आहिंसा का फलक - जैन स्वाध्याय सामग्री | Aahinsa Ka Phalak

आहिंसा का फलक

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अहिंसा की जीत

( सुनो सुनाएँ सत्य कथाएँ )

आशीर्वाद
पू० गणिनी आर्यिका रत्न श्री १०५ सुपार्श्वमति माता जी

लेखक
ब्र० धर्मचंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य

प्रकाशक
आचार्य धर्मश्रुतग्रंथमाला

अहिंसा की जीत

आशीर्वाद : परम पूज्य गणिनी आर्यिका
श्री सुपार्श्वमति माता जी
लेखक : ब्र० धर्मचंद शास्त्री
प्रकाशन वर्ष : १९६६
मूल्य : १५.०० रुपये
प्रकाशक : आचार्य धर्मश्रुत ग्रंथ माला
प्राप्ति स्थान : श्री दि० जैन मंदिर
गुलाब वाटिका लोनी
रोड दिल्ली
फोन : ०५७५-६०००७४
मुद्रक : शिक्षा प्रिन्टर ग्राईज
नवीन शाहदरा दिल्ली-३२

अहिंसा की जीत

क्रम
१. पाप का बोझ
२. सच्चा सुख
३. सच्चा न्याय
४. कोयले की दलाली
५. सच्ची जीत
६. ईर्ष्या
७. नीलमपरी और पंकज
८. ढोंगी साधु
९. विजेता
१०. सब को प्यार करो
११. राजा की शर्त
१२. जरूरत और शाकाहार
१३. पुण्य का फल
१४. मैं मांस नहीं खाऊंगा
१५. सबसे सस्ता भोजन

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पाप का बोझ

एक गरीब आदमी था - बनवारी लाल उसके पास छोटा सा खेत था, जिसमें वह अपना पेट भरने के लिए अनाज उगा लेता था। उसके पास कुछ मुर्गियाँ भी थीं। उन्हीं के अंडे बेचकर उसको कुछ पैसे भी मिल जाते थे।

एक दिन बनवारी ने देखा कि एक मुर्गी ने सोने का अंडा दिया है। बनवारी बहुत खुश हुआ। उसने वह सोने का अंडा एक सुनार को बेचा तो उसे बहुत-सारा धन मिल गया। अब वह मुर्गी हर रोज एक सोने का अंडा देती। बनवारी उसे ले जाकर बेच देता। धीरे-धीरे बनवारी मालामाल हो गया।

अब बनवारी के मन में लालच आया। उसने सोचा कि क्यों न मुर्गी को मारकर सारे सोने के अंडे निकाल लूँ। इस तरह रोज-रोज की झंझट भी खत्म हो जावेगी। बस उसने उस मुर्गी का पेट चीर डाला। लेकिन उसमें उसे भी एक अंडा न मिला। मुर्गी तो मर ही चुकी थी। बनवारी हाथ मलता रह गया।

लेकिन इसके बाद से बनवारी उदास रहने लगा। धीरे-धीरे उसका धन भी खत्म होने लगा। बनवारी के पास जितनी मुर्गियाँ बची थीं वे भी मर गयीं।

इन्हीं दिनों वर्षा न होने से सूखा पड़ा। बनवारी का खेत भी सूखा रह गया। फसल न होने से अनाज भी न मिला। सोने के अंडों से कमाया धन भी खत्म हो चला था।

बनवारी बहुत परेशान रहने लगा। उसने सोचा कि अब कोई और काम करना चाहिए। यह सोचकर वह बचा हुआ धन लेकर

मुर्गियों की मौत

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शहर गया और बहुत सी मुर्गियाँ खरीद लाया। उसने तय किया कि वह अंडों का व्यापार करेगा।

अब हर रोज वह मुर्गियों के दड़बे में अंडे लेने जाता तो उसे हर रोज एक मुर्गी मरी हुई मिलती। धीरे-धीरे उसकी मुर्गियों की संख्या कम होने लगी। बनवारी बहुत परेशान हुआ।

एक शाम की बात है। बनवारी घर के बाहर सिर लटकाए बैठा था। तभी एक फकीर आवाज लगाता हुआ उधर से गुजरा। बनवारी ने जैसे ही कुछ पैसे निकाले और फकीर को देने गया।

बनवारी ने जैसे ही पैसे देने के लिए हाथ बढ़ाया कि उसे देखकर फकीर चिल्लाया - तू खूनी है खूनी है दूर हट दूर हट ले जा अपने पैसे। और तेजी से कदम बढ़ाता चला गया। घबराया हुआ परेशान बनवारी एक क्षण के लिए कुछ भी न समझ पाया कि फकीर ने ऐसा क्यों कहा?

बनवारी घर लौट आया। लेकिन अब उसका मन परेशान था कि फकीर ने उसे खूनी क्यों कहा। मैंने तो आज तक किसी का खून नहीं किया।

बनवारी को उदास देखकर उसकी पत्नी ने बहलाने के लिए समझाया - तुम भी किन बातों में पड़ गए। भला यह चलते फकीर की बात में कोई दम होता है। चलो उठो, खाना ठंडा हो रहा है।

नहीं मुझे भूख नहीं है। तुम खा लो। बनवारी ने कहा।

पत्नी ने बहुत समझाया। पर बनवारी उस रात भूखा ही लेट गया। परन्तु आँखों में नींद न थी। हर पल उसके सामने उस फकीर का चेहरा नाचता था। जाता। फिर उसकी बातें याद करके बनवारी का दिल डूबने लगता।

मुर्गियों की मौत

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सवेरा हुआ। बनवारी उठा और उस फकीर की तलाश में निकल पड़ा। पूरा शहर छानने के बाद आखिर एक सुनसान टूटे फूटे घर में वह फकीर मिल गया। बनवारी उसके पास पहुँचा तो वह फकीर फिर चिल्लाया - दूर हट दूर हट यहाँ क्यों आया है। तेरे हाथों में खून लगा है।

बनवारी ने अपने दोनों हाथ ऐसे पर वे तो साफ थे। यह देखकर फकीर हँसा - अरे नादान तेरी अक्ल पर पर्दा पड़ा है। इसीलिए तुझे अपने हाथों में लगा खून नहीं दिखाई दे रहा।

बनवारी ने फकीर के पैर पकड़ लिए। वह बोला - अब और पहेलियाँ न बुझाइए। मुझे सही राह दिखाइए। मुझे बताइए कि मुझसे क्या गलती हुई है।

फकीर ने बनवारी की आँखों से आँसू बहते देखे तो गंभीर हो गया।

अच्छा तू अगर सही दिल से अपने गुनाह को मानने के लिए तैयार है, तो सुन। मैं समझाता हूँ। फकीर ने कहा -

बनवारी संभल कर बैठ गया। फकीर ने आँखें बंद करके कहा - तेरे पास जो खेत था। उससे तुम भर पेट अनाज मिल जाता था। फिर भी तूने मुर्गियाँ पाल रखी थीं और उनके अंडे बेचता था। उन अंडों को कुछ दूर छूट लोग खाते थे।

हाँ महाराज। बनवारी ने कहा।

जरा ये बता कि अगर कोई तेरे बच्चों को इसी तरह बेच दे ताकि लोग उन्हें मारकर खा जाएँ - तो तुझे कैसा लगेगा?

यह तो बड़े दुख की बात होगी। मैं तो मर जाऊँगा।

तो क्या तूने कभी सोचा कि जिन मुर्गियों के बच्चों को तू बेचता था, उससे मुर्गियों का कितना कर होता रहा होगा।

मुर्गियों की मौत

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तो क्या, अंडे में जीव होता है स्वामी। बनवारी ने पूछा। और क्या मूर्ख। अंडे से ही तो मुर्गी पैदा होती है। इस जगत के समस्त पक्षी अंडे से ही जन्म लेते हैं। तब उन्हें खाना या खाने के लिए बेचना - पाप पाप हुआ कि नहीं?

हाँ स्वामी। पाप तो हुआ। पर मैं तो अनजान था। बनवारी ने कहा।

हाँ यही बात है। चूंकि तू अनजान था, इसलिए उस परमपिता परमेश्वर ने तेरा यह एक ऐसी मुर्गी भेजी जो सोने का अंडा देती थी। भगवान ने सोचा कि तू अपनी गरीबी मिटाकर उन मुर्गियों पर दया करेगा और उन्हें छोड़ देगा। याद रख। भगवान जिसे धन देता है, उसे वह उम्मीद करता है कि वह दयालु, परोपकारी और नेक बनेगा। दीनता पाकर जो भटक जाते हैं और सच्चाई का रास्ता छोड़ देते हैं - उनका विनाश भी बहुत जल्दी होता है। ओह इस तरह सोने की मुर्गी को मारकर मैं खूनी हो गया।

हाँ। तुमने जीव-हत्या तो की। और उसका पाप तुम्हारे सिर पर कुल्हाड़ बोल रहा है। फकीर ने कहा।

लेकिन जब मैंने दुबारा मुर्गियाँ पाली?

तो तुमने फिर से खूनी व्यापार शुरू किया। अब भगवान ने तुम्हें मुर्गियों के अंडे बेचकर कमाए पाप का दंड दिया और आज तुम्हारी ये हालत हो गयी है। अगर अब भी इस जीव-हत्या के व्यापार को तुमने न छोड़ा, तो तुम न सिर्फ कंगाल हो जाओगे, बल्कि तुम्हारा परिवार, घर, खेत - सब नष्ट हो जायेंगे। अरे मूर्ख भला पाप की गद्दी सिर पर रखकर कोई इस संसार में सुखी रह सका है।

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फकीर की इन बातों को सुनकर बनवारी भय से काँपने लगा। उसे लगा कि वह न सिर्फ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का खूनी है, बल्कि मुर्गियों के सैकड़ों मासूम बच्चों का भी वह हत्यारा है। उनके अंडों को नष्ट करने के लिए बेचकर उसने जो पाप किया है, उसकी तो कोई सीमा ही नहीं है। इस पाप का बोझ तो वह इस जन्म में क्या सात जन्मों में भी कम न कर पाएगा।

यह सोचकर बनवारी बिलख-बिलख कर रोने लगा - मैं पापी हूँ मैं खूनी हूँ मुझे बचाए मुझे बचाए मैं प्रायश्चित करना चाहता हूँ। पाप का बोझ कम करना चाहता हूँ।

बनवारी की गिड़गिड़ाहट और सच्चे मन से प्रायश्चित की बात सुनकर फकीर ने कहा - तो शांत मन से सुनो - मैं तुम्हें प्रायश्चित करने और पाप का बोझ कम करने का उपाय बताता हूँ।

बनवारी ने अपने आप के संभाला और फकीर की बात ध्यान से सुनने लगा।

फकीर ने कहा - तुम अब संकल्प लो कि अब कभी जाने-अनजाने जीव-हत्या नहीं करोगे। किसी पक्षी या पशु, यहाँ तक कि कीड़ों को भी नहीं मारोगे। यह संकल्प तुम्हें जो ताकत देगा उसके बल पर तुम जन-जन में प्रचार करोगे कि लोग अंडा न खाएँ। वे शाका-हारी अधिक खाएँ।

मैं ऐसा ही करूँगा स्वामी। बनवारी ने कहा।

तुमने राजकुमार सिद्धार्थ की कहानी सुनी होगी। एक बार उनके भाई देवदत्त ने हंस को अपने तीर का निशाना बनाया। घायल हंस को गिरा देखकर राजकुमार सिद्धार्थ ने उठा लिया। उन्होंने उसके घाव को धोया और उसे दवा लगायी। तभी देवदत्त आ गया और हंस माँगने लगा। किन्तु सिद्धार्थ ने देने से मना कर

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दिया। आखिर दोनों भाई कैसा काम करने के लिए पिता राजा शुद्धोदन के पास आए। दोनों के बड़े सुनकर राजा ने कहा - हम सिद्धार्थ को मिलेगा - क्योंकि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। सो इसी तरह तुम यह समझलो कि पशु-पक्षियों की हत्या करने की बजाए उनकी सेवा करने से कहीं अधिक पुण्य मिलता है। इसलिए अब उनकी सेवा करो। धीरे-धीरे तुम्हारे पापों का बोझ अपने आप कम हो जाएगा।

बनवारी वापस घर लौटा तो उसका मन प्रसन्न था। अब वह पशु-पक्षियों का सेवक बन गया था। उसके बाड़े में तरह-तरह के पक्षी निर्भय होकर आते। वह बीमार पक्षियों का उपचार भी करने लगा था। अपने छोटे से खेत में वह अनाज के साथ-साथ शाक-भाजी भी उगाने लगा था। इससे अंडों की तुलना में उसे कहीं ज्यादा आमदनी होने लगी थी। उसकी प्रेरणा से अनेक लोगों ने साभिज भोजन की बजाए शाकाहारी भोजन करना शुरू कर दिया था। बनवारी प्रसन्न था क्योंकि उसका हृदय पापों के बोझ से मुक्त होकर निर्मल बन गया था।

अपनी ही लगाना इस वाली धूप को रोक देता है
और पछतावे का भी अवसर नहीं देता।


सच्चा सुख

राजा इन्द्रसेन बहुत वीर और साहसी पुरुष था। उसने अपने आसपास के तमाम छोटे राज्यों को जीत लिया था। उन छोटे राज्यों के राजा, इन्द्रसेन के अधीन रहने लगे थे।

राजा इन्द्रसेन जितना बहादुर था, उतना ही शौकीन भी था। उसे संगीत और नृत्य से प्रेम था। उसके दरबार में बड़े-बड़े नर्तक आकर अपनी संगीत-कला प्रस्तुत करते और इनाम लेकर जाते। नृत्य-कला में निपुण अनेक कलाकार आकर इन्द्रसेन के दरबार में नृत्य प्रस्तुत करते और रुपयों से झोलियां भरकर ले जाते।

राजा इन्द्रसेन ने अपने राज्य की व्यवस्था बहुत अच्छी कर रखी थी। कोई चोरी न होती और न ही कोई बेईमानी करता। ऐसे लोगों को बड़ी कठोर सजा दी जाती थी। राजा इन्द्रसेन का हुक्म था कि कोई व्यक्ति बेकार न रहे। भीख मांगने वालों से उसे बहुत चिढ़ थी। इस तरह पूरे राज्य की जनता को सुखी बनाने में राजा इन्द्रसेन ने कोई कसर न उठा रखी थी।

किन्तु इसके बावजूद उसके राज्य में रहने वाले लोग दुखी थे। कोई घर ऐसा न था जहां कोई बीमार न हो। उस राज्य के सभी वैद्य इलाज कर-कर के परेशान थे। स्वयं राजा इन्द्रसेन की समझ में न आता कि उसकी प्रजा के चेहरे पर खुशी क्यों नहीं दिखाई देती। सब लोग उदास क्यों हैं।

एक दिन राजा इन्द्रसेन ने राज ज्योतिषी से पूछा - क्या कारण है कि मेरी सारी कोशिशों के बावजूद, मेरे राज्य की प्रजा का चेहरा उदास क्यों रहता है।

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राजा ज्योतिषी ने विचार किया फिर ग्रहों की शांति के लिए उपाय बताया। उन्होंने कहा कि आप एक बड़ा शांति-यज्ञ करें। उसमें पशु बलि चढ़ाएं। तब शांति - स्थापित होगी।

राजा इन्द्रसेन ने राज ज्योतिषी की बात मान ली। यज्ञ हुआ, पशु बलि दी गयी। लेकिन इसके बाद तो हालत और भी ज्यादा बिगड़ गई। अचानक महामारी फैल गयी। सैकड़ों लोग मर गए। बहुत से लोग इन्द्रसेन का राज्य छोड़ कहीं और जाकर बस गये।

यह सब देख-सुनकर राजा इन्द्रसेन बहुत दुखी हुआ। उसके चेहरे की मुस्कान चली गयी। अब वह स्वयं भी बीमार रहने लगा। राजवैद्य ने बहुत इलाज किया, पर कोई लाभ न हुआ।

इन्हीं दिनों की बात है। एक दिन राजा इन्द्रसेन के लिए जब नाश्ता आया तो उसमें अंडे नहीं थे। वो भी दुख और बीमारी के कारण इन्द्रसेन चिड़चिड़े स्वभाव का हो गया था। नाश्ते में अंडे न देखकर वह आगबबूला हो उठा। उसने तत्काल रसोईए को बुलाकर फटकार लगाई।

इन्द्रसेन तेरी ये हिम्मत, कि हमें नाश्ते में अंडे देना भूल जाए।
रसोइया नहीं महाराज। मैं ऐसी हिम्मत कैसे कर सकता हूं।
रसोइया महाराज - दरअसल आज पूरी बाजार में अंडे नहीं मिले।
इन्द्रसेन क्या बकते हो? राजा इन्द्रसेन दहाड़ उठे। क्या मेरे राज्य की सब मुर्गियां मर गई।
रसोइया हां महाराज। कुछ तो मुर्गियां महामारी के दौरान मर गई। जो बची थी वो अंडे नहीं देती। दूसरे किसी गांव में अंडे मिलते नहीं हैं।

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इन्द्रसेन झूठ एकदम झूठ। - मैं तेरे इस झूठ के लिए तुझे सज़ा दूंगा। अभी सज़ा का पता लगवाता हूं।

इसके बाद राजा इन्द्रसेन ने कोतवाल को बुलवाया और उसे हुक्म दिया कि पूरी बाजार छान डालो और जितने अंडे मिलें सब खरीद लाओ।

शहर कोतवाल ने पूरा बाजार छान डाला, पर एक भी अंडा न मिला। उसने वापस आकर राजा इन्द्रसेन को बताया कि अंडे तो एक भी नहीं हैं। सब यही कहते हैं कि कल आना आज तो सारे अंडे बिक गये।

इन्द्रसेन सारे अंडे बिक गये। - आश्चर्य से कहा ऐसा कौन माई का लाल है जो सारे अंडे खरीद ले गया।
कोतवाल पता नहीं हुजूर।
इन्द्रसेन तो पता लगाओ। - इन्द्रसेन ने झल्लाकर कहा।

अगले दिन फिर वही हुआ। इन्द्रसेन के सामने जब रसोइए ने नाश्ता रखा तो उसमें अंडे न थे। वह फिर से चीख उठा। अंडे क्यों नहीं लाए?

