आगम के आलोक में... निदान का स्वरूप — जैन स्वाध्याय सामग्री | Aagam Ke Aalok Mein... Nidan Ka Swaroop

आगम के आलोक में… निदान का स्वरूप

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

प्रस्तुत ‘निदान का स्वरूप’ कृति की विशेषताएँ

  1. निदान के संपूर्ण स्वरूप को बताने वाली यह प्रथम कृति है।
  2. प्रस्तुत कृति में निदान क्या है? ‘निदान’ शब्द का अर्थ, परिभाषा, भेद-प्रभेद, फल, पुराण-ग्रंथों के कथनक, इससे होने वाली हानियाँ व इसके स्वरूप को जानने से लाभ इत्यादि विषयों का विशद एवं विस्तृत वर्णन किया गया है।
  3. विषय को पढ़ने समय जो जिज्ञासामय मन में उत्पन्न होती हैं, लेखक द्वारा स्वयं ही प्रश्नोत्तरों के माध्यम से उनका तर्कपूर्ण एवं आगम सम्मत समाधान प्रस्तुत किया गया है।
  4. अनेक स्थानों पर एक ही विषय के संबंध में आचार्यों के विभिन्न कथन प्राप्त होते हैं, वहाँ उन सभी कथनों का तर्क-युक्ति सहित आगम सम्मत समन्वय स्थापित किया गया है।
  5. प्रत्येक प्रकरण के अंत में निष्कर्ष व तात्पर्य भी दिया गया है, जिससे संपूर्ण प्रकरण सरलता से समझ में आ जाता है।
  6. प्रत्येक विषय को अनेक आगम प्रमाणों के साथ स्पष्ट किया गया है, जिससे प्रामाणिकता संबंधी संदेह दूर हो जाता है; इसीलिए प्रस्तुत कृति का नाम भी ‘आगम के आलोक में… निदान का स्वरूप’ रखा गया है।
  7. विस्तार की अपेक्षा रखने वाले विषयगत विषय को परिशिष्ट में दिया गया है।
    इसप्रकार उक्त विशेषताओं सहित यह कृति है। निदान का सर्वांगीण स्वरूप जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।

आगम के आलोक में…
निदान का स्वरूप

लेखक :
पण्डित अमन जैन शास्त्री, लोनी
शास्त्री, शिक्षाशास्त्री

प्रकाशक :
पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट
ए-4, बापू नगर, जयपुर-302 015
फ़ोन : 0141-2707458, 2705581
E-mail: [email protected]

1

निदान का स्वरूप
पण्डित अमन जैन शास्त्री

प्रथम संस्करण : 1000
(दिनांक 22 दिसम्बर 2022)
श्री शीतलनाथ भगवान को ज्ञान कल्याणक

मूल्य : 25 रुपये

ISBN 978-93-91136-30-7

प्राप्ति स्थल : पण्डित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर
ए-4, बापू नगर, जयपुर-302015
फ़ोन : 0141-2707458, 2705581

प्रस्तुत संस्करण की कीमत कम करने वाले दानों की सूची

  1. पण्डित जिनकुमारजी शास्त्री, जयपुर (उपाचार्य) 1111/-
  2. श्रीमती अनुभूति-अनुभव जैन शास्त्री, झालावाड़ 1111/-
  3. श्रीमती प्रतीक्षा-अकलंक जैन, लोनी 1111/-
  4. श्री देवेश शास्त्री पृथ्वी देवपाल सेठ, अम्बाक 1111/-
  5. पण्डित हर्ष, अभिषेक शास्त्री, फुटेरा 1100/-
  6. श्रीमती तरुणा-सचिन जैन, दिल्ली 1000/-
  7. पण्डित अखिल शास्त्री, खंदियाना 500/-
  8. पण्डित तरुण शास्त्री, दिल्ली 500/-
    कुल योग : 7,544/-

लेखक की अन्य महत्वपूर्ण कृति
‘समवशरण रचना वर्णन’
एक बार अवश्य पढ़ें।

मुद्रक : देशाना कम्प्यूटर्स
आगरा रोड, जयपुर

2

विषयानुक्रमणिका

क्र. विषय
पृष्ठ

  • प्रास्ताविक
    4
  • शुभाशीष - डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल
    5
  • अपनी बात
    7
  • मंगलाचरण - सरोजिन जैन शास्त्री, ईसगढ़
    9
  1. निदान का सामान्य स्वरूप
    11
  2. विभिन्न दृष्टियों से ‘निदान’ शब्द का अर्थ
    12
  • शब्दकोशों के अनुसार…
    13
  • शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार…
    14
  • दार्शनिक दृष्टिकोण के अनुसार…
    15
  1. जिनागम में प्राप्त - ‘निदान’ शब्द
    16
  • शास्त्र के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग
    16
  • ध्यान के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग
    22
  1. निदान शब्द और निदान आयतन में अंतर
    23
  2. निदान बंध
    25
  3. निदान की परिभाषाएँ
    28
  • इच्छा
    33
  • अति-आसक्ति पूर्वक निरंतरता
    36
  • भौतिक सुख
    40
  • आगामी काल
    44
  1. निदान के भेद-प्रभेद
    49
  • मोक्ष का कारणभूत प्रशस्त निदान
    50
  • संसार का कारणभूत प्रशस्त निदान
    58
  • कषाय का कारणभूत अप्रशस्त निदान
    69
  • भोग का कारणभूत अप्रशस्त निदान
    94
  1. निदान बंध का फल
    103
  2. निदान से होने वाली हानियाँ
    108
  3. निदान के स्वरूप को जानने से लाभ
    118
  4. परिशिष्ट-1 (कुछ बंधी प्रकृतियाँ)
    120
  5. संदर्भित ग्रन्थ
    122
  6. विद्वानों के अभिमत
    125

प्रकाशकीय

सत्‌साहित्य का प्रकाशन पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट की एक प्रमुख गतिविधि है और सरल वर्तमान भाषा में लिखित ज्ञानोपयोगी, रुचिकर और आत्मकल्याण में सहायक, प्रामाणिक साहित्य का प्रकाशन हमारा लक्ष्य है।

युवा विद्वान अमन शास्त्री की कृति ‘निदान का स्वरूप’ का प्रकाशन इसी श्रृंखला की एक कड़ी है।

समाज में ऐसे लोग कम ही हैं, जिन्होंने निदान बंध का नाम भी सुना है, जो इसका मतलब समझते हैं और यह जानते हैं कि निदान एक आत्मघात का भेद है, बंध का कारण है, हमारी हित के विरुद्ध है और मुनिमार्ग में बाधक है।

अन्य दर्शनों में तो इसप्रकार के परिणामों (निदान संबधी) को अच्छा और उपादेय माना जाता है, सभी लोग अपने इष्टदेव के सामने अपनी इच्छाएँ प्रकट कर उन्हें पूरी करने की प्रार्थना करते हैं, मन्नत मांगते हैं। इसी को उनकी आक्रांतता (धार्मिक होना) माना जाता है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि आकांक्षाएँ मात्र बंध का कारण है, हेय है। यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।

विद्वान लेखक ने समाज के साथ निदान के शाब्दिक, उसकी व्युत्पत्ति, निदान शब्द का लोक में प्रचलित अर्थ और जिनागम के परिप्रेक्ष्य में उसके विशिष्ट अर्थ का स्पष्टीकरण करते हुए यथासंभव आगम में उपलब्ध सभी कथनों को उद्धृत किया है।

पूज्य दादा डॉ. हुकमचंदजी भारिल्ल द्वारा इस कृति का श्रवण और इसके प्रकाशन की स्वीकृति प्रदान करना इस कृति की उपयोगिता का सूचक है।

