आगम के आलोक में... निदान का स्वरूप - जैन स्वाध्याय सामग्री | Aagam Ke Aalok Mein... Nidan Ka Swaroop

आगम के आलोक में… निदान का स्वरूप

  • यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है -

प्रस्तुत ‘निदान का स्वरूप’ कृति की विशेषताएँ

  1. निदान के संपूर्ण स्वरूप को बताने वाली यह प्रथम कृति है।
  2. प्रस्तुत कृति में निदान क्या है? ‘निदान’ शब्द का अर्थ, परिभाषा, भेद-प्रभेद, फल, पुराण-ग्रंथों के कथनक, इससे होने वाली हानियाँ व इसके स्वरूप को जानने से लाभ इत्यादि विषयों का विशद एवं विस्तृत वर्णन किया गया है।
  3. विषय को पढ़ने समय जो जिज्ञासामय मन में उत्पन्न होती हैं, लेखक द्वारा स्वयं ही प्रश्नोत्तरों के माध्यम से उनका तर्कपूर्ण एवं आगम सम्मत समाधान प्रस्तुत किया गया है।
  4. अनेक स्थानों पर एक ही विषय के संबंध में आचार्यों के विभिन्न कथन प्राप्त होते हैं, वहाँ उन सभी कथनों का तर्क-युक्ति सहित आगम सम्मत समन्वय स्थापित किया गया है।
  5. प्रत्येक प्रकरण के अंत में निष्कर्ष व तात्पर्य भी दिया गया है, जिससे संपूर्ण प्रकरण सरलता से समझ में आ जाता है।
  6. प्रत्येक विषय को अनेक आगम प्रमाणों के साथ स्पष्ट किया गया है, जिससे प्रामाणिकता संबंधी संदेह दूर हो जाता है; इसीलिए प्रस्तुत कृति का नाम भी ‘आगम के आलोक में… निदान का स्वरूप’ रखा गया है।
  7. विस्तार की अपेक्षा रखने वाले विषयगत विषय को परिशिष्ट में दिया गया है।
    इसप्रकार उक्त विशेषताओं सहित यह कृति है। निदान का सर्वांगीण स्वरूप जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।

आगम के आलोक में…
निदान का स्वरूप

लेखक :
पण्डित अमन जैन शास्त्री, लोनी
शास्त्री, शिक्षाशास्त्री

प्रकाशक :
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट
ए-4, बापू नगर, जयपुर-302 015
फ़ोन : 0141-2707458, 2705581
E-mail: [email protected]

1

निदान का स्वरूप
पण्डित अमन जैन शास्त्री

प्रथम संस्करण : 1000
(दिनांक 22 दिसम्बर 2022)
श्री शीतलनाथ भगवान को ज्ञान कल्याणक

मूल्य : 25 रुपये

ISBN 978-93-91136-30-7

प्राप्ति स्थल : पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर
ए-4, बापू नगर, जयपुर-302015
फ़ोन : 0141-2707458, 2705581

प्रस्तुत संस्करण की कीमत कम करने वाले दानों की सूची

  1. पण्डित जिनकुमारजी शास्त्री, जयपुर (उपाचार्य) 1111/-
  2. श्रीमती अनुभूति-अनुभव जैन शास्त्री, झालावाड़ 1111/-
  3. श्रीमती प्रतीक्षा-अकलंक जैन, लोनी 1111/-
  4. श्री देवेश शास्त्री पृथ्वी देवपाल सेठ, अम्बाक 1111/-
  5. पण्डित हर्ष, अभिषेक शास्त्री, फुटेरा 1100/-
  6. श्रीमती तरुणा-सचिन जैन, दिल्ली 1000/-
  7. पण्डित अखिल शास्त्री, खंदियाना 500/-
  8. पण्डित तरुण शास्त्री, दिल्ली 500/-
    कुल योग : 7,544/-

लेखक की अन्य महत्वपूर्ण कृति
‘समवशरण रचना वर्णन’
एक बार अवश्य पढ़ें।

मुद्रक : देशाना कम्प्यूटर्स
आगरा रोड, जयपुर

2

विषयानुक्रमणिका

क्र. विषय
पृष्ठ

  • प्रास्ताविक
    4
  • शुभाशीष - डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल
    5
  • अपनी बात
    7
  • मंगलाचरण - सरोजिन जैन शास्त्री, ईसगढ़
    9
  1. निदान का सामान्य स्वरूप
    11
  2. विभिन्न दृष्टियों से ‘निदान’ शब्द का अर्थ
    12
  • शब्दकोशों के अनुसार…
    13
  • शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार…
    14
  • दार्शनिक दृष्टिकोण के अनुसार…
    15
  1. जिनागम में प्राप्त - ‘निदान’ शब्द
    16
  • शास्त्र के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग
    16
  • ध्यान के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग
    22
  1. निदान शब्द और निदान आयतन में अंतर
    23
  2. निदान बंध
    25
  3. निदान की परिभाषाएँ
    28
  • इच्छा
    33
  • अति-आसक्ति पूर्वक निरंतरता
    36
  • भौतिक सुख
    40
  • आगामी काल
    44
  1. निदान के भेद-प्रभेद
    49
  • मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त निदान
    50
  • संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान
    58
  • कषाय का कारणभूत अप्रशस्त निदान
    69
  • भोग का कारणभूत अप्रशस्त निदान
    94
  1. निदान बंध का फल
    103
  2. निदान से होने वाली हानियाँ
    108
  3. निदान के स्वरूप को जानने से लाभ
    118
  4. परिशिष्ट-1 (कुछ बंधी प्रकृतियाँ)
    120
  5. संदर्भित ग्रन्थ
    122
  6. विद्वानों के अभिमत
    125

प्रकाशकीय

सत्‌साहित्य का प्रकाशन पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट की एक प्रमुख गतिविधि है और सरल वर्तमान भाषा में लिखित ज्ञानोपयोगी, रुचिकर और आत्मकल्याण में सहायक, प्रामाणिक साहित्य का प्रकाशन हमारा लक्ष्य है।

युवा विद्वान अमन शास्त्री की कृति ‘निदान का स्वरूप’ का प्रकाशन इसी श्रृंखला की एक कड़ी है।

समाज में ऐसे लोग कम ही हैं, जिन्होंने निदान बंध का नाम भी सुना है, जो इसका मतलब समझते हैं और यह जानते हैं कि निदान एक आत्मघात का भेद है, बंध का कारण है, हमारी हित के विरुद्ध है और मुनिमार्ग में बाधक है।

अन्य दर्शनों में तो इसप्रकार के परिणामों (निदान संबधी) को अच्छा और उपादेय माना जाता है, सभी लोग अपने इष्टदेव के सामने अपनी इच्छाएँ प्रकट कर उन्हें पूरी करने की प्रार्थना करते हैं, मन्नत मांगते हैं। इसी को उनकी आक्रांतता (धार्मिक होना) माना जाता है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि आकांक्षाएँ मात्र बंध का कारण है, हेय है। यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।

विद्वान लेखक ने समाज के साथ निदान के शाब्दिक, उसकी व्युत्पत्ति, निदान शब्द का लोक में प्रचलित अर्थ और जिनागम के परिप्रेक्ष्य में उसके विशिष्ट अर्थ का स्पष्टीकरण करते हुए यथासंभव आगम में उपलब्ध सभी कथनों को उद्धृत किया है।

पूज्य दादा डॉ. हुकमचंदजी भारिल्ल द्वारा इस कृति का श्रवण और इसके प्रकाशन की स्वीकृति प्रदान करना इस कृति की उपयोगिता का सूचक है।

डॉ. शान्तिकुमारजी पाटील द्वारा इसका अवलोकन, मुद्रण और प्रकाशन में डॉ. अखिल बंसल के और टंकण में अखिल जैन शास्त्री के योगदान के लिए हम उनको धन्यवाद ज्ञापित करते हैं।

शोधपरक शैली में रचित यह रचना निश्चित ही हम सभी को निदान का स्वरूप समझने में सहायक होगी और हम सभी आत्मार्थियों का मार्गदर्शन करेगी।

22 नवम्बर 2022
पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर
कार्यकारी महामंत्री

शुभकामनाएँ

‘निदान’ यह एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनते ही अनेक प्रकार की जिज्ञासाएँ होती हैं कि निदान क्या है? निदान बंध कैसे होता है? हमें भी होता है अथवा? अथवा निदान बंध करने से नुकसान है या फायदा? न जाने निदान के संबंध में ऐसे कितने प्रश्न उत्पन्न होते हैं। कई बार तो निदान का वास्तविक स्वरूप नहीं समझपाने के कारण अनेक प्रकार की भ्रांतियाँ भी उत्पन्न होती रहती हैं।

‘निदान’ वास्तव में तो ‘आगामी काल में भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए अति आसक्त होना है।’ इसप्रकार की अनेक चर्चायें तर्क-युक्तियों व आगमाधार से लिखी गई इस कृति में पढ़ने को मिलेंगी।

यद्यपि जिनागम में प्रसंगानुसार यथास्थान निदान का स्वरूप प्राप्त होता है; परन्तु अभी तक ऐसी पुस्तक देखने में नहीं आई, जिसे पढ़कर पाठकों को निदान का स्वरूप पूरी तरह से स्पष्ट हो जाए।

चि. अमन जैन शास्त्री, लोनी ने ‘निदान का स्वरूप’ नामक कृति प्रस्तुत कर उस कमी की पूर्ति की है।

यह एक प्रामाणिक रचना है। इसे हमारे महाविद्यालय के अभीक्षक अमन जैन ने बहुत ही श्रम से तैयार किया है। मैंने इस कृति की विषय-वस्तु को इस कृति के लेखक अमन जैन के मुख से ही शब्दशः सुना है तथा यथास्थान अपेक्षित सुधार भी कराए हैं। वे करुणायोग के रुचिवंत विद्वान हैं, इनके द्वारा पूर्व में लिखी गई ‘समशरण रचना वर्णन’ नामक पुस्तक भी मैंने पढ़ी है।

निदान का स्वरूप जानने की जिज्ञासा रखने वाले धर्मप्रेमी भाई-बहनों को इसका स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए।

20 सितम्बर 2022
डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल
महामंत्री

पुरोवाक्

सामान्य तौर पर निदान शब्द का प्रयोग रोग के निदान (उपाय) के अर्थ में किया जाता है; लेकिन जिनागम में इस शब्द का प्रयोग मुख्यरूप से निदान शल्य, निदान आर्त्तध्यान व निदान बंध के रूप में अनेक स्थानों पर किया गया है। अनेक स्थानों पर विषयांतर के रूप में निदान का विषय पढ़ने को मिलता है, जिसे पढ़ते समय सहज ही अनेक जिज्ञासाएँ चित्त में बनी रहती है, साथ ही उस विषय संबंधी भी विस्तृत विवेचना वहाँ प्राप्त नहीं होती है। ऐसी स्थिति में आगम का आलोड़न कर इन सभी का सांगोपांग, आगम-प्रमाण, तर्क-युक्ति व दृष्टांत सहित विस्तृत विवेचन करने का प्रशंसनीय कार्य प्रिय अमन शास्त्री ने किया है - इसका मुझे बहुत ही हर्ष है।

निदान से संबंधित सम्पूर्ण विषयों को इस पुस्तक में इसप्रकार से प्रस्तुत किया गया है, जिससे स्वाध्यायियों की तत्संबंधी समस्त जिज्ञासाओं का सहज ही समाधान हो जाता है। इस विषय संबंधी जिज्ञासा के समाधान हेतु एकैषय यह कृति ही पर्याप्त है।

अल्पवय में गहन अध्ययन कर विशिष्ट विषय को व्यवस्थित पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करना, विशिष्ठ प्रतिभा के बिना संभव नहीं है। इससे पूर्व भी समवशरण संबंधी ऐसा ही सफल प्रयास आपने किया है। इसीप्रकार जिनावाणी के अध्ययन-मनन-चिंतन में संलग्न रहकर ऐसे ही अप्रचलित विषयों को साधर्मियों से परिचित कराते रहें - यही मेरी हार्दिक शुभकामना है।

25 सितम्बर 2022
डॉ. शान्तिकुमार पाटील
प्राचार्य
श्री टोडरमल दि. जैन सि. महाविद्यालय, जयपुर

अपनी बात

दशलक्षण पर्व के समय 2018 में सिरोंज जाना हुआ था। वहाँ समाज में प्रवचन करने के उपरांत एक दादाजी ने अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा “काश! हम भी पुरुष होते… तो भगवान के प्रशाल करने का महा-सौभाग्य प्राप्त हो जाता।” तब सहसा ही मैंने कहा - “ऐसी भावना नहीं भाही चाहिए; क्योंकि वर्तमान में ऐसे अनेक पुरुष हैं, जो किसी कारणवश बिना मन के जबरदस्ती भगवान का प्रशाल करते हैं। कदाचित् उन्होंने भी पूर्व में ऐसी ही भावना भाई होगी, जिसके फल स्वरूप उन्हें आज ऐसे संयोग तो मिले हैं; परंतु वर्तमान परिणामों के अभाव में जबरन् काम करके दुःखी ही होना पड़ रहा है।”

मैंने इस प्रसंग के पूर्व कभी निदान का वर्णन नहीं पढ़ा था, मात्र निदान शब्द सुना था; तथापि पूर्वाभ्यास के बल से ऐसे विचार व्यक्त हो गए।

जब शास्त्री का अध्ययन पूर्ण हुआ। तब भगवती आराधना का स्वाध्याय करना प्रारंभ किया। जिसमें अनेक स्थानों पर निदान के संबंध में विषय-वस्तु प्राप्त हुई। साथ ही निदान का स्वरूप भी थोड़ा-सा स्पष्ट होने लगा था। इसी के आधार से मैंने दीपावली के अवकाश के समय पंडित टोडरमल स्मारक भवन में इसी विषय के ऊपर प्रवचन किए। तब वहाँ आ. बा. ब्र. कल्पना दीदी भी उपस्थित थीं। प्रवचन के उपरांत उनसे चर्चा होती थी, जिसमें वे कुछ गलतियाँ व कुछ नवीन प्रयोगों की ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया करती थीं।

कालांतर में कोविड-19 के चलते लॉकडाउन लग गया। जिसमें मूलाचार ग्रंथ का विशेष अध्ययन हुआ। इसमें भी कुछ स्थानों पर निदान का वर्णन पढ़ने को मिला। इसप्रकार अनेक ग्रंथों के माध्यम से निदान का लगभग सम्पूर्ण स्वरूप मेरे चित्त में स्पष्ट हो चुका था। जिसे मैंने और भी अधिक व्यवस्थित करने के लिए लिखने का विचार बनाया। लिखने समय मात्र स्वानुभव जैन, खानियाँधाना और विचारित भैया, खानियाँधाना से भी चर्चा-वार्ता होती रहती थी। जिससे यह विषय और भी अधिक खुलकर सामने आया है।

निदान का सम्पूर्ण वर्णन लिखने के पश्चात आ. छोटे दादाजी (डॉ. हुकमचन्दजी भारिल्ल) को सम्पूर्ण लेखन शब्दशः सुनाया। तब आ. छोटे दादाजी ने मेरा कुछ विशेष बिंदुओं की ओर भी आकर्षित करवाया। साथ ही उन्होंने मेरा उत्साहवर्धन करते हुए कहा- “सम्पूर्ण वर्णन को एक ही स्थान पर व्यवस्थित करके बहुत अच्छा कार्य किया।”

विषय में किसी भी प्रकार की भूल का कभी न रह जाए। इसके लिए इस सम्पूर्ण वर्णन को आ. बा. ब्र. सुमात्रप्रकाशजी (खानियाँधाना), आ. बा. ब्र. कल्पना दीदी, डॉ. संजीवकुमारजी गोधा, डॉ. शान्तिकुमारजी पाटील, डॉ. अरुणजी बड़, डॉ. ज्योतिजी सेठी आदि विद्वानों ने पढ़कर शुद्ध किया है। आप सभी के सहयोग व निर्देशन में ही यह कार्य पूर्ण हो सका; अतः आप सभी को हृदयतल से कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। आ. परमात्मप्रकाशजी भारिल्ल का भी बहुत-बहुत आभार, जिन्होंने इस कृति को टोडरमल स्मारक ट्रस्ट से प्रकाशित करने की अनुमति प्रदान की।

अंत में ‘कौन न विमुह्यति शास्त्रदृष्टे’ के अनुसार श्रुत-सेवा के इस स्वतः सुकार्य में कोई अज्ञात-प्रमाद वश भूल रह गई हो तो सभी सुधी जनों से अनुरोध है कि इस ओर ध्यान आकर्षित कराएँ।

इस ‘निदान का स्वरूप’ कृति का सभी जन अध्ययन कर विकल्प-जाल से छूटकर आत्मस्थ हों। आत्मन्! आत्मनि तिष्ठ।।

25 सितम्बर 2022
पं. अमन जैन शास्त्री, लोनी

मंगलाचरण

(दोहा)
इच्छा वांछा सों रहित, है निरभय जिनराज।
जन स्वरूप निदान का, हो निरमोह’ हम आज।।1।।

(कवित्त मनहर)
आगरा तो है दुःख दानी, इच्छा करे बहु हानी,
मोह में लिपट-कर जीव क्लेश पाय है।
सन्त नहीं चित्त होवे, चिंता के भरम रोवे,
देन को पुण्य खोवे, माया चकराय है।
भोग रोग के समान कोहे न ये बात जाना।
जे निदान भलो ज्ञान, हान ही कराय है।
ये भी चाहा, वो भी चाहा-कछु मिलो पुण्य नाह,
स्व-पर सतायै नर जीवन गवाय है।।2।।
कोई जन चाहे, कोई जन धन चाहे,
सरहदि के जीवन में मदी हाय-हाय है।
पुण्य योग इष्ट भयो, पाप में अनिष्ट भयो,
कल-कल चाहत में आज को गवाय है।
प्रतिपल मारै काँटा, जैसे - पीर देन काँटा,
फिर भी उलझ ताँटा काहे घबराय है।
हल कछु होत नहींह, सोच! जब अंत आहि,
निदान करत नर जीवन दहाये है।।3।।

