आध्यात्मिक न्यायालय (12 भावना नाटक) | Aadhyatmik Nyayalay Natak

आध्यात्मिक न्यायालय एक प्रतीकात्मक न्याय नाटक है, जिसमें “चैतन्य आत्मा बनाम मोह” का मुकदमा चलता है। मोह का वकील और विवेक का वकील अपने अपने पक्ष रखते हैं, और साक्षी के रूप में बारह अनुप्रेक्षाएँ (अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्म भावना) एक एक कर गवाही देती हैं; बीच में मोह अपने गवाह राग और द्वेष भी प्रस्तुत करता है। कुल 15 दृश्यों में (अदालत की शुरुआत, बारह भावनाओं की गवाही, एक विशेष दृश्य तथा अंतिम निर्णय) आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराया जाता है, और अंत में न्यायाधीश यह निर्णय सुनाते हैं कि बारह भावनाओं का मनन कर मोह को त्यागो और रत्नत्रय को अपनाओ। संदेश स्पष्ट है, शरीर नश्वर है और आत्मा शाश्वत; सच्चा शत्रु बाहर नहीं, अपना मोह ही है। पूरा संवाद पाठ नीचे, मूल PDF (19 पृष्ठ) संलग्न।

Aadhyatmik Nyayalay (The Spiritual Courtroom): a symbolic Jain play in 15 scenes in which the soul (Chaitanya) is put on trial against Moh (delusion), with the twelve bhavanas (anuprekshas) testifying one by one as witnesses. The verdict: contemplate the twelve bhavanas, renounce delusion and embrace the ratnatraya. Full script below; original 19 page PDF attached.


पात्र : संचालक, न्यायाधीश (न्यायदेव), न्यायालय उद्घोषक, चैतन्य (वादी आत्मा), मोह (प्रतिवादी) एवं मोह वकील, विवेक वकील (अभियोजन पक्ष), राग, द्वेष, तथा साक्षी बारह भावनाएँ (अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ, धर्म)

संचालक : (प्रारम्भिक उद्बोधन) “णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं ।
णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्व साहूणं ।।”
आदरणीय गुरुवर, मंचासीन अतिथिगण एवं उपस्थित सभी श्रद्धालुजनों को सादर “जय जिनेन्द्र।”
आज हम सब एक ऐसे न्यायालय में प्रवेश करने जा रहे हैं, जहाँ न कोई झूठे साक्ष्य हैं, न कोई पक्षपात और न ही किसी को दंड देने की भावना। यह वह न्यायालय है जहाँ अपराधी कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि हमारा अपना मोह है। जहाँ वादी है चैतन्य आत्मा, प्रतिवादी है मोह, अभियोजन पक्ष में है विवेक, और साक्षी हैं बारह अनुप्रेक्षाएँ (भावनाएँ), जो जिनवाणी के प्रकाश में आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराती हैं। आइए, हम भी इस न्यायालय के केवल दर्शक न बनें, बल्कि स्वयं अपने हृदय में बैठकर विचार करें, क्या हमारा जीवन विवेक के अनुसार चल रहा है या मोह के अनुसार? इन्हीं भावों के साथ प्रस्तुत है नाट्य प्रस्तुति
(पीछे से (Order! Order!) हथौड़े की आवाज़ आए, और न्यायाधीश मंच पर प्रवेश करें)

एक आध्यात्मिक न्यायालय

“आत्मा बनाम मोह”

दृश्य 1 : अदालत की शुरुआत

(अदालत का मंच सजा हुआ है एक तरफ कटघरे में चैतन्य खडा हुआ है, पक्ष “विवेक” और विपक्ष “मोह” वकील हैं, तमाम गवाह और जनता बैठे हुए हैं।)

न्यायालय उद्घोषक : (हाथ में घंटी या हथौड़ा:“सावधान…! सावधान…!! माननीय आध्यात्मिक उच्च न्यायालय की कार्यवाही प्रारंभ होने जा रही है। सभी उपस्थित जन अपना-अपना स्थान ग्रहण करें। मन को शांत रखें… विचारों को सजग रखें… और यदि कोई अपना मोह बाहर छोड़कर आया हो… तो कृपया वापस जाकर ले आए… क्योंकि आज उसी पर मुकदमा चलने वाला है।"
(जज प्रवेश) “माननीय न्यायाधीश ‘न्यायदेव’ पधार रहे हैं। सभी सम्मानपूर्वक खड़े हो जाईए।”(जज बैठते हैं)

न्यायाधीश : “बैठ जाइए। आज का मुकदमा अत्यंत असाधारण है। यह संपत्ति का विवाद नहीं… यह हत्या का मुकदमा नहीं… यह किसी व्यक्ति के विरुद्ध भी नहीं… आज का मुकदमा है… चैतन्य बनाम मोह।”

मोह वकील : (आत्मविश्वास से) “माननीय न्यायाधीश! मेरे मुवक्किल का नाम सुनकर ही मुझे हँसी आ रही है। चैतन्य… जिस पर मेरा अधिकार अनादिकाल से है। यह मुकदमा शुरू होने से पहले ही मैं जीत चुका हूँ।”

विवेक वकील : (मुस्कुराकर) “माननीय न्यायाधीश… मोह जी की यही सबसे बड़ी भूल है। उन्हें लगता है कि जिसे वर्षों से बाँध रखा है… वह कभी मुक्त नहीं हो सकता। आज सत्य स्वयं गवाही देगा।”

न्यायाधीश : “अच्छा… तो क्या दोनों पक्ष तैयार हैं?”

मोह वकील : “मैं तो सदियों से तैयार हूँ।”

विवेक वकील : “मैं भी… और मेरे गवाह भी।”

मोह वकील : (हँसते हुए) “कितने गवाह हैं आपके?”

विवेक वकील : “केवल बारह।”

मोह वकील : “ओह…बारह? इतने कम? मेरे साथ तो पूरी दुनिया है।”

विवेक वकील : “दुनिया आपकी हो सकती है… सत्य नहीं।”

न्यायाधीश : “उद्घोषक…पहले गवाह को बुलाया जाए।” तभी… (मोह अचानक उठता है।)

मोह वकील : “एक मिनट माननीय न्यायाधीश! मुकदमा शुरू करने से पहले… क्या मुझे अपने मुवक्किल… यानी चैतन्य से… दो मिनट अकेले बात करने की अनुमति मिल सकती है?”

न्यायाधीश : न्यायालय मोह वकील को अपने मुवक्किल चैतन्य से दो मिनट अकेले बात करने की अनुमति देता है।"
(जज और विवेक थोड़ी दूरी पर चले जाते हैं। मंच पर केवल मोह और चैतन्य रह जाते हैं।)

मोह वकील : (मुस्कुराते हुए) चैतन्य… बहुत दिनों बाद अकेले मिले हैं। डरो मत… मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ।

चैतन्य : लेकिन सब तो कहते हैं कि मेरे सारे दुःखों का कारण तुम हो।

मोह वकील : (हँसकर) अरे! लोग तो बहुत कुछ कहते हैं। मैंने ही तो तुम्हें रिश्ते दिए… माँ-बाप दिए… पति-पत्नी का प्रेम दिया…बच्चों का स्नेह दिया…धन कमाने की प्रेरणा दी…अगर मैं न होता… तो तुम जीते कैसे?

चैतन्य : (सोचते हुए) बात… तो सही लगती है…
(तभी विवेक दूर से सुन लेता है और आगे आता है।)

विवेक वकील : आपत्ति, माननीय न्यायाधीश! मोह वकील केवल आधा सत्य बता रहे हैं।

न्यायाधीश : आपत्ति का आधार?

