4th kaal mein muni alone forest mein kaise rehte

#1

How did Digambar Jain Muni in 4th kaal who went alone to सुनसान forest for months for tapasya get water in kamandal for that time period ? Did muni THINK that Shravak will provide him water there ? Because fasting is possible but stopping excretion is not & muni have to take filtered water only.

Also, since muni cannot walk without पिच्छी, there might be many munis in सुनसान forest whose पिच्छी might have been taken by animals / blown by wind and they would have taken sallekhana for want of (lack of) picchi ? I have never heard of such instances in agams.

I was just contemplating on 4th kaal and I know the above questions are based on less understanding of mine.

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#2

चौथे काल मे सभी मुनिराज अकेले वन में नही रहते थे।
जो उसी भव मे मोक्ष जाने वाले हो ,या जिनका संहनन वज्ररुषभ नाराच संहनन हो ,या कोई महापुरष हो उन्हींको आचार्य सहमति देते थे क्योंकी वे कठिन से कठिन उपसर्ग भी सहन कर सकते है और वे समाधि भी अपनी सवयं कर सकते है। ग्रीषम ऋतु में पर्वत के ऊपर तप करना आदि हम जो सुनते है वे विशेष संहनन वाले मुनिराज ही कर सकते है।

बाकी सामान्य मुनिराजों के बड़े बड़े संघ भी होते है चौथे काल मे उनको आचर्य अकेले विहार की आज्ञा नही देते क्योंकि वे मार्ग से भ्रष्ट भी हो सकते है।

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#3

आचार्य संघ के अनुशाशक व पालक होते हैं और उनको यह पद उनके presence of mind के कारण ही दिया जाता है। मुख्यता, आचार्य, संघ को लेकर ऐसी ही जगह रुकते हैं जहाँ आस- पास झरना आदि हो जिससे जल आदि की व्यवस्था हो सके। मल-मूत्र आदि का प्रतिष्ठापन करने के लिए भी जगहों को ढूँढ लिया जाता है। तो बहुत से factors को consider करने के बाद किसी जगह पर आचार्य पूरे संघ को रोकते हैं। आचार्य साधारण नहीं होते, देश-काल-विज्ञान के ज्ञाता होते हैं।

किसी के ऊपर dependent रहना मुनि चर्या का अंग ही नहीं है। उनकी वृत्ति अलौकिक होती है। (Outsourced : पुरुषार्थसिद्धिउपाय)

मुनि संघों में यह बहुत common होता है ― कमंडल चोरी हो जाना या पिच्छी चोरी हो जाना / पंख rough हो जाना (जिससे पिच्छी को बदलना पड़े)। मुनि इन सब situations के लिए तैयार रहते हैं। और वन में रहने का एक लाभ ये भी है कि वन में ये पंख आदि सहज सुलभ हो जाते हैं। पिच्छी की अनुपस्तिथि से सल्लेखना धारण करना ― अति कठोर मालूम पड़ता है।

इस सम्बन्धी और भी प्रमाण मैं मूलाचार जी में ढूँढ रहा हूँ। मिलते ही यहाँ प्रेषित करूँगा।

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#4

Hum shravako ko yeh bhi maalum padta hai shashtra dwaara ki 4th kaal mai dev-devi ka avagaman chalta rehta tha.

Kitne hii devi-devta dharti par aa jaaya karte thay tatha akaash mai gaman bhi karte thay. Kaafi saari arihant kevali bhi hote thay uss samay par.

Toh agar kinhi muni maharaj ko aisa koi kasht aan pada hota jaise pichi aadi ka kho jaana ya fir kamandalu mai paani aadi nahi hona toh zaroor koi na koi dev unki madad karne aa jaate honge.

Kinhi manushyo ko yadi avadhigyaani muni maharaj se ya fir kinhi kevali bhagwan se pata chalta hoga ki aise koi maharaj ko van mai kasht ho raha hai toh woh bhi sewa karne swayam aa jaate honge.

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#5

विशेष इसमे नाटक समयसार गुणस्थान अधिकार छंद न-- 78 में आया है मुनिराज दो प्रकार के होते है।

  1. स्थविर कल्पि- जो संघ में रहते है।
  2. जिन कल्पि - जो अकेले विचरण करते है।

दो नो भाव लिंगी ही है।

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