रसोइया भय से थरथर कांपते हुए रसोइए ने कहा - हुजूर मैं तो सुबह ही गया था अंडे लेने। लेकिन पता लगा कि कोई आदमी सारे मुर्गी पालकों से अंडे खरीद ले गया है।

इन्द्रसेन ओह वो बदमाश है जो राजा इन्द्रसेन को परेशान कर रहा है। उसे पता नहीं है कि इन्द्रसेन उसको पल भर में मौत के घाट उतार देगा।
कोतवाल उत्तर में रसोइया चुप खड़ा रहा।
इन्द्रसेन ठीक है, तुम जाओ। - शहर कोतवाल को भेजो इन्द्रसेन ने कहा।

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थोड़ी देर में सिर झुकाए हुए शहर कोतवाल राजा के सामने हाजिर हो गया। उसने हक्केमाके से साफ पता लग रहा था कि वह उस व्यक्ति का पता नहीं लगा सका था जो अंडे खरीद रहा था।

राजा इन्द्रसेन क्रोध से पागल हो उठे - तुम कैसे कोतवाल हो मामूली से आदमी का पता नहीं लगा सके। अगर कल तक वह आदमी मेरे सामने तुमने पेश न किया, तो मैं तुम्हारी गर्दन काट दूंगा।

शहर कोतवाल जिस तरह गर्दन झुकाए आया था वैसे ही लौट गया। उसे सारी रात नींद न आयी। भोर होते ही वह उठा और मुर्गी पालकों के यहां पहुंचा। वह जानना चाहता था कि अंडे खरीदने वाला कौन है। लेकिन अफसोस तो तब हुआ जब हर मुर्गीपालक ने यही कहा - अभी थोड़ी देर पहले कोई सारे अंडे खरीद कर ले गया।

शहर कोतवाल ने अपना माथा पीट लिया और घर लौट आया। वह जानता था कि आज शाम तक अगर वह व्यक्ति न पकड़ा गया तो राजा इन्द्रसेन उसे मौत की सजा दे देगा। इसलिए शहर कोतवाल ने सोचा कि अच्छा यही होगा कि यहां से कहीं और भाग चले।

बस सुबह का उजाला होने से पहले शहर कोतवाल ने कुछ जरूरी सामान लिया और अपने परिवार के साथ भाग निकला।

राजा इन्द्रसेन की सीमा तक पहुंचते-पहुंचते सूर्य काफी चढ़ आया था। उस समय कोतवाल एक घने जंगल में गुजर रहा था। थकान और भूख-प्यास से बेहाल हो रहा था। कुछ दूर पर किसी महात्मा का आश्रम दिखाई दिया। वहां उसने केले का आश्रम में व्यस्त थे।

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कोतवाल ने सोचा कि वहां चलकर पानी पिया जाए ताकि आगे की यात्रा हो सके।

आश्रम में पहुंचने पर कोतवाल की भेंट एक ऋषि से हुई। उन्होंने बड़े प्रेम से कोतवाल को बुलवाया बिठाया पानी पिलाया और फिर कुशल समाचार पूछा। उत्तर में कोतवाल ने सारी बातें विस्तार से बता दी। तब उन ऋषि ने कहा - मेरे आश्रम की एक कोठरी में तुम निर्भय होकर रहो। तुम्हें कोई कष्ट न होगा।

उन ऋषि का नाम था - महानंद। कोतवाल को शंका हुई कि जंगल में रहने से कहीं कोई जानवर रात को हमला तो न करेगा। लेकिन ऋषि महानंद ने तत्काल उनकी शंका का समाधान कर दिया। उन्होंने कहा - जिस तरह तुम किसी जीव की भूख मिटाने के लिए अपने शरीर का मांस नहीं देना चाहते, इसी तरह अन्य जीव भी अपने शरीर की रक्षा करते हैं। तुम निश्चिंत रहो।

और कोतवाल वहां शांति से ठहर गया।

इधर कोतवाल के अचानक चले जाने से राजा इन्द्रसेन की चिंता और बढ़ गई। उसे अगले दिन भी अंडों का नाश्ता न मिला। वह भी पता न चला कि सारे अंडे कौन ले गया।

तब राजा इन्द्रसेन के दरबारियों ने उसे सलाह दी कि क्यों न वह शिकार के लिए जाए। इससे मन बहल जाएगा। इन्द्रसेन को यह सुझाव अच्छा लगा। उन्होंने तुरंत अपने मंत्री को आज्ञा दी कि सिपाहियों के साथ शिकार पर चलने की तैयारी की जाए।

अब राजा इन्द्रसेन अपने दल-बल के साथ शिकार के लिए जंगल में पहुंचे। वहां इन्द्रसेन ने एक बहुत सुन्दर हिरन देखा। वह उसका शिकार करना चाहते थे। लेकिन हिरन ने चौकड़ी भरी और भाग चला। राजा इन्द्रसेन ने भी अपना घोड़ा उसके पीछे दौड़ा दिया।

अहिंसा की जीत

जंगल में अकेले काफी दूर तक घोड़ा दौड़ाने के बाद राजा इंद्रसेन को लगा कि हिरन तो कहीं और चला गया है और वह स्वयं रास्ता भटक गए हैं।

उधर राजा इंद्रसेन के मंत्री और सिपाही भी उन्हें ढूँढ़ते हुए जंगल में भटक रहे थे।

अचानक कुछ सिपाही उस स्थान से गुज़रे जहाँ ऋषि महानंद का आश्रम था। वह एक वृक्ष के नीचे ध्यान लगाए बैठे थे। सिपाही उनके पास आए और बोले क्यों रे साधु। तूने किसी को इधर से जाते देखा है।

ऋषि महानंद ने आँखें बंद किए-किए ही कहा कि मुझे नहीं मालूम।

थोड़ी देर बाद राजा का मंत्री आया। उसने भी वही प्रश्न किया और महानंद ने वही उत्तर दिया। अंत में राजा आया उसने कहा - स्वामी मैं रास्ता भूल गया हूँ। मेरी सहायता कीजिए।

ऋषि महानंद ने आँखें बंद किए-किए ही इशारा किया कि इधर जाओ, रास्ता मिल जाएगा। राजा इंद्रसेन उधर ही गए तो मंत्री और सिपाही सभी मिल गये। राजा इंद्रसेन को आश्चर्य हुआ कि ऋषिवर ने आँखें बंद किए-किए ही कैसे मुझे मार्ग बता दिया।

राजा इंद्रसेन वापस आए और ऋषि महानंद के चरणों में सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया। फिर उन्होंने पूछा कि आपने कैसे मेरा मार्ग दर्शन किया?

उत्तर में ऋषि ने आँखें बंद किए ही कहा राजन। तुमने पहले तुम्हारे सिपाही तुमको पता पूछते आए और उनके बाद तुम्हारा मंत्री आया। अंत में तुम आए। मैंने उनकी वाणी सुनकर जान लिया था कि वे कौन हैं। इसलिए अंत में तुम्हें पहचानकर मैंने मार्ग बता

अहिंसा की जीत

दिया। सुनो राजन! मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसकी वाणी और भाषा भी वैसी ही हो जाती है और उसे ही सुनकर मैं समझ गया था कि मेरे सामने कौन खड़ा है।

ऋषि महानंद के ऐसे वचन सुनकर राजा इंद्रसेन उनके चरणों में अपना मस्तक रखकर बोले - हे स्वामी आप महान हैं। कृपाकर मेरे दुखों को भी अंत कीजिए। जानता हूँ राजन! तुम्हारा दुख क्या है? ऋषि महानंद ने कहा - लेकिन तुम पुण्य से ज़्यादा पाप कमा रहे हो। पाप और मैं। आश्चर्य से राजा इंद्रसेन ने पूछा। हाँ। तुम्हारे पाप-पुण्य के खाते में पाप के घड़े भरते जा रहे हैं। तुम्हारा यह भ्रम है कि तुम जो परोपकार करते हो वह बहुत है।

पर मैं कौन से पाप कर रहा हूँ?

अण्डों का भक्षण करके जीव हत्या के पाप कर रहे हो। प्रत्येक अंडा एक जीव है। और तुम जानते हो कि इस संसार में जीव हत्या से बढ़कर कोई पाप नहीं है। जीवन देने वाला तो ईश्वर है। और जो उसकी रचना को नष्ट करता है, वही सबसे बड़ा पापी है। ऋषि महानंद ने समझाया।

हे स्वामी! आप ये क्या कह रहे हैं। राजा इंद्रसेन ने ऋषिवर के चरणों पर सिर रखकर कहा आप मुझे इससे मुक्त कीजिए। मुझ पर कृपा कीजिए।

मैं नहीं कह रहा हूँ राजन। पिछले कई दिनों से तुम्हें अंडे खाने को नहीं मिले। सब मैंने बंद करवा कर रखवा दिए ताकि तुम जीव हत्या के पाप का बोझ कुछ तो हल्का कर सको। और उसका ही फल देखो कि तुम मेरे पास तक आ गये।

क्या आश्चर्य से राजा इंद्रसेन ने कहा।

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हो राजन! तुम्हारी प्रजा इसी कारण दुखी है, क्योंकि वह भी अंडे और मांसाग्र भोजन करती है। तुम्हारे लोग कभी स्वस्थ नहीं रह सकते। महामारी फैलने का कारण भी ये ही है। इसलिये अब तुम तत्काल अंडों का सेवन छोड़ दो। अपनी प्रजा को भी जागृत करो और उसे भी इस महामारी से बचाओ। इसी में तुम्हारा और सबका हित है।

राजा इंद्रसेन को लगा कि जैसे उनकी जिंदगी में उजाला हो गया है। उन्होंने पूरे राज्य में अंडे और मांसाग्र भोजन पर पाबन्दी लगा दी। युग में लोगों को कुछ कष्ट हुआ लेकिन जब उन्हें इसके सुखों का अनुभव हुआ तो उन्हें बहुत खुशी हुई।

इसके बाद राजा इंद्रसेन और उनकी प्रजा, वास्तविक सुख का आनंद लेने लगी।

मृत्यु के मन की विविध स्थिति होती है, आदमी केवल अपने को दृष्टि-सम्पन्न समझकर सबको अंधा समझ बैठता है। उसकी समझ के दरवाज़े पर काले परदे उतर आते हैं तब उसकी परिभाषायें होती हैं।


सच्चा न्याय

जैनों के सोलहवें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ जी, पूर्व में राजा मेघरथ थे। राजा मेघरथ बड़े ही प्रतापी राजा थे। उनके यहाँ सदा न्याय ही मिलता था। उनके दान और दया धर्म का गुणगान करते हुए लोग थकते नहीं हैं।

एक दिन राजा मेघरथ दरबार में बैठे थे अचानक एक कबूतर आकर महाराज मेघरथ की गोद में गिरा। उन्होंने देखा कि कबूतर घायल है।

राजा मेघरथ ने उसे उठा लिया और बोले - लगता है यह कबूतर किसी का सताया हुआ है।

तभी आवाज़ आयी - हाँ राजन! आप ठीक कहते हैं यह कबूतर मेरा शिकार है।

मनुष्य की बोली बोलने वाले की आवाज़ जब राजा मेघरथ ने देखा तो आश्चर्य में पड़ गए। सामने मुँडेर पर एक बाज बैठा था।

तुम कौन हो? राजा ने पूछा

मैं तो एक साधारण बाज हूँ। यह कबूतर मेरा भोजन है। इसका पीछा करते-करते मैं यहाँ तक आ गया हूँ।

राजा मेघरथ और उस बाज का यह संवाद सुनकर राज दरबार में उपस्थित लोग चकित थे।

क्या चाहते हो। राजा ने बाज से पूछा।

मैंने कहा न, यह कबूतर मेरा भोजन है। मैं इसका माँस खाऊँगा। बाज ने कहा।

अहिंसा की जीत

लेकिन यह तो अब मेरी शरण में आ गया है। और जो शरण में आ जाए, उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है। राजा मेघरथ ने कहा।

यह कैसा धर्म है नृपन्। किसी का भोजन छीनकर आप धर्म पालन की बात करते हैं। बाज ने कहा।

जो भी हो। यह कबूतर तो मैं तुम्हें नहीं दूंगा राजा ने कहा।

महाराज मैंने सुना है कि आप न्यायी हैं, धर्म प्रिय हैं, पर मेरे साथ तो आप अन्याय कर रहे हैं। यदि आप यह कबूतर नहीं दे सकते तो मुझे इसके वज़न के बराबर मांस ही दे दीजिए।

राजा मेघरथ ने सोचा कि बाज की बात तो ठीक है। उसका भोजन छीनने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। यदि मैं ये कबूतर नहीं लौटाता हूँ तो कम से कम इसके भार के बराबर माँस तो देना ही चाहिए। लेकिन कितना मांस दूँ? क्या इसके लिए किसी जीव की हत्या करूँ। यह भी तो न्याय न हुआ कि एक प्राणी की रक्षा के लिए दूसरे प्राणी की हत्या करूँ दूँ तब? राजा मेघरथ विचित्र संकट में पड़ गये।

राजदरबार में सन्नाटा छा गया। राजदरबारी समझ गये कि इस समय महाराज घोर संकट में पड़ गये हैं। उनकी समझ में भी न आ रहा था कि इस समय महाराज को वे क्या सुझाव दें।

अंत में राजा मेघरथ ने कहा - सुनो बाज। मैं तुम्हें कबूतर के भार के बराबर मांस अपने शरीर से काटकर देता हूँ।

इस निर्णय से लोग स्तब्ध रह गये। राजा की आज्ञा से तुरंत एक तराजू और चाकू मँगाया गया। तराजू के एक पलड़े में कबूतर को रखा गया और राजा मेघरथ ने चाकू से अपने शरीर का मांस काटकर दूसरे पलड़े में रख दिया। लेकिन पलड़ा फिर भी न झुका। राजा मेघरथ ने देखा कि कबूतर का भार अधिक है। उन्हें कुछ

अहिंसा की जीत

आश्चर्य तो हुआ, किन्तु अब उन्हें अपना वचन तो पूरा करना ही था।

अस्तु राजा मेघरथ ने कहा - कबूतर का भार पूरा करने के लिए मैं स्वयं तराजू के दूसरे पलड़े में बैठता हूँ।

लेकिन तभी बाज ने कहा - ठहरिए राजन! आपका वचन पूरा हो चुका है। मैं बाज नहीं, एक देव हूँ। मैं तो आपकी दानशीलता की परीक्षा ले रहा था। आप धन्य हैं। जीव रक्षा के लिए आप अपने प्राणों की बाजी तक लगा सकते हैं। आप कितने महान् हैं। आपका त्याग अपूर्व है। आपकी यह घटना भविष्य में लोगों की प्रेरणा देगी कि वे जीव रक्षा करें और मांसाहार न करें। आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए मुझे क्षमा करें।

इतना कहकर वह देव चला गया, साथ ही वह कबूतर भी उड़ गया। राजदरबार राजा मेघरथ की जयकार में गूंज उठा।

मन और बुद्धि का भोजन विचार हैं, विचार हमेशा व्यतीत होता है।


कोयले की दलाली

एक था किसान। उसका नाम था किसन। उसके पास दो बड़े-बड़े खेत थे। उन खेतों में वह खूब अच्छी फसल उगाता। हर साल खूब अनाज होता। अपने लिए वह पूरे साल का अनाज भरकर रख लेता। बाकी अनाज बेच देता। इससे उसे अच्छी आमदनी हो जाती। वह अपनी खेती-बारी से बहुत खुश था। घर में किसी तरह की कोई कमी न थी।

किसन का छोटा-सा परिवार था। पत्नी रधिया के अलावा श्यामू और गोपाल - दो छोटे बेटे थे। किसन अपनी मेहनत से जो कुछ कमा सकता था, उसी से संतुष्ट था। उसे इससे ज्यादा तो चाहिए भी न था।

एक दिन की बात है जमींदार का बेटा हरी शहर से गांव आया। बढ़िया भड़क-भड़क वाले कपड़े, कलाई में कीमती घड़ी, उँगलियों में हीरों जड़ी अंगूठियां, गले में सोने की चेन - सभी देखकर हैरान हो जाते थे।

किसन हरी का बचपन का दोस्त था। वह गांव आता तो हरी से मिले बगैर न रहता। इस बार भी वह किसन के घर आया। किसन यों तो इससे पहले भी हरी से मिला था लेकिन इस बार किसन ने देखा कि हरी पहले से कहीं ज्यादा बदल गया है - उसके ठाटबाट कहीं ज्यादा बढ़ गये हैं। उसको शान-शौकत देखकर न जाने क्यों किसन को लगा कि काश वो भी ऐसी ही ठाठ वाली जिन्दगी जीता।