विवेक वकील : माननीय! रिश्ते दुःख का कारण नहीं…उनमें “मेरा” जोड़ देना दुःख का कारण है। धन समस्या नहीं… धन में आसक्ति समस्या है।

मोह वकील : (मुस्कुराकर) देखा माननीय! मेरी एक बात पूरी भी नहीं होने देते। कोई बात नहीं आपकी तो आदत है…बात पूरी करने से पहले उलझा देने की। ठीक तो मैं एक प्रश्न पूछता हूँ। (चैतन्य की ओर) यदि संसार इतना बुरा है…तो लोग उसे छोड़ते क्यों नहीं?

विवेक वकील : क्योंकि… मरीचिका को दूर से देखने वाला उसे पानी समझ लेता है।

मोह वकील : तो क्या आपके पास इसका कोई प्रमाण है?

विवेक वकील : जी हाँ। मेरे पहले विशेषज्ञ गवाह से बड़ा प्रमाण कोई नहीं। माननीय न्यायमूर्ति न्यायाधीश महोदय! इस मुकदमे की जड़ यह है कि जीव संसार की वस्तुओं को स्थाई मान बैठा है। आप की अनुमति हो तो अदालत मे मैं अनित्य भावना को बुलाना चाहता हूँ जो बताएंगी कि इस संसार में वास्तव में क्या नश्वर है।

न्यायाधीश : उद्घोषक! पहले विशेषज्ञ गवाह को न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए।

न्यायालय उद्घोषक : (घंटी बजाते हुए) "माननीय न्यायालय! समय के परिवर्तन का साक्षी… जीवन की क्षणभंगुरता का ज्ञाता… न्यायालय के प्रथम विशेषज्ञ गवाह… अनित्य भावना को सम्मानपूर्वक न्यायालय में आमंत्रित किया जाता है।(अनित्य भावना प्रवेश करती है।)

दृश्य 2 : अनित्य भावना की गवाही

विवेक वकील : गवाह महोदय, जो कहें सच कहें, सच के सिवा कुछ न कहें। झूठ पकड़ा गया तो कर्मों की अदालत अलग लगेगी!

अनित्य भावना : मैं हाथ उठाकर प्रतिज्ञा करती हूँ, न राग की मिलावट, न द्वेष का मसाला, केवल शुद्ध सत्य ही कहूँगी और सत्य के सिवा कुछ नहीं कहूँगी। माननीय न्यायालय! यौवन, धन, परिवार, मकान और इन्द्रिय-सुख सभी अनित्य हैं। वे सदा एक जैसे नहीं रहते।

मोह वकील : क्या आप इसका कोई उदाहरण प्रमाण सहित दे सकती हैं ?

अनित्य भावना : “ जोबन गृह गोधन नारी, हय गय जन आज्ञाकारी ।
इंद्रिय-भोग छिन थाई, सुरधनु चपला चपलाई ॥”
जैसे इन्द्रधनुष और बिजली क्षणभर दिखाई देकर विलीन हो जाते हैं, वैसे ही संसार के सभी वैभव भी नष्ट हो जाते हैं।

मोह वकील : यदि धन, परिवार और यौवन अनित्य हैं, तो लोग इन्हीं में सुख क्यों अनुभव करते हैं?

अनित्य भावना : क्योंकि वे उनके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते। क्षणिक सुख को ही स्थायी सुख समझ लेना अज्ञान है।

मोह वकील : तो क्या आप कह रही हैं कि ये सब व्यर्थ हैं?

अनित्य भावना : नहीं, उनका अस्तित्व है, परन्तु वे स्थायी नहीं हैं। उन्हें नित्य मानना ही भ्रम है।

मोह वकील : तो आपके अनुसार इस संसार में वास्तव में नित्य क्या है?

अनित्य भावना : केवल शुद्ध आत्मा नित्य, अविनाशी और स्थायी है। बाकी सभी पदार्थ परिवर्तनशील हैं।

विवेक वकील : धन्यवाद, माननीय न्यायालय! गवाह ने स्पष्ट कर दिया कि जीव का मोह अनित्य वस्तुओं पर आधारित है।

चैतन्य : (धीरे) तो मैं जिन पर भरोसा कर रहा था, वे तो क्षणभंगुर हैं। ठीक है फिर
“टूटेगा एक क्षण में जीवन का ये दुःस्वप्न,
छूटेगा देख! कण कण, बिखरेगा अंग अंग।
बदलेगा शेष सब कुछ पर मैं न बदलूँगा,
अस्तित्व से अनंत, मैं चैतन्य रहूँगा।।”

मोह वकील : धन्यवाद! आप अपना स्थान ग्रहण कर सकती हैं। न्यायाधीश महोदय से विनती है की गवाही को दर्ज किया जाए।
(अनित्य भावना बाहर जाती हैं। जज अपनी डायरी में कुछ लिखते हैं।)

मोह वकील : (आत्मविश्वास से) माननीय न्यायाधीश! एक गवाही से कोई मुकदमा नहीं जीता जाता। जब तक परिवार, मित्र, धन और शक्ति साथ हैं, मनुष्य को किसी बात का डर नहीं होना चाहिए।

विवेक वकील : (मुस्कुराकर) तो क्या मोह वकील यह कहना चाहते हैं कि संकट आने पर ये सब हमेशा रक्षा करते हैं?

मोह वकील : बिल्कुल! परिवार हो, पैसा हो, पहचान हो… फिर डर कैसा?

विवेक वकील : माननीय न्यायालय! इस दावे की सत्यता जानने के लिए मैं अगले विशेषज्ञ गवाह अशरण भावना को बुलाने की अनुमति चाहता हूँ।

दृश्य 3 : अशरण भावना

न्यायाधीश : अनुमति है।

न्यायालय उद्घोषक : संकट के समय वास्तविक सहारे का सत्य बताने वाली गवाह अशरण भावना न्यायालय में उपस्थित हों।

विवेक वकील : महोदया जी! याद रखिए, यहाँ झूठ की एंट्री फीस बहुत महँगी है। इसलिए केवल सत्य ही प्रस्तुत कीजिएगा। तो बताइए गवाह महोदया, क्या संसार में कोई ऐसा है जो जीव को मृत्यु से बचा सके?

अशरण भावना : नहीं। “सुर असुर खगाधिप जेते, मृग ज्यों हरि काल दले ते।
मणि मन्त्र तन्त्र बहु होई, मरते न बचावै कोई॥”
देव, राजा, धन या मंत्र-तंत्र, कोई भी काल (मृत्यु) से रक्षा नहीं कर सकता।

मोह वकील : लेकिन अस्पताल में परिवार साथ होता है… मुसीबत में मित्र साथ आते हैं… क्या वह सहारा नहीं?

अशरण भावना : साथ होना और बचा लेना, दो अलग बातें हैं। परिजन सेवा कर सकते हैं… साहस दे सकते हैं… पर कर्मफल अपने स्थान पर स्वयं ही भोगना पड़ता है।

विवेक वकील : तो आपका निष्कर्ष क्या है?

चैतन्य : जितना मुझे समझ आया है क्या मैं बात सकता हूं ?

