अनोखी कथाएँ भाग-4 - जैन स्वाध्याय सामग्री | Anokhi Kathayen Bhag-4

अनोखी कथाएँ भाग-4

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अनुक्रमणिका

अनुक्रम

विषय पेज सं
आहुतिदान का फल 1
धन वैभव छोड़ा 15
आहार दान का फल 26
झूम सेना 28
णमोकार मंत्र का महा प्रभाव 31
समस्याएँ देह धरे का कहीं फल पायो 40
जिसे कि हमें प्राप्त करना है 41
तीर्थंकर नेम कुमार की वीरता 44
मानतुंग की भक्ति 45
मूर्ति का महत्व 47
क्रोध की औषधि 48
अक्रोध की परीक्षा 50
प्रतिमा पूर्ण उत्तर 52
सेठ हरसुखराय 53
अब हम अमर भये ना मरेंगे 59
आत्मा रूपी बगीचा 59
मनुष्य कौन 60

प्रकाशक

प्रेरणा : शु० राजमति माता जी
विधान : अनोखी कथाएँ भाग पाँच
संकलन एवं संपादन : धर्मचंद शास्त्री प्रतिष्ठाचार्य
प्रकाशन वर्ष : 2001
पृष्ठ नं : 1
मूल्य : 20 रुपये
प्रकाशक : आचार्य धर्म भूतग्रन्थ माला
प्राप्ति स्थान : जैन मंदिर गुलाब वाटिका, लोनी रोड, दिल्ली

बुराई के बदले भलाई

बालक की बुद्धि
पर दुःख कातरता
आया अंग सोने का
निर्मोही परिवार
स्वर्ग का द्वार
सर्वतो भद्र साधु राज
महान् तत्व ज्ञानी
धर्म ध्यान
आगमोक्त आचरण
पुण्य संचय
विवेक दृष्टि
लोकोत्तर महात्मा
आध्यात्मिक प्रहरी
आश्चर्यप्रद व्यक्तित्व
युग निर्माता
अभय वाणी
मंगल वाणी
कामना

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आर्तध्यान का फल

जम्बू द्वीप के कुरु जंगल नाम का देश है। इसमें अवन्ति
नाम की नगरी है। इस नगरी का राजा अनुपस्थिर नाम का
था। इसकी पटरानी थी पद्मावती, प्रेमावती, सुप्रभा, कनकप्रभ
इन पटरानियों में पद्मावती का अग्रस्थान था इनके पुत्र का
नाम अनन्तीर्थी था अन्य रानियों में ५०० पुत्र उत्पन्न थे।
माडलिक राजा इसे नमस्कार करते थे। इसकी सभा में सदा
नाच गाना होता रहता था।
एक दिन वनमाली ने आकर वसंत ऋतु में वन बिहार के
लिए कहा। सभी सेना राजकुमार अल्प-शस्त्र लेकर चल दिए।
वन में सौंदर्य को देख लता निकुंजों में विश्राम किया। और
रत्न मणियों से निर्मित घाटों सोपानी वाले रंग बिरंगे जल से
युक्त तालाब में जल क्रीड़ा से युक्त प्रिय प्रेमसे किया। तालाब
का जल कुमुम्, केशर, कस्तूरी, कपूर आदि से सुगंधित किया
गया। उसके घाटों पर मणियों के सोफे पूरे गए थे। सोपानों
पर सुगंधित पुष्प बिछाये गए थे। राजा अपनी महारानी के साथ
जल क्रीड़ा में मग्न था।
इसी बीच विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणीस्थ अकलापुरी
का निवासी ब्रजदत्त नाम का विद्याधर अपनी स्त्री मदनवेगा
के साथ आकाश मार्ग से आ रहा था। मदनवेगा की दृष्टि
तालाब में जलक्रीड़ा करते हुए अनुपस्थिर राजा पर पड़ी तो
वह कहने लगी हम लोग पक्षी की तरह आकाश में घूमते रहते
हैं। देखिए यह राजा कितना सुखी है अपने समस्त परिवार
के साथ आनन्दपूर्वक विहार कर रहा है। हम लोग केवल नाम

के विद्याधर है। पर वास्तव में हमारे जीवन में तनिक भी सुख
नहीं है। हमको अधिक सुखी तो यह राजा है। इसने किस
प्रकार का सुंदर तालाब बनवाया है। इस तालाब का जल
भी कितना सुगंधित और स्वस्थ है। वास्तव में यह धन्य है
मनुष्य जीवन के लौकिक सुखों को भोग रहा है।
ब्रजदत्त को अनुपस्थिर राजा की यह प्रशंसा अच्छी नहीं
लगी। वह अपनी स्त्री को अलकापुरी में छोड़कर पुनः वहां
पर आया और एक बड़ी सी शिला लेकर उस तालाब को
ढक दिया। राजा रानी उसी तालाब के भीतर रह गए। यद्यपि
उन्होंने बाहर निकलने का पूर्ण प्रयत्न किया पर वे प्रयत्न
में सफल नहीं हो सके। रानियों ने राजा से कहा देव अब
दुःख करने से कुछ नहीं होने वाला है। पूर्व जन्म कृत कर्मों
का फल तो भोगना ही पड़ता है। शुभा-अशुभ कर्म का उदय
किसी को नहीं छोड़ता अब शांतिपूर्वक आई हुई विपत्ति को
सहना चाहिए। घबराने या विलाप करने से कुछ नहीं होने
का है। स्त्री, पुत्र, धन-दौलत सब यहीं पर रहने वाली वस्तुएँ
हैं। इनमें मोह करना व्यर्थ है। समय आने पर कोई किसी
की सहायता नहीं करता। चिन्ता, दुःख, क्लान्ति करने से कुछ
भी साथ आने का नहीं है। इस जीव ने पूर्व जन्म में जैसे
शुभाशुभ कर्म किये है। उनका फल इस भोगना ही पड़ता
है। अब मृत्यु से इसे कोई बचा नहीं सकता। अतः भगवान्
जिनेन्द्र देव के वचनों का ध्यान कीजिये। वीर वही है जो
मृत्यु का वीरता पूर्वक आलिंगन करे। और तनिक भी विचलित
न हो। हे- देव अब परिग्रह का मोह छोड़ संन्यास धारण
करना चाहिए। नहीं कल्याण करने वाला है। इसी के द्वारा

मनुष्य का उपकार हो सकता है। मरते समय जो व्यक्ति मोह
करता है वह अपना अहित कर लेता है। अतएव अब धन धान्य
वैभव आदि का त्याग कर आत्म कल्याण में लगना चाहिए।
महाराज ब्रजदत्त सही समान अपनी गति मत बिगाड़िये।
परिग्रह का मोह बड़ा ही अहित कर होता है। आचार्यों ने
परिग्रह के मोह को समस्त पापों की खान माना है। कोई
जीव परिग्रह का त्याग किए बिना अपना हित साधन नहीं
कर सकता है।
मोही राजा ने धन धान्य वैभव राज्य परिवार के आसक्त
चित्त होकर मरण किया। लाखों तरह समझाए जाने पर भी
राजा का मोह नहीं छूटा। आर्तध्यान में लीन रहा। स्त्री पुत्रों
का नाम ले कर विलाप करते हुए उसने प्राण छोड़े जिससे
उसी उद्यान में मरकर अजगर हुआ। रानियों ने समस्त परिग्रह
त्याग कर संन्यास धारण किया जिससे वे सौधर्म स्वर्ग में
सामग्री की आयु प्राप्त कर आनंदकान्ता, सुकान्त अग्निकान्त
नामक देव हुआ। जब राजकुमारों और सामंतों और रानियों
सहित अनुपस्थिर महाराज की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ
वे सभी दुःख में संलग्न हो गए तालाब में रखे गए पत्थर को
देखकर कहने लगे यह कार्य किसी यक्ष या विद्याधर का
है। पूर्व जन्म के वैर के कारण ही ऐसा करने लगे और नाना
प्रकार से दुःख प्रकट करते हुए चिंतित हुए। अनन्तीर्थी ने
सबको समझाया और कर्म को विवेकरूप को स्वरूप बताते
हुए धैर्य प्रदान किया।
शुभ मुहूर्त में अनन्तीर्थी का राज्याभिषेक कर दिया गया।
सारे कार्य पूर्ववत् चलने लगे। एक दिन इस नगर में

अवधिज्ञानी सारस्वता नाम के आचार्य संघ सहित पधारे व
अवन्ति के उद्यान में एक मनोहर शिला पर आसीन होकर
तपस्या करने लगे।
अनन्तीर्थी मुनि संघ का समाचार पाकर परिजन पुरजन
सहित मुनिराज की वंदना के लिए गया और निकट पहुँच
कर तीन प्रदक्षिणा दी और अष्टद्रव्यों से पूजा की। पश्चात्
मुनिराज का उपदेश सुनने लगा। धर्मोपदेश श्रवण करने के
अनन्तर उनसे हाथ जोड़ कर मुनिराज से पूछा- मेरे
माता-पिता का मरण क्यों हुआ है। उनके ऊपर वृहद शिला
कैसे रखी गई।
अवधि ज्ञान द्वारा बातों को जानकर मुनिराज बोले-बस
ब्रजदत्त नाम का विद्याधर अपनी पत्नी मदनवेगा सहित भ्रमण
करता हुआ था। अपनी पत्नी द्वारा की गई राजा की
प्रशंसा उसे अच्छी न लगी। पत्नी को अलकापुरी में छोड़कर
एक वृहद शिला सरोवर पर ढक दिया गया है। जिससे वहाँ
अनुपस्थिर और रानियों की मृत्यु हो गई। अनन्तीर्थी ने पूछा-
हे स्वामिन उनकी मृत्यु कैसे हुई। यह बतलाने की कृपा करें।
मुनिराज ने कहा- तुम्हारी माताओं ने समस्त वस्तुओं से
ममत्व छोड़ कर संन्यास धारण किया था। जिससे वे सौधर्म
स्वर्ग में देव हुई है। और अनुपस्थिर को अंत में मोह से सताया
जिससे वह उसी वाटिका में अजगर पर्याय को प्राप्त हुआ
है। अनन्तीर्थी माताओं की सुगति और पिता की दुर्गति जान
कर आश्चर्य चकित रह गया। उसने विद्याधर यह जीव
परिणामों के अनुसार सुगति और दुर्गति प्राप्त करता है। अतः
वह मुनिराज से हाथ जोड़ कर कहने लगा। प्रभो आप मेरे

पिता को थोड़ा कष्ट करके ऐसा उपदेश दीजिए जिससे वह
तिर्यंच गति को छोड़कर अपना आत्म कल्याण कर सकें।
मुनिराज बोले- अभी उस अजगर को उपदेश देने से आपके
पिता के जीव सर्प की जाति स्मरण हो सकता है तथा जाति
स्मरण होते ही स्वर्ग में रानियों के जीव भी वहां आ जाएंगे।
और उनके उपदेश देने लगेंगे। जिससे परिग्रह आसक्ति
में होने वाली हानि समझाए जाएंगे और संसार से ममत्व छोड़कर
अपनी आत्मा का कल्याण करेंगे। हमारे उपदेश की अपेक्षा
तुम्हारे ही समझाने से उनका कल्याण हो सकता है। जैनधर्म
एक ऐसा अमृत है किसी भी अवस्था में सेवन करें लाभ ही
लाभ है। यह धर्म सभी जीवों का कल्याण करने वाला है
अनन्तीर्थी मुनिराज को नमस्कार करके पिता के जीव अजगर
के पास गया। और उसे नमस्कार कर कहने लगा-रत्नी
होकर आपकी पत्नियों ने परिग्रह छोड़ने के कारण देव पद
प्राप्त किया है। सांसारिक पदार्थों की वांछा तथा परिग्रह की
लालसा ही हानि कारक है। आपने पुरुष पर्याय प्राप्त कर
शूरवीरता के अनेक कार्य किए परन्तु मरण के समय धन धान्य
से मोह लग रहा। जिससे आपको यह नीच पर्याय की प्राप्ति
हुई है। इस प्रकार देव समझाकर वहां से चले गए। अनन्तीर्थी
भी उसे संबोधन देकर चला गया और मुनिराज के पास आकर
सारा वृत्तान्त कहा।
मुनिराज बोले- अनन्तीर्थी बस सर्पराज की आयु अब
केवल ५० दिन की है।
अनन्तीर्थी- प्रभो। आप एक बार साधु उनके उपकार
के लिए अवश्य चलें। आपको यह पहुंचने पर अवश्य ही उनका

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कल्याण होगा।
अनंतवीर्य के आग्रह को स्वीकार कर मुनिराज अग्रकर के पास गये। बोले-मुनिराज अब तुम्हारी आयु १५ दिन शेष है। अतः मोक्ष लक्ष्मी लेने वाले व्रतों को स्वीकार कीजिये अहिंसा में ही धर्म है इस प्रकार समझाकर उसे व्रत दे दिए। मुनिराज १५ दिन तक निरन्तर उस अजगर को उपदेश देते रहे और अंत समय निकट जानकर बोले- तुम्हारी आयु अब समाप्त हो रही है। अब शरीर से मोह छोड़कर आत्मकल्याण में प्रवृत्त होना चाहिए। भेद विज्ञान द्वारा अनेक भवों द्वारा संचित पाप इसी भव में समाप्त करने का उद्यम करना पड़ेगा। यही श्रेष्ठ है। अब संन्यास मरण धारण करना परम आवश्यक है मुनिराज ने संसार की क्षण भंगुरता, वैभव की अस्थिरता को दूरदराज वर्णन किया। तथा संन्यास मरण धारण करने पर बहुत जोर दिया। समाधि मरण का महत्व बतलाते हुए मुनिराज कहने लगे। एक भव में ही समाधि धारण करने से जीव अपना कल्याण कर लेता है। समाधि मरण से आठ भव पश्चात् अवश्य निर्वाण सुख मिलता है। वस्तुतः रत्नत्रय के समान इस जीव की भलाई करने वाला अन्य कोई नहीं है। यही संसार से भ्रान्त जीवों को सुख और शांत देने वाला धर्म है। जो इस धर्म को भूल जाते है वे अनंत काल तक संसार भ्रमण करते रहते हैं।
इस प्रकार १५ दिनों तक उपदेश सुनते रहने से उस अजगर के परिणामों में शांति थी उजड़ को मैंने क्या बिगाड़ा था सो मेरे लिए इस प्रकार शिक्षा रख कर मरा है मैं उनसे जरूर बदला लूंगा। यह भावना उसके हृदय में थी। इसलिए

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यह तीन पात की आयु समाप्त कर भवनवासी देव हुआ।
अनंतवीर्य से पुनः मुनिराज से पूछा अब मेरी क्या गति हुई है।
एक ब्रजदत्त विद्याधर ने एक अप्रतिष्ठित राजा को तालाब में शिला रख कर मृत्यु को प्राप्त कराया था। “कषायु आप भयों बहिनने सखलीत कर खायो अति दीन” जिस समय वह राजा बलवान एक भवनवासी देव हुआ तो उस विद्याधर से बदला लेने का विचार करने लगा। अग्रकर कहा गया यह पूछने पर मुनिराज ने बताया था। बदला लेने की भावना शेष रह जाने से भवनवासी देवों में जन्म लेना पड़ा है परिग्रह खोटे भाव कितना बुरा है। बड़ा पाप है। रानियों ने इसके स्थान से देव गति प्राप्त की। परंतु राजा को दो भव यो ही खाने पड़े। मोह बहुत बड़ा पाप है इसका फलन जल्दी नहीं हो सकता। मुनिराज के वचनों का अनंतवीर्य पर बहुत प्रभाव पड़ा। उससे संसार का हाल सुन राजा अप्रतिष्ठित के पुत्र अनतवीर्य को वैराग्य आ गया और अपने पुत्र स्वभायु कुमार को बुलाकर राज तिलक कर दिया। और स्वयं अपरिमही तप वस्या करने गए और अनंतवीर्य ने समेद शिखर से तप कर निर्वाण प्राप्त किया।
अनुपरिचर राजा के जीव विपुल देव नामक भवनवासी देव ने जब ब्रजदत्त विद्याधर को देखा तो क्रोधाभिभूत होकर देखा समस्त विद्याओं को छीन लिया। तथा विद्याधर और उसकी पत्नी को समुद्र में डाल दिया और उनके समुद्र में डालकर कहने लगा खूब पानी पियो और अपनी करनी का फल भोगो। तुमने मुझे ४ परानियों के साथ जल क्रीड़ा करते

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समय शिलाखंड से ढककर मारा था। इसी का बदला मैंने चुकाया है। विद्याधर आर्तध्यान से मरकर प्रथम नरक में गया। इधर कुरुजांगल देश हस्तिनापुर नगर में जयदत्त नाम का राजा शासन करता था। उसकी रानी का नाम विधाया देवी था। उनके कोई संतान नहीं थी। दोनों दम्पति ने गुरुदत्त मुनिराज नमस्कार कर कहा- प्रभो हमारे किस पाप का उदय है। जिससे कुल बढ़ाने वाली संतति हमें प्राप्त नहीं हुई। क्या कभी हमें संतान होगी या बिना संतान के यो ही राज्य नष्ट हो जाएगा। गुरुदत्त मुनिराज ने कहा- वत्स धैर्य रखो। घबराने की आवश्यकता नहीं है। आपको जैन धर्म बढ़ाने वाला, निर्मल चरित्र का धारी धर्मात्मा पुत्र होगा। कुछ दिनों में अनुपरिचर राजा का जीव विमलदेव व्यन्तर विजया देवी के गर्भ में आवेगा। समय पाकर रानी के एक सुंदर पुत्र हुआ। जिसका नाम गुरुदत्त रखा गया। क्योंकि यह पुत्र गुरुदत्त मुनिराज के आशीर्वाद से उत्पन्न हुआ था। अतः उन्हीं के नाम पर इसका नामकरण हुआ। यह शिशु प्रारंभ से ही होनहार विवेकी, समझदार और प्रतिभाशाली था। इसने थोड़े ही समय में सब शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था।
गुरुदत्त भी राज्य ग्रहण के योग्य हो गया पिता ने श्री सुधर्माचार्य से दीक्षा ले ली। शासन भार पुत्र को हाथों में सौंप दिया और दिगम्बर मुनि बनकर कठोर तपस्या करने लगे। गुरुदत्त भी पिता के द्वारा दिये गये राज्य शासन को बहुत ही सुंदर और व्यवस्थित ढंग से चलाने लगा। उसने राज्य की वृद्धि की और प्रजा की सुख सुविधा के लिए अनेक प्रयत्न किये। प्रजा नये राजा से बहुत प्रसन्न थी। क्योंकि वह

