अनोखी कथाएँ भाग-4
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अनोखी कथाएँ
अनुक्रम
| विषय | पेज सं |
|---|---|
| आहुतिदान का फल | 1 |
| धन वैभव छोड़ा | 15 |
| आहार दान का फल | 26 |
| झूम सेना | 28 |
| णमोकार मंत्र का महा प्रभाव | 31 |
| समस्याएँ देह धरे का कहीं फल पायो | 40 |
| जिसे कि हमें प्राप्त करना है | 41 |
| तीर्थंकर नेम कुमार की वीरता | 44 |
| मानतुंग की भक्ति | 45 |
| मूर्ति का महत्व | 47 |
| क्रोध की औषधि | 48 |
| अक्रोध की परीक्षा | 50 |
| प्रतिमा पूर्ण उत्तर | 52 |
| सेठ हरसुखराय | 53 |
| अब हम अमर भये ना मरेंगे | 59 |
| आत्मा रूपी बगीचा | 59 |
| मनुष्य कौन | 60 |
प्रकाशक
प्रेरणा : शु० राजमति माता जी
विधान : अनोखी कथाएँ भाग पाँच
संकलन एवं संपादन : धर्मचंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य
प्रकाशन वर्ष : 2001
पृष्ठ नं : 1
मूल्य : 20 रुपये
प्रकाशक : आचार्य धर्म भूतग्रन्थ माला
प्राप्ति स्थान : जैन मंदिर गुलाब वाटिका, लोनी रोड, दिल्ली
बुराई के बदले भलाई
बालक की बुद्धि
पर दुःख कातरता
आया अंग सोने का
निर्माही परिवार
स्वर्ग का द्वार
सर्वतो भद्र साधु राज
महान तत्व ज्ञानी
धर्म ध्यान
आगमोक्त आचरण
पुण्य संचय
विवेक दृष्टि
लोकोत्तर महात्मा
आध्यात्मिक प्रहरी
आश्चर्यप्रद व्यक्तित्व
युग निर्माता
अभय वाणी
मंगल वाणी
कामना
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आर्तध्यान का फल
जम्बू द्वीप के कुरु जंगल नाम का देश है। इसमें अवन्ति
नाम की नगरी है। इस नगरी का राजा अनुपस्थिर नाम का
था। इसकी पटरानी थी पद्मावती, प्रेमावती, सुप्रभा, कनकप्रभ
इन पटरानियों में पद्मावती का अग्रस्थान था इनके पुत्र का
नाम अनन्तीर्थी था अन्य रानियों में ५०० पुत्र उत्पन्न थे।
माडलिक राजा इसे नमस्कार करते थे। इसकी सभा में सदा
नाच गाना होता रहता था।
एक दिन वनमाली ने आकर वसंत ऋतु में वन बिहार के
लिए कहा। सभी सेना राजकुमार अल्प-शस्त्र लेकर चल दिए।
वन में सौंदर्य को देख लता निकुंजों में विश्राम किया। और
रत्न मणियों से निर्मित घाटों सोपानी वाले रंग बिरंगे जल से
युक्त तालाब में जल क्रीड़ा से युक्त प्रिय प्रेमसे किया। तालाब
का जल कुमुम्, केशर, कस्तूरी, कपूर आदि से सुगंधित किया
गया। उसके घाटों पर मणियों के सोफे पूरे गए थे। सोपानों
पर सुगंधित पुष्प बिछाये गए थे। राजा अपनी महारानी के साथ
जल क्रीड़ा में मग्न था।
इसी बीच विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणीस्थ अकलपुरी
का निवासी ब्रजदत्त नाम का विद्याधर अपनी स्त्री मदनवेगा
के साथ आकाश मार्ग से आ रहा था। मदनवेगा की दृष्टि
तालाब में जलक्रीड़ा करते हुए अनुपस्थिर राजा पर पड़ी तो
वह कहने लगी हम लोग पक्षी की तरह आकाश में घूमते रहते
हैं। देखिए यह राजा कितना सुखी है अपने समस्त परिवार
के साथ आनन्दपूर्वक विहार कर रहा है। हम लोग केवल नाम
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के विद्याधर है। पर वास्तव में हमारे जीवन में तनिक भी सुख
नहीं है। हमको अधिक सुखी तो यह राजा है। इसने किस
प्रकार का सुंदर तालाब बनवाया है। इस तालाब का जल
भी कितना सुगंधित और स्वस्थ है। वास्तव में यह धन्य है
मनुष्य जीवन के लौकिक सुखों को भोग रहा है।
ब्रजदत्त को अनुपस्थिर राजा की यह प्रशंसा अच्छी नहीं
लगी। वह अपनी स्त्री को अलकापुरी में छोड़कर पुनः वहां
पर आया और एक बड़ी सी शिला लेकर उस तालाब को
ढक दिया। राजा रानी उसी तालाब के भीतर रह गए। यद्यपि
उन्होंने बाहर निकलने का पूर्ण प्रयत्न किया पर वे प्रयत्न
में सफल नहीं हो सके। रानियों ने राजा से कहा देव अब
दुःख करने से कुछ नहीं होने वाला है। पूर्व जन्म कृत कर्मों
का फल तो भोगना ही पड़ता है। शुभा-अशुभ कर्म का उदय
किसी को नहीं छोड़ता अब शांतिपूर्वक आई हुई विपत्ति को
सहना चाहिए। घबराने या विलाप करने से कुछ नहीं होने
का है। स्त्री, पुत्र, धन-दौलत सब यहीं पर रहने वाली वस्तुएँ
हैं। इनमें मोह करना व्यर्थ है। समय आने पर कोई किसी
की सहायता नहीं करता। चिन्ता, दुःख, क्लान्ति करने से कुछ
भी साथ आने का नहीं है। इस जीव ने पूर्व जन्म में जैसे
शुभाशुभ कर्म किये है। उनका फल इस भोगना ही पड़ता
है। अब मृत्यु से इसे कोई बचा नहीं सकता। अतः भगवान
जिनेन्द्र देव के वचनों का ध्यान कीजिये। वीर वही है जो
मृत्यु का वीरता पूर्वक आलिंगन करे। और तनिक भी विचलित
न हो। हे- देव अब परिग्रह का मोह छोड़ संन्यास धारण
करना चाहिए। नहीं कल्याण करने वाला है। इसी के द्वारा
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मनुष्य का उपकार हो सकता है। मरते समय जो व्यक्ति मोह
करता है वह अपना अहित कर लेता है। अतएव अब धन धान्य
वैभव आदि का त्याग कर आत्म कल्याण में लगना चाहिए।
महाराज ब्रजदत्त सही समान अपनी गति मत बिगाड़िये।
परिग्रह का मोह बड़ा ही अहित कर होता है। आचार्यों ने
परिग्रह के मोह को समस्त पापों की खान माना है। कोई
जीव परिग्रह का त्याग किए बिना अपना हित साधन नहीं
कर सकता है।
मोही राजा ने धन धान्य वैभव राज्य परिवार के आसक्त
चित्त होकर मरण किया। लाखों तरह समझाए जाने पर भी
राजा का मोह नहीं छूटा। आर्तध्यान में लीन रहा। स्त्री पुत्रों
का नाम ले कर विलाप करते हुए उसने प्राण छोड़े जिससे
उसी उद्यान में मरकर अजगर हुआ। रानियों ने समस्त परिग्रह
त्याग कर संन्यास धारण किया जिससे वे सौधर्म स्वर्ग में
सामग्री की आयु प्राप्त कर आनंदकान्ता, सुकान्त अग्निकान्त
नामक देव हुआ। जब राजकुमारों और सामंतों और रानियों
सहित अनुपस्थिर महाराज की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ
वे सभी दुःख में संलग्न हो गए तालाब में रखे गए पत्थर को
देखकर कहने लगे यह कार्य किसी यक्ष या विद्याधर का
है। पूर्व जन्म के वैर के कारण ही ऐसा करने लगे और नाना
