दशलक्षण महापर्व 2018 के लिए तैयार की गई 160 धार्मिक पहेलियाँ (उत्तर सहित) — जैन धर्म, तीर्थंकर, सिद्धांत और तत्त्व पर आधारित। हस्तलिखित नोटबुक का पूरा पाठ नीचे है, मूल PDF सबसे नीचे।
160 Jain religious riddles (Dharmik Paheliyan) with answers, prepared for Daslakshan Mahaparv 2018 — full OCR text of the 20-page handwritten notebook below; original PDF attached.
० धार्मिक पहेलियाँ-
१) एक अक्षर का मेरा नाम, मैं हूँ पंच प्रभु का धाम ।
जन जन करते मेरा ध्यान, पुरे जिनागम का सार ।। ओम ॐ
२) छः अक्षर का मेरा नाम, सबको बताता मुक्ति मार्ग ।
कितना सुंदर है मेरा धाम, बोलो बच्चो क्या यह काम ।।
- दिव्यध्वनि
३) पाँच अक्षर का मेरा नाम, शुद्धात्म का मुझमे धाम ।
कुन्दकुन्द ने मुझे बनाया, बताओ जल्दी मेरा नाम ।।
- समयसार
४) दो अक्षर का मेरा नाम, आता हूँ मुक्ति के काम ।
प्रथम कटे तो रम बन जाऊँ, अन्त कटे तो घर बन जाऊँ ।।
- धर्म
५) पाँच अक्षर का मेरा नाम, चारोगति में मेरा धाम ॥
उल्टी श्रद्धा मेरा काम, संसारी मुझसे परेशान ।।
- मिथ्यात्व
६) मुझे चाहिये रुपया पैसा, बोलो मेरा रूप है कैसा ।
तृष्णादेवी माता मेरी, तीन लोक की संपत्ती खाता ।।
- परिग्रह
७) मननशील कहलाता हूँ, चारो गति में जाता हूँ ।
संयम धारण करके मैं, मुक्ति पुरी भी जाता हूँ ।।
- मनुष्य
८) तीन अक्षर का मेरा नाम, मुझसे चलता है संसार ।
जिसने मुझे मुख को मोड़ा, उसका कटता है संसार ।।
- आश्रव
पूर्ण
*16 ९) ३ अक्षर का मेरा नाम, आता हूँ रहने के काम।
मुझसे बडा कोई न जग में, नाम बताओ मेरा भाई।।
- आकाश
१०) चार अक्षर का मेरा नाम, मुझको क्या दुनिया से काम।
ज्ञान ध्यान बस व्यापार, मुक्ति पाने को मैं तैयार।।
दिखने में लगता कंगाल, फिर भी हूँ मैं मालामाल।। - मुनिराज
११) चार अक्षर का मेरा नाम, तीर्थंकर में मेरा नाम।
अन्त कटे तो महा बन जाये, आदि कटे वीर कहलाये।। - महावीर
१२) पूर्व विदेह में विद्यमान हैं, भरत क्षेत्र में है गुणगान।
केवल ज्ञान के धारी हैं वो, बोलो भाई उनका नाम।। - सीमंधर स्वामी
१३) ३ अक्षर का उनका नाम, इन्द्रभूति था उनका नाम।
जिननिगम में उनका काम, द्वादशांग है उनका धाम।। - गौतम गणधर
१४) तीन अक्षर का मेरा नाम, अन्त कटे तो सर्व बचे।
मुझमें लोकालोक झलकते, मैं हूँ अनंत गुणों की खान।। - सर्वज्ञ
१५) चार अक्षर का मेरा नाम, छः खण्डों में मेरा धाम।
जीवाद्यवस्था मैं बतलाता, मुझको रचते दौलत राम।। - छहढाला
१६) दो अक्षर का मेरा नाम, सारे जग में आता काम।
मुख्य गौण करके मैं जानु, श्रुतज्ञान में मेरा धाम।। - नय
17] चार अक्षर का मेरा नाम, मेरा नाम है बड़ा महान।
प्रथम ग्रंथ के कर्ता को, मैने ही बस दिया है ज्ञानं।।
षट्खण्डागम
- धरसेन आचार्य
18] छह अक्षर का मेरा नाम, बाहय विभूति मेरा काम।