डॉ. शान्तिकुमारजी पाटील द्वारा इसका अवलोकन, मुद्रण और प्रकाशन में डॉ. अखिल बंसल के और टंकण में अखिल जैन शास्त्री के योगदान के लिए हम उनको धन्यवाद ज्ञापित करते हैं।

शोधपरक शैली में रचित यह रचना निश्चित ही हम सभी को निदान का स्वरूप समझने में सहायक होगी और हम सभी आत्मार्थियों का मार्गदर्शन करेगी।

22 नवम्बर 2022
पंडित टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर
कार्यकारी महामंत्री

शुभकामनाएँ

‘निदान’ यह एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनते ही अनेक प्रकार की जिज्ञासाएँ होती हैं कि निदान क्या है? निदान बंध कैसे होता है? हमें भी होता है अथवा? अथवा निदान बंध करने से नुकसान है या फायदा? न जाने निदान के संबंध में ऐसे कितने प्रश्न उत्पन्न होते हैं। कई बार तो निदान का वास्तविक स्वरूप नहीं समझपाने के कारण अनेक प्रकार की भ्रांतियाँ भी उत्पन्न होती रहती हैं।

‘निदान’ वास्तव में तो ‘आगामी काल में भौतिक सुख की प्राप्ति के लिए अति आसक्त होना है।’ इसप्रकार की अनेक चर्चायें तर्क-युक्तियों व आगमाधार से लिखी गई इस कृति में पढ़ने को मिलेंगी।

यद्यपि जिनागम में प्रसंगानुसार यथास्थान निदान का स्वरूप प्राप्त होता है; परन्तु अभी तक ऐसी पुस्तक देखने में नहीं आई, जिसे पढ़कर पाठकों को निदान का स्वरूप पूरी तरह से स्पष्ट हो जाए।

चि. अमन जैन शास्त्री, लोनी ने ‘निदान का स्वरूप’ नामक कृति प्रस्तुत कर उस कमी की पूर्ति की है।

यह एक प्रामाणिक रचना है। इसे हमारे महाविद्यालय के अभीक्षक अमन जैन ने बहुत ही श्रम से तैयार किया है। मैंने इस कृति की विषय-वस्तु को इस कृति के लेखक अमन जैन के मुख से ही शब्दशः सुना है तथा यथास्थान अपेक्षित सुधार भी कराए हैं। वे करुणायोग के रुचिवंत विद्वान हैं, इनके द्वारा पूर्व में लिखी गई ‘समशरण रचना वर्णन’ नामक पुस्तक भी मैंने पढ़ी है।

निदान का स्वरूप जानने की जिज्ञासा रखने वाले धर्मप्रेमी भाई-बहनों को इसका स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए।

20 सितम्बर 2022
डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल
महामंत्री

पुरोवाक्

सामान्य तौर पर निदान शब्द का प्रयोग रोग के निदान (उपाय) के अर्थ में किया जाता है; लेकिन जिनागम में इस शब्द का प्रयोग मुख्यरूप से निदान शल्य, निदान आर्त्तध्यान व निदान बंध के रूप में अनेक स्थानों पर किया गया है। अनेक स्थानों पर विषयांतर के रूप में निदान का विषय पढ़ने को मिलता है, जिसे पढ़ते समय सहज ही अनेक जिज्ञासाएँ चित्त में बनी रहती है, साथ ही उस विषय संबंधी भी विस्तृत विवेचना वहाँ प्राप्त नहीं होती है। ऐसी स्थिति में आगम का आलोड़न कर इन सभी का सांगोपांग, आगम-प्रमाण, तर्क-युक्ति व दृष्टांत सहित विस्तृत विवेचन करने का प्रशंसनीय कार्य प्रिय अमन शास्त्री ने किया है - इसका मुझे बहुत ही हर्ष है।

निदान से संबंधित सम्पूर्ण विषयों को इस पुस्तक में इसप्रकार से प्रस्तुत किया गया है, जिससे स्वाध्यायियों की तत्संबंधी समस्त जिज्ञासाओं का सहज ही समाधान हो जाता है। इस विषय संबंधी जिज्ञासा के समाधान हेतु एकैषय यह कृति ही पर्याप्त है।

अल्पवय में गहन अध्ययन कर विशिष्ट विषय को व्यवस्थित पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करना, विशिष्ठ प्रतिभा के बिना संभव नहीं है। इससे पूर्व भी समवशरण संबंधी ऐसा ही सफल प्रयास आपने किया है। इसीप्रकार जिनावाणी के अध्ययन-मनन-चिंतन में संलग्न रहकर ऐसे ही अप्रचलित विषयों को साधर्मियों से परिचित कराते रहें - यही मेरी हार्दिक शुभकामना है।

25 सितम्बर 2022
डॉ. शान्तिकुमार पाटील
प्राचार्य
श्री टोडरमल दि. जैन सि. महाविद्यालय, जयपुर

अपनी बात

दशलक्षण पर्व के समय 2018 में सिरोंज जाना हुआ था। वहाँ समाज में प्रवचन करने के उपरांत एक दादाजी ने अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहा “काश! हम भी पुरुष होते… तो भगवान के प्रशाल करने का महा-सौभाग्य प्राप्त हो जाता।” तब सहसा ही मैंने कहा - “ऐसी भावना नहीं भाही चाहिए; क्योंकि वर्तमान में ऐसे अनेक पुरुष हैं, जो किसी कारणवश बिना मन के जबरदस्ती भगवान का प्रशाल करते हैं। कदाचित् उन्होंने भी पूर्व में ऐसी ही भावना भाई होगी, जिसके फल स्वरूप उन्हें आज ऐसे संयोग तो मिले हैं; परंतु वर्तमान परिणामों के अभाव में जबरन् काम करके दुःखी ही होना पड़ रहा है।”

मैंने इस प्रसंग के पूर्व कभी निदान का वर्णन नहीं पढ़ा था, मात्र निदान शब्द सुना था; तथापि पूर्वाभ्यास के बल से ऐसे विचार व्यक्त हो गए।

जब शास्त्री का अध्ययन पूर्ण हुआ। तब भगवती आराधना का स्वाध्याय करना प्रारंभ किया। जिसमें अनेक स्थानों पर निदान के संबंध में विषय-वस्तु प्राप्त हुई। साथ ही निदान का स्वरूप भी थोड़ा-सा स्पष्ट होने लगा था। इसी के आधार से मैंने दीपावली के अवकाश के समय पंडित टोडरमल स्मारक भवन में इसी विषय के ऊपर प्रवचन किए। तब वहाँ आ. बा. ब्र. कल्पना दीदी भी उपस्थित थीं। प्रवचन के उपरांत उनसे चर्चा होती थी, जिसमें वे कुछ गलतियाँ व कुछ नवीन प्रयोगों की ओर मेरा ध्यान आकर्षित किया करती थीं।

कालांतर में कोविड-19 के चलते लॉकडाउन लग गया। जिसमें मूलाचार ग्रंथ का विशेष अध्ययन हुआ। इसमें भी कुछ स्थानों पर निदान का वर्णन पढ़ने को मिला। इसप्रकार अनेक ग्रंथों के माध्यम से निदान का लगभग सम्पूर्ण स्वरूप मेरे चित्त में स्पष्ट हो चुका था। जिसे मैंने और भी अधिक व्यवस्थित करने के लिए लिखने का विचार बनाया। लिखने समय मात्र स्वानुभव जैन, खानियाँधाना और विचारित भैया, खानियाँधाना से भी चर्चा-वार्ता होती रहती थी। जिससे यह विषय और भी अधिक खुलकर सामने आया है।