प्रकार से दुःख प्रकट करते हुए चिंतित हुए। अनन्तीर्थी ने
सबको समझाया और कर्म को विवेकरूप को स्वरूप बताते
हुए धैर्य प्रदान किया।
शुभ मुहूर्त में अनन्तीर्थी का राज्याभिषेक कर दिया गया।
सारे कार्य पूर्ववत् चलने लगे। एक दिन इस नगर में
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अवधिज्ञानी सारस्वता नाम के आचार्य संघ सहित पधारे व
अवन्ति के उद्यान में एक मनोहर शिला पर आसीन होकर
तरस्या करने लगे।
अनन्तीर्थी मुनि संघ का समाचार पाकर परिजन पुरजन
सहित मुनिराज की वंदना के लिए गया और निकट पहुँच
कर तीन प्रदक्षिणा दी और अष्टद्रव्यों से पूजा की। पश्चात्
मुनिराज का उपदेश सुनने लगा। धर्मोपदेश श्रवण करने के
अनन्तर उनसे हाथ जोड़ कर मुनिराज से पूछा- मेरे
माता-पिता का मरण क्यों हुआ है। उनके ऊपर वृहद शिला
कैसे रखी गई।
अवधि ज्ञान द्वारा बातों को जानकर मुनिराज बोले-बस
ब्रजदत्त नाम का विद्याधर अपनी पत्नी मदनवेगा सहित भ्रमण
करता हुआ था। अपनी पत्नी द्वारा की गई राजा की
प्रशंसा उसे अच्छी न लगी। पत्नी को अलकापुरी में छोड़कर
एक वृहद शिला सरोवर पर ढक दिया गया है। जिससे वहाँ
अनुपस्थिर और रानियों की मृत्यु हो गई। अनन्तीर्थी ने पूछा-
हे स्वामिन उनकी मृत्यु कैसे हुई। यह बतलाने की कृपा करें।
मुनिराज ने कहा- तुम्हारी माताओं ने समस्त वस्तुओं से
ममत्व छोड़ कर संन्यास धारण किया था। जिससे वे सौधर्म
स्वर्ग में देव हुई है। और अनुपस्थिर को अंत में मोह से सताया
जिससे वह उसी वाटिका में अजगर पर्याय को प्राप्त हुआ
है। अनन्तीर्थी माताओं की सुमति और पिता की दुर्मति जान
कर आश्चर्य चकित रह गया। उसने विद्याधर यह जीव
परिणामों के अनुसार सुमति और दुर्मति प्राप्त करता है। अतः
वह मुनिराज से हाथ जोड़ कर कहने लगा। प्रभो आप मेरे
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पिता को थोड़ा कष्ट करके ऐसा उपदेश दीजिए जिससे वह
तिर्यंच गति को छोड़कर अपना आत्म कल्याण कर सकें।
मुनिराज बोले- अभी उस अजगर को उपदेश देने से आपके
पिता के जीव सर्प की जाति स्मरण हो सकता है तथा जाति
स्मरण होते ही स्वर्ग में रानियों के जीव भी वहां आ जाएंगे।
और उनके उपदेश देने लगेंगे। जिससे परिग्रह आसक्ति
में होने वाली हानि समझाए जाएंगे और संसार से ममत्व छोड़कर
अपनी आत्मा का कल्याण करेंगे। हमारे उपदेश की अपेक्षा
तुम्हारे ही समझाने से उनका कल्याण हो सकता है। जैनधर्म
एक ऐसा अमृत है किसी भी अवस्था में सेवन करें लाभ ही
लाभ है। यह धर्म सभी जीवों का कल्याण करने वाला है
अनन्तीर्थी मुनिराज को नमस्कार करके पिता के जीव अजगर
के पास गया। और उसे नमस्कार कर कहने लगा-रत्नी
होकर आपकी पत्नियों ने परिग्रह छोड़ने के कारण देव पद
प्राप्त किया है। सांसारिक पदार्थों की वांछा तथा परिग्रह की
लालसा ही हानि कारक है। आपने पुरुष पर्याय प्राप्त कर
शूरवीरता के अनेक कार्य किए परन्तु मरण के समय धन धान्य
से मोह लग रहा। जिससे आपको यह नीच पर्याय की प्राप्ति
हुई है। इस प्रकार देव समझाकर वहां से चले गए। अनन्तीर्थी
भी उसे संबोधन देकर चला गया और मुनिराज के पास आकर
सारा वृत्तान्त कहा।
मुनिराज बोले- अनन्तीर्थी बस सर्पराज की आयु अब
केवल ५० दिन की है।
अनन्तीर्थी- प्रभो। आप एक बार साधु उनके उपकार
के लिए अवश्य चलें। आपको यह पहुंचने पर अवश्य ही उनका
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कल्याण होगा।
अनंतवीर्य के आग्रह को स्वीकार कर मुनिराज अग्रकर के पास गये। बोले-मुनिराज अब तुम्हारी आयु १५ दिन शेष है। अतः मोक्ष लक्ष्मी लेने वाले व्रतों को स्वीकार कीजिये अहिंसा में ही धर्म है इस प्रकार समझाकर उसे व्रत दे दिए। मुनिराज १५ दिन तक निरन्तर उस अजगर को उपदेश देते रहे और अंत समय निकट जानकर बोले- तुम्हारी आयु अब समाप्त हो रही है। अब शरीर से मोह छोड़कर आत्मकल्याण में प्रवृत्त होना चाहिए। भेद विज्ञान द्वारा अनेक भवों द्वारा संचित पाप इसी भव में समाप्त करने का उद्यम करना पड़ेगा। यही श्रेष्ठ है। अब संन्यास मरण धारण करना परम आवश्यक है मुनिराज ने संसार की क्षण भंगुरता, वैभव की अस्थिरता को दूरदराज वर्णन किया। तथा संन्यास मरण धारण करने पर बहुत जोर दिया। समाधि मरण का महत्व बतलाते हुए मुनिराज कहने लगे। एक भव में ही समाधि धारण करने से जीव अपना कल्याण कर लेता है। समाधि मरण से आठ भव पश्चात अवश्य निर्वाण सुख मिलता है। वस्तुतः रत्नत्रय के समान इस जीव की भलाई करने वाला अन्य कोई नहीं है। यही संसार से भ्रान्त जीवों को सुख और शांत देने वाला धर्म है। जो इस धर्म को भूल जाते है वे अनंत काल तक संसार भ्रमण करते रहते हैं।
इस प्रकार १५ दिनों तक उपदेश सुनते रहने से उस अजगर के परिणामों में शांति थी उजड़ को मैंने क्या बिगड़ा था सो मेरे लिए इस प्रकार शिक्षा रख कर मरा है मैं उनसे जरूर बदला लूंगा। यह भावना उसके हृदय में थी। इसलिए
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यह तीन पात की आयु समाप्त कर भवनासी देव हुआ।
अनंतवीर्य से पुनः मुनिराज से पूछा अब मेरी क्या गति हुई है।
एक ब्रजदत्त विद्याधर ने एक अप्रतिष्ठित राजा को तालाब में शिला रख कर मृत्यु को प्राप्त कराया था। “कषायु आप भयों बहिनने सखलीत कर खायो अति दीन” जिस समय वह राजा बलवान एक भवनासी देव हुआ तो उस विद्याधर से बदला लेने का विचार करने लगा। अग्रकर कहा गया यह पूछने पर मुनिराज ने बताया था। बदला लेने की भावना शेष रह जाने से भवनासी देवों में जन्म लेना पड़ा है परिग्रह खोटे भाव कितना बुरा है। बड़ा पाप है। रानियों ने इसके स्थान से देव गति प्राप्त की। परंतु राजा को दो भव यो ही खाने पड़े। मोह बहुत बड़ा पाप है इसका फलन जल्दी नहीं हो सकता। मुनिराज के वचनों का अनंतवीर्य पर बहुत प्रभाव पड़ा। उससे संसार का हाल सुन राजा अप्रतिष्ठित के पुत्र अनतवीर्य को वैराग्य आ गया और अपने पुत्र स्वभायु कुमार को बुलाकर राज तिलक कर दिया। और स्वयं अपरिमही तप वस्या करने गए और अनंतवीर्य ने समेद शिखर से तप कर निर्वाण प्राप्त किया।