  1. इच्छा से रहित
  2. पीड़ा

भोग रोग सम जान, कष्ट पीर की खदान।
फिर सुख हेतु कहे तिनको सम्भार?
माँगने से नाहिं मिले, मन मरजी न चले,
मन को बने यदि, सो नैक-सी फुहार है।
अब नहीं सही जात, भव दुःख अंडज्ञात,
बस एक चाह साँचि सुख की पुकार है।
साँचो सुख पायो जिन, मम कर-दोउ तिन,
भये जो निरति ‘समकित’ की जुहार है।।4।।
(दोहा)
आत्मास्वभाव महान हो, नहीं निदान का काज।
भव्य जीव यह समझकर, पायें सिद्ध स्वराज।।5।।

भव्य बिना कछु हाथ न आवै।

इन्द्र नरेन्द्र फणीन्द्रन के सुख, भोगन को नित जी ललचावै,
केवल ज्ञान कछु करूँ बिराम, सदा मम नाम सिहूँ जग छावै।
नूतन भोग शरीर निरोग, न इष्ट वियोग न रोग सतावै,
यों दिन रात विचार करे पर, भव्य बिना कछु हाथ न आवै।।
मात पिता सुत नारि सहोदर, छोड़ि विदेश कमावन जावै,
काटत काष्ठ पाठ लगावत, लगावत हाट कमावै बनावै।
कृत्य कुकृत्य करे बनि भृत्य, दिखावत नृत्य बजाय रिझावै,
यों तृष्णावश मूढ़ फिरै पर, भव्य बिना कछु हाथ न आवै।।

  • भव्य प्रमोद, पृ.30, माखनलालजी

निदान का स्वरूप

जिनधर्म का आधार वस्तु-स्वभाव, वीतरागता और सर्वज्ञता है।
देव को आदर्श बनाकर शास्त्र की स्यात् पद मुद्रा के माध्यम से निर्ग्रन्थ
गुरु सदैव ही वस्तु स्वरूप का आश्रय लेकर वीतरागता की वृद्धि करते
हैं। मुनिराजों की यह सिद्धी सम अवस्था स्वाधीन, स्वतंत्र व सहज
होती है। अभ्यंतर-बहिरंग से निरंतर समता रस झरता रहता है।

पूज्य मुनिराज निदान भावों का अभाव करके ही इस दशा को
प्राप्त करते हैं। निदान का नाश किए बिना इस सहज दशा की प्राप्ति
अशक्य है; क्योंकि जब तक चित्त में निदान भाव उत्पन्न होते रहेंगे,
तब तक मुनिराज अपना उपयोग अपने में एकाग्र नहीं कर सकते हैं।
तत्त्वतः, एकाग्रता तो निदान में भी होती है; परंतु वह
एकाग्रता पर पदार्थों में अति तीव्र आसक्ति पूर्वक होती है; अतः यह
निदान अनंत संसार का कारण है।

जैसे किसी ग्राहक को कोई वस्तु अतिप्रिय है और वह उस वस्तु
की प्राप्ति किसी भी कीमत पर करना चाहता है। ग्राहक की इस अतिप्रिय
अभिलाषा को देखकर दुकानदार उस वस्तु को लागत मूल्य से कई गुने
अधिक मूल्य में देता है और आश्चर्य तो तब होता है, जब ग्राहक उस
अल्प मूल्य वाली वस्तु को अधिक मूल्य देकर भी खरीदता है।

वैसे ही यह किसी वस्तु की अति आसक्ति पूर्वक चाहता है।
हमारी इस अति आसक्ति को देखकर कर्मरूपी दुकानदार उस वस्तु
(विषय-कषाय, भोग-संयोग) को लागत मूल्य से करोड़ों गुने अधिक

विभिन्न दृष्टिकोणों से ‘निदान’ शब्द का अर्थ

निवृत्ति और निकार्य रूप कर्मव्यवस्था

  1. दार्शनिक दृष्टिकोण से ‘निदान’ शब्द का अर्थ - इच्छा।
  1. शब्दकोश के अनुसार - निदान अर्थात् कारण, परिणाम,
    हेतु। जैसे लोक में कहा जाता है कि रोग का निदान बताओ, अर्थात् रोग
    का कारण बताओ। वैसे ही यहाँ कर्म बंधन के कारणों को निदान शब्द
    से कहा गया है।

इसी ‘कारण’ अर्थ को बताने के लिए पंडित टोडरमलजी ने
मोक्षमार्ग प्रकाशक ग्रन्थ में निदान शब्द का प्रयोग किया है। ‘कर्म
बंधन का निदान’ नामक शीर्षक के अंतर्गत कर्म बंधन में क्या कारण
हैं और क्या नहीं हैं? इत्यादि विषय का वर्णन किया है।

इस ‘कारण’ अर्थ को ही माधवकर कुछ अन्य शब्दों में
इसप्रकार कहते हैं-
‘निदानमाहुः पर्यायैः प्राच्यं येन लभ्यते।’ अर्थात् जिससे पर्यायों
के माध्यम से पूर्व रूप का लक्ष्य लिया जाता है, उसे निदान कहते हैं। (जो
पर्यायों के माध्यम से पूर्व रूप का लक्ष्य होता है, उसे निदान कहते हैं)

वर्तमान में पर्यायस्वरूप कार्य को देखकर पूर्व में किए गए कारणों
का लक्ष्य करना निदान है। जैसे - जगत जन कहते हैं कि पूर्व में ही ऐसे
कुछ काम किए होंगे, जिनके फल में आज ऐसे संयोग मिले हैं। यहाँ
हम वर्तमान पर्याय को देखकर पूर्व में किए हुए अच्छे-बुरे कार्यों का
अनुमान लगाते हैं, जो वर्तमान पर्याय के होने में कारण हैं। इस अर्थ के
अनुसार कर्म बंधन में जो भी कारण बनते हैं, वे सभी कारण निदान हैं।

आचार्य उमास्वामी देव तत्त्वार्थसूत्र के आठवें अध्याय के
प्रथम सूत्र में बंध के हेतुओं को बताते हुए लिखते हैं कि-

मिथ्यादर्शनाविरति-प्रमाद-कषाय-योग बंधहेतवः।।1।।
मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय, योग - ये बंध के 5 हेतु
हैं। उपर्युक्त अर्थ के अनुसार ये सभी बंध के निदान (हेतु) हैं।

सारांश यह है कि बंध के अनेक कारणों को निदान शब्द से
कहा जा सकता है। मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग
से बंध होता है अर्थात् मिथ्यात्वादि बंध के कारण हैं; इसलिए इसे ऐसा
भी कह सकते हैं कि ये बंध के निदान (कारण) हैं। इसे ही संक्षेप में
निदान बंध कह दिया जाता है।

  1. शब्दव्युत्पत्ति के अनुसार - (नि + दा + ल्युट् = निदान)
    निदान शब्द ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक ‘दा’ धातु से ल्युट् प्रत्यय करके बना
    है। जिसका अर्थ होता है ‘निश्चयेन दीयते अनेन इति निदानम्’ अर्थात्
    जिसके द्वारा निश्चितरूप से दिया जाता है, उसे निदान कहते हैं।

यद्यपि इस व्युत्पत्ति के अनुसार जगत में निदान का अर्थ
‘कारण’ ही किया जाता है; क्योंकि कारण के मिलने पर कार्य निश्चित
रूप से होता ही है; तथापि जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में निदान का अर्थ
‘निवृत्ति और निकार्य रूप कर्म अवस्था’ भी किया जा सकता है;
क्योंकि निवृत्ति और निकार्य रूप कर्मव्यवस्था में संक्रमण, अपकर्षण,
उत्कर्षण आदि की व्यवस्था नहीं होती है। ये अपना फल निश्चितरूप
से देते ही देते हैं और जो निश्चितरूप से (फल) देता है, उसे ही निदान
कहते हैं; इसलिए यहाँ निदान शब्द का दूसरा अर्थ निवृत्ति और
निकार्य रूप कर्म अवस्था किया है।

शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार अर्थ

निवृत्ति-निकार्य कोई कर्म प्रकृति नहीं है; अपितु ये तो
कर्मों की अवस्थाएँ हैं, जो ज्ञानावरणादि आठों ही कर्मों में होती हैं।
इन कर्मों के अंतर्गत अघाति कर्म में पुण्य (प्रशस्त) और पाप
(अप्रशस्त) का भेद देखा जाता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि निवृत्ति-निकार्य अवस्था वाले
कर्म भी पुण्य-पाप - दोनों रूपों में हो सकते हैं; जैसे - उपचार से
तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण, बलभद्र, देवादि गतियाँ
इत्यादि पुण्य प्रकृतियाँ निवृत्ति-निकार्य अवस्थारूप होती हैं और
नरकादि गति इत्यादि पाप प्रकृतियाँ निवृत्ति-निकार्य अवस्थारूप
होती हैं।

जिसप्रकार निदान में निश्चितरूप से फल दिया जाता है, उसीप्रकार
यहाँ उपचार से निवृत्ति-निकार्य अवस्था वाली तीर्थंकरोदि पुण्य
प्रकृतियाँ और नरकादि पाप प्रकृतियाँ निश्चितरूप से फल देती हैं;
इसलिए यहाँ ‘जो निश्चितरूप से फल देता है’ - इस शब्द व्युत्पत्ति के
अनुसार निदान का अर्थ निवृत्ति-निकार्य रूप कर्मव्यवस्था किया है।

ध्यान रखने योग्य बात यह है कि यहाँ मात्र ‘निदान’ इस शब्द
का विभिन्न दृष्टिकोणों से अर्थ बताया जा रहा है। आगे जब आगम में
प्राप्त निदान का अर्थ, स्वरूप बताया जाएगा; वहाँ निदान के फल में
तीर्थंकर पद की प्राप्ति नहीं हो सकती है; परंतु नरकादि आदि पदों की
प्राप्ति हो सकती है इत्यादि विशेष वर्णन किया जाएगा।

  1. गुणर्थिक - आचार्य अमृतचन्द स्वामी ने मूलाचार की
    टीका में निदान शब्द का अर्थ ‘आकांक्षा’ किया है। आकांक्षा अर्थात्
    इच्छा, चाह, आशा, अभिलाषा, तमन्ना इत्यादि।

निदान का स्वरूप

यद्यपि व्याकरण शास्त्र के अनुसार निदान शब्द का अर्थ आकांक्षा, इच्छा नहीं होता है; तथापि प्रत्येक दर्शन (मत) का पृथक् शब्दकोश होता है। जिसमें प्रचलित अर्थ के अतिरिक्त एक पृथक् अर्थ का प्रतिपादन भी किया जाता है। जैसे - लौकिक में 420 यह संख्या भी अन्य संख्याओं के समान ही है; परंतु संविधान की इक संहिता में 420 का प्रयोग धोखा-धड़ी के अर्थ में किया जाता है; वैसे ही जैनदर्शन में निदान शब्द का प्रयोग कारण के अतिरिक्त आकांक्षा, इच्छा के अर्थ में भी किया जाता है।

इसप्रकार निदान शब्द के तीन अर्थ हुए-

  1. कारण
  2. निधति और निफावितरूप कर्म अवस्था
  3. इच्छा (आकांक्षा)

'निदान का स्वरूप इस प्रकरण में निदान शब्द का मुख्य अर्थ इच्छा है। शेष दोनों अर्थ (कारण एवं निधति-निफावितरूप कर्म अवस्था) गौण हैं।

निदान शब्द का प्रयोग जिनागम में दो रूपों में मिलता है। पहला शल्य के रूप में और दूसरा ध्याम के रूप में।

  1. शल्य के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग :-

शल्य - “शोणति दिनस्तीति शल्यम्।” अर्थात् जो कष्ट दे, वह शल्य है। पीड़ा देनेवाली वस्तु शल्य है। शरीर में काँटादि का चुभ जाना शल्य है; क्योंकि जैसे किसी व्यक्ति के पैर में काँटा चुभ जाए, तो उसका पूरा उपयोग काँटे की ओर चला जाता है और जब तक वह काँटा निकलता नहीं है, तब तक उसका उपयोग अन्यत्र लगता भी नहीं है।

  1. मूलाचार टीका (आचारवृत्ति), गाथा-69

शल्य के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग

है; अपितु निरंतर आकुल-व्याकुल होता हुआ महाकष्ट को सहता है।

यही उस काँटे के समान जो पीड़ाकर भाव है, उसे भाव शल्य कहा गया है। किसी के मन में शल्य उत्पन्न हो जाए, तो उसका पूरा उपयोग उस शल्य की ओर चला जाता है और जब तक वह शल्य निकलती नहीं है, तब तक उसका उपयोग अन्यत्र लगता भी नहीं है; अपितु निरंतर ही आकुल-व्याकुल होता हुआ महाकष्ट को सहता है।

जिसप्रकार काँटादि शल्य प्राणियों को कष्ट देने वाली होती है, उसीप्रकार शरीर और मन संबंधी बाधा का कारण होने से कर्मोदय जनित विकार में भी शल्य का उपचार कर उसे (कर्म को) भी (द्रव्य) शल्य कहते हैं।

तात्पर्य यह है कि जो मन में काँटे के समान चुभे, निरंतर सतावे, तीर के समान घाव पैदा करे, दुस्सह हो, भदनवृक्ष की छाया में पलते हुए जहर के समान कार्य करे व स्वयं पापरूप हो, उसे शल्य कहते हैं।

जिसप्रकार किसी व्यक्ति के दाँतों में भोजन का कण अटक जाए और जब तक वह कण नहीं निकले, तब तक उसकी जिह्वा निरंतर उसको निकालने का प्रयत्न करती रहती है और अंत में स्वयं ही छिन्न-भिन्न होकर महा-व्याकुल होती है।

इसीप्रकार किसी व्यक्ति के मन में मिथ्या, माया, निदानरूप शल्य अटक जाए या उत्पन्न हो जाए और जब तक वह शल्य नहीं निकले, तब तक उसका उपयोग शांति से नहीं बैठना; अपितु निरंतर ही उस शल्य को पूर्ण करने का अथवा निकालने का प्रयत्न करता रहता है और अंत में स्वयं ही अनेक कष्टों को सहता हुआ मूढ़ होता है।

ऐसी महा कष्टदायक शल्य - भाव और द्रव्य के भेद से 2

  1. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-26

प्रकार की है’-

  1. भाव शल्य
  2. द्रव्य शल्य
    भाव शल्य तीन प्रकार की है-
  3. मिथ्या शल्य
  4. माया शल्य
  5. निदान शल्य
    मिथ्या शल्य भी 3 प्रकार की है-
  6. दर्शन शल्य
  7. ज्ञान शल्य
  8. चारित्र शल्य
    आचार्य अपराजित सूरि ने शल्य के इन 3 भेदों को दो रूपों में बताया है।
  1. मिथ्या, माया और निदान के रूप में,
  2. दर्शन, ज्ञान और चारित्र के रूप में;

चित्र: भाव, द्रव्य, मिथ्या, माया, निदान, द्रव्य कर्म, नो कर्म, दर्शन, ज्ञान, चारित्र, संचित, अचित, अभिन्न, भिन्न

यह थोड़ा गहराई से विचार करें तो शल्य के दर्शन-ज्ञान-चारित्र ये तीनों प्रकार मिथ्या शल्य को ही बतलाते हैं; अतः यहाँ दर्शन-ज्ञान-चारित्र को मिथ्या शल्य के प्रभेद के रूप में ही कहा है।

मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र शल्य को बताते हुए आचार्य अपराजित सूरि कहते हैं-

  1. यथा सत्य प्रतिज्ञो आचार्यस्तथा तव शास्यसम्यक्त्वाद्या-हेतुत्वात्कदाचित्कः शल्यमित्युच्यते। - सर्वार्थसिद्धि/राजवार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-18
  2. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-540

शल्य के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग

‘सम्यग्दर्शन के निःशंकित आदि 8 गुणों में दोष उत्पन्न करने वाली मिथ्या-दर्शन शल्य है। सम्यग्ज्ञान के अचारिण आदि 8 गुणों में दोष उत्पन्न करने वाली मिथ्या-ज्ञान शल्य है और सम्यक्चारित्र के 8 गुणों में अर्थात् समिति-गुप्ति में अनादर रहित मिथ्या-चारित्र शल्य है।’

भाषा में बगुले जैसा वेश धारण कर लोक को प्रसन्न करना ही माया शल्य है। ‘सम्यग्दर्शन के 8 गुणों में से निःशंकित गुण का घात करने वाली निदान शल्य है।’

प्रश्न :- मिथ्यात्व और मिथ्या शल्य - दोनों एक हैं या इनमें कुछ अंतर है?

उत्तर :- मिथ्यात्व और मिथ्या शल्य दोनों अलग-अलग है। सम्यक्त्व के साथ मिथ्यात्व नहीं हो सकता है (यहाँ मित्र गुणस्थान की विवक्षा नहीं है); परंतु सम्यक्त्व के साथ मिथ्या हो सकती है।

सम्यक्त्व में मिथ्यात्व अनाचार स्वरूप है; परंतु मिथ्या शल्य अनाचार स्वरूप है। मिथ्यात्व तीसरे गुणस्थान पर्यंत होता है; परंतु मिथ्या शल्य चौथे गुणस्थान पर्यंत होती है।

शंका :- क्षायोपशमिक सम्यक्त्व में लगने वाले चल-मल-अगाढ़ दोषों को मिथ्या-शल्य कह सकते हैं क्या?