निदान का सम्पूर्ण वर्णन लिखने के पश्चात आ. छोटे दादाजी (डॉ. हुकमचन्दजी भारिल्ल) को सम्पूर्ण लेखन शब्दशः सुनाया। तब आ. छोटे दादाजी ने मेरा कुछ विशेष बिंदुओं की ओर भी आकर्षित करवाया। साथ ही उन्होंने मेरा उत्साहवर्धन करते हुए कहा- “सम्पूर्ण वर्णन को एक ही स्थान पर व्यवस्थित करके बहुत अच्छा कार्य किया।”

विषय में किसी भी प्रकार की भूल का कभी न रह जाए। इसके लिए इस सम्पूर्ण वर्णन को आ. बा. ब्र. सुमात्रप्रकाशजी (खानियाँधाना), आ. बा. ब्र. कल्पना दीदी, डॉ. संजीवकुमारजी गोधा, डॉ. शान्तिकुमारजी पाटील, डॉ. अरुणजी बड़, डॉ. ज्योतिजी सेठी आदि विद्वानों ने पढ़कर शुद्ध किया है। आप सभी के सहयोग व निर्देशन में ही यह कार्य पूर्ण हो सका; अतः आप सभी को हृदयतल से कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। आ. परमात्मप्रकाशजी भारिल्ल का भी बहुत-बहुत आभार, जिन्होंने इस कृति को टोडरमल स्मारक ट्रस्ट से प्रकाशित करने की अनुमति प्रदान की।

अंत में ‘कौन न विमुह्यति शास्त्रदृष्टे’ के अनुसार श्रुत-सेवा के इस स्वतः सुकार्य में कोई अज्ञात-प्रमाद वश भूल रह गई हो तो सभी सुधी जनों से अनुरोध है कि इस ओर ध्यान आकर्षित कराएँ।

इस ‘निदान का स्वरूप’ कृति का सभी जन अध्ययन कर विकल्प-जाल से छूटकर आत्मस्थ हों। आत्मन्! आत्मनि तिष्ठ।।

25 सितम्बर 2022
पं. अमन जैन शास्त्री, लोनी

मंगलाचरण

(दोहा)
इच्छा वांछा सों रहित, है निरभय जिनराज।
जन स्वरूप निदान का, हो निरमोह’ हम आज।।1।।

(कवित्त मनहर)
आगरा तो है दुःख दानी, इच्छा करे बहु हानी,
मोह में लिपट-कर जीव क्लेश पाय है।
सन्त नहीं चित्त होवे, चिंता के भरम रोवे,
देन को पुण्य खोवे, माया चकराय है।
भोग रोग के समान कोहे न ये बात जाना।
जे निदान भलो ज्ञान, हान ही कराय है।
ये भी चाहा, वो भी चाहा-कछु मिलो पुण्य नाह,
स्व-पर सतायै नर जीवन गवाय है।।2।।
कोई जन चाहे, कोई जन धन चाहे,
सरहदि के जीवन में मदी हाय-हाय है।
पुण्य योग इष्ट भयो, पाप में अनिष्ट भयो,
कल-कल चाहत में आज को गवाय है।
प्रतिपल मारै काँटा, जैसे - पीर देन काँटा,
फिर भी उलझ ताँटा काहे घबराय है।
हल कछु होत नहींह, सोच! जब अंत आहि,
निदान करत नर जीवन दहाये है।।3।।

  1. इच्छा से रहित
  2. पीड़ा

निदान का स्वरूप

भोग रोग सम जान, कष्ट पीर की खदान।
फिर सुख हेतु कहे तिनको सम्भार?
माँगने से नाहिं मिले, मन मरजी न चले,
मन को बने यदि, सो नैक-सी फुहार है।
अब नहीं सही जात, भव दुःख अंडज्ञात,
बस एक चाह साँचि सुख की पुकार है।
साँचो सुख पायो जिन, मम कर-दोउ तिन,
भये जो निरति ‘समकित’ की जुहार है।।4।।
(दोहा)
आत्मास्वभाव महान हो, नहीं निदान का काज।
भव्य जीव यह समझकर, पायें सिद्ध स्वराज।।5।।

भव्य बिना कछु हाथ न आवै।

इन्द्र नरेन्द्र फणीन्द्रन के सुख, भोगन को नित जी ललचावै,
केवल ज्ञान कछु करूँ बिराम, सदा मम नाम सिहूँ जग छावै।
नूतन भोग शरीर निरोग, न इष्ट वियोग न रोग सतावै,
यों दिन रात विचार करे पर, भव्य बिना कछु हाथ न आवै।।
मात पिता सुत नारि सहोदर, छोड़ि विदेश कमावन जावै,
काटत काष्ठ पाठ लगावत, लगावत हाट कमावै बनावै।
कृत्य कुकृत्य करे बनि भृत्य, दिखावत नृत्य बजाय रिझावै,
यों तृष्णावश मूढ़ फिरै पर, भव्य बिना कछु हाथ न आवै।।

  • भव्य प्रमोद, पृ.30, माखनलालजी

निदान का स्वरूप

जिनधर्म का आधार वस्तु-स्वभाव, वीतरागता और सर्वज्ञता है।
देव को आदर्श बनाकर शास्त्र की स्यात् पद मुद्रा के माध्यम से निर्ग्रन्थ
गुरु सदैव ही वस्तु स्वरूप का आश्रय लेकर वीतरागता की वृद्धि करते
हैं। मुनिराजों की यह सिद्धी सम अवस्था स्वाधीन, स्वतंत्र व सहज
होती है। अभ्यंतर-बहिरंग से निरंतर समता रस झरता रहता है।

पूज्य मुनिराज निदान भावों का अभाव करके ही इस दशा को
प्राप्त करते हैं। निदान का नाश किए बिना इस सहज दशा की प्राप्ति
अशक्य है; क्योंकि जब तक चित्त में निदान भाव उत्पन्न होते रहेंगे,
तब तक मुनिराज अपना उपयोग अपने में एकाग्र नहीं कर सकते हैं।
तत्त्वतः, एकाग्रता तो निदान में भी होती है; परंतु वह
एकाग्रता पर पदार्थों में अति तीव्र आसक्ति पूर्वक होती है; अतः यह
निदान अनंत संसार का कारण है।

जैसे किसी ग्राहक को कोई वस्तु अतिप्रिय है और वह उस वस्तु
की प्राप्ति किसी भी कीमत पर करना चाहता है। ग्राहक की इस अतिप्रिय
अभिलाषा को देखकर दुकानदार उस वस्तु को लागत मूल्य से कई गुने
अधिक मूल्य में देता है और आश्चर्य तो तब होता है, जब ग्राहक उस
अल्प मूल्य वाली वस्तु को अधिक मूल्य देकर भी खरीदता है।

वैसे ही यह किसी वस्तु की अति आसक्ति पूर्वक चाहता है।
हमारी इस अति आसक्ति को देखकर कर्मरूपी दुकानदार उस वस्तु
(विषय-कषाय, भोग-संयोग) को लागत मूल्य से करोड़ों गुने अधिक

विभिन्न दृष्टिकोणों से ‘निदान’ शब्द का अर्थ

निवृत्ति और निकार्य रूप कर्मव्यवस्था

  1. दार्शनिक दृष्टिकोण से ‘निदान’ शब्द का अर्थ - इच्छा।
  1. शब्दकोश के अनुसार - निदान अर्थात् कारण, परिणाम,
    हेतु। जैसे लोक में कहा जाता है कि रोग का निदान बताओ, अर्थात् रोग
    का कारण बताओ। वैसे ही यहाँ कर्म बंधन के कारणों को निदान शब्द
    से कहा गया है।

