संस्कारशोध्य भाग-1 — जैन स्वाध्याय सामग्री | Sanskarashodhya Bhag-1

संस्कारशोध्य भाग-1

समर्पण

परम पूज्य प्रातः स्मरणीय महाकवि समाधि सम्राट
आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज
के करकमलों में सादर समर्पित

प्रार्थना

भावना दिन रात मेरी, सब सुखी संसार हो।
सत्य संयम शील का, व्यवहार घर-घर वार हो॥
धर्म का परचार हो, अरु देश का उद्धार हो।
और ये उजड़ा हुआ, भारत चमन गुलजार हो॥
भावना दिन रात मेरी, सब सुखी संसार हो।
ज्ञान के अभ्यास से, जीवों का पूर्ण विकास हो।
धर्म के परचार से, हिंसा का जग से ह्रास हो॥
भावना दिन रात मेरी, सब सुखी संसार हो।
शान्ति अरु आनन्द का, हर एक घर में वास हो।
वीर वाणी पर सभी, संसार का विश्वास हो॥
भावना दिन रात मेरी, सब सुखी संसार हो।
रोग अरु भय शोक होवे, दूर सब परमात्मा।
कर सकेकल्याण ज्योति, सब जगत की आत्मा॥
भावना दिन रात मेरी, सब सुखी संसार हो।

संस्कारोदय

भाग - 1

पूरे वर्ष भर पाठशाला के बच्चों के अध्ययन हेतु
धार्मिक एवं नैतिक शिक्षण सामग्री से
भरपूर अपूर्व कृति

प्रकाशक
धर्मोदय परीक्षा बोर्ड
सागर (म.प्र.)

अनुक्रम

कृति
संस्कारोदय
भाग - 1

सर्वाधिकार
प्रकाशकाधीन

संस्करण
पंचम, अगस्त 2012

आवृत्ति
2200

मूल्य
20 /-

प्रतिष्ठान
धर्मोदय परीक्षा बोर्ड
बाहुबली कॉलोनी
सागर (म.प्र.)
094249-51771

मुद्रक
विकास आफसेट, भोपाल

  1. अहिंसा गीत 3
  2. जैन शासन ध्वज 4
  3. चलो मंदिर चलें 5
  4. चार अणुयोग 6
  5. अमर कथा: भकामर की 7
  6. चमत्कार जिनभक्ति का 8
  7. भोजन विधि 9
  8. हम शाकाहारी हैं 10
  9. विनय 12
  10. रात्रिभोजन भोजन क्यों नहीं? 13
  11. आचार्य श्री शांतिसागर जी की उदारता 14
  12. नियम का फल 15
  13. वीर शासन जयन्ती 16
  14. हमें याद क्यों नहीं होता 17
  15. दयालु हाथी 18
  16. पानी कैसे छानें? 19
  17. चमड़े को पहचानें 20
  18. विजयादशमी 21
  19. सकल्ली हिंसा 22
  20. कर्मफल 23
  21. यह भी हिंसा है 24
  22. सम्राट् चंद्रगुप्त मौर्य 25
  23. सीखें: सभ्यताएँ 26
  24. धार्मिक स्थल पर क्या नहीं करें? 27
  25. राम कहानी 28
  26. अजान फल 29
  27. मितव्ययता 30
  28. अहिंसा का प्रभाव 31
  29. नारे 32

1. अहिंसा गीत

तर्ज- इंसाफ की डगर पर
जिनधर्म की डगर पर, बच्चों दिखाओ चल के।
यह धर्म है सभी का, धारो हृदय से बढ़ के ॥
यह धर्म है अहिंसा, धारो हृदय से बढ़ के ॥ ध्रुव ॥
जीती कथाएँ जिनने, जीती हैं इंद्रियाँ भी।
जीता है काम मद भी, जीता जनम मरण भी ॥
जीती क्षुधा तथा भी, संयम के पथ पर चल के ॥ 1 ॥
जीता स्वयं को जिसने, जिन शब्द कह रहा है।
माने जो ऐसे जिनको, सच जैन वह रहा है ॥
सच्चे बनोगे जैनी, जिनवर के पथ पै चल के ॥ 2 ॥
जीना सभी को प्रिय है, चाहे न कोई मरना।
तरुवर के धर्म जैसा, उपकार सबका करना ॥
सब में छिपी अहिंसा, जियो जिलाओ मिलके ॥ 3 ॥
यदि हो अहिंसा प्रेमी, स्वागत करो दिवस का।
दिन में ही लो बराती, दिन में ही भोज सबका ॥
बन जाओ श्रेष्ठ मानव, कुरीतियों कुचल के ॥ 4 ॥
वृषभादि वीर प्रभु ने, जिनधर्म को जिया है।
जीकर के कोई शंकर, अरहंत बन गया है ॥
जीतो स्वयं को होगे, महावीर तुम भी कल के ॥ 5 ॥
यह धर्म है अहिंसा …