अनुपरिसर राजा के जीव विपुल देव नामक भवनासी देव ने जब ब्रजदत्त विद्याधर को देखा तो क्रोधाभिभूत होकर देखा समस्त विद्याओं को छीन लिया। तथा विद्याधर और उसकी पत्नी को समुद्र में डाल दिया और उनके समुद्र में डालकर कहने लगा खूब पानी पियो और अपनी करनी का फल भोगो। तुमने मुझे ४ परानियों के साथ जल क्रीड़ा करते
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समय शिलाखंड से ढककर मारा था। इसी का बदला मैंने चुकाया है। विद्याधर आर्तध्यान से मरकर प्रथम नरक में गया। इधर कुरुजांगल देश हस्तिनापुर नगर में जयदत्त नाम का राजा शासन करता था। उसकी रानी का नाम विधाया देवी था। उनके कोई संतान नहीं थी। दोनों दम्पति ने गुरुदत्त मुनिराज नमस्कार कर कहा- प्रभो हमारे किस पाप का उदय है। जिससे कुल बढ़ाने वाली संतति हमें प्राप्त नहीं हुई। क्या कभी हमें संतान होगी या बिना संतान के यो ही राज्य नष्ट हो जाएगा। गुरुदत्त मुनिराज ने कहा- वत्स धैर्य रखो। घबराने की आवश्यकता नहीं है। आपको जैन धर्म बढ़ाने वाला, निर्मल चरित्र का धारी धर्मात्मा पुत्र होगा। कुछ दिनों में अनुपरिसर राजा का जीव विमलदेव व्यन्तर विजया देवी के गर्भ में आवेगा। समय पाकर रानी के एक सुंदर पुत्र हुआ। जिसका नाम गुरुदत्त रखा गया। क्योंकि यह पुत्र गुरुदत्त मुनिराज के आशीर्वाद से उत्पन्न हुआ था। अतः उन्हीं के नाम पर इसका नामकरण हुआ। यह शिशु प्रारंभ से ही होनहार विवेकी, समझदार और प्रतिभाशाली था। इसने थोड़े ही समय में सब शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था।
गुरुदत्त भी राज्य ग्रहण के योग्य हो गया पिता ने श्री सुधर्मचार्य से दीक्षा ले ली। शासन भार पुत्र को हाथों में सौंप दिया और दिगम्बर मुनि बनकर कठोर तपस्या करने लगे। गुरुदत्त भी पिता के द्वारा दिये गये राज्य शासन को बहुत ही सुंदर और व्यवस्थित ढंग से चलाने लगा। उसने राज्य की वृद्धि की और प्रजा की सुख सुविधा के लिए अनेक प्रयत्न किये। प्रजा नये राजा से बहुत प्रसन्न थी। क्योंकि वह
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दूनी रात चौगुनी उन्नति होती जा रही थी। मादलिक महामादलिक राजा उसे नमस्कार करने लगे थे।
एक दिन महाराज ने चंपापुर के राजा धात्रीवाहन की पुत्री अमयमती को मांगने के लिए दूत भेजा। पर धात्री वाहन राजा ने कन्या देने से इन्कार कर दिया। जिससे गुरुदत्त ने चंपापुरी पर आक्रमण किया। चारों ओर से घेर लिया। जब अमयमती को यह समाचार ज्ञात हुआ कि कोई राजा इसका हरण करना चाहता है। तो उसे बहुत चिंता हुई क्योंकि उसने अपने मन में गुरुदत्त राजा से ही विवाह करने का निश्चय कर लिया था। जब अमयमती को यह पता चला कि गुरुदत्त महाराज स्वयं ही सेना लेकर आए है और वह स्वयं पिता के पास गई और अपना निश्चय उनसे सुना दिया। उन्होंने कहा कि पिताजी मैं अपना विवाह गुरुदत्त के सिवाय अन्य किसी के साथ नहीं कर सकती हूं। इस भव में मेरे पति गुरुदत्त महाराज ही है। इसलिए आप उन्हीं के साथ मेरा विवाह कीजिए। कन्या की इच्छा जानकर धात्री वाहन ने अपनी कन्या अमयमती का विवाह गुरुदत्त राजा के साथ कर दिया। गुरुदत्त विवाह के पश्चात अपनी नगरी में लौट आए। और पूर्ववत् राज्य शासन करने लगे।
नरक से निकल कर ब्रजदत्त विद्याधर जिसे कि समुद्र में डुबोकर मारा था। नीलगिरी पर वही नरक का नारकी बाघ का जीव हुआ। और आस-पास के गांव में आकर आक्रमण करने लगा। जिससे प्रजा में त्राहि-त्राहि मचने लगी। लोग भयभीत होकर गुरुदत्त के पास आए। वे कहने लगे हे राजन नीलगिरि पर्वत पर जो सिंह रहता है उससे पीड़ित है। वह
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बच्चों को मनुष्यों को आधी रात को आकर ले जाता है पशु बछड़ों की तो गिनती ही नहीं। न जाने कितने खा गया है। आप हमारे पालक राजा है प्रजापाल है हम अपनी व्यथा और किससे कहने को जाए दया करो और हमें अपनी रक्षा का उपाय बताओ। गुरुदत्त राजा ने कहा कि राजा का कर्तव्य क्या है पृथ्वी की रक्षा करना दुष्ट लुटेरों चारों को देश से बाहर निकाल देना। सब प्रकार से प्रजा को संरक्षण करना। इसी प्रकार गुरुदत्त राजा ने अपनी प्रजा के लिए सब प्रकार से संरक्षण करना। तो राजा ने आज्ञा दी जिस गुफा में व्याघ्र रहता था उस गुफा में आग लगा दो। लकड़ियां भरवाकर आग लगवा दी। जिससे आठवेंद्य ध्यान के परिणामों से मरकर वह सौराष्ट्र देश में दीपनामा नामक पर्वत के नीचे पहली खेट नामक गांव में आमरण नामक ब्राह्मण का हलमुख नाम का पुत्र था।
एक दिन हस्तिनापुर में अमिताभ नामक मुनिराज आए। राजा गुरुदत्त ने उन्हें नमोस्तु कर अपने पूर्व भवों को जानने की अभिलाषा प्रकट की। मुनिराज ने गुरुदत्त के भव प्रकट किए। बताया कि तुम राजा थे अग्रगर हुए और भवनासी देव समाधि करके बने थे इस प्रकार भवों को बताया। गुरुदत्त मुनिराज के वचनों को सुनकर वैराग्य हुआ। और मुनिराज से अमयमती के पूर्व भव बतलाने की प्रार्थना की। मुनिराज ने बताया कि चंपापुर रानी नगर में एक किरात भील रहता था। उसकी स्त्री का नाम गोमुखी था एक दिन गोमुखी चतुर्विध संघ सहित आए समाधि गुप्त नाम के मुनिराज का धर्मोपदेश सुन रही थी। उपदेश श्रावण के बाद सभी लोगों
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ने व्रत लेकर देवव्रत गोमुखी ने भी अणुव्रत ग्रहण किए। इसका पति प्रतिदिन कबूतर पकड़ करके लाता था पर उसको यह छोड़ देती थी। जिससे वह नाराज होकर इसे प्रतिदिन पीटता था। एक दिन क्रोध में आकर गरूड़ वेग ने गोमुखी को घर से निकाल दिया वह घर से निकल कर अपने एक कुटुम्बी के यहां रहने लगी। मरते समय उसने धात्री वाहन राजा के ऐश्वर्य को प्राप्त करने की भावना की इस कारण यह धात्री वाहन राजा की पुत्री हुई है।