अहिंसा की जीत

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क्या देख रहा है किसन! हरी ने पूछा। हरी देख रहा था कि किसन उसे इस बार कुछ अजीब आश्चर्य से देख रहा है।

कुछ नहीं हरी। अपनी झोंप मिटाते हुए किसन ने कहा - तुम कितना बदल गये हो। फिर कुछ रुककर वह बोला - शहर की जिन्दगी में बहुत मजा है न -

हां हां तो। पर किसन। ये सब पैसे का खेल है। मैं धंधा करता हूं माल तैयार करके दूसरे देशों को भेजने का बस अच्छी आमदनी होती है।

मुझे भी कोई ऐसा धन्धा बताओ न मैं भी खूब रुपया कमाऊं और फिर तुम्हारी तरह ठाट-बाट वाली जिन्दगी जियूं। किसन ने कहा। उनके मन में हरी की जैसी जिन्दगी बिताने की कल्पना हिलोरें मार रही थी।

हां हां क्यों नहीं। हरी ने कहा किसन तू ऐसा कर, मुर्गी पालन कर। मुर्गियां भी बिकेंगी और अंडे भी। आजकल शहर में मुर्गियों और अंडों की बहुत मांग है। तू देखना, सालभर में मालामाल हो जाएगा।

किसन को लगा कि जैसे उसका सपना बहुत जल्दी साकार हो जाएगा। हरी से सारी बातें पूछ कर उसने मुर्गीपालन का धंधा शुरू करने का निश्चय किया। इसके लिए उसने अपने खेत बेच दिए। केवल थोड़ी सी जमीन का टुकड़ा रखा, जिसमें वो अपना मुर्गी-फार्म खोल सके।

गांव के बड़े बुजुर्गों ने सुना तो किसन को बहुत समझाया कि वो इस धंधे को न करे। उन्होंने कहा तू मुर्गियां बेचेगा। लोग उन मुर्गियों को मारकर खाएंगे। इसका मतलब है तू उन मुर्गियों की

अहिंसा की जीत

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हत्या का कारण बनेगा। ऐसे ही अंडे बेचेगा। लोग उन्हें भी खाएंगे अरे किसन। क्यों पाप का बोझ अपने सिर पर रख रहा है।

लेकिन किसन ने उनकी कोई परवाह न की। वह कहता है कि मैं न तो अपने हाथों से मुर्गी मारूंगा, न ही अंडे तोडूंगा। तब फिर पाप कैसा। मुझे तो रुपया कमाना है बहुत सा रुपया।

कुछ ही दिनों में किसन ने अपना मुर्गी फार्म खोल लिया। उसका व्यापार भी धीरे-धीरे चल पड़ा। किसन तो दिन रात यही सपना देखा करता था कि कब उसके पास बहुत सी दौलत आएगी और कब वह शानदार घर में शानदार जिन्दगी बिताएगा।

अचानक उसके फार्म की मुर्गियां मरने लगी। हर सुबह उसे दस-बीस मुर्गियां मरी हुई मिलती। उसकी समझ में न आया कि मामला क्या है। गांव में ऐसा कोई जानकार भी न था जो उसे बताता। किसन को शक हुआ कि कहीं कोई नेवला या बिल्ली तो मुर्गियों को नहीं मार रही।

उसने दो-तीन रातें जागकर फार्म की रखवाली भी की। लेकिन कोई फायदा न हुआ। मुर्गियों के मरने की संख्या बढ़ती गई। अब तो किसन को बहुत फिक्र हुई।

एक दिन शहर से आए एक व्यापारी ने उसे बताया कि तुम्हारी मुर्गियों को महामारी हो गई है। इसलिये वो बीमार मुर्गियां और उनके अंडे नहीं खरीदेगा। किसन को काटो तो खून नहीं।

वह भागकर शहर आया। हरी भैया से मिला। फिर एक डा० से मिला। उसने कुछ दवाइयां दी लेकिन जब किसन वापस गांव आया तो केवल थोड़ी सी मुर्गियां ही बची थीं। कुछ दिनों में वे भी मर गईं।

अहिंसा की जीत

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किसन का फार्म चौपट हो गया। उसके सारे रुपए डूब गए थे। उसका सपना टूट चुका था। वह दिन रात सिर झुकाए घर में बैठा रहता। अब तो खेत भी न थे जिसमें वह अनाज उगाता। जिस जमीन के टुकड़े को उसने फार्म के लिए सुरक्षित रखा था वहां मुर्गियों को कीट इतनी ज्यादा थी कि उसमें कुछ भी अनाज उगाना संभव न था।

उन्हीं दिनों हरी फिर गांव भर आया। वह किसन का हाल पूछने उसके घर पहुंचा। किसन को उस देखकर वह सारा मामला समझ गया।

किसन तू परेशान मत हो। तेरी मुसीबत मैं समझता हूं। मैं शहर जाकर बैंक से तुझे मुर्गी-फार्म खोलने के लिए कर्ज दिलवाने का इंतजाम करता हूं। बस तुझे एक दो लोगों की जमानत दिलवानी होगी। और हां इस मकान के कागजात भी बैंक में जमा करने होंगे। अब की बार तू पूरी समझदारी से धंधा शुरू करना।

किसन को लगा कि हरी ठीक कह रहा है। उसे हरी की बातों में आशा की किरणें दिखाई दी। उसकी आंखों में दौलत कमाने और शानदार जिन्दगी बिताने के सपने फिर से डोलने लगे।

हरी भैया शहर गए। किसन हर रोज उनके संदेश का इंतजार करने लगा। अब वह पहले की तरह उदास न था। जो भी मिलता उससे किसन यही कहता - बस अब देखना। मेरा धंधा ऐसा चलेगा कि लोग देखते रह जाएंगे।

एक दिन स्कूल-मास्टर मुंशी परसराम, किसन को मिले। उन्होंने किसन का हाल सुन रखा था। वे बोले भई बड़ा अफसोस हुआ ये सुनकर कि तुमने अपने खेत बेचकर मुर्गियों का धंधा किया और वो भी चौपट हो गया। कोई बात नहीं मास्टर जी। मैं फिर से उसी

अहिंसा की जीत

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काम को शुरू करने जा रहा हूं। और किसन ने हरी भैया वाली बात उन्हें बतायी।

मुंशी परसराम ने कुछ सोचा बोले - किसन एक कहावत - कोयले की दलाली में मुंह काला। तुमने अपना अच्छा खासा जमाजमाया खेती का काम बंद करके वो काम किया जिसकी तुम्हें जानकारी न थी और न ही है। फिर मुर्गियां और अंडे बेचकर तो तुम लोगों को मांसाहारी बनने का पाप भी तो अपने सिर पर ले रहे हो। इस बात का क्या गारंटी है कि दुबारा तुम इस धंधे में सफल हो जाओगे। भला पाप का धंधा करके कभी कोई फलता है। अरे जो लोग मुर्गी-अंडा खाते हैं, जब वे सुखी नहीं रह पाते तो तुम भला कैसे सुखी रह सकोगे। सोची और इन चार जल्दबाजी में फैसला न करना।

मुंशी परसराम चले गए। किसन को लगा कि वह ठीक कह रहे हैं। दौलत और शानदार जिन्दगी की लालच में मैं ये अंधा हो गया था। अरे क्या कमी थी मुझे? मैं भी कैसी मूर्खता कर बैठा।

किसन घर आया। जब वह अपने विचार लेकर आया तो उसने फार्म वाले जमीन के टुकड़े की सफाई की। उसने खेती करने की तैयारी करने लगा। इन बीच हरी भैया का संदेश आया तो उसने कहला दिया कि अब मुझे कर्ज नहीं चाहिए।

इसके बाद उसने उस छोटी सी जमीन में कड़ी मेहनत करके फसलें उगाई और दो साल बाद वह इस योग्य हुआ कि फिर से बड़े खेत खरीदकर खेती कर सके। वह बहुत खुश था। उसके सिर से पाप का बोझ जो उतर गया था।


सच्ची जीत

राजपुरा के दंगल की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी। आसपास के क्षेत्र के पहलवानों के लिए राजपुरा दंगल की ट्रॉफी उतना और इनाम की पदवी पाना बड़े गर्व की बात मानी जाती थी। लोगों को इस दंगल का पूरे साल इंतजार रहता। उधर अपने-अपने अखाड़ों के गुरुओं को भी पूरे साल इस दंगल की फिक्र रहती। वे अपने-अपने पहलवानों को पूरे साल खूब तैयारी कराते। लेकिन अपनी मुकाबला तो शिवपुर के तेला पहलवान और रामनगर के बिल्लू पहलवान के बीचों के बीच होता था। पिछले तीन सालों से तेला पहलवान को चेम्पीयन इस दंगल में विजयी होता रहा है। बिल्लू पहलवान के लिए यह जबरदस्त चुनौती थी। वह अपने चेले चंदू को हर साल दांव पेंच सिखाता, पर न जाने क्यों वह मात खा जाता।

इस बार के मुकाबले के लिए अभी कई महीने बाकी थे। दोनों पहलवान अपने-अपने चेलों को दांव पेंच के अच्छे अभ्यास करा रहे थे। लेकिन दोनों एक-दूसरे की खोज-खबर लेते रहते थे कि क्या कैसी तैयारी चल रही है।

तेला के कानों में अचानक एक दिन खबर पहुंची कि इस बार बिल्लू पहलवान की तैयारी औरों से बहुत अच्छी है लगता है, उसका चेला चंदू जरूर बाजी मार ले जाएगा।

इस खबर को सुनते ही तेला के कान खड़े हो गए। वह सोचने लगा कि श्यामू को कैसी तैयारी कराऊं कि वो चंदू से सवा-सेर साबित हो।

अहिंसा की जीत

बुरा है यही कहना चाहते हो न। कल्लू पहलवान ने समझाया देखा अगर श्यामू को ताकतवर बनाना चाहते हो तो उससे कहो अंडे खाए फिर देखना कमाल। ऐसी ताकत आ जाएगी कि शत्रु को गरदन एक बार दबा लेने पर छूट नहीं पाएगी।

तेजा को लगा कि कल्लू पहलवान ठीक कह रहा है। पहलवान में इतनी ताकत तो होनी चाहिए कि वो अपने दुश्मन को दबोच ले।

तेजा पहलवान शहर से लौटा तो उसने श्यामू से अंडे खाकर ताकत बढ़ाने की बात कही। पहले तो श्यामू ने आनाकानी की। फिर दंगल जीतने की चुनौती याद करके वो अंडे खाने लगा। शुरू में तो दो-चार ही खा सका। धीरे-धीरे इस अंडे रोज वह नाश्ते में खाने लगा। लेकिन श्यामू यह काम एकदम गुप्त ढंग से किया करता था।

इधर बिल्लू पहलवान भी तेजा की टोह लेता रहता था। उसे ये तो पता ही चला कि तेजा ने शहर के कल्लू पहलवान से कुछ नयी बातें सीखी हैं किन्तु वह उन बातों को नहीं जान पाया।

चंदू पहलवान का शरीर मोटा तो न था, पर वह शक्तियां भी न था। बिल्लू पहलवान रोज संडे से उसका अभ्यास कराता। फिर उसे डटकर दूध पिलवाते। खाने में हरी सब्जियां, दाल और शुद्ध घी खाने को कहते। एक दिन चंदू ने बिल्लू पहलवान से पूछा -

चंदू उस्ताद सुना है, मुर्गे के अंडे खाने से बहुत ताकत आती है। आप कहें तो मैं भी

बिल्लू खबरदार अगर अंडे का नाम भी लिया। बिल्लू पहलवान ने कहा - देख पहली बात तो ये है कि अंडा खाने का मतलब है जीव हत्या। समझ गया न।

अहिंसा की जीत

चंदू हां उस्ताद। अंडे से ही तो मुर्गा जन्म लेता है। चंदू ने कहा। दूसरी बात ये है कि अंडा हमारे शरीर में विष का काम करता है।

बिल्लू विष, पर उस्ताद अंडे खाते ही किसी को मरते तो नहीं देखा।

बिल्लू बिल्लू उस्ताद हंस पड़े अरे बेवकूफ वो ऐसा नहीं है जिसे खाते ही मौत हो जाती है। अंडा तो मीठा जहर है जो धीरे-धीरे असर करता है। ये दिल की नसों में अपना जहर जमा करता जाता है। धीरे-धीरे ऐसा रक्त जम जाता है कि अंडा खाने वाले के दिल की नसों में इतना जहर जम जाता है कि खून का बहाव रुकने लगता है। बस उसके बाद ही दिल का दौरा पड़ता है, और वो मर जाता है।

चंदू अब समझा। चंदू ने कहा, तब तो अंडा सचमुच ही मीठा-जहर है।

बिल्लू और एक बात सुन। मेरे उस्ताद नत्थू पहलवान एक बार किसी के बहकावे में आ गए। वो अपनी खुराक के साथ अंडे भी खाने लगे। धीरे-धीरे मुकाबले का दिन नजदीक आ गया। इस बीच नत्थू उस्ताद के बदन पर अच्छी खासी चर्बी चढ़ गई। अब वही चर्बी तो उसे जल्दी उतार भी न सकती थी। मुकाबले का दिन आ गया। नत्थू उस्ताद अखाड़े पर उतरे और वही हुआ जिसका डर था। नत्थू उस्ताद समझते थे कि अंडे खाने से उनका शरीर मजबूत हुआ है। जबकि मुकाबले में वो उसी मुर्गे की वजह से मार खा गए। तब समझ में आया कि वो कहा गलती कर बैठे हैं। उन्होंने फौरन अंडे खाना छोड़ा और बदन को ठीक किया। बस, फिर क्या था। अगले साल नत्थू पहलवान ने बाजी मार ली।

अहिंसा की जीत

बिल्लू अच्छा किया उस्ताद, मुझे आगाह कर दिया आपने। चंदू ने कहा।

चंदू ने शाकाहारी भोजन को ही अपनी ताकत का साधन बनाए रखा। उनका अभ्यास जैसे-जैसे बढ़ा उनमें दूध, बादाम, घी आदि की मात्रा बढ़ी। वह जितनी खुराक लेता था, उससे कहीं ज्यादा मेहनत करता था। नतीजा, इस बार उसका बदन ऐसा गठीला हो गया कि देखने वाले वाह कर उठते।

राजपुरा के दंगल का दिन आ गया। अखाड़े के चारों तरफ लोगों की भीड़ जमा हो गई। सबको इंतजार था, चंदू और श्यामू के मुकाबले का। थोड़ी ही देर में एक तरफ से चंदू अपने दोस्तों के साथ फुकारता हुआ आया। उसे देखकर लोगों को लगा कि इस बार चंदू का दांव अच्छा पड़ेगा। तभी श्यामू भी दहाड़ता हुआ आ गया। वह पहले से ज्यादा मोटा हो गया था। फिर भी वह उछलता हुआ अखाड़े में आ गया।

चंदू ने श्यामू को देखा तो, पिछले साल से वह कुछ अधिक मोटा लगा। चंदू को अचानक तरकीब सूझी अगर इसकी थोड़ी देर में थका दूं तो बाजी जीतना आसान होगा।

और वही हुआ। श्यामू का मोटापा उसके लिए मुसीबत बन पड़ा। चंदू ने उसे एकदम थका दिया। श्यामू ढीला पड़ने लगा। यह देखकर तेजा पहलवान को फिक्र हुई। उन्होंने श्यामू का हौसला बढ़ाया पर श्यामू ढीला पड़ा सो पड़ा ही गया। चंदू ने फिर ऐसे दांव चलाए कि श्यामू चारों खाने चित्त हो गया।

तालियों की गड़गड़ाहट और चंदू पहलवान की जय से अखाड़ा गूंज उठा। लोगों ने खूब होकर चंदू को उठा लिया। उधर श्यामू थका हुआ धीरे-धीरे चलकर अखाड़े से बाहर आया। उसे देखकर

अहिंसा की जीत

बिल्लू बिल्लू उस्ताद ने तेजा पहलवान से पूछा - क्या बात है, श्यामू को खुराक नहीं दी क्या।

तेजा दी तो थी पर तेजा शर्म से सिर झुकाए था।

बिल्लू उस्ताद कहीं अंडे तो न खिला दिए श्यामू को। अंडों से मोटापा ज्यादा बढ़ता है।

तेजा और तेजा की जैसे बिजली का करंट लगा। हैं बिल्लू उस्ताद। श्यामू को अंडे भी खिलाए थे। वो दरअसल कल्लू उस्ताद ने

बिल्लू कल्लू उस्ताद? कहकर बिल्लू जोर से हंसा। तुम उनके बहकावे में आ गए।

तेजा लेकिन उसने तो बहुत सोचकर सलाह दी थी।

बिल्लू उसने तुमसे नीचदी नेले की हार का बदला लिया है। याद करो वहां तुम्हारी श्यामू की जीत से उसके चेले हीरा पहलवान की कैसी हिल्ली उड़ी थी।

तेजा ओफ। मैं तो ऐसी बात सोच भी नहीं सकता था। कल्लू उस्ताद ने कहा।

बिल्लू प्यारे भाई इतना तो तुमको भी समझना चाहिए था कि अंडा तो जहर है फिर श्यामू को

