आहिंसा का फलक — जैन स्वाध्याय सामग्री | Aahinsa Ka Phalak

आहिंसा का फलक

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

अहिंसा की जीत

( सुनो सुनाएँ सत्य कथाएँ )

आशीर्वाद
पू० गणिनी आर्यिका रत्न श्री १०५ सुपार्श्वमति माता जी

लेखक
ब्र० धर्मचंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य

प्रकाशक
आचार्य धर्मश्रुतग्रंथमाला

अहिंसा की जीत

आशीर्वाद : परम पूज्य गणिनी आर्यिका
श्री सुपार्श्वमति माता जी
लेखक : ब्र० धर्मचंद शास्त्री
प्रकाशन वर्ष : १९६६
मूल्य : १५.०० रुपये
प्रकाशक : आचार्य धर्मश्रुत ग्रंथ माला
प्राप्ति स्थान : श्री दि० जैन मंदिर
गुलाब वाटिका लोनी
रोड दिल्ली
फोन : ०५७५-६०००७४
मुद्रक : शिक्षा प्रिन्टर ग्राईज
नवीन शाहदरा दिल्ली-३२

अहिंसा की जीत

क्रम
१. पाप का बोझ
२. सच्चा सुख
३. सच्चा न्याय
४. कोयले की दलाली
५. सच्ची जीत
६. ईर्ष्या
७. नीलमपरी और पंकज
८. ढोंगी साधु
९. विजेता
१०. सब को प्यार करो
११. राजा की शर्त
१२. जरूरत और शाकाहार
१३. पुण्य का फल
१४. मैं मांस नहीं खाऊंगा
१५. सबसे सस्ता भोजन

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पाप का बोझ

एक गरीब आदमी था - बनवारी लाल उसके पास छोटा सा खेत था, जिसमें वह अपना पेट भरने के लिए अनाज उगा लेता था। उसके पास कुछ मुर्गियाँ भी थीं। उन्हीं के अंडे बेचकर उसको कुछ पैसे भी मिल जाते थे।

एक दिन बनवारी ने देखा कि एक मुर्गी ने सोने का अंडा दिया है। बनवारी बहुत खुश हुआ। उसने वह सोने का अंडा एक सुनार को बेचा तो उसे बहुत-सारा धन मिल गया। अब वह मुर्गी हर रोज एक सोने का अंडा देती। बनवारी उसे ले जाकर बेच देता। धीरे-धीरे बनवारी मालामाल हो गया।

अब बनवारी के मन में लालच आया। उसने सोचा कि क्यों न मुर्गी को मारकर सारे सोने के अंडे निकाल लूँ। इस तरह रोज-रोज की झंझट भी खत्म हो जावेगी। बस उसने उस मुर्गी का पेट चीर डाला। लेकिन उसमें उसे भी एक अंडा न मिला। मुर्गी तो मर ही चुकी थी। बनवारी हाथ मलता रह गया।

लेकिन इसके बाद से बनवारी उदास रहने लगा। धीरे-धीरे उसका धन भी खत्म होने लगा। बनवारी के पास जितनी मुर्गियाँ बची थीं वे भी मर गयीं।

इन्हीं दिनों वर्षा न होने से सूखा पड़ा। बनवारी का खेत भी सूखा रह गया। फसल न होने से अनाज भी न मिला। सोने के अंडों से कमाया धन भी खत्म हो चला था।

बनवारी बहुत परेशान रहने लगा। उसने सोचा कि अब कोई और काम करना चाहिए। यह सोचकर वह बचा हुआ धन लेकर

मुर्गियों की मौत

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शहर गया और बहुत सी मुर्गियाँ खरीद लाया। उसने तय किया कि वह अंडों का व्यापार करेगा।

अब हर रोज वह मुर्गियों के दड़बे में अंडे लेने जाता तो उसे हर रोज एक मुर्गी मरी हुई मिलती। धीरे-धीरे उसकी मुर्गियों की संख्या कम होने लगी। बनवारी बहुत परेशान हुआ।

एक शाम की बात है। बनवारी घर के बाहर सिर लटकाए बैठा था। तभी एक फकीर आवाज लगाता हुआ उधर से गुजरा। बनवारी ने जैसे ही कुछ पैसे निकाले और फकीर को देने गया।

बनवारी ने जैसे ही पैसे देने के लिए हाथ बढ़ाया कि उसे देखकर फकीर चिल्लाया - तू खूनी है खूनी है दूर हट दूर हट ले जा अपने पैसे। और तेजी से कदम बढ़ाता चला गया। घबराया हुआ परेशान बनवारी एक क्षण के लिए कुछ भी न समझ पाया कि फकीर ने ऐसा क्यों कहा?

बनवारी घर लौट आया। लेकिन अब उसका मन परेशान था कि फकीर ने उसे खूनी क्यों कहा। मैंने तो आज तक किसी का खून नहीं किया।

बनवारी को उदास देखकर उसकी पत्नी ने बहलाने के लिए समझाया - तुम भी किन बातों में पड़ गए। भला यह चलते फकीर की बात में कोई दम होता है। चलो उठो, खाना ठंडा हो रहा है।

नहीं मुझे भूख नहीं है। तुम खा लो। बनवारी ने कहा।

पत्नी ने बहुत समझाया। पर बनवारी उस रात भूखा ही लेट गया। परन्तु आँखों में नींद न थी। हर पल उसके सामने उस फकीर का चेहरा नाचता था। जाता। फिर उसकी बातें याद करके बनवारी का दिल डूबने लगता।

मुर्गियों की मौत

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सवेरा हुआ। बनवारी उठा और उस फकीर की तलाश में निकल पड़ा। पूरा शहर छानने के बाद आखिर एक सुनसान टूटे फूटे घर में वह फकीर मिल गया। बनवारी उसके पास पहुँचा तो वह फकीर फिर चिल्लाया - दूर हट दूर हट यहाँ क्यों आया है। तेरे हाथों में खून लगा है।

बनवारी ने अपने दोनों हाथ ऐसे पर वे तो साफ थे। यह देखकर फकीर हँसा - अरे नादान तेरी अक्ल पर पर्दा पड़ा है। इसीलिए तुझे अपने हाथों में लगा खून नहीं दिखाई दे रहा।

बनवारी ने फकीर के पैर पकड़ लिए। वह बोला - अब और पहेलियाँ न बुझाइए। मुझे सही राह दिखाइए। मुझे बताइए कि मुझसे क्या गलती हुई है।

फकीर ने बनवारी की आँखों से आँसू बहते देखे तो गंभीर हो गया।

अच्छा तू अगर सही दिल से अपने गुनाह को मानने के लिए तैयार है, तो सुन। मैं समझाता हूँ। फकीर ने कहा -

बनवारी संभल कर बैठ गया। फकीर ने आँखें बंद करके कहा - तेरे पास जो खेत था। उससे तुम भर पेट अनाज मिल जाता था। फिर भी तूने मुर्गियाँ पाल रखी थीं और उनके अंडे बेचता था। उन अंडों को कुछ दूर छूट लोग खाते थे।

हाँ महाराज। बनवारी ने कहा।

जरा ये बता कि अगर कोई तेरे बच्चों को इसी तरह बेच दे ताकि लोग उन्हें मारकर खा जाएँ - तो तुझे कैसा लगेगा?

यह तो बड़े दुख की बात होगी। मैं तो मर जाऊँगा।

तो क्या तूने कभी सोचा कि जिन मुर्गियों के बच्चों को तू बेचता था, उससे मुर्गियों का कितना कर होता रहा होगा।

मुर्गियों की मौत

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तो क्या, अंडे में जीव होता है स्वामी। बनवारी ने पूछा। और क्या मूर्ख। अंडे से ही तो मुर्गी पैदा होती है। इस जगत के समस्त पक्षी अंडे से ही जन्म लेते हैं। तब उन्हें खाना या खाने के लिए बेचना - पाप पाप हुआ कि नहीं?