बाहर सभाये मुझमें लगती, भाई बताओं मेरा नाम।। - समवशरण
19] पाँच अक्षर का मेरा नाम, सब को जानना मेरा काम।
मैं रहता हूँ अपने अन्दर, फिर भि दुनिया मेरे अन्दर।।
ध्रुव स्थिति - केवलज्ञान
20] एक पुरुष जिनवर ने देखा, पाँव पसारे खडा हुआ।
पतली कमर पर हाथ रखे है, अनादि काल से खडा हुआ।।
वि०आकृति - त्रिलोक
21] कर्मप्रधान कथन है मेरा, गुणस्थानों का मुझमे नाम।
त्रिलोकादि का वर्णन करता, बोलो भाई तुम मेरा नाम।।
पहि - करणानुयोग
22] आतम ध्याना, आतम ध्याना, आतम मेरम जाना आतम ध्याना।
अष्ट कर्म की हानी घटा हो रहता है मस्ताना आतम ध्याना।।
वि०आकृति - सम्यग्दृष्टी
23] मुनिराजों की बात बताता, वीतरागता को दर्शाता।
महापुरुषों की बात बताकर, वीतरागता को दर्शाता।।
पुष्पबंध भी में करवाना, मुझे बताओं क्या कहलाता।। - प्रथमानुयोग
24] अणु-भणु जो देखा नाता, अत्यमत्व बतलाती है।
अरहंतो की दिव्यध्वनि है, के वलि कन्या कहलाती है।। - जिनवानीPage No.: 4
25] आठ अक्षर का मेरा नाम, मोक्षों का मुझमें धाम।
मैं स्वयं में अपूर्ण हूँ, पर कहलाता अपूर्व हूँ।।
- मोक्षमार्ग प्रकाशक
26] निगोद से लेकर मुक्तिपुरी को, मैं हूँ मार्ग बताता हूँ।
छोटा समयसार से नाम से में भव का परिचय पाता।। - छहढाला
27] स्वर्गों का राजा कहलाये, तीर्थकर को नमन कराये।
चिन्ह देखता सबसे पहले, कौन है उसका नाम बताओ।। - सौधर्म इन्द्र
28] द्वादशांगों से सजी हुई है केवली कन्या मेरा नाम।
जो भी मेरा आश्रय लेता वह बन जाता है भगवान।। - जिनवाणी
29] एक भूतनी हमने देखी, नागिन जैसा उसका काम।
बत्तीस भव करते सहयोग, रहती एक गुफा के धाम।। - जीभ
३०] द्रव्यों का ज्ञान कराती, नव तत्वों को भी बतलाती।
अनेकान्तमय धर्म बताती, स्याद्वाद शैली अपनाती।। - जिनवाणी
31] एक नागिन की ऐसी करनी, सब कुछ चटकर जाती है।
चूषक के वह वश में रहती, धर्म भ्रष्ट करवाती है। - रसनेन्द्रिय
३२] चार अक्षर का मेरा नाम, चेतन का क्या मुझमे काम।
मुझमें भ्रमित हुआ हेराम और जग में मेरा धाम।। - मिथ्यात्व
33] मैं सबको कसकर दुःख देती, सबकी सुख शान्ति हर लेती।
मैं हूँ आकुलता की माता, मेरा नाम सबको है ज्ञाता।।
- कषाय
34] दो अक्षर का मेरा नाम, परिणमन का ही काम।
पूरे जग में रहता हूँ, एक प्रदेशी मेरा आकार।।
(फिर भी ध्रुव में अनस्तिकाय) कालद्रव्य
35] जिसके सिर पर मैं हूँ आता, उसके होठ भुजा फड़कता।
जो मुझमें अन्धा हो जाता, छोटा बड़ा न उसे सुहाता।। - क्रोध
36] हितकारी अति मिष्ट है। तीन जगत का इष्ट है।
जिनवाणी कहलाती है, मोक्षमार्ग बतलाती है।। - दिव्यध्वनी
37] सबको मुक्ति मार्ग बनाती, तीर्थंकर के मुख से खिरती।
छह अक्षर का मेरा नाम, बोलो बच्चो मेरा नाम।। - दिव्यध्वनी
३८] मैं हूँ सब पापों का बाप, नाम बताये मेरा आप।
सारा जग मेरे आधीन, सब कुछ है फिर भी मैं दीन।। - लोभ