समाधान :- नहीं! क्षायोपशमिक सम्यक्त्व में लगने वाले चल-मल-अगाढ़ दोषों को मिथ्या-शल्य नहीं कह सकते हैं; क्योंकि क्षायोपशमिक सम्यक्त्व 7वें गुणस्थान तक होता है और उसमें लगने वाले दोष भी 7वें गुणस्थान तक ही होते हैं; परंतु ‘निःशल्यो व्रती’

  1. दमनस्य शल्यं शंकादि। ज्ञानस्य शल्यं अक्रमे पठर्न अविनादिभि च। चारित्रस्य शल्यं समिति-गुप्तीनादरः। योगमया… असंप्रयोगमया। सम्यग्ज्ञानि अंतरात्मविशेषा। निर्विचित्सिमुम्। - भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-540
  2. मूलाचार टीका, गाथा-250
  3. तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय-7, सूत्र-18

व्रती के शल्य नहीं होती है अर्थात् 5-6-7वें गुणस्थान में किसी भी प्रकार की शल्य नहीं होती है, इसलिए क्षायोपशमिक सम्यक्त्व में लगने वाले चल-मल-अगाढ़ दोषों को मिथ्या-शल्य नहीं कहा जा सकता है।

इसप्रकार माया कषाय और माया शल्य में भी किंचित अंतर का भाव है। यद्यपि आगम में इन दोनों के अंतर के संबंध में विशेष चर्चा नहीं मिलती है; इसलिए यह कहना थोड़ा कठिन है कि कौन-से भाव माया कषायरूप है और कौन-से भाव माया शल्यरूप है; तथापि इतना तो अवश्य है कि दोनों में अंतर तो है। माया कषाय 9वें गुणस्थान तक होती है; परंतु माया शल्य 4थे गुणस्थान तक होती है।

द्रव्य शल्य :- मिथ्यात्व, माया और निदान - इन तीन भाव शल्यों में जो कारण है - ऐसे कर्म द्रव्य-शल्य कहलाते हैं।

यह द्रव्य शल्य भी 3 प्रकार की है-

  1. संचित द्रव्य-शल्य
  2. अचित्त द्रव्य-शल्य
  3. मिश्र द्रव्य-शल्य

‘दासादिक संचित द्रव्य-शल्य है, सुवर्ण आदि पदार्थ अचित्त द्रव्य शल्य है और ग्रामिष्टि मिश्र द्रव्य-शल्य है। ये सभी पदार्थ भाव शल्य में निमित्त होते हैं; अतः इनको द्रव्य-शल्य कहते हैं।’

मूल में कर्म ही द्रव्य-शल्य है। ये भी 2 प्रकार के हैं - द्रव्य कर्म और नोकर्म। द्रव्य कर्म और नोकर्म को द्रव्य-शल्य कहा गया है। ऊपर जिस कर्म को द्रव्य-शल्य कहा था, वह द्रव्य-कर्मरूप है और यहाँ संचित-अचित्त एवं मिश्र - ये 3 द्रव्य-शल्य नोकर्मरूप हैं।

  1. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-541

शल्य के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग

प्रश्न :- ये शल्य किस गुणस्थान तक होती है?

उत्तर :- ‘निःशल्यो व्रती’ सूत्र के अनुसार ये सभी शल्य चौथे गुणस्थान तक होती है; परंतु आचार्य अपराजित सूरि ने भगवती आराधना की विजयोदया टीका में ‘निदान शल्य को सम्यग्ज्ञान नामक पाँचवें गुणस्थान तक और माया शल्य को 7वें गुणस्थान तक ही कहा है।’ परंतु आचार्य विद्यानंद स्वामी ने ‘निदान शल्य को चौथे गुणस्थान तक ही कहा है।’ पाँचवें गुणस्थान में अप्रत्यक्ष निदान कहा है।’ यह अप्रत्यक्ष निदान, शल्यरूप न होकर अंतर्ध्यानरूप है।

इसी के संबंध में सर्वार्थसिद्धिहार आचार्य पूज्यपाद स्वामी शंका को उत्कर समाधान में लिखते हैं-

व्रती होने के लिए दोनों (शल्य रहित व हिंसादि का त्याग) विशेषताओं से युक्त होना आवश्यक है। यदि किसी ने शल्यों का त्याग नहीं किया और केवल हिंसादि दोषों को छोड़ दिया तो वह व्रती नहीं हो सकता। ऐसा व्रती दृष्ट है, जिसमें शल्यों का त्याग करके व्रती को स्वीकार किया है।’

प्रश्न :- इसप्रकार तो आचार्य अपराजित सूरि का कथन असिद्ध हो जाएगा?

उत्तर :- तथ्य की दृष्टि से आचार्य विद्यानंद स्वामी व पूज्यपाद स्वामी का कथन बलवान है। तथापि आ. अपराजित सूरि का कथन दूषित है। सत्य है। उन्होंने निदान शल्य में निदान आर्तध्यान का

  1. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-25 (अंतर्गत सम्यग्दृष्टेः संतावनस्य वा निदान शल्यमस्ति। पार्श्वनाथदिगंबरेण विरचित विजयोदया पार्श्वनाथदिगंबरेण विरचित विजयोदया टीकायां शल्यं भावं द्रव्यं च भेद से 2
  2. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-18, पृ. 59
  3. सर्वार्थसिद्धि, अध्याय-7, पृ. 276

उपचार कर उसे पाँचवें गुणस्थान तक कहा और माया शल्य में माया कषाय का उपचार करके उसे सातवें गुणस्थान तक कहा।
इसप्रकार दोनों ही आचार्यों का कथन अपनी-अपनी विवक्षा से सत्य है।
इसप्रकार जिनागम में भाव शल्य के अंतर्गत निदान का वर्णन प्राप्त होता है।
2) ध्यान के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग :-
‘एकाग्रचिंता निरोधो ध्यानं’ अर्थात् चित्त को अन्य विषयों की ओर से हटाकर किसी एक विषय की ओर लगाना ध्यान है।¹
राग-द्वेष-मिथ्यात्व से अबुध, वस्तु के यथार्थ स्वरूप को ग्रहण करने वाले और अन्य विषयों में संचार न करने वाले ज्ञान को ध्यान कहते हैं।² यह परिभाषा मुख्यतः मोक्षमार्ग की अपेक्षा है।
आचार्य जिनसेन स्वामी ने आदिपुराण³ में ज्ञान की पर्याय को ध्यान कहा है। जिसे डॉ. हुकमचंदजी भारिल्ल के शब्दों में कह सकते हैं कि 'जानने रहने का नाम ही ध्यान है।'⁴ उपयोग की एकाग्रता का नाम ध्यान है। ध्यान के स्वरूप में ‘एकाग्रता’ इस शब्द का एक विशिष्ट स्थान है। यदि ध्यान के स्वरूप में से एकाग्रता शब्द को हटा दिया जाए, तो ध्यान का स्वरूप ही नहीं बनेगा; इसलिए उपयोग की एकाग्रता, चित्त की स्थिरता, लीनता का अपने रहने का नाम ध्यान है।
यह ध्यान 4 प्रकार का होता है-

  1. आर्त ध्यान
  2. रौद्र ध्यान
  3. धर्म ध्यान
  4. शुक्ल ध्यान
  1. ज्ञानार्णव गाथा-195
  2. विशेषाव टीका, गाथा-41
  3. आदिपुराण, पर्व-21, श्लोक-15
  4. इसीप्रकार पंचास्तिकाय सार व्याख्यान में आगमसार, गाथा-38 के भावार्थ में कहा है।

निदान शल्य और निदान आर्तध्यान में क्या अंतर

काल की बलिहारी है कि इस पंचम काल में प्रारम्भ के तीन (आर्त, रौद्र और धर्म) ध्यान ही हो सकते हैं; परंतु यह जीव इन तीनों ध्यानों में से भी केवल आर्त और रौद्र ध्यान को ही करता है। जो संसार के कारणभूत एवं कष्टदायक है। जो मोक्ष के कारणभूत एवं आनन्द प्रदायक है, ऐसे धर्म और शुक्ल ध्यान को पहचानता तक नहीं है।
आर्त में यह जीव होता है, दुःखी होता है, खेद-खिन्न होता है। रौद्र ध्यान में पापों में आनंद मानता है। धर्म्य ध्यान में स्वरूप का मनन-चिंतन इत्यादि करता है और शुक्ल ध्यान में क्रमशः स्थिरता को बढ़ाते हुए अनंत आनन्द की प्राप्ति करता है।
आर्त-रौद्र आदि प्रत्येक ध्यान चार-चार प्रकार के हैं। उनमें से आर्तध्यान के चार भेदों में से एक भेद है निदान। यथा-

  1. अनिष्ट संयोगज
  2. इष्ट वियोगज
  3. वेदना जन्य
  4. निदानज
    इसप्रकार ‘निदान’ शब्द का प्रयोग ध्यान के अंतर्गत आर्तध्यान के रूप में किया गया है।
    जिनागम में निदान का वर्णन निदान शल्य और आर्तध्यान के रूप में प्राप्त होने पर भी आर्तध्यान की अपेक्षा शल्य के अंतर्गत निदान का वर्णन अधिक प्राप्त होता है।
    प्रश्न :- निदान शल्य और निदान आर्तध्यान में क्या अंतर है?
    उत्तर :- निदान शल्य और निदान आर्तध्यान में चार अपेक्षाओं से अंतर देखा जा सकता है-
  5. काल की अपेक्षा - निदान शल्य अधिक समय तक होती है; परंतु निदान आर्तध्यान उससे थोड़े कम समय तक होता है। (निदान शल्य का काल अंतर्मुहूर्त है और निदान आर्तध्यान का काल निदान शल्य के अंतर्मुहूर्त से कम है।)

निदान का स्वरूप

  1. कषाय उद्रेक की अपेक्षा - निदान शल्य में कषायों का उद्रेक तीव्र होता है; परंतु निदान आर्तध्यान में कषायों का उद्रेक मंद-तीव्र (मध्यम) होता है।
  2. स्वामी की अपेक्षा - निदान शल्य चौथे गुणस्थान तक होती है और निदान आर्तध्यान पाँचवें गुणस्थान तक होता है।
  3. व्यक्तता की अपेक्षा - चौथे गुणस्थान तक होने वाली निदान शल्य को प्रत्यक्ष निदान कहते हैं और पाँचवें गुणस्थान तक होने वाले निदान आर्तध्यान को अप्रत्यक्ष निदान कहते हैं।
    तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक में निदान शल्य के प्रकरण में निदान आर्तध्यान के लिए ‘अप्रत्यक्ष निदान’ शब्द का प्रयोग किया है, इससे यह प्रतीत होता है कि एक प्रत्यक्ष निदान भी होता है, जो निदान शल्यस्वरूप है।
    प्रत्यक्ष निदान से तात्पर्य है कि जिस निदान में कषायों की तीव्रता हो और जो स्पष्ट रूप में ज्ञान का विषय बन सके, वह प्रत्यक्ष निदान है तथा इससे विपरीत अप्रत्यक्ष निदान है अर्थात् इस अप्रत्यक्ष निदान (आर्तध्यान) में कषायों की तीव्रता नहीं होती है तथा यह स्पष्ट रूप से ज्ञात भी नहीं हो जाता है।
विवक्षा निदान शल्य निदान आर्तध्यान
1. काल अधिक समय तक कम समय तक
2. कषाय उद्रेक तीव्र मंद-तीव्र (मध्यम)
3. स्वामी (गुणस्थान) पहले से चौथे पहले से पाँचवें
गुणस्थानवर्ती जीव गुणस्थानवर्ती जीव
4. व्यक्तता प्रत्यक्ष निदान अप्रत्यक्ष निदान

निदान बंध

जिनागम में निदान शल्य और आर्तध्यान के अतिरिक्त ‘निदान बंध’ के रूप में भी निदान शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है; तथापि आगम में ‘निदान बंध’ का प्रयोग शल्य और आर्तध्यान की अपेक्षा बहुत कम स्थानों पर मिलता है। जैसे - समयसार ग्रंथ की जयसेन आचार्य कृत तात्पर्यवृत्ति टीका में निदान बंध का प्रयोग है। जो निम्नप्रकार है-
'रागद्वेषमोह - ख्यातिपूजालाभ - दृष्टश्रुतानुभूत - भोगाकांक्षास्वरूपो निदानबन्धः।'¹ अर्थात् राग-द्वेष-मोह, ख्याति-पूजा-लाभ, दृष्ट-श्रुत-अनुभूत, भोगाकांक्षास्वरूप निदान बन्ध है।
यहाँ निदान शल्य और आर्तध्यान से होने वाले बंध को ही संक्षेप में निदान बंध कहा है; ऊपर निदान बंध की परिभाषा में आए ‘दृष्ट-श्रुत-अनुभूत’ शब्द निदान शल्य को बताते हैं तथा 'भोगाकांक्षा’³ शब्द निदान आर्तध्यान को बताता है; अतः निदान बन्ध में शल्य और आर्तध्यान के अतिरिक्त अन्य कुछ विशेष नहीं है, उन्हीं दोनों का विषय इस निदान बन्ध में आ जाता है।
यही कोई कह सकता है कि जब आगम में निदान बंध का अधिक उल्लेख प्राप्त नहीं होता है, तब फिर जगत में ‘निदान बंध’ ऐसा प्रयोग अधिक प्रचलित क्यों है?
समाधान :- जगत तो प्रत्येक कार्य में अपनी सुख-सुविधा को ढूँढ़ता है; इसलिए वह जगत सुख-दुःख (उच्चारण करने में सरलता का अनुभव होने) की दृष्टि से संक्षेप में ‘निदान बंध’ ऐसा कहने लगा।
निदान शब्द में निदान शल्य और निदान आर्तध्यान का ग्रहण

  1. समयसार (तात्पर्यवृत्ति टीका), गाथा-306-307
  2. निदान शल्य (द्रव्यसंग्रह, गाथा-42 की टीका)
  3. निदान आर्तध्यान (सर्वार्थसिद्धि, अध्याय-7, सूत्र-18)

निदान का स्वरूप

हो जाता है और बंध शब्द से कर्म बंधन का। निदान शल्य और आर्तध्यान से होने वाले बंध को निदान बंध कहते हैं।
इसीप्रकार निदान बंध के तीन अर्थ और निकल सकते हैं, यथा-

  1. कारण की अपेक्षा (निदान-कारण):-
    निदान बंध - 1. निदान से बंध¹ (निदान, कारण - बंध - कार्य) बंध के अनेक कारणों को निदान शब्द से कहा जा सकता है। जैसे - मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग। इन कारणों से बंधरूप कार्य होता है अर्थात् निदान से बंध होता है। इसे ही संक्षेप में निदान बंध कहा जाने लगा।
  1. बंध का निदान अर्थात् बंध का कारण।
    यद्यपि ‘बंध का निदान’ यह विग्रह व्याकरण की दृष्टि से उचित नहीं है; परंतु लोक में प्रचलित अर्थ को ध्यान में रखते हुए यहाँ व्याकरण के नियम को गौण करके यह अर्थ निकाला जा सकता है कि निदानबंध अर्थात् ‘बंध का कारण’
  1. निष्पत्ति-निष्काषित कर्म की अपेक्षा (निदान - निष्पत्ति/निष्काषित कर्म):-
    निदान बंध - निदान का बंध² अर्थात् निष्पत्ति-निष्काषित कर्म का बंध।
  2. इच्छा की अपेक्षा (निदान - इच्छा):-
    निदान बंध - निदान से होने वाला बंध³ अर्थात् इच्छा से होने वाला बंध।
  1. यहाँ तृतीया तत्पुरुष समास के द्वारा उक्त अर्थ किया है।
  2. यहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास के द्वारा उक्त अर्थ किया है।
  3. यहाँ तृतीया तत्पुरुष समास के द्वारा उक्त अर्थ किया है।

निदान बंध

‘इच्छा से होने वाला बंध’ कहें या ‘निदान शल्य व आर्तध्यान से होने वाला बंध’ - दोनों में कोई अंतर नहीं है, मात्र शब्दों का अंतर है। निदान शल्य और आर्तध्यान के स्थान पर इच्छा को लिया है; क्योंकि निदान शल्य और निदान आर्तध्यान में इच्छा की अहं भूमिका रहती है, इसलिए निदान शल्य और निदान आर्तध्यान को संक्षेप में इच्छा कहा जाता है और ऐसी इच्छा से होने वाले बंध को निदान बंध कहते हैं।
प्रश्न :- पहले और तीसरे (कारण और इच्छा) अर्थ में क्या अंतर है?
उत्तर :- क्योंकि पहले अर्थ के पहले बिंदु में ‘निदान से बंध’ - यह विग्रह किया है और तीसरे अर्थ में ‘निदान से होने वाला बंध’ यह विग्रह किया गया है - दोनों ही अर्थ समान प्रतीत होते हैं; फिर दोनों को अलग-अलग क्यों कहा?
उत्तर :- दोनों अर्थों में किंचित अंतर है। पहले अर्थ में ‘सामान्य कारण’ के रूप में निदान शब्द का प्रयोग किया है और तीसरे अर्थ में ‘विशेष कारण’ (इच्छा) के रूप में किया है।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यद्यपि सामान्यरूप से इच्छा से होने वाले बंध को निदान बंध कहा जाता है; परंतु गहराई से विचार करें तो इच्छा मात्र से होने वाला बंध, निदान बंध नहीं है। इच्छा के साथ अन्य अनेक शर्तें (कारण) भी जुड़ी हुई हैं; क्योंकि जिनागम में इस निदान शब्द का प्रयोग एक पारिभाषिक शब्द के रूप में किया गया है।
अनेक आचार्यों ने विविध शब्दों के माध्यम से निदान को परिभाषित किया है, जो निम्नप्रकार से है (प्रत्येक परिभाषा में जो विशिष्ट शब्द आए हैं, उन्हें रेखांकित (Underline) किया है)।

निदान का स्वरूप

तत्वार्थसूत्र की टीका सर्वार्थसिद्धि में आचार्य पूज्यपाद स्वामी लिखते हैं-

'निदानं विषयभोगकांक्षा।

विषय-भोगों की आकांक्षा का नाम निदान है।
इस परिभाषा में आयु कर्म को और जोड़ते हुए आचार्य वसुनंदी स्वामी मूलाचार की टीका आचारवृत्ति में लिखते हैं-

'इहलोक-परलोक-सुखकांक्षा निदानम्।

इहलोक-परलोक में सुख की आकांक्षा करना, निदान है।
इच्छा के स्थान पर मन के उपयोग को निदान कहते हुए आचार्य असंगति सूरि भगवती आराधना की विजयोदया टीका में लिखते हैं-

इदम्येव स्यादेकाग्रते इति मनसः प्रणिधानं निदानम्।

आगामी काल में यही होना चाहिए, इसप्रकार मन के उपयोग को निदान कहते हैं।

'रत्नत्रयवन्युन्मुक्तैः अनंत-ज्ञानादि-काव्यात्म्य चित्तं प्रणिधानमित्येव फलं स्यादिति निदानम्।

रत्नत्रयमुक्तै मुनिमार्ग से और अनंत ज्ञानादिक से अन्यत्र चित्त का उपयोग लगाना कि इसका यह फल मुझे मिले, यह निदान है।
इसे ही आ. अकलंक देव राजवार्तिक में इसप्रकार कहते हैं-

