोक्ष
सप्त तत्व का ग्रहण करना। - अनादिगुण
सप्त तत्व का ग्रहण करना। - अनादिउत्तम
सप्त तत्व का ग्रहण करना। - अनादिगुण
सप्त तत्व का ग्रहण करना। - अनादिउत्तम
सप्त तत्व का ग्रहण करना। - अनादिगुण
सप्त तत्व का ग्रहण करना।
प्रश्नोत्तरी
- अनादिमोक्ष
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिभावनी
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिमरण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिमोक्ष
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं।
प्रश्नोत्तरी
- अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिगुण
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं। - अनादिउत्तम
जो मोक्ष के मार्ग को प्राप्त करते हैं।
100 40 120
101 उपाधि
जो जीव के उपयोगों, गुणों को करने में निमित्त हो।
102 अशुभ
वह जो स्वभाव को हानि व कुंठित करे।
103 अजीव
चेतनारहित गुणों का पिंड। आत्मा अजीव है।
104 अजेय
पाँच इन्द्रियें, मन के सहित भले ही जीती न जा सकें।
105 अजर
कर्मों का क्षय कर जरा-मरण के दुःख जीतना अजर है।
106 अटवी
कर्मों के अटवी। वन। जंगल।
107 अतीन्द्रिय
इन्द्रियों का स्पर्श न हो। ज्ञान।
108 अपेक्षा
पाँच इन्द्रियों के व्यापार से उपयोग। उद्देश्य।
109 अतिथि
साधुओं के आहार करने की पद्धति के अनुसार, ठहरने में।
110 अणुव्रत
गृहस्थ-श्रावकों आदि भक्त पुरुषों के त्याग के नियम। निष्ठा। नियम ही।
111 अणुव्रतगुण
गृहस्थ धर्म के। अहिंसा नियम का पालन होने से।
112 अणुव्रतयोग
गृहस्थ धर्म त्यागिक का व अ-वरु। अणु विज्ञान के नियम से निरूपण हो।
113 अज्ञानमार्ग
ज्ञानमार्ग, ज्ञानदर्शन आदि का व कर्मों तथा नैतिक स्थलों का वर्णन होने से।
114 अज्ञान
एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ में अस्तित्व न होने का अज्ञान कहते हैं।
115 अभाव
एक द्रव्य की वर्तमान पर्याय का दूसरी द्रव्य की पर्याय में अभाव।
116 अभावज्ञान
एक पुद्गल द्रव्य की वर्तमान पर्याय का अन्य पुद्गल द्रव्य की वर्तमान पर्याय में अभाव।
117 अभावोपयोग
एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य में अभाव।
118 अभावार्थ
नित्य-नैमित्तिकों में करना। रचना ही। सामग्री ही।
119 अहंकार
जो पिछली अवस्था में विकास का कारण बनता था, उसे अपने को ही श्रेष्ठ
120 अहंमन्य
की भावना है।
121 अज्ञान
अज्ञान सभी दोषों के आदि। अज्ञान त्याग विभाग करें।
122 अहिंसक कर्म
अहिंसक कर्म। जीव हिंसा के प्रति।
123 अकारण
अकारण वाणी के भाव। जीव हिंसा के प्रति।
124 अकारण
अकारण वाणी के भाव। जीव हिंसा के प्रति।
125 अकारण
अकारण वाणी के भाव। जीव हिंसा के प्रति।
126 अकारण
अकारण वाणी के भाव। जीव हिंसा के प्रति।
127 अकारण
अकारण वाणी के भाव। जीव हिंसा के प्रति।
128 अकारण
अकारण वाणी के भाव। जीव हिंसा के प्रति।
129 अकारण
अकारण वाणी के भाव। जीव हिंसा के प्रति।
130 अकारण
अकारण वाणी के भाव। जीव हिंसा के प्रति।
131 अकारण
अकारण वाणी के भाव। जीव हिंसा के प्रति।
132 अकारण
अकारण वाणी के भाव। जीव हिंसा के प्रति।
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मूल दस्तावेज़ (PDF): 232.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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