तेजा बस मैं कल्लू उस्ताद के बहकावे में आ गया। खूब बदला लिया है उसने

बिल्लू चलो छोटी गलती तो इंसान से होती ही है। आगे के लिए सावधान हो जाओ।

तेजा उधर चंदू को घेरे हुए लोग पूछ रहे थे - पहलवान। इतना सुन्दर बनने के लिए क्या खाना चाहिए और क्या खाना चाहिए।

अहिंसा की जीत

मन से किसी का बुरा विचार नहीं करना चाहिए।
वचन से कटु शब्दों का उच्चारण नहीं करना और
काय से किसी भी प्राणी का घात नहीं करना।
मन-वचन-काय को सरल करना चाहिए क्योंकि
इनकी कुटिलता आत्मा के लिए कर्म-जाल बुनती है
और उसमें चेतन को फंसाकर दुर्गति में धकेल देती
है। परि तू सर्वथा मन-वचन-काय की चेष्टाओं को
नहीं रोक सकता तो अशुभ चेष्टा तो मत कर।


ईर्ष्या

आठ वर्ष के प्रशांत का नाम पूरे स्कूल में था। कारण यह था कि वह गणित में ही नहीं सभी विषयों में बहुत तेज था। स्कूल के सभी शिक्षक-शिक्षिकाएँ उसे अपने आदर्श विद्यालय का गौरव मानते थे।

प्रशांत के माता पिता के गर्व का तो ठिकाना ही न था। वे प्रशांत की उन्नति और विकास के लिए सारी चीजें लाकर देते। वे हर क्षण यही सोचते कि प्रशांत की उन्नति में कोई बाधा न आए। अच्छा से अच्छा खाना, अच्छे कपड़े, अच्छी पुस्तकें और पत्रिकाएँ - वे प्रशांत को उपलब्ध कराते। मध्यमवर्गीय परिवार में प्रशांत को सभी कुछ मिल रहा था।

प्रशांत का एक सहपाठी था - अशोक। वह प्रशांत से बहुत ईर्ष्या करता था। यों अशोक कक्षा में नंबर दो रहता था - किंतु बहुत कोशिशों के बाद भी वह प्रशांत का नंबर एक नहीं छीन पा रहा था। इस बात का दुख अशोक से ज्यादा, उसके पिता नरेश मल्होत्रा और पत्नी पिंकी मल्होत्रा को था। वे अशोक को, प्रशांत के खिलाफ खूब भड़काते, उसको खुश करते - लेकिन फिर भी वह परीक्षा फल आता तो अशोक नंबर दो पर ही रहता। इससे नरेश मल्होत्रा और पिंकी मल्होत्रा मलिन हो जाते। वे सदा यही सोचते रहते कि किस तरकीब से वे प्रशांत को पछाड़कर अपने अशोक को प्रथम स्थान दिलवाएँ।

प्रशांत के पिता हरीश शर्मा और माता नीलम शर्मा बड़े ही शालीन और सभ्य व्यक्ति थे। जनकपट और चालाकी तो उन्हें छू तक न गई थी। अशोक कभी-कभी बदले की भावना में आकर

असीसा की जीत

प्रशांत से झगड़ाकर बैठता तो वे यही कहते रहते, ‘दो तुम्हारा सहपाठी है, मित्र है उसे दुख पहुँचाना बुरी बात है।’

अशोक और प्रशांत के घर ही एक कॉलोनी में थे। अशोक की माँ पिंकी मल्होत्रा, प्रशांत की माँ नीलम शर्मा से अक्सर ही कहीं न कहीं मिल ही जाती थी। पिंकी जब भी मिलती - बड़े व्यंग्य से करती - ‘क्या बात है, निरंजना शर्मा! आजकल आप दिखाई नहीं देतीं लगता है आजकल प्रशांत को पढ़ाने में आपका टाइम ज्यादा खर्च हो जाता है।’

नीलम शर्मा कहतीं - ‘अरे पिंकी बहन! तुमसे तो करीब-करीब रोज ही मिलती हूँ वैसे सच पूछो तो हमें प्रशांत के साथ पढ़ाई में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती। तो क्या ट्यूशन लगा रखी है।’

‘उसको तो हमारी हैसियत नहीं है हां, प्रशांत के पिता अवश्य कभी-कभी पढ़ा देते हैं। वह भी तब जबकि प्रशांत खुद कुछ पूछता है। नीलम शर्मा ने कहा। भगवान करे, आपके प्रशांत को नजर न लगे। पिंकी मल्होत्रा ने कहा - हमें तो खुद बहुत अच्छा लगता है - जब से सुनते हैं कि प्रशांत फर्स्ट आया है। लेकिन एक बात खटकती है वैसे तो आप अपनी ही हैं, फिर भी बुरा न मानें तो कहूँ। बात प्रशांत की भलाई की ही है।’

पिंकी बहन। आप बात प्रशांत की भलाई की ही तो उसमें बुरा क्यों मानना। आप तो प्रशांत की प्रशंसक हैं।

'बात ये है कि प्रशांत की सेहत ठीक नहीं है एकदम दुबला पतला है जबकि वो पढ़ाई में बहुत मन लगाता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप उसकी सेहत पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहीं।

'ऐसा नहीं है बहन। हम तो प्रशांत को सभी चीजें देते हैं और कोई कमी नहीं रखते। नीलम ने कहा -

असीसा की जीत

'दरअसल प्रशांत बचपन से ही ऐसा है, दुबला-पतला। नीलम बहन! बुरा न मानना। प्रशांत का दिमाग जितना तेज है, उसे उसके दिमाग से खाना भी मिलना चाहिए। वैसे क्या मैं पूछ सकती हूँ कि उसको आप खाने के लिए क्या-क्या देती हैं।

'भोले और सरल स्वभाव की नीलम शर्मा ने कहा - दूध, घी, हरी सब्जियाँ, बादाम, अंकुरित अनाज - सभी कुछ देते हैं - साथ में मौसम के फल भी देते हैं।

यह सुनकर पिंकी मल्होत्रा ने मुँह बना लिया। उन्हें देखकर नीलम को लगा कि जैसे वह मलिन है और वह प्रशांत की देखभाल में कोई कमी कर रही है। आखिर पिंकी ने कहा - 'बस! अजी, इस खुराक से भला इतना तेज बच्चा, बड़ा होकर तो एकदम बुझ जाएगा। भला यह भी कोई खुराक है। तभी तो प्रशांत एकदम सींकिया पहलवान है। कहकर पिंकी मल्होत्रा खूब जोर से हँसी। उनका इस तरह हँसना नीलम शर्मा को बुरा लगा। फिर भी वह शालीन ढंग से उस बात को बर्दाश्त कर गयी। उन्होंने बड़े शालीनता से पूछा - 'पिंकी बहन! मैं तो अपनी समझ से प्रशांत को ठीक ही खुराक दे रही हूँ। फिर भी, यदि कोई कमी हो तो तुम बताओ मैं पूरा करूँगी।

'आप लोग शर्मा हैं न। ब्राह्मण हैं आप लोग उसे पूरा नहीं कर सकते। पिंकी ने नीलम पर चोट की।

'अब नीलम को भी बुरा लगा - 'क्यों ऐसा क्या है, जो हम प्रशांत के लिए नहीं कर सकते। इसमें हमारा शर्मा होना या न होना इसका क्या मतलब है। मतलब है बहन मतलब है पिंकी ने व्यंग्य से कहा। आप लोग वो खुराक अपने बच्चे को नहीं दे सकते जो दरअसल उसे चाहिए। इसीलिए आपके बच्चे कमजोर रहते हैं।

असीसा की जीत

'भला ऐसा क्या है, पिंकी बहन, जो हम नहीं दे सकते। जरा मैं भी तो सुनूँ। नीलम ने पूछा।

'आप प्रशांत को अंडा नहीं खिलातीं। अब देखिए न, हमारा अशोक भले ही दूसरे नंबर पर आता है लेकिन कोई दूसरा लड़का उसे पछाड़ कर तीसरे नंबर पर नहीं ला सकता - क्योंकि हम अशोक को बढ़िया खुराक देते हैं - मांस।

'भोली भाली नीलम शर्मा की बुद्धि में यह बात नहीं आयी कि अगर ऐसा है तो वो प्रशांत को क्यों नहीं पछाड़ सका। वह तो बेचारी यही सोचती रही कि वो प्रशांत के प्रति वह शायद गलत है। जबकि प्रशांत यह भी कि वह ठीक थी और पिंकी मल्होत्रा उनके साथ चाल खेल रही थी।

'बहन। हम तो ब्राह्मण हैं भला अंडा कैसे खिलाएँ, प्रशांत को।

दिया। आखिर दोनो भाई फैसला कराने के लिए पिता राजा शुद्धोधन के पास आए। दोनो के दावे सुनकर राजा ने कहा- हंस सिद्धार्थ को मिलेगा - क्योंकि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता हैं। तो इसी तरह तुम यह समझलो कि पशु-पक्षियों की हत्या करने की बजाए उनकी सेवा करने से कहीं अधिक पुण्य मिलता हैं। इसलिए अब उनकी सेवा करों। धीरे-धीरे तुम्हारें पापों का बोझ अपने आप कम हो जाएगा।

अपना ही लगाया वृक्ष खाली धूप को रोक देता है

और पछतावे का भी अवसर नहीं देता।

सच्चा सुख

एक दिन राजा इन्द्रसेन ने राज ज्योतिषी से पूछा- क्या कारण हैं कि मेरी सारी कोशिशों के बावजूद, मेरे राज्य की प्रजा का चेहरा उदास क्यों रहता हैं।

अहिंसा की जीत

राज ज्योतिषी ने विचार किया फिर ग्रहों की शान्ति के लिए उपाय बताया। उन्होंने कहा कि आप एक बड़ा शान्ति-यज्ञ करें। उसमें पशु-बलि चढ़ाएँ। तब शान्ति स्थापित होगी।

इन्हीं दिनों की बात हैं। एक दिन राजा इन्द्रसेन के लिए जब नाश्ता आया तो उसमें अंडे नहीं थें। यो भी दुख और बीमारी के कारण इन्द्रसेन चिड़चिड़े स्वभाव का हो गया था। नाश्ते में अंडे न देखकर वह आगबबूला हो उठा। उसने तत्काल रसोइए को बुलाकर फटकार लगाई।

तेरी ये हिम्मत, कि हमें नाश्ते में अंडे देना भूल जाए। नहीं महाराज। मैं ऐसी हिम्मत कैसे कर सकता हूं।

रसोइए ने कहा - दरअसल आज पूरी बाजार में अंडे नहीं मिले।

क्या बकते हो? राजा इन्द्रसेन दहाड़ उठें। क्या मेरे राज्य की सब मुर्गियाँ मर गई।

अहिंसा की जीत

झूठ एकदम झूठ। इन्द्रसेन ने कहा - मैं तेरे इस झूठ के लिए तुझे जरुर सजा दूंगा। अभी सच्चाई का पता लगवाता हूं। इसके बाद राजा इन्द्रसेन ने कोतवाल को बुलवाया और उसे हुक्म दिया कि पूरी बाजार छान डालो और जितने अंडे मिलें सब खरीद लाओं।

शहर कोतवाल ने पूरा बाजार खोज डाला, पर एक भी अंडा न मिला। उसने वापस आकर राजा इन्द्रसेन को बताया कि अंडा तो एक भी नहीं हैं। सब यहीं कहतें हैं कि कल आना आज तो सारे अंडे बिक गये।

सारे अंडे बिक गये। इन्द्रसेन ने आश्चर्य से कहा ऐसा कौन माई का लाल हैं जो सारे अंडे खरीद ले गया।

पता नहीं हुजूर। कोतवाल ने कहा।

तो पता लगाओ इन्द्रसेन ने झल्लाकर कहा।

अगले दिन फिर वहीं हुआ। इन्द्रसेन के सामने जब रसोइए ने नाश्ता रखा तो उसमें अंडे न थे। वह फिर से चीख उठा। अण्डे क्यों नहीं लाए?

ओफ्फो! यह कौन बदमाश हैं जो राजा इन्द्रसेन को परेशान कर रहा हैं। उसे पता नहीं हैं कि इन्द्रसेन उसको पल भर में मौत के घाट उतार देगा।

उत्तर में रसोइया चुप खडा रहा।

ठीक हैं, तुम जाओ। शहर कोतवाल को भेजो इन्द्रसेन ने कहा।

अहिंसा की जीत

थोडी देर में सिर झुकाए हुए शहर कोतवाल राजा के सामने हाजिर हो गया। उसके हावभाव से साफ पता लग रहा था कि वह उस व्यक्ति का पता नहीं लगा सका था जो अंडे खरीद रहा था। राजा इन्द्रसेन क्रोध से पागल हो उठे - तुम कैसे कोतवाल हो मामूली से आदमी का पता नहीं लगा सकें। अगर कल तक वह आदमी मेरे सामने तुमने पेश न किया, तो मैं तुम्हारी गर्दन काट दूंगा।

शहर कोतवाल ने अपना माथा पीट लिया और घर लौट

बस सुबह का उजाला होने से पहले शहर कोतवाल ने कुछ जरुरी सामान लिया और अपने परिवार के साथ भाग निकला। राजा इन्द्रसेन की सीमा तक पहुंचते-पहुंचते सूर्य काफी चढ़ आया था। उस समय कोतवाल एक घने जंगल से गुजर रहा था। थकान और भूख-प्यास से बुराहाल हो रहा था। कुछ दूर पर किसी महात्मा का आश्रम दिखाई दिया। वहां उनके चेले काम में व्यस्त थें।

अहिंसा की जीत

कोतवाल ने सोचा कि वहां चलकर पानी पिया जाए ताकि आगे की यात्रा हो सकें।

आश्रम में पहुंचने पर कोतवाल की भेंट एक ऋषि से हुई। उन्होने बड़े प्रेम से कोतवाल को बुलाकर बिठाया पानी पिलाया और फिर कुशल समाचार पूछा। उत्तर में कोतवाल ने सारी बातें विस्तार से बता दी। तब उन ऋषि ने कहा - मेरे आश्रम की एक कोठरी में तुम निर्भय होकर रहो। तुम्हें कोई कष्ट न होगा।

उन ऋषि का नाम था - महानन्द। कोतवाल को शंका हुई कि जंगल में रहने से कही कोई जानवर रात को हमला तो न करेगा। लेकिन ऋषि महानन्द ने तत्काल उनकी शंका का समाधान कर दिया। उन्होने कहा - जिस तरह तुम किसी जीव की भूख मिटाने के लिए अपने शरीर का मांस नहीं देना चाहते, इसी तरह अन्य जीव भी अपने शरीर की रक्षा करते हैं। तुम निश्चिंत रहो। और कोतवाल वहां शांति से ठहर गया।

इधर कोतवाल के अचानक चले जाने से राजा इन्द्रसेन की चिंता और बढ़ गई। उसे अगले दिन भी अंडो का नाश्ता न मिला। यह भी पता न चला कि सारे अंडे कौन ले गया।

तब राजा इन्द्रसेन के दरबारियों ने उसे सलाह दी कि क्यों न वह शिकार के लिये जाएं। इससे मन बहल जाएगा। इन्द्रसेन को यह सुझाव अच्छा लगा। उन्होने तुरंत अपने मंत्री को आज्ञा दी कि सिपाहियों के साथ शिकार पर चलनें की तैयारी की जाए। अब राजा इन्द्रसेन अपने दल-बल के साथ शिकार के लिए जंगल में पहुंचे। वहां इन्द्रसेन ने एक बहुत सुन्दर हिरन देखा। वह उसका शिकार करना चाहते थे। लेकिन हिरन ने चौकड़ी भरी और भाग चला। राजा इन्द्रसेन ने भी अपना घोड़ा उसके पीछे दौड़ा दिया।

अहिंसा की जीत

जंगल में अकेले काफी दूर तक घोड़ा दौडाने के बाद राजा इन्द्रसेन को लगा कि हिरन तो कहीं और चला गया हैं और वह स्वयं रास्ता भटक गए हैं।

उधर राजा इन्द्रसेन के मंत्री और सिपाही भी उन्हें ढूढ़ते हुए जंगल में भटक रहे थे।

अचानक कुछ सिपाही उस स्थान से गुजरे जहाँ ऋषि महानंद का आश्रम था। वह एक वृक्ष के नीचे ध्यान लगाए बैठें थे। सिपाही उनके पास आए और बोले क्यों रे साधु। तूने किसी को इधर से जाते देखा है।

ऋषि महानंद ने आंखे बंद किए-किए ही कहा कि मुझे नहीं मालूम ।

थोड़ी देर बाद राजा का मंत्री आया। उसने भी यही प्रश्न किया और महानंद ने वही उत्तर दिया। अंत में राजा आया उसने कहा - स्वामी मैं रास्ता भूल गया हूं। मेरी सहायता कीजिए । ऋषि महानंद ने आंखे बंद किए-किए ही इशारा किया कि इधर जाओ, रास्ता मिल जाएगा। राजा इन्द्रसेन उधर ही गए तो मंत्री और सिपाही सभी मिल गये। राजा इन्द्रसेन को आश्चर्य हुआ कि ऋषिवर ने आंखें बंद किए-किए ही कैसे मुझे सही मार्ग बता दिया। राजा इन्द्रसेन वापस आए और ऋषि महानंद के चरणों में सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया। फिर उन्होने पूछा कि आपने कैसे मेरा मार्ग दर्शन किया?