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दूनी रात चौगुनी उन्नति होती जा रही थी। मादलिक महामादलिक राजा उसे नमस्कार करने लगे थे।
एक दिन महाराज ने चंपापुर के राजा धात्रीवाहन की पुत्री अभयमती को मांगने के लिए दूत भेजा। पर धात्री वाहन राजा ने कन्या देने से इन्कार कर दिया। जिससे गुरुदत्त ने चंपापुरी पर आक्रमण किया। चारों ओर से घेर लिया। जब अभयमती को यह समाचार ज्ञात हुआ कि कोई राजा इसका हरण करना चाहता है। तो उसे बहुत चिंता हुई क्योंकि उसने अपने मन में गुरुदत्त राजा से ही विवाह करने का निश्चय कर लिया था। जब अभयमती को यह पता चला कि गुरुदत्त महाराज स्वयं ही सेना लेकर आए है और वह स्वयं पिता के पास गई और अपना निश्चय उनसे सुना दिया। उन्होंने कहा कि पिताजी मैं अपना विवाह गुरुदत्त के सिवाय अन्य किसी के साथ नहीं कर सकती हूं। इस भव में मेरे पति गुरुदत्त महाराज ही है। इसलिए आप उन्हीं के साथ मेरा विवाह कीजिए। कन्या की इच्छा जानकर धात्री वाहन ने अपनी कन्या अभयमती का विवाह गुरुदत्त राजा के साथ कर दिया। गुरुदत्त विवाह के पश्चात् अपनी नगरी में लौट आए। और पूर्ववत् राज्य शासन करने लगे।
नरक से निकल कर ब्रजदत्त विद्याधर जिसे कि समुद्र में डुबोकर मारा था। नीलगिरी पर वही नरक का नारकी बाघ का जीव हुआ। और आस-पास के गांव में आकर आक्रमण करने लगा। जिससे प्रजा में त्राहि-त्राहि मचने लगी। लोग भयभीत होकर गुरुदत्त के पास आए। वे कहने लगे हे राजन नीलगिरि पर्वत पर जो सिंह रहता है उससे पीड़ित है। वह

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बच्चों को मनुष्यों को आधी रात को आकर ले जाता है पशु बछड़ों की तो गिनती ही नहीं। न जाने कितने खा गया है। आप हमारे पालक राजा है प्रजापाल है हम अपनी व्यथा और किससे कहने को जाए दया करो और हमें अपनी रक्षा का उपाय बताओ। गुरुदत्त राजा ने कहा कि राजा का कर्तव्य क्या है पृथ्वी की रक्षा करना दुष्ट लुटेरों चारों को देश से बाहर निकाल देना। सब प्रकार से प्रजा को संरक्षण करना। इसी प्रकार गुरुदत्त राजा ने अपनी प्रजा के लिए सब प्रकार से संरक्षण करना। तो राजा ने आज्ञा दी जिस गुफा में व्याघ्र रहता था उस गुफा में आग लगा दो। लकड़ियां भरवाकर आग लगवा दी। जिससे आठवेंद्य ध्यान के परिणामों से मरकर वह सौराष्ट्र देश में दीपनामा नामक पर्वत के नीचे पहली खेट नामक गांव में आमरण नामक ब्राह्मण का हलमुख नाम का पुत्र था।
एक दिन हस्तिनापुर में अमिताभ नामक मुनिराज आए। राजा गुरुदत्त ने उन्हें नमोस्तु कर अपने पूर्व भवों को जानने की अभिलाषा प्रकट की। मुनिराज ने गुरुदत्त के भव प्रकट किए। बताया कि तुम राजा थे अग्रगर हुए और भवनवासी देव समाधि करके बने थे इस प्रकार भवों को बताया। गुरुदत्त मुनिराज के वचनों को सुनकर वैराग्य हुआ। और मुनिराज से अभयमती के पूर्व भव बतलाने की प्रार्थना की। मुनिराज ने बताया कि चंपापुर रानी नगर में एक किरात भील रहता था। उसकी स्त्री का नाम गोमुखी था एक दिन गोमुखी चतुर्विध संघ सहित आए समाधि गुप्त नाम के मुनिराज का धर्मोपदेश सुन रही थी। उपदेश श्रावण के बाद सभी लोगों

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ने व्रत लेकर देवव्रत गोमुखी ने भी अणुव्रत ग्रहण किए। इसका पति प्रतिदिन कबूतर पकड़ करके लाता था पर उसको यह छोड़ देती थी। जिससे वह नाराज होकर इसे प्रतिदिन पीटता था। एक दिन क्रोध में आकर गरूड़ वेग ने गोमुखी को घर से निकाल दिया वह घर से निकल कर अपने एक कुटुम्बी के यहां रहने लगी। मरते समय उसने धात्री वाहन राजा के ऐश्वर्य को प्राप्त करने की भावना की इस कारण यह धात्री वाहन राजा की पुत्री हुई है।
अभयमती रानी अपने पूर्व भव में भी व्रत के फल को सुनकर बहुत प्रसन्न हुई। और सोचने लगी कि व्रतों के सिवा अन्य कोई संसार में रक्षक नहीं है। धर्म ही इस जीव को लोक और परलोक के दुखों से मुक्ति दे सकता है। अब तक भोगों में आसक्त रहकर इसने अपने जीवन को कौड़ी के मोल बेच दिया। पर अब आत्मकल्याण के लिए तैयार हो जाना चाहिए। यह जीव व्यसनों में फंसकर अपना अहित करता है। सच्चे धर्म को पकड़ कर छोड़ देता है। जिससे इसे आत्मिक तृप्ति नहीं होती। अब अवश्य ही हम लोगों को आत्मकल्याण में लग जाना चाहिए। इस प्रकार निश्चय कर राजा गुरुदत्त और अभयमती रानी संसार शरीर भोगों से विरक्त हो गए। गुरुदत्त की समस्त भोगोपभोग सामग्री अच्छी नहीं लगती।
महाराज गुरुदत्त ने अपने पुत्र को बुलाया। और उन्हें सारी बातें समझाकर राजा तिलक दे दिया। तथा अमिताभ नामक आचार्य के पास आकर दीक्षा ग्रहण की। थोड़े दिनों में द्वादशांग श्रुतज्ञान का धारी होकर गुरु सेवा

करता रहा। और पश्चात् गुरु आज्ञा से एकाकी विहार करने
लगा।
अभयमति ने इन्हीं आचार्य की शिष्या सुव्रता आर्यिका से
व्रत ग्रहण किए। राजा और रानी तपस्या करने लगे। अभयमति
की आयु थोड़ी थी। अत: उसने अपनी मृत्यु निकट जान समाधि
मरण धारण कर लिया। मरते समय उसके परिणामों में अपूर्व
शांति थी। जिससे वह कापिष्ठ स्वर्ग में ललितका नामक देव
हुई।
गुरुदत्त आचार्य विहार करते पल्लीखेड नामक गाँव के
जंगल में आए। और संध्या हो जाने से प्रतिमा योग धारण
किया। प्रात: काल हलमुख ने गुरुदत्त मुनि को देखा। वह
अपने खेत में हल जोतने जा रहा था। और अपनी स्त्री को
खेत में भोजन लाने के लिए घर पर कह कर आया था। पर
वहाँ खेत में पानी भरा हुआ था। इसलिए हल चलाना बहुत
ही कठिन है। अत: वह मुनिराज से कहने लगा। ऐ साधु जब
मेरी स्त्री यहाँ भोजन करने को आवे तू उससे कह देना कि
पश्चिम के खेत में हल जोतने गया है। वही पर भोजन दे
आवे देरी नहीं करे। और देखो भूल मत जाना अन्यथा मुझे
भूखा रहना पड़ेगा।
स्त्री जब दोपहर की रोटियाँ लेकर आई। और खेत में
हलमुख को नहीं पाया तो बहुत नाराज हुई और गालियाँ देती
हुई वापस लौट आई। इधर पश्चिम वाले खेत पर जब संध्या
समय तक भोजन नहीं आया। तो हलमुख को बड़ा कष्ट हुआ।
और क्रोध में पागल हुआ घर आया। और स्त्री को जोर से
पीटने लगा रोते हुए स्त्री ने कहा- आप खेत पर कहाँ थे

मैं तो घटो बैठकर आई हूँ मेरी क्या गलती है।
वह हलमुख बोला- क्या साधु ने जो कहा था या उसने
यह बात नहीं कही कि मैं पश्चिम के खेत पर गया हूँ। मैंने
तो वहाँ बैठे साधु से कहा था मेरी पत्नी से कह देना कि
पश्चिम की ओर के खेत पर जा रहा हूँ। बड़ा मक्कार निकला
वह साधु देखता हूँ उसे और तीव्र क्रोध में आकर कहता है।
मैं उसकी मरम्मत किए बिना नहीं छोडूंगा यदि तीव्र जलकर
बुरी तरह जलाया नहीं तो काहे का ब्राह्मण और काहे की
गृहस्थानी हूँ। यह हलमुख नारकी पहले नरक में था वहाँ से
मरकर सिंह हुआ और आज देखो सिंह नरकी की तीनों पर्यायों
जीवों को मारना कुत्तो के समान नारकीयो से लड़ना यह
करना था इसलिए संस्कार थे ही।
वह हलमुख मुनिराज के पास गया। और उनको पकड़
लाया और उनके शरीर में मिट्टी के तेल से भीगा कपड़ा लपेट
दिया और आग लगा दी। गुरुदत्त मुनिराज को तो पूर्व भव
का स्मरण होने से वैराग्य आया था इसलिए वो आत्म श्रद्धा
गए शरीर अलग है। मैं चैतन्य सिद्ध हूँ ज्ञानघन आत्मा हूँ।
वैसे की गुरुदत्त मुनिराज मन को एकाग्र करके अपनी
आत्मा को ध्यान में लीन होना श्रेष्ठ समझकर आत्मा में लीन
हो गए। उन्होंने राज्य अवस्था में सिंह को गुफा में आग
लगवाने की आज्ञा दी थी। आज वही सिंह का जीव ब्राह्मण
हलमुख बना जो कि अपने पूर्व भव का बैरी को वैर के संस्कार
से जैसे गुरुदत्त राजा ने जलाया वैसे ही मुनि बनने पर जला
रहा है।
वे गुरुदत्त मुनिराज जलने लगे शरीर से मोह छोड़ दिया।

शरीर रूपी वैद्गालय चैतन्य आत्मा रूपी देव विराजमान है
उसे चैतन्य आत्मा में लीन हो गए और प्रत्येक आत्मा का
यही भावना आनी चाहिए क्योंकि भावना भव नाशिनी होती
है।
मुनिराज सोचने लगे क्रोध भी मेरा स्वरूप नहीं है। इससे
भलाई नहीं हो सकती क्षमा ही हमारा स्वभाव है। आत्म हित
शुक्ल ध्यान में लीन होने में हित है। इसलिए शुक्ल ध्यान
में लीन होकर घातिया कर्मों का नाश करके केवल ज्ञान रूपी
आत्म संपत्ति को प्राप्त किया। केवल ज्ञान होने पर ५ प्रकार
के देव स्तुति आकर के करने लगे।
देव पुन: कहने लगे - हे प्रभो आपके चरण प्रसाद से
कल्याण, वचन और निर्माण मिलने में क्या देरी है। देवराज
आपके चरण निरन्तर वन्दनीय है। कर्म बंधन को नाश करने
के लिए आप दयानिधि के समान है। इस प्रकार देवो ने स्तुति
की।
हलमुख ने देवो को आया हुआ देखकर आश्चर्य में डूब
गया। तथा बहुत भयभीत भी हुआ यह देवो के अतिशय से
उदट कर बहुत दूर जाकर गिरा। यहाँ तो केवल ज्ञान के
अतिशय दिख रहे थे भगवान् आकाश में थे दिव्य तेज उनके
शरीर से निकल रहा था। उनकी दिव्य ध्वनि बिखर रही थी।
और हलमुख ने गुरुदत्त केवली के दिनों के पूर्व के भवों का
वर्णन निकाल रहा था। उसको सुनकर हलमुख को तीव्र वैराग्य
आया। और मुनिराज के ऊपर जो उपसर्ग किया था उसके
लिए भी उसके मन में भी बहुत कष्ट हुआ केवली भगवान्
के मुख से पंचम काल का स्वरूप भी पूछा और विश्वरता को

जानकर हलमुख का हृदय और भी कांपने लगा व वैराग्य
को प्राप्त होकर उसी गुरुदत्त केवली के निकट जिन दीक्षा
ग्रहण कर ली। गुरुदत्त केवली पृथ्वी पर विहार करते हुए
पल्ली खेत नगर में आए। और वहाँ द्रोणागिरि पर्वत से मुक्ति
को प्राप्त हुए।

धन वैभव कथा

भारत देश में मालव देश में अनूपपुरी समान विश्ववर राजा
राजा करता था। और राजेश्वरी गुणपाल उनकी सेवनी रति
इन्द्राणी के रूप को भी तिरस्कृत करने वाली थी। रात दिन
मममद भक्ति दान पूजा स्वाध्याय में लीन रहती थी। लक्ष्मी
व सरस्वती का भंडार थी उसके एक बन्धुश्री कन्या थी।
धनश्री ने एक दिन प्रात: मुहूर्त में ऐरावत हाथी, चंद्रमा,
सूर्य देखा सुबह पति से पूछा तो परब्रम्ही धर्मज्ञ गुणवक्त
पुत्र होगा। सूर्य देखने से जिन शासन में उन्नति करने वाला
काम देव समान पुत्र होगा ऐसा जिन मंदिर में जा मुनिराज
से स्वप्नों का फल समझा। धनश्री के गर्भ में बालक आया
दान, पूजा तीर्थाटन करने की भावना हुई। ६३ शलाका पुरुषों
की कथा, तीर्थाटन, जिनालयों के दर्शन, भगवान् के समक्ष
बैठ कर स्तुति, स्वर्ग समान की प्रवृत्ति श्रावकों के साथ धार्मिक
चर्चा करना जिनेन्द्र भगवान् का परमागत अभिषेक की भावना
आदि धार्मिक भावनाओं को पूर्ण करती थी।
कैलाश पर्वत के ७२ जिनालयों का ध्यान, सुमेरु
पर्वतों के जिनालयों का पूर्ण ध्यान करने लगी चतुर्विध
संघ को खूब दान दिया।

एक दिन विश्ववर राजा वैभव के साथ हाथी पर सवार
से वन क्रीडा को जा रहा था। इस अनिद्य सुंदरी को देख
काम पीड़ित हो गया। सोचने लगा मेरी, शची देवांगना के
समान कौन है इस सुंदरी के बिना जीवन निरर्थक है। विश्ववर
राजमार्ग से वापस लौटा तो मूर्छित हो गया। बहन अगर कपूर
से अनेक शीतलोपचार किए चेतना लौटी तो कहने लगा कि
जाओ गुणपाल की पुत्री वसुश्री की याचना करो कि राजा
वसुश्री के साथ विवाह करना चाहता है। शुभ मुहूर्त में विवाह
की तैयारी करो दासी ने वहाँ समाचार कहा कि यह
सीमायशास्त्री आनन्द छा जाना चाहिए। पटरानी कहने। मुनीश्री
से संत विचार करता है साध्वी को पुत्री देना चाहिए। विश्वमी
के साथ कन्या का विवाह नहीं करूंगा।
विवाह में कन्या की भावना जानना भी परम आवश्यक
है अत: वह वसुश्री को अपने पास बैठाकर प्रेमपूर्वक कहने
लगा मान्य नरेश तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते है। और
तुम्हें विवाह के बाद पटरानी पद दिया जाएगा। हमारे भाग्य
जागेंगे। सभी देश हमारा सम्मान करेंगे। जब तुझे राज्य
शासन मिलेगा तब और भी पुण्य होगा। हमारी गणना राजाओं
में होने लगेगी बेटी धन्य है तुम जैसी बेटी को पाकर।
वसुश्री ने उत्तर दिया- पिताजी आप संसार के वैभव में
हमें भुलाना चाहते है। विश्वमी के साथ विवाह कर हमारा धर्म
नष्ट करना चाहते है। मैं वासना लोलुपी नहीं हूँ धर्म को
छोड़ना नहीं वेतना। जैन धर्म ही सभी प्राणियों का हित करने
वाला है। यही त्रिभुवन में पूज्य व वंदनीय है। देवदेवो के