2. जैन शासन ध्वज

  • जैन ध्वज पंचपरमेष्ठी के प्रतीक के साथ-साथ विश्वधर्म, विश्वप्रेम, विश्व शांति का भी उद्घोषक है।

  • ध्वज चेतना, श्रद्धा, समर्पण का प्रतीक है। ध्वज गौरव और गरिमा से मंडित उज्ज्वल आदर्शों संकल्पों के साथ-साथ एकता/अखंडता का प्राण है।

  • ध्वज को जिनशासन की प्रभावना का प्रतीक माना जाता है। जब हम जैन मंदिर जाते हैं, तब हमें मंदिर के शिखर पर आकाश में लहराता हुआ ध्वज दिखाई देता है।

  • यह ध्वज आकार में आयताकार है तथा इसकी लम्बाई व चौड़ाई का अनुपात 3:2 है।

  • इस ध्वज में पाँच रंग है- लाल, पीला, सफेद, हरा और गहरा नीला। लाल, पीले, हरे, नीले रंग की पट्टियाँ चौड़ाई में समान है तथा सफेद रंग की पट्टी अन्य रंगों की पट्टी से चौड़ाई में दुगुनी होती है।

  • ध्वज के बीच में जो स्वस्तिक है, उसका रंग केसरिया है। जैन समाज के इस सर्वमान्य ध्वज में पाँच रंगों को अपनाया गया है। ये पाँच रंग पंच परमेष्ठी के प्रतीक माने गए हैं।

श्वेत रंग - अर्हन्त परमेष्ठी।
लाल रंग - सिद्ध परमेष्ठी।
पीला रंग - आचार्य परमेष्ठी।
हरा रंग - उपाध्याय परमेष्ठी।
नीला रंग - साधु परमेष्ठी।

स्फटिक प्रवेन्त रक्तं च पीत-श्यामनिभं तथा।
एतत्तत्त्वपरमेष्ठिनः पञ्चवर्ण यथाक्रमम्॥
मातसार, अध्याय 35

जैन ध्वज की मध्य पट्टिका पर अंकित स्वस्तिक जहाँ प्राचीनता को दर्शाता है, वहीं प्राप्ति के लक्ष्य को भी दर्शाता है। तथा चतुर्गति का भी प्रतीक है।

  • ये पाँच रंग, पंच अणुव्रत एवं पंच महाव्रतों के प्रतीक रूप में भी सफेद रंग अहिंसा एवं शक्ति, लाल रंग सत्य एवं कल्याण, पीला रंग अचौर्य एवं धनादि लाभ, हरा रंग ब्रह्मचर्य एवं अभय, नीला रंग अपरिग्रह एवं विजय का द्योतक माना जाता है।

3. चलो मंदिर चलें

जल्दी उठो नहाओ जल्दी, कपड़े शुद्ध पहनकर जल्दी।
मंदिर जाओ जिनदर्शन को, नंगे पैर धरम पालन को॥
अष्ट द्रव्य ले लो जीव बचाकर, कुछ-कुछ मन में अच्छा घयाकर।
चिंता अन्य कार्य की तजकर, जाओ मंदिर सज्जन बनकर॥
मंदिर दिखे नमन तब करना, मंदिर पहुँच द्वार पर रुकना।
पैर धोने जल से फिर धोना, फिर मंदिर में प्रवेश होना॥
कहो ओम जय-जय-जय बोलो, निस्सही निस्सही निस्सही बोलो।
कहो नमोऽस्तु कहो नमोऽस्तु, घण्टा बजाकर कहो नमोऽस्तु॥
हाथ जोड़कर शीश झुकाओ, णमोकार फिर जल्दी ध्याओ।
करो अंगूठा मुट्ठी भीतर, पूज चढ़ाओ पाँच जगह पर॥
बैठ गवासन, करो नमोऽस्तु, विनती पढ़कर करो नमोऽस्तु।
परिक्रमा फिर तीन लगाओ, गंधोदक उत्तमांग लगाओ॥
जिनवाणी को शीश झुकाओ, चार पूज्ज फिर आप चढ़ाओ।
रत्नत्रय को शीश झुकाओ, तीन पूज्ज गुरु अग्र चढ़ाओ॥
णमोकार नौ बार पढ़ो फिर, अस्सहि अस्सहि अस्सहि कहकर।
पीठ दिखाए बिन फिर आना, ‘सुव्रत’ धरकर जैन कहाना॥