उत्तर में ऋषि ने आंखें बंद किए ही कहा राज्न । तुमसे पहले तुम्हारे सिपाही तुम्हारा पता पूछने आए और उसके बाद तुम्हारा मंत्री आया। अंत में तुम आए। मैने उनकी वाणी सुनकर जान लिया था कि वे कौन हैं। इसलिए अंत में तुम्हे पहचानकर मैने मार्ग बता

अहिंसा की जीत

दिया। सुनो राजन। मनुष्य जैसे कर्म करता हैं, उसकी वाणी और भाषा भी वैसी ही हो जाती हैं और उसे ही सुनकर मैं समझ गया था कि मेरे सामने कौन खड़ा हैं।

ऋषि महानन्द के ऐसे वचन सुनकर राजा इन्द्रसेन उनके चरणों में अपना मस्तक रखकर बोले - हे स्वामी आप महान हैं। कृपाकर मेरे दुखों का भी अंत कीजिए। जानता हूं राजन । तुम्हारा दुख क्या हैं? ऋषि महानन्द ने कहा - लेकिन तुम पुण्य से ज्यादा पाप कमा रहे हो। पाप और मैं। आश्चर्य से राजा इन्द्रसेन ने पूछा। हां। तुम्हारे पाप-पुण्य के खाते में पाप के पन्ने भरते जा रहे हैं। तुम्हारा यह भ्रम हैं कि तुम जो परोपकार करते हो वह बहुत हैं। पर मैं कौन से पाप कर रहा हूं?

अण्डों का भक्षण करके जीव हत्या के पाप कर रहें हो। प्रत्येक अंडा एक जीव हैं। और तुम जानते हो कि इस संसार में जीव हत्या से बढ़कर कोई पाप नहीं हैं। जीवन देने वाला तो ईश्वर हैं। और जो उसकी रचना को नष्ट करता हैं, वहीं सबसे बड़ा पापी हैं। ऋषि महानन्द ने समझाया।

हे स्वामी। आप ये क्या कह रहें हैं। राजा इन्द्रसेन ने ऋषिवर के चरणों पर सिर रखकर कहा आप मुझे इससे मुक्त कीजिए। मुझ पर कृपा कीजिए।

मैं वहीं कह रहा हूं राजन। पिछले कई दिनो से तुम्हें अंडे खाने को नहीं मिले। वो सब मैने खरीद कर रखवा दिए ताकि तुम जीव हत्या के पाप का बोझ कुछ तो हल्का कर सकों। और उसका ही फल देखो कि तुम मेरे पास तक आ गये।

क्या? आश्चर्य से राजा इन्द्रसेन ने कहा ।

अहिंसा की जीत

हाँ राजन। तुम्हारी प्रजा इसी कारण दुखी है, क्योंकि वह भी अंडे और सामिष भोजन करती हैं। तुम्हारे लोग कभी स्वस्थ नहीं रह सकते। महामारी फैलने का कारण भी ये ही है। इसलिये अब तुम तत्काल अंडो का सेवन छोड़ दो। अपनी प्रजा को भी जागृत करो और उसे भी इस महामारी से बचाओ। इसी में तुम्हारा और सबका हित हैं।

राजा इन्द्रसेन को लगा कि जैसे उनकी जिन्दगी में उजाला हो गया हैं। उन्होनें पूरे राज्य में अंडे और सामिष भोजन पर पाबन्दी लगा दी। शुरु मे लोगो को कुछ कष्ट हुआ लेकिन जब उन्हें इसके सुखों का अनुभव हुआ तो उन्हें बहुत खुशी हुई।

इसके बाद राजा इन्द्रसेन और उसकी प्रजा, वास्तविक सुख का आनन्द लेने लगी।

मनुष्य के मन की स्थिति विचित्र होती है, आदमी

केवल अपने को दृष्टि-संम्पन्न समझकर सबको अंधा

समझ बैठता है। उसकी समझ के दरवाजो पर काले

परदे उत्तर आते हैं तब उसकी परिभाषाएँ होती हैं। ***

सच्चा न्याय

राजा मेघरथ मे उसे उठा लिया और बोले - लगता है यह कबूतर किसी का सताया हुआ है।

तभी आवाज आयी - हां राजन। आप ठीक कहते है यह

कबूतर मेरा शिकार है।

मनुष्य की बोली बोलनें वाले की ओर जब राजा मेघरथ ने देखा तो आश्चर्य में पड़ गए। सामने मुंडेर पर एक बाज बैठा था। तुम कौन हो? राजा ने पूछा

मैं तो एक साधारण बाज हूं। यह कबूतर मेरा भोजन है। इसका पीछा करते-करते मैं यहां तक आ गया हूं।

क्या चाहते हो। राजा ने बाज से पूछा।

मैंने कहा न, यह कबूतर मेरा भोजन है। मैं इसका माँस खाऊंगा। बाज ने कहा।

अहिंसा की जीत

लेकिन यह तो अब मेरी शरण मे आ गया हैं। और जो शरण में आ जाए, उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है। राजा मेघरथ ने कहा। यह कैसा धर्म हैं राजन् । किसी का भोजन छीनकर आप धर्म पालन की बात करते है। बाज ने कहा ।

जो भी हो। यह कबूतर तो मैं तुम्हें नहीं दूंगा राजा ने कहा । महाराज मैने सुना हैं कि आप न्यायी है, धर्म प्रिय हैं, पर मेरे साथ तो आप अन्याय कर रहे हैं। यदि आप यह कबूतर नहीं दे सकते तो मुझे इसके वजन के बराबर मांस ही दे दीजिए। राजा मेघरथ ने सोचा कि बाज की बात तो ठीक हैं। उसका भोजन छीनने का मुझे कोई अधिकार नहीं हैं। यदि मैं ये कबूतर नहीं लौटाता हूं तो कम से कम इसके भार के बराबर मांस तो देना ही चाहिए। लेकिन किसका मांस दूं? क्या इसके लिए किसी जीव की हत्या करूं। यह भी तो न्याय न हुआ कि एक प्राणी की रक्षा के लिए दूसरे प्राणी की हत्या कर दूं तब ? राजा मेघरथ विचित्र संकट में पड़ गये।

अंत में राजा मेघरथ ने कहा सुनो बाज। मैं तुम्हे कबूतर के भार के बराबर मांस अपने शरीर से काटकर देता हूं। इस निर्णय से लोग स्तब्ध रह गये। राजा की आज्ञा से तुरंत एक तराजू और चाकू मंगाया गया। तराजू के एक पल्ले में कबूतर को रखा गया और राजा मेघरथ ने चाकू से अपने शरीर का मांस काटकर दूसरे पल्ले में रख दिया। लेकिन पल्ला फिर भी न झुका । राजा मेघरथ ने देखा कि कबूतर का भार अधिक है। उन्हें कुछ अहिंसा की जीत

अस्तु राजा मेघरथ ने कहा- कबूतर का भार पूरा करने के लिए मैं स्वयं तराजू के दूसरे पल्ले में बैठता हूं। लेकिन तभी बाज ने कहा- ठहरिए राजन । आपका वचन

पूरा हो चुका है। मैं बाज नहीं, एक देव हूं। मैं तो आपकी दानशीलता की परीक्षा ले रहा था। आप धन्य हैं। जीव रक्षा के लिए आप अपने प्राणों की बाजी तक लगा सकते हैं। आप कितने महान् हैं। आपका त्याग अपूर्व हैं। आपकी यह घटना भविष्य में लोगों को प्रेरणा देगी कि वे जीव रक्षा करें और मांसाहार न करें। आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए मुझे क्षमा करें।

इतना कहकर वह देव चला गया, साथ ही वह कबूतर भी उड़ गया। राजदरबार राजा मेघरथ की जयकार से गूंज उठा। मन और बुद्धि का भोजन विचार हैं, विचार

हमेशा व्यतीत होता है।

कोयले की दलाली

एक था किसान। उसका नाम था किसन। उसके पास दो

एक दिन की बात हैं जमीदार का बेटा हरी शहर से गांव आया। बढिया तड़क-भड़क वाले कपड़े, कलाई में कीमती घड़ी, उंगलियों में हीरों जड़ी अंगूठियां, गले मे सोने की चेन - सभी देखकर हैरान हो जाते थे।

अहिंसा की जीत

क्या देख रहा है किसन। हरी ने पूछा। हरी देख रहा था कि किसन उसे इस बार कुछ अजीब आश्चर्य से देख रहा हैं। कुछ नहीं हरी। अपनी झेंप मिटाते हुए किसन ने कहा- तुम कितना बदल गये हो। फिर कुछ रुककर वह बोला- शहर की जिन्दगी में बहुत मजा हैं न -

हां हैं तो। पर किसन। ये सब पैसे का खेल हैं। मैं धंधा करता हूं माल तैयार करके दूसरे देशों को भेजने का बस अच्छी आमदनी होती हैं।

मुझे भी कोई ऐसा धन्धा बताओ न मैं भी खूब रुपया कमाऊं और फिर तुम्हारी तरह ठाठ-बाट वाली जिन्दगी जिऊं। किसन ने कहा। उसके मन मे हरी की जैसी जिन्दगी बिताने की कल्पना हिलोरें मार रहीं थी।

हां हां क्यों नहीं। हरी ने कहा किसन तू ऐसा कर, मुर्गी पालन कर। मुर्गियां भी बिकेगीं और अंडें भी। आजकल शहर में मुर्गियों और अंडों की बहुत मांग हैं। तू देखना, सालभर में मालामाल हो जाएगा।

किसन को लगा कि जैसे उसका सपना बहुत जल्दी साकार हो जाएगा। हरी से सारी बाते पूछ कर उसने मुर्गीपालन का धंधा शुरु करने का निश्चय किया। इसके लिए उसने अपने खेत बेंच दिए। केवल थोड़ी सी जमीन का टुकड़ा रखा, जिसमें वो अपना मुर्गी-फार्म खोल सकें ।

गांव के बड़े बुजुर्गों ने सुना तो किसन को बहुत समझाया कि वो इस धंधे को न करें। उन्होंने कहा तू मुर्गियां बेंचेगा। लोग उन मुर्गियों को मारकर खाएंगे। इसका मतलब हैं तू उन मुर्गियों की अहिंसा की जीत

हत्या का कारण बनेगा। ऐसे ही अंडे बेंचेगा। लोग उम्हें भी खाएंगे अरे किसन । क्यों पाप का बोझ अपने सिर पर रख रहा हैं। लेकिन किसन ने उनकी कोई परवाह न की। वह कहता है कि मैं न तो अपने हाथों से मुर्गी मारुंगा, न ही अंडे तोडूंगा। तब फिर पाप कैसा। मुझे तो रुपया कमाना हैं बहुत सा रुपया । कुछ ही दिनों में किसन ने अपना मुर्गी फार्म खोल लिया ! उसका व्यापार भी धीरे-धीरे चल पड़ा। किसन तो दिन रात यहीं सपना देखा करता था कि कब उसके पास बहुत सी दौलत आएगी और कब वह शानदार घर में शानदार जिन्दगी बिताएगा। अचानक उसके फार्म की मुर्गियां मरने लगी। हर सुबह उसे दस-बीस मुर्गी मरी हुई मिलती। उसकी समझ में न आया कि मामला क्या हैं। गांव में ऐसा कोई जानकार भी न था जो उसे बताता । किसन को शक हुआ कि कहीं कोई नेवला या बिल्ली तो मुर्गियों को नहीं मार रहीं।

एक दिन शहर से आए एक व्यापारी ने उसे बताया कि तुम्हारी मुर्गियों को महामारी हो गई हैं। इसलिये वो बीमार मुर्गियां और उनके अंडे नहीं खरीदेगा। किसन को काटो तो खून नहीं। वह भागकर शहर आया। हरी भैया से मिला। फिर एक डा० से मिला। उसने कुछ दवाइयां दी लेकिन जब किसन वापस गांव आया तो केवल थोडी सी मुर्गियां ही बची थी। कुछ दिनों में वे भी मर गई।

अहिंसा की जीत

उन्हीं दिनों हरी भैया फिर गांव आए। वह किसन का हाल पूछने उसके घर पहुंचा। किसन को उदास देखकर वह सारा मामला समझ गया ।

बातों में आशा की किरण दिखाई दी। उसकी आंखों में दौलत कमाने और शानदार जिन्दगी बिताने के सपने फिर से तैरने लगें। हरी भैया शहर गए। किसन हर रोज उनके संदेश का इंतजार करने लगा। अब वह पहले की तरह उदास न था। जो भी मिलता उससे किसन यहीं कहता - बस अब देखना । मेरा धंधा ऐसा चलेगा कि लोग देखते रह जाएंगे।

एक दिन स्कूल-मास्टर मुंशी परसराम, किसन को मिलें। उन्होंने किसन का हाल सुन रखा था। वह बोले भई बड़ा अफसोस हुआ ये सुनकर कि तुमने अपने खेत बेंचकर मुर्गियों का धंधा किया और वो भी चौपट हो गया। कोई बात नहीं मास्टर जी। मैं फिर से उसी अहिंसा की जीत

काम को शुरु करने जा रहा हूं। और किसन ने हरी भैया वाली बात उन्हे बतायी।

मुंशी परसराम ने कुछ सोचा बोले - किसन एक कहावत हैं - कोयले की दलाली में मुंह काला । तुमने अपना अच्छा खासा जमाजमाया खेती का काम बंद करके वो काम किया जिसकी तुम्हें जानकारी न थी और न ही हैं। फिर मुर्गियां और अंडे बेंचकर तो तुम लोगों को मांसाहारी बनाने का पाप भी तो अपने सिर पर ले रहे हो। अब तुम कर्ज लेने वाले हो। अभी खेत खोए हैं, अब घर भी खो दोगे। इस बात की क्या गारंटी हैं कि दुबारा तुम इस धंधे में सफल हो ही जाओगे। भला पाप का धंधा करके कभी कोई फला फूला हैं। अरे जो लोग मुर्गी-अंडा खाते हैं, जब वे सुखी नहीं रह पाते तो तुम भला कैसे सुखी रह सकोगे। सोचो और इस बार जल्दबाजी में फैसला न करना।

मुंशी परसराम चले गए। किसन को लगा कि वह ठीकै कह

रहें हैं। दौलत और शानदार जिन्दगी की लालच में मैं ही अंधा हो गया था। अरे क्या कमी थी मुझें? मैं भी कैसी मूर्खता कर बैठा। किसन घर आया। अब वह नये विचार लेकर आया था।

उसने फार्म वाले जमीन के टुकड़े की सफाई की। उसमें खेती करने की तैयारी करने लगा। इस बीच हरी भैया का संदेश आया तो उसने कहला दिया कि अब मुझें कर्ज नहीं चाहिए।

सच्ची जीत

इस बार के मुकाबले के लिए अभी कई महीने बाकी थे।

दोनो पहलवान अपने-अपने चेलों को दांव पेंच के अच्छे अभ्यास करा रहें थे। लेकिन दोनों एक-दूसरे की खोज-खबर लेते रहते थे कि क्या कैसी तैयारी चल रही हैं।

तेजा के कानों में अचानक एक दिन खबर पहुंची कि इस बार बिल्लू पहलवान की तैयारी ओर सालों से बहुत अच्छी हैं लगता है, उसका चेला चंदू जरूर बाजी मार ले जाएगा।

इस खबर को सुनते ही तेजा के कान खड़े हे गए। वह सोचने लगा कि श्यामू को कैसी तैयारी कराऊं कि वो चंदू से सवा-सेर साबित हो।

अहिंसा की जीत

एक दिन तेजा पहलवान शहर गया। रास्ते में कल्लू पहलवान का अखाड़ा पड़ता था। संयोग से कल्लू पहलवान बाहर ही मिल गए। तेजा को उन्होंने देखा तो बहुत खुश हुए।

अरे आओं भाई। कितने दिनों बाद मुलाकात हो रही हैं। कहते हुए कल्लू पहलवान तेजा को अंदर अपनी बैठक में ले गया। कल्लू पहलवान भी अपने जमाने का नामी पहलवान था।

बंबई, कलकत्ता, दिल्ली, जयपुर और न जाने कितने शहरों में अपनी जीत का नगाड़ा बजा चुका था। उसकी बैठक की दीवारें तमाम प्रमाण-पत्रों और तस्वीरों से सजी हुई थी। आलमारियाँ ट्राफी और मेडलों से भरी हुई थी।

बातचीत के दौरान तेजा ने अपने मन की चिंता कल्लू को बताई। कल्लू ने बहुत से सवाल किए और तेजा ने उनके जवाब भी दिए।

भाई। तैयारी तो तुम्हारी ठीक हैं। फिर भला क्या बात हो सकती है कि तुम्हारा श्यामू बाजी हार जाए। कल्लू पहलवान ने सोचते हुए कहा - अच्छा ये बताओं खुराक क्या देते हो, श्यामू को- जो सब पहलवान लेते हैं। यानी दूध, बादाम, घी तेजा पहलवान ने कहा।

बस । कल्लू ने फिर पूछा ।

हां। तेजा ने कहा ।

तो अब उसे अंडे खिलाओं । कल्लू ने कहा ।

अंडे। मगर किसके अंडे । तेजा ने आश्चर्य से पूछा। अरे भाई, मुर्गी के अंडे और क्या ।

लेकिन अंडे खाना तो?