द्वारा, त्यागीयों को इसी से मोक्ष लक्ष्मी मिलती है। जैन धर्म
तीव्र पुण्य उदय से मिलता है। पापी जीव इसे नहीं पा सकते।
क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, शब्द आदि सम्यग्दर्शन
के प्रति पक्षी है सम्यक् दर्शन के प्रभाव से ही मनुष्य अपना
कल्याण कर सकता है। मिथ्यात्व से जीव का हित नहीं हो
सकता।
पुत्री मैंने तुम्हारे विचार समझने को पूछा है मैं खुद यह
सब करने को समर्थ नहीं हूँ मिथ्यादर्शन व हिंसा के समान
अनिष्ट कारी और कुछ भी नहीं है। लड़की की रक्षा यहाँ
से चले जाने पर ही की जा सकती है। इस प्रकार कह कर
अपनी गामिनी स्त्री को अपने मित्र श्री दत्त के यहाँ छोड़कर
१ अरब ८ करोड़ की संपत्ति को छोड़ वह पुत्री को लेकर
चल दिया।
राजा को जब यह पता चला तो मुझे कन्या देना गुणपाल
उनको ने राजेश्वर सारी संपत्ति छोड़ कर कन्या के साथ
दूसरे देश चला गया है। उसने मुझे पानी अपनी समझा है।
धर्म कल्याण करने वाला है। अहिंसा धर्म ही श्रेष्ठ है मैं कुधर्म
में व्यर्थ ही जीवन बिताया। मैंने धर्म को महिमा नहीं समझी
थी यह कह कर राजा ने जिन धर्मानुयायी उस सेठ को ढूंढने
अपने दूत को भेजा। एक दिन शिव गुप्त नामक आचार्य
त्रिगुप्त नामक शिष्य के साथ ईर्यापथ से चलकर आ रहे थे।
श्रीमंत सेठ उन्हें पाप रूपी पर्वत को वज्र समान समझ
पड़गाहन कर ले गए आहार के बाद सभी नहीं एकत्रित हो
गए। धनश्री भी वहाँ आई। त्रिगुप्ति मुनि धनश्री को देख
आश्चर्य में पड़ गए और गुप्त से कहने लगी धर्म यह भद्र

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परिणाम वाली, उत्तम गुण वाली, पति व्रत धर्म में प्रवीण, पर घर में निस्तेज क्यों रही है? गुरु बोले-आयुष्मान्! संसार में दुखों के सिवा और कुछ है क्या? इस नगर के राजा ने इससे कन्या माँगी थी। गुणपाल सेठ कन्या ले कौशाम्बी गया बेचारी रह गई। मुनिराज बोले इसके यहाँ जो पुत्र होगा प्रभावशाली, यशस्वी राजा धर्मात्मा होगा। मुनिराज की भविष्यवाणी सुन श्रीदत्त को बड़ा कष्ट हुआ। सोचता है इसके पुत्र को मार डालना चाहिए। यह विचार पूरे भव के दोनों के पैर के कारण आया। धनश्री को श्रीदत्त ने अंधेरी कोठरी में रख छोड़ा सो भोजन देने लगा। उसका आना जाना भी रोक दिया। समय पाकर धनश्री को पुत्र उत्पन्न हुआ सो बच्चे को चुन कर संदाल को दिया और मरा बालक धनश्री के पास सुला दिया। धनश्री को होश आया वो मृतक शिशु को देख रोने लगी। श्रीदत्त ने मायावी शब्दों में समझाना शुरू किया। कर्मोदय को कोई हाथ नहीं रोकला। मरा बालक दुर्भाग्य से हुआ है धैर्य धरो। संदाल बालक के शुभ लक्षण-लाल रंग, प्रभावशाली ललाट, राजाओं जैसे चिह्न देख कर प्रभावित हुआ। उसकी भावना बदल गई। मैं क्यों मारूँ, गरम बालू पर छोड़ देता हूँ अपने आप मर जायेगा। तप बालू पर पड़ा बालक मृत्यु को बाट जोह रहा था कि श्रीदत्त का बहनोई इन्द्रदत्त आ निकला। अथाह सुंदर शिशु को देखकर प्रभावित हुआ और हाथों में ले लिया। कोई सन्तान थी नहीं इसलिए स्त्री का मृदु धर्म बदलकर उसका जन्म महोत्सव मनाकर उसका पालन करने लगा। नौकर चाकरों को भी कहा कि मिला है कहने की मना कर दी।

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श्रीदत्त को बहनोई के घर पुत्र होने का समाचार मिला तो हर्ष से देखने गया उसी पुत्र को जिसे कि संदाल को सौंपा था देखकर मानसिक वेदना हुई व मार डालने का उपाय सोचने लगा। अपने मन में भावों को छिपाकर बोला-मैं बहुत प्रसन्न हूँ आपके यहां धन था बहुत पर संतान के बिना शोभा नहीं थी। राधा से बढ़कर कौन सौभाग्यशाली होगा। इस प्रकार बातें बनाकर राधा को अपने गाँव से आया। इसी प्रकार इन्द्रदत्त अपनी बहन को दुखी करके भी अपनी दुष्टकार्य उस बालक को मारना चाहता था। कपट तो किया था धूमधाम से जन्मोत्सव मनाऊँगा। और एक दिन मरे बालक को रात के जंगल में सुला कर उस बच्चे को जल्लादों को सौंप दिया। प्रातः मरा बालक देख राधा रोने लगी सो वह भी रोने लगा कहने लगा मैं तो इसे अपनी संपत्ति का मालिक बनाना चाहता था। मेरे बड़े अरमान बच्चे की मृत्यु से धूल में मिल गए। मैं कहीं का नहीं रहा। यहाँ नहीं खाता तो मृत्यु तो नहीं होती। इस प्रकार दुष्टों को माथा ठोक-ठोक ठोकर दिखाने लगा।

जल्लाद जब बच्चे को मारने सुनसान स्थान में पहुँचा। तो उसे बच्चे के तेजस्वी मुख को देखकर उसके मन में प्रसन्नता हुई। सोचने लगा कि निरपराध बच्चे की हत्या कर मैं पातकी क्यों बनूँ। मैं इसे इस तालाब के किनारे छोड़ देता हूँ। कोई फिकर जानकर आगे सो खा जाएँगे। और यह अपने आप मर जाएगा। इस प्रकार निर्णय कर तालाब के किनारे रख दिया। दोपहर को गाएँ तालाब में पानी पीने को आई। पानी पीना भूलकर वे उस बच्चे के पास चली गई और उसको

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सूंघने लगी। उस निरीह शिशु की कुव भावनाओं ने उन पशुओं के हृदय पर भी अपना प्रभाव अंकित कर दिया। और सब गायें एकचित्त हो गयीं। स्वतः अपने स्तन से दूध गिराने लगीं। उन ग्वालों ने जो दूध देखा वे अत्यधिक प्रभावित हुए। और उस पुत्र को ले जाकर आपने स्वामी गोविंद को दे दिया। गोविंद ने उस सुंदर शिशु का नाम धनकीर्ति रख दिया धनकीर्ति कुमार कामदेव समान सुंदर व तेजस्वी था। राज पुत्र के समान बुद्धिमान् होने लगा।

श्रीदत्त सेठ अपनी पुत्री श्रीमती के विवाह के लिए भी लाने के लिए लुम्बिनी नामक गाँव में गया और उसकी निगाह धनकीर्ति पर पड़ी तो उसने तत्काल पहचान लिया सोचने लगा अभागा अभी भी जिंदा है। मैंने इसे मारने का प्रयत्न किया है फिर भी बच गया। जल्लाद यह धोखा देता है मैं स्वयं अपने हाथों से इसे जहन्नुम भेजूंगा। यह कुछ दिन और रह यहाँ रहकर गाँव लोगों पर अपना प्रभाव डाल दिया। एक दिन गोविंद को बुलाकर कहा-भाई मैं आपसे काम लेना चाहता हूँ। आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगे। आप अपने पुत्र धनकीर्ति को हमारे घर भेज दीजिए। आपकी बड़ी कृपा होगी। मैं अन्य आवश्यक कार्यों से दूसरे गाँव जा रहा हूँ। कपट जाल गोविंद जानता नहीं था। उसने बड़े प्रेम से भोजन कराया और सह का खर्च देकर अपने गाँव भेज दिया। साथ में सेठ पुत्र के लिए पत्र लिखा। मैं जिस व्यक्ति को भी लेकर भेज रहा हूँ उसे तुम विष दे देना। दया दिखलाने की आवश्यकता नहीं है। धनकीर्ति धो का घड़ा लेकर व पत्र लेकर शिप्रा नदी जा रहा था आम के वृक्ष के नीचे छाया में

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बैठ गया। सो गया। मुँह सेना नाम की वेश्या वहां आई उसकी दृष्टि धनकीर्ति पर पड़ी तो मन में स्नेह की धारा उमड़ पड़ी वह अदृश्य शक्ति से खिंच कर पेड़ के नीचे आ गई। धनकीर्ति के सुंदर मुख को देखकर लगा कि उसका पिता ही हो। कमर में बाँधे पत्र को देखा तो पता चला उसका रहस्य समझकर दूसरा पत्र था। तुम्हें मेरी आज्ञा माननी पड़ेगी। मैं दूसरे गाँव आवश्यक कार्य से जा रहा हूँ आज की लग्न सर्वश्रेष्ठ है इसलिए इसकी शादी कर देना। पत्र लिख ज्यो का स्त्री बलात्कार मुँहसेना चली गई। उसने सोते हुए उसे जगाया नहीं। वह जागा तो बिलम्ब जानकर शीघ्र ही धो का घड़ा सिर पर रखकर उज्जैनी नगरी आया और श्री दत्त के पुत्र महाबल को उसके पिता का पत्र दे दिया।

महाबल ने जल्दी ही विवाह की तैयारी कर दी। ज्योतिषी को बुलाकर लग्न दिखायी। ज्योतिषी ने कहा-सर्वश्रेष्ठ समय है। धनकीर्ति राजा होगा, प्रतापी तेजस्वी निकलेगा। महाबल ने शीघ्र ही धनकीर्ति के साथ अपनी बहन का विवाह कर दिया। धनकीर्ति आनंद के साथ रहने लगा। उज्जैनी में आकर श्रीदत्त ने देखा ओहो मैंने मार डालने को लिखा था परन्तु यह जीवित कैसे बच गया। मालूम होता है इसका पुण्य जोरदार है। फिर सोचने लगा-कि मेरी लड़की विधवा हो जाए तो हो जाए परन्तु इसको मारे बिना मैंने चैन नहीं पड़ सकती मुझे दंभ हो गया है। मैं स्वयं नहीं समझ पाता हूँ। क्या करूँ इसे मारना अवश्य है। उसने धनकीर्ति को बुलाया बेटे मैं तुम्हें सुखी धनदशा देनी चाहता हूँ आज अपने कुलदेवता धर्मेन्द्र की पूजा को आधी रात के समय जाना

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होगा। नेवटा चढ़ा कुलदेवता के दर्शन कर लौट आना। उसका पुत्र बोला पिताजी तो नदी-नदी बातें करते हैं। महाबल ने स्वयं नेवटा ले लिया और धनकीर्ति के स्थान पर मंदिर में प्रवेश किया। यों ही जल्लादों की तलवार उसकी गर्दन पर पड़ी पर नहीं गिर पत्नी को प्रभाव हुआ। उसका पुत्र ही मारा गया। जब श्रीदत्त ने धनकीर्ति को घर में देखा तो पूछा कि तुम नेवटा चढ़ाने नहीं गए।

धनकीर्ति- पिताजी! मैं आपके आदेशानुसार जा रहा था। किंतु उत्तर प्रभावी महाबल ने नहीं जाने दिया। मैंने हाथ से नेवटा लेकर चले गए। मैंने आपकी आज्ञा पालन करने का पूरा प्रयत्न किया मुझे रुक जाना पड़ा।

धनकीर्ति के वचन सुनते ही उसकी बड़ी वेदना हुई नंगे पैर मंदिर की ओर दौड़ा। मंदिर के द्वार पर महाबल की लाश के आगे विलाप करने लगा और शोक में विक्षिप्त सा हो गया। सोचने लगा मैंने इस दुष्ट के मारने का कितना प्रयास किया सब व्यर्थ गया। इसके स्थान पर मेरा ही पुत्र मारा गया। किंतु कुछ भी हो इसे मारे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकती। और पत्नी को बुलाकर बोला कि इसको मारे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकती। विष प्रयोग के द्वारा इसे मार दो। पहले पतिव्रता उसकी पत्नी विशाखादत्ता ने उसे बहुत समझाया पर बाद में स्त्री का पति की आज्ञा माननी है। आप बातें चाहते हैं तो पाप करना छोड़ दीजिए। आप ज्ञानवान है अहिंसा तत्व समझो। मुझे उपदेश की आवश्यकता नहीं यदि जीवन चाहो तो इस दुष्ट को मार डालो। स्वामिनी आपकी आज्ञा शिरोधार्य है एक बार दासी के वचनों पर ध्यान दे संसार

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में द्वेष दुखों का तांडव शुरू शुरू से होता आ रहा है। अहिंसा के समान सुख देने वाला कोई नहीं है। जिससे कि वैर-विरोध का अंत किया जाता है। आप विचार करें मैं तो आपके चरणों की दासी हूँ। श्रीदत्त बोला मैं आपसे कुछ सुनना नहीं चाहता। तत्क्षण ऐसा उपाय करो जिससे वह मारा जाए। इसके जीवित रहते एक क्षण भी मेरे को शांति नहीं मिल सकती। हताश होकर पत्नी ने विषैले लड्डू तैयार किये बड़े-बड़े लड्डुओं में विष मिला हुआ था। पुत्री को आदेश दिया कि लड्डू परोस दो। पुत्री सोचती है बड़े लड्डू पति को परोसती हूँ तो क्या सोचेंगे पिताजी लड़की भूल गई इससे बड़े लड्डू पिता को परोस दिए। लड्डू खाते ही श्रीदत्त मूर्छित हो गए और लड़खड़ा कर मर गए। दुष्ट को मारने का जो अनिष्ट सोचता है उसका स्वयं ही अनिष्ट हो जाता है।

धनकीर्ति कुमार ने जब यह देखा आश्चर्य में पड़ गया और श्रीमती भी पिता की अवस्था देख कर रोने लगी। उसके करुण कंठ को देख विशाखादत्ता भी वहां आई उसके मरने पर श्रीमती रो रही है। दामाद के स्थान पर पति का मरण देखकर उसे महान् आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगी-हाय रे भाग्य की लीला कौन जान सकता है? जीवन भर कपट वृत्ति की उसका फल जीवन भर उसे ही भोगना पड़ा। धनकीर्ति का बाल बांका नहीं हुआ। अहिंसा रूपी जैन धर्म के फल से भयंकर संकट टल जाता है किंतु हिंसा के कारण सुख भी दुख बन जाता है।

मुनि के वचन असत्य नहीं होंगे यह धनकीर्ति निश्चय

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ही पालक नरेश बनेगा। पृथ्वी में दंडनीय मांडलिक राजा होगा यह दामाद के मुंह की ओर देख कर अपने पति के क्रूर कार्यों की आलोचना पुत्री से कहने लगी। बेटी राजाओं से पूज्य धनकीर्ति को पाकर तुम धन्य हो तुम पटरानी बनोगी। मेरे पति को धनकीर्ति का पुण्य एवं वैभव सहन नहीं हुआ इससे कपट जाल रचकर इन्हें अनेक बार भगाने का प्रयास किया पर असफल रहे। धन्य है जो पुण्यात्मा है उनका कोई बाल बांका नहीं कर सकता। जैसे सूर्य के प्रकाश को कोई छीन नहीं कर सकता वैसे ही पुण्यात्मा के पुण्य को कोई छीन नहीं कर सकता।

गुणपाल सेठ ने अपनी पत्नी धनश्री को मित्र में विश्वास कर छोड़ दिया था। किंतु ईर्ष्या वश उनके पुत्र धनकीर्ति को उत्पन्न होने के दूसरे क्षण से ही मारने का प्रयास किया था। जिसका परिणाम अपनी और अपने पुत्र की मृत्यु हुई। यह आवेश में सारी कथा कहकर स्वयं विष का लड्डू खा गई। और पुत्री को आशीर्वाद दिया कि पवित्रता में सीता के समान, पवित्रता में शची समान, गुरुभक्ति में चेल्ना समान, विद्या में सरस्वती के समान और रूप में रति के समान पटरानी बनेगी। पुनः जोर से कहने लगी श्रीदत्त विश्वासघात का अंतिम संस्कार कर उनके ही व्यक्ति धनकीर्ति की स्तुति करने लगे। हे देव आपके समान पुण्यात्मा कौन है? आपके समान यशस्वी दिव्य तेजस्वी और आलौकिक चमत्कारी कौन है?