  • निस्सही - अदृश्य देवतागण से स्थान देने का निवेदन सूचक तथा सांसारिक विकल्पों को छोड़ता हूँ।
  • अस्सहि - अदृश्य देवतागण से पुनः स्थान पर आने का निवेदन तथा लौटते समय कहने योग्य।
  • अरिहन्त प्रतिमा के समक्ष पाँच पूज्ज चढ़ाते समय बोलना चाहिए-
    अरिहन्तसिद्धायुवज्झायावस्सवेसाहुभ्यो नमः।
  • जिनवाणी के समक्ष चार पूज्ज चढ़ाते समय - प्रथमं करणं द्रव्यं नमः।
  • गुरु के समक्ष तीन पूज्ज चढ़ाते समय - सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रेभ्यो नमः।
  • गवासन मुद्रा - गाय के समान बैठना।

4. चार अनुयोग

जिनवाणी के उपदेश को पद्धति को अनुयोग कहते हैं।
अनुयोग चार होते हैं-

  1. प्रथमानुयोग
  2. करणानुयोग
  3. चरणानुयोग
  4. द्रव्यानुयोग

प्रथमानुयोग
जो सच्चा इतिहास बताता, तीर्थंकर चारित्र सुनाता।
महापुरुष की जिसमें गाथा, वही प्रथमानुयोग कहाता॥
करणानुयोग
लोक-अलोक प्रमाण बताता, कर्मों के फल को दर्शाता।
युग परिवर्तन ज्ञान कराता, वही करणानुयोग कहाता॥
चरणानुयोग
साधक का आचार बताता, श्रावक की चर्या समझाये।
मोक्ष महल को खोलने द्वार, वही चरणानुयोग सु-धार॥
द्रव्यानुयोग
द्रव्य तत्त्व का ज्ञान करावे, अध्यातम का भान करावे।
नय-प्रमाण के भेद बताये, वही द्रव्यानुयोग कहाये॥

5. अमर कथा : भक्तामर की

कवि कालिदास व मानतुंगाचार्य में वाद-विवाद हुआ, जिसमें कालिदास की पराजय होने से उन्हें लज्जित होना पड़ा; जिससे उन्होंने राजा भोज की मानतुंगाचार्य के विरुद्ध भड़का दिया। राजा भोज का मद जागृत हुआ। उसने श्री मानतुंगाचार्य को 48 कोठों के भीतर जेलखाने में हथकड़ी व बेड़ी पहनाकर बंद कर दिया और बाहर कड़ा पहरा बैठा दिया। श्री मानतुंगाचार्य जी ने रात्रि में अर्हत् सर्वज्ञ वीतराग श्री आदिनाथ भगवान् की भक्ति में लीन होकर स्तोत्र की रचना की। जब उन्होंने 46 वें काव्य की रचना की तब हथकड़ी व बेड़ी टूट गई और वे 48 कोठों के बाहर आ गए। राजा ने इस चमत्कार को स्वयं जाकर देखा एवं नम्रता से मानतुंगाचार्य के चरणों में नमस्कार करके अपने अपराध की क्षमा याचना की। आचार्य श्री ने राजा को क्षमा कर दिया और फिर वहाँ से विहार कर गए।