अहिंसा की जीत

बुरा है यही कहना चाहते हो न। कल्लू पहलवान ने समझाया देखो अगर श्यामू को ताकतवर बनाना चाहते हो तो उससे कहो अंडे खाए फिर देखना कमाल । ऐसी ताकत आ जाएगी कि चंदू की गरदन एक बार दबा लेने पर छूट नहीं पाएगी।

तेजा को लगा कि कल्लू पहलवान ठीक कह रहा हैं। पहलवान में इतनी ताकत तो होनी चाहिए कि वो अपने दुश्मन को दबोच ले।

तेजा पहलवान शहर से लौटा तो उसने श्यामू से अंडे खाकर ताकत बढ़ाने की बात कहीं। पहले तो श्यामू ने आनाकानी की। फिर दंगल जीतने की चुनौती याद करके वो अंडे खाने लगा। शुरु में तो दो-चार ही खा सका। धीरे-धीरे दस अंडे रोज वह नाश्ते में खाने लगा। लेकिन श्यामू यह काम एकदम गुप्त ढंग से किया करता था।

इधर बिल्लू पहलवान भी तेजा की टोह लेता रहता था। उसे ये तो पता चल ही गया कि तेजा ने शहर के कल्लू पहलवान से कुछ नयी बातें सीखी हैं किन्तु वह उन बातों को नहीं जान पाया। चंदू पहलवान का शरीर मोटा तो न था, पर वह सींकिया भी न था। बिल्लू पहलवान रोज सवेरे से उसका अभ्यास कराते। फिर उसे डटकर दूध पिलवाते। खाने में हरी सब्जियां, दाल और शुद्ध घी खाने को कहते। एक दिन चंदू ने बिल्लू पहलवान से पूछा - उस्ताद सुना है, मुर्गी के अंडें खाने से बहुत ताकत आती हैं। आप कहें तो मैं भी -

हैं।

अहिंसा की जीत

हां उस्ताद। अंडे से ही तो मुर्गी जन्म लेती हैं। चंदू ने कहा। दूसरी बात ये है कि अंडा हमारे शरीर में विष का काम करता विष, पर उस्ताद अंडा खाते ही किसी को मरते तो नहीं देखा। बिल्लू उस्ताद हंस पड़े अरे बेवकूफ वो ऐसा जहर नहीं है जिसे खाते ही मौत हो जाती हैं। अंडा तो मीठा जहर हैं जो धीरे-धीरे असर करता हैं। ये दिल की नसों में अपना जहर जमा करता जाता हैं। धीरे-धीरे ऐसा वक्त आता हैं कि अंडा खाने वाले के दिल की नसों में इतना जहर जम जाता है कि खून का बहाव रुकने लगता हैं। बस उसके बाद ही दिल का दौरा पड़ता है, और वो मर जाता हैं।

हैं।

अब समझा। चंदू ने कहा, तब तो अंडा सचमुच ही मीठा-जहर और एक बात सुन। मेरे उस्ताद नत्थू पहलवान एक बार किसी के बहकावे में आ गए। वो अपनी खुराक के साथ अंडे भी खाने लगे। धीरे-धीरे मुकाबले का दिन नजदीक आ गया। इस बीच नत्थू उस्ताद के बदन पर अच्छी खासी चर्बी चढ़ गयी। अब चर्बी चढ़ी तो उसे जल्दी उतार भी न सकते थे। मुकाबले का दिन आ गया। नत्थू उस्ताद अखाड़े पर उतरे और वहीं हुआ जिसका डर था। नत्थू उस्ताद समझते थे कि अंडे खाने से उनका शरीर मजबूत हुआ हैं। जबकि मुकाबले में वो उसी मुटापे की वजह से मात खा गए। तब समझ में आया कि वो कहां गलती कर बैठे हैं। उन्होंने फौरन अंडे खाना छोड़ा और बदन को ठीक किया। बस, फिर क्या था। अगले साल नत्थू पहलवान ने बाजी मार ली।

कहा।

अहिंसा की जीत

अच्छा किया उस्ताद, मुझे आगाह कर दिया आपने। चंदू ने चंदू ने शाकाहारी भोजन को ही अपनी ताकत का साधन

बनाए रखा। उसका अभ्यास जैसे-जैसे बढ़ा उसने दूध, बादाम, घी आदि की मात्रा बढ़ा दी। वह जितनी खुराक लेता था, उससे कहीं ज्यादा मेहनत करता था। नतीजा, इस बार उसका बदन ऐसा गठीला हो गया कि देखने वाले वाह कर उठते।

और वही हुआ। श्यामू का मुटापा उसके लिए मुसीबत बन पड़ा। चंदू ने उसे एकदम थका दिया। श्यामू ढीला पढ़ने लगा। यह देखकर तेजा पहलवान को फिक्र हुई। उन्होंने श्यामू का हौसला बढाया पर श्यामू दीला पड़ा सो पड़ता ही गया। चंदू ने फिर ऐसे दांव चलाए कि श्यामू चारो खाने चित हो गया।

तालियों की गड़गड़ाहट और चंदू पहलवान की जय से अखाड़ा गूंज उठा। लोगों ने खुश होकर चंदू को उठा लिया। उधर श्यामू थका हुआ धीरे-धीरे चलकर अखाड़े से बाहर आया। उसे देखकर अहिंसा की जीत

दी तो थी पर तेजा शर्म से सिर झुकाए था।

उस्ताद कहीं अंड़े तो न खिला दिए श्यामू को। अंडों से मोटापा ज्यादा बढ़ता हैं।

और तेजा को जैसे बिजली का करंन्ट लगा। हैं बिल्लू उस्ताद । श्यामू को अंडें भी खिलाए थे। वो दरअसल कल्लू उस्ताद ने

कल्लू उस्ताद ? कहकर बिल्लू जोर से हंसा । तुम उसके बहकावे में आगए।

लेकिन उसने तो बहुत सोचकर सलाह दी थी।

उसने तुमसे नौचंदी मेले की हार का बदला लिया है। याद करों वहां तुम्हारे श्यामू की जीत से उसके चेले हीरा पहलवान की कैसी खिल्ली उड़ी थी।

प्यारे भाई इतना तो तुमको भी समझना चाहिए था कि अँडा तो जहर है फिर श्यामू को

चलो छोड़ो गलती तो इन्सान से होती ही है। आगे के लिए सावधान हो जाओ।

उधर चंदू को घेरे हुए लोग पूछ रहे थे - पहलवान। इतना सुन्दर बनाने के लिए क्या करना चाहिए और क्या खाना चाहिए।

अहिंसा की जीत

खूब मेहनत करो और शाकाहारी भोजन करों। चंदू कह रहा था। तभी बिल्लू उस्ताद पास आए। चंदू ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए और उन्होंने चंदू को गले लगा लिया।

मन-वचन काय को सरल करना चाहिए क्योंकि

इनकी कुटिलता आत्मा के लिए कर्म-जाल बुनती हैं और उसमें चेतन को फंसाकर दुर्गति में ढकेल देती हैं। यदि तू सर्वथा मन वचन-काय की चेष्टाओं को नहीं रोक सकता तो अशुभ चेष्टा तो मत कर।

ईर्ष्या

प्रशान्त का एक सहपाठी था - अशोक । वह प्रशांत से बहुत ईर्ष्या करता था। यों अशोक कक्षा में नंबर दो रहता था - किंतु बहुत कोशिशों के बाद भी वह प्रशांत का नंबर एक नहीं छीन पा रहा था। इस बात का दुख अशोक से ज्यादा, उसके पिता नरेश मल्होत्रा और पत्नी पिंकी मल्होत्रा को था। वे अशोक को, प्रशांत के खिलाफ खूब भड़काते, उसको खुश करते - लेकिन फिर भी जब परीक्षा फल आता तो अशोक नम्बर दो पर ही रहता। इससे नरेश मल्होत्रा और पिंकी मल्होत्रा जलभुन जाते। वे सदा यही सोचते रहते कि किस तरकीब से वे प्रशान्त को पछाड़कर अपने अशोक को प्रथम स्थान दिलवाएं।

प्रशांत के पिता हरीश शर्मा और माता नीलम शर्मा बड़े ही शालीन और सभ्य व्यक्ति थे। छलकपट और चालाकी तो उन्हें छू तक न गई थी। अशोक कभी-कभी बदले की भावना में आकर

अहिंसा की जीत

अगर प्रशांत से झगड़ाकर बैठता तो वे यही कहते - बेटे, वो तुम्हारा सहपाठी है, मित्र हैं उसे दुख पहुंचाना बुरी बात हैं। अशोक और प्रशांत के घर एक ही कालोनी में थे। अशोक

की मां पिंकी मल्होत्रा, प्रशांत की मां नीलम शर्मा से अक्सर ही कहीं न कहीं मिल ही जाती थी। पिंकी जब भी मिलती - बड़े व्यंग्य से कहती - क्या बात हैं, मिसेज शर्मा । आजकल आप दिखाई नहीं देती लगता हैं आजकल प्रशांत को पढ़ाने में आपका टाइम ज्यादा खर्च हो जाता हैं।

नीलम शर्मा कहती - अरें पिंकी बहन । तुमसे तो करोब-करीब रोज ही मिलती हूं वैसे सच पूछो तो हमें प्रशांत के साथ पढ़ाई में कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती। तो क्या ट्यूसन लगा रखी हैं। उसकी तो हमारी हैसियत नहीं हैं हां, प्रशान्त के पिता अवश्य कभी-कभी पढ़ा देते हैं। वह भी तब जबकि प्रशान्त खुद कुछ पूछता हैं। नीलम शर्मा ने कहा। भगवान करें, आपके प्रशांत को नजर न लगें। पिंकी मल्होत्रा ने कहा- हमें तो खुद बहुत अच्छा लगता हैं - जब हम सुनते हैं कि प्रशांत फर्स्ट आया हैं। लेकिन एक बात खटकती हैं वैसे तो आप अपनी ही हैं, फिर भी बुरा न मानें तो कहूं। बात प्रशांत की भलाई की ही हैं।

पिंकी बहन। अगर बात प्रशांत की भलाई की हैं तो उसमें बुरा क्यों मानना । आप तो प्रशांत की प्रशंसक हैं।

बात ये हैं कि प्रशान्त की सेहत ठीक नहीं हैं एकदम दुबला पतला हैं जबकि वो पढाई में बहुत मन लगाता हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप उसकी सेहत पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहीं। ऐसा नहीं हैं बहन। हम तो प्रशान्त को सभी जरूरी चीजें देते हैं और कोई कमी नही रखते । नीलम ने कहा -

अहिंसा की जीत

दरअसल प्रशान्त बचपन से ही ऐसा हैं, दुबला-पतला। नीलम बहन। बुरा न मानना। प्रशांत का दिमाग जितना तेज है, उसे उसके हिसाब से खाना भी मिलना चाहिए। वैसे क्या मैं पूछ सकती हूं कि उसको आप खाने के लिए क्या-क्या देती हैं। भोले और सरल स्वभाव की नीलम शर्मा ने कहा- दूध, घी, हरी सब्जियाँ, बादाम, अंकुरित अनाज - सभी कुछ देते हैं - साथ में मौसम के फल भी देते हैं।

यह सुनकर पिंकी मल्होत्रा ने मुंह बना लिया। उन्हें देखकर नीलम शर्मा को लगा कि जैसे वह गलत हैं और वह प्रशान्त की देखभाल में कोई कमी कर रहीं हैं। आखिर पिंकी ने कहा - बस। अजी, इस खुराक से भला इतना तेज बच्चा, बडा होकर तो एकदम बुझ जाएगा। भला यह भी कोई खुराक हैं। तभी तो प्रशांत एकदम सींकिया पहलवान हैं। कहकर पिंकी मल्होत्रा खूब जोर से हंसी। उनका इस तरह हंसना नीलम शर्मा को बुरा लगा। फिर भी वह शालीन ढ़ग से उस बात को बर्दाश्त कर गयी। उन्होंने बड़े शांतभाव से पूछा - पिंकी बहन। मैं तो अपनी समझ से प्रशांत को ठीक ही खुराक दे रही हूं। फिर भी, यदि कोई कमी हो तो तुम बताओ मैं पूरा करूंगी।

अब नीलम को भी बुरा लगा - क्यों ऐसा क्या हैं, जो हम प्रशान्त के लिए नहीं कर सकतें। इसमें हमारा शर्मा होना या न होना इसका क्या मतलब हैं। मतलब हैं बहन मतलब हैं पिंकी ने व्यंग्य से कहा। आप लोग वो खुराक अपने बच्चों को नहीं दे सकतें जो दरअसल उन्हें चाहिए। इसीलिए आपके बच्चे कमजोर रहते हैं। अहिंसा की जीत

भला ऐसा क्या हैं, पिंकी बहन, जो हम नहीं दे सकतें। जरा मैं भी तो सुनू। नीलम ने पूछा।

आप प्रशांत को अंडा नहीं खिलाती। अब देखिए न, हमारा अशोक भले ही दूसरे नंबर पर आता हैं लेकिन कोई दूसरा लडका उसे पछाड़ कर तीसरे नंबर पर नहीं ला सकता - क्योंकि हम अशोक को बढ़िया खुराक देते हैं।

भोली भाली नीलम शर्मा की बुद्धि में यह बात नहीं आयी कि अगर ऐसा हैं तो वो प्रशांत को क्यों नहीं पछाड़ सका। वह तो बेचारी यही सोचती रहीं कि वो प्रशांत के प्रति वह शायद गलत हैं। जबकि सच्चाई यह थी कि वह ठीक थी और पिंकी मल्होत्रा उनके साथ चाल खेल रहीं थी।

बहन। हम तो ब्राह्मण हैं भला अंडा कैसे खिलाएं, प्रशांत को। ये सब कहने की बातें हैं जमाना बदल गया हैं ये सब पुरानी बातें हो गई। आजकल सब लोग अंडा खाते हैं। और फिर या तो बच्चे की भलाई की बात सोच लो या फिर धरम-करम रख लो। पिंकी मल्होत्रा ने अपना काम कर दिया था। नीलम शर्मा को वह उलझन में डालकर चली गयी। नीलम दिन भर यही सोचती रही कि क्या करूं। कभी उसे अपने प्रशांत का ख्याल आता। वह सोचती कि अगर ये इसी तरह कमजोर रहा तो बड़ा होकर जिन्दगी का बोझ कैसे उठाएगा। कभी सोचती कि कमजोर शरीर को रोग व्याधियां धेर लेती हैं। अगर प्रशांत और कमजोर हो गया तो। फिर उसे ध्यान आता कि हमारे घर में तो प्याज लहसन तक नहीं खाया जाता। अगर अंडा खाने लगे तो पता नहीं क्या हो। घर के दूसरे लोग क्या सोचेंगे। सब हमें घृणा की दृष्टि से देखने लगेंगे। फिर सोचती - अगर चोरी छिपे प्रशांत को अंडा खिला दू तो। और अहिंसा की जीत

अगर अम्मा-बाबूजी को कभी पता चल गया तब क्या होगा। वो तो तूफान खड़ा कर देंगे। नीलम की कुछ भी समझ में न आ रहा था। शाम को हरीश घर लौटे तो पत्नी नीलम को उन्होंने बहुत परेशान देखा। पूछने पर नीलम ने सारी बात बता दी। उसने दिन भर जो कुछ सोचा था, वह भी बता दिया । हरीश शर्मा ने सारी बात ध्यान से सुनी। फिर बोले - चिंता की कोई बात नहीं। पहले चाय पिलाओं, फिर मैं तुम्हारी समस्या का समाधान करता हूं। थोड़ी ही देर में नीलम ने चाय-नाशता तैयार करके हरीश के सामने रख दिया।

हरीश ने चाय पीते हुए कहा - बात ये हैं कि तुम भोले स्वभाव की हो और पिंकी मल्होत्रा बहुत चालाक महिला हैं। उन्होने न सिर्फ तुम्हें नीचा दिखाया है, बल्कि एक गहरी चाल भी चली हैं। उन्होंने अपने को बहुत श्रेष्ठ बताने की कोशिश की हैं कि वह अपने बच्चे अशोक को अंडा देती हैं। वह अपने को आधुनिक और एक पढ़ी-लिखी समझदार मां सिद्ध करना चाहती है। और तुमने अपने भोलेपन में उनकी बात स्वीकार कर ली, जबकि सच ये है कि तुम भी एक कुशल मां हो और प्रशांत की देखभाल बहुत अच्छी तरह करती हो।

लेकिन हरीश, क्या ऐसा नहीं लगता कि हमारा प्रशांत दुबला हैं और उसे नीलम ने कहा पर उसकी बात बीच में ही काटकर हरीश ने कहा - दुबला होना कोई बुराई नहीं हैं। हमारा प्रशांत एकदम ठीक हैं। दुबला होने से वह ज्यादा चुस्त-फुर्त रहता हैं। मोटे होने से शरीर के साथ-साथ अकल भी मोटी हो जाती है। अब पिंकी मल्होत्रा के बेटे अशोक की बात लो । अगर अंडा खाने से किसी की तुद्धि तेज हो जाती है तो अब तक अशोक प्रशांत को क्यों नहीं पछाड़ सका। मैं अच्छी तरह जानता हूं - पिंकी मल्होत्रा हमारे अहिंसा की जीत

प्रशांत से ईर्ष्या करती हैं और उन्होंने यह जो झूठी सहानुभूति दिखाई है, उसके पीछे गहरी चाल है।

गहरी चाल हैं नीलम ने पूछा

हां। एक तो अंडा खिलाने की बात मनवाकर वह हमें भ्रष्ट करना चाहती है। ताकि हम अपने घर और बिरादरी के लोगो को बीच बदनाम हो जाए। दूसरी और असली चाल ये है कि प्रशांत जब अंडा खाने लगेगा तो वह मोटा हो जाएगा। वह सुस्त रहने लगेगा और तब उसका दिमाग भी सुस्त हो जाएगा। इस तरह वह कक्षा में पहले नंबर पर नहीं आएगा। और तब अशोक मल्होत्रा कक्षा में प्रथम हो जाएगा।