धनकीर्ति ससुर के शोर बन का स्वामी बन गया। मालव नरेश विश्वर को उसकी सूचना मिली की यह सेठ गुणपाल

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का पुत्र है। उसे बड़ी प्रसन्नता हुई और राजा ने चारों और दूत भेज कर सम्यक्‌ चूड़ामणि गुणपाल का भी पता लगा लिया। गुणपाल कोशांबी में था तो ससम्मान उसे बुला लिया। उसे राजवैद्य का पद प्रदान किया। तथा उसकी सारी संपत्ति वापस कर दी। राजा उससे कहने लगा। श्रेष्ठि तुम धन्य हो। आपने अपनी धर्म रक्षा के लिए धन वैभव, भोग-विलास का त्याग कर दिया। आपके त्याग का बड़ा भारी प्रभाव पड़ा है। मैंने उसी दिन से जैन धर्म धारण किया था। श्रावक की क्रियाएँ पालन करने लग गया हूँ। कृपया अब जैन धर्म के तत्वों को हमें समझाइये। मैंने यह भी निश्चय किया है मैं अपनी पुत्री का विवाह आपके पुत्र के साथ करूंगा और कन्या दान से आधा राज्य भी दूंगा आप स्वीकार करें। गुणपाल बोला मैं यह सब तभी स्वीकार करूंगा। तब आप वस्तुतः जैन दीक्षा लेंगे। गुरुस्वाध्याय को बुलाकर दीक्षाजन्य क्रिया करवायेंगे तब आप जैन माने जाएंगे। राजा बोला- श्रेष्ठियों में जैन धर्म का पालन करता हूँ आपकी इच्छा है तो मैं दीक्षाजन्य क्रिया धारण करूँ इसका शीघ्र प्रबंध कर दें। राजा की दीक्षाजन्य क्रिया के बाद शुभ मुहूर्त में धनकीर्ति का विवाह हो गया। कुछ समय राज्य करते-करते संसार शरीर भोगों की असारता को विचार करते हुए आत्मकल्याण करने वाली दिगम्बरी दीक्षा यशोधर मुनिराज से ग्रहण कर ली। श्रीमती आदि ने आर्यिकाओं के पास आर्यिका दीक्षा ले ली। सभी लोग संन्यास मरण कर स्वर्ग में देव हुए।

आहार दान का फल

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जो पहले श्रीभूषण राजा थे वे शांतिनाथ हुए। जम्बूद्वीप के दक्षिण में भरत क्षेत्र के मध्य देश के रत्नपुर नामक नगर में श्रीषेण नाम का राजा राज्य करता था। धीर-वीर और दान का देने वाला था। शत्रुओं को नाश करने में दीर्घ दक्ष प्रजा का पालन करने वाला था। दो रानियां सिन्धुमती, आनंदिता रानी के दो पुत्र हुए। सब अच्छी तरह से राज्य चल रहा था। उसी नगर में शारीरिक नाम का ब्राह्मण महाबुद्धिमान् था। अचल ग्राम में भी एक ब्राह्मण रहता था। धरणी जट नाम, वेद-वेदांगों का ज्ञाता था। अग्निहोत्र पत्नी से इन्दुमति, अग्निभूति नाम के पुत्र थे। एक कपिल लड़का नाम का दासी का पुत्र था जो पूर्ण पुण्य से श्रीषेण बुद्धि वाला था। जब इन दोनों पुत्रों को ब्राह्मण पढ़ता था तब यह दासी पुत्र कपिल भी पढ़ता था। बुद्धि कर्मानुसारिणी होती है। बिना पढ़ाये ही वह दासी पुत्र सुनकर ज्ञानवान हो गया।

सभी ब्राह्मण धरणीजट को क्रोधित हो गए। दासी के पुत्र को विद्या क्यों पढ़ाई। और कपिल को घर से निकाल दिया। रत्नपुर नगर के ब्राह्मण का वध करके रहने लगा। सात्यकि पुरोहित ने अपनी पुत्री सरमात्मा का विवाह इसके साथ कर दिया। राज्य में अधिक सम्मान पाने लगा। बहुत सारे वेदों का पाठ करने लगा।

जब सरमात्मा राजभवन हुई तब वह कपिल कुचरित्र करने की शुभेच्छा करने लगा। सरमात्मा ने यह देखकर मन में विचार किया। यह पापी किसी नीच का लड़का है उत्तम

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पुरुष ऐसी चेष्टा नहीं करते। यह कपिल से विरक्त हो गई प्रेम छोड़ दिया और अपने महल में रहने लगी। धरणी जट ब्राह्मण पाप कर्मोदय से दरिद्री हो गया। कपिल का अधिक वैभव समाप्त है सुनकर वहां आया। देखो ब्राह्मण की लड़की को कैसा पाप मिला और इसे गरीबी आ गई।

कपिल ब्राह्मण अंदर बहुत रोष कर रहा था। बाहर अत्यंत अनुराग रख रहा था। और इसके चरणों में पड़ा। ऊंचे पर बैठकर बहुत सेवा की थी। और कहने लगा मेरी मां माई वगैरह सब सुख से है। ऐसा पूछकर गरम जल से स्नान कराके वस्त्राभूषण पहनाकर यह ब्राह्मण मेरा पिता है किंचित ऐसी कपटपूर्ण बात कही। यह ब्राह्मण दरिद्री था इसलिए यह भी इसको अपना लड़का बताने लगा। कपट वचन धरणी जट को सारे नगर में प्रसिद्ध करना पड़ा। इस दरिद्रता के कारण कार्य अकार्य कुछ भी मनुष्य नहीं निंदता सभी करता है। एक माह व्यतीत हुआ धरणी जट को उस नगरी में सरमात्मा जो गुणों की खान थी। एक दिन उससे बोली-मैं बहुत सारा धन दूंगी लेकिन यह बदमाश धरणी जट पिताजी कपिल क्या तुम्हारा पुत्र है। इसकी चेष्टाएं अत्यंत खोटी, गंदी, खराब है। मेरे हृदय में इसके प्रति प्रेम नहीं है। तब यह बात जान धरणी जट ब्राह्मण ने सारी बात बता दी और बहुत सारा धन सरमात्मा से पाकर अपने घर की ओर गया। सरमात्मा अपने पति को नीच कुली दासी पुत्र जानकर राजा की शरण में गई। राजा ने अपनी पुत्री के समान इसको सन्यास में रखा। और कपिल को दुष्ट बुद्धि कपटी चरित्र हीन राजवचना रहित समग्र कला मुख्य करवा कर गये पर बैठाकर देश से निकाल

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दिया। राजाओं का यह धर्म है सज्जनों का पालन करें, दुष्टों को दंड देवें। नहीं तो देश में चरित्रहीन बहुत होने लगेंगे। एक दिन राजा के यहां तप रत्न की खान दो चारण ऋद्धि मुनि मानो दो चंद्रमा ही हो, आये। आदित्य मति और अरिंजय इनको देखकर राजा ने प्रणाम किया। राजा ने भक्ति पूर्वक प्रदक्षिण करके आहार दिया।

इस प्रकार श्रीषेण राजा ने दान दिया अपने पुत्रों के साथ बहुत दिन सुख भोगने के बाद अपना शरीर छोड़ कर उत्तम भोग भूमि में सरमात्मा के साथ जन्म लिया। इस प्रकार के सुख भोगें। जहां शीत उष्ण की बाधा नहीं दरिद्रता नहीं अलगायु नहीं, आपस में प्रेम, युद्ध नहीं दान के प्रभाव से ही वहां जीव जन्म लेते हैं। वहां से आकर देव गति में ही जन्म लेते हैं। पांच जोध ने भोग भूमि के अच्छे सुख भोग और फिर हस्तिनापुर में भव भर में ऊंचे पदों को पाकर सुख भोगते हुए विवकेतन ऐरावत के यहां शांति नाथ तीर्थंकर के रूप में अवतार लिया और मोक्ष गए।

वृषभसेना

जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में कोहरी पतन नामक समुद्र का किनारा था। जहां उससेन नाम का राजा राज्य करता था। प्रजापित बुद्धिमान् विवेक सहित अनेक गुणों से युक्त धर्मात्मा था। उसी नगर में जिनचंद्र सेठ और धनश्री नाम की उसकी सेठानी थी। जो अत्यंत सुंदर अनेक गुणों की ख्यात पति की अत्यंत प्यारी थी। उसी के एक लड़की (सुता) ने जन्म लिया।

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वह अत्यंत सुंदरी गुणवान माता-पिता ने वृषभसेना उसका नाम रखा। क्षय भी उसका अत्यंत सुंदरी भीति से पालन करती थी। बड़े प्रयत्न से उसका नंदन करती थी। उस वृषभ सेना के नहाने के जल से एक गड्ढा भर गया था। एक दिन कोई आदि योगी से युक्त कुत्ता उसमें गिर पड़ा। गिरते ही वह कुत्ता अत्यंत सुंदर स्वस्थ बन हो गया जिससे गाय को बड़ा आश्चर्य हुआ। उस धाय ने मन में चिंतन किया धन्य हो यह सुकुमारी बड़ी पुण्यात्मा है। इसके शरीर के नहाने का जो जल फलता है वह रोग को नाश करने वाला है। और अमृत के समान है। उस नंदन से नहा कर उस धाय की माता १२ वर्ष से अंधी थी। उस जल को लगाने से उसकी आंखें खुल गई। वह धाय अपनी माता का रूप देख अत्यंत हर्षित हुई। इसके शरीर से शोषित जल जो औषधि के समान है। इस धर्म की ख्याति में सारे जगत् में विख्यात करूंगी। इसके प्रभाव से सारे जगत् के रोग नष्ट होते थे।

एक दिन राजा नरपिंगल ने मंत्री को धनप्रियलाल राजा के देश में भेजा वह तुरंत ही जा पहुंचा। जब यह पहुंचा तो सब कुओं में उसने विष डाल दिया। तब इस राजा की सारी सेना विष युक्त पानी पीते ही बीमार हो गये। तब धाय ने वृषभसेना के नंदन के जल को लगा कर सभी निरोगी हो गए। जिस प्रकार कि गुरु वचनों के प्रसाद से मिथ्यात्व तुरंत ही नष्ट हो जाता है। उससेन राजा ने आखिर उसके ऊपर चढ़ाई की। उन कुओं का पानी पीते ही सारी सेना फिर धनप्रियगल ज्वर से पीड़ित हो गई। तब राजा फिर उदास होकर लौट कर अपने स्थान पर आ गया।

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अनोखी कथाएँ

गुरुदत्त भी राज्य ग्रहण के योग्य हो गया पिता ने श्री सुधर्माचार्य से दीक्षा ले ली। शासन भार पुत्र को हाथों में सौंप दिया और दिगम्बर मुनि बनकर कठिन तपस्या करने लगे। गुरुदत्त भी पिता के द्वारा दिये गये राज्य शासन को बहुत ही सुंदर और व्यवस्थित ढंग से चलाने लगा। उसने राज्य की वृद्धि की और प्रजा की सुख सुविधा के लिए अनेक प्रयत्न किये। प्रजा नये राजा से बहुत प्रसन्न थी। क्योंकि दिन

अनोखी कथाएँ

दूनी रात चौगुनी उन्नति होती जा रही थी। मांडलिक महामांडलिक राजा उसे नमस्कार करने लगे थे।

एक दिन महाराज ने चंपापुर के राजा धात्रीवाहन की पुत्री अभयमती को मांगने के लिए दूत भेजा। पर धात्री वाहन राजा ने कन्या देने से इंकार कर दिया। जिससे गुरुदत्त ने चंपापुरी पर आक्रमण किया। चारों ओर से घेर लिया। जब अभयमती को यह समाचार ज्ञात हुआ कि कोई राजा इसका हरण करना चाहता है। तो उसे बहुत चिंता हुई क्योंकि उसने अपने मन में गुरुदत्त राजा से ही विवाह करने का निश्चय कर लिया था। जब अभयमती को यह पता चला कि गुरुदत्त महाराज स्वयं ही सेना लेकर आए हैं और वह स्वयं पिता के पास गई और अपना निश्चय उन्हें सुना दिया। उन्होंने कहा कि पिताजी मैं अपना विवाह गुरुदत्त के सिवाय अन्य किसी के साथ नहीं कर सकती हूं। इस भव में मेरे पति गुरुदेव महाराज ही हैं। इसलिए आप उन्हीं के साथ मेरा विवाह कीजिए। कन्या की इच्छा जानकर धात्री वाहन ने अपनी कन्या अभयमती का विवाह गुरुदत्त राजा के साथ ही कर दिया। गुरुदत्त विवाह के पश्चात् अपनी नगरी में लौट आए। और पूर्ववत राज्य शासन करने लगे।

नरक से निकल कर ब्रजदंड विद्याधर जिसे कि समुद्र में डुबोकर मारा था। नीलगिरी पर वही नरक का नारकी व्याघ्र का जीव हुआ। और आस-पास के गांवों में आकर आक्रमण करने लगा। जिससे प्रजा में त्राहि-त्राहि मचने लगी। लोग भयभीत होकर गुरुदत्त के पास आए। वे कहने लगे हे राजन् नीलगिरि पर्वत पर जो सिंह रहता है उससे पीड़ित हैं। वह अनोखी कथाएँ

एक दिन हस्तिनापुर में अमिताश्रव नामक मुनिराज आए। राजा गुरुदत्त ने उन्हें नमोऽस्तु कर अपने पूर्व भवो को जानने की अभिलाषा प्रकट की। मुनिराज ने गुरुदत्त के भव प्रकट किए। बताया कि तुम राजा थे अजगर हुए और भवनवासी देव समाधि करके बने थे इस प्रकार भवों को बताया ! गुरुदत्त मुनिराज के वचनों को सुनकर वैराग्य हुआ। और मुनिराज से अभयमती के पूर्व भव बतलाने की प्रार्थना की। मुनिराज ने बताया कि चंपापुर रानी नगर में एक किरात भील रहता था। उसकी स्त्री का नाम गोमुखी था एक दिन गोमुखी चर्तुविध संघ सहित आए समाधि गुप्त नाम के मुनिराज का धर्मोपदेश सुन रही थी। उपदेश श्रावण के बाद सभी लोगों अनोखी कथाएँ

ने व्रत लेते देखकर गोमुखी ने भी अणुव्रत ग्रहण किए। इसका पति प्रतिदिन कबूतर पकड़ करके लाता था पर उसको यह छोड़ देती थी। जिससे वह नाराज होकर इसे प्रतिदिन पीटता था। एक दिन क्रोध में आकर गरुड़ वेग ने गोमुखी को घर से निकाल दिया वह घर से निकल कर अपने एक कुटुम्बी के यहां रहने लगी। मरते समय उसने धात्री वाहन राजा के ऐश्वर्य को प्राप्त करने की भावना की इस कारण यह धात्री वाहन राजा की पुत्री हुई है।

अभयमती रानी अपने पूर्व भव में किए व्रत के फल को सुनकर बहुत प्रसन्न हुई। और सोचने लगी कि व्रतों के सिवा अन्य कोई संसार में रक्षक नहीं है। धर्म ही इस जीव को लोक और परलोक के दुखों से मुक्ति दे सकता है। अब तक भोगों में आसक्त रहकर हमने अपने जीवन को कौड़ी के मोल बेच दिया। पर अब आत्मकल्याण करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। यह जीव व्यसनों में फंसकर अपना अहित करता है। सच्चे धर्म को घबड़ा कर छोड़ देता है। जिससे इसे आत्मिक तुष्टि नहीं होती। अब अवश्य ही हम लोगों को आत्मकल्याण में लग जाना चाहिए। इस प्रकार निश्चय कर राजा गुरुदत्त और अभयमती रानी संसार शरीर भोगों से विरक्त हो गए। गुरुदत्त की समस्त भोगोपभोग सामग्री अच्छी नहीं लगती।

महाराज गुरुदत्त ने अपने पुत्र श्री दत्त को बुलाया। और उन्हें सारी बातें समझाकर राज्य तिलक दे दिया। तथा अमिताश्रव नामक आचार्य के पास आकर दीक्षा ग्रहण की। थोड़े दिनों में द्वादशांग श्रुतज्ञान का धारी होकर गुरु सेवा अनोखी कथाएँ

करता रहा। और पश्चात् गुरु आज्ञा से एकाकी बिहार करने लगा।

अभयमति ने इन्हीं आचार्य की शिष्या सुव्रता आर्यिका से व्रत ग्रहण किए। राजा और रानी तपस्या करने लगे। अभयमति की आयु थोड़ी थी। अतः उसने अपनी मृत्यु निकट जान समाधि मरण धारण कर लिया। मरते समय उसके परिणामों में अपूर्व शांति थी। जिससे वह कापिष्ठ स्वर्ग में ललिकांत नामक देव हुई।

गुरुदत्त आचार्य बिहार करते पल्लीखेठ नामक गांव के जंगल में आए। और संध्या हो जाने से प्रतिमा योग धारण किया। प्रातः काल हलमुख ने गुरुदत्त मुनि को देखा। वह अपने खेत में हल जोतने जा रहा था। और अपनी स्त्री को खेत में भोजन लाने के लिए घर पर कह कर आया था। पर वहां खेत में पानी भरा हुआ था। इसलिए हल चलाना बहुत ही कठिन है। अतः वह मुनिराज से कहने लगा। रे साधु जब मेरी स्त्री यहां भोजन करने को आवे तू उससे कह देना कि पश्चिम के खेत में हल जोतने गया है। वहीं पर भोजन दे आवें देरी नहीं करें। और देखो भूल मत जाना अन्यथा मुझे भूखा रहना पड़ेगा।

स्त्री जब दोपहर की रोटियां लेकर आई। और खेत में हलमुख को नहीं पाया तो बहुत नाराज हुई और गालियां देती हुई वापस लौट आई। इधर पश्चिम वाले खेत पर जब संध्या समय तक भोजन नहीं आया। तो हलमुख को बड़ा कष्ट हुआ। और क्रोध में पागल हुआ घर आया। और स्त्री को जोर से पीटने लगा रोते हुए स्त्री ने कहा- आप खेत पर कहां थे अनोखी कथाएँ

मैं तो घंटो बैठकर आई हूँ मेरी क्या गलती है। वह हलमुख बोला- क्या साधु ने जो वहां बैठा था उसने यह बात नहीं कही कि मैं पश्चिम के खेत पर गया हूं। मैंने तो वहां बैठे साधु से कहा था मेरी पत्नी से कह देना कि पश्चिम की ओर के खेत पर जा रहा हूं। बड़ा मक्कार निकला वह साधु देखता हूँ उसे और तीव्र क्रोध में आकर कहता है। मैं उसकी मरम्मत किए बिना नहीं छोडूंगा यदि तेल डालकर बुरी तरह जलाया नहीं तो काहे का ब्राह्मण और काहे की गृहस्वामी हूं। यह हलमुख नारकी पहले नरक में था वहां से मरकर सिंह हुआ और आज देखो सिंह नरकी की दोनों पर्यायों जीवों को मारना कुत्तों के समान नारकीयों से लड़ना यह करता था इसलिए संस्कार थे ही।