अमयमती रानी अपने पूर्व भव में भी व्रत के फल को सुनकर बहुत प्रसन्न हुई। और सोचने लगी कि व्रतों के सिवा अन्य कोई संसार में रक्षक नहीं है। धर्म ही इस जीव को लोक और परलोक के दुखों से मुक्ति दे सकता है। अब तक भोगों में आसक्त रहकर इसने अपने जीवन को कौड़ी के मोल बेच दिया। पर अब आत्मकल्याण के लिए तैयार हो जाना चाहिए। यह जीव व्यसनों में फंसकर अपना अहित करता है। सच्चे धर्म को पकड़ कर छोड़ देता है। जिससे इसे आत्मिक तृप्ति नहीं होती। अब अवश्य ही हम लोगों को आत्मकल्याण में लग जाना चाहिए। इस प्रकार निश्चय कर राजा गुरुदत्त और अमयमती रानी संसार शरीर भोगों से विरक्त हो गए। गुरुदत्त की समस्त भोगोपभोग सामग्री अच्छी नहीं लगती।
महाराज गुरुदत्त ने अपने पुत्र को बुलाया। और उन्हें सारी बातें समझाकर राजा तिलक दे दिया। तथा अमिताभ नामक आचार्य के पास आकर दीक्षा ग्रहण की। थोड़े दिनों में द्वादशांग श्रुतज्ञान का धारी होकर गुरु सेवा
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करता रहा। और पश्चात गुरु आज्ञा से एकाकी विहार करने
लगा।
अभयमति ने इन्हीं आचार्य की शिष्या सुव्रता आर्याका से
व्रत ग्रहण किए। राजा और रानी तपस्या करने लगे। अभयमति
की आयु थोड़ी थी। अत: उसने अपनी मृत्यु निकट जान समाधि
मरण धारण कर लिया। मरते समय उसके परिणामों में अपूर्व
शांति थी। जिससे वह कापिष्ठ स्वर्ग में ललितका नामक देव
हुई।
गुरुदत्त आचार्य विहार करते पल्लीखेड नामक गाँव के
जंगल में आए। और संध्या हो जाने से प्रतिमा योग धारण
किया। प्रात: काल हलमुख ने गुरुदत्त मुनि को देखा। वह
अपने खेत में हल जोतने जा रहा था। और अपनी स्त्री को
खेत में भोजन लाने के लिए घर पर कह कर आया था। पर
वहाँ खेत में पानी भरा हुआ था। इसलिए हल चलाना बहुत
ही कठिन है। अत: वह मुनिराज से कहने लगा। ऐ साधु जब
मेरी स्त्री यहाँ भोजन करने को आवे तू उससे कह देना कि
पश्चिम के खेत में हल जोतने गया है। वही पर भोजन दे
आवे देरी नहीं करे। और देखो भूल मत जाना अन्यथा मुझे
भूखा रहना पड़ेगा।
स्त्री जब दोपहर की रोटियाँ लेकर आई। और खेत में
हलमुख को नहीं पाया तो बहुत नाराज हुई और गालियाँ देती
हुई वापस लौट आई। इधर पश्चिम वाले खेत पर जब संध्या
समय तक भोजन नहीं आया। तो हलमुख को बड़ा कष्ट हुआ।
और क्रोध में पागल हुआ घर आया। और स्त्री को जोर से
पीटने लगा रोते हुए स्त्री ने कहा- आप खेत पर कहाँ थे
अनोखी कथाएँ
मैं तो घटो बैठकर आई हूँ मेरी क्या गलती है।
वह हलमुख बोला- क्या साधु ने जो कहा था या उसने
यह बात नहीं कही कि मैं पश्चिम के खेत पर गया हूँ। मैंने
तो वहाँ बैठे साधु से कहा था मेरी पत्नी से कह देना कि
पश्चिम की ओर के खेत पर जा रहा हूँ। बड़ा मक्कार निकला
वह साधु देखता हूँ उसे और तीव्र क्रोध में आकर कहता है।
मैं उसकी मरम्मत किए बिना नहीं छोडूंगा यदि तीव्र जलकर
बुरी तरह जलाया नहीं तो काहे का ब्राह्मण और काहे की
गृहस्थानी हूँ। यह हलमुख नारकी पहले नरक में था वहाँ से
मरकर सिंह हुआ और आज देखो सिंह नरकी की तीनों पर्यायों
जीवों को मारना कुत्तो के समान नारकीयो से लड़ना यह
करना था इसलिए संस्कार थे ही।
वह हलमुख मुनिराज के पास गया। और उनको पकड़
लाया और उनके शरीर में मिट्टी के तेल से भीगा कपड़ा लपेट
दिया और आग लगा दी। गुरुदत्त मुनिराज को तो पूर्व भव
का स्मरण होने से वैराग्य आया था इसलिए वो आत्म श्रद्धा
गए शरीर अलग है। मैं चैतन्य सिद्ध हूँ ज्ञानघन आत्मा हूँ।
वैसे की गुरुदत्त मुनिराज मन को एकाग्र करके अपनी
आत्मा को ध्यान में लीन होना श्रेष्ठ समझकर आत्मा में लीन
हो गए। उन्होंने राज्य अवस्था में सिंह को गुफा में आग
लगवाने की आज्ञा दी थी। आज वही सिंह का जीव ब्राह्मण
हलमुख बना जो कि अपने पूर्व भव का बैरी को वैर के संस्कार
से जैसे गुरुदत्त राजा ने जलाया वैसे ही मुनि बनने पर जला
रहा है।
वे गुरुदत्त मुनिराज जलने लगे शरीर से मोह छोड़ दिया।
अनोखी कथाएँ
शरीर रूपी वैद्गालय चैतन्य आत्मा रूपी देव विराजमान है
उसे चैतन्य आत्मा में लीन हो गए और प्रत्येक आत्मा का
यही भावना आनी चाहिए क्योंकि भावना भव नाशिनी होती
है।
मुनिराज सोचने लगे क्रोध भी मेरा स्वरूप नहीं है। इससे
भलाई नहीं हो सकती क्षमा ही हमारा स्वभाव है। आत्म हित
शुक्ल ध्यान में लीन होने में हित है। इसलिए शुक्ल ध्यान
में लीन होकर घातिया कर्मों का नाश करके केवल ज्ञान रूपी
आत्म संपत्ति को प्राप्त किया। केवल ज्ञान होने पर ५ प्रकार
के देव स्तुति आकर के करने लगे।
देव पुन: कहने लगे - हे प्रभो आपके चरण प्रसाद से
कल्याण, वचन और निर्माण मिलने में क्या देरी है। देवराज
आपके चरण निरन्तर वन्दनीय है। कर्म बंधन को नाश करने
के लिए आप दयानिधि के समान है। इस प्रकार देवो ने स्तुति
की।
हलमुख ने देवो को आया हुआ देखकर आश्चर्य में डूब
गया। तथा बहुत भयभीत भी हुआ यह देवो के अतिशय से
उदट कर बहुत दूर जाकर गिरा। यहाँ तो केवल ज्ञान के
अतिशय दिख रहे थे भगवान आकाश में थे दिव्य तेज उनके
शरीर से निकल रहा था। उनकी दिव्य ध्वनि बिखर रही थी।
और हलमुख ने गुरुदत्त केवली के दिनों के पूर्व के भवों का
वर्णन निकाल रहा था। उसको सुनकर हलमुख को तीव्र वैराग्य
आया। और मुनिराज के ऊपर जो उपसर्ग किया था उसके
लिए भी उसके मन में भी बहुत कष्ट हुआ केवली भगवान
के मुख से पंचम काल का स्वरूप भी पूछा और विश्वरता को
अनोखी कथाएँ
जानकर हलमुख का हृदय और भी कांपने लगा व वैराग्य
को प्राप्त होकर उसी गुरुदत्त केवली के निकट जिन दीक्षा
ग्रहण कर ली। गुरुदत्त केवली पृथ्वी पर विहार करते हुए
पल्ली खेत नगर में आए। और वहाँ द्रोणागिरि पर्वत से मुक्ति
को प्राप्त हुए।
धन वैभव कथा