इस स्तोत्र का प्रारम्भ ‘भक्त-अमर’ शब्द से होता है, इसलिए इसका नाम भक्त-अमर-भक्तामर स्तोत्र सर्वप्रसिद्ध है। भक्तामर स्तोत्र की रचना आचार्य मानतुंग ने 7 वीं शताब्दी में की थी। विश्व के उत्कृष्टतम पाँच स्तोत्र में संस्कृत भाषा का भक्तामर स्तोत्र आता है। इसका वास्तविक नाम आदिनाथ स्तोत्र है। इस काव्य का प्रत्येक अक्षर एवं उसकी संयोजना अद्भुत मंत्र शक्ति को लिए हुए है। इस स्तोत्र को भक्तिभाव पूर्वक निरंतर पढ़ने से कर्म निर्जरा के साथ सभी प्रकार की विघ्न-बाधाएँ दूर होती हैं, मनवांछित कार्य सिद्ध होते हैं, जीवन सुख-शान्तिमय बनता है।

6. चमत्कार जिनभक्ति का

आचार्य वादिराज मुनि को कुष्ठ रोग हो गया था। एक बार राजा की सभा में इसकी चर्चा हुई तो इनके एक अन्त्य भक्त ने अपने गुरु के अपवाद के भय से झूठ कह दिया कि उन्हें कोई रोग नहीं है। इस पर वाद-विवाद हुआ और अन्त में राजा ने स्वयं ही परीक्षा करने का निश्चय किया। भक्त घबराया हुआ वादिराज मुनि के पास पहुँचा और समस्त घटना कह सुनाई। गुरु ने भक्त को आश्वासन देते हुए कहा- धर्म के प्रसाद से सब ठीक होगा, तुम चिन्ता मत करो। अनन्तर आचार्य श्री ने एकाीभावस्तोत्र की रचना की। जिसके फलस्वरूप उनकी पूर्ण काया स्वर्ण के समान कान्तिवान और निरोग हो गई, जिसे देखकर राजा बहुत प्रभावित हुआ और मुनि चरणों में नमस्कार कर जैनधर्म अंगीकार किया।

दार्शनिक, चिन्तक और महाकवि के रूप में वादिराज मुनि प्रख्यात थे। आप उच्चकोटि के तार्किक विद्वान् थे। आपकी बुद्धि रूपी गाय ने जीवन पर्यन्त शुक्तकरूपी घास खाकर सरस काव्य-दुग्ध से सहृदयों को तृप्त किया है। आपकी तुलना जैन कवियों में सोमदेवसूरि से और इतर संस्कृत कवियों में नैषधकार श्रीहर्ष से की जा सकती है।

आचार्य वादिराज का समय-सन् 1010 से 1065 ई. है। आपने निम्न रचनाएँ की हैं- पार्श्वनाथचरित, यशोधरचरित, एकाीभाव स्तोत्र, न्यायविनिश्चय विवरण तथा प्रमाण निर्णय।

7. भोजन विधि

जीवन जीने के लिए भोजन करना अनिवार्य है, भोजन हमें शक्ति प्रदान करता है, किन्तु अधिक मात्रा में, असमय पर, किसी भी प्रकार का किया हुआ भोजन रोग का भी कारण बनता है। स्वस्थ जीवन के लिए भोजन-प्रक्रिया को निम्न प्रकार से बनाना चाहिए-

  1. छने हुए जल से स्नान करना चाहिए। फिर जिनदर्शन करने के पश्चात् भोजन करना चाहिए।
  2. भोजन करने के पहले हाथ-पैर को धोकर, ऊँचे आसन पर थाली रखकर, स्वयं नीचे बैठकर भोजन करना चाहिए।
  3. भोजन करते समय टी.वी. देखना, संगीत सुनना, मोबाइल पर बात करना आदि दूसरा कार्य नहीं करना चाहिए। अन्यथा भोजन का सही तरीके से चर्वण एवं पाचन नहीं होता। जीभ कट जाना, ठसका लगना, नाक में पानी आना आदि विकृतियाँ भी उत्पन्न हो जाती हैं।
  4. भोजन प्रारम्भ करने के पहले एवं अंत में नौ बार णमोकार का जाप करना चाहिए।
  5. प्राणियों के वध से प्राप्त भोजन, बासा भोजन, तामसिक (आलू, प्याज, लहसुन) भोजन हमें कभी भी नहीं करना चाहिए।
  6. भोजन करते समय प्रायः मौन ही रहना चाहिए। चप-चप आवाज करते हुए, गिरा-गिराकर अथवा खड़े होकर घूमते-फिरते कभी भी भोजन नहीं करना चाहिए।
  7. होटल का बना, अभक्ष्यदित भोजन कभी नहीं करना चाहिए।
  8. भोजन को अच्छी तरह से चबा-चबाकर, शोधकर खाना चाहिए।
  9. थाली में जूठन कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए।