  1. सर्वार्थसिद्धि, अध्याय-7, सूत्र-18
  2. क्षीरप्रभृत तत्वालोकिक, वत्तीय, अध्याय-7, सूत्र-18 में कहा है - 'विषय-भोगों की आकांक्षा करना, निदान है।
  3. मूलाचार टीका (आचारवृत्ति), गाथा-86
  4. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-26
  5. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-1208

निदान की परिभाषाएँ

'भोगाकांक्षा नियतं चित्तं चित्तं तस्मिन्नेति वा निदानम्।
विषयसुखोपभोगिभावी भोगाकांक्षा तथा नियतं चित्तं दीयते तस्मिन्नेति वा निदानमिति व्यपदिश्यते।

भोगों की आकांक्षा से जिसमें व जिसके द्वारा चित्त दिया जाता है, वह निदान है। विषय-सुखों की उत्कृष्ट अभिलाषा, भोगाकांक्षा है। उस भोगाकांक्षा से जिसमें नियतरूप से चित्त दिया जाता है तथा जिसके द्वारा दिया जाता है, वह निदान है।
यहाँ जिसमें’ पद से भावों का विषय-भोगों में उपचार करने उन विषय-भोगों को ही निदान कहा है और ‘जिसके द्वारा’ पद से भावों को भी निदान कहा है।
द्रव्यसंग्रह ग्रन्थ की टीका में आचार्य ब्रह्मदेव सूरि निदान की आध्यात्मिक परिभाषा बताते हुए लिखते हैं-

निर्विचार - परमन्यत्वेन - भवत्यन्तरग - परमाद्वैकरूप-सुखामृतसारस्वालम्ब आत्ममनोर्जयो जीवो दुष्टभुतानुभूतमेषु यन्नियतं निरंतरं चित्तं ददाति तन्निदानमभिप्रेक्ष्यते।

निर्विचार-परमाद्वैतत्व की भावना से उत्पन्न परमाह्लाद जिसका स्वरूप है, ऐसे सुखामृत रस का स्वाद न लेते हुए यह जीव देखे हुए, सुने हुए और अनुभव किए हुए भोगों में जो निरंतर चित्त को देता है, उसे निदान प्रत्यय कहते हैं। (यहाँ भावों को ही निदान कहा है।)
इसी भांति तत्वार्थश्लोक वार्तिक में आचार्य विद्यानंद स्वामी

  1. तत्वार्थश्लोकवार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-37
  2. सर्वार्थसिद्धि, अध्याय-7, सूत्र-37 में कहा है - 'भोगाकांक्षा नियतं दीयते चित्तं तस्मिन्नेति वा निदानम् अर्थात् भोगों की आकांक्षा से जिसमें और जिसके कारण चित्त को दिया जाता है, उसे निदान कहते हैं।
  3. द्रव्यसंग्रह, गाथा-42 (टीका)

भी लिखते हैं-

भविष्य में भोगों की आकांक्षा के वश होकर वैषयिक सुख की उत्कृष्ट प्राप्ति के लिए मनोवृत्ति करना, निदान है।
भविष्य सुख की प्राप्ति में प्रमुख लक्ष्य रहे मन का अपूर्व पदार्थ की प्रार्थना में अभिमुख बने रहने से निदान होता है।
विद्याधर, चक्रवर्ती, देव, इंद्र, अहमिंद्र आदि के भोगों की आकांक्षा करके नियत हो रहा चित्त उन निदान में दिया जाता है अथवा उसका भोगाभिप्राय चित्त की टंकोत्कीर्ण लगी रहती है, इस कारण वह (भोगाभिप्राय) निदान कहलाता है।
जो मुनियों का पुनः-पुनः अभ्यास वृत होकर उपजता है, वह निदान है।
मुनियों का एकाग्र उठते रहना, निदान नामक आर्तध्यान है।
उपर्युक्त सभी परिभाषाओं के साररूप में आचार्य पूज्यपाद स्वामी सर्वार्थसिद्धि में इसप्रकार कहते हैं-

'भोगाकांक्षासुखरागमाविर्भावयति प्रति मनःप्रणिधानं संकल्पश्चेति-प्रबन्धरूपेणायं निदानमित्युच्यते।

भोगों की आकांक्षा के प्रति आतुर हुए व्यक्ति के आगामी भोगों की प्राप्ति के लिए मनः प्रणिधान का होना, संकल्प तथा निरंतर चिंता करना, निदान नामक आर्तध्यान है।
आ. रविषेण स्वामी पद्मपुराण में तप की मुख्यता से कहते हैं-
'भोगों की आकांक्षा के लिए तप को दूषित करना, निदान है।

  1. तत्वार्थश्लोक वार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-37
  2. वही, अध्याय-9, सूत्र-33
  3. तत्वार्थश्लोक वार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-37
  4. वही, अध्याय-9, सूत्र-33
  5. वही, अध्याय-9, सूत्र-33
  6. सर्वार्थसिद्धि, अध्याय-9, सूत्र-33

निदान की परिभाषाएँ

अंत में निदान का फल दिखाते हुए तस्वार्थ अधिगम सूत्र (श्वेताम्बर) में आचार्य उमास्वाति देव निदान की परिभाषा इसप्रकार बताते हैं-

भी लिखते हैं-

निदान का स्वरूप

जो स्मृतियों का पुनः-पुनः अभ्यास वृत्त होकर उपजना है, वह निदान है।⁴

'भोगाकाङ्गातुरस्यानागतविषयप्राप्तिं प्रति मनः प्रणिधानं संकल्पश्चिन्ता-प्रबन्धस्तुरीयमार्तं निदानमित्युच्यते।'⁶ भोगों की आकांक्षा के प्रति आतुर हुए व्यक्ति के आगामी भोगों की प्राप्ति के लिए मनः प्रणिधान का होना, संकल्प तथा निरंतर चिंता करना, निदान नामक आर्त्तध्यान है।

  1. तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-37

  2. वही, अध्याय-9, सूत्र-33

  3. वही, अध्याय-9, सूत्र-33

  4. वही, अध्याय-9, सूत्र-33

  5. सर्वार्थासिद्धि, अध्याय-9, सूत्र-33

निदान की परिभाषाएँ

निदान अर्थात् महाव्रत आदि की साधना के फलरूप में

इहलोक-परलोक के सुखों की इच्छा करना निदान है।¹

निदान अर्थात् नष्ट करने का साधन। जिससे आत्म-सुख नष्ट हो जाता है, वह निदान है। धर्म के स्वरूप में इहलोक-परलोक के सुखों की इच्छा रखने से आत्म-सुख नष्ट हो जाता है; इसलिए धर्म के फलरूप में इहलोक-परलोक के भौतिक सुखों की इच्छा करना, निदान है।² उपर्युक्त निदान शल्य और निदान आर्त्तध्यान दोनों को एक साथ बताने हेतु समयसार की तात्पर्यवृत्ति टीका में आचार्य जयसेन स्वामी ने ‘निदान बन्ध’ इस पद का प्रयोग किया है।

शंका :- उपर्युक्त परिभाषाओं के अंतर्गत तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक में अपूर्व पदार्थों की इच्छा को निदान कहा है तथा द्रव्यसंग्रह में सुने हुए, देखे हुए और अनुभव किए हुए पदार्थों की इच्छा को निदान कहा है; इसप्रकार दोनों आचार्यों का परस्पर विरुद्ध कथन है, तो हम किन आचार्य के कथन को सत्य माने ?

समाधान :- यहाँ दोनों ही कथन सत्य हैं; क्योंकि

तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक में निदान आर्त्तध्यान की चर्चा है और द्रव्यसंग्रह में निदान शल्य की चर्चा है; इसलिए यहाँ प्रकरण की भिन्नता होने से दोनों आचार्य में परस्पर विरोध नहीं है। अब रही बात हम किसे सत्य माने ?

  1. तत्त्वार्थ अधिगम सूत्र, अध्याय-7, सूत्र-32

  2. वही, अध्याय-9, सूत्र-33

निदान का स्वरूप

तो यहाँ हम आर्तध्यान या शल्य की चर्चा नहीं कर रहे हैं; अपितु निदान सामान्य की चर्चा कर रहे हैं।

उपर्युक्त सभी परिभाषाओं के साररूप में कह सकते हैं-

आगामी काल में भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए अति आसक्ति पूर्वक निरंतर इच्छा करना, निदान है।

इस परिभाषा में चार पद मुख्य हैं :-

  1. आगामी काल¹

  2. भौतिक सुख²

  3. अति आसक्ति पूर्वक निरंतरता³

  4. इच्छा⁴

निदान की परिभाषा में इन चारों ही पदों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रत्येक पद का अपना एक विशिष्ट स्थान है। यदि इनमें से एक भी पद को छोड़ दिया जाए, तो वह निदान नाम नहीं पा सकता है; अतः चारों पदों का अतीव महत्त्व है।

यहाँ पदों का विश्लेषण परिभाषा के क्रमानुसार न करके पदों की महत्ता एवं विकास क्रम के अनुसार किया है-

  1. ‘आगामी काल’ हेतु परिभाषाओं में प्रयुक्त अन्य शब्द - इहलोक-परलोक/ भविष्य। 2. ‘भौतिक सुख’ हेतु परिभाषाओं में प्रयुक्त अन्य शब्द - भोग / सुख / दृष्ट-श्रुत-अनुभूत भोग/ वैषयिक-सुख / अपूर्व पदार्थ।

  2. ‘अति आसक्ति पूर्वक निरंतरता’ हेतु परिभाषाओं में प्रयुक्त अन्य शब्द - उत्कट रहना / नियतरूप से / एकाग्र लटक रहे / टक-टकी लगाना / पुनः पुनः अभ्यास वृत्त / एकाग्र उठते रहना / आतुर होना / संकल्पपना / अटकना/ चिंता।

  3. ‘इच्छा’ हेतु परिभाषाओं में प्रयुक्त अन्य शब्द - आकांक्षा / मन का उपयोग / चित्त का उपयोग / चित्त का देना / मनोवृत्ति / मन का अभिमुख होना / चित्त की टक- टकी/संकल्परत / चिंतारत।

इच्छा

  1. इच्छा :- ‘इच्छा’ इस पद का निदान की परिभाषा में

अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है; क्योंकि निदान का प्रारंभ भी यहाँ से होता है और अंत भी। ‘इच्छा’ इस पद को अनेक आचार्यों ने विभिन्न शब्दों के माध्यम से कहा है, जैसे - आकांक्षा¹, मन का उपयोग², चित्त का उपयोग³, चित्त का देना⁴, मनोवृत्ति⁵, मन का अभिमुख होना⁶, चित्त की टक-टकी⁷, संकल्परत⁸, चिंतारत⁹ इत्यादि रूपों से कहा है; इसप्रकार शब्दों की विभिन्नता होने पर भी अर्थ की भिन्नता नहीं है। इच्छा अर्थात् आकांक्षा, चाह, अभिलाषा, आशा, लालसा,

तमन्ना, इत्यादि। किसी वस्तु को प्राप्त करने के लिए लगाया जाने वाला उपयोग ही आकांक्षा है।

आकांक्षा मन के उपयोग से, मनोवृति से, चित्त की टक-टकी से अलग और कुछ नहीं है। वास्तव में आकांक्षा तो एक प्रकार की मनोवृत्ति ही है।

(मनोवृत्ति + प्राप्ति की भावना = इच्छा) जब मनोवृत्ति में प्राप्ति की भावना जुड़ जाती है, तब उसी मनोवृत्ति को इच्छा कहा जाता है। इस इच्छा (आकांक्षा) शब्द से सर्व जगत भली-भाँति परिचित है; इसलिए अधिकांश आचार्यों ने परिभाषा में इच्छा शब्द का प्रयोग किया है।

इच्छा ही दुःखों का मूल कारण है, इसी के कारण राग-द्वेष की उत्पत्ति होती है या ऐसा कहें कि राग-द्वेष इस इच्छा के ही कोमल- कठोर रूप हैं। इच्छा की भयानकता व विशालता को दिखलाते हुए आचार्य गुणभद्र स्वामी आत्मानुशासन ग्रंथ में लिखते हैं- 1. सर्वार्थसिद्धि 2. भगवती आराधना

  1. तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक

  2. वही 4. तत्त्वार्थराजवार्तिक

  3. वही 7. वही 8. सर्वार्थसिद्धि

  4. वही

निदान का स्वरूप

आशागर्तः प्रतिप्राणी यस्मिन्विश्वमणूपमम् ।

कस्य किं कियदायाति वृथा वो विषयैषिता ।।36।।

इस एक विश्व में अनंतानंत प्राणी रहते हैं और प्रत्येक प्राणी का आशारूपी गड्डा इतना गहरा है कि जिसमें संपूर्ण विश्व अणु के समान दिखाई देता है। जब एक ही जीव के आशारूपी गड्ढे में यह पूरा विश्व एक अणु के समान दिखाई देता है, तब फिर यह विश्व सबकी तृष्णा की पूर्ति करने में कैसे समर्थ है? किसको कितनी विभूति दे सकता है? अर्थात् रंच मात्र भी नहीं; इसलिए तेरी विषयों की इच्छा व्यर्थ ही है और यह उल्टा तुझे ही महा-व्याकुल करने वाली है। इच्छाओं के जिस घने जाल में हम निरंतर उलझते ही जा रहे हैं, उसे पण्डित टोडरमलजी’ ने 4 भागों में विभाजित किया है; जो इसप्रकार हैं-

  1. विषय को जानने-देखने की इच्छा :- इससे यह जानना-

देखना चाहता है। जैसे - वर्ण देखने की, राग सुनने की, अव्यक्त को जानने की इत्यादि इच्छाएँ होती हैं। वहाँ अन्य कोई पीड़ा नहीं है; परंतु जब तक जानता-देखता नहीं है, तब तक महा-व्याकुल रहता है। 2) कषाय पूर्ति की इच्छा :- इस इच्छा में कषाय भावों के अनुसार कार्य करना चाहता है। जैसे - बुरा करने की, हीन करने की इत्यादि इच्छाएँ होती हैं। यहाँ भी अन्य कोई पीड़ा नहीं है; परंतु जब तक वह कार्य न हो, तब तक महा-व्याकुल रहता है।

  1. पापोदय को दूर करने की इच्छा :- इस इच्छा में पाप के उदय से जो शरीर में या बाह्य अनिष्ट कारण मिलते हैं, उनको दूर करना चाहता है। जैसे – रोग, पीड़ा, क्षुधा आदि का संयोग होने पर उन्हें दूर 1. मोक्षमार्गप्रकाशक, अध्याय-3, पृष्ठ-70

इच्छा

करने की इच्छा होती है। सो यहाँ यही पीड़ा है कि जब तक वह दूर न हो, तब तक महा-व्याकुल रहता है।

  1. पुण्योदय में प्रवृत्ति करने की इच्छा :- पुण्योदय से उक्त तीनों प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति करना चाहता है; परंतु उनका साधन एक साथ नहीं हो सकता; इसलिए एक को छोड़कर अन्य में लगता है। इसप्रकार अनेक कार्यों की प्रवृत्ति में इच्छा होते हुए भी सभी में एक साथ प्रवृत्ति नहीं कर सकता है; इसलिए महा-व्याकुल रहता है। इसप्रकार सामान्यरूप से इच्छाओं को चार रूपों में प्रस्तुत किया है, लेकिन इच्छाएँ केवल चार प्रकार की ही नहीं होती हैं; अपितु अनेक प्रकार की होती हैं। प्रत्येक इच्छा के अनेक प्रकार हैं। लौकिक में भी सुख-शांति प्राप्त करने के लिए परिणामों की संभाल अति-आवश्यक है; इसलिए सुख-शांति प्राप्त करने के लिए ऐसी खतरनाक, प्रतिपल रुलाने वाली इच्छाओं को किसी भी कीमत पर छोड़ना ही चाहिए।

इच्छाओं का नाम निदान है; किन्तु मात्र इच्छाएँ ही निदान नहीं हैं और न ही सभी इच्छाएँ निदान हैं। यदि केवल इच्छाएँ ही निदान होतीं, तब इच्छा और निदान दोनों पर्यायवाची होने चाहिए थे; परंतु ऐसा तो है नहीं। इच्छा और निदान दोनों भिन्न-भिन्न हैं। यद्यपि सामान्यरूप से निदान को इच्छा कह दिया जाता है। तथापि इच्छाएँ निदान से बहुत अधिक हैं; क्योंकि वे श्रेणी के सराग गुणस्थानों (9वें गुणस्थान) में भी होती हैं; परंतु निदान तो मात्र चौथे या पाँचवें गुणस्थान तक ही होता है। निदान तो इच्छाओं का अंश मात्र है; अतः इसके बिना निदान का प्रारंभ भी नहीं हो सकता है; इसलिए निदान के अंतर्गत सर्वप्रथम इच्छाओं के स्वरूप का निरूपण किया गया है।

निदान का स्वरूप

इच्छा मात्र निदान नहीं है और न ही सम्पूर्ण इच्छाएँ निदान हैं तो फिर किसप्रकार की इच्छाएँ निदान हैं? और कौन-सी इच्छाएँ निदान में आती हैं? इसके उत्तर स्वरूप दूसरा विशेषण है ‘अति आसक्ति पूर्वक निरंतरता’ -

  1. अति आसक्ति पूर्वक निरंतरता :- ‘अति आसक्ति’ यह पद इच्छा के भाव पक्ष को बताता है और ‘निरंतरता’ यह पद इच्छा के काल पक्ष को बताता है।

ध्यातव्य बात यह है कि यहाँ आसक्ति के साथ ‘अति’ विशेषण का प्रयोग किया है। मात्र आसक्ति शब्द का नहीं; क्योंकि आसक्ति और राग-द्वेष का होना स्वाभाविक है। जब तक विकल्पात्मक दशा है, तब तक सामान्य आसक्त भाव और राग-द्वेष का होना सहज ही है। इसलिए निदान के प्रकरण में जो हमारे दैनिक व्यवहार में सहज हैं, ऐसी सामान्य आसक्ति, राग-द्वेष पूर्वक इच्छाओं की बात नहीं है; अपितु अत्यधिक आसक्ति और तीव्र राग-द्वेष की बात है। अति आसक्ति और राग-द्वेष पूर्वक जो इच्छा होती है, वह निदान है।

'जैसे – नागदत्त सेठ ने नियम लिया था कि जब तक दीपक जलता रहेगा, तब तक मैं सामायिक करता रहूँगा। सामायिक करते समय सेठजी को प्यास लगी। इसप्रकार प्यास लगने की इच्छा सामान्य है, सहज है। यह निदान नहीं है।

सेठजी दीपक बुझने का इंतजार करने लगे; परंतु जैसे ही दीपक बुझने को होता, वैसे ही भवदत्ता सेठानी उसमें तेल भर देती - ऐसा बारम्बार होने लगा।

अति आसक्ति पूर्वक निरंतरता

पहले सेठजी के जो सामान्य आसक्ति पूर्वक इच्छा हो रही थी। अब उसी में तीव्रता आती जा रही है। वह इच्छा अत्यंत वेगवती हो गई। ऐसी अति आसक्ति पूर्वक इच्छा ही निदान है। अंत में पानी-पानी… करते हुए निदान पूर्वक मरण करके अगले भव में उसी निदान के फलस्वरूप पानी में मेंढ़क हुए…¹ निरंतरता :- यह इच्छा के काल (समयावधि) पक्ष को बताता है। अति आसक्ति पूर्वक इच्छाओं में निरंतरता होती ही है। यहाँ कोई कहे की इच्छाएँ तो दिनभर निरंतर चलती ही रहती हैं, तो क्या वे सभी निदान हैं?