भारत देश में मालव देश में अनूपपुरी समान विश्ववर राजा
राजा करता था। और राजेश्वरी गुणपाल उनकी सेवनी रति
इन्द्राणी के रूप को भी तिरस्कृत करने वाली थी। रात दिन
मममद भक्ति दान पूजा स्वाध्याय में लीन रहती थी। लक्ष्मी
व सरस्वती का भंडार थी उसके एक बन्धुश्री कन्या थी।
धनश्री ने एक दिन प्रात: मुहूर्त में ऐरावत हाथी, चंद्रमा,
सूर्य देखा सुबह पति से पूछा तो परब्रम्ही धर्मज्ञ गुणवक्त
पुत्र होगा। सूर्य देखने से जिन शासन में उन्नति करने वाला
काम देव समान पुत्र होगा ऐसा जिन मंदिर में जा मुनिराज
से स्वप्नों का फल समझा। धनश्री के गर्भ में बालक आया
दान, पूजा तीर्थाटन करने की भावना हुई। ६३ शलाका पुरुषों
की कथा, तीर्थाटन, जिनालयों के दर्शन, भगवान के समक्ष
बैठ कर स्तुति, स्वर्ग समान की प्रवृत्ति श्रावकों के साथ धार्मिक
चर्चा करना जिनेन्द्र भगवान का परमागत अभिषेक की भावना
आदि धार्मिक भावनाओं को पूर्ण करती थी।
कैलाश पर्वत के ७२ जिनालयों का ध्यान, सुमेरु
पर्वतों के जिनालयों का पूर्ण ध्यान करने लगी चतुर्विध
संघ को खूब दान दिया।
अनोखी कथाएँ
एक दिन विश्ववर राजा वैभव के साथ हाथी पर सवार
से वन क्रीडा को जा रहा था। इस अनिद्य सुंदरी को देख
काम पीड़ित हो गया। सोचने लगा मेरी, शची देवांगना के
समान कौन है इस सुंदरी के बिना जीवन निरर्थक है। विश्ववर
राजमार्ग से वापस लौटा तो मूर्छित हो गया। बहन अगर कपूर
से अनेक शीतलोपचार किए चेतना लौटी तो कहने लगा कि
जाओ गुणपाल की पुत्री वसुश्री की याचना करो कि राजा
वसुश्री के साथ विवाह करना चाहता है। शुभ मुहूर्त में विवाह
की तैयारी करो दासी ने वहाँ समाचार कहा कि यह
सीमायशास्त्री आनन्द छा जाना चाहिए। पटरानी कहने। मुनीश्री
से संत विचार करता है साध्वी को पुत्री देना चाहिए। विश्वमी
के साथ कन्या का विवाह नहीं करूंगा।
विवाह में कन्या की भावना जानना भी परम आवश्यक
है अत: वह वसुश्री को अपने पास बैठाकर प्रेमपूर्वक कहने
लगा मान्य नरेश तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते है। और
तुम्हें विवाह के बाद पटरानी पद दिया जाएगा। हमारे भाग्य
जागेंगे। सभी देश हमारा सम्मान करेंगे। जब तुझे राज्य
शासन मिलेगा तब और भी पुण्य होगा। हमारी गणना राजाओं
में होने लगेगी बेटी धन्य है तुम जैसी बेटी को पाकर।
वसुश्री ने उत्तर दिया- पिताजी आप संसार के वैभव में
हमें भुलाना चाहते है। विश्वमी के साथ विवाह कर हमारा धर्म
नष्ट करना चाहते है। मैं वासना लोलुपी नहीं हूँ धर्म को
छोड़ना नहीं वेतना। जैन धर्म ही सभी प्राणियों का हित करने
वाला है। यही त्रिभुवन में पूज्य व वंदनीय है। देवदेवो के
अनोखी कथाएँ
द्वारा, त्यागीयों को इसी से मोक्ष लक्ष्मी मिलती है। जैन धर्म
तीव्र पुण्य उदय से मिलता है। पापी जीव इसे नहीं पा सकते।
क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, शब्द आदि सम्यग्दर्शन
के प्रति पक्षी है सम्यक दर्शन के प्रभाव से ही मनुष्य अपना
कल्याण कर सकता है। मिथ्यात्व से जीव का हित नहीं हो
सकता।
पुत्री मैंने तुम्हारे विचार समझने को पूछा है मैं खुद यह
सब करने को समर्थ नहीं हूँ मिथ्यादर्शन व हिंसा के समान
अनिष्ट कारी और कुछ भी नहीं है। लड़की की रक्षा यहाँ
से चले जाने पर ही की जा सकती है। इस प्रकार कह कर
अपनी गामिनी स्त्री को अपने मित्र श्री दत्त के यहाँ छोड़कर
१ अरब ८ करोड़ की संपत्ति को छोड़ वह पुत्री को लेकर
चल दिया।
राजा को जब यह पता चला तो मुझे कन्या देना गुणपाल
उनको ने राजेश्वर सारी संपत्ति छोड़ कर कन्या के साथ
दूसरे देश चला गया है। उसने मुझे पानी अपनी समझा है।
धर्म कल्याण करने वाला है। अहिंसा धर्म ही श्रेष्ठ है मैं कुधर्म
में व्यर्थ ही जीवन बिताया। मैंने धर्म को महिमा नहीं समझी
थी यह कह कर राजा ने जिन धर्मानुयायी उस सेठ को ढूंढने
अपने दूत को भेजा। एक दिन शिव गुप्त नामक आचार्य
त्रिगुप्त नामक शिष्य के साथ ईर्यापथ से चलकर आ रहे थे।
श्रीमंत सेठ उन्हें पाप रूपी पर्वत को वज्र समान समझ
पड़गाहन कर ले गए आहार के बाद सभी नहीं एकत्रित हो
गए। धनश्री भी वहाँ आई। त्रिगुप्ति मुनि धनश्री को देख
आश्चर्य में पड़ गए और गुप्त से कहने लगी धर्म यह भद्र
अनोखी कथाएँ
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परिणाम वाली, उत्तम गुण वाली, पति व्रत धर्म में प्रवीण, पर घर में निस्तेज क्यों रही है? गुरु बोले-आयुष्मान! संसार में दुखों के सिवा और कुछ है क्या? इस नगर के राजा ने इससे कन्या माँगी थी। गुणपाल सेठ कन्या ले कौशाम्बी गया बेचारी रह गई। मुनिराज बोले इसके यहाँ जो पुत्र होगा प्रभावशाली, यशस्वी राजा धर्मात्मा होगा। मुनिराज की भविष्यवाणी सुन श्रीदत्त को बड़ा कष्ट हुआ। सोचता है इसके पुत्र को मार डालना चाहिए। यह विचार पूरे भव के दोनों के पैर के कारण आया। धनश्री को श्रीदत्त ने अंधेरी कोठरी में रख छोड़ा सो भोजन देने लगा। उसका आना जाना भी रोक दिया। समय पाकर धनश्री को पुत्र उत्पन्न हुआ सो बच्चे को चुन कर संदाल को दिया और मरा बालक धनश्री के पास सुला दिया। धनश्री को होश आया वो मृतक शिशु को देख रोने लगी। श्रीदत्त ने मायावी शब्दों में समझाना शुरू किया। कर्मोदय को कोई हाथ नहीं रोकला। मरा बालक दुर्भाग्य से हुआ है धैर्य धरो। संदाल बालक के शुभ लक्षण-लाल रंग, प्रभावशाली ललाट, राजाओं जैसे चिह्न देख कर प्रभावित हुआ। उसकी भावना बदल गई। मैं क्यों मारूँ, गरम बालू पर छोड़ देता हूँ अपने आप मर जायेगा। तप बालू पर पड़ा बालक मृत्यु को बाट जोह रहा था कि श्रीदत्त का बहनोई इन्द्रदत्त आ निकला। अथाह सुंदर शिशु को देखकर प्रभावित हुआ और हाथों में ले लिया। कोई सन्तान थी नहीं इसलिए स्त्री का मृदु धर्म बदलकर उसका जन्म महोत्सव मनाकर उसका पालन करने लगा। नीकर चाकरों को भी कहा कि मिला है कहने की मना कर दी।
