अलिंगग्रहण के 20 बोल | Alinggrahan ke twenty Bol

श्री प्रवचनसारजी-अलिंगग्रहण के २० बोल

१. टीकार्थ- ग्राहक (ज्ञायक) जिसके लिंगों के द्वारा अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण (जानना) नहीं होता, वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा अतीन्द्रिय ज्ञानमय है इस अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश- आत्मा इन्द्रियों के द्वारा नहीं जानता है। स्व-पर प्रकाशक ज्ञानस्वभाव स्वयं से है, इन्द्रियों से नहीं। आत्मा इन्द्रियों से जाने ऐसा ज्ञेय पदार्थ नहीं है।

२. टीकार्थ- ग्राह्य (ज्ञेय) जिसका लिंगों के द्वारा अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण (जानना) नहीं होता है वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा इन्द्रिय-प्रत्यक्ष का विषय नहीं है इस अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश-आत्मा इन्द्रियों के द्वारा जानने में नहीं आता। आत्मा इन्द्रियों से ज्ञात हो-ऐसा ज्ञेय पदार्थ नहीं है। आत्मा स्वज्ञान प्रत्यक्ष से ज्ञात हो ऐसा ज्ञेय पदार्थ है।

३. टीकार्थ- जैसे धुयें से अग्नि का ग्रहण (ज्ञान) होता है, इसीप्रकार लिंग द्वारा अर्थात् इन्द्रियगम्य (इन्द्रियों से जानने योग्य) चिन्ह द्वारा जिसका ग्रहण नहीं होता है, वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा इन्द्रियप्रत्यक्षपूर्वक अनुमान का विषय नहीं है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश- आत्मा इन्द्रियों के अनुमान से ज्ञात हो ऐसा ज्ञेय नहीं है।

४. टीकार्थ- दूसरों के द्वारा मात्र लिंग द्वारा ही जिसका ग्रहण नहीं होता वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा अनुमेयमात्र (केवल अनुमान से ही ज्ञात होने योग्य) नहीं है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश-अन्य द्वारा आत्मा केवल अनुमान से ज्ञात हो वह ऐसा प्रमेय पदार्थ नहीं है। यदि आत्मा केवल अनुमान का ही विषय हो तो वह कभी भी प्रत्यक्षज्ञान का विषय नहीं हो सकता।

५. टीकार्थ- जिसके लिंग से ही अर्थात् अनुमानज्ञान से ही पर का ग्रहण नहीं होता, वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा अनुमातामात्र (केवल अनुमान करनेवाला ही) नहीं है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश- आत्मा केवल अनुमान से ही जाने, ऐसा वह ज्ञेय पदार्थ नहीं है। साधक को अनुमान के साथ आंशिक स्वसंवेदन ज्ञान प्रत्यक्ष होता है और वह बढ़कर सम्पूर्ण प्रत्यक्ष ऐसा केवलज्ञान होता है।

६. टीकार्थ- जिसके लिंग के द्वारा नहीं, किन्तु स्वभाव के द्वारा ग्रहण होता है वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा प्रत्यक्ष ज्ञाता है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश वर्तमान में परोक्ष ज्ञान होने पर भी मेरा स्वभाव प्रत्यक्ष ज्ञाता है। परज्ञेयों की अपेक्षा रहित, इन्द्रिय व मन के अवलम्बन रहित, स्वयं स्वयं को प्रत्यक्ष जाने ऐसा आत्मा का ज्ञाता स्वभाव है।

७. टीकार्थ- जिसके लिंग द्वारा अर्थात् उपयोग नामक लक्षण द्वारा ग्रहण नहीं है अर्थात् ज्ञेय पदार्थों का आलंबन नहीं है, वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा के बाह्य पदार्थों का आलंबन वाला ज्ञान नहीं है - ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश उपयोग को ज्ञेय पदार्थों का आलंबन नहीं है। चैतन्य लक्षण उपयोग स्व-आत्मा का अवलम्बन करता है। पर का अवलम्बन लेवे ऐसा उपयोग का स्वभाव नहीं है।

८. टीकार्थ - जो लिंग को अर्थात् उपयोग नामक लक्षण को ग्रहण नहीं करता अर्थात् स्वयं (कहीं बाहर से) नहीं लाता, सो अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा जो कहीं से नहीं लाया जाता ऐसे ज्ञानवाला है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश आत्मा उपयोग को कहीं बाहर से नहीं लाता है। ज्ञान उपयोग की निर्मलता एवं वृद्धि बाह्य किसी भी पदार्थों में से नहीं आती है, वह तो क्रमशः अंतर ज्ञानस्वभाव में से आती है।

९. टीकार्थ -जिसे लिंग का अर्थात् उपयोग नामक लक्षण का ग्रहण अर्थात् पर से हरण नहीं हो सकता (अन्य से नहीं ले जाया जा सकता) सो अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा के ज्ञान का हरण नहीं किया जा सकता - ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश कोई उपयोगरूप धन का हरण (चोरी) नहीं कर सकता। पर से जिसका घात न हो, स्वस्वभाव से जो च्युत न हो, स्व का आश्रय छोड़े नहीं और पर का आश्रय लेवें नहीं, यही उपयोग का स्वरूप है।

१०. टीकार्थ - जिसे लिंग में अर्थात् उपयोग नामक लक्षण में ग्रहण अर्थात् सूर्य की भांति उपराग (मलिनता, विकार) नहीं है, वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा शुद्धोपयोगस्वभावी है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश- त्रिकाली द्रव्य व गुण की शुद्धता की भांति ज्ञान की पर्याय भी शुद्ध है, उसमें मलिनता नहीं है। स्वोन्मुखी उपयोग - शुद्धोपयोग में विकार मलिनता नहीं है। अशुद्धोपयोग को उपयोग ही नहीं कहते।