३९] सकल जीवन दुःख भोगूँ, पराधीनता मेरा काम।
मायाचारी से जन्मी हूँ, चौपाया भी मेरा नाम।। - तिर्यञ्चगति
40] सब पापी मेरे घर आते, सात घरों में ते दुख पाते।
नित नित होते देह के खण्ड, भूख, प्यास भी लगे प्रचण्ड।। - नरकगति
41] सुख का पुरा धाम है, पञ्चमगति भी नाम है।
सिद्धों का तो धाम है, पीडित का क्या काम है।।
- मोक्ष
42] ऐसे शाश्वत पर्व बतायो, महिने में आते दो बार।
संयम समता भाव जगाना, रहता है अपना उस दिन काम।। - अष्टमी, चतुर्दशी
43] गुरु की आज्ञा में रहते हैं, अध्ययन मनन नित करते हैं।
दृव्य श्रुत के ज्ञाता पुरे, सब को शिक्षण वह देते हैं।। - उपाध्याय
44] व्रत आठ पालन करते हैं, बाईस को वह जीत रहे हैं।
पंच परम पद की श्रेणी में, उनको सब पहिचान रहे हैं।। - साधु
45] काम किसी के कभी न आता, पर अपना अस्तित्व बताता।
उसको हम स्वीकार रहे हैं, पर कर्ता नहीं मान रहे हैं।। - निमित्त
46] ज्ञान ध्यान तप लीन मुनिवर, मरा सर्प राजाने डाला।
रानी ने उपसर्ग हटाया, विरतिचार उपसर्ग सहा था।।
पर मुनिवर ने धर्मवृद्धि का, दोनों को उपदेश दिया था।। - यशोधर मुनिराज
47] चार अक्षर का मेरा नाम, चेतन का नहीं नाम निशान।
मुझसे भ्रमित हुआ है सदा, सारा जग है मेरा धाम।। - पुद्गल
48] दो अक्षर का मेरा नाम, रहता हूँ मैं सुख के धाम।
करने को कुछ काम नहीं, दुःख का नामनिशान नहीं।। - सिद्ध
49] ऐसा शाश्वत पर्व बताओ, तीन बार वर्ष में आता।
संयम समता भाव जगाता, हम सब के वह मन को भाता॥
- दशलक्षण पर्व
50] दो अक्षर का मेरा नाम, बिना कमाये ही आराम।
लोग अमर मुझको कहते हैं, अमृत पीने का है काम॥
फिर भी मर जाता हूँ मैं, इससे रहता हूँ हैरान॥
- देव
51] निरखतचार ‘शील’ की महिमा, सूलि भी सिंहासन बन गई।
व्रतपालन की अनुपम शक्ति, नाम सेठ का शोषण कर गई॥
- सेठसुदर्शन
52] जिनको होता केवलज्ञान, चार अक्षर में आता नाम।
पहले दो अक्षर से गुजर, अन्त के अक्षर राग बनत॥
- वीतरागी
53] शब्द सुने से लगे जकड़, जैन तीर्थ है बड़ा सुघड़।
बुंदेलखण्ड में है यह स्थान, तीन अक्षर में पूरा नाम॥
- बंघाजी
54] बुंदेलखण्ड का तीर्थ महान, तीन अक्षर का उसका नाम।
मुनि चर्चा में नित्य प्रयोग, मिला है जिसे सिद्ध संयोग॥
- आहारजी
55] चार अक्षर का पूरा नाम, जिनमें हैं जिन भगवान।
पहले दो अक्षर करते शुरुआत, अंत के अक्षर स्वामी पात्र॥
- आदिनाथ
56] सीधा बोलो करो घमण्ड, उल्टा कर दो करे नमन।
कतर षटपटा दो अक्षर में जान, घुमा फिरा कर बनता नाम॥
- मान
57] पाँच अक्षर का पूरा नाम, इष्ट वेदना अर्थ मतान।
यदि काट दूँ आदि अंत बने शरू वह बस्तु तुरन्त।।
- देवस्तुति
58] तीन अक्षर का पूरा नाम, उल्टा सीधा एक समान।
माता हूँ झुकने के काम, बतलाओ बंधुभो मेरा नाम।। - नमन
59] जैन धर्म में श्रेष्ठ विचार, दीन-दुःखी पर रखना यार।