हाँ स्वामी। पाप तो हुआ। पर मैं तो अनजान था। बनवारी ने कहा।

हाँ यही बात है। चूंकि तू अनजान था, इसलिए उस परमपिता परमेश्वर ने तेरा यह एक ऐसी मुर्गी भेजी जो सोने का अंडा देती थी। भगवान ने सोचा कि तू अपनी गरीबी मिटाकर उन मुर्गियों पर दया करेगा और उन्हें छोड़ देगा। याद रख। भगवान जिसे धन देता है, उसे वह उम्मीद करता है कि वह दयालु, परोपकारी और नेक बनेगा। दीनता पाकर जो भटक जाते हैं और सच्चाई का रास्ता छोड़ देते हैं - उनका विनाश भी बहुत जल्दी होता है। ओह इस तरह सोने की मुर्गी को मारकर मैं खूनी हो गया।

हाँ। तुमने जीव-हत्या तो की। और उसका पाप तुम्हारे सिर पर कुल्हाड़ बोल रहा है। फकीर ने कहा।

लेकिन जब मैंने दुबारा मुर्गियाँ पाली?

तो तुमने फिर से खूनी व्यापार शुरू किया। अब भगवान ने तुम्हें मुर्गियों के अंडे बेचकर कमाए पाप का दंड दिया और आज तुम्हारी ये हालत हो गयी है। अगर अब भी इस जीव-हत्या के व्यापार को तुमने न छोड़ा, तो तुम न सिर्फ कंगाल हो जाओगे, बल्कि तुम्हारा परिवार, घर, खेत - सब नष्ट हो जायेंगे। अरे मूर्ख भला पाप की गद्दी सिर पर रखकर कोई इस संसार में सुखी रह सका है।

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फकीर की इन बातों को सुनकर बनवारी भय से काँपने लगा। उसे लगा कि वह न सिर्फ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का खूनी है, बल्कि मुर्गियों के सैकड़ों मासूम बच्चों का भी वह हत्यारा है। उनके अंडों को नष्ट करने के लिए बेचकर उसने जो पाप किया है, उसकी तो कोई सीमा ही नहीं है। इस पाप का बोझ तो वह इस जन्म में क्या सात जन्मों में भी कम न कर पाएगा।

यह सोचकर बनवारी बिलख-बिलख कर रोने लगा - मैं पापी हूँ मैं खूनी हूँ मुझे बचाए मुझे बचाए मैं प्रायश्चित करना चाहता हूँ। पाप का बोझ कम करना चाहता हूँ।

बनवारी की गिड़गिड़ाहट और सच्चे मन से प्रायश्चित की बात सुनकर फकीर ने कहा - तो शांत मन से सुनो - मैं तुम्हें प्रायश्चित करने और पाप का बोझ कम करने का उपाय बताता हूँ।

बनवारी ने अपने आप के संभाला और फकीर की बात ध्यान से सुनने लगा।

फकीर ने कहा - तुम अब संकल्प लो कि अब कभी जाने-अनजाने जीव-हत्या नहीं करोगे। किसी पक्षी या पशु, यहाँ तक कि कीड़ों को भी नहीं मारोगे। यह संकल्प तुम्हें जो ताकत देगा उसके बल पर तुम जन-जन में प्रचार करोगे कि लोग अंडा न खाएँ। वे शाका-हारी अधिक खाएँ।

मैं ऐसा ही करूँगा स्वामी। बनवारी ने कहा।

तुमने राजकुमार सिद्धार्थ की कहानी सुनी होगी। एक बार उनके भाई देवदत्त ने हंस को अपने तीर का निशाना बनाया। घायल हंस को गिरा देखकर राजकुमार सिद्धार्थ ने उठा लिया। उन्होंने उसके घाव को धोया और उसे दवा लगायी। तभी देवदत्त आ गया और हंस माँगने लगा। किन्तु सिद्धार्थ ने देने से मना कर

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दिया। आखिर दोनों भाई कैसा काम करने के लिए पिता राजा शुद्धोदन के पास आए। दोनों के बड़े सुनकर राजा ने कहा - हम सिद्धार्थ को मिलेगा - क्योंकि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। सो इसी तरह तुम यह समझलो कि पशु-पक्षियों की हत्या करने की बजाए उनकी सेवा करने से कहीं अधिक पुण्य मिलता है। इसलिए अब उनकी सेवा करो। धीरे-धीरे तुम्हारे पापों का बोझ अपने आप कम हो जाएगा।

बनवारी वापस घर लौटा तो उसका मन प्रसन्न था। अब वह पशु-पक्षियों का सेवक बन गया था। उसके बाड़े में तरह-तरह के पक्षी निर्भय होकर आते। वह बीमार पक्षियों का उपचार भी करने लगा था। अपने छोटे से खेत में वह अनाज के साथ-साथ शाक-भाजी भी उगाने लगा था। इससे अंडों की तुलना में उसे कहीं ज्यादा आमदनी होने लगी थी। उसकी प्रेरणा से अनेक लोगों ने साभिज भोजन की बजाए शाकाहारी भोजन करना शुरू कर दिया था। बनवारी प्रसन्न था क्योंकि उसका हृदय पापों के बोझ से मुक्त होकर निर्मल बन गया था।

अपनी ही लगाना इस वाली धूप को रोक देता है
और पछतावे का भी अवसर नहीं देता।


सच्चा सुख

राजा इन्द्रसेन बहुत वीर और साहसी पुरुष था। उसने अपने आसपास के तमाम छोटे राज्यों को जीत लिया था। उन छोटे राज्यों के राजा, इन्द्रसेन के अधीन रहने लगे थे।

राजा इन्द्रसेन जितना बहादुर था, उतना ही शौकीन भी था। उसे संगीत और नृत्य से प्रेम था। उसके दरबार में बड़े-बड़े नर्तक आकर अपनी संगीत-कला प्रस्तुत करते और इनाम लेकर जाते। नृत्य-कला में निपुण अनेक कलाकार आकर इन्द्रसेन के दरबार में नृत्य प्रस्तुत करते और रुपयों से झोलियां भरकर ले जाते।

राजा इन्द्रसेन ने अपने राज्य की व्यवस्था बहुत अच्छी कर रखी थी। कोई चोरी न होती और न ही कोई बेईमानी करता। ऐसे लोगों को बड़ी कठोर सजा दी जाती थी। राजा इन्द्रसेन का हुक्म था कि कोई व्यक्ति बेकार न रहे। भीख मांगने वालों से उसे बहुत चिढ़ थी। इस तरह पूरे राज्य की जनता को सुखी बनाने में राजा इन्द्रसेन ने कोई कसर न उठा रखी थी।

किन्तु इसके बावजूद उसके राज्य में रहने वाले लोग दुखी थे। कोई घर ऐसा न था जहां कोई बीमार न हो। उस राज्य के सभी वैद्य इलाज कर-कर के परेशान थे। स्वयं राजा इन्द्रसेन की समझ में न आता कि उसकी प्रजा के चेहरे पर खुशी क्यों नहीं दिखाई देती। सब लोग उदास क्यों हैं।

एक दिन राजा इन्द्रसेन ने राज ज्योतिषी से पूछा - क्या कारण है कि मेरी सारी कोशिशों के बावजूद, मेरे राज्य की प्रजा का चेहरा उदास क्यों रहता है।

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राजा ज्योतिषी ने विचार किया फिर ग्रहों की शांति के लिए उपाय बताया। उन्होंने कहा कि आप एक बड़ा शांति-यज्ञ करें। उसमें पशु बलि चढ़ाएं। तब शांति - स्थापित होगी।