११. टीकार्थ - लिंग द्वारा अर्थात् उपयोग नामक लक्षण द्वारा ग्रहण

अर्थात् पौद्गलिक कर्म का ग्रहण जिसके नहीं है, वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा द्रव्यकर्म से असंयुक्त (असंबद्ध) है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश - उपयोग द्रव्यकर्म को ग्रहण नहीं करता है, क्योंकि उसमें मलिनता नहीं है। शुद्धोपयोग को जड़कर्म के साथ निमित्त-नैमित्तिक संबंध भी नहीं है।

१२. टीकार्थ- जिसे लिंग के द्वारा अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण अर्थात् विषयों का उपभोग नहीं है, सो अलिंगग्रहण है। इस प्रकार आत्मा विषयों का उपभोक्ता नहीं है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश आत्मा स्व-स्वरूप का भोक्ता है। इन्द्रिय विषयों का आत्मा में अभाव है, उनको वह कैसे भोगे ? आत्मा पर विषयों का नहीं परन्तु अपने ज्ञान, दर्शन, वीर्य, आनंद और शांति आदि का उपभोक्ता है।

१३. टीकार्थ - लिंग द्वारा अर्थात् मन अथवा इन्द्रियादि लक्षण के द्वारा ग्रहण अर्थात् जीवतत्व को धारण कर रखना जिसके नहीं है, वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा शुक्र और आर्तव का अनुविधायी (अनुसार होनेवाला) नहीं है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश - आत्मा जड़ द्रव्यप्राणों से जीवित नहीं रहता है। आत्मा चेतन्य भावप्राण से जीवित रहता है। आत्मा का जीवत्व धारणकर रखना द्रव्यप्राणों का अथवा माता-पिता के रज-वीर्य का अनुविधायी नहीं है।

१४. टीकार्थ- लिंग का अर्थात् मेहनाकार का (पुरुषादि की इन्द्रिय के आकार का) ग्रहण जिसके नहीं है, सो अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा लौकिक साधनमात्र नहीं है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश-आत्मा मेहनाकार को (पुरुष, स्त्री नपुंसक की जड़ इन्द्रियों के आकार को) ग्रहण नहीं करता है। आत्मा (सन्तानोत्पत्ति का) लौकिक साधनमात्र नहीं है। आत्मा तो वीतरागी पर्याय प्रगट करने में लोकोत्तर साधन है।

१५. टीकार्थ- लिंग के द्वारा अर्थात् अमेहनाकार के द्वारा जिसका ग्रहण अर्थात् लोक में व्यापकत्व नहीं है, सो अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा पाखंडियों के प्रसिद्ध साधनरूप आकारवाला-लोकव्याप्तिवाला नहीं है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश प्रत्येक आत्मा अपने स्वक्षेत्ररूप असंख्य प्रदेशों में रहता है।

१६. टीकार्थ - जिसके लिंगों का अर्थात् स्त्री, पुरुष और नपुंसक वेदों का ग्रहण नहीं है, वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा द्रव्य से तथा भाव से स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक नहीं है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश- द्रव्यवेद- नोकर्म जड़ शरीर की रचना है, वह अजीवतत्त्व है। भाववेद- पर शरीर को स्पर्श करने का, भोगने का भाव पापभाव है। द्रव्य तथा भाववेद का आत्मस्वभाव में अभाव है।

१७. टीकार्थ- लिंगों का अर्थात् धर्मचिन्हों का ग्रहण जिसके नहीं है, वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा के बहिरंग यतिलिंगों का अभाव है - इस अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश जब अंतर में निग्रंथ दशा प्रगट होती है, तब बाहर में शरीर की नग्न दिगम्बर दशा ही होती है तथा संयम-शौच के उपकरण मयूरपिच्छि और कमंडलु मात्र होते हैं, परन्तु उनका आत्मा में अभाव है।

१८. टीकार्थ - लिंग अर्थात् गुण ऐसा जो ग्रहण अर्थात् अर्थावबोध (पदार्थज्ञान) जिसके नहीं है, सो अलिंगग्रहण है। इस प्रकार आत्मा गुणविशेष से आलिंगित न होनेवाला ऐसा शुद्ध द्रव्य है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश अभेद आत्मा (सामान्य) गुणभेद (विशेष) का स्पर्श नहीं करता।

१९. टीकार्थ लिंग अर्थात् पर्याय ऐसा जो ग्रहण अर्थात्

अर्थावबोधविशेष जिसके नहीं है, सो अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा पर्याय विशेष से आलिंगित न होने वाला ऐसा शुद्ध द्रव्य है - ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश नित्य आत्मा अनित्य पर्याय का स्पर्श नहीं करता।

२०. टीकार्थ- लिंग अर्थात् प्रत्यभिज्ञान का कारण ऐसा जो ग्रहण

अर्थात् अर्थावबोध सामान्य जिसके नहीं है, वह अलिंगग्रहण है। इसप्रकार आत्मा द्रव्य से नहीं आलिंगित ऐसी शुद्ध पर्याय है ऐसे अर्थ की प्राप्ति होती है। सारांश- शुद्ध पर्याय की अनुभूति ही आत्मा है। शुद्ध पर्याय एक स्वतंत्र अनित्य सत् अहेतुक है, वह ध्रुव सामान्य को स्पर्श नहीं करती। वेदन - जानना पर्याय में ही होता है, शक्तिरूप त्रिकाली सामान्य में नहीं। पर्याय में जब स्वसंवेदन प्रत्यक्ष से आत्मा का जानना हुआ अनुभव हुआ, तब उस शुद्ध पर्याय को (अनुभव को) आत्मा कहा।

प्रस्तुति ब्र. पं. हेमचन्द जैन ‘हेम’, देवलाली