इसी ‘कारण’ अर्थ को बताने के लिए पंडित टोडरमलजी ने
मोक्षमार्ग प्रकाशक ग्रन्थ में निदान शब्द का प्रयोग किया है। ‘कर्म
बंधन का निदान’ नामक शीर्षक के अंतर्गत कर्म बंधन में क्या कारण
हैं और क्या नहीं हैं? इत्यादि विषय का वर्णन किया है।

इस ‘कारण’ अर्थ को ही माधवकर कुछ अन्य शब्दों में
इसप्रकार कहते हैं-
‘निदानमाहुः पर्यायैः प्राच्यं येन लभ्यते।’ अर्थात् जिससे पर्यायों
के माध्यम से पूर्व रूप का लक्ष्य लिया जाता है, उसे निदान कहते हैं। (जो
पर्यायों के माध्यम से पूर्व रूप का लक्ष्य होता है, उसे निदान कहते हैं)

वर्तमान में पर्यायस्वरूप कार्य को देखकर पूर्व में किए गए कारणों
का लक्ष्य करना निदान है। जैसे - जगत जन कहते हैं कि पूर्व में ही ऐसे
कुछ काम किए होंगे, जिनके फल में आज ऐसे संयोग मिले हैं। यहाँ
हम वर्तमान पर्याय को देखकर पूर्व में किए हुए अच्छे-बुरे कार्यों का
अनुमान लगाते हैं, जो वर्तमान पर्याय के होने में कारण हैं। इस अर्थ के
अनुसार कर्म बंधन में जो भी कारण बनते हैं, वे सभी कारण निदान हैं।

आचार्य उमास्वामी देव तत्त्वार्थसूत्र के आठवें अध्याय के
प्रथम सूत्र में बंध के हेतुओं को बताते हुए लिखते हैं कि-

निदान का स्वरूप

मिथ्यादर्शनाविरति-प्रमाद-कषाय-योग बंधहेतवः।।1।।
मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय, योग - ये बंध के 5 हेतु
हैं। उपर्युक्त अर्थ के अनुसार ये सभी बंध के निदान (हेतु) हैं।

सारांश यह है कि बंध के अनेक कारणों को निदान शब्द से
कहा जा सकता है। मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग
से बंध होता है अर्थात् मिथ्यात्वादि बंध के कारण हैं; इसलिए इसे ऐसा
भी कह सकते हैं कि ये बंध के निदान (कारण) हैं। इसे ही संक्षेप में
निदान बंध कह दिया जाता है।

  1. शब्दव्युत्पत्ति के अनुसार - (नि + दा + ल्युट् = निदान)
    निदान शब्द ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक ‘दा’ धातु से ल्युट् प्रत्यय करके बना
    है। जिसका अर्थ होता है ‘निश्चयेन दीयते अनेन इति निदानम्’ अर्थात्
    जिसके द्वारा निश्चितरूप से दिया जाता है, उसे निदान कहते हैं।

यद्यपि इस व्युत्पत्ति के अनुसार जगत में निदान का अर्थ
‘कारण’ ही किया जाता है; क्योंकि कारण के मिलने पर कार्य निश्चित
रूप से होता ही है; तथापि जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में निदान का अर्थ
‘निवृत्ति और निकार्य रूप कर्म अवस्था’ भी किया जा सकता है;
क्योंकि निवृत्ति और निकार्य रूप कर्मव्यवस्था में संक्रमण, अपकर्षण,
उत्कर्षण आदि की व्यवस्था नहीं होती है। ये अपना फल निश्चितरूप
से देते ही देते हैं और जो निश्चितरूप से (फल) देता है, उसे ही निदान
कहते हैं; इसलिए यहाँ निदान शब्द का दूसरा अर्थ निवृत्ति और
निकार्य रूप कर्म अवस्था किया है।

शब्द व्युत्पत्ति के अनुसार अर्थ

निवृत्ति-निकार्य कोई कर्म प्रकृति नहीं है; अपितु ये तो
कर्मों की अवस्थाएँ हैं, जो ज्ञानावरणादि आठों ही कर्मों में होती हैं।
इन कर्मों के अंतर्गत अघाति कर्म में पुण्य (प्रशस्त) और पाप
(अप्रशस्त) का भेद देखा जाता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि निवृत्ति-निकार्य अवस्था वाले
कर्म भी पुण्य-पाप - दोनों रूपों में हो सकते हैं; जैसे - उपचार से
तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण, बलभद्र, देवादि गतियाँ
इत्यादि पुण्य प्रकृतियाँ निवृत्ति-निकार्य अवस्थारूप होती हैं और
नरकादि गति इत्यादि पाप प्रकृतियाँ निवृत्ति-निकार्य अवस्थारूप
होती हैं।

जिसप्रकार निदान में निश्चितरूप से फल दिया जाता है, उसीप्रकार
यहाँ उपचार से निवृत्ति-निकार्य अवस्था वाली तीर्थंकरोदि पुण्य
प्रकृतियाँ और नरकादि पाप प्रकृतियाँ निश्चितरूप से फल देती हैं;
इसलिए यहाँ ‘जो निश्चितरूप से फल देता है’ - इस शब्द व्युत्पत्ति के
अनुसार निदान का अर्थ निवृत्ति-निकार्य रूप कर्मव्यवस्था किया है।

ध्यान रखने योग्य बात यह है कि यहाँ मात्र ‘निदान’ इस शब्द
का विभिन्न दृष्टिकोणों से अर्थ बताया जा रहा है। आगे जब आगम में
प्राप्त निदान का अर्थ, स्वरूप बताया जाएगा; वहाँ निदान के फल में
तीर्थंकर पद की प्राप्ति नहीं हो सकती है; परंतु नरकादि आदि पदों की
प्राप्ति हो सकती है इत्यादि विशेष वर्णन किया जाएगा।

  1. गुणर्थिक - आचार्य अमृतचन्द स्वामी ने मूलाचार की
    टीका में निदान शब्द का अर्थ ‘आकांक्षा’ किया है। आकांक्षा अर्थात्
    इच्छा, चाह, आशा, अभिलाषा, तमन्ना इत्यादि।

निदान का स्वरूप

यद्यपि व्याकरण शास्त्र के अनुसार निदान शब्द का अर्थ आकांक्षा, इच्छा नहीं होता है; तथापि प्रत्येक दर्शन (मत) का पृथक् शब्दकोश होता है। जिसमें प्रचलित अर्थ के अतिरिक्त एक पृथक् अर्थ का प्रतिपादन भी किया जाता है। जैसे - लौकिक में 420 यह संख्या भी अन्य संख्याओं के समान ही है; परंतु संविधान की इक संहिता में 420 का प्रयोग धोखा-धड़ी के अर्थ में किया जाता है; वैसे ही जैनदर्शन में निदान शब्द का प्रयोग कारण के अतिरिक्त आकांक्षा, इच्छा के अर्थ में भी किया जाता है।

इसप्रकार निदान शब्द के तीन अर्थ हुए-

  1. कारण
  2. निधति और निफावितरूप कर्म अवस्था
  3. इच्छा (आकांक्षा)

'निदान का स्वरूप इस प्रकरण में निदान शब्द का मुख्य अर्थ इच्छा है। शेष दोनों अर्थ (कारण एवं निधति-निफावितरूप कर्म अवस्था) गौण हैं।

निदान शब्द का प्रयोग जिनागम में दो रूपों में मिलता है। पहला शल्य के रूप में और दूसरा ध्याम के रूप में।

  1. शल्य के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग :-

शल्य - “शोणति दिनस्तीति शल्यम्।” अर्थात् जो कष्ट दे, वह शल्य है। पीड़ा देनेवाली वस्तु शल्य है। शरीर में काँटादि का चुभ जाना शल्य है; क्योंकि जैसे किसी व्यक्ति के पैर में काँटा चुभ जाए, तो उसका पूरा उपयोग काँटे की ओर चला जाता है और जब तक वह काँटा निकलता नहीं है, तब तक उसका उपयोग अन्यत्र लगता भी नहीं है।