राजा इन्द्रसेन ने राज ज्योतिषी की बात मान ली। यज्ञ हुआ, पशु बलि दी गयी। लेकिन इसके बाद तो हालत और भी ज्यादा बिगड़ गई। अचानक महामारी फैल गयी। सैकड़ों लोग मर गए। बहुत से लोग इन्द्रसेन का राज्य छोड़ कहीं और जाकर बस गये।

यह सब देख-सुनकर राजा इन्द्रसेन बहुत दुखी हुआ। उसके चेहरे की मुस्कान चली गयी। अब वह स्वयं भी बीमार रहने लगा। राजवैद्य ने बहुत इलाज किया, पर कोई लाभ न हुआ।

इन्हीं दिनों की बात है। एक दिन राजा इन्द्रसेन के लिए जब नाश्ता आया तो उसमें अंडे नहीं थे। वो भी दुख और बीमारी के कारण इन्द्रसेन चिड़चिड़े स्वभाव का हो गया था। नाश्ते में अंडे न देखकर वह आगबबूला हो उठा। उसने तत्काल रसोईए को बुलाकर फटकार लगाई।

इन्द्रसेन तेरी ये हिम्मत, कि हमें नाश्ते में अंडे देना भूल जाए।
रसोइया नहीं महाराज। मैं ऐसी हिम्मत कैसे कर सकता हूं।
रसोइया महाराज - दरअसल आज पूरी बाजार में अंडे नहीं मिले।
इन्द्रसेन क्या बकते हो? राजा इन्द्रसेन दहाड़ उठे। क्या मेरे राज्य की सब मुर्गियां मर गई।
रसोइया हां महाराज। कुछ तो मुर्गियां महामारी के दौरान मर गई। जो बची थी वो अंडे नहीं देती। दूसरे किसी गांव में अंडे मिलते नहीं हैं।

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इन्द्रसेन झूठ एकदम झूठ। - मैं तेरे इस झूठ के लिए तुझे सज़ा दूंगा। अभी सज़ा का पता लगवाता हूं।

इसके बाद राजा इन्द्रसेन ने कोतवाल को बुलवाया और उसे हुक्म दिया कि पूरी बाजार छान डालो और जितने अंडे मिलें सब खरीद लाओ।

शहर कोतवाल ने पूरा बाजार छान डाला, पर एक भी अंडा न मिला। उसने वापस आकर राजा इन्द्रसेन को बताया कि अंडे तो एक भी नहीं हैं। सब यही कहते हैं कि कल आना आज तो सारे अंडे बिक गये।

इन्द्रसेन सारे अंडे बिक गये। - आश्चर्य से कहा ऐसा कौन माई का लाल है जो सारे अंडे खरीद ले गया।
कोतवाल पता नहीं हुजूर।
इन्द्रसेन तो पता लगाओ। - इन्द्रसेन ने झल्लाकर कहा।

अगले दिन फिर वही हुआ। इन्द्रसेन के सामने जब रसोइए ने नाश्ता रखा तो उसमें अंडे न थे। वह फिर से चीख उठा। अंडे क्यों नहीं लाए?

रसोइया भय से थरथर कांपते हुए रसोइए ने कहा - हुजूर मैं तो सुबह ही गया था अंडे लेने। लेकिन पता लगा कि कोई आदमी सारे मुर्गी पालकों से अंडे खरीद ले गया है।

इन्द्रसेन ओह वो बदमाश है जो राजा इन्द्रसेन को परेशान कर रहा है। उसे पता नहीं है कि इन्द्रसेन उसको पल भर में मौत के घाट उतार देगा।
कोतवाल उत्तर में रसोइया चुप खड़ा रहा।
इन्द्रसेन ठीक है, तुम जाओ। - शहर कोतवाल को भेजो इन्द्रसेन ने कहा।

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थोड़ी देर में सिर झुकाए हुए शहर कोतवाल राजा के सामने हाजिर हो गया। उसने हक्केमाके से साफ पता लग रहा था कि वह उस व्यक्ति का पता नहीं लगा सका था जो अंडे खरीद रहा था।

राजा इन्द्रसेन क्रोध से पागल हो उठे - तुम कैसे कोतवाल हो मामूली से आदमी का पता नहीं लगा सके। अगर कल तक वह आदमी मेरे सामने तुमने पेश न किया, तो मैं तुम्हारी गर्दन काट दूंगा।

शहर कोतवाल जिस तरह गर्दन झुकाए आया था वैसे ही लौट गया। उसे सारी रात नींद न आयी। भोर होते ही वह उठा और मुर्गी पालकों के यहां पहुंचा। वह जानना चाहता था कि अंडे खरीदने वाला कौन है। लेकिन अफसोस तो तब हुआ जब हर मुर्गीपालक ने यही कहा - अभी थोड़ी देर पहले कोई सारे अंडे खरीद कर ले गया।

शहर कोतवाल ने अपना माथा पीट लिया और घर लौट आया। वह जानता था कि आज शाम तक अगर वह व्यक्ति न पकड़ा गया तो राजा इन्द्रसेन उसे मौत की सजा दे देगा। इसलिए शहर कोतवाल ने सोचा कि अच्छा यही होगा कि यहां से कहीं और भाग चले।

बस सुबह का उजाला होने से पहले शहर कोतवाल ने कुछ जरूरी सामान लिया और अपने परिवार के साथ भाग निकला।

राजा इन्द्रसेन की सीमा तक पहुंचते-पहुंचते सूर्य काफी चढ़ आया था। उस समय कोतवाल एक घने जंगल में गुजर रहा था। थकान और भूख-प्यास से बेहाल हो रहा था। कुछ दूर पर किसी महात्मा का आश्रम दिखाई दिया। वहां उसने केले का आश्रम में व्यस्त थे।

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कोतवाल ने सोचा कि वहां चलकर पानी पिया जाए ताकि आगे की यात्रा हो सके।

आश्रम में पहुंचने पर कोतवाल की भेंट एक ऋषि से हुई। उन्होंने बड़े प्रेम से कोतवाल को बुलवाया बिठाया पानी पिलाया और फिर कुशल समाचार पूछा। उत्तर में कोतवाल ने सारी बातें विस्तार से बता दी। तब उन ऋषि ने कहा - मेरे आश्रम की एक कोठरी में तुम निर्भय होकर रहो। तुम्हें कोई कष्ट न होगा।

उन ऋषि का नाम था - महानंद। कोतवाल को शंका हुई कि जंगल में रहने से कहीं कोई जानवर रात को हमला तो न करेगा। लेकिन ऋषि महानंद ने तत्काल उनकी शंका का समाधान कर दिया। उन्होंने कहा - जिस तरह तुम किसी जीव की भूख मिटाने के लिए अपने शरीर का मांस नहीं देना चाहते, इसी तरह अन्य जीव भी अपने शरीर की रक्षा करते हैं। तुम निश्चिंत रहो।

और कोतवाल वहां शांति से ठहर गया।

इधर कोतवाल के अचानक चले जाने से राजा इन्द्रसेन की चिंता और बढ़ गई। उसे अगले दिन भी अंडों का नाश्ता न मिला। वह भी पता न चला कि सारे अंडे कौन ले गया।

तब राजा इन्द्रसेन के दरबारियों ने उसे सलाह दी कि क्यों न वह शिकार के लिए जाए। इससे मन बहल जाएगा। इन्द्रसेन को यह सुझाव अच्छा लगा। उन्होंने तुरंत अपने मंत्री को आज्ञा दी कि सिपाहियों के साथ शिकार पर चलने की तैयारी की जाए।