न्यायाधीश : हाँ बोलिए।

चैतन्य : “दुःख-मुक्ति सुख-भुक्ति की न आस करूँगा असहाय इस जगत में न विश्वास धरूँगा सब काल के खिलौने, मैं काल हरूँगा
अरहंत सिद्ध शरण, मैं चैतन्य रहूँगा ।।”

विवेक वकील : माननीय न्यायाधीश, गवाह ने स्पष्ट कर दिया कि बाहरी सहारे सीमित हैं। इसलिए आत्मजागृति ही वास्तविक शरण है।

मोह वकील : (धीरे से चैतन्य के कान में) “इनकी बातों में मत आना… मुसीबत आएगी तो सबसे पहले तुम अपने परिवार को ही पुकारोगे…”
(चैतन्य कुछ सोच में पड़ जाता है।) (अशरण भावना चली जाती हैं। चैतन्य सोच में डूबा है। मोह तुरंत मौका पकड़ता है।)

दृश्य 4 : संसार भावना

मोह वकील : (हँसते हुए) माननीय न्यायाधीश! अभी कहा गया कि कोई किसी का सहारा नहीं। लेकिन मैं पूछना चाहता हूँ… अगर संसार इतना दुःखमय है, तो लोग इसे छोड़कर भागते क्यों नहीं? लोग घर बनाते हैं… शादियाँ करते हैं… बच्चे पालते हैं… त्योहार मनाते हैं… क्या ये सब दुःख मनाने के लिए करते हैं?

विवेक वकील : बहुत अच्छा प्रश्न है, माननीय न्यायाधीश। इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए मैं अगले गवाह संसार भावना को बुलाने की अनुमति चाहता हूँ।

न्यायाधीश : अनुमति है।

न्यायालय उद्घोषक : माननीय न्यायालय ! जीवन के चक्र का वास्तविक स्वरूप बताने वाली गवाह संसार भावना न्यायालय में उपस्थित हों।"

विवेक वकील : क्या आप वचन देती हैं कि आपकी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी? सत्य को साक्षी मानकर कहिए- जो कहेंगी जिनवाणी के आधार से कहेंगी अन्यथा नहीं कहेंगी।

संसार भावना : मान्यवर ! मैं वचन देता हूँ कि मेरी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी।

मोह वकील : गवाह महोदया, सीधा उत्तर दीजिए… क्या संसार में सुख है या नहीं?

संसार भावना : “चहुँगति दुःख जीव भरै हैं, परिवर्तन पंच करै हैं।
सब विधि संसार असारा, यामें सुख नाहिं लगारा ॥”
माननीय न्यायालय! संसार में जो सुख दिखाई देता है, वह क्षणिक है। उसके साथ परिवर्तन और वियोग भी जुड़े रहते हैं।

मोह वकील : आप कह रही हैं सुख नहीं है… तो मिठाई खाने में आनंद नहीं? बच्चे की मुस्कान में खुशी नहीं? परिवार के साथ समय बिताना सुख नहीं?

संसार भावना : वह क्षणिक सुख है। जिसके पीछे दुःख और आकुलता छिपी हो, उसे सच्चा सुख नहीं कहा जा सकता।

विवेक वकील : तो वास्तविक सुख कहाँ है?

संसार भावना : “नहीं भव्य यहाँ कुछ भी रमणीय नहीं है
सौन्दर्य-भोग छल हैं, करणीय नहीं हैं।”
संसार में सुख नहीं, अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में सुख है। वही स्थायी और वास्तविक सुख का स्रोत है।

चैतन्य : (सिर झुककर अफसोस करता हुआ) “मैं थक चुका भटक अटक के अब न भ्रमूँगा
भवितव्यता विचार, मैं चैतन्य रहूँगा ।।”

विवेक वकील : न्यायाधीश महोदय से विनती है की गवाही को दर्ज किया जाए।

दृश्य 5 : एकत्व भावना

मोह वकील : (चैतन्य की ओर देखकर) यदि यह शरीर तुम नहीं हो… तो फिर तुम हो कौन?

विवेक वकील : (मुस्कुराकर) बहुत अच्छा प्रश्न है, मोह वकील। और इस मुकदमे का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न भी। संसार भावना ने बताया कि संसार में स्थायी सुख नहीं है। अब यह जानने के लिए कि इस यात्रा में जीव के साथ वास्तव में कौन रहता है, अदालत एकत्व भावना को कटघरे में आमंत्रित करती है।"

न्यायालय उद्घोषक : "माननीय न्यायालय! आत्मा और स्वयं के वास्तविक स्वरूप का परिचय कराने वाली गवाह… एकत्व भावना न्यायालय में उपस्थित हों।

विवेक वकील : जिनवाणी पर हाँथ रख कर कसम खाइए जो कहेंगे सत्य कहेंगे ओर सत्य के सिवा कुछ नहीं कहेंगे।

एकत्व भावना : में जिनवाणी पर हाँथ रख कर कसम खाता हूँ की जो कहूँगा सत्य कहूँगा ओर सत्य के सिवा कुछ नहीं कहूँगा।

मोह वकील : (आत्मविश्वास से) गवाह महोदया… सीधा उत्तर दीजिए। ये (चैतन्य की ओर इशारा करके) कौन हैं? इनका नाम? इनकी पहचान?

एकत्व भावना : इनका नाम… इनका शरीर… इनके रिश्ते… ये सब व्यवहार की पहचान हैं। इनकी वास्तविक पहचान… आत्मा है।

मोह वकील : अगर ये आत्मा हैं… तो इन्हें भूख किसे लगती है? दर्द किसे होता है? बुखार किसे आता है?

एकत्व भावना : भूख शरीर को लगती है। पीड़ा शरीर को होती है। रोग शरीर को होता है। लेकिन अज्ञान के कारण आत्मा स्वयं को शरीर मान बैठती है, इसलिए “मैं दुखी हूँ” ऐसा अनुभव करती है। "शुभ-अशुभ करम फल जेते, भोगैं जिय एकहिं तेते।
सुत दारा होय न सीरी, सब स्वारथ के हैं भीरी ॥”

मोह वकील : (चुटकी लेते हुए) अच्छा… तो अगली बार बुखार आए… तो डॉक्टर के पास शरीर को भेज देना… खुद मत जाना! (हल्की हँसी)

विवेक वकील : माननीय न्यायाधीश… यही तो भ्रम है। डॉक्टर शरीर का उपचार करता है… लेकिन ‘मैं शरीर हूँ’ इस भ्रम का उपचार केवल सम्यक् ज्ञान करता है।

चैतन्य : तो… मैं शरीर के साथ रहता हूँ… लेकिन शरीर नहीं हूँ?

एकत्व भावना : हाँ। जन्म के समय भी तुम अकेले आए… मृत्यु के समय भी अकेले जाओगे। जो तुम्हारे साथ हर जन्म में रहता है… वह शरीर नहीं… तुम्हारा आत्मस्वरूप है।

विवेक वकील : तो आपका निष्कर्ष क्या है?

एकत्व भावना : "है यात्रा अकेली बस भीड़ साथ में
नहीं साथ कोई साथी सामान हाथ में”

चैतन्य : तो मेरे कर्मों का जिम्मेदार मैं स्वयं हूँ, ठीक है! “पर संग का दुःस्वप्न तोड़ अब मैं जगूँगा हूँ एक शुद्ध ज्ञायक, चैतन्य रहूँगा ।।”

विवेक वकील : न्यायाधीश महोदय से विनती है की गवाही को दर्ज किया जाए।

दृश्य 6 : अन्यत्व भावना

मोह वकील : (हँसते हुए) ठीक है… मान लिया… ये शरीर नहीं हैं। लेकिन… ये शरीर इनके बिना रह सकता है क्या?