  1. मूलाचार टीका (आचारवृत्ति), गाथा-69

शल्य के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग

है; अपितु निरंतर आकुल-व्याकुल होता हुआ महाकष्ट को सहता है।

यही उस काँटे के समान जो पीड़ाकर भाव है, उसे भाव शल्य कहा गया है। किसी के मन में शल्य उत्पन्न हो जाए, तो उसका पूरा उपयोग उस शल्य की ओर चला जाता है और जब तक वह शल्य निकलती नहीं है, तब तक उसका उपयोग अन्यत्र लगता भी नहीं है; अपितु निरंतर ही आकुल-व्याकुल होता हुआ महाकष्ट को सहता है।

जिसप्रकार काँटादि शल्य प्राणियों को कष्ट देने वाली होती है, उसीप्रकार शरीर और मन संबंधी बाधा का कारण होने से कर्मोदय जनित विकार में भी शल्य का उपचार कर उसे (कर्म को) भी (द्रव्य) शल्य कहते हैं।

तात्पर्य यह है कि जो मन में काँटे के समान चुभे, निरंतर सतावे, तीर के समान घाव पैदा करे, दुस्सह हो, भदनवृक्ष की छाया में पलते हुए जहर के समान कार्य करे व स्वयं पापरूप हो, उसे शल्य कहते हैं।

जिसप्रकार किसी व्यक्ति के दाँतों में भोजन का कण अटक जाए और जब तक वह कण नहीं निकले, तब तक उसकी जिह्वा निरंतर उसको निकालने का प्रयत्न करती रहती है और अंत में स्वयं ही छिन्न-भिन्न होकर महा-व्याकुल होती है।

इसीप्रकार किसी व्यक्ति के मन में मिथ्या, माया, निदानरूप शल्य अटक जाए या उत्पन्न हो जाए और जब तक वह शल्य नहीं निकले, तब तक उसका उपयोग शांति से नहीं बैठना; अपितु निरंतर ही उस शल्य को पूर्ण करने का अथवा निकालने का प्रयत्न करता रहता है और अंत में स्वयं ही अनेक कष्टों को सहता हुआ मूढ़ होता है।

ऐसी महा कष्टदायक शल्य - भाव और द्रव्य के भेद से 2

  1. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-26

निदान का स्वरूप

प्रकार की है’-

  1. भाव शल्य
  2. द्रव्य शल्य
    भाव शल्य तीन प्रकार की है-
  3. मिथ्या शल्य
  4. माया शल्य
  5. निदान शल्य
    मिथ्या शल्य भी 3 प्रकार की है-
  6. दर्शन शल्य
  7. ज्ञान शल्य
  8. चारित्र शल्य
    आचार्य अपराजित सूरि ने शल्य के इन 3 भेदों को दो रूपों में बताया है।
  1. मिथ्या, माया और निदान के रूप में,
  2. दर्शन, ज्ञान और चारित्र के रूप में;

चित्र: भाव, द्रव्य, मिथ्या, माया, निदान, द्रव्य कर्म, नो कर्म, दर्शन, ज्ञान, चारित्र, संचित, अचित, अभिन्न, भिन्न

यह थोड़ा गहराई से विचार करें तो शल्य के दर्शन-ज्ञान-चारित्र ये तीनों प्रकार मिथ्या शल्य को ही बतलाते हैं; अतः यहाँ दर्शन-ज्ञान-चारित्र को मिथ्या शल्य के प्रभेद के रूप में ही कहा है।

मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र शल्य को बताते हुए आचार्य अपराजित सूरि कहते हैं-

  1. यथा सत्य प्रतिज्ञो आचार्यस्तथा तव शास्यसम्यक्त्वाद्या-हेतुत्वात्कदाचित्कः शल्यमित्युच्यते। - सर्वार्थसिद्धि/राजवार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-18
  2. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-540

शल्य के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग

‘सम्यग्दर्शन के निःशंकित आदि 8 गुणों में दोष उत्पन्न करने वाली मिथ्या-दर्शन शल्य है। सम्यग्ज्ञान के अचारिण आदि 8 गुणों में दोष उत्पन्न करने वाली मिथ्या-ज्ञान शल्य है और सम्यक्चारित्र के 8 गुणों में अर्थात् समिति-गुप्ति में अनादर रहित मिथ्या-चारित्र शल्य है।’

भाषा में बगुले जैसा वेश धारण कर लोक को प्रसन्न करना ही माया शल्य है। ‘सम्यग्दर्शन के 8 गुणों में से निःशंकित गुण का घात करने वाली निदान शल्य है।’

प्रश्न :- मिथ्यात्व और मिथ्या शल्य - दोनों एक हैं या इनमें कुछ अंतर है?

उत्तर :- मिथ्यात्व और मिथ्या शल्य दोनों अलग-अलग है। सम्यक्त्व के साथ मिथ्यात्व नहीं हो सकता है (यहाँ मित्र गुणस्थान की विवक्षा नहीं है); परंतु सम्यक्त्व के साथ मिथ्या हो सकती है।

सम्यक्त्व में मिथ्यात्व अनाचार स्वरूप है; परंतु मिथ्या शल्य अनाचार स्वरूप है। मिथ्यात्व तीसरे गुणस्थान पर्यंत होता है; परंतु मिथ्या शल्य चौथे गुणस्थान पर्यंत होती है।

शंका :- क्षायोपशमिक सम्यक्त्व में लगने वाले चल-मल-अगाढ़ दोषों को मिथ्या-शल्य कह सकते हैं क्या?

समाधान :- नहीं! क्षायोपशमिक सम्यक्त्व में लगने वाले चल-मल-अगाढ़ दोषों को मिथ्या-शल्य नहीं कह सकते हैं; क्योंकि क्षायोपशमिक सम्यक्त्व 7वें गुणस्थान तक होता है और उसमें लगने वाले दोष भी 7वें गुणस्थान तक ही होते हैं; परंतु ‘निःशल्यो व्रती’

  1. दमनस्य शल्यं शंकादि। ज्ञानस्य शल्यं अक्रमे पठर्न अविनादिभि च। चारित्रस्य शल्यं समिति-गुप्तीनादरः। योगमया… असंप्रयोगमया। सम्यग्ज्ञानि अंतरात्मविशेषा। निर्विचित्सिमुम्। - भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-540
  2. मूलाचार टीका, गाथा-250
  3. तत्त्वार्थसूत्र, अध्याय-7, सूत्र-18

निदान का स्वरूप

व्रती के शल्य नहीं होती है अर्थात् 5-6-7वें गुणस्थान में किसी भी प्रकार की शल्य नहीं होती है, इसलिए क्षायोपशमिक सम्यक्त्व में लगने वाले चल-मल-अगाढ़ दोषों को मिथ्या-शल्य नहीं कहा जा सकता है।

इसप्रकार माया कषाय और माया शल्य में भी किंचित अंतर का भाव है। यद्यपि आगम में इन दोनों के अंतर के संबंध में विशेष चर्चा नहीं मिलती है; इसलिए यह कहना थोड़ा कठिन है कि कौन-से भाव माया कषायरूप है और कौन-से भाव माया शल्यरूप है; तथापि इतना तो अवश्य है कि दोनों में अंतर तो है। माया कषाय 9वें गुणस्थान तक होती है; परंतु माया शल्य 4थे गुणस्थान तक होती है।

द्रव्य शल्य :- मिथ्यात्व, माया और निदान - इन तीन भाव शल्यों में जो कारण है - ऐसे कर्म द्रव्य-शल्य कहलाते हैं।

यह द्रव्य शल्य भी 3 प्रकार की है-

  1. संचित द्रव्य-शल्य
  2. अचित्त द्रव्य-शल्य
  3. मिश्र द्रव्य-शल्य

‘दासादिक संचित द्रव्य-शल्य है, सुवर्ण आदि पदार्थ अचित्त द्रव्य शल्य है और ग्रामिष्टि मिश्र द्रव्य-शल्य है। ये सभी पदार्थ भाव शल्य में निमित्त होते हैं; अतः इनको द्रव्य-शल्य कहते हैं।’

मूल में कर्म ही द्रव्य-शल्य है। ये भी 2 प्रकार के हैं - द्रव्य कर्म और नोकर्म। द्रव्य कर्म और नोकर्म को द्रव्य-शल्य कहा गया है। ऊपर जिस कर्म को द्रव्य-शल्य कहा था, वह द्रव्य-कर्मरूप है और यहाँ संचित-अचित्त एवं मिश्र - ये 3 द्रव्य-शल्य नोकर्मरूप हैं।

  1. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-541

शल्य के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग

प्रश्न :- ये शल्य किस गुणस्थान तक होती है?