उल्टा कर दूँ तोता याद, ऐसा धर्म सुकाऊँ भाथ।। - दया
60] पाँच अक्षर का नाम अनूप, सब कोई देखे लघु रूप।
मध्य कटे से शुद्ध है वो, पानी वराजय उनसे लो।। - जलविहार
61] गंध सुगंध का है भंडार हवन में डाले सब नर नार।
दस लहाण में दसवाँ ओय अतिआवश्यकता उसको होय।। - धूव
62] दो अक्षर का ऐसा नाम, मारे कृपणता पाप समान।
उल्टा कर दो अच्छा सोख, भलो जगत में सबको होय।। - लोभ
63] चार अक्षर का पूरा नाम, जैन तीर्थ है बड़ा महान।
दो अक्षर में पर्वत जाये, शेष अक्षर में नारी भाव।। - गिरनार
64] चार अक्षर का मेरा नाम, 8 दिन तक चले विधान।
कोढी राजा हुआ था ठीक, बतलाओ बंधुओ मुझओलीक।। - शिब्दचक्र
६५] तीन अक्षर का मेरा नाम, खुशबु ठंडक मेरा काम।
आता है पुजा के काम, या माथे में लें विश्राम ।।
- चन्दन
६६] चार कर्म से दूर रहते, चार कर्म पास में रहते।
रोटी पानी कभी न खाते, हम सब उनकी महिमा गाते।। - अरहंत
६७] श्रीमंधर के पास गये थे, जिनके अनुभव सभी नये थे।
जो अध्यात्म ध्वजा के धारी, जिनने महान शास्त्र रचे थे। - कुन्दकुन्दाचार्य
६८] सर्व देखा वैराग्य धरा था, मेंढक जिसके मुँह में फँसा था।
शांती भक्ति रचाने वाले चरण कमल से पूज्य हुआ था।। - पूज्यपाद
६९] भूख प्यास का नाम नहीं है, रागदेष का काम नहीं है।
परमौदारिक काया उनकी रहे नगन और ध्यान कहीं है।। - अरहंत
७०] सिद्ध प्रभु की भक्ति करावे, घर में ही वैरागी कहावे।
अन्तर्मुहुर्त में केवलज्ञान, ऐसे विरागी का नाम बतावे।। - भरत
७१] महिमा जिनकी खुब सुनी है मित्रता की मिशाल बड़ी है।
तुंगीगिरी से मोक्ष पधारे उस मानुष का नाम बताओ।। - सुग्रीव
७२] राक्षध वंश में जो जन्मे थे, नित्यपूजन का नियम लिये थे।
चूलगिरि से मोक्ष पधारे, ऐसे सुत का नाम बताओ।। - कुंभकर्णAMAR KRISH
73] ऐलक जी एक नगर में आये, दीक्षा का जब भाव लागये।
बिना गुरु के दीक्षा यथे, मेघ गरज धरती पर आये।।
- आ. मायनंदी
74] स्याद्वाद की तो निशानी, चिदानंद की है राजधानी।
अनेकान्त का रूप बधानी, अमर तेरी जग में है कहानी।।
- जिनवाणी
75] स्वर्ग से चलकर देव जो आये, विद्याधर नाम का रूप बनाये।
लेते परिक्षा वीर की वो, उसमे वर्धमान नहीं घबराये।।
- संगम देव
76] काम स्वयं अपना करना, आशा नहीं किसी की करना।
अन्य लोग सब मिलजाते है, कार्य स्वतः ही हो जाता है।।
- उपादानकारण
77] मैं दोषों से दूर बहुत हुँ, गुणों का पूर्ण खजाना हुँ मैं।
विश्वभरा हो मुझसे जानो, अबतो तुम मुझे पहिचानो।।
- हव्य
78] दो अक्षर का मेरा नाम दो द्रव्यों के आता काम।
अपनी गति से चलते है चलते है फिर भी आता मेरा नाम।।
- धर्म (द्रव्य)
79] प्राणों की आहुती देकर, जिसने अपना भाई बचाया।
जैन धर्म की रक्षा करके, जग में अपना नाम कमाया।।
- निकलेक
80] मोक्षपुरी एक ने पाई, एक हुआ परिपूर्ण ज्ञानी।
उसदिन का तुम नाम बताओ, नहीं रहोंगे तुम अज्ञानी।।