विवेक वकील : नहीं।

मोह वकील : (खुश होकर) तो फिर दोनों एक ही हुए!

विवेक वकील : साथ रहना… और एक होना… दो अलग बातें हैं। माननीय न्यायाधीश! अब यह जानना आवश्यक है कि जिस शरीर, परिवार और धन को हम “मेरा” मानते हैं, क्या वे वास्तव में हमारे हैं? इस सत्य को स्पष्ट करने हेतु मैं अन्यत्व भावना को कटघरे में बुलाने की अनुमति चाहता हूँ।

न्यायाधीश : अनुमति है।

न्यायालय उद्घोषक : अगली गवाह अन्यत्व भावना कटघरे में उपस्थित हों।

विवेक वकील : क्या आप वचन देती हैं कि आपकी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी? सत्य को साक्षी मानकर कहिए- जो कहेंगी जिनवाणी के आधार से कहेंगी, अन्यथा नहीं कहेंगी।

अन्यत्व भावना : मान्यवर ! मैं वचन देती हूँ कि मेरी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी।

मोह वकील : (एक सूटकेस लेकर प्रवेश करता है) माननीय न्यायाधीश! इस सूटकेस में मेरे जीवन की सबसे कीमती चीज़े हैं। (एक-एक चीज़ निकालते हुए) धन… घर की चाबी… मोबाइल… ज़मीन के कागज़… इनसे बढ़कर अपना कौन होता है?

विवेक वकील : (मुस्कुराकर) माननीय न्यायाधीश ! इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देने के लिए मैं विशेषज्ञ अन्यत्व भावना से निवेदन करता हूँ।

अन्यत्व भावना : वकील साहब… उत्तर देने से पहले क्या एक प्रश्न मैं भी पूछ सकती हूँ?

मोह वकील : ज़रूर।

अन्यत्व भावना : यदि आज आपको किसी दूर देश जाना पड़े…तो क्या यह सूटकेस हमेशा आपके साथ रहेगा?

मोह वकील : नहीं… कभी न कभी यहीं रह जाएगा।

अन्यत्व भावना : और यदि इस संसार से जाना पड़े?

मोह वकील : (धीरे से) तब…कुछ भी साथ नहीं जाएगा।

अन्यत्व भावना : “जल-पय जौं जिय-तन मेला, पै भिन्न-भिन्न नहीं भेला ।
तो प्रघट जुदे धन धामा, क्यों है इक मिलि सुत रामा ।।
“जैसे दूध और पानी साथ दिखाई देते हैं, फिर भी दोनों अलग हैं; वैसे ही आत्मा और शरीर साथ प्रतीत होते हैं, पर दोनों भिन्न हैं। जब शरीर ही अपना नहीं, तो धन, मकान, परिवार और अन्य परवस्तुएँ अपनी कैसे हो सकती हैं?”

मोह वकील : लेकिन… परिवार से प्रेम करना क्या गलत है?

अन्यत्व भावना : प्रेम करना गलत नहीं। “मेरा” मानकर बँध जाना दुःख का कारण है। रिश्ते निभाइए… पर उनमें अपनी आत्मा को मत खोइए।

चैतन्य : तो… मैं आज तक जिन वस्तुओं को “मेरी” कहता रहा…वे वास्तव में कुछ समय के लिए मेरे पास थीं… मेरी कभी थीं ही नहीं? “अनन्य के परिणाम से न अन्य फल लहे न अन्य का परिणाम-फल अनन्य को मिले।”

अन्यत्व भावना : यही अन्यत्व भावना का सार है।

विवेक वकील : माननीय न्यायाधीश! गवाह ने स्पष्ट कर दिया कि आत्मा और परवस्तु सदा से भिन्न हैं। आसक्ति ही बंधन का कारण है।

दृश्य 7 : अशुचि भावना

मोह : (दर्पण देखते हुए) “माननीय न्यायाधीश! दुनिया में सबसे सुंदर रचना यदि कोई है…हम जितना ध्यान अपने शरीर का रखते है उतना किसी और का नहीं रखते।”

विवेक वकील : "क्या वास्तव में ऐसा ही है? या यह केवल आँखों का भ्रम है? इसका उत्तर देने के लिए मैं अशुचि भावना को न्यायालय में आमंत्रित करना चाहता हूँ।

न्यायाधीश : अनुमति है।

न्यायालय उद्घोषक : अगली गवाह अशुचि भावना कटघरे में उपस्थित हों।

विवेक वकील : क्या आप वचन देती हैं कि आपकी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी? सत्य को साक्षी मानकर कहिए, जो कहेंगी जिनवाणी के आधार से कहेंगी, अन्यथा नहीं कहेंगी।

अशुचि भावना : मान्यवर! मैं वचन देती हूँ कि मेरी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी।

मोह वकील : (दर्पण हाथ में लेकर) माननीय न्यायाधीश! ईश्वर ने मनुष्य को इतना सुंदर शरीर दिया है… फिर इसे अशुद्ध कैसे कहा जा सकता है?(दर्पण चैतन्य की ओर बढ़ाते हुए) देखो… कितना सुंदर चेहरा है!

विवेक वकील : माननीय न्यायाधीश! बाहरी रूप देखकर निर्णय नहीं दिया जा सकता। विशेषज्ञ गवाह से सत्य जानना उचित होगा।

मोह वकील : गवाह महोदया… क्या शरीर सचमुच अशुद्ध है?

अशुचि भावना : “पल-रुधिर राध-मल-थैली, कीकस वसादि तैं मैली।
नवद्वार बहैं घिनकारी, अस देह करै किम यारी ॥”
बाहर से यह शरीर सुंदर दिखाई दे सकता है… किन्तु भीतर? यह मांस, रक्त, हड्डियों और अनेक मल-मूत्रादि से बना शरीर है। इसके नौ द्वारों से निरंतर मल निकलता रहता है। फिर भी मनुष्य इसी पर अभिमान करता है।

मोह वकील : (कुतर्क) तो क्या शरीर से घृणा करनी चाहिए?

अशुचि भावना : नहीं। यही सबसे बड़ी भूल होगी। शरीर साधन है… साध्य नहीं। इसकी देखभाल करनी चाहिए… लेकिन इसमें आसक्त नहीं होना चाहिए। अरे आत्मन! “यह देह शमशान-तुल्य म्लान, भीति है।
वपु-राग-घृणित, शोकर-पुरीष-प्रीति है।।”

चैतन्य : तो… शरीर की रक्षा करना आवश्यक है… लेकिन शरीर को ही “मैं” मान लेना अज्ञान है! “संयम-चिता-तपा अशुचिता-देह तजूँगा, शुचि आत्मा सँभाल मैं चैतन्य रहूँगा।
नेह जुदी देह को किंचित भी न दूँगा, स्वरूप-प्रीति धार मैं चैतन्य रहूँगा ।।”

अशुचि भावना : यही अशुचि भावना का सार है। शरीर स्वभाव से अशुद्ध है… पर आत्मा स्वभाव से शुद्ध, पवित्र और चेतन है।

विवेक वकील : माननीय न्यायाधीश! गवाह ने स्पष्ट कर दिया कि अशुचि भावना का उद्देश्य शरीर से घृणा करना नहीं, बल्कि आत्मा की पवित्रता की ओर दृष्टि करना है। गवाही अभिलेख में दर्ज की जाए।

मोह वकील : (थोड़ा परेशान होकर) माननीय न्यायाधीश… पहले कहा, संसार अपना नहीं…फिर कहा, शरीर भी मैं नहीं… अब शरीर भी अशुद्ध… तो आखिर जीव बंधता किससे है?