8. हम शाकाहारी हैं

हम शाकाहारी हैं। सभी जैन शाकाहारी होते हैं। इसका अर्थ यह है कि हम केवल शाकाहारी भोजन करते हैं। उन सब्जियों और फलों को खाते हैं, जो वास्तव में शाकाहारी हैं।
ये वे सब्जियाँ और फल हैं, जो हमें खाना चाहिए - तुरई, परवल, हरी मिर्च, लौकी, कद्दू, टमाटर, भिंडी, करेला, गिल्की, नींबू, ककड़ी, बरबटी, मटर की फली, आंवला आदि सब्जियाँ।
केला, संतरा, मौसमी, सेवफल, अनार, चीकू, अमरूद, खरबूजा, नारियल, अंगूर, नाशपाती, अनानास, बेल, आलू बुखारा, आडू, लीची, पपीता आदि फल।

जैन किसी जीव को चोट पहुँचाने का प्रयास नहीं करते, यहाँ तक कि पौधों के प्रति भी दयालु होते हैं। इसलिए जमीन के नीचे पैदा होने वाली सब्जी जैसे- आलू, प्याज, लहसुन, गाजर, चुकन्दर आदि नहीं खाते। जैन माँस, मछली, अण्डे और उनसे बनी चीजें नहीं खाते।

सब्जी-फल खाने से लाभ :

  1. सब्जियाँ शरीर की सैकड़ों बीमारियों को नष्ट करने वाली होती हैं, कमजोरी दूर होती है।
  2. इससे पेट साफ होता है, भूख अच्छी लगती है, खून बढ़ता है और साफ भी होता है, आँखों की बीमारियाँ नहीं होती हैं।
  3. शरीर में हड्डियाँ मजबूत करते हैं।

सब्जी फल नहीं खाने से हानियाँ :

  1. पेट साफ नहीं होता। दिन में दो बार शौच जाने के स्थान पर वह 2-3 दिन में एक बार शौच जाता है। शौच नहीं जाने से मल पेट में पड़ा-पड़ा सड़ता रहता है। उसको बदबू से पेट दर्द, सिर दर्द, पेट का कड़क होना आदि कई बीमारियाँ हो जाती हैं।
  2. जो नमकीन, कचौड़ी, पकौड़ी, समोसा आदि चीजें खाने का शौक रखते हैं और फल भी बहुत कम खाते हैं, उनके शरीर में रक्त (एच्. बी.) की कमी हो जाती है।
  3. शरीर में खून कम होता जाता है। खून कम होने से चक्कर आने लगते हैं, दिमाग कमजोर हो जाता है, उसको थोड़े से चलने में ही थकान आने लगती है, श्वास भरना आदि अनेक परेशानियाँ पैदा हो जाती हैं।

शिक्षा: घर में जो भी सब्जी, सलाद आदि बनते हैं। ककड़ी, टमाटर, केला, जामफल आदि जो भी फल आते हैं, उन्हें खाने से हम दिन भर खुश रहते हैं, हँसते-खेलते रहते हैं, हम कभी बीमार नहीं होते, हमें कभी डॉक्टर के पास नहीं जाना पड़ता है।

9. विनय

विनय का अर्थ है - नम्रता पूर्वक, अपनेपन के साथ किया गया व्यवहार, विनयवान सच्चा सुख पाता है, सभी उसका आदर करते हैं। मानवीय गुणों में विनय गुण मुकुट में लगी मणि के समान श्रेष्ठ है। यह एक तप भी है जो तीर्थंकर जैसे पुण्य प्रकृति के बंध में सहायक है।

प्रतिदिन करने योग्य विनय :