अब राजा इन्द्रसेन अपने दल-बल के साथ शिकार के लिए जंगल में पहुंचे। वहां इन्द्रसेन ने एक बहुत सुन्दर हिरन देखा। वह उसका शिकार करना चाहते थे। लेकिन हिरन ने चौकड़ी भरी और भाग चला। राजा इन्द्रसेन ने भी अपना घोड़ा उसके पीछे दौड़ा दिया।

अहिंसा की जीत

जंगल में अकेले काफी दूर तक घोड़ा दौड़ाने के बाद राजा इंद्रसेन को लगा कि हिरन तो कहीं और चला गया है और वह स्वयं रास्ता भटक गए हैं।

उधर राजा इंद्रसेन के मंत्री और सिपाही भी उन्हें ढूँढ़ते हुए जंगल में भटक रहे थे।

अचानक कुछ सिपाही उस स्थान से गुज़रे जहाँ ऋषि महानंद का आश्रम था। वह एक वृक्ष के नीचे ध्यान लगाए बैठे थे। सिपाही उनके पास आए और बोले क्यों रे साधु। तूने किसी को इधर से जाते देखा है।

ऋषि महानंद ने आँखें बंद किए-किए ही कहा कि मुझे नहीं मालूम।

थोड़ी देर बाद राजा का मंत्री आया। उसने भी वही प्रश्न किया और महानंद ने वही उत्तर दिया। अंत में राजा आया उसने कहा - स्वामी मैं रास्ता भूल गया हूँ। मेरी सहायता कीजिए।

ऋषि महानंद ने आँखें बंद किए-किए ही इशारा किया कि इधर जाओ, रास्ता मिल जाएगा। राजा इंद्रसेन उधर ही गए तो मंत्री और सिपाही सभी मिल गये। राजा इंद्रसेन को आश्चर्य हुआ कि ऋषिवर ने आँखें बंद किए-किए ही कैसे मुझे मार्ग बता दिया।

राजा इंद्रसेन वापस आए और ऋषि महानंद के चरणों में सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया। फिर उन्होंने पूछा कि आपने कैसे मेरा मार्ग दर्शन किया?

उत्तर में ऋषि ने आँखें बंद किए ही कहा राजन। तुमने पहले तुम्हारे सिपाही तुमको पता पूछते आए और उनके बाद तुम्हारा मंत्री आया। अंत में तुम आए। मैंने उनकी वाणी सुनकर जान लिया था कि वे कौन हैं। इसलिए अंत में तुम्हें पहचानकर मैंने मार्ग बता

अहिंसा की जीत

दिया। सुनो राजन! मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसकी वाणी और भाषा भी वैसी ही हो जाती है और उसे ही सुनकर मैं समझ गया था कि मेरे सामने कौन खड़ा है।

ऋषि महानंद के ऐसे वचन सुनकर राजा इंद्रसेन उनके चरणों में अपना मस्तक रखकर बोले - हे स्वामी आप महान हैं। कृपाकर मेरे दुखों को भी अंत कीजिए। जानता हूँ राजन! तुम्हारा दुख क्या है? ऋषि महानंद ने कहा - लेकिन तुम पुण्य से ज़्यादा पाप कमा रहे हो। पाप और मैं। आश्चर्य से राजा इंद्रसेन ने पूछा। हाँ। तुम्हारे पाप-पुण्य के खाते में पाप के घड़े भरते जा रहे हैं। तुम्हारा यह भ्रम है कि तुम जो परोपकार करते हो वह बहुत है।

पर मैं कौन से पाप कर रहा हूँ?

अण्डों का भक्षण करके जीव हत्या के पाप कर रहे हो। प्रत्येक अंडा एक जीव है। और तुम जानते हो कि इस संसार में जीव हत्या से बढ़कर कोई पाप नहीं है। जीवन देने वाला तो ईश्वर है। और जो उसकी रचना को नष्ट करता है, वही सबसे बड़ा पापी है। ऋषि महानंद ने समझाया।

हे स्वामी! आप ये क्या कह रहे हैं। राजा इंद्रसेन ने ऋषिवर के चरणों पर सिर रखकर कहा आप मुझे इससे मुक्त कीजिए। मुझ पर कृपा कीजिए।

मैं नहीं कह रहा हूँ राजन। पिछले कई दिनों से तुम्हें अंडे खाने को नहीं मिले। सब मैंने बंद करवा कर रखवा दिए ताकि तुम जीव हत्या के पाप का बोझ कुछ तो हल्का कर सको। और उसका ही फल देखो कि तुम मेरे पास तक आ गये।

क्या आश्चर्य से राजा इंद्रसेन ने कहा।

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हो राजन! तुम्हारी प्रजा इसी कारण दुखी है, क्योंकि वह भी अंडे और मांसाग्र भोजन करती है। तुम्हारे लोग कभी स्वस्थ नहीं रह सकते। महामारी फैलने का कारण भी ये ही है। इसलिये अब तुम तत्काल अंडों का सेवन छोड़ दो। अपनी प्रजा को भी जागृत करो और उसे भी इस महामारी से बचाओ। इसी में तुम्हारा और सबका हित है।

राजा इंद्रसेन को लगा कि जैसे उनकी जिंदगी में उजाला हो गया है। उन्होंने पूरे राज्य में अंडे और मांसाग्र भोजन पर पाबन्दी लगा दी। युग में लोगों को कुछ कष्ट हुआ लेकिन जब उन्हें इसके सुखों का अनुभव हुआ तो उन्हें बहुत खुशी हुई।

इसके बाद राजा इंद्रसेन और उनकी प्रजा, वास्तविक सुख का आनंद लेने लगी।

मृत्यु के मन की विविध स्थिति होती है, आदमी केवल अपने को दृष्टि-सम्पन्न समझकर सबको अंधा समझ बैठता है। उसकी समझ के दरवाज़े पर काले परदे उतर आते हैं तब उसकी परिभाषायें होती हैं।


सच्चा न्याय

जैनों के सोलहवें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ जी, पूर्व में राजा मेघरथ थे। राजा मेघरथ बड़े ही प्रतापी राजा थे। उनके यहाँ सदा न्याय ही मिलता था। उनके दान और दया धर्म का गुणगान करते हुए लोग थकते नहीं हैं।

एक दिन राजा मेघरथ दरबार में बैठे थे अचानक एक कबूतर आकर महाराज मेघरथ की गोद में गिरा। उन्होंने देखा कि कबूतर घायल है।

राजा मेघरथ ने उसे उठा लिया और बोले - लगता है यह कबूतर किसी का सताया हुआ है।

तभी आवाज़ आयी - हाँ राजन! आप ठीक कहते हैं यह कबूतर मेरा शिकार है।

मनुष्य की बोली बोलने वाले की आवाज़ जब राजा मेघरथ ने देखा तो आश्चर्य में पड़ गए। सामने मुँडेर पर एक बाज बैठा था।

तुम कौन हो? राजा ने पूछा

मैं तो एक साधारण बाज हूँ। यह कबूतर मेरा भोजन है। इसका पीछा करते-करते मैं यहाँ तक आ गया हूँ।

राजा मेघरथ और उस बाज का यह संवाद सुनकर राज दरबार में उपस्थित लोग चकित थे।

क्या चाहते हो। राजा ने बाज से पूछा।

मैंने कहा न, यह कबूतर मेरा भोजन है। मैं इसका माँस खाऊँगा। बाज ने कहा।

अहिंसा की जीत

लेकिन यह तो अब मेरी शरण में आ गया है। और जो शरण में आ जाए, उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है। राजा मेघरथ ने कहा।

यह कैसा धर्म है नृपन्। किसी का भोजन छीनकर आप धर्म पालन की बात करते हैं। बाज ने कहा।