समाधान :- नहीं! यहाँ ‘निरंतर इच्छा’ इस पद से दिनभर चलने वाली इच्छाओं को नहीं लिया है। जब तक आत्मलीनता नहीं होगी, तब तक सविकल्प दशा में दिनभर चलने वाली इच्छाएँ स्वाभाविक, सहज और सामान्य हैं, निदान नहीं हैं। किसी विशेष विषय में अति आसक्ति पूर्वक इच्छाओं की निरंतरता ही निदान हैं।

इसी ‘अति आसक्ति पूर्वक निरंतरता’ को आचार्य भगवंतों ने उत्कट (उत्कर्ष)², नियतरूप से³, एकाग्र लटक रहे⁴, टक-टकी लगाना⁵, पुनः-पुनः अभ्यास वृत्त⁶, एकाग्र उठते रहना⁷, आतुर होना⁸, संकल्प⁹, चिंता¹⁰ इत्यादि भाषा में व्यक्त किया है।

प्रश्न :- क्या संकल्प करना निदान है ?

उत्तर :- हाँ! आचार्य पूज्यपाद स्वामी संकल्प को भी निदान 1. आराधना कथा कोष, कथा क्रमांक-114 (जिनपूजन प्रभाव कथा) 2. राजवार्तिक, तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक

  1. वही

  2. तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक

  3. वही 6. वही 7. वही

  4. सर्वार्थसिद्धि

  5. वही 10. वही

निदान का स्वरूप

कहते हैं; परंतु संकल्प मात्र निदान नहीं है; क्योंकि संकल्प तो सामान्यतः होते ही रहते हैं। जैसे - देव दर्शन करने के, शास्त्र सुनने के इत्यादि; परंतु यदि यही संकल्प अति आसक्ति और राग-द्वेष पूर्वक किए जाएँ, तो निदान कहलाएंगे।

इसलिए आचार्य पूज्यपाद स्वामी ने परिभाषा में ‘आतुर’ शब्द को लिखा है। जिस संकल्प में आतुरता अर्थात् अति आसक्ति और तीव्र राग-द्वेष हो, वह संकल्प निदान है।

सुरसुंदरी ने ऐसे ही संकल्प पूर्वक निदान किया था…

'चम्पापुर नगर में राजा रिपुवर्धन एवं उनकी रानी रतिसुंदरी रहते थे। उनकी एक पुत्री थी। जिसका नाम सुरसुन्दरी था। उसी राज्य में धनवाय और धनवती नामक सेठ-सेठानी रहते थे। जिनके पुत्र का नाम अमरकुमार था।

एक बार बालिका सुरसुन्दरी घर से सात कोड़ी अपने साड़ी के पल्लू में बाँधकर खेलने गई और पेड़ के नीचे सो गई। तब वहाँ अतिचंचल अमरकुमार ने उसकी साड़ी में से सात कोड़ी निकालकर उनसे मिठाई खरीद ली और अपनी पूरी मित्र मण्डली में बांट दी। अंत में जब सुरसुंदरी को मिठाई देने के लिए गए, तब सुरसुंदरी ने पूछा कि यह मिठाई कहाँ से लाए। अमरकुमार बोले कि यह मिठाई तुमने ही तो दिलवाई है। सुरसुंदरी बोली मैंने कैसे ? अमरकुमार ने कहा कि तुम्हारे पल्लू में जो सात कोड़ी थीं, उन्हीं की मिठाई लाया हूँ। यह सुनते ही सुरसुंदरी को बहुत क्रोध आया और बोली कि

अमरकुमार तुमने चोरी की है; इसप्रकार समस्त मित्र मण्डली के सामने अपना अपमान होते देख अमरकुमार बोले कि क्या तुम इन सात कोड़ी अति आसक्ति पूर्वक निरंतरता

से राज्य खरीद लेतीं। सुरसुंदरी संकल्प करती हुई बोली ‘हाँ! मैं इनसे राज्य खरीद लेती।’

इसप्रकार अति आतुरता पूर्वक संकल्प किया, जो निदान है। कालांतर में दोनों बड़े हो गए और दोनों का परस्पर विवाह हो गया। एक दिन सुरसुंदरी सहित अमरकुमार धन कमाने के लिए बाहर जाते हैं। वहाँ सुरसुंदरी थकी हुई होने से एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगती है। इनकी यह अवस्था देखकर अमरकुमार को बचपन की वही घटना याद आ जाती है… तब वे सुरसुंदरी को सात कोड़ी देकर कहते हैं कि लो ये तुम्हारी बचपन की सात कोड़ी, अब इनसे राज्य खरीद लेना। जब राज्य खरीद लो, तब मेरे पास वापस आ जाना।

कुछ समय पश्चात् अनेक कष्टों को सहते हुए अंत में उन्हीं सात कोड़ी के बदले राज्य खरीद लेती है; इसप्रकार पूर्व में जो संकल्प द्वारा निदान किया था, वह पूर्ण हुआ।‘’

इसीप्रकार आतुरता सहित चिंता आदि करना भी निदान है।

'अनुराग और दुःख संकल्प के ही अधीन हैं अर्थात् किसी से प्रीति-अप्रीति करना संकल्प के अधीन है। संकल्प के होने पर ही (भौतिक) सुख-दुःख होता है। संकल्प के अभाव में नहीं।'2 सारांश यह है कि ‘अति आसक्ति पूर्वक निरंतरता’ इस पद के बिना निदान की परिभाषा पूर्ण नहीं हो सकती है; क्योंकि निदान - शल्य व ध्यान का भेद है और दोनों में निरंतरता ही होती है। अंतर मात्र इतना है कि शल्य में निरंतरता अधिक समय तक होती है और ध्यान में थोड़े कम समय तक होती है; परंतु दोनों में ही निरंतरता 1. विस्तार से जानने हेतु देखिए - सुरसुंदरी, पं. काशीनाथ जैन कृत 2. भगवती अराधना, गाथा-1227-29

निदान का स्वरूप

अवश्य होती है। जब मूल में ही निरंतरता है, तब उसके भेद-प्रभेदों में तो होगी ही; इसलिए निदान की परिभाषा में निरंतर शब्द का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि अति आसक्ति पूर्वक इच्छाओं की निरंतरता, मन की एकाग्रता, संकल्प निदान है; परंतु सभी प्रकार की इच्छाओं की निरंतरता, मन की एकाग्रता, संकल्प निदान नहीं है।

वे इच्छाएँ अनेक प्रकार की होती हैं, जिन्हें दो रूपों में देखा जा सकता है-

  1. भौतिक सुख की इच्छा

  2. वास्तविक सुख की इच्छा

इनमें से भौतिक सुख की इच्छा ही निदान में आती है,

वास्तविक सुख की नहीं। पूर्व में जो 4 प्रकार की इच्छाएँ देखी थीं, वे सभी भौतिक सुख की इच्छाएँ हैं।

अब वह भौतिक सुख क्या है? उसे देखते हैं-

  1. भौतिक सुख :- इस जीव का एकमात्र लक्ष्य सुखी होना है और यह गलत भी नहीं है; परंतु जहाँ से यह सुखी होना चाहता है, जिन पदार्थों से सुख की आकांक्षा रखता है, वह गलत है; क्योंकि जब उनमें सुख है ही नहीं, तो वे कैसे दे सकते हैं ? लेकिन इस जीव की धृष्टता तो देखो ! कि वास्तविक सुख को भूलकर निरंतर उन्हीं विषय- भोगों में चित्त को रमाए रखता है और प्रति समय उन्हें प्राप्त करने की अभिलाषा करता रहता है।

यहाँ भौतिक शब्द से विषय-कषाय, भोग-संयोग – इन चारों

का ग्रहण करना चाहिए।

भौतिक सुख

विषय से तात्पर्य है पंचेन्द्रिय विषय अर्थात् स्पर्शन, रसन, घ्राण, चक्षु और कर्ण – इन पाँच इंद्रियों के क्रमशः स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द – ये पाँच विषय हैं। ये पंचेन्द्रिय-विषय ही भोग कहलाते हैं। (एक दृष्टि से) विषय, अलग हो और भोग, अलग हो – ऐसा नहीं है; अपितु दोनों एक ही हैं।

आचार्य वसुनंदी स्वामी भोग की परिभाषा बताते हुए कहते हैं- 'सांसारिकसुखहेतून् भोगाः’1

अर्थात् सांसारिक सुख के हेतु, भोग कहलाते हैं। जिन-जिन कारणों से संसार का सुख प्राप्त होता है; वे सभी कारण, भोग हैं। इष्ट- मिष्ट-स्वादिष्ट आहार से लेकर शयन पर्यंत जिन भी पदार्थों से, क्रियाओं से और भावों से सांसारिक सुख की प्राप्ति होती है; वे सभी पदार्थ, क्रियाएँ एवं भाव, भोग हैं।

सांसारिक सुख अर्थात् सुखाभास (झूठा-सुख)। जो वास्तविक सुख नहीं है, वह सांसारिक सुख है। इसे ही आचार्य अपराजित सूरि इसप्रकार कहते हैं कि ‘दुःख का प्रतिकार अर्थात् दुःखों को कम करना ही सुख है’ अर्थात् ‘कमदुःख’ का नाम ही सुख है। इसे ही सांसारिक सुख, इन्द्रिय सुख, भौतिक सुख, वैषयिक सुख इत्यादि शब्दों के माध्यम से कहते हैं और यह इन्द्रिय सुख, दुःख के बिना नहीं हो सकता है।3 जैसे तीव्र ज्वर से मंद ज्वर होने पर कहा जाता है कि ज्वर उतर गया, ठीक हो गया; परंतु वास्तव में वह ठीक नहीं हुआ; मात्र कम हुआ है। वैसे ही पहले तीव्र दुःख था, अब मंद हो गया है, उसे ही सुख 1. मूलाचार टीका (आचारवृत्ति), गाथा-81

  1. भगवती अराधना (विजयोदया टीका), गाथा-1243

  2. भगवती अराधना (विजयोदया टीका), गाथा-1243

निदान का स्वरूप

कह देते हैं; परंतु वास्तव में वह सुख नहीं है; अपितु कम दुःख ही है। उस कम दुःख को ही सुख कहा जाता है और यही सांसारिक सुख, इन्द्रिय सुख, भौतिक सुख और वैषयिक सुख है।

सांसारिक सुख के हेतु ये पंचेन्द्रिय विषय हैं; इसलिए ये पंचेन्द्रिय विषय ही भोग हैं। भोग शब्द सुनते ही हमारे मन में स्पर्शन इन्द्रिय की मैथुन क्रिया ख्याल में आती है; परंतु मात्र इतना ही भोग नहीं है; पाँचों ही इन्द्रियों के विषय, भोग हैं। आचार्य देव इसे ही इसप्रकार कहते हैं - 'अपनी इच्छा से जो भोगे जाते हैं, वे काम-भोग हैं।'1

'सुख का साधन होने से मन में संकल्पित खान-पान आदि

और स्त्री वर्ग आदि काम-भोग हैं।'2

कषाय – जब इंद्रियों की बात चलती है, तब मन का ग्रहण

स्वयमेव हो जाता है। जैसे - इंद्रिय संयम में पाँच इंद्रियों के साथ एक मन को भी लिया जाता है, वैसे ही यहाँ इंद्रियों के अंतर्गत मन का ग्रहण भी हो जाता है तथा मन का जो विषय है, ऐसे कषायादि परिणामों का विषय शब्द के साथ ग्रहण हो जाता है। तभी तो विषय- कषाय दोनों को साथ में लिया जाता है।

विषय शब्द के साथ कषाय शब्द को ग्रहण करने का दूसरा

कारण यह भी है कि निदान के भेदों में एक भेद विषय परक है, तो दूसरा भेद कषाय परक; इसलिए विषय के साथ कषाय शब्द का भी ग्रहण किया है।

संयोग – भोग के साथ संयोग का भी ग्रहण करना चाहिए;

क्योंकि निदान के भेदों में एक भेद संयोग परक भी है। यदि हम संयोग 1. भगवती अराधना (विजयोदया टीका), गाथा-202

  1. भगवती अराधना (विजयोदया टीका), गाथा-202

भौतिक सुख

को ग्रहण नहीं करते हैं, तो वह भेद छूट जाएगा; इसलिए संयोग का ग्रहण करना भी अति आवश्यक है।

संयोग की परिभाषा बताते हुए आचार्य वसुनंदी देव मूलाचार की टीका (आचारवृत्ति) में लिखते हैं -

'अनात्मनीनस्य आत्मभावः संयोगः’1

जो अपने नहीं हैं, उनमें आत्म-भाव होना संयोग है। यद्यपि सामान्यरूप से प्राप्त होने वाले सभी पदार्थ भी संयोग कहलाते हैं; तथापि आचार्य वसुनंदी स्वामी के अनुसार जिन पदार्थों में हमारा आत्म-भाव है, एकत्व-ममत्व-कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि होती है; वे सभी पदार्थ, क्रियाएँ एवं भाव हमारे संयोग हैं। इनके अतिरिक्त जिन पदार्थों में हमारा आत्म- भाव नहीं है, वे हमारे संयोग भी नहीं हैं; जैसे-

गृहस्थों के लिए उनका घर, संयोग है; क्योंकि उनका उस घर में आत्म-भाव है; परंतु मुनिराजों के लिए वसतिका, संयोग नहीं है; क्योंकि पूज्य मुनिराजों का उसमें आत्म-भाव नहीं होता है। इसी से यह भी प्रतिफलित होता है कि यदि हमारे आस-पास

रहने वाले पदार्थों में आत्मभाव नहीं है, तो वे पदार्थ हमारे लिए संयोगरूप नहीं हैं; परंतु यदि दूर देश में स्थित पदार्थों में हमारा आत्म- भाव है, तो वे हमारे लिए संयोगरूप हैं।

अन्य विवक्षा से प्राप्त होने वाले सभी पदार्थ संयोग कहलाते हैं। इसके अनुसार मुनिराजों के लिए वसतिका, तीर्थंकरों के लिए समवशरण इत्यादि सभी संयोग हैं; परंतु विवक्षित विवक्षा के अनुसार जिन पदार्थों में आत्म-भाव रहता है, वे ही संयोग हैं, अन्य नहीं। निदान में भोग पुण्य कर्मों का एवं भुगतान पाप कर्मों का होता है। 1. मूलाचार टीका (आचारवृत्ति), गाथा-48

  • भोग और संयोग में किंचित् अंतर है :-

छोटा है।

निदान का स्वरूप

  1. संयोग का विषय बड़ा है और भोग का विषय अपेक्षाकृत

  2. संयोगों के अंदर भोग सम्मिलित हैं; परंतु भोगों के अंदर सभी संयोग सम्मिलित नहीं हैं।

  3. संयोग में राग-द्वेष दोनों होते हैं; परंतु भोग में केवल राग ही होता है; क्योंकि ‘भोग के समय चित्त राग से व्याकुल रहता है।’ संयोग में शत्रु-मित्र दोनों होते हैं; परंतु भोग में केवल मित्र ही होता है; क्योंकि आत्मीयपना शत्रु-मित्र दोनों में हो सकता है, लेकिन सुख बुद्धि तो मित्र या राग के कारणभूत पदार्थों में ही हो सकती है। इसप्रकार विषय-कषाय, भोग-संयोग से प्राप्त होने वाला सुख (सुखाभास, कम दुःख), भौतिक सुख है। ऐसे भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए निरंतर इच्छा करना ही निदान है; परंतु अभी भी निदान की परिभाषा पूर्ण नहीं हुई है। इसमें अभी एक महत्त्वपूर्ण पद शेष है, जो निम्नप्रकार से है-

  4. आगामी काल :- आगामी काल अर्थात् भविष्य काल। यहाँ

भविष्य काल से मरण के बाद प्राप्त होने वाला अगला भव अर्थात् परलोक मात्र का ग्रहण नहीं करना है; अपितु इहलोक (वर्तमान भव) में वर्तमान समय से आगे और मरण से पूर्व का काल भी ग्रहण करना। इहलोक और परलोकरूप आगामी काल में भौतिक सुख की

प्राप्ति के लिए अति आसक्ति पूर्वक निरंतर इच्छा करना, निदान है। निदान की परिभाषा में से यदि ‘आगामी काल’ इस पद को

हटा दिया जाए तो निदान की परिभाषा पूर्ण नहीं होगी; इसलिए 1. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-1236

आगामी काल

‘आगामी काल’ इस पद का अपना एक विशिष्ट स्थान है।

आगामी काल इस पद का अंतर्भाव इच्छा शब्द में भी हो

जाता है; क्योंकि इच्छा हमेशा आगामी काल के लिए ही होती है। इच्छा होती वर्तमान में है; परंतु इच्छा का जो विषय होता है, वह भविष्य काल से संबंध रखता है।

जो वर्तमान में हमारे पास नहीं है अथवा अल्प है या फिर जो है, उसे आगामी काल में बनाए रखने के लिए, प्राप्त करने के लिए या उसकी वृद्धि करने के लिए इच्छा होती है; क्योंकि वर्तमान में जो है, सो है; उसमें तो कुछ फेर-बदल हो नहीं सकता। जो भी फेर-बदल होगा, वह आगामी काल में ही होगा; इसलिए फेर-बदल की इच्छा में आगामी काल स्वयमेव समाहित हो जाता है।