हाय राम। ये तो मैने सोचा ही नहीं। पिंकी तो हमारी दोस्त बनकर दुश्मन का काम करने आई थी। नीलम ने कहा ।

हां सच्चाई ये है कि जो लोग अंडे खाते हैं, मांसाहारी भोजन करते हैं - वे स्वभाव से सुस्त होते हैं। हमारा प्रशांत शुद्ध शाकाहारी भोजन करता हैं। वो दुबला है तो क्या । उसमें ताकत की कमी नहीं हैं। और फिर उसे कौन पहलवानी करनी हैं। हरीश ने समझाया ।

मैं तो सारे दिन परेशान होकर यही सोचती रही कि प्रशांत को अंडा खिलाऊं या नहीं। उसके भविष्य की चिंता सताने लगी थी। कुछ नहीं होगा उसे। तुम बेफिक्र रहो। उसे अंडे से ज्यादा ताकत दूध, फल और सब्जियों से मिलती हैं। वहीं असली पौष्टिक भोजन हैं। हरीश ने समझाया।

नीलम अब निश्चिंत हो चुकी थी। लेकिन पिंकी मल्होत्रा को बेचैनी हो रही थी कि उसकी बात नीलम ने मानी या नहीं। अगले दिन वह फिर आ धमकी। नीलम अब समझ गई कि वह क्यों आई अहिंसा की जीत

है। नीलम ने उससे झूठ ही कह दिया कि प्रशांत बड़े शौक से अंडे खाने लगा है। पिंकी मल्होत्रा यह सुनकर बहुत खुश हुई। छमाही परीक्षा हुई। प्रशांत फिर प्रथम आया। पिंकी तो पूरी उम्मीद लगाए थी कि प्रशांत नीचे की ओर लुढ़केगा। लेकिन ऐसा न हुआ। पिंकी की आशाओं पर पानी फिर गया। आखिर एक दिन उसने प्रशांत से पूछ ही लिया - प्रशांत । तुम अंडे तो खाते हो न। पर तुम्हारी सेहत तो पहले जैसी है।

नहीं आंटी। मैने अंडा कभी नहीं खाया और न ही खाऊंगा। उसके बदले दूसरी बहुत सी अच्छी चीजें खाने को हैं न। प्रशान्त की बात सुनकर पिंकी को गहरा धक्का लगा - उसने सोचा - तो नीलम मेरी चाल समझ गई। कोई बात नहीं, अब दूसरी चाल सोचूंगी। और पिंकी मल्होत्रा फिर से अपनी नयी योजना बनाने में व्यस्त हो गयी। लेकिन अशोक कभी भी प्रशांत को नहीं हरा पाया।

कषाय और विषय-वासना इस जीव के हृदय-सरोवर को

व्यथित कर आकुल-व्याकुल कर देती हैं। आत्मा को

सन्मार्ग से च्युत कर दुर्गति में ढकेल देती हैं, इसलिए समस्त वैरभाव का परित्याग कर चित को स्वच्छ कर । आत्मचिंतवन और आत्मालोचन द्वारा आत्मशुद्धि करके आत्मानुभव करने का प्रत्यन करना चाहिए।

नीलम - परी और पंकज

पंकज गहरी नींद में सो रहा था। अचानक उसे लगा कि गुलाबी रंग के सुन्दर झिलमिलाते कपड़े पहने एक परी ने उसे जगाया। पंकज पहले तो उसे देखकर थोड़ा घबराया। लेकिन परी की सुंदरता और उसका मुस्कराता चेहरा देखकर पंकज भी मुस्कराया।

छह-सात साल का पंकज उस रात गुलाबी परी को देखकर

बहुत खुश था। गुलाबी परी ने कहा - पंकज । तुम्हें परियों की रानी - नीलम परी ने बुलाया हैं।

यह सुनकर पंकज बहुत खुश हुआ। वह उसके साथ चलने के लिए तैयार हो गया। गुलाबी परी ने पंकज की उंगली पकड़ी और उसे परी लोक की ओर उड़ा ले चली।

कुछ देर तक पंकज बादलों, तारों और आकाश को देखता रहा। फिर अचानक उसने सोचा कि परियों की रानी - नीलम परी ने उसे ही क्यों बुलाया हैं। जबकि राजू, मुन्नू, मीता, सुभाष, कमला सभी उसके मुहल्ले में रहते हैं और फिर अकेले उसे ही क्यों बुलाया हैं। उसके साथ बाकी बच्चों को क्यों नहीं बुलाया। आखिर उसका मन नहीं माना तो उसने ये सवाल गुलाबी परी से पूछ ही लिया। गुलाबी परी ने कहा - मैं तो रानी-परी की सेविका हूं। यह बात तो वही बताएंगी। मुझे हुक्म हुआ था कि मैं तुम्हें इसी वक्त परीलोक में ले आऊं, सो ले चल रही हूं।

लेकिन क्यों। क्या रानी-परी को मुझसे जरूरी काम हैं। अहिंसा की जीत

कहा न। मुझे कुछ नहीं मालूम। फिर उसने मुस्कराकर कहा- घबराओं नहीं। कुछ ही पलों में हम परीलोक में पहुंचने वाले हैं। और पंकज सचमुच ही परीलोक में पहुंच गया। उसने जैसा पढ़ा-सुना था, परीलोक बिलकुल वैसा ही था। हर ओर रंग बिरंगी रोशनी वाले मकान, फूलों से भरी सड़कें, ठंडी-ठंडी हवा, मधुर संगीत ।

गुलाबी परी पंकज को सीधे रानी परी के दरबार में ले गई। परियों की रानी नीलम -परी एक ऊंचे सिंहासन पर बैठी थी। उसने सुंदर झिलमिल करते हुए नीले रंग के कपड़े पहन रखे थे। गुलाबी परी ने रानी-परी के सामने आकर कहा - महारानी आपकी आज्ञा से मैं पंकज को ले आई हूं।

कहा।

हूं तो ये हैं, वो पंकज नामका लड़का । गुस्से से नीलम परी ने पंकज घबरा गया। उसकी समझ में न आया कि नीलम परी उससे क्यों नाराज हैं।

जल्लादों। पकड़ लो इस लड़के को और कैदखाने में डाल दो । इसके मुकदमें की सुनवाई कल होगी।

पंकज ने देखा कि दो राक्षस, बड़ी-बड़ी तलवारें लिए उसकी ओर बढ़ रहें हैं। वह घबराकर चीख उठा पर लगा जैसे उसके गले में कुछ फंस गया हैं। उसकी आवाज गुम हो गई हैं। वह वहां से भागने लगा, लेकिन उन जल्लादों ने उसे कसकर पकड़ लिया । उनके बड़े-बड़े मजबूत हाथों में वह छटपटाकर रह गया। अपने को छुड़ाना उसे बहुत मुश्किल लगा ।

अहिंसा की जीत

कुछ ही देर में पंकज को एक अंधेरी कोठरी में डाल दिया। बाहर से दरवाजा बंद करके मोटा ताला लगा दिया गया। बेचारा पंकज वहां पड़े-पड़े रोता रहा। फिर थोड़ी देर में सो गया। अचानक लोहे का वह मोटा दरवाजा खुला तो पंकज जाग गया। सवेरा हो चुका था। वे जल्लाद अंदर आए और बोले - चलो उठो तुम्हारा मुकदमा शुरु होने वाला हैं।

लेकिन मेरा कसूर क्या हैं। मैने क्या गलती की हैं जिसकी मुझे सजा मिल रही हैं।

महारानी के दरबार में चलो। सब मालूम हो जाएगा। एक जल्लाद ने कहा।

पर मुझे भूख लगी हैं। रात से कुछ नहीं खाया। कुछ खाने के लिए दो न ।

यह सुनकर दोनो जल्लाद जोर से हाँ हाँ करके हंसे। पंकज को उनकी हंसी सुनकर लगा कि जैसे आसमान फट जाएगा।

फिर एक जल्लाद ने कहा हां हां क्यों नहीं। तुम्हें तो हम ऑमलेट खिलाएंगे, उबले अंडे खिलाएगें और जो मांगोगे वो भी देंगे पर अभी नहीं, पहले मुकदमा खत्म हो और वे फिर से हंसे । नीलम परी का दरबार लगा था। पंकज को पकड़कर उन

जल्लादों ने एक बड़े पिंजड़े में बंद कर दिया और दोनो तलवारें तानकर उसके बाहर खड़े हो गए।

नीलमपरी ने कहा - पंकज के खिलाफ शिकायत करने वालों को पेश किया जाए। पंकज ने यह सुना तो परेशान होकर इधर-उधर देखने लगा। भला कौन हो सकता है, उसके खिलाफ शिकायत करने वाला। क्या राजू, मीता या मुन्नी। मैने तो स्कूल में भी किसी से झगडा नहीं किया। फिर किसने मेरी शिकायत की। अहिंसा की जीत

अचानक पंकज विचित्र सी कुड़क-कुड़क कूं कूं की आवाजों से चौंक उठा। उसने देखा कि मुर्गियों का एक बड़ा झुंड़ जोर-जोर से रोता हुआ चला आ रहा हैं। वे सारी मुर्गियां दरबार में आकर दूसरी ओर खड़ी हो गई। तभी नीलम परी ने कहा- खामोश । रोना बंद करो और अपनी शिकायत कहो ।

तब मुर्गियों के झुंड़ में से निकलकर एक मुर्गी ने कहा - महारानी जी। ये लड़का, हमारे बच्चों की हत्या करता हैं। ये खूनी हैं। और यहीं नहीं। बहुत सारे बच्चे इसी जैसे है जो हर रोज हमारे बच्चों की हत्या करते हैं। हमारी विनय है कि इसे मौत की सजा दी जाए।

ये झूठ है। मैने किसी के बच्चें की हत्या नहीं की। मैं तो खुद बच्चा हूं भला मैं क्यों इनके बच्चों की हत्या करूँगा। पंकज ने कहा। ये झूठ बोल रहा हैं। मौत की सजा से डर रहा हैं। लेकिन महारानी जी मैं सच कहती हूं हम तमाम मुर्गियों के बच्चों की हत्या, हर रोज सुबह ये और इस जैसे बच्चें करतें हैं। इसको सजा दीजिए ताकि इसके साथियों को भी सबक मिलें। मुर्गियों ने कहा और रोने लगी।

नीलम परी ने कहा- पंकज तुमने सुना ये मुर्गियां, तुम्हें अपने बच्चों का हत्यारा बताती हैं। तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना हैं। रानी परी मैं सच कह रहा हूं। मैने किसी की हत्या नहीं की। मेरा कोई साथी भी ऐसा नहीं हैं। पंकज ने कहा।

मैं बताती हूं, महारानी जी। ये लड़का रोज सुबह एक अंडा खाता हैं। इसके बहुत से साथी भी ऐसा ही करते हैं। रानी जी उन्ही अंडों से तो हमारे बच्चे पैदा होते हैं। आप ही बताइए, क्या अहिंसा की जीत

अंडों को तोड़कर खा जाना, हमारे बच्चों की हत्या नहीं हुई। मुर्गी ने कहा।

अजीब बात हैं। आश्चर्य से पंकज ने कहा - अंडे खाने में भला क्या हर्ज हैं। महारानी जी, पृथ्वी पर तो न जाने कितने लोग अंडे खाते हैं। अंडे खाने से भला हत्या का क्या संबंध। पंकज ने कहा।

संबंध तो हैं, पंकज। ये और बात है कि तुमने उसे समझा नहीं। नीलम परी ने कहा उन अंडो में मुर्गियों के बच्चों का छोटा रुप छुपा होता है। धीरे-धीरे वह बड़ा होता हैं और फिर चूजे के रुप में वो अंडा फोड़कर बाहर निकलता है। इस तरह उन अंडो को खाना, जीवहत्या के समान अपराध हुआ ।

मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता। झुंझलाकर पंकज ने कहा - लोग तो कहते हैं कि अंडा जरूर खाना चाहिए। इससे ताकत आती हैं, शरीर मजबूत होता हैं।

झूठ है ये भ्रम है तुम्हारा। मुर्गी ने कहा। महारानी जी। इस लड़के को तो अंडे इतना पसंद हैं कि अगर इसकी मां नाश्ते में अंडा न देतो ये गुस्से से नाश्ता नहीं करता। और यहां आकर भोला बनता हैं।

महारानी जी। ये सही है कि मैं अंडे खाता हूं। लेकिन आज तक मुझसे किसी ने नहीं कहा कि अंडे खाना पाप है। जीव-हत्या हैं। पंकज ने कहा।

मुझे तुम्हारी अज्ञानता पर तरस आता है जरा सोचो। जिस मां के बच्चें छीनकर कोई मार डाले उसे कितना दुख होगा। अगर ये जल्लाद तुम्हें मार डालें तो तुम्हारी मां को कितना दुख होगा। ऐसा ही दुख इन मुर्गियों को हो रहा है और ये सब अपनी फरियाद लेकर यहां आई हैं।

अहिंसा की जीत

आश्चर्य हैं। लोग अंडो को ताकत के लिए खाते हैं, और आप उन्हें जीव-हत्या कह रही हैं। पंकज ने कहा। मैं ठीक कह रही हूं पंकज । अंडे खाने से ताकत नहीं आती, उससे शरीर कमजोर होने लगता है। पेट के अंदर धीरे-धीरे कई तरह के रोग जन्म लेने लगते हैं। जो बड़े होने पर भयानक रुप ले लेते है। अगर ताकत चाहिए तो उसके लिए और भी चीजें है - जो अंडे से ज्यादा ताकत देती हैं - दूध, फल, बादाम इन्हें खाओं। पंकज उन रोती बिलखती मुर्गियों को देखकर सोच रहा था - अगर अंडे खाना अच्छा होता तो ये मुर्गियां भला इस तरह क्यों रोती। यह तो सच है कि अंडे से ही मुर्गी निकलती हैं। तब तो सचमुच अंडा खाने का मतलब है - जीव-हत्या और अगर ऐसा है तो ओफ कितने ही लोग रोज कितनी बड़ी जीव हत्या करते हैं बाप रे बाप इतना बड़ा पाप ।

क्या सोच रहे हो पंकज । नीलम परी ने पूछा - क्या अभी भी तुम्हें विश्वास नहीं हुआ कि तुम कितना बडा अपराध हर रोज करते हो।

मैं समझ गया महारानी जी। अंड़े खाना घोर पाप हैं, पंकज ने कहा।

तो महारानी जी। इसे मौत की सजा दीजिए, जिससे सब बच्चों को सबक मिले कि अंडे खाना कितना बड़ा अपराध हैं। मुर्गी ने गुस्से में आकर कहा।

शांत शांत शांत नीलमपरी ने कहा - ये सच है कि पंकज और इस जैसे दूसरे अंडा खाने वाले बच्चे अपराधी हैं लेकिन इसमें इनका कोई दोष नहीं हैं। ये अभी अनजान और अबोध हैं। यदि इन्हें इनकी गलती का अहसास करा दिया जाए तो ये कभी वो गलती फिर नहीं करेंगे। क्यों पंकज ।

अहिंसा की जीत

हां महारानी जी। मुझे ही क्यों, हजारों-हजारों बच्चों को भी पता नहीं हैं कि अंडा खाने से क्या नुकसान होता है और क्या अपराध करते हैं वो । पंकज ने कहा।

वैसे तो अभी छोटे हो, फिर भी तुम्हें बता देती हूं कि अंडे खाने से एक तो मोटापा बढ़ता है। दूसरे दिल की नलियों में एक ऐसा पदार्थ जन्म लेता हैं, जिसके कारण उनमें पहले तो खून का बहाव कम होता हैं। फिर जब वह पदार्थ ज्यादा जम जाता है तो खून का बहाव एकदम रुक जाता है और इस तरह उस आदमी की मौत हो जाती है। इसी तरह जो आदमी मोटा हो जाता है, वो सुस्त हो जाता है। जल्दी-जल्दी काम नहीं कर पाता। पैदल चलने से थक. जाता है। थोड़ा सा भी बोझ नहीं उठा पाता और तब उसे मधुगेह, गठिया, हृदय-रोग जैसी अनेक बीमारियाँ घेर लेती है। तीसरा नुकसान ये है कि पाचन-शक्ति कमजोर हो जाती है। इससे आदमी कमजोर हो जाता है। लेकिन दूध, घी, सब्जियाँ, बादाम आदि खाने वालों को कभी ये रोग नहीं सताते, क्योंकि उनका शरीर चुस्त-फुर्त रहता हैं। उनकी उम्र भी लंबी होती है। नीलम परी से अंडों से होने वाले नुकसान सुनकर पंकज सोचने लगा कि लोग भी कैसे है। जिन अंड़ो से इतना नुकसान होता है, उन्हें फिर भी लोग क्यों खाते हैं।

पंकज के मन में उठें प्रश्न को नीलम-परी ने समझ लिया। वह बोली - मैने तुम्हारे मन की बात जान ली है। तुम ठीक सोच रहें हो। लोग जानबूझ कर अंडे के रुप में ऐसा मीठा-जहर खा रहें हैं जो आगे चलकर उनके लिए धातक बन जाता है। लेकिन दुख तो यही है कि वे इस बारे में कभी सोचते नहीं। उन्हें समझाना बताना जरुरी है।