जो भी हो। यह कबूतर तो मैं तुम्हें नहीं दूंगा राजा ने कहा।

महाराज मैंने सुना है कि आप न्यायी हैं, धर्म प्रिय हैं, पर मेरे साथ तो आप अन्याय कर रहे हैं। यदि आप यह कबूतर नहीं दे सकते तो मुझे इसके वज़न के बराबर मांस ही दे दीजिए।

राजा मेघरथ ने सोचा कि बाज की बात तो ठीक है। उसका भोजन छीनने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। यदि मैं ये कबूतर नहीं लौटाता हूँ तो कम से कम इसके भार के बराबर माँस तो देना ही चाहिए। लेकिन कितना मांस दूँ? क्या इसके लिए किसी जीव की हत्या करूँ। यह भी तो न्याय न हुआ कि एक प्राणी की रक्षा के लिए दूसरे प्राणी की हत्या करूँ दूँ तब? राजा मेघरथ विचित्र संकट में पड़ गये।

राजदरबार में सन्नाटा छा गया। राजदरबारी समझ गये कि इस समय महाराज घोर संकट में पड़ गये हैं। उनकी समझ में भी न आ रहा था कि इस समय महाराज को वे क्या सुझाव दें।

अंत में राजा मेघरथ ने कहा - सुनो बाज। मैं तुम्हें कबूतर के भार के बराबर मांस अपने शरीर से काटकर देता हूँ।

इस निर्णय से लोग स्तब्ध रह गये। राजा की आज्ञा से तुरंत एक तराजू और चाकू मँगाया गया। तराजू के एक पलड़े में कबूतर को रखा गया और राजा मेघरथ ने चाकू से अपने शरीर का मांस काटकर दूसरे पलड़े में रख दिया। लेकिन पलड़ा फिर भी न झुका। राजा मेघरथ ने देखा कि कबूतर का भार अधिक है। उन्हें कुछ

अहिंसा की जीत

आश्चर्य तो हुआ, किन्तु अब उन्हें अपना वचन तो पूरा करना ही था।

अस्तु राजा मेघरथ ने कहा - कबूतर का भार पूरा करने के लिए मैं स्वयं तराजू के दूसरे पलड़े में बैठता हूँ।

लेकिन तभी बाज ने कहा - ठहरिए राजन! आपका वचन पूरा हो चुका है। मैं बाज नहीं, एक देव हूँ। मैं तो आपकी दानशीलता की परीक्षा ले रहा था। आप धन्य हैं। जीव रक्षा के लिए आप अपने प्राणों की बाजी तक लगा सकते हैं। आप कितने महान् हैं। आपका त्याग अपूर्व है। आपकी यह घटना भविष्य में लोगों की प्रेरणा देगी कि वे जीव रक्षा करें और मांसाहार न करें। आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए मुझे क्षमा करें।

इतना कहकर वह देव चला गया, साथ ही वह कबूतर भी उड़ गया। राजदरबार राजा मेघरथ की जयकार में गूंज उठा।

मन और बुद्धि का भोजन विचार हैं, विचार हमेशा व्यतीत होता है।


कोयले की दलाली

एक था किसान। उसका नाम था किसन। उसके पास दो बड़े-बड़े खेत थे। उन खेतों में वह खूब अच्छी फसल उगाता। हर साल खूब अनाज होता। अपने लिए वह पूरे साल का अनाज भरकर रख लेता। बाकी अनाज बेच देता। इससे उसे अच्छी आमदनी हो जाती। वह अपनी खेती-बारी से बहुत खुश था। घर में किसी तरह की कोई कमी न थी।

किसन का छोटा-सा परिवार था। पत्नी रधिया के अलावा श्यामू और गोपाल - दो छोटे बेटे थे। किसन अपनी मेहनत से जो कुछ कमा सकता था, उसी से संतुष्ट था। उसे इससे ज्यादा तो चाहिए भी न था।

एक दिन की बात है जमींदार का बेटा हरी शहर से गांव आया। बढ़िया भड़क-भड़क वाले कपड़े, कलाई में कीमती घड़ी, उँगलियों में हीरों जड़ी अंगूठियां, गले में सोने की चेन - सभी देखकर हैरान हो जाते थे।

किसन हरी का बचपन का दोस्त था। वह गांव आता तो हरी से मिले बगैर न रहता। इस बार भी वह किसन के घर आया। किसन यों तो इससे पहले भी हरी से मिला था लेकिन इस बार किसन ने देखा कि हरी पहले से कहीं ज्यादा बदल गया है - उसके ठाटबाट कहीं ज्यादा बढ़ गये हैं। उसको शान-शौकत देखकर न जाने क्यों किसन को लगा कि काश वो भी ऐसी ही ठाठ वाली जिन्दगी जीता।

अहिंसा की जीत

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क्या देख रहा है किसन! हरी ने पूछा। हरी देख रहा था कि किसन उसे इस बार कुछ अजीब आश्चर्य से देख रहा है।

कुछ नहीं हरी। अपनी झोंप मिटाते हुए किसन ने कहा - तुम कितना बदल गये हो। फिर कुछ रुककर वह बोला - शहर की जिन्दगी में बहुत मजा है न -

हां हां तो। पर किसन। ये सब पैसे का खेल है। मैं धंधा करता हूं माल तैयार करके दूसरे देशों को भेजने का बस अच्छी आमदनी होती है।

मुझे भी कोई ऐसा धन्धा बताओ न मैं भी खूब रुपया कमाऊं और फिर तुम्हारी तरह ठाट-बाट वाली जिन्दगी जियूं। किसन ने कहा। उनके मन में हरी की जैसी जिन्दगी बिताने की कल्पना हिलोरें मार रही थी।

हां हां क्यों नहीं। हरी ने कहा किसन तू ऐसा कर, मुर्गी पालन कर। मुर्गियां भी बिकेंगी और अंडे भी। आजकल शहर में मुर्गियों और अंडों की बहुत मांग है। तू देखना, सालभर में मालामाल हो जाएगा।

किसन को लगा कि जैसे उसका सपना बहुत जल्दी साकार हो जाएगा। हरी से सारी बातें पूछ कर उसने मुर्गीपालन का धंधा शुरू करने का निश्चय किया। इसके लिए उसने अपने खेत बेच दिए। केवल थोड़ी सी जमीन का टुकड़ा रखा, जिसमें वो अपना मुर्गी-फार्म खोल सके।

गांव के बड़े बुजुर्गों ने सुना तो किसन को बहुत समझाया कि वो इस धंधे को न करे। उन्होंने कहा तू मुर्गियां बेचेगा। लोग उन मुर्गियों को मारकर खाएंगे। इसका मतलब है तू उन मुर्गियों की

अहिंसा की जीत

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हत्या का कारण बनेगा। ऐसे ही अंडे बेचेगा। लोग उन्हें भी खाएंगे अरे किसन। क्यों पाप का बोझ अपने सिर पर रख रहा है।

लेकिन किसन ने उनकी कोई परवाह न की। वह कहता है कि मैं न तो अपने हाथों से मुर्गी मारूंगा, न ही अंडे तोडूंगा। तब फिर पाप कैसा। मुझे तो रुपया कमाना है बहुत सा रुपया।

कुछ ही दिनों में किसन ने अपना मुर्गी फार्म खोल लिया। उसका व्यापार भी धीरे-धीरे चल पड़ा। किसन तो दिन रात यही सपना देखा करता था कि कब उसके पास बहुत सी दौलत आएगी और कब वह शानदार घर में शानदार जिन्दगी बिताएगा।