इसलिए सभी आचार्यों ने प्रत्यक्ष या परोक्षरूप से आगामी काल को लिया है। रविषेण आचार्य, वसुनंदी आचार्य, अपराजित सूरि ने तो स्पष्टरूप से ‘आगामी काल’ पद का प्रयोग किया है; साथ ही अन्य आचार्यों ने भी ‘ऐसा फल मिले’, ‘प्राप्त करने के लिए’ इत्यादि शब्दों के माध्यम से परोक्षरूप में आगामी काल का ग्रहण किया है। इहलोक-आकांक्षा और परलोक-आकांक्षा के सम्बन्ध में

आचार्य वसुनंदि स्वामी आचारवृत्ति में लिखते हैं-

'जो इस लोक में - बलदेव, चक्रवर्ती आदि के राज्य की

अभिलाषा करता है, राजश्रेष्ठी पद चाहता है, उसके वह इहलोक- आकांक्षा है। जो परलोक में - स्वर्ग आदि में देवपने की प्रार्थना होती है, उसके वह परलोक-आकांक्षा है - ये दोनों ही आकांक्षाएँ सम्यक्त्व का घात करती हैं अर्थात् इहलोक में मुझे षट्खंड का साम्राज्य, बलदेव निदान का स्वरूप

पद, राजश्रेष्ठी पद मिले और परलोक में मुझे इंद्र पद, सामान्य देवपद या महान ऋद्धिधारी देवपद तथा सुन्दर रूप मिले इत्यादि रूप से प्रार्थना करता हुआ जीव मिथ्यादृष्टि हो जाता है; क्योंकि कांक्षा निदान शल्यरूप है।‘’

आगामी काल में भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए अति आसक्ति पूर्वक निरंतर इच्छा करना, निदान है।

इसप्रकार परिभाषा में आए हुए प्रत्येक पद की आवश्यकता को तर्क-युक्ति एवं आगम के आधार से देखा।

आचार्य अपराजित सूरी और आचार्य उमास्वाति के अनुसार

‘इसका यह फल मुझे मिले’ या ‘साधना के फलरूप में सुखों की इच्छा करना’ निदान है अर्थात् किन्हीं विशिष्ट भावों, क्रियाओं या साधना के फलरूप में इसका यह फल मुझे मिले - इसप्रकार लेन-देन की भावना करना भी निदान है।

आचार्य विद्यानंद स्वामी थोड़ी और गहराई में जाकर विषय को स्पष्ट करते हुए कहते हैं-

'स्मृतियों का पुनः-पुनः अभ्यास वृत्त होकर उपजना, निदान है।'2 'स्मृतियों का एकाग्र उठते रहना, निदान नामक आर्त्तध्यान है।'3 यहाँ इच्छा (मन के एकाग्र उपयोग) को स्मृति शब्द से कहा गया है। इससे यह परिलक्षित होता है कि भूतकाल की यादों का पुनः-पुनः स्मरण करना, उन यादों में अपने मन को एकाग्र करना भी निदान है।

प्रश्न :- ‘स्मृतियों का एकाग्र उठते रहना’ इसमें आगामी 1. मूलाचार टीका (आचारवृत्ति), गाथा-250

  1. तत्त्वार्थश्लोक वातिक, अध्याय-9, सूत्र-33 3. वही, अध्याय-9, सूत्र-33 आगामी काल

कालादि चार बिंदु तो घटित होते ही नहीं हैं, फिर इसे निदान कैसे कह सकते हैं ?

उत्तर :- ‘स्मृति का एकाग्र उठते रहना’ इसमें चारों ही बिंदु घटित होते हैं, जो इसप्रकार हैं -

स्मृति से ‘मन का उपयोग’ अर्थात् इच्छा का ग्रहण हो जाता है। स्मृति किसी न किसी विषय में होती ही है; अतः इससे ‘भौतिक सुख’ का ग्रहण हो जाता है। एकाग्र से निरंतरपने का ग्रहण हो जाता है। बीते हुए काल की अच्छी-बुरी घटनाओं को याद करने का प्रयोजन तो आगामी काल में कुछ अच्छा-बुरा करने का ही होता है; इसलिए आगामी काल का भी ग्रहण हो जाता है।

इसप्रकार ‘स्मृतियों का एकाग्र उठते रहना’ इसमें वे चारों ही विशेषता समाहित हो जाती हैं।

यहाँ प्रश्न हो सकता है कि इष्ट पदार्थों का वियोग होने पर उनको प्राप्त करने की इच्छा होती है; यह तो इष्ट वियोगज नामक दूसरा आर्त्तध्यान है और इस निदान में भी इष्ट पदार्थों की इच्छा की जाती है, तो दोनों में क्या अंतर हुआ ?

इसीप्रकार आचार्य विद्यानंद स्वामी तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक’ में शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं-

"शंका :- यहाँ निदान नामक चौथा आर्तध्यान, इष्ट वियोगज नामक दूसरे आर्त्तध्यान के अंदर ही गर्भित हो जाएगा; क्योंकि मनोज्ञ पदार्थ का विपरीत अर्थात् मनोज्ञ विषय का संयोग करने के लिए पुनः चिंताएँ रचना, दूसरा आर्त्तध्यान है। निदान में भी इष्ट विषयों के संयोग 1. तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-33, पृ.291 निदान का स्वरूप

हो जाने की चिंताएँ की जाती हैं; अतः दूसरे आर्त्तध्यान से ही चौथे आर्त्तध्यान का ग्रहण हो जाना सिद्ध है।

समाधान :- यह ठीक नहीं है; क्योंकि जो विषय अब तक

अनेक पर्यायों में प्राप्त नहीं हुए। उन सुखावह विषय-भोगों की प्राप्ति के लिए निदान किया जाता है।

भविष्य सुख की प्राप्ति में एकाग्र लटक रहे मन का ‘अपूर्व’ पदार्थ की प्रार्थना में अभिमुख बने रहने से निदान होता है और दूसरा आर्त्तध्यान तो कुछ काल तक भोगे हुए, प्राप्त किए हुए विषयों का दैव- दुर्विपाक के अनुसार वियोग हो जाने पर पुनः उनका संयोग हो जाने की इच्छा अनुसार प्रवर्तता है।

इसप्रकार जिन्हें आज तक नहीं भोगा, उनको प्राप्त करने की इच्छा का नाम निदान है और जो भोगकर, प्राप्त होकर छूट गए हैं, उन्हें पुनः प्राप्त करने की इच्छा का नाम इष्टवियोगज नामक दूसरा आर्त्तध्यान है।"। दूसरा अंतर यह है कि इष्ट वियोगज नामक दूसरे आर्त्तध्यान में वियोग की मुख्यता है और चौथे निदान आर्त्तध्यान में संयोग और वियोग दोनों की ही मुख्यता है।

इसलिए यहाँ पूर्व अनुभूत पदार्थ और अपूर्व पदार्थ – दोनों का ही ग्रहण किया गया है।

इसप्रकार निदान की परिभाषा में आगामी काल, भौतिक सुख, अति आसक्ति पूर्वक निरंतरता और आकांक्षा - ये चारों ही पद अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

चतुराई सो ही भली, आतम में चित दीन।

परधन परमन हरन कू, वेश्या हू परवीन।।

निदान के भेद-प्रभेद

  • निदान के भेद - प्रभेद :-

यह निदान प्रशस्त और अप्रशस्त के भेद से दो’ प्रकार का है- 1) प्रशस्त निदान 2) अप्रशस्त निदान

प्रशस्त निदान भी मोक्ष एवं संसार के भेद से दो प्रकार का है- 1) मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त निदान

  1. संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान

इसीप्रकार अप्रशस्त निदान भी कषाय और भोग के भेद से दो प्रकार का है-

  1. कषाय का कारणभूत अप्रशस्त निदान

  2. भोग का कारणभूत अप्रशस्त निदान

किन्तु आचार्य शिवार्य भगवती आराधना² में निदान के कुल तीन भेद ही बतलाते हैं-

  1. प्रशस्त निदान 2) अप्रशस्त निदान 3) भोगकृत निदान यहाँ मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त निदान को निदान के रूप में स्वीकार नहीं किया है। केवल संसार के कारणभूत प्रशस्त निदान को ही प्रशस्त निदान कहा है तथा कषाय के कारणभूत अप्रशस्त निदान को अप्रशस्त निदान कहा और भोग के कारणभूत अप्रशस्त निदान को भोगकृत निदान कहा है।

दोनों कथनों में अंतर मात्र इतना ही है कि एक³ आचार्य ने 1. सिद्धांतसार संग्रह (नरेंद्रसेनाचार्य), श्लोक-245-253 और अमितगति श्रावकाचार, अध्याय-7, श्लोक-20-22

  1. भगवती आराधना, गाथा-26 और विजयोदया टीका, गाथा - 26, 1209 तत्थ णिदाणं तिविहं होइ पसत्थापसत्थभोगकदं।

तिविधं पि तं णिदाणं परिपंथो सिद्धिमग्गस्स।।1209।। 3. सिद्धांतसार संग्रह, श्लोक-245-253/अमितगति श्रावकाचार, अध्याय-7, श्लोक-20-22 निदान का स्वरूप

मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भावों को निदान कहा है और दूसरे’ आचार्य ने मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भावों को निदान नहीं कहा है। शेष भेद यथावत् हैं, मात्र शब्दों का अंतर है।

निदान

प्रशस्त निदान

अप्रशस्त निदान

मोक्ष का कारणभूत

कषाय का कारणभूत

संसार का कारणभूत

  1. मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त निदान :-

भोग का कारणभूत

कर्मणां विच्युतिं बोधिं समाधिं भवदुःखतः ।

हानिमाकांक्षतो मुक्ति हेतुभूतं निगद्यते ।।248।।2

कर्मों का नाश, बोधि की प्राप्ति, समाधि, संसार दुःखों का नाश इत्यादि की चाह करना, मोक्ष का कारणभूत (प्रशस्त निदान) है। जिन कारणों से निश्चितरूप से मोक्ष प्राप्त हो, उन कारणों को ‘मोक्ष का कारणभूत’ कहते हैं। कर्मों का नाश, बोधि की प्राप्ति इत्यादि के माध्यम से निश्चितरूप से मोक्ष प्राप्त होता है; इसलिए इन्हें मोक्ष का कारणभूत कहा है।

वर्तमान में कर्मों का नाश, बोधि की प्राप्ति इत्यादि प्राप्त करने के शुभ भाव हैं; इसलिए प्रशस्त कहा है।

कर्मों का नाश, बोधि की प्राप्ति इत्यादि कारणों को प्राप्त करने की इच्छा होने से निदान कहा है।

  1. भगवती आराधना, गाथा-26 और विजयोदया टीका, गाथा-26, 1209 2. सिद्धांतसार संग्रह (नरेंद्रसेनाचार्य), श्लोक-248 मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त निदान

इसप्रकार जिन कारणों से निश्चितरूप से मोक्ष प्राप्त होने वाला है, ऐसे कारणों को शुभ भाव पूर्वक प्राप्त करने की इच्छा करना ही मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त निदान है।

प्रश्न :- निदान हमारा अत्यंत समीप का शत्रु (दोष) है, हेय अर्थात् त्यागने योग्य है तो फिर क्या हम कर्म-नाश, बोधि-प्राप्ति आदि की भावना भी नहीं कर सकते हैं?

उत्तर :- कर्म नाश, बोधि को प्राप्त करने की भावना कर सकते हैं। इसकी उपादेयता को दिखलाते हुए आचार्य वसुनंदी स्वामी मूलाचार की टीका आचारवृत्ति की 107 वीं गाथा की उत्थानिका में लिखते हैं- किंचिदपि निदानं न कर्तव्यं ? कर्तव्यं चेत्याह -

क्या किंचित् भी निदान नहीं करना चाहिए? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं कि करना चाहिए, कुछ निदान तो कर सकते हैं। जैसे- जा गदी अरहंताणं णिट्ठिदट्ठाणं च जा गदी।

जा गदी वीदमोहाणं सा मे भवदु सस्सदा।।107।।¹

अरहंत देव की जो गति हुई है, कृतकृत्य सिद्धों की जो गति हुई है तथा मोह रहित जीवों की जो गति हुई है, वही गति सदा के लिए मेरी हो।

ऐसी भावना करनी चाहिए; परंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या ऐसी भावना, निदान है?

उत्तर :- हाँ ! उक्त भावना निदानरूप है। यद्यपि मूल गाथा में तो निदान शब्द का प्रयोग नहीं किया है; किन्तु उत्थानिका में तो अवश्य ऐसी भावना को निदान कहा गया है। इसका अर्थ यही है कि उक्त भावना निदानरूप है।

  1. मूलाचार, गाथा-107

निदान का स्वरूप

प्रश्न :- यदि उक्त भावना निदान है तो कौन-से निदानरूप है? चार भेदों में से कौन-से भेदरूप है?

उत्तर :- गाथा में अरहंत, सिद्ध, वीतरागी बनने की भावना भाई है। अरहंत, सिद्ध, वीतरागी बनने के बाद निश्चित रूप से मोक्ष होता है और जो निश्चितरूप से मोक्ष प्राप्त कराते हैं, उन्हें मोक्ष का कारणभूत कहा जाता है अर्थात् इस गाथा में जो भावना भाई गई है, वह मोक्ष की कारणभूत है।

वर्तमान में जो ऐसी भावना भाई जा रही है, वह शुभभावरूप होने से प्रशस्त है और मोक्ष के लिए होने से मोक्ष के कारणभूत है तथा इच्छा होने से निदान है।

इसप्रकार मूलाचार की 107 वीं गाथा में मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त निदान की चर्चा है। जिसे उत्थानिका में उपादेय कहा गया है अर्थात् मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त निदान करने योग्य है; परंतु वास्तव में तो यह मोक्ष की कारणभूत प्रशस्त भावना, निदान है ही नहीं।

आगे चलकर ग्रंथकार एवं टीकाकार स्वयं ही इसका निषेध

करते हुए कहते हैं कि ऐसी (मोक्ष की कारणभूत प्रशस्त) भावना, निदान नहीं है; विकल्प मात्र है।

ग्रंथकार वट्टकेर आचार्य गाथा 568 में लिखते हैं-

आरोग्ग-बोहिलाहं दिंतु समाहिं च मे जिणवरिंदा ।

किं ण हु णिदाणमेयं णवरि विभासेत्थ कायव्वा ।।568।।

हे जिनेन्द्र देव ! मुझे आरोग्य (जन्म-मरण का अभाव), बोधि का लाभ और समाधि प्रदान करें; क्या यह निदान नहीं है? नहीं! यह निदान नहीं है; इसे केवल विकल्प समझना चाहिए।

मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त निदान

आरोग्य, बोधि और समाधि ये निश्चितरूप से मोक्ष प्राप्त कराने वाले हैं अर्थात् ये मोक्ष के कारणभूत तत्त्व हैं। वर्तमान में शुभ भावरूप होने से प्रशस्त हैं। इसप्रकार उक्त गाथा में मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भावों की चर्चा है।

पूर्वोक्त गाथा 107 में जिन मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भावों को निदान कहा था। उन्हीं मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भावों को यहाँ (568वीं गाथा में) सामान्य विकल्प मात्र कहा जा रहा है; निदान होने का निषेध किया है। आगे आचार्य देव स्वयं ही शंका उठाते हुए समाधान करते हैं -

शंका :- एतस्माच्चेदं निदानं न भवति यत् ?

समाधान :- भासा असच्चमोसा णवरि हु भत्तीय भासिदा एसा। ण हु खीणरागदोसा दिंति समाहिं च बोहिं च ।।566।।

शंका :- आखिर ! ये मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भाव, निदान क्यों नहीं हैं? अर्थात् किस कारण से यह निदान नहीं है? समाधान :- यह बोधि-समाधि की प्रार्थना असत्यमृषा भाषा है, यह मात्र भक्ति से कही गई है; क्योंकि जिनके राग-द्वेष नष्ट हो चुके हैं, वे जिनेन्द्र भगवान समाधि और बोधि को नहीं देते हैं। यदि वे देने का कार्य करेंगे तो राग-द्वेष सहित हो जाएँगे।

उनके द्वारा जो देने योग्य था, सो तो उन्होंने दे ही दिया। वह क्या है? सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्ररूप रत्नत्रय का उपदेश है। हम लोगों के लिए इससे अधिक और क्या चाहिए अर्थात् कुछ नहीं; इसलिए यह समाधि और बोधि की प्रार्थना, भक्ति है।’

  1. मूलाचार, गाथा-567

निदान का स्वरूप

प्रश्न :- ऊपर कहा था कि बोधि-समाधि की प्रार्थना असत्यमृषा भाषा है तो यह असत्यमृषा भाषा क्या होती है?