  • जिनमंदिर में दोनों हाथ जोड़कर, जमीन पर माथा रखने हुए देव-शास्त्र-गुरु को नमस्कार करना। नमोऽस्तु बोलना चाहिए।
  • लौटते समय देव-शास्त्र-गुरु की ओर पीठ न हो, ऐसा ध्यान रखना।
  • जिनबिम्ब अथवा गुरु के मुख पर सीधा प्रकाश पड़े इस प्रकार टॉर्च आदि नहीं रखना।
  • जिनवाणी को साफ-सुथरा, कवर चढ़ाकर, यथास्थान रखना चाहिए।
  • प्रतिदिन माता-पिता, दादा-दादी, शिक्षक आदि के चरण स्पर्श कर उनका आशीष लेना चाहिए।
  • झूठे सुख मंदिर में प्रवेश नहीं करना, मंदिर में शोर नहीं करना। पालथी लगाकर बैठना चाहिए।
  • सभी साधर्मी बन्धुओं से हाथ जोड़कर जय-जिनेन्द्र बोलना चाहिए। भाई-बहिनों से भी जय-जिनेन्द्र बोलना चाहिए।
  • साफ-सुथरे मर्यादित वस्त्र पहनकर ही देव-शास्त्र-गुरु के समक्ष जाना।
  • गुरु से कोई वस्तु दोनों हाथों से लेना व दोनों हाथों से देना चाहिए।
  • गुरु की परछाई पर पैर नहीं रखना चाहिए।
  • शास्त्रादि रखने वाले बेंच, टेबिल आदि का पैरों से लाँघना नहीं चाहिए।

10. रात्रिभोजन क्यों नहीं ?

रात्रि भोजन करते समय :

  • चींटी पेट में चली जावे तो - बुद्धि नष्ट हो जाती है।
  • जूँ पेट में चली जावे तो - पेट में पानी भर जाता है, पेट मोटा हो जाता है, इसी को जलोदर रोग कहते हैं, इसका कुछ भी इलाज नहीं है।
  • मक्खी पेट में चली जावे तो - जब तक मक्खी नहीं निकल जाती उल्टियाँ होती रहती हैं।
  • मकड़ी पेट में चली जावे तो - कुष्ठ (सफेद दाग) की बीमारी हो जाती है।
  • बाल गले में चला जावे तो - स्वर भंग अर्थात् आवाज खराब हो जाती है।
  • रात्रि में कफ प्रधान रहता है भोजन का पाचन पित्त से होता है। दिन में पित्त प्रधान रहता है इसलिए रात्रिभोजन करने वाले का पाचनतंत्र खराब हो जाता है।
  • रात्रि में लाइट के प्रकाश में सैंकड़ों, हजारों, लाखों कीड़े उत्पन्न होते हैं, उनकी हिंसा होती है, जिससे पाप लगता है।
  • रात्रि में भोजन करने वालों को लाइट का अच्छा प्रकाश होने पर भी भोजन में ये सभी चीजें दिखाई नहीं देती हैं, फलतः खाने वालों के शरीर में अनेक विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।
  • डॉक्टर लोग एसिडिटी के मरीज को रात्रिभोजन का त्याग करवाते हैं, रात्रिभोजन त्याग से उनको बीमारी में आराम मिलता है।
  • रात्रिभोजन के फल से अगले भव में ऐसी ही पर्यायें मिलती हैं, जिसमें उनको दिन में भोजन करने का समय ही नहीं मिलता है। उनका स्वभाव ही रात्रि में भोजन करना होता है। जैसे- उल्लू, चमगादड़, बिल्ली, साँप आदि।

11. आचार्य श्री शांतिसागर जी की उदारता

एक किसान के खेत में जब फसल तैयार हो जाती थी तब बहुत सारे पक्षी दाना चुगने के लिए उसके खेत पर आते थे। किसान पक्षियों को उड़ा देता था। पक्षी वहाँ से उड़कर पड़ोसी के खेत में दाना चुगने चले जाते थे।
पड़ोसी खेत के मालिक- भीमगौड़ा पाटिल का लड़का सातगौड़ा इतना उदार था कि दाना चुगते हुए देखकर भी वह पक्षियों को नहीं उड़ाता था। यह देख किसान पड़ोसी के बेटे से कहता था, बेटा! तुम पक्षियों को क्यों नहीं उड़ाते ? यदि तुम पक्षियों को नहीं उड़ाओगे तो वे तुम्हारी पूरी फसल खा जायेंगे …। और मैं भी पूरे पक्षी तुम्हारे खेत में भेज दूँगा।
सातगौड़ा कह देता था- “दादाजी! आप सभी पक्षियों को मेरे खेत में भेज देना, यदि पक्षी हमारा पूरा खेत खा जायेंगे तो भी अनाज खत्म नहीं होगा, हमारे यहाँ कोई कमी नहीं होगी।
उस बच्चे की उदारता एवं दया का यह फल होता था कि जब अनाज निकाला जाता तब उनके यहाँ पूरे गाँव की अपेक्षा अधिक अनाज निकलता था।” आगे जाकर वह बालक दिगम्बर जैन मुनियों के लिये आदर्श बाल ब्रह्मचारी जैनाचार्य श्री शांतिसागरजी बने।
पहले माता-पिता की सेवा की बाद में दीक्षा ली। श्रमण संस्कृति तथा जिनवाणी रक्षा में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा।
सारांश : दान और दया से कभी धन समाप्त नहीं होता अपितु उसमें वृद्धि ही होती है।