उत्तर :- ‘निःशल्यो व्रती’ सूत्र के अनुसार ये सभी शल्य चौथे गुणस्थान तक होती है; परंतु आचार्य अपराजित सूरि ने भगवती आराधना की विजयोदया टीका में ‘निदान शल्य को सम्यग्ज्ञान नामक पाँचवें गुणस्थान तक और माया शल्य को 7वें गुणस्थान तक ही कहा है।’ परंतु आचार्य विद्यानंद स्वामी ने ‘निदान शल्य को चौथे गुणस्थान तक ही कहा है।’ पाँचवें गुणस्थान में अप्रत्यक्ष निदान कहा है।’ यह अप्रत्यक्ष निदान, शल्यरूप न होकर अंतर्ध्यानरूप है।

इसी के संबंध में सर्वार्थसिद्धिहार आचार्य पूज्यपाद स्वामी शंका को उत्कर समाधान में लिखते हैं-

व्रती होने के लिए दोनों (शल्य रहित व हिंसादि का त्याग) विशेषताओं से युक्त होना आवश्यक है। यदि किसी ने शल्यों का त्याग नहीं किया और केवल हिंसादि दोषों को छोड़ दिया तो वह व्रती नहीं हो सकता। ऐसा व्रती दृष्ट है, जिसमें शल्यों का त्याग करके व्रती को स्वीकार किया है।’

प्रश्न :- इसप्रकार तो आचार्य अपराजित सूरि का कथन असिद्ध हो जाएगा?

उत्तर :- तथ्य की दृष्टि से आचार्य विद्यानंद स्वामी व पूज्यपाद स्वामी का कथन बलवान है। तथापि आ. अपराजित सूरि का कथन दूषित है। सत्य है। उन्होंने निदान शल्य में निदान आर्तध्यान का

  1. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-25 (अंतर्गत सम्यग्दृष्टेः संतावनस्य वा निदान शल्यमस्ति। पार्श्वनाथदिगंबरेण विरचित विजयोदया पार्श्वनाथदिगंबरेण विरचित विजयोदया टीकायां शल्यं भावं द्रव्यं च भेद से 2
  2. तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-18, पृ. 59
  3. सर्वार्थसिद्धि, अध्याय-7, पृ. 276

निदान का स्वरूप

उपचार कर उसे पाँचवें गुणस्थान तक कहा और माया शल्य में माया कषाय का उपचार करके उसे सातवें गुणस्थान तक कहा।
इसप्रकार दोनों ही आचार्यों का कथन अपनी-अपनी विवक्षा से सत्य है।
इसप्रकार जिनागम में भाव शल्य के अंतर्गत निदान का वर्णन प्राप्त होता है।
2) ध्यान के अंतर्गत निदान शब्द का प्रयोग :-
‘एकाग्रचिंता निरोधो ध्यानं’ अर्थात् चित्त को अन्य विषयों की ओर से हटाकर किसी एक विषय की ओर लगाना ध्यान है।¹
राग-द्वेष-मिथ्यात्व से अबुध, वस्तु के यथार्थ स्वरूप को ग्रहण करने वाले और अन्य विषयों में संचार न करने वाले ज्ञान को ध्यान कहते हैं।² यह परिभाषा मुख्यतः मोक्षमार्ग की अपेक्षा है।
आचार्य जिनसेन स्वामी ने आदिपुराण³ में ज्ञान की पर्याय को ध्यान कहा है। जिसे डॉ. हुकमचंदजी भारिल्ल के शब्दों में कह सकते हैं कि 'जानने रहने का नाम ही ध्यान है।'⁴ उपयोग की एकाग्रता का नाम ध्यान है। ध्यान के स्वरूप में ‘एकाग्रता’ इस शब्द का एक विशिष्ट स्थान है। यदि ध्यान के स्वरूप में से एकाग्रता शब्द को हटा दिया जाए, तो ध्यान का स्वरूप ही नहीं बनेगा; इसलिए उपयोग की एकाग्रता, चित्त की स्थिरता, लीनता का अपने रहने का नाम ध्यान है।
यह ध्यान 4 प्रकार का होता है-

  1. आर्त ध्यान
  2. रौद्र ध्यान
  3. धर्म ध्यान
  4. शुक्ल ध्यान
  1. ज्ञानार्णव गाथा-195
  2. विशेषाव टीका, गाथा-41
  3. आदिपुराण, पर्व-21, श्लोक-15
  4. इसीप्रकार पंचास्तिकाय सार व्याख्यान में आगमसार, गाथा-38 के भावार्थ में कहा है।

निदान शल्य और निदान आर्तध्यान में क्या अंतर

काल की बलिहारी है कि इस पंचम काल में प्रारम्भ के तीन (आर्त, रौद्र और धर्म) ध्यान ही हो सकते हैं; परंतु यह जीव इन तीनों ध्यानों में से भी केवल आर्त और रौद्र ध्यान को ही करता है। जो संसार के कारणभूत एवं कष्टदायक है। जो मोक्ष के कारणभूत एवं आनन्द प्रदायक है, ऐसे धर्म और शुक्ल ध्यान को पहचानता तक नहीं है।
आर्त में यह जीव होता है, दुःखी होता है, खेद-खिन्न होता है। रौद्र ध्यान में पापों में आनंद मानता है। धर्म्य ध्यान में स्वरूप का मनन-चिंतन इत्यादि करता है और शुक्ल ध्यान में क्रमशः स्थिरता को बढ़ाते हुए अनंत आनन्द की प्राप्ति करता है।
आर्त-रौद्र आदि प्रत्येक ध्यान चार-चार प्रकार के हैं। उनमें से आर्तध्यान के चार भेदों में से एक भेद है निदान। यथा-

  1. अनिष्ट संयोगज
  2. इष्ट वियोगज
  3. वेदना जन्य
  4. निदानज
    इसप्रकार ‘निदान’ शब्द का प्रयोग ध्यान के अंतर्गत आर्तध्यान के रूप में किया गया है।
    जिनागम में निदान का वर्णन निदान शल्य और आर्तध्यान के रूप में प्राप्त होने पर भी आर्तध्यान की अपेक्षा शल्य के अंतर्गत निदान का वर्णन अधिक प्राप्त होता है।
    प्रश्न :- निदान शल्य और निदान आर्तध्यान में क्या अंतर है?
    उत्तर :- निदान शल्य और निदान आर्तध्यान में चार अपेक्षाओं से अंतर देखा जा सकता है-
  5. काल की अपेक्षा - निदान शल्य अधिक समय तक होती है; परंतु निदान आर्तध्यान उससे थोड़े कम समय तक होता है। (निदान शल्य का काल अंतर्मुहूर्त है और निदान आर्तध्यान का काल निदान शल्य के अंतर्मुहूर्त से कम है।)