उत्तर :- असत्यमृषा अर्थात् अनुभय वचन। जो वचन सत्य भी नहीं हैं और असत्य भी नहीं हैं, उन्हें अनुभय वचन अथवा असत्यमृषा भाषा कहते हैं।

विशेष का ज्ञान नहीं हो पाता; अतः उन्हें सत्य भी नहीं कह सकते हैं और सामान्य का ज्ञान होता रहता है; अतः उन्हें असत्य भी नहीं कह सकते हैं; इसलिए ऐसे वचनों को असत्यमृषा अथवा अनुभय वचन कहते हैं।’

ये अनुभय वचन 9 प्रकार के होते हैं और मुनिराजों को भाषा समिति में इन वचनों का बोलना वर्जित नहीं है अर्थात् वे बोल सकते हैं।2 ‘हे जिनेंद्र देव मुझे आरोग्य, बोधि का लाभ तथा समाधि प्रदान करें’ यह वाक्य, याचनी अनुभय वचन का है। वास्तव में जिनेंद्र देव कुछ दे नहीं सकते हैं; अतः इस वाक्य को सत्य नहीं कह सकते हैं; परंतु पूर्व में इनका उपदेश अवश्य ही दिया था; अतः इन वचनों को असत्य भी नहीं कह सकते हैं। याचना पूर्वक वचन बोले हैं; इसलिए ये याचनी अनुभय वचन हैं।

ऐसे अनुभय वचन मुनिराज बोल सकते हैं; इसलिए जिनवरों और आचार्यों की भक्ति करना, निदान नहीं है। राग-द्वेष रहित अर्हत देव में, धर्म में और द्वादशविध श्रुत में जो राग है- ये तीनों ही भक्ति हैं। आचार्यों में, श्रमणों में और चारित्र युक्त बहुश्रुत विद्वानों में जो राग है; यह प्रशस्त राग सभी सरागी (छठवें गुणस्थानवर्ती) मुनियों में होता है।3 1. मूलाचार टीका (आचारवृत्ति), गाथा-316

  1. मूलाचार, गाथा-316 / भगवती आराधना, गाथा-1201

  2. मूलाचार, गाथा-572,573

मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त निदान

तेसिं अहिमुहदाए अत्था सिज्ांति तह य भत्तीय ।

तो भत्ति रागपुव्वं वुच्चइ एदं ण हु णिदाणं ।।574।।

उन जिनवर आदिकों के अभिमुख होने से उनकी तरफ अपने

मन को लगाने से, उनकी भक्ति से वांछित इष्ट की सिद्धि हो जाती है, इष्ट मनोरथ’ हस्तग्राह्य हो जाते हैं; इसलिए यह भक्ति रागपूर्वक ही होती है; परंतु निदानरूप नहीं होती है; क्योंकि इससे संसार के कारणों का अभाव होता है।

जिन प्रशस्त भावों के माध्यम से भगवान की भक्ति की जाती है; वे प्रशस्त भाव हैं तो राग ही; परंतु रागरूप होने पर भी निदान नहीं हैं; क्योंकि वे संसार के कारण नहीं हैं।

इससे सिद्ध होता है कि सभी राग भाव, इच्छा, निदान नहीं हैं; अपितु जो राग भाव, इच्छा, प्रशस्त भाव संसार (भौतिक सुख) के कारण हैं, वे ही निदान हैं।

प्रश्न :- यदि यह मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त भाव निदान नहीं है, तो आचार्य नरेंद्रकीर्ति2 और आचार्य अमितगति देव3 ने इसे निदान क्यों कहा है? जब आचार्यों में ही परस्पर विरोध है, तब हम किन आचार्य के कथन को सत्य मानें ?

उत्तर :- यहाँ दोनों कथनों में विरोध-सा प्रतीत होता है; परंतु विरोध है नहीं, मात्र विवक्षा भेद है और दूसरी बात यह है कि यदि कहीं दो कथनों में परस्पर विरोध दिखाई देता है, तो सर्वप्रथम यदि वहाँ तर्क-युक्ति सम्भव हो तो उनका प्रयोग करना चाहिए, अन्यथा दोनों ही कथनों को स्वीकार करना चाहिए।

  1. यहाँ लौकिक मनोरथों की बात नहीं है।

  2. सिद्धांतसार संग्रह, श्लोक-245-253

  3. अमितगति श्रावकाचार, अध्याय-7, श्लोक-20-22

निदान का स्वरूप

“धवलादि ग्रंथों में भी इसीप्रकार की शंका उठाकर समाधान किया गया है, जो इसप्रकार है-

शंका :- दोनों कथनों में से एक ही सत्य होना चाहिए,

अन्यथा संशय मिथ्यात्व हो जायेगा?

समाधान :- नहीं! यहाँ संशय मिथ्यात्व नहीं है; क्योंकि जो अरहंत देव के द्वारा कहा हुआ है, वही सत्य है। इसमें संदेह नहीं है। हम लोग छद्मस्थ हैं। हमारे द्वारा यह विवेक करना शक्य नहीं है कि इन दोनों में से कौन-सा सत्य है? इसलिए मिथ्यात्व के भय से दोनों का ही ग्रहण करना चाहिए अर्थात् यदि पहले कथन को सत्य कह दिया और दूसरा कथन सत्य निकला अथवा दूसरे कथन को सत्य

कह दिया और पहला कथन सत्य निकला, तो हम मिथ्यादृष्टि हो जाएंगे; अतएव केवली, श्रुत-केवली के मिलने तक दोनों कथनों को ही मानना उचित है।"।

दूसरा प्रबल कारण यह है कि जहाँ स्याद्वाद का प्रयोग होता है, वहाँ विरोध नहीं होता है, मात्र अपेक्षा भेद होता है। इसीप्रकार यहाँ भी स्याद्वाद का प्रयोग होने से विरोध नहीं है, मात्र अपेक्षा भेद है। जो इसप्रकार है-

मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भावों को निदान कहने का कारण यह है कि कहीं-कहीं सामान्यरूप से इच्छा मात्र को निदान कह दिया जाता है और इन मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भावों में भी किसी न किसी रूप में इच्छा तो होती ही है; इसलिए मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भावों में इच्छा मात्र को लक्ष्य करके निदान कहा गया है; परंतु वास्तव में वे भाव संसार के कारणभूत नहीं होने से निदान नहीं हैं; अतः पूर्व में 1. मूलाचार प्रस्तावना, पृ.-17

मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त निदान

निदान की परिभाषा में भौतिक सुख की इच्छाओं को ही निदान सिद्ध किया था, सर्व इच्छाओं को नहीं; क्योंकि भौतिक सुख की इच्छाएँ ही संसार का कारण हैं।

आचार्य नरेंद्रसेन देव स्वयं ही उक्त प्रशस्त भावों की उपादेयता बताते हुए लिखते हैं कि यह मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त निदान पवित्र है, अनंत है, अद्वितीय है और मोक्ष प्राप्त कराने वाला’ है। इसे ही आचार्य शिवार्य इसप्रकार कहते हैं-

दुक्खक्खयकम्मक्खयसमाधिमरणं च बोधिलाभो य।

एयं पत्थेयव्वं ण पत्थणीयं तओ अण्णं ।।1219।।

हमारे शारीरिक, आगंतुक और स्वाभाविक दुःखों का नाश हो

तथा उनके कारणभूत कर्मों का क्षय हो। रत्नत्रय का पालन करते हुए मरण हो और जिनदीक्षा की ओर अभिमुख करनेवाले ज्ञान का लाभ हो, इतनी ही प्रार्थना करने योग्य है। इनके सिवाय अन्य प्रार्थना करने योग्य नहीं है।

तात्पर्य यह है कि मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भावों में इच्छा मात्र को लक्ष्य करके निदान कहा है; परंतु वास्तव में ये भाव संसार के कारण नहीं हैं; अतः निदान भी नहीं हैं; क्योंकि जो संसार के कारणभूत भाव होते हैं, वे ही निदान कहलाते हैं।

जन्म-मरण, क्षुधादि 18 दोष नष्ट हों, रागादि भावों का क्षय हो, अनादि की पराधीनता और मोहादि कर्मों का नाश हो, रत्नत्रय की प्राप्ति हो इत्यादि भाव, पवित्र हैं, अनंत हैं, अद्वितीय हैं और मोक्ष प्राप्ति कराने वाले हैं; अतः सम्यग्दृष्टि को करने योग्य हैं, उपादेय हैं। 1. सिद्धांतसार संग्रह, छंद-251

निदान का स्वरूप

इसप्रकार मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भाव, निदान हैं या नहीं ? तथा इसके स्वरूप सहित इसकी हेय-उपादेयता के ऊपर तर्क-युक्ति व आगम प्रमाण से चर्चा की।

  1. संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान :-

देशं कालं भवं भावं क्षेत्र- मैश्वर्यमेव वा।

जिनधर्म प्रसिद्ध्यर्थं कांक्षतो वा दरिद्रिताम् ।।249।। संसार-हेतुकं तद्धि निदानं जिननायकैः ।

कथितं हि यतो नैते जायन्ते संसृतिं विना ।।250।।¹

जैनधर्म की प्राप्ति होने के लिए योग्य देश, काल, भव, भाव (शुभ परिणाम), क्षेत्र, वैभव की चाह करना, संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान होता है; क्योंकि संसार के बिना ये देश-कालादि प्राप्त नहीं होते हैं - ऐसा जिननायकों ने कहा है।

इसे ही आचार्य शिवार्य भगवती आराधना में केवल प्रशस्त निदान कहते हैं-

संजमहेतुं पुरिसत्तसबलविरियसंघदणबुद्धी।

सावयबंधुकुलादीणि णिदाणं होदि हु पसत्थं ।।1210।।

संयम धारण करने के लिए अन्य जन्म में पुरुषार्थ, उत्साह, शरीर से उत्पन्न बल, वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न वीर्य, वज्रवृषभनाराच संहनन, उत्तम बुद्धि, श्रावक धर्म, धर्म में सहायी बंधुजन तथा निर्वाण के योग्य निर्मल कुल आदि की चाह करना, प्रशस्त निदान है। निदान इस दूसरे भेद में इन्हीं संसार के कारणभूत संयोगों को प्राप्त करने की इच्छा की गई है; इसलिए इसे संसार का कारणभूत कहा है। ‘संयम धारण करने के लिए, जिनधर्म की प्राप्ति हेतु’ ऐसे शुभ 1. सिद्धांतसार संग्रह, छंद-249,250

संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान

परिणाम होने से प्रशस्त कहा और उक्त संयोगों को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होने से निदान कहा है।

प्रशस्त निदान का पहला भेद मोक्ष का कारणभूत है और यह दूसरा भेद संसार का कारणभूत है।

यहाँ मूल प्रश्न तो यही उठता है कि हम किसे मोक्ष का कारण कहें और किसे संसार का कारण कहें ?

उत्तर :- इसका उत्तर प्राप्त करने के लिए पहले कारण के स्वरूप को जानना आवश्यक है।

मोक्षमार्ग प्रकाशक¹ में पंडित टोडरमलजी ने तीन प्रकार के कारण बताएँ हैं, जो निम्नप्रकार हैं -

  1. जिसके सद्भाव में कार्य हो भी सकता है और नहीं भी; इसीप्रकार जिसके अभाव में कार्य हो भी सकता है और नहीं भी। जैसे- उपवास, क्षेत्र, तीव्र क्षयोपशम, शारीरिक बल इत्यादि द्वारा मोक्षप्राप्ति। (सद्भाव = √ /x ; अभाव = √ / x)

  2. जिसके सद्भाव में कार्य हो भी सकता है और नहीं भी; परंतु जिसके अभाव में कार्य हो ही नहीं सकता है। जैसे – मुनिदशा, वज्रवृषभनाराच संहनन, निर्वाण के योग्य निर्मल कुलादि द्वारा मोक्ष प्राप्ति। (सद्भाव = √ /x ; अभाव = x)

  3. जिसके सद्भाव में कार्य निश्चितरूप से होता ही है तथा जिसके अभाव में कार्य निश्चितरूप से होता ही नहीं है। जैसे - कर्मों का नाश, जन्म-मरण का अभाव, धर्म्य-शुक्ल ध्यान, सम्यक् रत्नत्रय की परिपूर्णता इत्यादि द्वारा मोक्ष प्राप्ति। (सद्भाव = √ ; अभाव = x) 1. मोक्षमार्ग प्रकाशक, अध्याय-9

निदान का स्वरूप

उक्त तीनों कारणों में से तीसरा कारण, मोक्ष का यथार्थ कारण है; क्योंकि जिसके होने पर निश्चितरूप से मोक्ष होता ही है और नहीं होने पर नहीं होता है - वही मोक्ष का यथार्थ कारण है। जैसे - कर्म नाश होने पर निश्चितरूप से मोक्ष होगा और कर्म नाश नहीं होने पर निश्चित रूप से मोक्ष नहीं होगा; इसलिए कर्मों का नाश आदि, मोक्ष के कारण हैं। ऐसे तीसरे कारण को प्राप्त करने की भावना मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त निदान के अंतर्गत होती है।

शेष दो कारण (पहला और दूसरा) संसार के कारणभूत हैं;

क्योंकि इनके होने पर मोक्ष निश्चितरूप से होगा ही, ऐसा नहीं है अर्थात् इन कारणों का मोक्ष के साथ अविनाभाव सम्बन्ध नहीं है तथा इन कारणों को प्राप्त करने के बाद भी संसार में रुलना हो सकता है; इसलिए इन्हें संसार का कारण कहा।

निदान के इस दूसरे भेद में प्रथम दो कारणों को प्राप्त करने की इच्छा रहती है; इसलिए इस निदान को संसार का कारणभूत कहा है। (पहला कारण) योग्य-देश, क्षेत्र, काल, भाव, शारीरिक बल, शारीरिक उत्साह, तीव्र क्षयोपशम, उत्तम बुद्धि, श्रावक धर्म, बंधुजन इत्यादि के मिलने पर मोक्ष हो भी सकता है और नहीं भी तथा इनके नहीं होने पर मोक्ष हो भी सकता है और नहीं भी। इसका अर्थ है कि ये मोक्ष के कारण नहीं हैं; इसलिए इन्हें संसार का कारण कहा। (दूसरा कारण) वज्रऋषभनाराच संहनन, मुनिदशा (मात्र बाह्य दशा), योग्य कुलादि के बिना तो मोक्ष हो ही नहीं सकता; परंतु इनके होने पर मोक्ष हो भी सकता है और नहीं भी। इसका अर्थ है कि ये भी मोक्ष के यथार्थ कारण नहीं हैं; इसलिए इन्हें भी संसार का कारण कहा।

संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान

तात्पर्य यह है कि संसार के कारणभूत संयोगों को प्राप्त करने के लिए वर्तमान में शुभ परिणाम पूर्वक जो इच्छा की जाती है, वह संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान है।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रशस्त निदान की परिभाषा में जिसकी इच्छा की गई है, वह संयोग है। विषय-कषाय-भोग नहीं है। यदि विषय-कषाय, भोग की इच्छा होती तो वह अप्रशस्त निदान होता; इसलिए निदान की परिभाषा में ‘भौतिक सुख’ इस पद से विषय-कषाय और भोग के साथ-साथ संयोग का भी ग्रहण किया था। जिससे यह (संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान) दूसरा भेद भी निदान सामान्य में गर्भित हो जाए।

प्रशस्त निदान में प्रशस्त भावों की चर्चा होती है। यहाँ प्रशस्त भाव से तात्पर्य है कि निर्मल हृदय से, शुद्ध मनोवृत्ति से, बिना किसी कषाय के, भोगों की अभिलाषा से रहित जो भाव हैं, वे प्रशस्त भाव हैं। यदि इन प्रशस्त भावों के मध्य में किंचित् भी कषाय उत्पन्न हो जाए अर्थात् मान के लिए, क्रोध के लिए, भोग के लिए या अपने स्वार्थ को पूर्ण करने के लिए उक्त संयोगों की अभिलाषा करता है, तो फिर वह प्रशस्त निदान नहीं रहेगा। उसका स्तर गिरकर निम्न अप्रशस्त रूप हो जाएगा; इसलिए प्रशस्त निदान करने के लिए पूर्ण शुद्ध हृदय व निर्मल मनोवृत्ति होनी चाहिए।

प्रशस्त निदान की परिभाषा में आचार्य देव ने उत्कृष्ट से उत्कृष्ट शुभ भावों को दर्शा दिया है। निदान को पूर्ण रूप से छोड़ने के लिए ऐसे उत्कृष्टतम शुभ भावों को भी छोड़ना होगा।

जब संयम को धारण करने वाले उत्कृष्टतम शुभ भाव को

निदान का स्वरूप

त्याज्य बतला दिया। तब उससे निम्न प्रकार के शुभ भावों का तो कहना ही क्या? अर्थात् वे तो उससे पहले छोड़ने योग्य हैं। आगामी काल में अध्ययन, वैयावृत्ति, तप, प्रक्षाल-पूजन, दया-दानादि संयोगों को प्राप्त करने के लिए शुभ भाव पूर्वक जो तीव्र इच्छा की जाती है, वह भी निदान है।

पदार्थों में एकत्व-ममत्व-कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि होने के कारण हमारे चित्त को यह बात स्वीकार नहीं होती कि अध्ययन, वैयावृत्ति, तप, प्रक्षाल-पूजन, दया-दानादि संयोगों की भी इच्छा नहीं करनी चाहिए; अपितु हमारा मन उल्टा ही प्रश्न पूछता है कि उक्त प्रकार की मनोवृत्ति क्यों नहीं करनी चाहिए? भला इनसे अच्छे भाव और कौन- से हो सकते हैं? और इनको करने में क्या हानि है?

इसका समाधान करते हुए आचार्य नरेन्द्रसेन देव कहते हैं कि ‘यह संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान किंचित् दुःख का कारण है;’ क्योंकि दया-दानादि और संयोग मोक्ष के कारणभूत नहीं हैं; अतः यह संसार का कारणभूत होने से दुःख का ही कारण है।

प्रश्न :- दुःख कैसा? अरे ! इनको करने में तो लाभ ही लाभ है। आगामी काल में अध्ययन, वैयावृत्ति, तप, प्रक्षाल-पूजन, दया- दानादि का अवसर प्राप्त होगा। इसमें दुःख कैसा?