- विद्यावली
११] ऐसा तुम स्थान बताओ जहाँ जीव का आना जाना।
आते है अपने भावों से, जाते भी अपने भावों से ।।
- चारगतियाँ
१२] पृथ्वी ही जिसका शरीर है कंकड पत्थर जिसके धाम।
स्थावर का एक भेद हुँ बोलो भैया उसका नाम ।।
- पृथ्वीकायिक
१३] चिन्ह सिंह कहलाता है जिनका पावापुर निर्वाण महान।
नमस्कार करता प्रभुजी को वर्तमान का शासन जान।।
- महावीर
१४] सुख धाम की प्रथम शिला है, कहते जिसे धर्मो का मूल।
बिन इसके जो देव दुःखी है। इसके सहित नर तन अनुकूल।।
- सम्यग्दर्शन
१५] जिसके कारण जीव घुमता, जिसके कारण होते पाप।
जिसके ज्ञान चारित्र है झूठे, जो सब पापों का बाप ।।
- मिथ्यात्व
१६] शाश्वत तीर्थ जिसे कहते है, मोक्ष गये अनंते जीव।
बीस तीर्थंकर मोक्ष पधारे, चौबीसों जाते है सदीव ।।
- सम्मेदशिखर
१७] 66 दिनों तक मौन रहे, प्रभुअवसर का इंतजार किया।
इन्द्रभूति ब्राह्मण आता तो जीवों का उद्धार किया।।
- महावीर
१८] तीन लोक में यही सार है, परमेष्ठि भी करते ध्यान।
जो भी इसका आश्रय लेता, करता है अपना कल्यान।।
- वीतरागताAMAR
४९) एलाचारी जिन्हें कहते है, कलिकाल सर्वज्ञ महान।
पाँच परमागम जिनको है प्रसिद्ध, पढ़ने से होता है कल्यान।।
- कुन्दकुन्दाचार्य
९०) चारों को विनशाया जिसने फिर भी चारों के साथ।
चार अक्षर का नाम है उनका चार अनंते जिनके साथ।।
- अरहंत
९१) 357 सूत्र है जिसमें संस्कृत में है पहला ग्रंथ।
दस अध्यायों में विभक्त है कहलाता है मुक्ति का पंथ।।
- तत्त्वार्थ सूत्र
९२) तीन अक्षर का मेरा नाम, स्थिर रहकर भी चलता है।
सारी दुनिया चलाकर थकती, दुनिया कहती मेरा नाम।।
- अधर्म (द्रव्य)
९३) गाथा का पुरुषों की बात बताना, किंतु वीतरागता को ही दर्शाना,
महापुरुषों की बात बताकर, पुण्य बंध भी करवाता।।
- प्रथमानुयोग
९४) ज्ञान नहीं अज्ञान नहीं, सुख या दुःख की खान नहीं।
पाँच भाई है मेरे संग में, जीव शब्द भी रहता मुझमे।।
- अजीव
९५) सीमंधर के पास गये जो, उत्तम अनुभव शास्त्र रचे।
प्रथम युग के देव कहलाये, उनका नाम बतलाओ भाई।।
- आ. कुन्दकुन्द
९६) परम शत्रु है आस्रव मेरा, सम्यग्दर्शन हरता भाई।
सबको शिवपुर में ले जाता, कर्मों पर है धाक जमाता।।
- संवर
९८) मुक्ति वधु की परम सहेली, तव है मुझे मित्र समान।
कर्म दहन की आग्नि बनुं मैं, बोलो भैया मेरा नाम।।
- निर्जरा
९९) दो अक्षर का मेरा नाम, नरकों में है मेरा धाम।
मुझको जो अपनाता है, वह नरको में जाता है।।
- पाप
९९) सात अक्षर का मेरा नाम; पंच भावों में आता नाम।
चार भाव तो आते जाते, सदा काल है मेरा धाम।।
- पारिणामिक भाव
१००) जो जीवों को दुःख देता है, वह मुझको धारण करता।
में लेजाता नरकों बीच, मुझमें है पापों का बीज।।
- हिंसा
१०१) सत्यरूप से में विवरीत, अज्ञानी से मेरी जीत।
मुझको जो भी करता है वह नरकों में चल जाता है।।
- झूठ