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श्रीदत्त को बहनोई के घर पुत्र होने का समाचार मिला तो हर्ष से देखने गया उसी पुत्र को जिसे कि संदाल को सौंपा था देखकर मानसिक वेदना हुई व मार डालने का उपाय सोचने लगा। अपने मन में भावों को छिपाकर बोला-मैं बहुत प्रसन्न हूँ आपके यहां धन था बहुत पर संतान के बिना शोभा नहीं थी। राधा से बढ़कर कौन सौभाग्यशाली होगा। इस प्रकार बातें बनाकर राधा को अपने गाँव से आया। इसी प्रकार इन्द्रदत्त अपनी बहन को दुखी करके भी अपनी दुष्टकार्य उस बालक को मारना चाहता था। कपट तो किया था धूमधाम से जन्मोत्सव मनाऊँगा। और एक दिन मरे बालक को रात के जंगल में सुला कर उस बच्चे को जल्लादों को सौंप दिया। प्रातः मरा बालक देख राधा रोने लगी सो वह भी रोने लगा कहने लगा मैं तो इसे अपनी संपत्ति का मालिक बनाना चाहता था। मेरे बड़े अरमान बच्चे की मृत्यु से धूल में मिल गए। मैं कहीं का नहीं रहा। यहाँ नहीं खाता तो मृत्यु तो नहीं होती। इस प्रकार दुष्टों को माथा ठोक-ठोक ठोकर दिखाने लगा।
जल्लाद जब बच्चे को मारने सुनसान स्थान में पहुँचा। तो उसे बच्चे के तेजस्वी मुख को देखकर उसके मन में प्रसन्नता हुई। सोचने लगा कि निरपराध बच्चे की हत्या कर मैं पातकी क्यों बनूँ। मैं इसे इस तालाब के किनारे छोड़ देता हूँ। कोई फिकर जानकर आगे सो खा जाएँगे। और यह अपने आप मर जाएगा। इस प्रकार निर्णय कर तालाब के किनारे रख दिया। दोपहर को गाएँ तालाब में पानी पीने को आई। पानी पीना भूलकर वे उस बच्चे के पास चली गई और उसको
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सूंघने लगी। उस निरीह शिशु की कुव भावनाओं ने उन पशुओं के हृदय पर भी अपना प्रभाव अंकित कर दिया। और सब गायें एकचित्त हो गयीं। स्वतः अपने स्तन से दूध गिराने लगीं। उन ग्वालों ने जो दूध देखा वे अत्यधिक प्रभावित हुए। और उस पुत्र को ले जाकर आपने स्वामी गोविंद को दे दिया। गोविंद ने उस सुंदर शिशु का नाम धनकीर्ति रख दिया धनकीर्ति कुमार कामदेव समान सुंदर व तेजस्वी था। राज पुत्र के समान बुद्धिमान होने लगा।
श्रीदत्त सेठ अपनी पुत्री श्रीमती के विवाह के लिए भी लाने के लिए लुम्बिनी नामक गाँव में गया और उसकी निगाह धनकीर्ति पर पड़ी तो उसने तत्काल पहचान लिया सोचने लगा अभागा अभी भी जिंदा है। मैंने इसे मारने का प्रयत्न किया है फिर भी बच गया। जल्लाद यह धोखा देता है मैं स्वयं अपने हाथों से इसे जहन्नुम भेजूंगा। यह कुछ दिन और रह यहाँ रहकर गाँव लोगों पर अपना प्रभाव डाल दिया। एक दिन गोविंद को बुलाकर कहा-भाई मैं आपसे काम लेना चाहता हूँ। आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगे। आप अपने पुत्र धनकीर्ति को हमारे घर भेज दीजिए। आपकी बड़ी कृपा होगी। मैं अन्य आवश्यक कार्यों से दूसरे गाँव जा रहा हूँ। कपट जाल गोविंद जानता नहीं था। उसने बड़े प्रेम से भोजन कराया और सह का खर्च देकर अपने गाँव भेज दिया। साथ में सेठ पुत्र के लिए पत्र लिखा। मैं जिस व्यक्ति को भी लेकर भेज रहा हूँ उसे तुम विष दे देना। दया दिखलाने की आवश्यकता नहीं है। धनकीर्ति धो का घड़ा लेकर व पत्र लेकर शिप्रा नदी जा रहा था आम के वृक्ष के नीचे छाया में
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बैठ गया। सो गया। मुँह सेना नाम की वेश्या वहां आई उसकी दृष्टि धनकीर्ति पर पड़ी तो मन में स्नेह की धारा उमड़ पड़ी वह अदृश्य शक्ति से खिंच कर पेड़ के नीचे आ गई। धनकीर्ति के सुंदर मुख को देखकर लगा कि उसका पिता ही हो। कमर में बाँधे पत्र को देखा तो पता चला उसका रहस्य समझकर दूसरा पत्र था। तुम्हें मेरी आज्ञा माननी पड़ेगी। मैं दूसरे गाँव आवश्यक कार्य से जा रहा हूँ आज की लग्न सर्वश्रेष्ठ है इसलिए इसकी शादी कर देना। पत्र लिख ज्यो का स्त्री बलात्कार मुँहसेना चली गई। उसने सोते हुए उसे जगाया नहीं। वह जागा तो बिलम्ब जानकर शीघ्र ही धो का घड़ा सिर पर रखकर उज्जैनी नगरी आया और श्री दत्त के पुत्र महाबल को उसके पिता का पत्र दे दिया।
महाबल ने जल्दी ही विवाह की तैयारी कर दी। ज्योतिषी को बुलाकर लग्न दिखायी। ज्योतिषी ने कहा-सर्वश्रेष्ठ समय है। धनकीर्ति राजा होगा, प्रतापी तेजस्वी निकलेगा। महाबल ने शीघ्र ही धनकीर्ति के साथ अपनी बहन का विवाह कर दिया। धनकीर्ति आनंद के साथ रहने लगा। उज्जैनी में आकर श्रीदत्त ने देखा ओहो मैंने मार डालने को लिखा था परन्तु यह जीवित कैसे बच गया। मालूम होता है इसका पुण्य जोरदार है। फिर सोचने लगा-कि मेरी लड़की विधवा हो जाए तो हो जाए परन्तु इसको मारे बिना मैंने चैन नहीं पड़ सकती मुझे दंभ हो गया है। मैं स्वयं नहीं समझ पाता हूँ। क्या करूँ इसे मारना अवश्य है। उसने धनकीर्ति को बुलाया बेटे मैं तुम्हें सुखी धनदशा देनी चाहता हूँ आज अपने कुलदेवता धर्मेन्द्र की पूजा को आधी रात के समय जाना
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होगा। नेवटा चढ़ा कुलदेवता के दर्शन कर लौट आना। उसका पुत्र बोला पिताजी तो नदी-नदी बातें करते हैं। महाबल ने स्वयं नेवटा ले लिया और धनकीर्ति के स्थान पर मंदिर में प्रवेश किया। यों ही जल्लादों की तलवार उसकी गर्दन पर पड़ी पर नहीं गिर पत्नी को प्रभाव हुआ। उसका पुत्र ही मारा गया। जब श्रीदत्त ने धनकीर्ति को घर में देखा तो पूछा कि तुम नेवटा चढ़ाने नहीं गए।
धनकीर्ति- पिताजी! मैं आपके आदेशानुसार जा रहा था। किंतु उत्तर प्रभावी महाबल ने नहीं जाने दिया। मैंने हाथ से नेवटा लेकर चले गए। मैंने आपकी आज्ञा पालन करने का पूरा प्रयत्न किया मुझे रुक जाना पड़ा।