वह हलमुखी मुनिराज के पास गया। और उनको पकड़

शरीर रूपी देवालय चैतन्य आत्मा रूपी देव विराजमान है उसे चैतन्य आत्मा में लीन हो गए और प्रत्येक आत्मा का यही भावना आनी चाहिए क्योंकि भावना भव नाशिनी होती है।

मुनिराज सोचने लगे क्रोध भी मेरा स्वरुप नहीं है। इससे भलाई नहीं हो सकती क्षमा ही हमारा स्वभाव है। आत्म हित शुक्ल ध्यान में लीन होने में हित है। इसलिए शुक्ल ध्यान में लीन होकर घातिया कर्मों का नाश करके केवल ज्ञान रूपी आत्म संपत्ति को प्राप्त किया। केवल ज्ञान होने पर ४ प्रकार के देव स्तुति आकर के करने लगे।

देव पुनः कहने लगे - हे प्रभो आपके चरण प्रसाद से कल्याण, वचन और निर्वाण मिलने में क्या देरी है। देवराज आपके चरण निरन्तर वन्दनीय हैं। कर्म बंधन को नाश करने के लिए आप दावाग्नि के समान हैं। इस प्रकार देवों ने स्तुति की।

हलमुख ने देवों को आया हुआ देखकर आश्चर्य में डूब गया। तथा बहुत भयभीत भी हुआ यह देवों के अतिशय से उचट कर बहुत दूर जाकर गिरा। यहां तो केवल ज्ञान के अतिशय दिख रहे थे भगवान् आकाश में थे दिव्य तेज उनके शरीर से निकल रहा था। उनकी दिव्य ध्वनि बिखर रही थी। और हलमुख व गुरुदत्त केवली के दिनों के पूर्व के भवों का वर्णन निकल रहा था। उसको सुनकर हलमुख को तीव्र वैराग्य आया। और मुनिराज के ऊपर जो उपसर्ग किया था उसके लिए भी उसके मन में और भी बहुत कष्ट हुआ केवली भगवान् के मुख से पंचम काल का स्वरूप भी पूछा और विचत्रता को

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जानकर हलमुख का हृदय और भी कांपने लगा व वैराग्य को प्राप्त होकर उन्हीं गुरुदत्त केवली के निकट जिन दीक्षा ग्रहण कर ली। गुरुदत्त केवली पृथ्वी पर बिहार करते हुए पल्ली खेट नगर में आए। और वहां द्रोणागिरि पर्वत से मुक्ति को प्राप्त हुए।

धन वैभव छोड़ा

भारत देश में मालव देश में अमरपुरी समान विश्वंधर राजा राज्य करता था। और राजश्रेष्ठी गुरुपाल उनकी सेठानी रति इन्द्राणी के रूप को भी तिरस्कृत करने वाली थी। रात दिन भगवद् भक्ति दान पूजा स्वाध्याय में लीन रहती थी। लक्ष्मी व सरस्वती का भंडार थी उसके एक बन्धुश्री कन्या थी। धनश्री ने एक दिन ब्राह्म मुहूर्त में ऐरावत हाथी, चंद्रमा, सूर्य देखा सुबह पति से पूछा तेरे पराक्रमी धर्मज्ञ गुरुभक्त पुत्र होगा। सूर्य देखने से जिन शासन में उन्नति करने वाला काम देव समान पुत्र होगा ऐसा जिन मंदिर में जा मुनिराज से स्वप्नों का फल समझा। धनश्री के गर्भ में बालक आया दान, पूजा तीर्थाटन करने की भावना हुई। ६३ शलाका पुरुषों की कथा, तीर्थाटन, जिनालयों के दर्शन, भगवान् के समक्ष बैठ कर स्तुति, सधर्म रक्षण की प्रवृत्ति श्रावकों के साथ धार्मिक चर्चा करना जिनेन्द्र भगवान् का पंचामृत अभिषेक की भावना आदि धार्मिक भावनाओं को पूर्ण करती थी।

कैलाश पर्वत के ७२ जिनालयों का ध्यान, सुमेरु

पर्वतों के जिनालयों का पूर्ण ध्यान करने लगी चर्तुविध संघ को खूब दान दिया।

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एक दिन विश्वंधर राजा वैभव के साथ हाथी पर सवार

हो वन क्रीड़ा को जा रहा था। इस अनिंध सुंदरी को देख काम पीड़ित हो गया। सोचने लगा रति, शची देवांगना के समान कौन है इस सुंदरी के बिना जीवन निरर्थक है। विश्वंधर राजमार्ग से वापस लौटा तो मूर्छित हो गया। चंदन अगर कपूर से अनेक शीतलोपचार किए चेतना लौटी तो कहने लगा कि जाओ गुणपाल की पुत्री बंधुश्री की याचना करो कि राजा बंधुश्री के साथ विवाह करना चाहता है। शुभ मुहूत में विवाह की तैयारी करो दासी ने वहां समाचार कहा कि यह

सौभाग्यशाली आनंद छा जाना चाहिए। पटरानी बनेगी। पुत्रों से सेठ विचार करता है साधर्मी को पुत्री देना चाहिए। विधर्मी के साथ कन्या का विवाह नहीं करूंगा।

विवाह में कन्या की भावना जानना भी परम आवश्यक

है अतः वह बंधुश्री को अपने पास बैठाकर प्रेमपूर्वक कहने लगा मालव नरेश तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते हैं। और तुम्हें विवाह के बाद पटरानी पद दिया जाएगा। हमारे भाग्य जागेंगे। सभी देश हमारा सम्मान करेंगे। जब तुम्हें राज्य शासन मिलेगा तब और भी पुण्य होगा। हमारी गणना राजाओं में होने लगेगी बेटी हम धन्य हैं तुम जैसी बेटी को पाकर। बंधुश्री ने उत्तर दिया- पिताजी आप संसार के वैभव में हमें भुलाना चाहते हैं। विधर्मी के साथ विवाह कर हमारा धर्म नष्ट करना चाहते हैं। मैं वासना लौलुपी नहीं हूँ धर्म को दो कौड़ी में नहीं बेचना। जैन धर्म ही सभी प्राणियों का हित करने वाला है। यही त्रिभुवन में पूज्य व वंदनीय है। देवेन्द्रों के

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द्वारा, त्यागियों को इसी से मोक्ष लक्ष्मी मिलती है। जैन धर्म तीव्र पुण्य उदय से मिला है। पापी जीव इसे नहीं पा सकते। क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, शंका आदि सम्यकदर्शन के प्रति पक्षी हैं सम्यक् दर्शन के प्रभाव से ही मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है। मिथ्यात्व से जीव का हित नहीं हो सकता।

पुत्री मैंने तुम्हारे विचार समझने को पूछा है मैं खुद यह सब करने को समर्थ नहीं हूँ मिथ्यादर्शन व हिंसा के समान अनिष्ट कारी और कुछ भी नहीं है। लड़की की रक्षा यहां से चले जाने पर ही की जा सकती है। इस प्रकार कह कर अपनी गर्भिणी स्त्री को अपने मित्र श्री दत्त के यहां छोड़कर १ अरब ८ करोड़ की संपत्ति को छोड़ वह पुत्री को लेकर चल दिया।

राजा को जब यह पता चला तो मुझे कन्या देना गुणपाल उचिन न समझकर सारी संपत्ति छोड़ कर कन्या के साथ दूसरे देश चला गया है। उसने मुझे पापी अधर्मी समझा है। धर्म कल्याण करने वाला है। अहिंसा धर्म ही श्रेष्ठ है मैंने कुधर्म में व्यर्थ ही जीवन बिताया। मैंने धर्म की महिमा नहीं समझी थी यह कह कर राजा ने जिन धर्मानुयायी उस सेठ को ढूढ़ने अपने दूत को भेजा। एक दिन शिव गुप्त नामक आचार्य त्रिगुप्त नामक शिष्य के साथ ईर्यापथ से चलकर आ रहे थे। श्रीदत्त सेठ उन्हें पाप रूपी पर्वत को बज्र समान समझ पड़गाहन कर ले गए आहार के बाद सभी वहीं एकत्रित हो गए। धनश्री भी वहां आई। त्रिगुप्ति मुनि धनश्री को देख आश्चर्य में पड़ गए और गुप्त से कहने लगे प्रभो यह भद्र अनोखी कथाएँ

परिणाम वाली, उत्तम गुण वाली, पति व्रत धर्म में प्रवीण, पर घर में निस्तेज क्यों रह रही है? गुरु बोले- आयुष्मान्! संसार में दुखों के सिवा और कुछ है क्या? इस नगर के राजा ने इससे कन्या मांगी थी। गुणपाल सेठ कन्या ले कौशाम्बी गया बेचारी रह गई। मुनिराज बोले इसके यहां जो पुत्र होगा प्रभावशाली, यशस्वी राजा धर्मात्मा होगा। मुनिराज की भविष्यवाणी सुन श्रीदत्त को बड़ा कष्ट हुआ। सोचता है इसके पुत्र को मार डालना चाहिए। यह विचार पूर्व भव के दोनों के बैर के कारण आया। धनश्री को श्रीदत्त ने अंधेरी कोठरी में रखा थोड़ा सा भोजन देने लगा। उसका आना जाना भी रोक दिया। समय पाकर धनश्री को, पुत्र उत्पन्न हुआ सो बच्चे को चुरा कर चंडाल को दिया और मरा बालक धनश्री के पास सुला दिया। धनश्री को होश आया वो मृतक शिशु को देख रोने लगी। श्रीदत्त ने मायावी शब्दों में समझाना शुरू किया। कर्मोदय को कोई हाल नहीं सकता। मरा बालक दुर्भाग्य से हुआ है धैर्य धरो। चंडाल बालक के शुभ लक्षण-लाल रंग, प्रभावशाली ललाट, राजाओं जैसे चिह्न देख कर प्रभावित हुआ। उसकी भावना बदल गई। मैं क्यों मारू, गरम बालू पर छोड़ देता हूँ अपने आप मर जायेगा। तप्त बालू पर पड़ा बालक मृत्यु की बाट जोह रहा था कि श्रीदत्त का बहनोई इन्द्रदत्त आ निकला। अनाथ सुंदर शिशु को देखकर प्रभावित हुआ और हाथों में ले लिया। कोई सन्तान थी नहीं इसलिए स्त्री का गूढ़ गर्भ बतलाकर उसका जन्म महोत्सव मनाकर उसका पालन करने लगा। नौकर

दिखाने लगा।

जल्लाद जब बच्चे को मारने सुनसान स्थान में पहुंचा। तो उसे बच्चे के तेजस्वी मुख को देखकर उसके मन में प्रसन्नता हुई। सोचने लगा कि निरपराध बच्चे की हत्या कर मैं पातकी क्यों बनूं। मैं इसे इस तालाब के किनारे छोड़ देता हूं। कोई हिंसक जानवर आएंगे सो खा जाएंगे। और यह अपने आप मर जाएगा। इस प्रकार निर्णय कर तालाब के किनारे रख दिया। दोपहर को गायें तालाब में पानी पीनी को आई। पानी पीना भूलकर वे उस बच्चे के पास चली गई और उसको अनोखी कथाएँ

सूंघने लगीं। उस निरीह शिशु की मूक भावनाओं ने उन पशुओं के हृदय पर भी अपना प्रभाव अंकित कर दिया। और सब गायें एकत्रित हो गयी। स्वतः अपने स्तन से दूध गिराने लगीं। उन ग्वालों ने जो दृश्य देखा वे अत्यधिक प्रभावित हुए। और उस पुत्र को ले जाकर अपने स्वामी गोविंद को दे दिया। गोविंद ने उस सुंदर शिशु का नाम धनकीर्ति रख दिया धनकीर्ति कुमार कामदेव समान सुदर व तेजस्वी था। राज पुत्र के समान वृद्धिगत होने लगा।

श्रीदत्त सेठ अपनी पुत्री श्रीमती के विवाह के लिए भी लाने के लिए लुरपही नामक गावं में गया और उसकी निगाह धनकीर्ति पर पड़ी तो उसने तत्काल पहचान लिया सोचने लगा अभागा अभी भी जिंदा है। मैंने इसे मारने का प्रयत्न किया है फिर भी बच गया। जल्लाद यह धोखा देता है मैं स्वयं अपने हाथों से इसे जहन्नुम भेजूंगा। यहां कुछ दिन और रह सकूं वहां रहकर गावं वालों पर अपना प्रभाव डाल दिया। एक दिन गोविंद को बुलाकर कहा-भाई मैं आपसे काम लेना चाहता हूं। आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करेंगे। आप अपने पुत्र धनकीर्ति को हमारे घर भेज दीजिए। आपकी बड़ी कृपा होगी। मैं अन्य आवश्यक कार्य से दूसरे गांव जा रहा हूं। कपट जाल गोविंद जानता नहीं था। उसने बड़े प्रेम से भोजन कराया और राह का खर्च देकर अपने गांव भेज दिया। साथ में सेठ पुत्र के लिए पत्र लिखा। मैं जिस व्यक्ति को घी लेकर भेज रहा हूँ उसे तुम विष दे देना। दया दिखलाने की आवश्यकता नहीं है। धनकीर्ति घी का घड़ा लेकर व पत्र लेकर क्षिप्रा नदी जा रहा था आम के वृक्ष के नीचे छाया में अनोखी कथाएँ

बैठ गया। सो गया। मृग सेना नाम की वेश्या वहां आई उसकी दृष्टि धनकीर्ति पर पड़ी तो मन में स्नेह की धारा उमड़ पड़ी वह अदृश्य शक्ति से खिच कर पेड़ के नीचे आ गई। धनकीर्ति के सुंदर मुख को देखकर लगा कि उसका पिता ही हो। कमर में बांधे पत्र को देखा तो पता चला उसका रहस्य समझकर दूसरा पत्र बांध दिया। तुम्हें मेरी आज्ञा माननी पड़ेगी। मैं दूसरे गांव आवश्यक कार्य से जा रहा हूँ आज की लग्न सर्वश्रेष्ठ है इसलिए इसकी शादी कर देना। पत्र लिख ज्यों का त्यों बांधकर मृगसेना चली गई। उसने सोते हुए उसे जगाया नहीं। वह जागा तो बिलम्ब जानकर शीघ्र ही घी का घड़ा सिर पर रखकर उज्जैनी नगरी आया और श्री दत्त के पुत्र महाबल को उसके पिता का पत्र दे दिया।

होगा। नैवेद्य चढ़ा कुलदेवता के दर्शन कर लौट आना। उसका पुत्र बोला पिताजी तो नयी-नयी बात करते हैं। महाबल ने स्वयं नैवेद्य ले लिया और धनकीर्ति के स्थान पर मंदिर में प्रवेश किया। त्यों ही जल्लादों की तलवारें उसकी गर्दन पर पड़ी पर वहीं गिर पंचत्व को प्राप्त हुआ। उसका पुत्र ही मारा गया। जब श्रीदत्त ने धनकीर्ति को घर में देखा तो पूछा कि तुम नैवेध चढ़ाने नहीं गए।

धनकीर्ति-पिताजी। मैं आपके आदेशानुसार जा रहा था। किंतु उदार प्रेमी महाबल ने नहीं जाने दिया। मेरे हाथ से नैवेध लेकर चले गए। मैंने आपकी आज्ञा पालन करने का पूरा प्रयत्न किया परंतु मुझे यहीं रूक जाना पड़ा। धनकीर्ति के वचन सुनते ही उसकी बड़ी वेदना हुई नंगे पैर मंदिर की ओर दौड़ा। मंदिर के द्वार पर महाबल की लाश के आगे विलाप करने लगा और शोक में विक्षिप्त सा हो गया। सोचने लगा मैंने इस दुष्ट के मारने का कितना प्रयास किया सब व्यर्थ गया। इसके स्थान पर मेरा ही पुत्र मारा गया। किंतु कुछ भी हो इसे मारे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकती। और पत्नी को बुलाकर बोला कि इसको मारे बिना मुझे चैन नहीं मिल सकती विष प्रयोग के द्वारा इसे मार दो। पहले पतिव्रता उसकी पत्नी विसाखादात्ता ने उसे बहुत समझाया पर बाद में स्त्री का पति की आज्ञा माननी है। आप शांति चाहते हैं तो पाप करना छोड़ दीजिये। आप ज्ञानवान हैं अहिंसा तत्व समझये। मुझे उपदेश की आवश्यकता नहीं यदि जीवन चाहती हो तो इस दुष्ट को मार डालो। स्वामिन आपकी आज्ञा शिरोधार्य है एक बार दासी के वचनों पर ध्यान दे संसार

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में द्वेष ईर्ष्या का तांडव नृत्य शुरू से होता आ रहा है। अहिंसा के समान सुख देने वाला कोई नहीं है। जिससे कि बैर-विरोध का अंत किया जाता है। आप विचार करें मैं तो आपके चरणों की दासी हूं। श्रीदत्त बोला मैं आपसे कुछ सुनना नहीं चाहता। तत्क्षण ऐसा उपाय करो जिससे वह मारा जाए। इसके जीवित रहते एक क्षण भी मेरे को शांति नहीं मिल सकती। हताश होकर पत्नी ने विषैले लड्डू तैयार किये बडे-बड़े लड्डूओं में विष मिला हुआ था। पुत्री को आदेश दिया कि लड्डू परोस दो। पुत्री सोचती है बड़े लड्डू पति को परोसती हूँ तो क्या सोचेंगे पिताजी लड़की हमें भूल गई इससे बड़े लड्डू पिता को परोस दिए। लड्डू खाते ही श्रीदत्त मूर्छित को गए और लड़खड़ा कर मर गए। दूसरे को मारने का जो अनिष्ट सोचता है उसका स्वयं ही अनष्टि हो जाता है।

ही पालक नरेश बनेगा। पृथ्वी में वंदनीय मांडलिक राजा होगा वह दामाद के मुंह की ओर देख कर अपने पति के क्रूर कार्यों की आलोचना पुत्री से कहने लगी। बेटी राजाओं से पूज्य धनकीर्ति को पाकर तुम धन्य हो तुम पटरानी बनोगी। मेरे पति को धनकीर्ति का पुण्य एवं वैभव सहन नहीं हुआ इससे कपट जाल रचकर इन्हें अनेक बार मरवाने का प्रयास किया पर असफल रहे। धन्य है जो पुण्यात्मा हैं उनका कोई बाल बांका नहीं कर सकता। जैसे सूर्य के प्रकाश को कोई क्षीण नहीं कर सकता वैसे ही पुण्यात्मा के पुण्य को कोई क्षीण नहीं कर सकता।

गुणपाल सेठ ने अपनी पत्नी धनश्री को मित्र पर विश्वास कर छोड़ दिया था। किंतु ईर्ष्या वश उनके पुत्र धनकीर्ति को उत्पन्न होने के दूसरे क्षण से ही मारने का प्रयास किया था। जिसका परिणाम आपनी और अपने पुत्र की मृत्यु हुई। वह आवेश में सारी कथा कहकर स्वंय विष का लड्डू खा गई। और पुत्री को आशीर्वाद दिया कि पतिव्रता में सीता के समान, पवित्रता में शची समान, गुरुभक्ति में चेलना समान, विद्या में सरस्वती के समान और रूप में रति के समान पटरानी बनेगी। पुनः जोर से कहने लगी श्रीदत्त विसाखादत्ता का अंतिम संस्कार कर उनके ही व्यक्ति धनकीर्ति की स्तुति करने लगे। हे देव आपके समान पुण्यात्मा कौन है? आपके समान यशस्वी दिव्य तेजस्वी और आलौकिक चमत्कारी कौन है?