अचानक उसके फार्म की मुर्गियां मरने लगी। हर सुबह उसे दस-बीस मुर्गियां मरी हुई मिलती। उसकी समझ में न आया कि मामला क्या है। गांव में ऐसा कोई जानकार भी न था जो उसे बताता। किसन को शक हुआ कि कहीं कोई नेवला या बिल्ली तो मुर्गियों को नहीं मार रही।

उसने दो-तीन रातें जागकर फार्म की रखवाली भी की। लेकिन कोई फायदा न हुआ। मुर्गियों के मरने की संख्या बढ़ती गई। अब तो किसन को बहुत फिक्र हुई।

एक दिन शहर से आए एक व्यापारी ने उसे बताया कि तुम्हारी मुर्गियों को महामारी हो गई है। इसलिये वो बीमार मुर्गियां और उनके अंडे नहीं खरीदेगा। किसन को काटो तो खून नहीं।

वह भागकर शहर आया। हरी भैया से मिला। फिर एक डा० से मिला। उसने कुछ दवाइयां दी लेकिन जब किसन वापस गांव आया तो केवल थोड़ी सी मुर्गियां ही बची थीं। कुछ दिनों में वे भी मर गईं।

अहिंसा की जीत

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किसन का फार्म चौपट हो गया। उसके सारे रुपए डूब गए थे। उसका सपना टूट चुका था। वह दिन रात सिर झुकाए घर में बैठा रहता। अब तो खेत भी न थे जिसमें वह अनाज उगाता। जिस जमीन के टुकड़े को उसने फार्म के लिए सुरक्षित रखा था वहां मुर्गियों को कीट इतनी ज्यादा थी कि उसमें कुछ भी अनाज उगाना संभव न था।

उन्हीं दिनों हरी फिर गांव भर आया। वह किसन का हाल पूछने उसके घर पहुंचा। किसन को उस देखकर वह सारा मामला समझ गया।

किसन तू परेशान मत हो। तेरी मुसीबत मैं समझता हूं। मैं शहर जाकर बैंक से तुझे मुर्गी-फार्म खोलने के लिए कर्ज दिलवाने का इंतजाम करता हूं। बस तुझे एक दो लोगों की जमानत दिलवानी होगी। और हां इस मकान के कागजात भी बैंक में जमा करने होंगे। अब की बार तू पूरी समझदारी से धंधा शुरू करना।

किसन को लगा कि हरी ठीक कह रहा है। उसे हरी की बातों में आशा की किरणें दिखाई दी। उसकी आंखों में दौलत कमाने और शानदार जिन्दगी बिताने के सपने फिर से डोलने लगे।

हरी भैया शहर गए। किसन हर रोज उनके संदेश का इंतजार करने लगा। अब वह पहले की तरह उदास न था। जो भी मिलता उससे किसन यही कहता - बस अब देखना। मेरा धंधा ऐसा चलेगा कि लोग देखते रह जाएंगे।

एक दिन स्कूल-मास्टर मुंशी परसराम, किसन को मिले। उन्होंने किसन का हाल सुन रखा था। वे बोले भई बड़ा अफसोस हुआ ये सुनकर कि तुमने अपने खेत बेचकर मुर्गियों का धंधा किया और वो भी चौपट हो गया। कोई बात नहीं मास्टर जी। मैं फिर से उसी

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काम को शुरू करने जा रहा हूं। और किसन ने हरी भैया वाली बात उन्हें बतायी।

मुंशी परसराम ने कुछ सोचा बोले - किसन एक कहावत - कोयले की दलाली में मुंह काला। तुमने अपना अच्छा खासा जमाजमाया खेती का काम बंद करके वो काम किया जिसकी तुम्हें जानकारी न थी और न ही है। फिर मुर्गियां और अंडे बेचकर तो तुम लोगों को मांसाहारी बनने का पाप भी तो अपने सिर पर ले रहे हो। इस बात का क्या गारंटी है कि दुबारा तुम इस धंधे में सफल हो जाओगे। भला पाप का धंधा करके कभी कोई फलता है। अरे जो लोग मुर्गी-अंडा खाते हैं, जब वे सुखी नहीं रह पाते तो तुम भला कैसे सुखी रह सकोगे। सोची और इन चार जल्दबाजी में फैसला न करना।

मुंशी परसराम चले गए। किसन को लगा कि वह ठीक कह रहे हैं। दौलत और शानदार जिन्दगी की लालच में मैं ये अंधा हो गया था। अरे क्या कमी थी मुझे? मैं भी कैसी मूर्खता कर बैठा।

किसन घर आया। जब वह अपने विचार लेकर आया तो उसने फार्म वाले जमीन के टुकड़े की सफाई की। उसने खेती करने की तैयारी करने लगा। इन बीच हरी भैया का संदेश आया तो उसने कहला दिया कि अब मुझे कर्ज नहीं चाहिए।

इसके बाद उसने उस छोटी सी जमीन में कड़ी मेहनत करके फसलें उगाई और दो साल बाद वह इस योग्य हुआ कि फिर से बड़े खेत खरीदकर खेती कर सके। वह बहुत खुश था। उसके सिर से पाप का बोझ जो उतर गया था।


सच्ची जीत

राजपुरा के दंगल की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी। आसपास के क्षेत्र के पहलवानों के लिए राजपुरा दंगल की ट्रॉफी उतना और इनाम की पदवी पाना बड़े गर्व की बात मानी जाती थी। लोगों को इस दंगल का पूरे साल इंतजार रहता। उधर अपने-अपने अखाड़ों के गुरुओं को भी पूरे साल इस दंगल की फिक्र रहती। वे अपने-अपने पहलवानों को पूरे साल खूब तैयारी कराते। लेकिन अपनी मुकाबला तो शिवपुर के तेला पहलवान और रामनगर के बिल्लू पहलवान के बीचों के बीच होता था। पिछले तीन सालों से तेला पहलवान को चेम्पीयन इस दंगल में विजयी होता रहा है। बिल्लू पहलवान के लिए यह जबरदस्त चुनौती थी। वह अपने चेले चंदू को हर साल दांव पेंच सिखाता, पर न जाने क्यों वह मात खा जाता।

इस बार के मुकाबले के लिए अभी कई महीने बाकी थे। दोनों पहलवान अपने-अपने चेलों को दांव पेंच के अच्छे अभ्यास करा रहे थे। लेकिन दोनों एक-दूसरे की खोज-खबर लेते रहते थे कि क्या कैसी तैयारी चल रही है।

तेला के कानों में अचानक एक दिन खबर पहुंची कि इस बार बिल्लू पहलवान की तैयारी औरों से बहुत अच्छी है लगता है, उसका चेला चंदू जरूर बाजी मार ले जाएगा।

इस खबर को सुनते ही तेला के कान खड़े हो गए। वह सोचने लगा कि श्यामू को कैसी तैयारी कराऊं कि वो चंदू से सवा-सेर साबित हो।

अहिंसा की जीत

बुरा है यही कहना चाहते हो न। कल्लू पहलवान ने समझाया देखा अगर श्यामू को ताकतवर बनाना चाहते हो तो उससे कहो अंडे खाए फिर देखना कमाल। ऐसी ताकत आ जाएगी कि शत्रु को गरदन एक बार दबा लेने पर छूट नहीं पाएगी।

तेजा को लगा कि कल्लू पहलवान ठीक कह रहा है। पहलवान में इतनी ताकत तो होनी चाहिए कि वो अपने दुश्मन को दबोच ले।

तेजा पहलवान शहर से लौटा तो उसने श्यामू से अंडे खाकर ताकत बढ़ाने की बात कही। पहले तो श्यामू ने आनाकानी की। फिर दंगल जीतने की चुनौती याद करके वो अंडे खाने लगा। शुरू में तो दो-चार ही खा सका। धीरे-धीरे इस अंडे रोज वह नाश्ते में खाने लगा। लेकिन श्यामू यह काम एकदम गुप्त ढंग से किया करता था।