धनकीर्ति के वचन सुनते ही उसकी बड़ी वेदना हुई नंगे पैर मंदिर की ओर दौड़ा। मंदिर के द्वार पर महाबल की लाश के आगे विलाप करने लगा और शोक में विक्षिप्त सा हो गया। सोचने लगा मैंने इस दुष्ट के मारने का कितना प्रयास किया सब व्यर्थ गया। इसके स्थान पर मेरा ही पुत्र मारा गया। किंतु कुछ भी हो इसे मारे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकती। और पत्नी को बुलाकर बोला कि इसको मारे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकती। विष प्रयोग के द्वारा इसे मार दो। पहले पतिव्रता उसकी पत्नी विशाखादत्ता ने उसे बहुत समझाया पर बाद में स्त्री का पति की आज्ञा माननी है। आप बातें चाहते हैं तो पाप करना छोड़ दीजिए। आप ज्ञानवान है अहिंसा तत्व समझो। मुझे उपदेश की आवश्यकता नहीं यदि जीवन चाहो तो इस दुष्ट को मार डालो। स्वामिनी आपकी आज्ञा शिरोधार्य है एक बार दासी के वचनों पर ध्यान दे संसार
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में द्वेष दुखों का तांडव शुरू शुरू से होता आ रहा है। अहिंसा के समान सुख देने वाला कोई नहीं है। जिससे कि वैर-विरोध का अंत किया जाता है। आप विचार करें मैं तो आपके चरणों की दासी हूँ। श्रीदत्त बोला मैं आपसे कुछ सुनना नहीं चाहता। तत्क्षण ऐसा उपाय करो जिससे वह मारा जाए। इसके जीवित रहते एक क्षण भी मेरे को शांति नहीं मिल सकती। हताश होकर पत्नी ने विषैले लड्डू तैयार किये बड़े-बड़े लड्डुओं में विष मिला हुआ था। पुत्री को आदेश दिया कि लड्डू परोस दो। पुत्री सोचती है बड़े लड्डू पति को परोसती हूँ तो क्या सोचेंगे पिताजी लड़की भूल गई इससे बड़े लड्डू पिता को परोस दिए। लड्डू खाते ही श्रीदत्त मूर्छित हो गए और लड़खड़ा कर मर गए। दुष्ट को मारने का जो अनिष्ट सोचता है उसका स्वयं ही अनिष्ट हो जाता है।
धनकीर्ति कुमार ने जब यह देखा आश्चर्य में पड़ गया और श्रीमती भी पिता की अवस्था देख कर रोने लगी। उसके करुण कंठ को देख विशाखादत्ता भी वहां आई उसके मरने पर श्रीमती रो रही है। दामाद के स्थान पर पति का मरण देखकर उसे महान आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगी-हाय रे भाग्य की लीला कौन जान सकता है? जीवन भर कपट वृत्ति की उसका फल जीवन भर उसे ही भोगना पड़ा। धनकीर्ति का बाल बांका नहीं हुआ। अहिंसा रूपी जैन धर्म के फल से भयंकर संकट टल जाता है किंतु हिंसा के कारण सुख भी दुख बन जाता है।
मुनि के वचन असत्य नहीं होंगे यह धनकीर्ति निश्चय
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ही पालक नरेश बनेगा। पृथ्वी में दंडनीय मांडलिक राजा होगा यह दमाद के मुंह की ओर देख कर अपने पति के क्रूर कार्यों की आलोचना पुत्री से कहने लगी। बेटी राजाओं से पूज्य धनकीर्ति को पाकर तुम धन्य हो तुम पटरानी बनोगी। मेरे पति को धनकीर्ति का पुण्य एवं वैभव सहन नहीं हुआ इससे कपट जाल रचकर इन्हें अनेक बार भगाने का प्रयास किया पर असफल रहे। धन्य है जो पुण्यात्मा है उनका कोई बाल बांका नहीं कर सकता। जैसे सूर्य के प्रकाश को कोई छीन नहीं कर सकता वैसे ही पुण्यात्मा के पुण्य को कोई छीन नहीं कर सकता।
गुणपाल सेठ ने अपनी पत्नी धनश्री को मित्र में विश्वास कर छोड़ दिया था। किंतु ईर्ष्या वश उनके पुत्र धनकीर्ति को उत्पन्न होने के दूसरे क्षण से ही मारने का प्रयास किया था। जिसका परिणाम अपनी और अपने पुत्र की मृत्यु हुई। यह आवेश में सारी कथा कहकर स्वयं विष का लड्डू खा गई। और पुत्री को आशीर्वाद दिया कि पवित्रता में सीता के समान, पवित्रता में शची समान, गुरुभक्ति में चेल्ना समान, विद्या में सरस्वती के समान और रूप में रति के समान पटरानी बनेगी। पुनः जोर से कहने लगी श्रीदत्त विश्वासघात का अंतिम संस्कार कर उनके ही व्यक्ति धनकीर्ति की स्तुति करने लगे। हे देव आपके समान पुण्यात्मा कौन है? आपके समान यशस्वी दिव्य तेजस्वी और आलौकिक चमत्कारी कौन है?
धनकीर्ति ससुर के शोर बन का स्वामी बन गया। मालव नरेश विश्वर को उसकी सूचना मिली की यह सेठ गुणपाल
अनोखी कथाएँ
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का पुत्र है। उसे बड़ी प्रसन्नता हुई और राजा ने चारों और दूत भेज कर सम्यक् चूड़ामणि गुणपाल का भी पता लगा लिया। गुणपाल कोशांबी में था तो ससम्मान उसे बुला लिया। उसे राजवैद्य का पद प्रदान किया। तथा उसकी सारी संपत्ति वापस कर दी। राजा उससे कहने लगा। श्रेष्ठि तुम धन्य हो। आपने अपनी धर्म रक्षा के लिए धन वैभव, भोग-विलास का त्याग कर दिया। आपके त्याग का बड़ा भारी प्रभाव पड़ा है। मैंने उसी दिन से जैन धर्म धारण किया था। श्रावक की क्रियाएँ पालन करने लग गया हूँ। कृपया अब जैन धर्म के तत्वों को हमें समझाइये। मैंने यह भी निश्चय किया है मैं अपनी पुत्री का विवाह आपके पुत्र के साथ करूंगा और कन्या दान से आधा राज्य भी दूंगा आप स्वीकार करें। गुणपाल बोला मैं यह सब तभी स्वीकार करूंगा। तब आप वस्तुतः जैन दीक्षा लेंगे। गुरुस्वाध्याय को बुलाकर दीक्षाजन्य क्रिया करवायेंगे तब आप जैन माने जाएंगे। राजा बोला- श्रेष्ठियों में जैन धर्म का पालन करता हूं आपकी इच्छा है तो मैं दीक्षाजन्य क्रिया धारण करूं इसका शीघ्र प्रबंध कर दें। राजा की दीक्षाजन्य क्रिया के बाद शुभ मुहूर्त में धनकीर्ति का विवाह हो गया। कुछ समय राज्य करते-करते संसार शरीर भोगों की असारता को विचार करते हुए आत्मकल्याण करने वाली दिगम्बरी दीक्षा यशोधर मुनिराज से ग्रहण कर ली। श्रीमती आदि ने आर्यिकाओं के पास आर्यिका दीक्षा ले ली। सभी लोग संन्यास मरण कर स्वर्ग में देव हुए।
आहार दान का फल
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जो पहले श्रीभूषण राजा थे वे शांतिनाथ हुए। जम्बूद्वीप के दक्षिण में भरत क्षेत्र के मध्य देश के रत्नपुर नामक नगर में श्रीषेण नाम का राजा राज्य करता था। धीर-वीर और दान का देने वाला था। शत्रुओं को नाश करने में दीर्घ दक्ष प्रजा का पालन करने वाला था। दो रानियां सिन्धुमती, आनंदिता रानी के दो पुत्र हुए। सब अच्छी तरह से राज्य चल रहा था। उसी नगर में शारीरिक नाम का ब्राह्मण महाबुद्धिमान था। अचल ग्राम में भी एक ब्राह्मण रहता था। धरणी जट नाम, वेद-वेदांगों का ज्ञाता था। अग्निहोत्र पत्नी से इन्दुमति, अग्निभूति नाम के पुत्र थे। एक कपिल लड़का नाम का दासी का पुत्र था जो पूर्ण पुण्य से श्रीषेण बुद्धि वाला था। जब इन दोनों पुत्रों को ब्राह्मण पढ़ता था तब यह दासी पुत्र कपिल भी पढ़ता था। बुद्धि कर्मानुसारिणी होती है। बिना पढ़ाये ही वह दासी पुत्र सुनकर ज्ञानवान हो गया।