धनकीर्ति ससुर के सारे धन का स्वामी बन गया। मालब नरेश विवंधर को उसकी सूचना मिली की यह सेठ गुणपाल

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का पुत्र है। उसे बड़ी प्रसन्नता हुई और राजा ने चारो और दूत भेज कर सम्यक्त्व चूड़ामणि गुणपाल का भी पता लगा लिया। गुणपाल कौशांबी में था तो ससम्मान उसे बुला लिया। उसे राजसेठ का पद प्रदान किया। तथा उसकी सारी संपत्ति वापस कर दी। राजा उससे कहने लगा। श्रेष्ठि तुम धन्य हो। आपने अपनी धर्म रक्षा के लिए धन वैभव, भोग-विलास का त्याग कर दिया। आपके त्याग का बड़ा भारी प्रभाव पड़ा है। मैंने उसी दिन से जैन धर्म धारण किया था। श्रावक की क्रियाएं पालन करने लग गया हूं। कृपया अब जैन धर्म के तत्वों को हमे समझाइये। मैंने यह भी निश्चय किया है मैं अपनी पुत्री का विवाह आपके पुत्र के साथ करूंगा और कन्या दान से आधा राज्य भी दूंगा आप स्वीकार करें। गुणपाल बोला मैं यह सब तभी स्वीकार करूंगा। तब आप वस्तुतः जैन दीक्षा लेवेंगे। गृहस्थाचार्य को बुलाकर दीक्षान्वय क्रिया करवायेगें तब आप जैन माने जाएंगे। राजा बोला- श्रेष्ठीवर्ग मैं जैन धर्म का पालन करता हूँ आपकी इच्छा है तो मैं दीक्षान्वय क्रिया धारण करूँ इसका शीघ्र प्रबंध कर दें। राजा की दीक्षान्व्य क्रिया के बाद शुभ मुहूत में धनकीर्ति का विवाह हो गया। कुछ समय राज्य करते-करते संसार शरीर भोगों की असारता को विचार करते हुए आत्मकल्याण करने वाली दिगम्बरी दीक्षा यशोधर मुनिराज से ग्रहण कर ली। श्रीमती आदि ने आर्यिकाओं के पास आर्यिका दीक्षा ले ली। सभी लोग संन्यास मरण कर स्वर्ग में देव हुए।

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आहार दान का फल

जो पहले श्रीषेण राजा थे वे शांतिनाथ हुए। जम्बूद्वीप के दक्षिण में भरत क्षेत्र के मलय देश के रत्नसंचय नगर में श्रीषेण नाम का राजा राज्य करता था। धीर-वीर और दान का देने वाला था। शत्रुओं का नाश करने में दीर्घ दक्ष प्रजा का पालन करने वाला था। दो रानियां सिघनंदिता, आनंदिता रानी के दो पुत्र हुए। सब अच्छी तरह से राज्य चल रहा था। उसी नगर में सात्यकि नाम का ब्राह्मण महाबुद्धिमान् था। अचल ग्राम में भी एक ब्राह्मण रहता था। धरणी जट नाम, वेद-वेदाओं का ज्ञाता था। अग्निला पत्नी से इन्द्रभूति, अग्निभूति नाम के पुत्र थे। एक कपिल लड़का नाम का दासी का पुत्र था जो पूर्व पुण्य से तीक्ष्ण बुद्धि वाला था। जब इन दोनों पुत्रों को ब्राह्मण पढ़ता था तब यह दासी पुत्र कपिल भी पढ़ता था। बुद्धि कर्मानुसारिणी होती है। बिना पढ़ाये ही वह दासी पुत्र सुनकर ज्ञानवान हो गया।

सभी ब्राह्मण धरणीजट से क्रोधित हो गए। दासी के पुत्र को विद्या क्यों पढ़ाई। और कपिल को घर से निकाल दिया। रत्नपुर नगर के ब्राह्मण का वेष धरकर रहने लगा। सात्यकि पुरोहित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह इसके साथ कर दिया। राज्य में अधिक सम्मान पाने लगा। बहुत सारे वेदों का पाठ करने लगा।

जब सत्यभामा राजस्वला हुई तब वह कपिल कुचारित्र करने की कुचेष्टा करने लगा। सत्यभामा ने यह देखकर मन में विचार किया। यह पापी किसी नीच का लड़का है उत्तम अनोखी कथाएँ

वृषभसेना

जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में कावेरी पत्तन नामक समुद्र का किनारा था। जहां उग्रसेन नाम का राजा राज्य करता था। प्रजापित बुद्धिमान् विवेक सहित अनेक गुणों से युक्त धर्मात्मा था। उसी नगर में जिनचंद्र सेठ और धनश्री नाम की उसकी सेठानी थी। जो अत्यंत सुंदर अनेक गुणों की खान पति को अत्यंत प्यारी थी। उसी के एक लड़की (सुता) ने जन्म लिया। अनोखी कथाएँ

वह अत्यंत सुंदरी गुणवान माता-पिता ने वृषभसेना उसका नाम रखा। धाय भी उसका अत्यंत सुंदरी प्रीति से पालन करती थी। बड़े प्रयत्न से उसका न्हवन कराती थी। उस वृषभ सेना के नहाने के जल से एक गड्ढ़ा भर गया था। एक दिन कोढ़ आदि रोगों से युक्त कुत्ता उसमें गिर पड़ा। गिरते ही वह कुत्ता अत्यंत सुंदर स्वस्थ्य तन हो गया जिससे धाय को बड़ा आश्चर्य हुआ। उस धाय ने मन में चिंतवन किया धन्य हो यह सुकुमारी बड़ी पुण्यात्मा है। इसके शरीर के नहाने का जो जल फैलता है वह रोगों को नाश करने वाला है। और अमृत के समान है। उस न्हवन से नहा कर उस धाय की माता १२ वर्ष से अंधी थी। उस जल को लगाने से उसकी आंख खुल गई। वह धाय अपनी माता का रूप देख अत्यंत हर्षित हुई, इसके शरीर से स्पर्शित जल तो औषधि के समान है। इस धर्म की ख्याति मैं सारे जगत् में विख्यात करूंगी। इसके प्रभाव से सारे जगत् के रोग नष्ट होते थे।

एक दिन राजा नरपिंगल ने मंत्री को घनपिंगल राजा के देश में भेजा यह तुरंत ही जा पहुंचा। जब यह पहुंचा तो सब कुओं में उसने विष डलवा दिया। तब इस राजा की सारी सेना विष युक्त पानी पीते ही बीमार हो गये। तव धाय ने वृषभसेना के न्हवन के जल को लगा कर सभी निरोगी हो गए। जिस प्रकार कि गुरु बचनों के प्रसाद से मिथ्यातम तुरंत ही नष्ट हो जाता है। उग्रसेन राजा ने क्रोधित उसके ऊपर चढ़ाई की। उन कुओं का पानी पीते ही सारी सेना फिर घनपिंगल ज्वर से पीड़ित हो गई। तब राजा फिर उदास होकर लौट कर अपने स्थान पर आ गया।

अनोखी कथाएँ

रत्नपिंगल मंत्री ने राजा के सेठ की पुत्री का सारा हाल राजा से कहा। तब हर्षित होकर राजा ने अपनी पीड़ा के नाश के लिए उसके न्हवन का जल मांगा। सेठानी सेठ से डर कर बोली क्या पुत्री के न्हवन जल को राजा अपने सिर पर डालोगें। जब मंत्री ने कहा मैं सत्य कह रहा हूं। जो सत्य बोलने वाले को दोष नहीं लगता। तब दोनों दंपति ने न्हवन का जल धाय के हाथों राजा के पास भेजा। राजा ने उस न्होन का जल अपने सिर पर लगाया। उसके स्पर्श से राजा रोगों से रहित अत्यंत सुन्दर हो गया। तब धाय से राजा ने कन्या के बारे पूछा। जिनचंद सेठ को तुरंत बुलवाया। राजा के पास तुरंत सेठ आया। कहा अपनी कन्या वृषभसेना हमारे लिए देओ। सेठ ने कहा राजन मैं अपनी पुत्री तभी दे सकता हूँ जब कि अष्टान्हिका महापूजा पंचामृत अभिषेक करके करो और सारे कैदियों को कारागृह से मुक्त करो। तब विमल तेजस्वी सुंदर रूपवान और गुणवान अपनी पुत्री आपको दूंगा। राजा ने यह सब वचन माने सेठ ने खुशी के साथ राजा के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। सेठ की पुत्री वृषभसेना अत्यंत गुणवान पुण्यवान है। राजा ने उसे पटरानी का पद दे दिया। इससे ही विशेष अनुराग राजा का था। जिनेन्द्र अभिषेक निर्ग्रथ गुरुओं को अहार दान भी बड़ी भक्ति से करने लगा। शील व्रत का पालन भी करने लगा। जगत् पूज्य

जैनधर्म को पालते हुए जो बनारस का पृथ्वीचंद राजा महादुष्ट था इसलिए बंदी गृह से उसे नहीं छोड़ा गया था।

नारायणदत्ता उसकी रानी थी। तब नारायण दत्ता ने यह मंत्रणा की कि वृषभसेना के नाम से बहुत दान दिया जाए

अनोखी कथाएँ

और अनेक जनों का सम्मान करती थी। दान लेने के लिए इस पत्तन में बहुत मनुष्य आते थे। तब राजा बोले मेरे बिना पूछे तुमने ये दानशाला कैसे खोली है। इतना दान कर रही हो। तब वृषभसेना बोली मैं दान नहीं करती हूं। मेरे नाम से कोई और दान कर रहा है। तब राजा का रोष वृषभसेना के वचन सुनकर शांत हुआ। पृथ्वीचंद को दुष्टता के नहीं छोड़ा था। उसने पत्र लिखा सिर झुका कर अपनी उदंण्डता मैंने त्याग दी ऐसा परिचय दिया और जब पृथ्वीचंद्र कारागार से छूटे तो वृषभसेना से कहा हे देवी तुम्हारे प्रताप से मैंने दूसरा जीवन पाया है। मेरा जीवन सफल हुआ है। राजा से भी बहुत सम्मान पाकर घन पिंगल के पास गया। घन पिंगल ने पृथ्वीचंद्र छोड़ दिया है। मेघ पिंघल भी आया और उग्रसेन राजा का मित्र बन गया। देखो जग में पुण्य प्रधान है।

णमोकार मंत्र का महाप्रभाव

मगध देश के राजगृह नगर के राजा संग्राम शूर राज्य करते थे उसकी रानी कनक माला थी। नगर में वृषभ दास सेठ थे जिनदत्ता उसकी पत्नी अनेक रूप गुणों शील की खान थी विनय तो जैसें जलेबी में रस भरा रहता है वैसे ही कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह सेठ महान् सम्यक् दृष्टि धार्मिक संपूर्ण अच्छे लक्षणों से युक्त था। पांच गुण उसमें थे। योग्य पात्र में राग करने वाला, गुणों में राग करने वाला, परिजनों के साथ रहने वाला, शास्त्र में ज्ञाता, युद्ध में योद्धा ये ५ गुण उसमें थे। जिनदत्ता सम्पूर्ण गुणों से युक्त परंतु वंध्या एक यह अवगुण उनमें था अर्थात कोई पुत्र उसके नहीं हुआ अनोखी कथाएँ

था। स्त्री के आज्ञाकारिणी होना, संतुष्ट होना, दक्ष होना, साध्वी होना, पतिव्रता और विदुषी होना ये अच्छे गुण लक्षण माने गए हैं।

एक दिन जिनदत्ता ने अपने पति सेठ से हाथ जोड़कर कहा- स्वामिन पुत्र के बिना कुल सुशोभित नहीं होता। अनेक उपाय कर लिए पुत्र उत्पति होती नहीं है। पुत्र के बिना वंशच्छेद हो जाएगा। इसलिए संतान की प्राप्ति के लिए दूसरा विवाह कर लीजिए। यौवन, सौंदर्य, प्रेम आभूषणों का समूह पुत्र के बिना बेकार हैं। सेठ ने कहा- हे भद्र तुम्हारा कहना सत्य है। फिर भी असत्य है क्योंकि “पर मिंद शरीरपि” यह शरीर भी पर है। सर्वमनित्यं दृष्टवा या भोगानुभवनं करोतु स विवेक शून्यएव । और संसार की समस्त वस्तुओं का अनित्य देखकर जो भोगों का अनुभव करता है। वह विवेक से शून्य है! सेठ जी कहते हैं कि मेरे ७० वर्ष पूर्ण हो गए हैं अतः विवाह करना उचित नहीं है वृद्धावस्था में धर्म को छोड़कर यदि ऐसा किया जाए तो लोक में मोह की महिमा, हंसी एवं विरुद्धता होगी। रोग होने पर भी शरीर को आभूषणों से सजाना, शोक रहते हुए भी भोगों में निमग्न रहना, दरिद्रता होने पर भी घर में रहना, वृद्धावस्था आने पर भी स्त्री का समागम करना। यह सब परस्पर विरुद्ध बातें हैं। इन्हें जानता हुआ भी मनुष्य जिससे प्रेरित हो इन्हें नहीं करता है। वह महान् मोह रूपी समस्त लोक को जीतता है। मेरे शरीर को यमराज ने ग्रस लेने की तैयारी की है।

तब जिनदाता बोली- हे स्वामिन भागों के वशीभूत ऐसा किया जाता है। तो वह हंसी का कारण होता है। संतान वृद्धि अनोखी कथाएँ

के लिए करना दोष नहीं है। इस प्रकार सेठानी के कहने पर सेठ ने विवाह करना स्वीकार कर लिया।

उसी नगर में जिनदत्ता ने अपने काका की पत्नी बंधुश्री को पुत्री कनकश्री की याचना की परंतु काका कहते सौत के ऊपर पुत्री नहीं दी जाती है। जितदत्ता ने कहा मैं कनकश्री के घर नहीं जाऊंगी। जिन मंदिर में ही रहूंगी। ऐसी शपथ खा कनकश्री को मांगा। ऐसी शपथ के साथ अपने चचेरी बहन कनकश्री का विवाह शुभ मुहूर्त में अपने पति वृषभदास सेठ का विवाह करा दिया। जिनदात्ता सेठानी विवाह के पश्चात् अपने सारे घर का काम काज अपनी सौत कनकश्री को सौंप कर रात दिन धर्म ध्यान में तत्पर रहने लगी। घर की चिंता कुछ भी नहीं करती थी। जिनदत्ता जिन मंदिरों में और दोनों दंपत्ति सुख से अपने महलों में रहने लगे। एक दिन कनकश्री अपनी मां के घर गई। माता ने पूछा हे पुत्री कनक तू अपने पति के साथ सुख का अनुभव करती हो या नहीं। पुत्री ने उत्तर दिया मां मेरा पति के साथ वार्तालाप भी नहीं है। काम भोग की बात ही अलग है। और दूसरी बात है सपत्नी के रहते मेरा विवाह कर दिया अब पति के सुख के बारे में पूछती हो या जो रेत से घी निकालने जैसी बात हो गई। सिर पर मुंडन कराके पूछती हो यह ठीक नहीं है। मुझे तिल मात्र भी सुख नहीं है। जिनदत्ता ने मेरे पति को हर एक प्रकार से वश में कर रखा है दोनों दंपत्ति दिन रात मंदिर में रहते हैं। वहीं सुख का अनुभव करते हैं और संध्या सुबह दोनो समय भोजन करने के लिए आते हैं। मैं अकेली दुर्बल शरीर होकर रात्रि में भाग्य की निदा करती अनोखी कथाएँ