इधर बिल्लू पहलवान भी तेजा की टोह लेता रहता था। उसे ये तो पता ही चला कि तेजा ने शहर के कल्लू पहलवान से कुछ नयी बातें सीखी हैं किन्तु वह उन बातों को नहीं जान पाया।

चंदू पहलवान का शरीर मोटा तो न था, पर वह शक्तियां भी न था। बिल्लू पहलवान रोज संडे से उसका अभ्यास कराता। फिर उसे डटकर दूध पिलवाते। खाने में हरी सब्जियां, दाल और शुद्ध घी खाने को कहते। एक दिन चंदू ने बिल्लू पहलवान से पूछा -

चंदू उस्ताद सुना है, मुर्गे के अंडे खाने से बहुत ताकत आती है। आप कहें तो मैं भी

बिल्लू खबरदार अगर अंडे का नाम भी लिया। बिल्लू पहलवान ने कहा - देख पहली बात तो ये है कि अंडा खाने का मतलब है जीव हत्या। समझ गया न।

अहिंसा की जीत

चंदू हां उस्ताद। अंडे से ही तो मुर्गा जन्म लेता है। चंदू ने कहा। दूसरी बात ये है कि अंडा हमारे शरीर में विष का काम करता है।

बिल्लू विष, पर उस्ताद अंडे खाते ही किसी को मरते तो नहीं देखा।

बिल्लू बिल्लू उस्ताद हंस पड़े अरे बेवकूफ वो ऐसा नहीं है जिसे खाते ही मौत हो जाती है। अंडा तो मीठा जहर है जो धीरे-धीरे असर करता है। ये दिल की नसों में अपना जहर जमा करता जाता है। धीरे-धीरे ऐसा रक्त जम जाता है कि अंडा खाने वाले के दिल की नसों में इतना जहर जम जाता है कि खून का बहाव रुकने लगता है। बस उसके बाद ही दिल का दौरा पड़ता है, और वो मर जाता है।

चंदू अब समझा। चंदू ने कहा, तब तो अंडा सचमुच ही मीठा-जहर है।

बिल्लू और एक बात सुन। मेरे उस्ताद नत्थू पहलवान एक बार किसी के बहकावे में आ गए। वो अपनी खुराक के साथ अंडे भी खाने लगे। धीरे-धीरे मुकाबले का दिन नजदीक आ गया। इस बीच नत्थू उस्ताद के बदन पर अच्छी खासी चर्बी चढ़ गई। अब वही चर्बी तो उसे जल्दी उतार भी न सकती थी। मुकाबले का दिन आ गया। नत्थू उस्ताद अखाड़े पर उतरे और वही हुआ जिसका डर था। नत्थू उस्ताद समझते थे कि अंडे खाने से उनका शरीर मजबूत हुआ है। जबकि मुकाबले में वो उसी मुर्गे की वजह से मार खा गए। तब समझ में आया कि वो कहा गलती कर बैठे हैं। उन्होंने फौरन अंडे खाना छोड़ा और बदन को ठीक किया। बस, फिर क्या था। अगले साल नत्थू पहलवान ने बाजी मार ली।

अहिंसा की जीत

बिल्लू अच्छा किया उस्ताद, मुझे आगाह कर दिया आपने। चंदू ने कहा।

चंदू ने शाकाहारी भोजन को ही अपनी ताकत का साधन बनाए रखा। उनका अभ्यास जैसे-जैसे बढ़ा उनमें दूध, बादाम, घी आदि की मात्रा बढ़ी। वह जितनी खुराक लेता था, उससे कहीं ज्यादा मेहनत करता था। नतीजा, इस बार उसका बदन ऐसा गठीला हो गया कि देखने वाले वाह कर उठते।

राजपुरा के दंगल का दिन आ गया। अखाड़े के चारों तरफ लोगों की भीड़ जमा हो गई। सबको इंतजार था, चंदू और श्यामू के मुकाबले का। थोड़ी ही देर में एक तरफ से चंदू अपने दोस्तों के साथ फुकारता हुआ आया। उसे देखकर लोगों को लगा कि इस बार चंदू का दांव अच्छा पड़ेगा। तभी श्यामू भी दहाड़ता हुआ आ गया। वह पहले से ज्यादा मोटा हो गया था। फिर भी वह उछलता हुआ अखाड़े में आ गया।

चंदू ने श्यामू को देखा तो, पिछले साल से वह कुछ अधिक मोटा लगा। चंदू को अचानक तरकीब सूझी अगर इसकी थोड़ी देर में थका दूं तो बाजी जीतना आसान होगा।

और वही हुआ। श्यामू का मोटापा उसके लिए मुसीबत बन पड़ा। चंदू ने उसे एकदम थका दिया। श्यामू ढीला पड़ने लगा। यह देखकर तेजा पहलवान को फिक्र हुई। उन्होंने श्यामू का हौसला बढ़ाया पर श्यामू ढीला पड़ा सो पड़ा ही गया। चंदू ने फिर ऐसे दांव चलाए कि श्यामू चारों खाने चित्त हो गया।

तालियों की गड़गड़ाहट और चंदू पहलवान की जय से अखाड़ा गूंज उठा। लोगों ने खूब होकर चंदू को उठा लिया। उधर श्यामू थका हुआ धीरे-धीरे चलकर अखाड़े से बाहर आया। उसे देखकर

अहिंसा की जीत

बिल्लू बिल्लू उस्ताद ने तेजा पहलवान से पूछा - क्या बात है, श्यामू को खुराक नहीं दी क्या।

तेजा दी तो थी पर तेजा शर्म से सिर झुकाए था।

बिल्लू उस्ताद कहीं अंडे तो न खिला दिए श्यामू को। अंडों से मोटापा ज्यादा बढ़ता है।

तेजा और तेजा की जैसे बिजली का करंट लगा। हैं बिल्लू उस्ताद। श्यामू को अंडे भी खिलाए थे। वो दरअसल कल्लू उस्ताद ने

बिल्लू कल्लू उस्ताद? कहकर बिल्लू जोर से हंसा। तुम उनके बहकावे में आ गए।

तेजा लेकिन उसने तो बहुत सोचकर सलाह दी थी।

बिल्लू उसने तुमसे नीचदी नेले की हार का बदला लिया है। याद करो वहां तुम्हारी श्यामू की जीत से उसके चेले हीरा पहलवान की कैसी हिल्ली उड़ी थी।

तेजा ओफ। मैं तो ऐसी बात सोच भी नहीं सकता था। कल्लू उस्ताद ने कहा।

बिल्लू प्यारे भाई इतना तो तुमको भी समझना चाहिए था कि अंडा तो जहर है फिर श्यामू को

तेजा बस मैं कल्लू उस्ताद के बहकावे में आ गया। खूब बदला लिया है उसने

बिल्लू चलो छोटी गलती तो इंसान से होती ही है। आगे के लिए सावधान हो जाओ।

तेजा उधर चंदू को घेरे हुए लोग पूछ रहे थे - पहलवान। इतना सुन्दर बनने के लिए क्या खाना चाहिए और क्या खाना चाहिए।

अहिंसा की जीत

मन से किसी का बुरा विचार नहीं करना चाहिए।
वचन से कटु शब्दों का उच्चारण नहीं करना और
काय से किसी भी प्राणी का घात नहीं करना।
मन-वचन-काय को सरल करना चाहिए क्योंकि
इनकी कुटिलता आत्मा के लिए कर्म-जाल बुनती है
और उसमें चेतन को फंसाकर दुर्गति में धकेल देती
है। परि तू सर्वथा मन-वचन-काय की चेष्टाओं को
नहीं रोक सकता तो अशुभ चेष्टा तो मत कर।