सभी ब्राह्मण धरणीजट को क्रोधित हो गए। दासी के पुत्र को विद्या क्यों पढ़ाई। और कपिल को घर से निकाल दिया। रत्नपुर नगर के ब्राह्मण का वध करके रहने लगा। सात्यकि पुरोहित ने अपनी पुत्री सरमात्मा का विवाह इसके साथ कर दिया। राज्य में अधिक सम्मान पाने लगा। बहुत सारे वेदों का पाठ करने लगा।
जब सरमात्मा राजभवन हुई तब वह कपिल कुचरित्र करने की शुभेच्छा करने लगा। सरमात्मा ने यह देखकर मन में विचार किया। यह पापी किसी नीच का लड़का है उत्तम
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पुरुष ऐसी चेष्टा नहीं करते। यह कपिल से विरक्त हो गई प्रेम छोड़ दिया और अपने महल में रहने लगी। धरणी जट ब्राह्मण पाप कर्मोदय से दरिद्री हो गया। कपिल का अधिक वैभव समाप्त है सुनकर वहां आया। देखो ब्राह्मण की लड़की को कैसा पाप मिला और इसे गरीबी आ गई।
कपिल ब्राह्मण अंदर बहुत रोष कर रहा था। बाहर अत्यंत अनुराग रख रहा था। और इसके चरणों में पड़ा। ऊंचे पर बैठकर बहुत सेवा की थी। और कहने लगा मेरी मां माई वगैरह सब सुख से है। ऐसा पूछकर गरम जल से स्नान कराके वस्त्रभूषण पहनाकर यह ब्राह्मण मेरा पिता है किंचित ऐसी कपटपूर्ण बात कही। यह ब्राह्मण दरिद्री था इसलिए यह भी इसको अपना लड़का बताने लगा। कपट वचन धरणी जट को सारे नगर में प्रसिद्ध करना पड़ा। इस दरिद्रता के कारण कार्य अकार्य कुछ भी मनुष्य नहीं निंदता सभी करता है। एक माह व्यतीत हुआ धरणी जट को उस नगरी में सरमात्मा जो गुणों की खान थी। एक दिन उससे बोली-मैं बहुत सारा धन दूंगी लेकिन यह बदमाश धरणी जट पिताजी कपिल क्या तुम्हारा पुत्र है। इसकी चेष्टाएं अत्यंत खोटी, गंदी, खराब है। मेरे हृदय में इसके प्रति प्रेम नहीं है। तब यह बात जान धरणी जट ब्राह्मण ने सारी बात बता दी और बहुत सारा धन सरमात्मा से पाकर अपने घर की ओर गया। सरमात्मा अपने पति को नीच कुली दासी पुत्र जानकर राजा की शरण में गई। राजा ने अपनी पुत्री के समान इसको सन्यास में रखा। और कपिल को दुष्ट बुद्धि कपटी चरित्र हीन राजवचना रहित समग्र कला मुख्य करवा कर गये पर बैठाकर देश से निकाल
अनोखी कथाएँ
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दिया। राजाओं का यह धर्म है सज्जनों का पालन करें, दुष्टों को दंड देवें। नहीं तो देश में चरित्रहीन बहुत होने लगेंगे। एक दिन राजा के यहां तप रत्न की खान दो चारण ऋद्धि मुनि मानो दो चंद्रमा ही हो, आये। आदित्य मति और अरिंजय इनको देखकर राजा ने प्रणाम किया। राजा ने भक्ति पूर्वक प्रदक्षिण करके आहार दिया।
इस प्रकार श्रीषेण राजा ने दान दिया अपने पुत्रों के साथ बहुत दिन सुख भोगने के बाद अपना शरीर छोड़ कर उत्तम भोग भूमि में सरमात्मा के साथ जन्म लिया। इस प्रकार के सुख भोगें। जहां शीत उष्ण की बाधा नहीं दरिद्रता नहीं अलगायु नहीं, आपस में प्रेम, युद्ध नहीं दान के प्रभाव से ही वहां जीव जन्म लेते हैं। वहां से आकर देव गति में ही जन्म लेते हैं। पांच जोध ने भोग भूमि के अच्छे सुख भोग और फिर हस्तिनापुर में भव भर में ऊंचे पदों को पाकर सुख भोगते हुए विवकेतन ऐरावत के यहां शांति नाथ तीर्थंकर के रूप में अवतार लिया और मोक्ष गए।
वृषभसेना
जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में कोहरी पतन नामक समुद्र का किनारा था। जहां उससेन नाम का राजा राज्य करता था। प्रजापित बुद्धिमान विवेक सहित अनेक गुणों से युक्त धर्मात्मा था। उसी नगर में जिनचंद्र सेठ और धनश्री नाम की उसकी सेठानी थी। जो अत्यंत सुंदर अनेक गुणों की ख्यात पति की अत्यंत प्यारी थी। उसी के एक लड़की (सुता) ने जन्म लिया।
अनोखी कथाएँ
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वह अत्यंत सुंदरी गुणवान माता-पिता ने वृषभसेना उसका नाम रखा। क्षय भी उसका अत्यंत सुंदरी भीति से पालन करती थी। बड़े प्रयत्न से उसका नंदन करती थी। उस वृषभ सेना के नहाने के जल से एक गड्ढा भर गया था। एक दिन कोई आदि योगी से युक्त कुत्ता उसमें गिर पड़ा। गिरते ही वह कुत्ता अत्यंत सुंदर स्वस्थ बन हो गया जिससे गाय को बड़ा आश्चर्य हुआ। उस धाय ने मन में चिंतन किया धन्य हो यह सुकुमारी बड़ी पुण्यात्मा है। इसके शरीर के नहाने का जो जल फलता है वह रोग को नाश करने वाला है। और अमृत के समान है। उस नंदन से नहा कर उस धाय की माता १२ वर्ष से अंधी थी। उस जल को लगाने से उसकी आंखें खुल गई। वह धाय अपनी माता का रूप देख अत्यंत हर्षित हुई। इसके शरीर से शोषित जल जो औषधि के समान है। इस धर्म की ख्याति में सारे जगत में विख्यात करूंगी। इसके प्रभाव से सारे जगत के रोग नष्ट होते थे।
एक दिन राजा नरिंगल ने मंत्री को धनप्रियलाल राजा के देश में भेजा वह तुरंत ही जा पहुंचा। जब यह पहुंचा तो सब कुओं में उसने विष डाल दिया। तब इस राजा की सारी सेना विष युक्त पानी पीते ही बीमार हो गये। तब धाय ने वृषभसेना के नंदन के जल को लगा कर सभी निरोगी हो गए। जिस प्रकार कि गुरु वचनों के प्रसाद से मिथ्यात्व तुरंत ही नष्ट हो जाता है। उससेन राजा ने आखिर उसके ऊपर चढ़ाई की। उन कुओं का पानी पीते ही सारी सेना फिर धनप्रियगल ज्वर से पीड़ित हो गई। तब राजा फिर उदास होकर लौट कर अपने स्थान पर आ गया।
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— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3032.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है