विवेक वकील : (मुस्कुराकर) यही तो इस मुकदमे का अगला अध्याय है।

न्यायाधीश : “न्यायालय 2 मिनट का विचार-विराम लेता है। इसके बाद बचाव पक्ष अपने विशेष गवाह प्रस्तुत करेगा।”
(हथौड़ा बजाते हैं।)
उसी दौरान मोह वकील राग और द्वेष से फुसफुसाकर कहेगा: अब तक मैं अकेला लड़ रहा था… अब तुम दोनों आओ… और इस मुकदमे का रुख बदल दो !

विशेष दृश्य, मोह के गवाह: राग और द्वेष

मोह वकील : माननीय न्यायाधीश! अब तक आपने विवेक के गवाह सुने हैं। अब बचाव पक्ष भी अपने गवाह पेश करना चाहता है।

न्यायाधीश : अनुमति है। गवाहों को बुलाया जाए।

मोह वकील : ये मेरे सबसे खास गवाह हैं… जिनके बिना मेरा काम ही नहीं चलता… राग और द्वेष !

न्यायालय उद्घोषक : माननीय न्यायालय! बचाव पक्ष के विशेष गवाह राग एवं द्वेष कटघरे में उपस्थित हों।
(राग मुस्कुराते हुए और द्वेष थोड़ा अकड़कर प्रवेश करे।)

मोह वकील : राग जी, आप बताइए, आपका काम क्या है?

राग : मैं लोगों को जोड़ता हूँ। माँ को बच्चे से, मित्र को मित्र से, व्यक्ति को धन से… मेरे बिना जीवन में अपनापन कहाँ रहेगा?

मोह वकील : वाह! मतलब आप तो बहुत अच्छे हुए।

विवेक वकील : Objection My Lord/आपत्ति ! राग जी, अगर आपकी प्रिय वस्तु आपकी इच्छा के अनुसार न मिले तो?

राग : तो… मन बेचैन होता है।

विवेक वकील : और यदि वह छिन जाए?

राग : तो दुःख, क्रोध और चिंता होने लगती है।

विवेक वकील : तो इसका मतलब यह हुआ कि आपका अत्यधिक जुड़ाव शांति छीन सकता है?

राग : हाँ… ऐसा हो सकता है।
(अब द्वेष)

मोह वकील : द्वेष जी, अब आप बताइए। आप क्या करते हैं?

द्वेष : जिससे मन नहीं मिलता, उसे देखते ही मन कहता है… इसे नौच डालूँ, उससे दूर रहूँ!

मोह वकील : तो क्या आप किसी तरह लोगों के मददगार हुए?

द्वेष : अरे !.. मेरी वजह से ही तो आदमी अपनी पसंद-नापसंद को लेकर सतर्क रहता है।

विवेक : लेकिन जब कोई आपकी इच्छा के विरुद्ध जाए तब आपको कैसा लगता है?

द्वेष : अरे! पूछो ही मत जम के क्रोध आता है।

विवेक वकील : और फिर?

द्वेष : फिर क्या गलत निर्णय… अशुभ भाव… और कर्मबंधन। (मोह धीरे से द्वेष की ओर देखकर)

मोह वकील : अरे! तुम तो मेरे खिलाफ ही गवाही दे रहे हो!
(सभी हसने लग जाते हैं…)

न्यायाधीश : Order Order !!

विवेक वकील : माननीय न्यायालय! राग ने स्वीकार किया कि आसक्ति बेचैनी और दुःख का कारण बन सकती है। द्वेष ने स्वयं स्वीकार किया कि वह क्रोध और अशुभ भावों को जन्म देता है। अर्थात् दोनों ही आत्मा की शुद्धता में बाधक हैं।

चैतन्य : अरे! तो क्या… जिसे मैं अपना प्रेम और अपनी पसंद समझता था, उसमें भी बंधन छिपा है?

विवेक वकील : जब उसमें ममत्व और आसक्ति जुड़ जाए, तो हाँ।

मोह : माननीय न्यायाधीश, राग-द्वेष को तो आपने दोषी बना दिया…लेकिन अब बताइए, कर्म आते कैसे हैं?

विवेक वकील : यही प्रश्न अगले साक्ष्य का विषय है।

न्यायाधीश : न्यायालय अगले विशेषज्ञ गवाह को बुलाने की अनुमति देता है।

न्यायालय उद्घोषक : माननीय न्यायाधीश! की आज्ञा से आत्मा में कर्म के आगमन का यथार्थ स्वरूप समझाने वाली गवाह, आस्रव भावना, कटघरे… में उपस्थित हों..।

दृश्य 7: आस्रव भावना

विवेक वकील : क्या आप वचन देती हैं कि आपकी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी? सत्य को साक्षी मानकर कहिए- जो कहेंगी जिनवाणी के आधार से कहेंगी, अन्यथा नहीं कहेंगी।

आस्रव भावना : मान्यवर! मैं वचन देती हूँ कि मेरी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी।

मोह वकील : गवाह महोदया! सीधा सवाल। क्या कर्म कोई बाहर से उठाकर आत्मा में डाल देता है?

आस्रव भावना : नहीं। कर्म के आगमन का कारण जीव के शुभ-अशुभ विकारी भाव हैं। “ जो जोगन की चपलाई, तातें है आस्रव भाई।
आस्रव दुखकार घनेरे, बुधिवन्त तिन्हें निरवेरे ॥”

मोह वकील : मतलब??

आस्रव भावना : जब जीव में राग-द्वेष आदि विकारी भाव उत्पन्न होते हैं, तब भावास्रव होता है। और उसी समय कर्मयोग्य पुद्गल का आत्मा के साथ एक क्षेत्र में आगमन होना द्रव्य आस्रव कहलाता है।

मोह वकील : तो क्या केवल बुरे कर्मों से ही आस्रव होता है?

आस्रव भावना : नहीं। पुण्य और पाप, दोनों आस्रव और बंध के भेद हैं।

मोह वकील : अच्छा! तो पूजा, दान, भक्ति, व्रत जैसे शुभ भाव भी आस्रव और बंध हैं?

आस्रव भावना : हाँ। अच्छे भाव रखें तो पुण्य और बुरे भाव रखें तो पाप होता है।

विवेक वकील : तो क्या पुण्य, आत्मा का अंतिम हित है?

आस्रव भावना : “इन इन्द्रियों को मन-वच-तन जो भी लुभाया
मिथ्यात्व-कषायों से खूब कर्म कमाया।”
हमें अच्छी चीज़े और सुख मिले यह पुण्य का फल हो सकता है। लेकिन उन चीजों में बहुत ज्यादा लगाव हो जाए तो आत्मा बंधती रहती है। इसलिए पुण्य अच्छा है पर आत्मा का अंतिम लक्ष्य पुण्य नहीं, बल्कि शुद्ध आत्मा की प्राप्ति है।

चैतन्य : तो केवल पाप से बचना पर्याप्त नहीं… मुझे अपने भीतर के राग-द्वेष को भी पहचानना होगा। “खुद भूल से बँधा हूँ, अब मूल भजूँगा
सब राग-द्वेष टाल मैं चैतन्य रहूँगा ।।”

आस्रव भावना : जब हमे अपनी गलती समझ आती है तब आस्रव को रोकने की शुरुवात होती है।

मोह वकील : लेकिन एक बात समझ नहीं आई…कर्म तो अपने आप आ गए इसमें मेरी क्या गलती?