१०२) सब लोगों का माल हडपती, सबको में पहुँचाती जेल।
सबकी बदनामी करवाती, बतलाओ कैसा यह खेल।।
- चोरी
१०३) मान को बचाया है जिसने, जिनवाणी माँ का है पुत्र।
ज्ञान को गँवाया जिसने, पर जिनधर्म को किया मजबूत।।
- निष्कलंक
१०४) ताज बन गया पुष्पों का हार, पडा ज्ञायक मन में सवार।
नाम बताओ उस सती का, कर्म खिपावै भांति अपार।।
- सोमा सतीAMAR
[105] आतम स्वाद चखता हूँ, विदेहक्षेत्र से लाया ज्ञान।
चारण ऋद्धिधारी हुँ, बतलाओ तुम मेरा नाम ।।
- आ. कुन्दकुन्द
[106] ग्यारह वर्ष की उम्र थी न्यारी उनने जिनदीक्षा धारी।
कुन्द था तो प्यारा था परमागम रचा डाला ।।
- कुन्दकुन्दाचार्य
[107] पाँच भाई पूज्य कहलाते, तीनो लोक उन्हे है ध्याते।
जो उनकी भक्ति निस करे, पाप से मुक्त वे हो जाते ।।
- पंचपरमेष्ठि
[108] एक ऐसा मनुष्य देखा खाता है ना पीता है।
अमृत भी नहीं पीता है फिर भी अनंत काल तक जीता है।।
- सर्वज्ञ
[109] एक गया, दो गया, तीन गया रे।
चार गया किन्तु चार रहा रे ।।
- अरहंत परमेष्ठी
[110] आँखो से आँसू टपटपके थे, पैरो में थी बेडीयाँ।
फिर भी मुनि को दिया आहार, महिमा उस की अपरम्पार ॥
- चन्दनबाला
[111] दोनो भाई जुड़वा आवे, बहिन को देख वैराग्य पावे।
कुंथलगिरि से मोक्ष पधारे हम भी उनकी भक्ति रचावे॥
- देशभूषण-कुलभूषण
[112] दो-दो केवली मुक्ति पधारे, बुंदेलखण्ड की शान बढावे।
ढूंढ के उत्तर जल्दी बतावे, जिला टीकमगढ में ही कहावे।।
- आहारजीAMAR
113]
एलाचार्य भी जो कहावे, गिद्ध विच्छ को धारण करते।
अष्टापाहुड भी उनकी कृति है, महिमा उनकी खूब सुनी थी।।
- कुन्दकुन्दाचार्य
114]
ऐसे गुरु का नाम बताओ, उनका भतिशय सबको बताया।
धिण्डि फटी और हहुजी प्रगटे, भस्म व्याधि से जो थे जकडे।। - समंतभह
115]
साधुजी ने घर से निकाला, पिता जी ने भी मुष को मुंडाया।
22 बरष तक वियोग न जाने वह कौन संयोग।। - अंजना
116]
एक सती थी चंदनबाला, सेठानी ने कैद में जला।
नाम बताओ सेठानि का, जिसने चंदना सती को सताया।। - सुभहा (भलका)
117]
काशी नगरी की बात सुनाता, भृष ने उनको बहुत सताया।
पाखण्डी का भांडा फोडे नाम तो उनका थोडा जोडे।। - समंतभह
118]
विषभी अमृत तुमने किया था, विषापहार स्तोत्र रचा था।
बेटे को जो तुरंत उठाया, भाक्ति में मन जो खूब लगाया।। - धनंजय
119]
नृप ने उनको पीडा पहुँचाई, उनने भक्ति प्रभु की गाई।
देवों ने भी महिमा रचाई, ताले टुटे सभी दिखाई।। - आ. मानतुंग
120]
भर्तृहरि के भाई बताते, जैनो में जैनाचार्य कहाये।
श्रेणिक चरित्र के ये लेखक, उनको पूजन हम सब ध्यावत्।। - आ. शुभचन्द्र
121]
द्वारा नगरी जिसने बसाई, मुनि ने नगरी फिर वो मिटाई।
महापुरूष में नाम जो भावे, लीला में जो उपमा पावे ।।
- श्रीकृष्ण
122]
मेरा तीरथ सबसे प्यारा, राजस्थान में जो है न्यारा।
अतिशय क्षेत्र महान कहावे, माधोपुर जिला में आवे ।। - महावीरजी