रहती हूं। यह सब झूठा समाचार कनकश्री ने अपनी माता बंधुश्री से कहा।

पुत्री के मिथ्या वचन कहने पर भी पुत्री के काम सुख की पूर्ति के लिए वह क्रोधाग्नि से बुझाना चाहती है। और उसका प्रयोग करने लगी। वह कहती है कि हे पुत्री यह पापिनी जिनदत्ता जिन उपायों से मरेगी वह उपाय मैं करती हूं। इस प्रकार पुत्री के मन में संतोष उत्पन्न कराके उसे पति के घर भेज कनकश्री ने. अपनी माता बंधुश्री से इस प्रकार कपटपूर्ण वार्तालाप अपने पति सेठानी जिनदत्ता के बारे में किया। बंधुश्री को जिनदाता के प्रति ईर्ष्या भाव उत्पन हो गया। कहा है कि यह जीव पर्याय परिवार व प्रकृति के मोह में फंसकर पाप कर्मों को उर्पाजन करके नरकों में जाते हैं। बंधुश्री अपनी पुत्री कनकश्री के मिथ्या वचनों पर विश्वास करके क्या-क्या माया जाल रचती है। वह जिनदत्ता से मन में वैर बांधकर रह गयी।

एक समय जो कि अनेक धूर्त जालों से सहित था।

जिसका शरीर हड्डियों के आभूषणों से विभूषित था। जो त्रिशूल डमरु और नूपुर से युक्त था। जिसकी आकृति अत्यंत भयानक डरावनी थी। ऐसा एक कापालिक नाम का योगी

भिक्षा के लिए बंधुश्री के घर आया।

बंधुश्री मन में उसे देख ऐसा मन में विचार करती है। अहो मैंने कई कापालिक देखे। लेकिन ऐसा तेज भयानक रौद्र रूप वाला जो बुरे से बुरे कार्यों को सिद्ध करने वाला हो ऐसा सिद्धि वाला कापालिक आज ही देखा है। इसके पास अवश्य ही मेरे कार्य की सिद्धि हो जाएगी। ऐसा निश्चय कर अनोखी कथाएँ

उसने अपना कार्य कराने के लिए उसे अनेक जलेबी व्यंजनों को अच्छी भिक्षा दी। खोटे कार्यों को करने वालों को खोटे व्यक्ति ही आदर करते हैं। कहा है यावत्कीर्ति भवेत्लोके यावद् दानं प्रयच्छति - लोक में जब तक कीर्ति होती है तब तक दान दिया जाता है। इसके बाद कापालिक ने बंधुश्री ने कहा- ये योगी तुम नित्य प्रति मेरे घर आया करो। कापालिक ने बंधुश्री का कहना मान कर बंधुश्री के घर आना स्वीकार कर लिया। संसार में कार्य वश ही कोई किसी की सेवा करता है। “परमार्थ से कोई किसी का प्यारा नहीं है।” प्रतिदिन बंधुश्री योगी को भिक्षा देने लगी। एक दिन भिक्षुक ने अच्छी भक्ति देखकर योगी ने मन में विचार किया माता मैं तुम्हारा उपकार करूंगा। पिता, यज्ञोपवीत देने वाला, विद्या देने वाला, अन्न देने वाला और भय से रक्षा करने वाला पांच पिता हैं। राजपत्नी, गुरुपत्नी, मित्र पत्नी, पत्नी की माता, अपनी माता ये पांच माताएं हैं। बंधुश्री ने अन्न देकर इसे वश में कर लिया - वह कापालिक बोला मां मुझे एक महाविद्या की सिद्धि है। जो तुम्हारा प्रयोजन हो कहो मैं वेसा करूंगा। पश्चात् रोती हुई बंधुश्री ने गदगद् कंठ से अपनी पुत्री का सारा हाल कह दिया। मेरी पुत्री कनकश्री जिनदत्ता सेठानी के कारण दुखी है इसलिए यह पापिनी जिनदत्ता तेरे द्वारा मारने योग्य है। तुम्हारी बहिन कनकश्री जिस प्रकार अच्छी तरह घर में रहने लगे वह काम तुम्हें अवश्य ही करना है। तब योगी ने कहा- हे माता तुम सुनो मुझे जीवों के मारने में किंचित भी नहीं सोचना पड़ता। आज में कृष्ण पक्ष की चर्तुदशी के दिन श्मशान में विद्या सिद्ध करके निश्चत ही अनोखी कथाएँ

जिनदत्ता को मार डालूंगा। और अपनी बहिन कनकश्री को सुखी करूंगा। यदि यह प्रतिज्ञा पूर्ण नहीं कर सका तो अग्नि में प्रवेश करूंगा। योगी के ऐसा कहने पर बंधुश्री अपने मन में अत्यंत हर्षित हुई।

कापालिक भी ऐसी प्रतिज्ञा कर चर्तुदशी के दिन पूजा की सामग्री लेकर साथ गया। वहां अपने स्थान पहुंचकर एक मुर्दा ले आया और पूजा कर उसके शव में एक तलवार बांध कर बैठ गया। बैठकर उसने मुर्दे की बड़ी पूजा की एंव मंत्र का जाप किया। पश्चात् वेताली महाविद्या की आराधना कर उसका आह्वान किया। मंत्र प्रभाव से वेताली विद्या शीघ्र ही उस मुर्दे में प्रवेश हो गई। अनेक मुख वाली भयंकर बेताल प्रगट हो- कहने लगा हे महामाये- मैंने जिस कार्य वश तेरी आराधना की है सुनो जिन मंदिर में स्थित जो कनकश्री की सौत है ऐसी जिनदत्ता को मार डालो कापालिक के वचन सुन विधा ने कहा- तथास्तु। जैसा आपने आदेश दिया है वैसा ही करूंगी। तदन्तर किल किल शब्द करती हुई वह भयानक राक्षसी के समान विद्या जिनदत्ता के पास गई। ज्यों ही विद्या जिनदत्ता को देखती है वह प्रोषध का व्रत लिए हुए थी और सम्यकदर्शन जिसकी आत्मा में निवास करता था। जिसका चित्त सम्यकदर्शन से युक्त थी। वह वेताली यद्यपि अत्यंत शक्तिशालिनी थी परंतु धर्म के माध्यम से कुछ भी करने में समर्थ नहीं हो सकती। जिसके हृदय में सम्यक्त्व रूपी देव निवास करता है। उसके मना से सिंह श्रृंगाल, अग्नि पानी भयंकर सर्प, विष, समुद्र, स्थल गर्त, मणिधारी सर्प, चोर, दास, ग्रह, शाकिनी, रोग, शत्रु तुल्य आपत्तियां विलीन हो जाती हैं।

अनोखी कथाएँ 37

वह विद्या तीन प्रदक्षिणा देकर शमशान में चली गई। उस भयंकर विद्या को देखकर योगी भाग गया। मृतक शरीर में उस योगी ने फिर आहन किया। परंतु पहले के समान दह कुछ करने में जिनदत्ता का समर्थ नहीं हुई। इस प्रकार तीन बार योगी ने ऐसा किया चौथी बार मरण के भय से योगी ने कह दिया कि हे महा भैरवी। कनकश्री और जिनदत्ता के बीच में जो दुष्टा हो उसे मार डालो।

विघ्नौघा प्रलंय यांति शाकिनी भूत पन्नगाः ।

विषं निर्विषतां याति स्त्यमाने जिनेश्वरे ।।

जो जिनेन्द्र देव की स्तुति करता है उसमें ही लीन रहता है उसे विष, भूत, वेताल शाकिनी आदि कुछ भी नहीं बिगाड़ पाते। उस पर प्रहार न हीं कर पाते पापियों को देव मार डालते हैं। यही णमोकार की महिमा है। तदन्नंतर वह वेताली भयंकर शब्द करती हुई आई। और शरीर की चिंता को आई हुई कनकश्री को देखा। एंव तत्काल ही कापालिक की आज्ञा याद कर शुद्ध समयकत्व, तप, शाली आदि गुणों से युक्त देव और गुरु की भक्ति में संलग्न जिनदत्ता का पराभव अपने आपको करने में असमर्थ जानकर उस विद्या ने प्रमाद कनकश्री को तलवार से मार डाला। खून लिप्त शरीर को धारण करने वाली वह देवी विद्या श्मशान में जाकर खड़ी हो गई। योगी ने उसका विर्सजन किया वह अपने स्थान पर चली गई। कापालिक भी अपने स्थान पर चला गया। ठीक है होनहार का कोई उल्लंघन नहीं कर सकता।

प्रातः काल संतुष्ट चित्त बंधुश्री अपने बेटी के यहां गई। अनोखी कथाएँ

और शैय्या पर खंडित अपनी पुत्री को देखकर राजा के पास गई। राजा ने उससे पूछा भद्रे इस प्रकार तुम रो क्यों रही हो। तब बंधुश्री बोली हे देव मेरी पुत्री कनकश्री को जिनदत्ता सौत ने मार डाला। यह बात सुनकर राजा ने दोनों दंपति को पकड़ लाने के लिए सैनिक भेजे। परंतु वे सभी सैनिक जिन शासन देवी पुण्य देवी के द्वारा कील दिए गए। मंदिर जाने वाले स्त्री-पुरुषों से यह वृतान्त सुनकर जिनदत्ता ने कहा- पूर्वोपाजि कर्म किसी के द्वारा उलंघन नहीं किए जा सकते। कार्योत्सर्ग पूरा कर जिनदत्ता विचार करने लगी यह कलंक मेरे लिए ही आया है। पूर्व भव में जो किया है वह अन्यथा नहीं हो सकता। ऐसा विचार कर जिन शासन देवी के लिए उपसर्ग दूर करने के लिए फिर से कार्योत्सर्ग किया। अंतरंग बहिरंग कषाय शरीर से ममत्व त्याग दोनों प्रकार का संन्यास लेकर जिन मंदिर में बैठ गई। उसके कार्योत्सर्ग से आकृष्ट होकर जिन शासन देवी ने कहा- बेटी तुम स्थिर रहो तुम्हारा यह उपसर्ग दूर हो जाएगा। और जैन धर्म की महत्ता प्रभावना होगी। ऐसा मान तुम धर्म ध्यान में तत्पर स्थिर होकर रहो। ऐसा कहकर जिन शासन देवी चली गई। जिनदत्ता भी नमस्कार

मंत्र का उच्चारण करती हुई समाधि का नियम लिए खड़ी रही। इधर यह हो रहा था उधर शासन देवी द्वारा प्रेरित कापालिक पूरी नगरी में प्रत्येक घर-घर में कह रहा था- हे नगरवासी सुनो बंधुश्री ने आग्रह कर मेरे द्वारा प्रेरित वेताली विधा के द्वारा अपनी पुत्री को मरवा डाला है। ऐसा निश्चय करना चाहिए। कनकश्री ही इसकी बेटी दुष्ट विचार वाली और जिनद्रत्ता से ईर्ष्या करने वाली थी। इसलिये मार डाली गई। इस विषय में अनोखी कथाएँ

विकल्प नहीं करना चाहिए। देवता व योगी के वचनों को सुनकर तथा लोगों ने कहा- जिनदत्ता निरपराध साध्वी स्त्री है। तदन्तर शासन देवी ने सुवर्ण रत्न तथा वस्त्र आदि के द्वारा जिनदत्ता की पूजा की तथा उसका जय-जयकार किया। सब

लोगों से शुद्धता की बात कही। इसी अवसर पर देवों ने नगर के मध्य पंचाश्चार्य किए। यह सब देखकर राजा ने कहा- बंधुश्री दुष्टा है। अतः उसे गधे पर चढ़ाकर निकाल देना चाहिए। बंधुश्री ने कहा- मैंने अज्ञान से किया है मुझे प्रायश्चित्त दिलाया जाए। राजा ने कहा- इस पाप का प्रायश्चित्त कहीं सुना नहीं है। मित्र, द्रोही, कृतघ्नी, स्त्री की हत्या करने वाला और चुगलखोर इन चारों का प्रायश्चित्त हमने नहीं देखा। इस प्रकार राजा ने जब नगरी में फैला हुआ ढिंढोरा कापालिक के द्वारा सुना तो बंधुश्री को अपराधी जान नगर से निकाल दिया है। इस बंधुश्री ने अत्युग्र पाप का फल तत्काल देख लिया ऐसा सभासदों ने कहा और जिनदत्ता की रक्षा धर्म के द्वारा हो गई। राजा ने मन में विचार किया जैन धर्म को छोड़कर अन्य धर्म की इतनी महिमा नहीं है ऐसा कह जैन मंदिर में गया

सेठ-सेठानी को नमन कर और समाधि गुप्त मुनिराज को नमन कर बैठ गया। राजा ने मुनिराज से कहा- भगवान् सेठ-सेठानी का उपसर्ग धर्म के माहात्म्य से दूर हुआ है। मुनिराज ने कहा- यदिष्टं तत्सर्व धर्मेण भवति जो इष्ट हैं वह सब धर्म से होता है। मुनिराज ने कहा-अस्मिन् संसारे धर्म विहाय सर्वभण्य नित्यं । अतएव धर्म कर्त्तव्यः । इस संसार में धर्म को छोड़कर सभी कुछ अनित्य है। अतएव धर्म करना चाहिए।

अनोखी कथाएँ

समस्या-देह धरे को कहा फल पायो’

एक राजा अपने दरबार में कभी-कभी कोई समस्या

लाकर रखा करता था। अनेक विद्वान् उस समस्या की पूर्ति पद्य में करके सुनाते थे। एक बार उस राजा ने ठसाठस भरे हुए राजदरबार में ‘देह धरे को कहा फल पायो’ यह समस्या रखी। बहुत से विद्वानों ने इसे वहीं कण्ठस्थ कर लिया।

समस्या पूर्ति को सुनाने का आठवां दिन निश्चित हुआ। साथ ही पुरस्कार की घोषणा भी सुनाई गई।

निश्चित दिन राज दरबार ठसाठस भर गया। विद्वान् लोग क्रमशः समस्या पूर्ति को सुनाने लगे-

शैशव काल गयो सब खेलत, शिक्षण में चित नाहि लगायो। यौवन में तिय संग रमौं, नित के धन जोड़न को चित चायो ।। वृद्ध भये सब अंग गये थकि, होश हवास सभी विसरायो । खोय दिये पन तीनों वृथा नर! 'देह धरे को कहा फल पायो ।। दूसरा विद्वान् सुनाने लगा-

जे शुभ पूरब कर्म विपाक, उदय, रस मानुष जन्म लहायो। कर्मभूमि पुनि आरज खेत, त्रिवर्ण महान्वय जाति कहायो ।। पूरण अक्ष निरोग वपुः विपुलायु धनेश प्रताप बढ़ायो। स्वानुभवामृत पान किये बिन, ‘देह धरे को कहा फलपायो’ ।। अब तीसरा विद्वान् बोला-

हाथन से नहिं दान दियो नहिं, कानन को जिन शासन भायो । नैनन से नहिं साधु विलोकिय, पाँवन से नहिं तीरथ धायो ।। अनोखी कथाएँ

पेट भरो धन पाप उजार्जित, गर्व से काहु न शीस नवायो। धारि हृदय परमातम भक्ति न, 'देह धरे को कहा फल पायो ।। अब चौथा विद्वान् बोला-

पाकर द्रव्य न दान दियो नहिं, भोग कियो धन यो हि गमायो। ज्ञान उपाय कहा भयो जो न, हिताहित भेद विज्ञान लहायो ।। वाचक शक्ति भये कहा होत, न जीवन को शुभ मार्ग बतायो । पाय नृजन्म कियो तप त्याग न, ‘देह धरे को कहां फल पायो ।।’ चारों विद्वानों द्वारा क्रमशः समस्या पूर्ति श्रवण कर सभा मंत्र मुग्ध हो गई। जीवन का वास्तविक भान जो उन्हें आज हुआ था।

जिसे कि हमें प्राप्त करना है

एक नगरी में दिगबर महर्षि आये। दर्शनार्थ हजारों नर-नारी आ पहुँचे। अब महात्मा जी को मोक्ष (संसार के दुःखों का अत्यन्त अभाव) के विषय में प्रवचन होने लगा तो एक व्यक्ति ने कहा- “महात्मन ! जिस प्रकार ज्वर आदि रोगों के प्रत्यक्ष दीखने पर वैद्य डाक्टर लोग तर्क-विर्तक करके उसके होने के कारणों का अन्वेषण करते हैं और इलाज करने के लिए उद्यत होते हैं, ठीक इसी प्रकार मोक्ष प्रत्यक्ष दीखने पर ही उसके उपाय का अन्वेषण किया जा सकता है और उस पर चलने का प्रयत्न किया जा सकता है परन्तु मोक्ष तो दिखता नहीं, इसलिए उसका उपाय बताना व्यर्थ है?”