विवेक वकील : कर्म बेचारे बाहर खड़े थे…तुमने हि तो राग-द्वेष का दरवाजा खोलकर कहा- आइए आइए!

मोह : अरे मैंने तो थोड़ा सा दरवाजा खोल था। (हल्की हँसी)

विवेक वकील : बिल्कुल सही बात है पर थोड़ा कभी क्रोध के लिए,कभी मन के लिए तो कभी लोभ के लिए ऐसा करते-करते दरवाजा 24 घंटे ही open रहता है।

मोह वकील : तो दरवाजा बंद कैसे होगा ?

विवेक वकील : जब भाव बदलेंगे। अच्छे भाव रहेंगे तो दरवाजा बंद हो जाएगा ओर राग द्वेष के बाद रहेंगे तो दरवाजा खुला रहेगा।

मोह वकील : ओह! मतलब कर्मों से पहले अपने भावों पर पहरा देना होगा।

न्यायाधीश : बहुत अच्छा। आस्रव का स्वरूप न्यायालय के सामने स्पष्ट हो गया। गवाही अभिलेख में दर्ज की जाती है।

दृश्य 8 : संवर भावना

विवेक वकील : माननीय न्यायालय!

मोह वकील : रुकिए! रुकिए! अगर कर्मों का आना इतना आसान है, तो अब कोई इन्हें रोकने वाला भी है क्या?

विवेक वकील : बिल्कुल है।

मोह वकील : कौन?

विवेक वकील : संवर।

मोह वकील : अच्छा! तो बुलाइए उन्हें भी। देखते हैं कितने बड़े रोकने वाले हैं!
(विवेक वकील न्यायाधीश की ओर देखते है ओर वे बुलाने के लिए इशारा कर देते हैं।)

न्यायालय उद्घोषक : माननीय न्यायालय! कर्मों के आने का रास्ता रोकने वाली अगली गवाह- संवर भावना, कटघरे में उपस्थित हों। (संवर भावना प्रवेश करती हैं। हाथ में एक छोटी ढाल या STOP का बोर्ड हो सकता है।)

विवेक वकील : क्या आप वचन देती हैं कि आपकी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी? सत्य को साक्षी मानकर कहिए- जो कहेंगी जिनवाणी के आधार से कहेंगी, अन्यथा नहीं कहेंगी।

संवर भावना : मान्यवर! मैं वचन देती हूँ कि मेरी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी।

मोह वकील : गवाह महोदया, एकदम आसान भाषा में बताइए- संवर आखिर है क्या?

संवर भावना : “जिन पुण्य-पाप नहिं कीना, आतम अनुभव चित दीना।
तिन ही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके॥”
नए कर्मों का आना रुक जाए, उसे संवर कहते हैं।

मोह वकील : बस? इतनी-सी बात?

संवर भावना : बात छोटी है…लेकिन करने में मेहनत लगती है।

मोह वकील : तो अगर मैं किसी को देखकर गुस्सा न करूँ…किसी चीज़ को देखकर बहुत ज्यादा ललचाऊँ नहीं… तो कर्मों का रास्ता रुकने लगेगा?

संवर भावना : अच्छे काम मतलब शुभोपयोग ओर बुरे काम जैसे टीवी देखना, शॉर्ट्स देखना जैसे बुरे काम अशुभोपयोग दोनों ही बंधन के कारण है, इसलिए ज्ञानी जीव धीरे-धीरे शुद्धता की ओर बढ़ता है।

चैतन्य : (दृढ़ता से) तो संवर केवल रोकना नहीं… अपने भीतर की शुद्धता को बढ़ाना है “मैं सिद्ध हूँ स्वभाव से ये सिद्ध करूँगा, करमों के अकर्मण्य को प्रसिद्ध करूँगा।
आयेंगी जब कषायें न उन से मिलूँगा, भाऊँगा भेद-ज्ञान, मैं चैतन्य रहूँगा।।”

विवेक वकील : माननीय न्यायाधीश महोदय! निवेदन है कि इस सत्यपूर्ण गवाही को न्यायालय के अभिलेख में दर्ज किया जाए।

दृश्य 9 : निर्जरा भावना

(मोह एक स्टिकी नोट्स का सारी का बॉक्स लेकर आता है।)

मोह वकील : रुकिए! संवर ने नए कर्मों(बंद बॉक्स) को तो अंदर आने से रोक दिया… लेकिन ये जो पुराने कर्म(बॉक्स ओपन करके बताता है) पहले से जमा हैं, इनका क्या? इन्हें तो कोई निकाल नहीं सकता!

विवेक वकील : क्यों नहीं?

मोह वकील : अच्छा? तो निकालकर दिखाइए!

विवेक वकील : माननीय न्यायाधीश! इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए अगली गवाह, निर्जरा भावना, को बुलाने की अनुमति चाहता हूँ।

न्यायाधीश : अनुमति है।

न्यायालय उद्घोषक : माननीय न्यायालय! पुराने कर्मों के क्षय और आत्मशुद्धि का मार्ग बताने वाली गवाह, निर्जरा भावना, कटघरे में उपस्थित हों।"

मोह वकील : गवाह महोदया, ये देखिए! (कर्मों का बॉक्स दिखाता है) इतने सारे कर्म जमा हैं। अब इन्हें कौन साफ करेगा?

निर्जरा भावना : आत्मा की शुद्धता।

मोह वकील : कैसे?

निर्जरा भावना : झाडू से घर की धूल साफ होती है… सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र से कर्मों की निर्जरा होती है। “जिन पुण्य-पाप नहिं कीना, आतम अनुभव चित दीना।
तिन ही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके॥”
(चैतन्य के हाथ में स्टिकी नोट्स वाला बॉक्स हैं, राग, द्वेष, क्रोध, लोभ आदि।)

निर्जरा भावना : चैतन्य, इन पर क्या लिखा है?

चैतन्य : राग, द्वेष, क्रोध, लोभ…

निर्जरा भावना : इन्हें हटाओ।

चैतन्य : मैं?

निर्जरा भावना : हाँ। आत्मशुद्धि का पुरुषार्थ तुम्हें स्वयं करना है। (चैतन्य 2-3 नोट हटाता है।)

मोह वकील : अरे! इतने से कर्म खत्म हो गए?

निर्जरा भावना : नहीं। यह केवल समझाने का प्रतीक है। सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र से आत्मशुद्धि बढ़ती है और कर्मों की निर्जरा होती है।

चैतन्य : यानी असली सफाई बाहर नहीं, अपने परिणामों की करनी है। “वैराग्य बोधि जागी लगा शील सँवारने तप देख कर्म भागे, लगा धर्म बरसने निश्चिंत हो,विराग-पथ प्रवास करूँगा शुद्धोपयोग लीन मैं चैतन्य रहूँगा।।”

मोह वकील : तो परिणामों की सफाई के लिए तप करना होगा और उससे निर्जरा हो जाएगी?

निर्जरा भावना : जितनी परिणामों में शुद्धता बढ़ेगी, उतनी निर्जरा होगी… और पूर्ण निर्जरा के बाद जीव मोक्ष के पूर्ण सुख को प्राप्त करता है।

मोह वकील : तो अब नए कर्म भी नहीं आ रहे… और पुराने भी निकल रहे हैं… (चिंतित होकर) मेरी तो दुकान ही बंद हो गई! (दर्शकों में हँसी)

विवेक वकील : दुकान बंद नहीं हुई मोह जी…ग्राहक जाग गया है। (तालियाँ)

न्यायाधीश : आज की गवाही से स्पष्ट हुआ, संवर नए कर्मों का आना रोकता है और निर्जरा पुराने कर्मों को दूर करने की दिशा है। गवाही अभिलेख में दर्ज किया जाता है।

दृश्य 10 : लोक भावना

मोह वकील : ठीक है! नए कर्मों को संवर ने रोक दिया और पुराने कर्मों को निर्जरा ने हटा दिया। लेकिन अब एक सवाल है, यह सब हो कहाँ रहा है?