ईर्ष्या

आठ वर्ष के प्रशांत का नाम पूरे स्कूल में था। कारण यह था कि वह गणित में ही नहीं सभी विषयों में बहुत तेज था। स्कूल के सभी शिक्षक-शिक्षिकाएँ उसे अपने आदर्श विद्यालय का गौरव मानते थे।

प्रशांत के माता पिता के गर्व का तो ठिकाना ही न था। वे प्रशांत की उन्नति और विकास के लिए सारी चीजें लाकर देते। वे हर क्षण यही सोचते कि प्रशांत की उन्नति में कोई बाधा न आए। अच्छा से अच्छा खाना, अच्छे कपड़े, अच्छी पुस्तकें और पत्रिकाएँ - वे प्रशांत को उपलब्ध कराते। मध्यमवर्गीय परिवार में प्रशांत को सभी कुछ मिल रहा था।

प्रशांत का एक सहपाठी था - अशोक। वह प्रशांत से बहुत ईर्ष्या करता था। यों अशोक कक्षा में नंबर दो रहता था - किंतु बहुत कोशिशों के बाद भी वह प्रशांत का नंबर एक नहीं छीन पा रहा था। इस बात का दुख अशोक से ज्यादा, उसके पिता नरेश मल्होत्रा और पत्नी पिंकी मल्होत्रा को था। वे अशोक को, प्रशांत के खिलाफ खूब भड़काते, उसको खुश करते - लेकिन फिर भी वह परीक्षा फल आता तो अशोक नंबर दो पर ही रहता। इससे नरेश मल्होत्रा और पिंकी मल्होत्रा मलिन हो जाते। वे सदा यही सोचते रहते कि किस तरकीब से वे प्रशांत को पछाड़कर अपने अशोक को प्रथम स्थान दिलवाएँ।

प्रशांत के पिता हरीश शर्मा और माता नीलम शर्मा बड़े ही शालीन और सभ्य व्यक्ति थे। जनकपट और चालाकी तो उन्हें छू तक न गई थी। अशोक कभी-कभी बदले की भावना में आकर

असीसा की जीत

प्रशांत से झगड़ाकर बैठता तो वे यही कहते रहते, ‘दो तुम्हारा सहपाठी है, मित्र है उसे दुख पहुँचाना बुरी बात है।’

अशोक और प्रशांत के घर ही एक कॉलोनी में थे। अशोक की माँ पिंकी मल्होत्रा, प्रशांत की माँ नीलम शर्मा से अक्सर ही कहीं न कहीं मिल ही जाती थी। पिंकी जब भी मिलती - बड़े व्यंग्य से करती - ‘क्या बात है, निरंजना शर्मा! आजकल आप दिखाई नहीं देतीं लगता है आजकल प्रशांत को पढ़ाने में आपका टाइम ज्यादा खर्च हो जाता है।’

नीलम शर्मा कहतीं - ‘अरे पिंकी बहन! तुमसे तो करीब-करीब रोज ही मिलती हूँ वैसे सच पूछो तो हमें प्रशांत के साथ पढ़ाई में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती। तो क्या ट्यूशन लगा रखी है।’

‘उसको तो हमारी हैसियत नहीं है हां, प्रशांत के पिता अवश्य कभी-कभी पढ़ा देते हैं। वह भी तब जबकि प्रशांत खुद कुछ पूछता है। नीलम शर्मा ने कहा। भगवान करे, आपके प्रशांत को नजर न लगे। पिंकी मल्होत्रा ने कहा - हमें तो खुद बहुत अच्छा लगता है - जब से सुनते हैं कि प्रशांत फर्स्ट आया है। लेकिन एक बात खटकती है वैसे तो आप अपनी ही हैं, फिर भी बुरा न मानें तो कहूँ। बात प्रशांत की भलाई की ही है।’

पिंकी बहन। आप बात प्रशांत की भलाई की ही तो उसमें बुरा क्यों मानना। आप तो प्रशांत की प्रशंसक हैं।

'बात ये है कि प्रशांत की सेहत ठीक नहीं है एकदम दुबला पतला है जबकि वो पढ़ाई में बहुत मन लगाता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप उसकी सेहत पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहीं।

'ऐसा नहीं है बहन। हम तो प्रशांत को सभी चीजें देते हैं और कोई कमी नहीं रखते। नीलम ने कहा -

असीसा की जीत

'दरअसल प्रशांत बचपन से ही ऐसा है, दुबला-पतला। नीलम बहन! बुरा न मानना। प्रशांत का दिमाग जितना तेज है, उसे उसके दिमाग से खाना भी मिलना चाहिए। वैसे क्या मैं पूछ सकती हूँ कि उसको आप खाने के लिए क्या-क्या देती हैं।

'भोले और सरल स्वभाव की नीलम शर्मा ने कहा - दूध, घी, हरी सब्जियाँ, बादाम, अंकुरित अनाज - सभी कुछ देते हैं - साथ में मौसम के फल भी देते हैं।

यह सुनकर पिंकी मल्होत्रा ने मुँह बना लिया। उन्हें देखकर नीलम को लगा कि जैसे वह मलिन है और वह प्रशांत की देखभाल में कोई कमी कर रही है। आखिर पिंकी ने कहा - 'बस! अजी, इस खुराक से भला इतना तेज बच्चा, बड़ा होकर तो एकदम बुझ जाएगा। भला यह भी कोई खुराक है। तभी तो प्रशांत एकदम सींकिया पहलवान है। कहकर पिंकी मल्होत्रा खूब जोर से हँसी। उनका इस तरह हँसना नीलम शर्मा को बुरा लगा। फिर भी वह शालीन ढंग से उस बात को बर्दाश्त कर गयी। उन्होंने बड़े शालीनता से पूछा - 'पिंकी बहन! मैं तो अपनी समझ से प्रशांत को ठीक ही खुराक दे रही हूँ। फिर भी, यदि कोई कमी हो तो तुम बताओ मैं पूरा करूँगी।

'आप लोग शर्मा हैं न। ब्राह्मण हैं आप लोग उसे पूरा नहीं कर सकते। पिंकी ने नीलम पर चोट की।

'अब नीलम को भी बुरा लगा - 'क्यों ऐसा क्या है, जो हम प्रशांत के लिए नहीं कर सकते। इसमें हमारा शर्मा होना या न होना इसका क्या मतलब है। मतलब है बहन मतलब है पिंकी ने व्यंग्य से कहा। आप लोग वो खुराक अपने बच्चे को नहीं दे सकते जो दरअसल उसे चाहिए। इसीलिए आपके बच्चे कमजोर रहते हैं।

असीसा की जीत

'भला ऐसा क्या है, पिंकी बहन, जो हम नहीं दे सकते। जरा मैं भी तो सुनूँ। नीलम ने पूछा।

'आप प्रशांत को अंडा नहीं खिलातीं। अब देखिए न, हमारा अशोक भले ही दूसरे नंबर पर आता है लेकिन कोई दूसरा लड़का उसे पछाड़ कर तीसरे नंबर पर नहीं ला सकता - क्योंकि हम अशोक को बढ़िया खुराक देते हैं - मांस।

'भोली भाली नीलम शर्मा की बुद्धि में यह बात नहीं आयी कि अगर ऐसा है तो वो प्रशांत को क्यों नहीं पछाड़ सका। वह तो बेचारी यही सोचती रही कि वो प्रशांत के प्रति वह शायद गलत है। जबकि प्रशांत यह भी कि वह ठीक थी और पिंकी मल्होत्रा उनके साथ चाल खेल रही थी।

'बहन। हम तो ब्राह्मण हैं भला अंडा कैसे खिलाएँ, प्रशांत को।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3030.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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