उत्तर :- सब परिणामों का वैचित्र्य है। लौकिक हो या पारलौकिक - दोनों में ही सुख-शांति का संबंध परिणामों के साथ है। परिणामों से ही सुख-शांति मिलती है और परिणामों से ही दुःख-दर्द मिलता है अर्थात् सुख-दुःख के कारण परिणाम ही हैं; कोई वस्तु या क्रिया नहीं। कहा भी है-

संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान

परिणामे बंधुजि कहिए, मोक्ख वि तह वियाणि।

इउ जाणेविणु जीव तुहुँ, तह भावहु परियाणि ।।14।।¹

परिणाम से ही बंध है अर मोक्ष भी परिणाम से।

यह जानकर हे भव्यजन ! परिणाम को पहचानिये ।।14।।

हे जीव ! परिणाम से ही बंध कहा है और परिणाम से ही मोक्ष कहा है; अतः तू इस बात को अच्छी तरह जानकर अपने भावों को पहिचान। अभी वर्तमान समय में अध्ययन, वैयावृत्ति, तप, प्रक्षाल- पूजन, दया-दानादि के परिणाम हो रहे हैं और परिणामों सहित इनमें प्रवृत्ति भी कर रहे हैं; इसलिए अभी ये कार्य अच्छे लग रहे हैं और इन्हीं कार्यों को करते हुए ऐसी भावना करें कि आगामी काल में हमें ऐसे ही संयोग मिलें। अध्ययन का अवसर, प्रभावना की शक्ति, प्रक्षाल- पूजन का लाभ मिले इत्यादि भावना करें तो उससे निदान बंध होगा और बंध होगा, सो उदय में भी अवश्य आएगा।

बंध होने के पश्चात् पूर्व की निदान-भावना (बंध) के अनुसार संयोग मिलना तो निश्चित है; परंतु पूर्व के जैसे परिणाम हों, यह निश्चित नहीं है; क्योंकि परिणाम स्थिर नहीं होते हैं, निरंतर बदलते रहते हैं, सदैव एक समान नहीं रहते हैं।

आगम में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो अपने वर्तमान परिणामों से सातवें नरक जाने की योग्यता रखते थे, वे ही अंतर्मुहूर्त बाद मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

अशुभ से शुभ परिणामों का उदाहरण - 'एक मुनिराज वृक्ष के नीचे बैठकर आत्मसाधना कर रहे थे। तभी किसी ने केवली से पूछा कि यदि अभी इन मुनिराज का मरण हो, तो पूज्य मुनिवर कहाँ जाएंगे? 1. योगसार, दोहा-14

निदान का स्वरूप

केवली बोले भले ही अभी इनके वर्तमान परिणाम 7वें नरक ले जाने की योग्यता रखते हों; परंतु अन्तर्मुहूर्त पश्चात् ये पूज्य मुनिवर आत्मस्थिरता पूर्वक अनन्त आनंद के धाम मोक्षपुरी का वरण करेंगे।’ जिसप्रकार अशुभ परिणामों से शुभ परिणाम होने में देर नहीं लगती; उसीप्रकार शुभ परिणामों से अशुभ परिणाम होने में भी समय नहीं लगता।

शुभ से अशुभ परिणामों का उदाहरण - 11वें गुणस्थानवर्ती पूर्ण वीतरागी उपशमक भी आगामी कुछ क्षणों में मिथ्यात्व की भूमि पर आ गिरते हैं। यह सब परिणामों की क्षणभंगुरता ही तो है।2 इसप्रकार पूर्व के निदान बंधानुसार संयोग तो मिल जाएंगे; परंतु पूर्व जैसे परिणाम रहेंगे या नहीं - किसी को ज्ञात नहीं हैं? क्योंकि परिणाम क्षणभंगुर हैं। पूर्व के समान वर्तमान में परिणाम न रहे तो दुःखी ही होना पड़ेगा; क्योंकि परिणामों से ही सुख-दुःख होता है। एक ही महाविद्यालय में अनेक छात्र पढ़ते हैं, उनमें से कुछ छात्र तो पूर्ण रुचि के साथ स्वेच्छा से समस्त कक्षाओं में उपस्थित होकर लाभ लेते हैं और लाभ लेते हुए मजा करते हैं; परंतु कुछ विद्यार्थी रुचि के साथ स्वेच्छा से समस्त कक्षाओं का लाभ नहीं लेते हैं और जिन कक्षाओं में उपस्थित होते हैं, उनमें भी अध्यापक जबरदस्ती भेजते हैं, ऐसे विद्यार्थी स्व-रुचि (परिणाम) के अभाव में कक्षा में बैठकर भी बंधन का अनुभव करते हैं, दुःखी होते हैं और पूरी कक्षा में यही विचार करते रहते हैं कि कक्षा कब छूटेगी? यहाँ से कैसे 1. बोधि समाधि निधान, पृ. 171 (उत्तरपुराण-स्वेतवाहन मुनिराज की कथा) 2. मोक्षमार्ग प्रकाशक, अधिकार-7, पृ.265

संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान

भागूँ? परंतु भाग नहीं पाता, बिना मन के कक्षा में बैठना ही पड़ता है और महा-व्याकुल होता है।

ऐसा क्यों होता है?

पूर्व में शुभ परिणाम पूर्वक अथवा किसी कषाय के वश

कदाचित् ऐसा निदान किया हो कि हम एक बड़े महाविद्यालय में पढ़े और सम्पूर्ण कक्षाओं का लाभ लें - इसप्रकार निदान भाव किया था तथा पुण्यानुसार उसका बंध भी हो गया। बंध हुआ है, तब उदय में आएगा ही; इसलिए वर्तमान में ऐसे संयोग मिल गए, जिन्हें भोगना पड़ रहा है; परंतु परिणामों (रुचि) के अभाव में उन संयोगों में बंधन का अनुभव करता है और निरंतर दुःखी होता है, रोता है।

इसप्रकार कितने ही अच्छे संयोग क्यों न हों; उनकी अभिलाषा नहीं करनी चाहिए; क्योंकि ये संयोग संसार के कारण हैं और दुःख देने वाले हैं; अतः सभी प्रकार के संयोगों की अभिलाषा छोड़ने योग्य ही है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि अध्ययन, वैयावृत्ति, तप, प्रक्षाल-पूजन, दया-दानादि करने का निषेध नहीं है; अपितु इनके संबंध में निदान करने का निषेध है।

इसीप्रकार उत्कृष्टतम भाव संयम धारण करने की अभिलाषा भी नहीं करना चाहिए; क्योंकि यह निदान संसार का कारण है।

प्रश्न :- संयम को धारण करने की इच्छा संसार की कारणभूत और किंचित् दुःख को देने वाली कैसे हो सकती है? वह तो मोक्षमार्ग का एक अंश है ?

उत्तर :- यहाँ संयम को संसार का कारणभूत और किंचित् दुःख को देने वाला नहीं कहा। यहाँ तो तत्संबंधी जो निदान भाव है, उसको संसार का कारणभूत और किंचित् दुःख को देने वाला कहा है। निदान का स्वरूप

कैसे? सो बताते हैं-

अभी तो हमने भाव पूर्वक उत्कृष्ट संयम की भावना भा ली और उससे निदान बंध कर लिया। जब उसका उदय आएगा, तब ऐसे ही परिणाम होंगे, ऐसा नहीं कह सकते हैं और उस दशा के योग्य परिणामों के अभाव में अनेक दुःख-दर्द को सहन करते हुए महाकष्ट को उठाना पड़ेगा। संयम दशा के योग्य परिणाम न होने से उनमें निरंतर अतिचार लगते रहेंगे। वे ही अतिचार, अनाचार के रूप में परिवर्तित होकर संयम दशा से भ्रष्ट कर देंगे और जो संयम भाव से भ्रष्ट हैं, उनकी दुर्गति होती है। इसी सम्बन्ध में आचार्य वट्टकेर स्वामी मूलाचार में लिखते हैं कि- कंदप्पमाभिजोग्गं किव्विस सम्मोहमासुरत्तं च ।

तादेवदुग्गईओ मरणम्मि विराहिए होंति ।।63।।

मरण काल में विराधना के हो जाने पर कांदर्प, आभियोग्य,

किल्विषक, स्वमोह और आसुरी - ये देव दुर्गतियाँ होती हैं। इसीप्रकार आचार्य कुंदकुंद देव भी अष्टपाहुड़ और समयसार ग्रन्थ में कठोर शब्दों में भर्त्सना करते हुए लिखते हैं - णाणं चरित्तहीणं लिंगग्गहणं च दंसणं विहृणं।

संजमहीणं य तवो जड़ चरई णिरत्थयं सव्वं ।।5।।¹

वदणियमाणि धरंता सीलाणि तहा तवं च कुव्वंता।

परमट्ठबाहिरा जे णिव्वाणं ते ण विन्दन्ति ।।153।।²

दर्शन रहित यदि वेश हो चारित्र विरहित ज्ञान हो।

संयमरहित तप निरर्थक आकाश कुसुम समान हो ।।5।।

व्रत नियम सब धारण करें, तप शील भी पालन करें।

पर दूर हो परमार्थ से, ना मुक्ति की प्राप्ति करें।।153।। 1. अष्टपाहुड (शीलपाहुड) गाथा-5 2. समयसार (पुण्यपापाधिकार), गाथा-153 संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान

अर्थात् चारित्र हीन ज्ञान निरर्थक है, सम्यग्दर्शन (परिणाम) के बिना लिंग-ग्रहण अर्थात् नग्न दिगम्बर दीक्षा लेना निरर्थक है और संयम बिना तप निरर्थक है।

शील-तप को करते हुए भी, व्रत-नियम को धारण करते हुए

भी जो जीव परमार्थ (शुद्ध परिणाम) से बाह्य हैं, उन्हें निर्वाण की प्राप्ति नहीं होती है।

इसप्रकार अन्तरंग परिणामों के बिना केवल बाह्य क्रिया, संयोग कुछ भी कार्यकारी नहीं हैं।

निदान बंध केवल संयोग दे सकता है, परिणाम नहीं और संयोगों का मोक्षमार्ग में किंचित् मात्र भी स्थान नहीं है; इसलिए संयोगों की चाह संसार का ही कारण है और दुःख देने का प्रबल साधन है।

प्रश्न :- मोक्ष के कारणभूत प्रशस्त भावों में कर्मों का नाश, बोधि की प्राप्ति इत्यादि की भावना कर सकते हैं - ऐसा कहा था। बोधि अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र है तथा सम्यक्चारित्र में ही संयम दशा, मुनिचर्या आती है। फिर सम्यक्चारित्र की भावना कर सकते हैं और संयम दशा, मुनिचर्या की नहीं - दोनों में ऐसा अंतर क्यों ? उत्तर :- पहली बात तो यह है कि संयम दशा, मुनिचर्या धारण करने का निषेध नहीं है; परंतु तत्संबंधी इच्छारूप निदान का निषेध है। दूसरी बात यह है कि सम्यक्चारित्र दो प्रकार का होता है- 1) निश्चय सम्यक्चारित्र

  1. व्यवहार सम्यक्चारित्र

अभ्यन्तर तीन कषाय चौकड़ी के अभाव पूर्वक प्रकट हुई वीतराग परिणति का नाम निश्चय सम्यक्चारित्र है। ऐसे निश्चय सम्यक्चारित्र के निदान का स्वरूप

साथ जो बाह्य में मुनिदशा (द्रव्यलिंग) होती है, वह व्यवहार चारित्र है। हम अल्पज्ञ जीव निश्चय चारित्र को देख नहीं सकते हैं, मात्र बाह्य में दिखने वाली मुनिदशा (द्रव्यलिंग) को ही देख सकते हैं; इसलिए यहाँ केवल बाह्य में दिखने वाली मुनिदशारूप व्यवहार चारित्र को ही उपचार से प्रशस्त निदान में कहा है।

निश्चय चारित्र का मोक्ष के साथ अविनाभाव संबंध है; परंतु व्यवहार चारित्र का नहीं अर्थात् निश्चय चारित्र के होने पर मोक्ष होगा ही होगा और निश्चय चारित्र के अभाव में नियम से मोक्ष नहीं होगा तथा व्यवहार चारित्र के नहीं होने पर मोक्ष नियम से नहीं होगा; परंतु व्यवहार चारित्र (बाह्य मुनिदशा) के होने पर मोक्ष हो भी सकता है और नहीं भी; इसलिए व्यवहार चारित्र का मोक्ष के साथ अविनाभाव संबंध नहीं है।

जब बोधि कहते हैं तब निश्चय सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान के साथ निश्चय-चारित्र का ग्रहण करना चाहिए और जब संयम दशा, मुनिचर्या कही जाती है, तब व्यवहार-चारित्र का ग्रहण करना चाहिए। प्रश्न :- इसका अर्थ यह हुआ कि जो अभ्यंतर सहित बाह्य

मुनिदशा है, उसकी अभिलाषा कर सकते हैं क्या?

उत्तर :- नहीं ! अभ्यंतर कारणों की तो बहिरंग कारणों के साथ व्याप्ति है; परंतु बहिरंग कारणों की अभ्यंतर कारणों के साथ व्याप्ति नहीं है अर्थात् अभ्यंतर कारणों के होने पर बहिरंग कारण होंगे ही; परंतु बहिरंग कारणों के होने पर अभ्यंतर कारण होंगे ही - ऐसा आवश्यक नहीं है तथा कार्य सिद्धि तो अभ्यंतर कारणों से ही होती है। अभ्यंतर कारणों के मिलने पर बहिरंग कारण का मिलना तो

कषाय का कारणभूत प्रशस्त निदान

सहज ही है; इसलिए केवल मोक्ष के साथ अविनाभाव संबंध रखने वाले अभ्यंतर कारणों की ही प्रार्थना करनी चाहिए, बहिरंग कारणों की नहीं। तात्पर्य यह है कि अत्यंत मंद कषायरूप प्रशस्त परिणामों सहित बिना किसी स्वार्थ भावना के जो मोक्ष के अविनाभावी नहीं हैं; ऐसे संयोगों की चाह करना, संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान है। जो किंचित् दुःख को देने वाला होने से त्याज्य ही है।

इसप्रकार निदान के इस दूसरे भेद का स्वरूप, कारण के प्रकार, संसार का कारणभूत किसे कहना ? इसमें होने वाले जीवों के परिणामों का स्तर व इसकी हेयता को अनेक तर्क-युक्ति व आगम के आधार से समझा। 3) कषाय का कारणभूत अप्रशस्त निदान :-

माणेण जाइकुलरूवमादि आइरियगणधरजिणत्तं ।

सोभग्गाणादेयंपत्थंतो अप्पसत्थं तु ।।1211।।

मान कषाय के वश जाति, कुल, रूप आदि तथा आचार्य पद,

गणधर पद, जिनपद, सौभाग्य, आज्ञा, आदेय आदि को प्राप्त करने की प्रार्थना करना (कषाय का कारणभूत) अप्रशस्त निदान है।

निदान के इस तीसरे भेद में मानादि कषायों के वशीभूत होकर इच्छा की जाती है; इसलिए इसे कषाय का कारणभूत कहा है।

कलुषित अभिप्राय के पोषण हेतु अशुभ परिणाम होने से अप्रशस्त कहा तथा उक्त संयोगों को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होने से निदान कहा है। परिभाषा में आया ‘मान’ शब्द कषायों के प्रतिनिधि के रूप में है अर्थात् इस मान शब्द से क्रोध, माया, लोभ, हास्यादि सर्व कषायों का ग्रहण करना चाहिए। जैसे - क्रोध कषाय के वश, माया कषाय के 1. भगवती आराधना, गाथा-1211

निदान का स्वरूप

वश, लोभ कषाय के वश, हास्य कषाय के वश, रति कषाय के वश आदि से उत्तम जाति इत्यादि की प्रार्थना करना, कषाय का कारणभूत अप्रशस्त निदान है।

यहाँ प्रश्न हो सकता है कि कषायों में तीन वेदरूप नोकषाय तो भोग के कारण हैं। फिर यहाँ अभिमान शब्द से सर्व कषायों का ग्रहण कैसे किया जा सकता है?

समाधान :- मूल में तीनों वेद कषायरूप हैं; अतः वेद भी कषाय के कारणभूत अप्रशस्त निदान में कारण हैं।

भोगों में भी वेदों की प्रवृत्ति देखी जाती है - इसका अर्थ यह है कि वेद कषाय और भोग दोनों में ही कारण बनते हैं; इसलिए जब कषाय की मुख्यता होगी, तब वेदों को कषायों का कारण कहा जाएगा और जब भोग की मुख्यता होगी, तब वेदों को भोगों का कारण कहा जाएगा। यहाँ कषायों की मुख्यता होने से सर्व कषायों में तीनों वेदों का भी ग्रहण किया है।

कषाय प्रति समय होती हैं; परंतु भोग प्रति समय नहीं होते हैं, इसलिए भी वेदों का प्रथम ग्रहण कषायों में ही होगा।

इसप्रकार अभिमान शब्द से सर्व कषायों का ग्रहण करना चाहिए। प्रश्न :- यदि यहाँ सर्व कषायों का ही ग्रहण करना था तो क्रोधादि शब्द का प्रयोग करना चाहिए था; क्योंकि लगभग सर्वत्र क्रोध कषाय का प्रथम प्रयोग किया जाता है और प्रतिनिधि के रूप में भी क्रोध कषाय को ही रखा जाता है। फिर यहाँ मान कषाय का प्रयोग क्यों किया ? उत्तर :- क्रोधादि चारों कषाय चारों ही गतियों में होती हैं, तथापि प्रत्येक गति में किसी एक कषाय की मुख्यता देखी जाती है। कषाय का कारणभूत अप्रशस्त निदान

जैसे – तिर्यंच गति में माया की, नरक गति में क्रोध की, मनुष्य गति में मान की और देव गति में लोभ की मुख्यता देखी जाती है। आचार्य देव के समक्ष मनुष्य गति के जीव बैठे हुए थे; अतः उन्होंने मनुष्यों को समझाने के लिए मान कषाय का आधार लिया। यहाँ एक प्रश्न सम्भव है कि मनुष्य में तो क्रोध, माया, लोभ, हास्यादि सर्व कषायों की बहुलता पाई जाती है। अपना पूरा जीवन धन के लोभ में लगा देते हैं और गोम्मटसार जीवकाण्ड में लिखा भी है कि ‘मनुष्य और तिर्यंच गति में लोभ कषाय का काल सर्वाधिक होता है और सबसे कम काल मान कषाय का होता है’’ फिर मान कषाय की ही मुख्यता क्यों कही ?

समाधान :- जहाँ गोम्मटसार ग्रंथ में काल की अपेक्षा लोभ कषाय की मुख्यता कही, वहीं गोम्मटसार जीवकाण्ड की टीका जीवतत्त्व प्रदीपिका में द्वितीय सिद्धांत ग्रंथ कषायप्राभृत के अनुसार प्रथम समय की अपेक्षा मनुष्य गति में मान की मुख्यता कही है, जो इसप्रकार है- नारकतिर्यग्नरसुरगत्युत्पन्न - जीवस्य तद्भव-प्रथमकाले - प्रथमसमये यथासंख्यं क्रोधमायामानलोभकषायाणामुदयः स्यादिति नियमवचनं कषायप्राभृत-द्वितीयसिद्धांत-व्याख्यातुर्यतिवृषभाचार्यस्य अभिप्रायमाश्रित्योक्तं । वा-अथवा महाकर्म प्रकृतिप्राभृत- प्रथमसिद्धांतकर्तुः भूतवल्याचार्यस्य अभिप्रायेणानियमो ज्ञातव्यः। प्रागुक्तनियमं बिना यथासंभवं कषायोदयोऽस्तीत्यर्थः।

अर्थ :- नरक, तिर्यंच, मनुष्य व देव में उत्पन्न हुए जीव के प्रथम समय में क्रमशः क्रोध, माया, मान व लोभ का उदय ही होता है। 1.

  • अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -

:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 1028.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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