विवेक वकील : माननीय न्यायालय! इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए अगली गवाह लोक भावना को बुलाने की अनुमति चाहता हूँ।

न्यायाधीश : अनुमति है।

मोह वकील : (चैतन्य से धीरे से) अब लोक भी समझना पड़ेगा? ये मुकदमा है या पूरी पढ़ाई की क्लास?

चैतन्य : शायद… इस बार पढ़ाई ही बचाने वाली है।

न्यायालय उद्घोषक : माननीय न्यायालय! छह द्रव्यों से बने लोक के वास्तविक स्वरूप को समझाने वाली गवाह लोक भावना कटघरे में उपस्थित हों।

विवेक वकील : क्या आप वचन देती हैं कि आपकी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी? सत्य को साक्षी मानकर कहिए- जो कहेंगी जिनवाणी के आधार से कहेंगी, अन्यथा नहीं कहेंगी।

लोक भावना : मान्यवर! मैं वचन देती हूँ कि मेरी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी।

मोह वकील : लोक भावना जी, एक बात बताइए, इस दुनिया को बनाया किसने?

लोक भावना : किसी ने नहीं।

मोह वकील : मतलब?

लोक भावना : ब्रह्मा ने इसे बनाया नहीं, विष्णु इसे थामे नहीं हैं और महादेव इसे नष्ट नहीं करते। यह अनादि-अनन्त है। “निज काल पाय विधि झरना, तासौं निज-काज न सरना।
तप करि जो कर्म खिपावै, सोई शिवसुख दरसावै॥”

मोह वकील : अच्छा! तो फिर इसमें जो कुछ हो रहा है, उसकी जिम्मेदारी किसकी है?

लोक भावना : प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने स्वभाव से परिणमन करता है। एक द्रव्य के परिणमन में दूसरे द्रव्य का अधिकार नहीं।

विवेक वकील : तो क्या यह पूरा लोक ही मेरी आत्मा है?

लोक भावना : नहीं। छह द्रव्यों से बना यह लोक तुमसे भिन्न है। तुम्हारा वास्तविक स्वरूप तुम्हारा शाश्वत चैतन्य है।

चैतन्य : तो जिस दुनिया को मैं “अपना संसार” समझकर परेशान होता रहा… वह मुझसे भिन्न है? “है दुःख नरक में स्वर्ग में सुख झूठी बात है मिथ्यात्व से दुखी निगोद लोक-व्याप्त है सुख का स्वयं पिटारा, क्यों दुःख लहूँगा? त्रैलोक्य का तिलक हूँ, चैतन्य रहूँगा ।।"

लोक भावना : हाँ। अपने चैतन्यस्वरूप की ओर देखना ही वास्तविक दिशा है।

मोह वकील : (थोड़ा परेशान होकर) तो अब दुनिया भी मेरी नहीं?

विवेक वकील : दुनिया आपकी हो या न हो… आपको अपना आत्मस्वरूप तो पहचानना ही पड़ेगा।

मोह वकील : ये मुकदमा मेरे लिए दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है!

विवेक वकील : माननीय न्यायाधीश महोदय ! निवेदन है कि इस सत्यपूर्ण गवाही को न्यायालय के अभिलेख में दर्ज किया जाए।

दृश्य 12 : बोधि-दुर्लभ भावना

विवेक वकील : माननीय न्यायालय! लोक भावना ने बताया कि हमारी आत्मा इस संसार से अलग है। अब सवाल है, इस आत्मा के लिए सबसे दुर्लभ चीज़ क्या है? इसी बात को समझाने के लिए मैं बोधिदुर्लभ भावना को कटघरे में बुलाने की अनुमति चाहता हूँ।

न्यायाधीश : अनुमति है।

न्यायालय उद्घोषक : माननीय न्यायालय! अब अगली गवाह बताएँगी कि इस आत्मस्वरूप का सही ज्ञान प्राप्त करना इतना दुर्लभ क्यों है। अगली विशेषज्ञ गवाह, बोधिदुर्लभ भावना, कटघरे में उपस्थित हों।

विवेक वकील : क्या आप वचन देती हैं कि आपकी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी? सत्य को साक्षी मानकर कहिए- जो कहेंगी जिनवाणी के आधार से कहेंगी, अन्यथा नहीं कहेंगी।

बोधिदुर्लभ भावना : मान्यवर ! मैं वचन देती हूँ कि मेरी गवाही में कल्पना नहीं, केवल सच्चाई ही होगी।

मोह वकील : गवाह महोदया, आप कहती हैं कि सही ज्ञान मिलना दुर्लभ है। लेकिन आजकल तो ज्ञान की कोई कमी नहीं-किताबें हैं, मोबाइल है, इंटरनेट है!

बोधिदुर्लभ भावना : जानकारी बहुत मिल सकती है…लेकिन अपने आत्मस्वरूप का सही ज्ञान मिलना दुर्लभ है।

मोह वकील : दुर्लभ क्यों?

बोधिदुर्लभ भावना : यह जीव अनंत बार अलग-अलग गतियों और ऊँचे-ऊँचे पदों को प्राप्त कर चुका है, लेकिन सम्यग्दर्शन और आत्मज्ञान को प्राप्त करना अत्यंत दुर्लभ है। “किन हू न कर्यो न धरै को, षट्द्रव्यमयी न हरै को।
सो लोकमाँहिं बिन समता, दुःख सहै जीव नित भ्रमता।”

मोह वकील : तो क्या पुण्य और शुभ कर्मों से बोधि मिल जाता है?

बोधिदुर्लभ भावना : नहीं।बोधि आत्मा के आश्रय और अपने पुरुषार्थ से प्रकट होती है।

चैतन्य : (आत्मचिंतन करते हुए) तो इतने जन्मों में मैंने बहुत कुछ पाया… लेकिन अपने आपको सही रूप में जाना ही नहीं। “नहीं रूप रंग देह वचन मेरे चयन के सौभाग्य! बोधि-ध्यान मुझे भा रहे मन में नर भव मिला निराला नहीं व्यर्थ करूँगा चारित्र चार धार मैं चैतन्य रहूँगा ।।”

बोधिदुर्लभ भावना : यही बोधिदुर्लभ भावना का संदेश है, बाहरी उपलब्धियों से ज्यादा जरूरी है अपने आत्मस्वरूप को जानना।

मोह वकील : तो अब क्या करना होगा?

विवेक वकील : बोधि की प्राप्ति के लिए बार-बार अपने आत्मस्वरूप की ओर देखना होगा।

न्यायाधीश : गवाही अभिलेख में दर्ज की जाए।

न्यायालय उद्घोषक : माननीय न्यायालय! अब इस मुकदमे की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण गवाह, धर्म भावना, को कटघरे में बुलाया जाए।

मोह वकील : ओहो! अब आखिरी गवाह भी आ गई… लगता है फैसला मेरे खिलाफ ही जाने वाला है!