123]
ऐसे गेट का नाम बनाओं, जिससे कभी न कोई गुजरा।
बना है हड्डी का जो, रंग है जिसका उजला-उजला ।। - कोलगेट
124]
ऐसे बाँध का नाम बताओं, हिन्दुस्थान का बेटा है जो।
देह है जिसकी स्वतःवर्ष की, भरी हुई है जिससे चर्बी ।। - लाईफबॉय
125]
कौनसा पॉलिश है वह, जिसके बनने में कई बंदर मरते।।
उस पॉलिश का नाम बताओ, नाम बताकर शिक्षा पाओ।। - नेलपॉलिश
126]
बिल्ली का रज वीर्य है उलटा कीड़ों का रस जिसमें मिलता।
दस गुने दामों पर मिलता जो भी लगाये चमड़ी मलती ।। - क्रीम
127]
पर्स बेल्ट और जुते चप्पल, बोल्ट और वॉशर या निखल।
जिन्दा पशुओं को कटवाके, किससे बनता नाम बताये ।। - चमड़ा
128]
जिसमें है कोई रस ना, उसके चक्कर में मत फँसना।
टी.वी. वाले बनाये बुद्धु, लेकिन उसका स्वादन त्यजना।। - रसनाAMAR KRISH
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129]
मौत का है पैगाम हुँ लाती, खुद भी जलती तुम्हे जलाती।
धुंए में तेरे निकोटीन है, बोलो तो मैं क्या कहलाती है।।
कविता - - सिगरेट
130]
दादाजी का हूँ में कलेजा, बेकिंग कस्टर्ड से में बनता।
छुरी मारकर काटे मुझको, मौज मनाये खाये मुझको।।
सामान्य-ज्ञान - - केक
131]
पीने में यह ठंडी लगती लेकिन सुगर के कफ से बनती।
कार्बोहाइड्रेट मिला हुआ है, माल विदेशी कहा हुआ है।।
कविता - - पेप्सी
132]
जन्म दिवस पर काम में आती, लेकिन गोवध से है बनती।
जो भी खाये दाँत सडाये। बेचनेवाला मौज उठाये।।
कविता - - टॉफी
133]
एक अंग का ज्ञान यहाँ था, दीक्षा अपना खेद किया था।
बिल्ली को जो बचाने वाले, बाद अभिषेक बखान किया है।।
इतिहास पहेली - - आ. माघनंदि
134]
अंत समय णमोकार सुनाया, कुत्ते को भी देव बनाया।
काया सुंदर चरम शरीरी, बैरागी थे आप सुमीरी॥
धार्मिक पहेली - - जीवन्धर कुमार
135]
शवण दूर घूम कर आया, विमानवासी चल न पाया।
पर्वत पर मुनि बालि विराजे, उस पर्वत का नाम बताये॥
धार्मिक पहेली - - कैलाशपर्वत
136]
ज्ञाता तुम क्यों रोता जग में लिखनेवाले मुक्ति मग में।
आत्मध्यानी के लेखक हैं वो उस महात्मा का नाम बताओ।।
पहेली - - अमृतचन्द्राचार्य
[137]
ऐसे इन्द्र का नाम बताओ, चारपैर और पूँछ दिखाओ।
शत इन्द्रो में आनेवाला, इन्द्र की शोभा पाने वाला।।
- सिंह
[138]
जन्म से निग्रन्थ भेषादि दिखाया, 11 वर्ष में मुनिपद पाया।
ऐसे शूरि का नाम बताओ, उसका उत्तर ढूंढ के लाओ।।
- कुन्दकुन्दाचार्य
[139]
जिनेन्द्र वर्णी एक कहावे, क्षुल्लक पद की पदवी पावें।
उसके अन्दर न थी व्याधि, कहाँ हुयी थी उनकी समाधी।।
- ईसृति
[140]
आठ गुणों को प्राप्त किया है, निराकार पद धार लिया है।
अब न उनको भाना भव में, लीन रहे निज चेतन दृग में।।
- सिद्ध परमेष्ठि
[141]
क्षण में हो गया राग विराग, हुआ विवाह घर हो गया त्याग।
बालविवाह की शक्ति गाई वीर पुत्र की माँ कहलाई।।