अनोखी कथाएँ

समस्या-देह धरे को कहा फल पायो’

एक राजा अपने दरबार में कभी-कभी कोई समस्या

लाकर रखा करता था। अनेक विद्वान् उस समस्या की पूर्ति पद्य में करके सुनाते थे। एक बार उस राजा ने ठसाठस भरे हुए राजदरबार में ‘देह धरे को कहा फल पायो’ यह समस्या रखी। बहुत से विद्वानों ने इसे वहीं कण्ठस्थ कर लिया।

समस्या पूर्ति को सुनाने का आठवां दिन निश्चित हुआ। साथ ही पुरस्कार की घोषणा भी सुनाई गई।

निश्चित दिन राज दरबार ठसाठस भर गया। विद्वान् लोग क्रमशः समस्या पूर्ति को सुनाने लगे-

शैशव काल गयो सब खेलत, शिक्षण में चित नांहि लगायो। यौवन में तिय संग रमौं, नित के धन जोड़न को चित चायो ।। वृद्ध भये सब अंग गये थकि, होश हवास सभी विसरायो। खोय दिये पन तीनों वृथा नर! 'देह धरे को कहा फल पायो ।। दूसरा विद्वान् सुनाने लगा-

जे शुभ पूरब कर्म विपाक, उदय, रस मानुष जन्म लहायो । कर्मभूमि पुनि आरज खेत, त्रिवर्ण महान्वय जाति कहायो ।। पूरण अक्ष निरोग वपुः विपुलायु धनेश प्रताप बढ़ायो। स्वानुभवामृत पान किये बिन, ‘देह धरे को कहा फलपायो’ ।। अब तीसरा विद्वान् बोला-

हाथन से नहिं दान दियो नहिं, कानन को जिन शासन भायो । नैनन से नहिं साधु विलोकिय, पाँवन से नहिं तीरथ धायो ।। अनोखी कथाएँ

पेट भरो धन पाप उजार्जित, गर्व से काहु न शीस नवायो । धारि हृदय परमातम भक्ति न, 'देह धरे को कहा फल पायो ।। अब चौथा विद्वान् बोला-

पाकर द्रव्य न दान दियो नहिं, भोग कियो धन यो हि गमायो । ज्ञान उपाय कहा भयो जो न, हिताहित भेद विज्ञान लहायो ।। वाचक शक्ति भये कहा होत, न जीवन को शुभ मार्ग बतायो । पाय नृजन्म कियो तप त्याग न, ‘देह धरे को कहां फल पायो।।’ चारों विद्वानों द्वारा क्रमशः समस्या पूर्ति श्रवण कर सभा मंत्र मुग्ध हो गई। जीवन का वास्तविक भान जो उन्हें आज हुआ था।

जिसे कि हमें प्राप्त करना है

एक नगरी में दिगबर महर्षि आये। दर्शनार्थ हजारों नर-नारी आ पहुँचे। अब महात्मा जी को मोक्ष (संसार के दुःखों का अत्यन्त अभाव) के विषय में प्रवचन होने लगा तो एक व्यक्ति ने कहा- “महात्मन! जिस प्रकार ज्वर आदि रोगों के प्रत्यक्ष दीखने पर वैद्य डाक्टर लोग तर्क-विर्तक करके उसके होने के कारणों का अन्वेषण करते हैं और इलाज करने के लिए उद्यत होते हैं, ठीक इसी प्रकार मोक्ष प्रत्यक्ष दीखने पर ही उसके उपाय का अन्वेषण किया जा सकता है और उस पर चलने का प्रयत्न किया जा सकता है परन्तु मोक्ष तो दिखता नहीं, इसलिए उसका उपाय बताना व्यर्थ है?”

अनोखी कथाएँ

इस पर महात्मा जी कहने लगे, तुमने कभी कुए पर

चलने वाले अरहट (घटीयंत्र, रेहट) को देखा होगा। वहाँ जिस प्रकार अरहट का घूमना उसके धुरे के घूमने से होता है और धुरे का घूमना उसमें जुते हुए बैल के घूमने पर होता है। यदि बैल का घूमना बन्द हो जाय तो धुरे का घूमना बन्द हो जाता है और धुरे को रुक जाने पर अरहट का घूमना रुक जाता है उसी प्रकार कर्मोंदय रूपी बैल के चलने पर ही चार गति (नरक, तिर्यंच, मनुष्य, देव) रूपी धुरे का चक्र चलता रहता है और चतुर्गति रूपी धुरा ही, अनेक प्रकार की शारीरिक मानसिक आदि वेदनाओं रूपी अरहट को

घुमाता रहता है। कर्मोदय के रुक जाने से चतुर्गति का चक्र रुक जाता है और उसके रुकने से संसार रूपी अरहट का परिचलन समाप्त हो जाता है। बस, इसी का नाम मोक्ष है। यद्यपि यहां दृष्टांत देकर मोक्ष की सिद्धि की गई है, परन्तु ऊपर के दृष्टान्त में जिस प्रकार मात्र बैल के रुक जाने से दूर में खड़ा हुआ व्यक्ति यह अनुमान लगा लेता है कि इस समय अरहट (कुएं से पानी निकालने वाला

घटीयंत्र) नहीं चल रहा है और उसका यह अनुमान घटी यंत्र के नहीं दिखने पर भी अक्षरशः सत्य और सुनिश्चित है उसी प्रकार कर्मोदय के बन्द हो जाने पर मोक्ष स्वयं सिद्ध है क्योंकि संसार के दुःखों का अत्यन्त अभाव अथवा अविनाशी अतीन्द्रिय सुख की प्राप्ति का होना ही मोक्ष है जो कि कर्मोदय के बन्द हो जाने से होता है।

इसी विषय को इस प्रकार भी ठीक-ठीक समझा जा

अनोखी कथाएँ

सकता है, कि जिस प्रकार बीज के अत्यन्त जल जाने पर उससे अंकुर उत्पन्न नहीं होता, उसी प्रकार अंकुर रूप संसार अवस्था के कारण भूत कर्म रूपी बीज के नष्ट हो जाने पर संसार में परिभ्रमण नहीं करना पड़ता अर्थात् दुखों का सदा के लिए विनाश हो जाता है।

जिस प्रकार आगे होने वाला सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण प्रत्यक्ष दिखता नहीं, फिर भी शास्त्रों से ठीक-ठीक ज्ञान कर लिया जाता है और उसी प्रकार वैसा ही होता है, इसी प्रकार मोक्ष भी धर्म शास्त्रों से निराबाध सिद्धि को प्राप्त होता है। समस्त शिष्टवादी, अप्रत्यक्ष होने पर भी मोक्ष को मानते हैं इसलिए भी हमें विश्वास करना चाहिए क्योंकि पूज्य पुरुषों के वचन अन्यथा (मिथ्या) नहीं होते। यदि हमें अनेक पूज्य पुरुषों ने यह बताया है कि ‘यह तुम्हारे पिता के पिता का चित्र है, उनमें अमुक अमुक बातें थीं, उन्होंने समाज में अमुक-अमुक कार्य किये हैं तो हमें शत-प्रतिशत विश्वास हो जाता है कि वास्तव में जो ये कहते हैं, वह अक्षरशः सत्य है इसमें अंश मात्र भी धोखेबाजी नहीं है।’ इस प्रकार युक्ति, धर्मशास्त्र और पूज्य पुरुषों की वाणी से मोक्ष निराबाध सिद्ध है जिसे कि हमें प्राप्त करना है।

ध्यान-धनुष को थाम ले, ज्ञान बाण दे तान।

कर्म शत्रु को मार दे, तो पावे निर्वाण ।।

काय रूप जिस अश्व पर, बैठा आत्म सवार ।

यदि मन रूपि लगाम को, साधे तो भव पार ।।

अनोखी कथाएँ

तीर्थंकर नेमिकुमार की वीरता

एक बार श्रीकृष्णा जी की राजसभा में चर्चा चली कि श्रीकृष्णा, बलदेव और नेमिकुमार इन तीनों में सबसे अधिक बलवान कौन है?

किसी ने श्रीकृष्णा को, किसी ने बलदेव को और किसी ने नेमिकुमार को बलशाली बतलाया। इनमें श्रीकृष्णा नारायण अर्धचक्री थे। बलदेव बदभद्र थे और नेमिकुमार तीर्थंकर थे। लोग निर्णय पर नहीं पहुँच पा रहे थे कि तीनों में बलशाली कौन हैं?

नेमिकुमार ने अपना पैर जमाकर कहा- जो हमारा पैर हिला देगा वही सबसे बलवान है। श्रीकृष्ण तथा बलदेव भी उस पैर को नहीं हिला सके। फिर नेमिकुमार ने हाथ और हाथ की ऊंगली मोड़ने को कहा, किन्तु कोई उँगली भी न मोड़ सका।

यह देखकर श्रीकृष्ण को चिन्ता हुई कि राज्य का अधिकारी नेमिकुमार होगा। एक बार ये सब जल-क्रीड़ा करने गये थे। स्नान करने के बाद नेमिकुमार ने अपनी भावज रुक्मणि से कहा-भावज! मेरी धोती निचोड़ देना। रुक्मणि ने उत्तर दिया- देवर जी! हम तो नाग शय्या पर बैठकर शंख बजाने वाले की ही धोती धोते हैं। यह सुनकर नेमिकुमार ने राजभवन में जाकर नाग शय्या पर बैठकर इतने जोर से शंखध्वनि की कि सारी द्वारिका में तहलका मच गया। लोगों ने घोर ध्वनि को सुनकर अपने अनोखी कथाएँ

कान बन्द कर लिये। पक्षी उड़कर भागने लगे। अब तो श्रीकृष्णा आदि को पूर्ण निश्चय हो गया कि नेमिकुमार के समान कोई वीर इस दुनिया में नहीं है तथा यह सोचकर ही नेमिकुमार को विरागी बनाने के लिए विवाह का आडम्बर किया।

महर्षि मानतुंग की भक्ति

महर्षि मानतुंग श्रेष्ठ विद्वान् एवं महान् तपस्वी थे। एक बार वे विहार करते हुए राजा भोज को राजधानी धारानगरी में आये और नगर के एकान्त में ठहर गये।

नगर के नर-नारी दर्शनाथ पहुँचे। सदुपदेश सुनकर सभी बहुत प्रभावित हुए। जब राजा के कानों तक यह समाचार पहुँचा तब वे भी दर्शन करने के लिए समस्त राज्याधिकारियों के साथ गये। प्रसिद्ध कवि कालिदास भी उनके साथ थे। ईष्यावश उन्होंने कुछ छेड़छाड़ करके शास्त्रार्थ शुरू कर दिया। आचार्य श्री ने शास्त्रार्थ में कालिदास को पराजित कर दिया।

कवि कालिदास बहुत लज्जित हुए। उन्होंने रात को काली की उपासना करके प्रातः राजा भोज से कहा- राजन्! जैन साधु मानतुंग को राजभवन में बुलावें, मैं उनसे शास्त्रार्थ करूंगा। राजा ने मुनि को बुलाने को एक सिपाही भेजा, किन्तु मुनिराज ने उत्तर दिया- मुझे राजकाज से क्या प्रयोजन है? राजा को कोई काम हो तो यहीं आकर पूछ लें।

अनोखी कथाएँ

सिपाही ने जाकर यह समाचार राजा भोज को सुना दिया। वह उत्तर सुनकर कालिदास ने राजा को भड़का दिया। राजन् ! वह साधु तो बहुत अभिमानी है। इसी से उसका नाम मानतुंग रखा है। देखिये- आपको भी कुछ नहीं समझता। राजा का राज्यपद जागृत हो गया। वे क्रोधित हो बोले- जैन मुनि को जबरन ले आओ।

राज्य कर्मचारियों ने ऐसा ही किया। मुनिराज ने अपने ऊपर उपसर्ग आया जानकर मौन धारण कर लिया और

आत्म निमग्न हो गये। राजा ने आज्ञा दी- हमारे विद्वान् के साथ शास्त्रार्थ कीजिए, अन्यथा कारावास दिया जायेगा। मुनि मानतुंग ने जब राजा की बात का कोई उत्तर नहीं दिया तो राजा भोज और भी अधिक क्रोध से भभक गया। मर्हिष को चुपचाप बैठा देखकर राजा ने हथकड़ी बेड़ी पहना कर बन्दीघर के ४८ कोठों के भीतर बन्द कर देने की आज्ञा दे दी। राज्य कर्मचारियों ने ऐसा ही किया।

अपने ऊपर घोर उपसर्ग आया जानकर मर्हिष ने भगवान् ऋषभनाथ की स्तुति करने के लिए भक्तामर महाकाव्य की रचना की। उसके ४८ काव्य पढ़ते ही कोठों के ४८ तोले टूट गये और वे अपने आप ४८ कोठों के बाहर आ गये। पहरेदार यह देखकर दंग रह गया। कर्मचारियों ने इस घटना की सूचना राजा को दी। राजा ने बन्दीगृह में जाकर यह चमत्कार स्वयं अपनी आँखों से देखा, तब उसे महर्षि की महत्ता और अपनी भूल मालूम हुई। राजा ने महर्षि के चरणों में गिरकर अपने अपराध की क्षमा याचना की। महर्षि अनोखी कथाएँ

ने सबको क्षमा कर दिया।

महर्षि मानतुंग ने निष्काम भाव से भगवान् आदि नाथ की भक्तामर स्त्रोत रचकर स्तुति की थी जिससे उनका संकट अपने आप दूर हो गया। निष्काम भक्ति का अपूर्व प्रभाव है।

भक्ति-भजन का, करलो चित्त लगाय।

निश्चय बेड़ा पार है, दुःख सभी टल जाय ।।

मूर्ति का महत्व

एक समय कुम्भाराणा ने क्रोध के वशीभूत हो, बिना सोचे समझे यह प्रतिज्ञा कर डाली कि जब तक मैं बूंदी का दुर्ग (किला) नहीं तोड़ लूँगा, अन्न जल ग्रहण नहीं करूंगा। लेकिन यह कार्य एक दो दिन में हो नहीं सकता था। असली किले के टूटने से पहले राणा की मृत्यु का होना भी सम्भव था। इसलिए प्रतिज्ञा पूर्ण करने के लिए, मंत्रियों ने यह अनुमति दी कि उस किले की मूर्ति बनवाकर उसे तोड़ डालिये।

किले की मूर्ति, तोड़ी जाने के अभिप्राय से बनकर तैयार हो गई, साथ ही राणा द्वारा उसे तोड़े जाने का समय निश्चित हो गया।

कर्मयोग की बात कि उसी राणा के यहाँ बूंदी का एक सामन्त, बूँदी-नरेश से विद्रोह करके चला आया। उसने जब बूँदी-अपने देश के किले की मूर्ति के तोड़ने का अनोखी कथाएँ

समाचार सुना तो उसे यह तनिक भी सहन नहीं हुआ कि उसके सामने उसके देश के दुर्ग की मूर्ति नष्ट की जाय। तोड़ने दूँ क्या इसे नकली किला मैं मान के।

पूजते हैं भक्त क्या? प्रभु मूर्ति को जड़ जान के ।। अज्ञान उसको भले ही, जड़ कहें अज्ञान से।

देखते भगवान् को धीमान उसमें ध्यान से ।।

ऐसा विचार कर वह राणा से लड़ा और उसने अपने

जीवन रहते हुए अपने देश के किले की मूर्ति को तोड़ने नहीं दिया। अतः मूर्ति के दर्शन, पूजन आदर आदि करना बहुत ही महत्व की बात है। संसार के कोई भी कार्य बिना मूर्ति (आकार) के सफल नहीं होते हैं, यह बात अनेकों अकाट्य युक्तियों द्वारा निर्विवाद सिद्ध है। चित्र थकी नारी लखे, मन गंदला बहु होय ।

मूर्ति शान्त जिनेश की, देखे पाप जु खोय ।।

क्रोध की औषधि

एक व्यक्ति, जिसे बात-बात पर क्रोध आता था और कितने ही उपाय कर लेने पर भी जब वह क्रोध को दूर नहीं कर सका तो एक बार दिगम्बर जैनाचार्य श्री वादीभसिंह के निकट पहुँचा। वह सिर नवाकर नम्रतापूर्वक आचार्य श्री से निवेदन करता है, गुरुदेव ! क्रोध का दुष्परिणाम अनेक अनोखी कथाएँ

बार भोग चुका हूँ, अतः ऐसा कोई उपाय बताइये कि जिससे यह चाण्डाल सदा के लिए नष्ट हो जाय।

गुरुदेव ने प्रार्थी पुरुष को, मुमुक्षु जानकर कहना प्रारम्भ किया-'हे भाई! जब तेरी दृष्टि किसी दुश्मन पर पड़ती है तब सहसा तेरे अन्तर मानस में रोष उभरता हुआ दिखाई देता है, नेत्रों से रक्त की धारायें बहने लग जाती हैं, भृकुटी चढ़ जाती है, ओष्ठ फड़फड़ाने लग जाते हैं, दांत कटकटाने लग जाते हैं, शरीर में कम्पन के साथ एक विचित्र गति होने लग जाती है। दुबले पतले इस शरीर में रक्त संचार तीव्र गति से होने लगता है, बल बढ़ जाता है जैसे कि कोई पिशाच अन्दर से प्रवेश कर गया हो।

क्रोध की अग्नि से संतृप्त हुआ तू अपने अपराध करने वाले दुश्मन को सन्तापित करने के लिए कचहरी के द्वारों को भी खटखटाने लगता है, उसे दबाने अथवा मारने का उपाय करता है साथ ही मुख से गालियों की बौछारें छोड़ने लगता है, पर देख ! यह सब तेरी क्रियाएँ दुर्बलता और अज्ञानता की सूचक हैं।

लेकिन भाई ! तूने कभी इस पर गहराई से विचार भी किया है, कि वास्तव में स्वयं का शत्रु कौन हैं? जिसने स्वयं को बिगाड़ किया है, वही तो स्वयं का शत्रु है। संसार में अपकार करने वाला ही शत्रु कहा जाता है, उस पर ही स्वयं को क्रोध आता है। लेकिन भीतरी शत्रु तो आत्मा का उपकार करने वाला क्रोध ही है जिसने स्वयं को अपने स्वरूप से विमुख किया।

  • अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -

:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3032.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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