निदान का स्वरूप

  1. कषाय उद्रेक की अपेक्षा - निदान शल्य में कषायों का उद्रेक तीव्र होता है; परंतु निदान आर्तध्यान में कषायों का उद्रेक मंद-तीव्र (मध्यम) होता है।
  2. स्वामी की अपेक्षा - निदान शल्य चौथे गुणस्थान तक होती है और निदान आर्तध्यान पाँचवें गुणस्थान तक होता है।
  3. व्यक्तता की अपेक्षा - चौथे गुणस्थान तक होने वाली निदान शल्य को प्रत्यक्ष निदान कहते हैं और पाँचवें गुणस्थान तक होने वाले निदान आर्तध्यान को अप्रत्यक्ष निदान कहते हैं।
    तत्त्वार्थश्लोक वार्तिक में निदान शल्य के प्रकरण में निदान आर्तध्यान के लिए ‘अप्रत्यक्ष निदान’ शब्द का प्रयोग किया है, इससे यह प्रतीत होता है कि एक प्रत्यक्ष निदान भी होता है, जो निदान शल्यस्वरूप है।
    प्रत्यक्ष निदान से तात्पर्य है कि जिस निदान में कषायों की तीव्रता हो और जो स्पष्ट रूप में ज्ञान का विषय बन सके, वह प्रत्यक्ष निदान है तथा इससे विपरीत अप्रत्यक्ष निदान है अर्थात् इस अप्रत्यक्ष निदान (आर्तध्यान) में कषायों की तीव्रता नहीं होती है तथा यह स्पष्ट रूप से ज्ञात भी नहीं हो जाता है।
विवक्षा निदान शल्य निदान आर्तध्यान
1. काल अधिक समय तक कम समय तक
2. कषाय उद्रेक तीव्र मंद-तीव्र (मध्यम)
3. स्वामी (गुणस्थान) पहले से चौथे पहले से पाँचवें
गुणस्थानवर्ती जीव गुणस्थानवर्ती जीव
4. व्यक्तता प्रत्यक्ष निदान अप्रत्यक्ष निदान

निदान बंध

जिनागम में निदान शल्य और आर्तध्यान के अतिरिक्त ‘निदान बंध’ के रूप में भी निदान शब्द का प्रयोग प्राप्त होता है; तथापि आगम में ‘निदान बंध’ का प्रयोग शल्य और आर्तध्यान की अपेक्षा बहुत कम स्थानों पर मिलता है। जैसे - समयसार ग्रंथ की जयसेन आचार्य कृत तात्पर्यवृत्ति टीका में निदान बंध का प्रयोग है। जो निम्नप्रकार है-
'रागद्वेषमोह - ख्यातिपूजालाभ - दृष्टश्रुतानुभूत - भोगाकांक्षास्वरूपो निदानबन्धः।'¹ अर्थात् राग-द्वेष-मोह, ख्याति-पूजा-लाभ, दृष्ट-श्रुत-अनुभूत, भोगाकांक्षास्वरूप निदान बन्ध है।
यहाँ निदान शल्य और आर्तध्यान से होने वाले बंध को ही संक्षेप में निदान बंध कहा है; ऊपर निदान बंध की परिभाषा में आए ‘दृष्ट-श्रुत-अनुभूत’ शब्द निदान शल्य को बताते हैं तथा 'भोगाकांक्षा’³ शब्द निदान आर्तध्यान को बताता है; अतः निदान बन्ध में शल्य और आर्तध्यान के अतिरिक्त अन्य कुछ विशेष नहीं है, उन्हीं दोनों का विषय इस निदान बन्ध में आ जाता है।
यही कोई कह सकता है कि जब आगम में निदान बंध का अधिक उल्लेख प्राप्त नहीं होता है, तब फिर जगत में ‘निदान बंध’ ऐसा प्रयोग अधिक प्रचलित क्यों है?
समाधान :- जगत तो प्रत्येक कार्य में अपनी सुख-सुविधा को ढूँढ़ता है; इसलिए वह जगत सुख-दुःख (उच्चारण करने में सरलता का अनुभव होने) की दृष्टि से संक्षेप में ‘निदान बंध’ ऐसा कहने लगा।
निदान शब्द में निदान शल्य और निदान आर्तध्यान का ग्रहण

  1. समयसार (तात्पर्यवृत्ति टीका), गाथा-306-307
  2. निदान शल्य (द्रव्यसंग्रह, गाथा-42 की टीका)
  3. निदान आर्तध्यान (सर्वार्थसिद्धि, अध्याय-7, सूत्र-18)

निदान का स्वरूप

हो जाता है और बंध शब्द से कर्म बंधन का। निदान शल्य और आर्तध्यान से होने वाले बंध को निदान बंध कहते हैं।
इसीप्रकार निदान बंध के तीन अर्थ और निकल सकते हैं, यथा-

  1. कारण की अपेक्षा (निदान-कारण):-
    निदान बंध - 1. निदान से बंध¹ (निदान, कारण - बंध - कार्य) बंध के अनेक कारणों को निदान शब्द से कहा जा सकता है। जैसे - मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग। इन कारणों से बंधरूप कार्य होता है अर्थात् निदान से बंध होता है। इसे ही संक्षेप में निदान बंध कहा जाने लगा।
  1. बंध का निदान अर्थात् बंध का कारण।
    यद्यपि ‘बंध का निदान’ यह विग्रह व्याकरण की दृष्टि से उचित नहीं है; परंतु लोक में प्रचलित अर्थ को ध्यान में रखते हुए यहाँ व्याकरण के नियम को गौण करके यह अर्थ निकाला जा सकता है कि निदानबंध अर्थात् ‘बंध का कारण’
  1. निष्पत्ति-निष्काषित कर्म की अपेक्षा (निदान - निष्पत्ति/निष्काषित कर्म):-
    निदान बंध - निदान का बंध² अर्थात् निष्पत्ति-निष्काषित कर्म का बंध।
  2. इच्छा की अपेक्षा (निदान - इच्छा):-
    निदान बंध - निदान से होने वाला बंध³ अर्थात् इच्छा से होने वाला बंध।
  1. यहाँ तृतीया तत्पुरुष समास के द्वारा उक्त अर्थ किया है।
  2. यहाँ षष्ठी तत्पुरुष समास के द्वारा उक्त अर्थ किया है।
  3. यहाँ तृतीया तत्पुरुष समास के द्वारा उक्त अर्थ किया है।

निदान बंध

‘इच्छा से होने वाला बंध’ कहें या ‘निदान शल्य व आर्तध्यान से होने वाला बंध’ - दोनों में कोई अंतर नहीं है, मात्र शब्दों का अंतर है। निदान शल्य और आर्तध्यान के स्थान पर इच्छा को लिया है; क्योंकि निदान शल्य और निदान आर्तध्यान में इच्छा की अहं भूमिका रहती है, इसलिए निदान शल्य और निदान आर्तध्यान को संक्षेप में इच्छा कहा जाता है और ऐसी इच्छा से होने वाले बंध को निदान बंध कहते हैं।
प्रश्न :- पहले और तीसरे (कारण और इच्छा) अर्थ में क्या अंतर है?
उत्तर :- क्योंकि पहले अर्थ के पहले बिंदु में ‘निदान से बंध’ - यह विग्रह किया है और तीसरे अर्थ में ‘निदान से होने वाला बंध’ यह विग्रह किया गया है - दोनों ही अर्थ समान प्रतीत होते हैं; फिर दोनों को अलग-अलग क्यों कहा?
उत्तर :- दोनों अर्थों में किंचित अंतर है। पहले अर्थ में ‘सामान्य कारण’ के रूप में निदान शब्द का प्रयोग किया है और तीसरे अर्थ में ‘विशेष कारण’ (इच्छा) के रूप में किया है।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि यद्यपि सामान्यरूप से इच्छा से होने वाले बंध को निदान बंध कहा जाता है; परंतु गहराई से विचार करें तो इच्छा मात्र से होने वाला बंध, निदान बंध नहीं है। इच्छा के साथ अन्य अनेक शर्तें (कारण) भी जुड़ी हुई हैं; क्योंकि जिनागम में इस निदान शब्द का प्रयोग एक पारिभाषिक शब्द के रूप में किया गया है।
अनेक आचार्यों ने विविध शब्दों के माध्यम से निदान को परिभाषित किया है, जो निम्नप्रकार से है (प्रत्येक परिभाषा में जो विशिष्ट शब्द आए हैं, उन्हें रेखांकित (Underline) किया है)।