- सती अंजना
[142]
विफल हो गई सारी चाल, पुण्यभाव से मालामाल।
णमोकार मंत्र की महिमा जान, हुआ। सर्व से पार विधान।।
- सती सोमा
[143]
तीन बार वनवास है पाया, तोभी जिया को हिला न पाया।
सारे जग से पूज्य है माना, नाम बताओ जिसको आता।।
- सीता
[144]
मेरु भी केवल कहे सार जगभर माया, सारा जग मुख कहे लोभी कहीं न जाय।
तो भी कहीं न आप देखो श्रद्धा की मूरत, कलिकाल तीर्थंकर आये जो दूजे बन जाये मूरत।
- रेवतीAMAR KRISH
[145] स्वयं भाग्य से सबको मिलता, अग्रिम वचन थे वे अनमोल।
नारी का आभूषण है वो, बोल सको तो मुख से बोल।।
- मैना सुंदरी
[146] मिथ्या गुरु का मान गलायो, सच्चे गुरु से मान बढ़ाया।
जैन धर्म का वह आभूषण, जिसकी श्रद्धा में न लगा दूषण।।
- चेलना
[147] सत्त्वज्ञेश की रचना कीनी, जग की अनुपम निधियाँ दीनी।
मृत्यु लखकर भी मुस्कान, तत्त्ववेदी पर हुआ बलिदान।।
- टोडरमलजी
[148] जिनकी लेखनी में था श्रृंगार, महान् तत्त्व का है उपकार।
वह श्रृंगार विराग बन गया, एक रसिक विद्वान बन गया।।
- बनारसीदासजी
[149] गागर में सागर भर दीना, भावि जीवों को उपदेश है दीना।
दिव्य ध्वनि दौलत बरसाई, जिन धर्म की महिमा गाई।।
- दौलतरामजी
[150] जिनके स्वप्नों का सम्यक्, फल देख रहा संसार।
इनको देखकर जो भी होते, वह जाये भव पार।।
- सम्राट् चन्द्रगुप्त
[151] भारत की संज्ञा है वे, जैन धर्म के गौरव थे।
जल में भिन्न कमल है वे, जिनधर्म पहिचान है वे।।
- भरतचक्रवर्ती
[चा / 152] हर माता का वीर पुत्र वह, अतुलवीर्यबलवान महान्।
कामदेव पदवी का धारी उनकी महिमा जगमें भारी।।
- हनुमानPage No.: 20
153]
एक प्रतिज्ञा निश्चय बारी, मृत्यु भी हँसकर स्वीकारी।
तीर्थंकर पद पदवी पाई, हठ प्रतिज्ञा रहना अब भाई।।
- पुरुरवा
154]
जिनशासन पर यह बलिवान, याद रखेगा सकल जहान।
संकट में जिन धर्म न त्यागा, जिन शासन से था अनुराग ।।
- निकलंक
155]
वनराज जब सम्मुख आये, लोभी उनको डिगा न पाये।
मन में भजे तत्व अपार, वनराज बने तब शाकाहार ।।
- दीवान अमरचंद
156]
ज्ञान विराग का अद्भुत खेल, किया विवाह पर हुआ न मेल।
लिया मोक्ष घट शुभ निर्वाण, पटना नगरी मंगल जान ।।
- जम्बुस्वामी
157]
खल मंडल में प्रमुख महान, सत्यधर्म का साथी मान।
राज संपदा सब ही त्यागी, राजा राम का पक्का साथी ।।
- विभीषण
158]
लक्ष्मी जिनकी दासी थी, संकट सहे महान।
जहाँ जहाँ वे पग धरे, वहाँ धन वैभव सम्मान ।।
- धन्यकुमार
159]
नट के फल को त्यागकर, लिया धरम बड़ इष्ट।
एक रूप मुनिराज का, बाधा हरे अनिष्ट ।।
- ब्रह्मगुलाल
160]
अहोभाग्य तीर्थंकर मुनिवर आज यहाँ पधारे हैं, माहार प्रथम दो रसुरस का भाव सभी उमजाये
धन्य मुनि परम दिगंबर, नश्वर जग का मचान है, जिनके पद को शीष नवावत बादल
मानो गरजत हैं।।
- राजा श्रेयांस
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