दृश्य 13: धर्म भावना

विवेक वकील : माननीय न्यायालय! बोधिदुर्लभ भावना ने बताया कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र पाना बहुत कठिन है। अब न्यायालय जानना चाहता है कि आत्मा का सच्चा धर्म क्या है, जो उसे सच्चा सुख और मोक्ष की राह दिखाए। इसी बात को समझाने के लिए मैं धर्म भावना को कटघरे में बुलाने की अनुमति चाहता हूँ।

न्यायाधीश : अनुमति है।

न्यायालय उद्घोषक : माननीय न्यायालय! इस मुकदमे की अंतिम गवाह, धर्म भावना, कटघरे में उपस्थित हों।

मोह वकील : माननीय न्यायाधीश! एक आखिरी सवाल… आजकल धर्म के इतने रूप हैं, पूजा, व्रत, दान, तीर्थ, सेवा… तो इनमें से असली धर्म कौन-सा है?

धर्म भावना : जिससे आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप की ओर बढ़े, वही सार्थक धर्म है।

मोह वकील : तो क्या केवल पूजा-पाठ करना ही धर्म नहीं?

धर्म भावना : बाहरी क्रियाएँ अपने स्थान पर हैं, लेकिन निश्चयरत्नत्रय, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र, ही साररूप धर्म है। “ अन्तिम ग्रीवक लौं की हद, पायो अनन्त बिरियाँ पद।
पर सम्यग्ज्ञान न लाधौ, दुर्लभ निज में मुनि साधौ ॥”

विवेक वकील : और यह धर्म कहाँ से प्रकट होता है?

धर्म भावना : अपने शुद्ध आत्मस्वरूप के आश्रय से। जब जीव अपने आत्मस्वरूप को जानकर उसी में स्थिर होने का पुरुषार्थ करता है, तब स्थिर और अक्षय सुख, मोक्ष की प्राप्ति होती है।

चैतन्य : (धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए) तो मैंने बाहर बहुत कुछ खोजा… सुख भी बाहर ढूँढा, सहारा भी बाहर ढूँढा, अपनापन भी बाहर ढूँढा… लेकिन जिस सुख को खोज रहा था…उसका स्रोत तो मेरे भीतर ही था। “पाप को तो पापी भी पाप जानते
पर पुण्य को धर्मात्मा ना धर्म मानते।।
है साम्य आत्म-धर्म, वीतराग बनूँगा
शुद्धात्मा कमाल मैं चैतन्य रहूँगा ।।”

धर्म भावना : यही धर्म भावना का संदेश है।

मोह : (थोड़ा कमजोर पड़ते हुए): लेकिन… अगर चैतन्य ने खुद को पहचान लिया… तो मेरा क्या होगा?

विवेक वकील : जब आत्मा जागती है, तब मोह की पकड़ अपने आप कमजोर होने लगती है।

मोह वकील : तो… अब फैसला सुनाया जाएगा?

न्यायाधीश : (हथौड़ा उठाते हुए) हाँ। सभी अपने स्थान पर रहें। अब इस न्यायालय में… अंतिम निर्णय सुनाया जाएगा।
(सब शांत होकर जज की ओर देखते हैं।)

न्यायालय उद्घोषक : माननीय न्यायालय! सभी उपस्थित जन अपने स्थान ग्रहण करें। अंतिम निर्णय की कार्यवाही प्रारंभ होती है। (जज अपनी पूरी कार्यवाही वाली डायरी खोलते हैं।)

अंतिम दृश्य : न्यायालय का निर्णय

(पूरा न्यायालय शांत है। सभी पात्र न्यायाधीश की ओर देखते हैं।)

न्यायाधीश : (हथौड़ा बजाते हुए) Order! Order!!“बारह भावनाओं की गवाही, जिनवाणी के प्रमाण और प्रस्तुत तर्कों को सुनने के बाद यह न्यायालय अपने अंतिम निर्णय पर पहुँचा है।” इस न्यायालय में यह सिद्ध हो चुका है कि - मोह ही जीव के अनादिकालीन बंधन का मूल कारण है।… आत्मा न शरीर है, न धन है, न परिवार है; वह शुद्ध चैतन्य स्वरूप है। - राग-द्वेष से आस्रव और बंध होता है, शुद्धोपयोग से संवर और निर्जरा होती है। - सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र ही आत्मा का वास्तविक धर्म हैं। - अतः यह न्यायालय घोषित करता है कि, “मोह दोषी है और विवेक वकील की सभी दलीलें सत्य सिद्ध हुई हैं।” किन्तु इस न्यायालय का उद्देश्य किसी को दण्ड देना नहीं, आत्मा को जाग्रत करना है। हे चैतन्य ! यदि तुम स्थायी सुख और मोक्ष चाहते हो, तो रत्नत्रयरूप धर्म को अपने जीवन में धारण करो। यही मार्ग तुम्हें आत्मानुभव और परम शांति तक ले जाएगा।
(चैतन्य हाथ जोड़कर आगे आता है।)

चैतन्य : “आज मुझे ज्ञात हो गया कि मेरा सच्चा शत्रु बाहर नहीं, मेरा मोह ही था। अब मैं सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र के मार्ग पर चलकर अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का अनुभव करने का पुरुषार्थ करूँगा।”

न्यायाधीश : (अंतिम घोषणा) “यही इस न्यायालय का अंतिम निर्णय है। बारह भावनाओं का मनन करो, मोह को त्यागो, रत्नत्रय को अपनाओ और अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का अनुभव करो; नहीं तो jail में डाल दूँगा। न्यायालय की कार्यवाही यहीं समाप्त होती है।” (हथौड़े की तीन चोटें।) सभी पात्र एक साथ हाथ जोड़कर दर्शकों की ओर मुख करते हैं। और गाते हैं- “चैतन्य-चारु चिन्त्य चित्त-चैन चुनूँगा
चैतन्य को चुना है चैतन्य रहूँगा ।।
अब जागृति के गीत ही मैं नित्य गुनूँगा
चैतन्य का बना हूँ चैतन्य रहूँगा ।।

संचालक : (नाटक के समापन पर) आदरणीय उपस्थित गुरुवर, मंचासीन अतिथिगण एवं सभी श्रद्धालुजनों, आप सभी ने हमारी इस विनम्र प्रस्तुति को धैर्यपूर्वक देखा और सुना, इसके लिए हम हृदय से आभारी हैं। यदि इस प्रस्तुति के माध्यम से बारह भावनाओं का संदेश आपके हृदय तक पहुँचा हो और आत्मचिंतन की एक छोटी-सी प्रेरणा भी मिली हो, तो हमारा यह प्रयास सफल होगा। हम विद्यार्थी हैं, सीखने की यात्रा पर हैं। यदि इस नाट्य-प्रस्तुति में हमसे कोई त्रुटि, अशुद्धि या कमी रह गई हो, तो उसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। अब मैं विनम्रतापूर्वक हमारे अध्यक्ष महोदय से निवेदन करता/करती हूँ कि वे मंच पर पधारकर अपने प्रेरणादायी उद्बोधन द्वारा हमारा मार्गदर्शन करें। साथ ही हमारी इस प्रस्तुति के संबंध में अपने अमूल्य विचार, सुझाव एवं यदि कोई त्रुटि रही हो तो उसका भी कृपापूर्वक उल्लेख करें, ताकि हम भविष्य में और अधिक शुद्ध एवं उत्कृष्ट प्रस्तुति दे सकें। आदरणीय अध्यक्ष महोदय, कृपया मंच पर पधारकर हमें अपना स्नेहिल मार्गदर्शन प्रदान करें। धन्यवाद। जय जिनेन्द्र

प्रूफरीडिंग बाकी है

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