निदान का स्वरूप

तत्वार्थसूत्र की टीका सर्वार्थसिद्धि में आचार्य पूज्यपाद स्वामी लिखते हैं-

'निदानं विषयभोगकांक्षा।

विषय-भोगों की आकांक्षा का नाम निदान है।
इस परिभाषा में आयु कर्म को और जोड़ते हुए आचार्य वसुनंदी स्वामी मूलाचार की टीका आचारवृत्ति में लिखते हैं-

'इहलोक-परलोक-सुखकांक्षा निदानम्।

इहलोक-परलोक में सुख की आकांक्षा करना, निदान है।
इच्छा के स्थान पर मन के उपयोग को निदान कहते हुए आचार्य असंगति सूरि भगवती आराधना की विजयोदया टीका में लिखते हैं-

इदम्येव स्यादेकाग्रते इति मनसः प्रणिधानं निदानम्।

आगामी काल में यही होना चाहिए, इसप्रकार मन के उपयोग को निदान कहते हैं।

'रत्नत्रयवन्युन्मुक्तैः अनंत-ज्ञानादि-काव्यात्म्य चित्तं प्रणिधानमित्येव फलं स्यादिति निदानम्।

रत्नत्रयमुक्तै मुनिमार्ग से और अनंत ज्ञानादिक से अन्यत्र चित्त का उपयोग लगाना कि इसका यह फल मुझे मिले, यह निदान है।
इसे ही आ. अकलंक देव राजवार्तिक में इसप्रकार कहते हैं-

  1. सर्वार्थसिद्धि, अध्याय-7, सूत्र-18
  2. क्षीरप्रभृत तत्वालोकिक, वत्तीय, अध्याय-7, सूत्र-18 में कहा है - 'विषय-भोगों की आकांक्षा करना, निदान है।
  3. मूलाचार टीका (आचारवृत्ति), गाथा-86
  4. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-26
  5. भगवती आराधना (विजयोदया टीका), गाथा-1208

निदान की परिभाषाएँ

'भोगाकांक्षा नियतं चित्तं चित्तं तस्मिन्नेति वा निदानम्।
विषयसुखोपभोगिभावी भोगाकांक्षा तथा नियतं चित्तं दीयते तस्मिन्नेति वा निदानमिति व्यपदिश्यते।

भोगों की आकांक्षा से जिसमें व जिसके द्वारा चित्त दिया जाता है, वह निदान है। विषय-सुखों की उत्कृष्ट अभिलाषा, भोगाकांक्षा है। उस भोगाकांक्षा से जिसमें नियतरूप से चित्त दिया जाता है तथा जिसके द्वारा दिया जाता है, वह निदान है।
यहाँ जिसमें’ पद से भावों का विषय-भोगों में उपचार करने उन विषय-भोगों को ही निदान कहा है और ‘जिसके द्वारा’ पद से भावों को भी निदान कहा है।
द्रव्यसंग्रह ग्रन्थ की टीका में आचार्य ब्रह्मदेव सूरि निदान की आध्यात्मिक परिभाषा बताते हुए लिखते हैं-

निर्विचार - परमन्यत्वेन - भवत्यन्तरग - परमाद्वैकरूप-सुखामृतसारस्वालम्ब आत्ममनोर्जयो जीवो दुष्टभुतानुभूतमेषु यन्नियतं निरंतरं चित्तं ददाति तन्निदानमभिप्रेक्ष्यते।

निर्विचार-परमाद्वैतत्व की भावना से उत्पन्न परमाह्लाद जिसका स्वरूप है, ऐसे सुखामृत रस का स्वाद न लेते हुए यह जीव देखे हुए, सुने हुए और अनुभव किए हुए भोगों में जो निरंतर चित्त को देता है, उसे निदान प्रत्यय कहते हैं। (यहाँ भावों को ही निदान कहा है।)
इसी भांति तत्वार्थश्लोक वार्तिक में आचार्य विद्यानंद स्वामी

  1. तत्वार्थश्लोकवार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-37
  2. सर्वार्थसिद्धि, अध्याय-7, सूत्र-37 में कहा है - 'भोगाकांक्षा नियतं दीयते चित्तं तस्मिन्नेति वा निदानम् अर्थात् भोगों की आकांक्षा से जिसमें और जिसके कारण चित्त को दिया जाता है, उसे निदान कहते हैं।
  3. द्रव्यसंग्रह, गाथा-42 (टीका)

निदान का स्वरूप

भी लिखते हैं-

भविष्य में भोगों की आकांक्षा के वश होकर वैषयिक सुख की उत्कृष्ट प्राप्ति के लिए मनोवृत्ति करना, निदान है।
भविष्य सुख की प्राप्ति में प्रमुख लक्ष्य रहे मन का अपूर्व पदार्थ की प्रार्थना में अभिमुख बने रहने से निदान होता है।
विद्याधर, चक्रवर्ती, देव, इंद्र, अहमिंद्र आदि के भोगों की आकांक्षा करके नियत हो रहा चित्त उन निदान में दिया जाता है अथवा उसका भोगाभिप्राय चित्त की टंकोत्कीर्ण लगी रहती है, इस कारण वह (भोगाभिप्राय) निदान कहलाता है।
जो मुनियों का पुनः-पुनः अभ्यास वृत होकर उपजता है, वह निदान है।
मुनियों का एकाग्र उठते रहना, निदान नामक आर्तध्यान है।
उपर्युक्त सभी परिभाषाओं के साररूप में आचार्य पूज्यपाद स्वामी सर्वार्थसिद्धि में इसप्रकार कहते हैं-

'भोगाकांक्षासुखरागमाविर्भावयति प्रति मनःप्रणिधानं संकल्पश्चेति-प्रबन्धरूपेणायं निदानमित्युच्यते।

भोगों की आकांक्षा के प्रति आतुर हुए व्यक्ति के आगामी भोगों की प्राप्ति के लिए मनः प्रणिधान का होना, संकल्प तथा निरंतर चिंता करना, निदान नामक आर्तध्यान है।
आ. रविषेण स्वामी पद्मपुराण में तप की मुख्यता से कहते हैं-
'भोगों की आकांक्षा के लिए तप को दूषित करना, निदान है।

  1. तत्वार्थश्लोक वार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-37
  2. वही, अध्याय-9, सूत्र-33
  3. तत्वार्थश्लोक वार्तिक, अध्याय-7, सूत्र-37
  4. वही, अध्याय-9, सूत्र-33
  5. वही, अध्याय-9, सूत्र-33
  6. सर्वार्थसिद्धि, अध्याय-9, सूत्र-33

निदान की परिभाषाएँ

अंत में निदान का फल दिखाते हुए तस्वार्थ अधिगम सूत्र (श्वेताम्बर) में आचार्य उमास्वाति देव निदान की परिभाषा इसप्रकार बताते हैं-

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 1028.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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