अहिंसा की जीत

महारानी जी। आप तो इस हत्यारे को समझाने-बुझाने लगीं। इसे तो मौत की सजा दीजिए न्याय कीजिए महारानी जी, न्याय। मुर्गी चिल्लाई। इसके साथ ही सारी मुर्गियां शोर करने लगी। नीलम-परी ने उन्हें शांत करके कहा - यह सही है कि पंकज तुम्हारा अपराधी है लेकिन अनजाने में किया गया अपराध, अपराध नहीं कहलाता। ऐसे अपराधी को क्षमादान देकर सुधरने का मौका दिया जाता है और वही हम पंकज के साथ करेंगें। फिर नीलम-परी ने पंकज की ओर देखकर कहा- क्यों पंकज । तुम अपने तमाम दोस्तों को बताओगें न। कि अंडें खाना कितना बुरा है। हां नीलम परी। आज से मैं कभी अंडें को हाथ तक नहीं लगाऊंगा और अपने तमाम साथियों को बताऊंगा कि अंडे खाना जहर है, हत्या के समान है। और मुर्गियों से वादा करता हूं कि उन्हें हमसे कोई शिकायत न होगी।

पंकज की बात सुनकर मुर्गियां संतुष्ट हो गई और कुड़क-कुड़क करती हुई चली गई। इसके बाद पंकज को पिंजरे से बाहर निकाला गया। नीलम-परी ने उसे अपने पास बिठाया। तभी एक परी हाथ में बड़ा कटोरा और चम्मच लेकर आई। उस कटोरे में फूलों के पराग का हलवा था। पंकज को तो बहुत जोर से भूख लगी थी। उसने फट से कटोरा ले लिया और मीठा हलवा खाने लगा। नीलम-परी अब उससे बहुत खुश थी।

पराग का हलवा खा चुकने के बाद नीलम-परी ने आदेश दिया - अब पंकज को परीलोक की सैर कराओं और फिर वापस पृथ्वी पर छोड़ आओं।

पंकज ने परीलोक की अनेक अनोखी बातें देखीं। फिर उसे वही गुलाबी परी पृथ्वी पर उसके घर उसी बिस्तर पर छोड़ गयी। अहिंसा की जीत

पंकज उस सुबह जागा। नहा धोकर स्कूल के लिए तैयार हुआ। फिर मां से बोला - मां। आज से मैं नाश्तें में अंडा नहीं खाऊंगा।

लेकिन क्यों। मां ने पूछा।

यह मैं स्कूल से लौटकर बताऊंगा। कह कर पंकज स्कूल चला गया।

पंकज की मां सारे दिन परेशान रही कि यह अचानक पंकज को क्या हुआ। लेकिन शाम को उसने अपने मम्मी-पापा को नीलम-परी की कहानी सुनाई तो उन्होंने भी कहा - आज से हमारे घर में अंडा नहीं आएगा और न ही हम लोग कभी अंडा खाएंगे। इसके बाद तो पंकज के दोस्तों ने भी नीलम-परी की कहानी सुनकर अंडा छोड़ दिया। वे शुद्ध शाकाहारी हो गए। अब वे अपने को पहले से ज्यादा ताकतवर और फुर्तीला महसूस करते थे। मनोबल की कमजोरी होने से विषय-वासना प्राणियों को अपना दास बनाकर पददलित कर देती हैं। इस मन को दास बनाना कठिन हैं। यदि मन वश में हो गया तो इन्द्रियां और वासनायें उस मनोबली के समक्ष आत्मसमर्पण कर देती हैं। * * *

ढ़ोगी साधु

एक गांव था। वहां के लोग बड़े सीधे-सादे थे। एक बार एक ठग वहां आया। उसने गांव के भोले लोगों को देखा तो मन में सोचने लगा कि इन्हें बेवकूफ बनाकर मजे से जिन्दगी कट सकती हैं। बस वह वहां से चला गया और कुछ दिनों बाद एक साधु का वेश बनाकर आ गया।

गांव के बाहर एक पुराना टूटा-फूटा मंदिर था। पास ही नदी बहती थी। उस धूर्त ने वहीं अपना अड्डा जमाया। धीरे-धीरे गांव के लोग उसके पास आने लगें। वह साधु उनकी छोटी-मोटी तकलीफें दूर करने के लिए दवा देने लगा। बदलें में गांव के लोग उसके खाने-पीने की चीजें लाने लगें। साधु को यही तो चाहिए था। वह मंदिर में पड़ा रहता। खूब डटकर खाता-पीताऔर लोगों को ठगता रहता ।

कुछ दिनों बाद उस साधु के मन में लालच आया। उसे

रोज-रोज दूध, घी, मिठाई आदि खाने से मन ऊबने लगा। सोचा बहुत दिन हो गए मांस नहीं खाया। पर इस गांव का तो कोई व्यक्ति मांस नहीं खाता। फिर भला मुझे मांस खाने को कैसे मिल सकता हैं। वह तरकीब सोचने लगा। एक दिन एक किसान का लड़का तेज बुखार से पीड़ित था। उसे लेकर वह किसान साधु के पास आया ।

बाबा। देखो मेरे बेटे को क्या हो गया है। मेरी इकलौती संतान है। बड़ी मन्नतों के बाद हुआ है। इसे बचा लो। अहिंसा की जीत

बाबा ने आंखें बंद की। कुछ सोचा। फिर आंखें खोलकर बोले - बेटा। तुम्हारे इस बच्चे को देवी मांग रही है। ये तो नहीं बच करता ।

किसान रो पड़ा। बाबा के पैरों पर गिर पड़ा। बाबा से बोला - आप सब कुछ कर सकते है। देवी को समझाए मेरे बच्चे को बचा लीजिए ।

मैं कुछ नहीं कर सकता। देवी तुमसे नाराज है। कहती है - इसने मेरी पूजा नहीं की। मैं तो इसके लड़के को लेकर ही जाऊँगीं।

किसान गिड़गिड़ाने लगा। बाबा । देवी को किसी तरह मनाइए। वो जो कहेंगी, मैं करूंगा। लेकिन मेरे बच्चे को बचा लीजिए ।

ठीक है। मैं प्रार्थना करता हूं। देखता हूं शायद देवी मान जाएं। कह कर बाबा ने फिर आंखें बंद कर ली।

थोड़ी देर बाद बाबा ने आंखें खोलकर कहा - देवी कहती हैं कि बच्चे के बदले, मुझे बकरे की बलि दो। उसका प्रसाद किसान को भी खाना होगा। तब मैं इस बच्चे को छोड़ दूंगी। बलि! बकरे की बलि! आश्चर्य से किसान ने कहा। उसका प्रसाद मुझे भी खाना होगा। पर मैने तो कभी मांस खाया नहीं। किसान ने परेशान होकर कहा।

सोच लो ! या तो देवी को अपना बच्चा दे दो, या बकरे की बलि चढ़ा दो।

मजबूर किसान ने कहा - ठीक है। मैं बलि के लिए बकस ले आऊंगा।

अहिंसा की जीत

ठीक है। ये दवा इस बच्चे को खिला देना। ठीक हो जाएगा। लेकिन अपना वायदा मत भूलना, वरना देवी माता तुम्हारा सर्वनाश कर देंगी।

किसान दवा लेकर चला गया। अगले दिन उसके बच्चे का बुखार उतर गया। वह एक बकरा लेकर साधु को देने के लिए चला। गांव के लोगों ने सुना तो बहुत परेशान हुए। लेकिन देवी के क्रोध की बात सुनकर चुप हो गए।

किसान बकरा लेकर साधु के पास आया। साधु बकरे को मंदिर के पीछे नदी किनारे ले गया। उसे काटकर उसका मांस ले आया।

मैनें देवी माता को बलि चढ़ा दी है। अब इस मांस को मैं पकाऊगा। तब तुम इस प्रसाद को खाना। साधु ने उस किसान से कहा।

किसान बेचारा चुपचाप एक ओर बैठा रहा। साधु ने मांस पकाया। फिर थोड़ा-सा मांस किसान को दिया। किसान हिचकिचाया तो साधु ने देवी के क्रोध की याद दिलाई। बेचारे किसान ने किसी तरह वह मांस खाया और चला गया।

इधर साधु ने खूब डटकर भोजन किया और खर्राटे मारकर सोने लगा।

सवेरा हुआ। उसने देखा कि एक औरत रोती-चीखती आ रही है। वह उसी किसान की बीवी थी।

अरे बाबा। तुमने मेरे पति को क्या खिला दिया। कल से वो उल्टियां कर रहा हैं।

अहिंसा की जीत

इसका मतलब है कि उसने देवी माता का प्रसाद शुद्ध हृदय से नहीं खाया। खैर। ये दवा ले जाकर खिलाओं। तब तक मैं देवी माता से प्रार्थना करता हूं कि वह तुम्हारे पति को क्षमा कर दे। किसान की पत्नी दवा लेकर चली गयी। साधु के पास पिछले दिन का काफी मांस बचा था। उस दिन भी उसने डटकर मांस खाया। उधर किसान भी ठीक हो गया। साधु के चमत्कार की बात पूरे गांव में फैल गयी।

अब साधु को मांस खाने की इच्छा जल्दी-जल्दी होने लगी। वह किसी न किसी बहाने बलि चढ़वाने लगा और खुद तो भरपेट खाता ही था दूसरों को भी प्रसाद कहकर खिलाता था। इस प्रकार धीरे-धीरे पूरा गांव मांसाहारी हो गया। उसने तरह-तरह के झूठे डर दिखाकर लोगों को मांस खाने पर मजबूर कर दिया। अब उसकी जब इच्छा होती - अपने जाल में किसी को फंसाने और उसी से मांस पकवाता। फिर खूब खाकर डकार लेता।

गांव के भोले भाले लोगों को साधु ने खूब फंसा लिया था। वे उसकी हर बात मानते थे।

एक दिन शहर से जमीदार का बेटा आया। बाबा के चमत्कार और पूरे गांव के मांसाहारी होने की कहानी उसने भी सुनी। वह बहुत हैरान हुआ कि यह मामला क्या है। उसे शक हुआ कि कहीं कोई ठग इस गांव के भोले लोगों को बहका तो नहीं रहा। बस उसने गन्दे कपड़े पहने, बाल बिखराए और कुछ लड़कों के साथ साधु बाबा के दर्शन करने गया। वह पागल बन गया था। उसके साथ गए लड़कों ने साधु से कहा - ये पागल हो गया है। इसे दवा देकर ठीक कर दीजिए।

अहिंसा की जीत

साधु बाबा ने आंखें बंद करके सोचा। फिर बोले - इसे तो भैरवनाथ बाबा ने पकड़ रखा है। कहते हैं - जान छुड़ानी है तो बकरे की बलि दो वरना ये जिन्दगी भर पागल रहेगा और एक दिन इस नदी में डूबकर मर जाएगा।

ओह! धबराकर लड़कों ने कहा - ठीक है, हम बलि के लिए बकरा लेकर आएंगे।

जमीदार के लड़के ने साधु का ढोंग भांप लिया था। पर वह उसकी पोल सारे गांव वालों के सामने खोलना चाहता था। इसलिए उसने पूरी योजना बनाई ।

अगले दिन वह बकरा लेकर गांव के बहुत से लोगों के साथ साधु के यहां पहुंचा ।

ले आए बकरा। साधु ने पूछा।

हां दूर बकरे को लेकर खड़े लड़कों ने कहा।

बलि से पहले इसे नदी में स्नान करा लाओं। साधु ने कहा। लड़के बकरा लेकर नदी की ओर गए। फिर उसे पानी में

डुबाकर ले आए।

उन्होंने कहा - बाबा। ये बकरा तो विचित्र है। ये हंसता भी है और रोता भी है।

बाबा एक क्षण के लिए चक्कर में पड़ गए। फिर अपने मन का भय छिपाते हुए बोला - तब तो यह जरूर कोई देव पुरुष रहा होगा, पूर्वजन्म में। ये बकरा क्यों हंस रहा हैं और क्यों रो रहा हैं। ये तो आप ही इससे पूछिए। शायद आपसे बात करें। एक

लड़के ने कहा।

अहिंसा की जीत

बाबा के पास वह बकरा लाया गया, लेकिन उनसे थोड़ी दूर पर खड़ा किया गया।

बाबा ने पूछा - क्यों भाई बकरे, क्या तुम्हें नहीं मालूम है कि थोड़ी ही देर में तुम्हारी बलि दी जाएगी। फिर तुम्हारा मांस प्रसाद के रुप में सब खाएंगे।

बाबा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब वह बकरा मनुष्य की बोली में बोलने लगा। उसने कहा- जानता हूं, तभी तो हंस रहा हूं।

भला इसमें हंसने की क्या बात हैं। क्या तुम्हें मृत्यु से भय नहीं लगता। बाबा ने पूछा।

नहीं। कई जन्मों पहले मैं भी तुम्हारी तरह पुजारी था। लोगों से बलि चढ़वाया करता था। फिर उस बकरे का मांस खुद भी खाता था और दूसरों को खिलाता था। लेकिन उसका फल मुझे क्या मिला, जानते हो। बकरे ने पूछा

नहीं।

अगले जन्म में मुझे बकरा बनना पड़ा। मुझे जीव हत्या का दंड़ मिला। यह दंड़ मैं पिछले कई जन्मों से भोग रहा हूँ। हर जन्म में मैं बकरा बनता हूं, काटा जाता हूं, फिर बकरा बनता हूं। इसलिए रो रहा हूं। कि हाय। मुझे मुक्ति कब मिलेगी। जीव हत्या का दंड़ मुझे कब तक भोगना पडेगा।

पर तुम तो हंस भी रहें थे। बाबा ने पूछा।

हां हंस रहा हूं तुम्हारी मूर्खता पर। तुम न जाने कितने बकरों की हत्या का पाप अपने सिर पर ले चुके हो। हर बकरे के लिए तुम्हें बकरे की ही योनि में जन्म लेकर इसी तरह कटना पड़ेगा और फिर बकरा बनना पड़ेगा। तुम इतनी सी बात नहीं समझते और अहिंसा की जीत

फिर भी बलि पर बलि चढ़ाते जा रहें हो। बाबा धबरा गया। वह सोचने लगा क्या करूं। यह जरूर दैवी बकरा है। इसकी बात सत्य है। उसकी कुछ समझ में न आ रहा था।

तभी एक लड़के ने कहा - क्यों बाबा। क्या सोच रहें हो। इसकी बलि नहीं चढ़ाओगे।

उत्तर में वह बकरा बोल पड़ा - अरे ये क्या बोलेगा। ये तो ढ़ोगीं हैं इसने साधु का वेश बना रखा है और गांव के भोले भाले लोगों को फंसाकर उन्हें मांसाहारी बनने पर मजबूर किया हैं। इसको तो नरक में घोर कष्ट मिलेगा।

क्या कहा। ये साधु नहीं हैं। दोगीं है। एक ग्रामीण ने पूछा। हां। इसकी दाढ़ी-बाल सब नकली हैं ये लोगों को मामूली दवाइयां देकर बेवकूफ बनाता रहा बकरे ने कहा।

बाबा धबरा गया। अपनी पोल खुलते देखकर वह भागने लगा तो लोगो ने उसे पकड़ लिया और खूब पिटाई की। उसकी कुटिया की तलाशी ली गई तो कुछ अंग्रेजी दवाओं की मामूली दर्द निवारक और बुखार की गोलियां निकली। उसकी दाढ़ी व सिर के बाल नकली थें। गांव वालों ने उसे खूब पीटा और भगा दिया। अब जमीदार का बेटा भी लोगों के बीच आ गया था। वह बकरा वहीं खड़ा था। लोगों ने आकर उस चमत्कारी बकरे को ध्यान से देखा तो वह एक बकरे की खाल से बनाया बकरे का पुतला था जिसमें माइक से जमीदार का बेटा बोलता था। यह सारा नाटक देखकर लोग चकित रह गए। जमीदार के बेटे ने कहा - आप लोगों के सामने उस दोगी साधु की पोल खोलने के लिए मैने यह नाटक किया था।

अहिंसा की जीत

इसके बाद गांव वालों ने तय किया कि अब वे कभी न तो पशु बलि देंगें, न मांस खाएंगे और न ही कभी ऐसे दोगीयों की बात में आएंगे। हम शाकाहारी हैं, शाकाहारी ही रहेंगे। हमने यह भी महसूस किया कि मांस खाकर सभी लोग बीमार हुए हैं। पहले ऐसा न था। इसलिए शाकाहार ही शुद्ध आहार है और उससे ही हम अपने शरीर एवं मन को स्वस्थ व पवित्र बनाए रख सकते हैं। यदि हम अनादि कालीन तृष्णा की प्यास बुझाना चाहते हैं। तो ध्यान रूपी रस्सी में शुभोपयोग रूपी लोटे को बाँधकर आत्मारूपी कुए से स्वानुभव रूपी जल को निकालकर शुद्ध निश्चय नय के छन्ने से छानकर निर्मल शुद्धोपयोग रूपी कटोरी में भरकर पान करो। उसके सेवन से जो आनंद प्राप्त होगा वह आनंद किसी भी पौद्गलिक वस्तु में नहीं हैं। जिन्होनें इसका पान किया वही धन्य हैं। इसी के पान से विषम तृष्णा रूपी विष का नाश होता हैं।

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:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3030.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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