12. नियम का फल

एक व्यक्ति ने एक संत से “मैं आज किसी भी वस्तु को बिना दिये ग्रहण नहीं करूँगा” यह नियम ले लिया। वह शाम के समय जंगल में शौच से आकर लोटा माँजने के लिए मिट्टी कुरेद रहा था कि उसके हाथ में एक कलश के मुँह का किनारा लगा। उसने जमीन खोदी तो उसमें से स्वर्ण से भरा एक कलश निकला।
सोना देख उसका मन बदल गया, लेकिन उसने अपना नियम नहीं तोड़ा। पड़े को पुनः जमीन में दबा दिया एवं निशान के रूप में एक छोटी सी लकड़ी उसके ऊपर गाड़ कर घर आ गया। भोजन आदि आवश्यक कार्यों को करके जब वह बिस्तर पर लेटा तो उसको नींद नहीं आ रही थी ? उसने अपने मन की बात को छिपाने का बहुत प्रयास किया। लेकिन पत्नी के बार-बार पूछने पर उसने पूरी बात बता दी।
जब वह पत्नी को पूरी बात बता रहा था तभी उसकी झोपड़ी के पीछे कुछ चोरों ने छिपकर पूरी बातें सुन लीं और धन लेने के लिए वे जंगल में पहुँच गये। उन्होंने गढ़ा खोदकर घड़ा निकाल कर देखा तो घड़े में तो बिच्छू, साँप आदि विषैले जीव भरे थे। साँप, बिच्छुओं के काटने से उसको बहुत गुस्सा आया। उन्होंने सोचा उस धूर्त को इसका मजा अवश्य चखाना चाहिए। इसलिए उन्होंने घड़े को बन्द कर उठाया और गरीब की झोपड़ी के आगे लाकर पटक दिया। धमाके की आवाज सुनकर गरीब ने बाहर आकर देखा तो उस घड़े में हीरे-मोती जगमगा रहे थे।
यह देख उसे आश्चर्य-चकित हो पत्नी से कहा- “देखो यदि मैं नियम तोड़ देता तो धन भी जाता और धर्म भी, नियम नहीं तोड़ा तो धर्म भी बच गया और धन भी घर पर आ गया।”
सारांश : नियम का पालन अच्छी तरह करने से हमेशा लाभ-ही-लाभ होता है।

13. वीर शासन जयन्ती

जैन शास्त्रों के अनुसार नये वर्ष का प्रारम्भ श्रावण कृष्ण प्रतिपदा से होता है। इसी दिन राजगृही नगरी के विपुलाचल पर्वत पर अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर को केवलज्ञान होने के 66 दिन के बाद दिव्यध्वनि खिरी थी, इसलिए यह प्रथम देशना दिवस (वीरशासन जयन्ती) के रूप में मनाया जाता है। यह तिथि इतिहास में अपना खास महत्त्व रखती है और एक ऐसे ‘सर्वोदय’ तीर्थ की जन्म तिथि है, जिसका लक्ष्य सर्वप्राणिहित है।"

प्रतिवर्ष वीरशासन जयन्ती को मनाते समय भगवान् महावीर के संदेशों को हृदय में अंकित कर उनकी वाणी का घर-घर में प्रचार-प्रसार करने का सतत् प्रयत्न करना प्रत्येक श्रावक का कर्त्तव्य है।
कैसे मनायें वीर शासन जयन्ती?

  1. प्रातःकाल सामूहिक रूप से भगवान् महावीर एवं द्वादशाङ्ग जिनवाणी की पूजन करें।
  2. जिनशासन की प्रभावना हेतु भगवान् महावीर की फोटो एवं जिनवाणी लेकर बाजे गाजे के साथ प्रभावना यात्रा निकालें।
  3. दोपहर में महावीर विधान का आयोजन करें।
  4. रात्रिकालीन भगवान् महावीर एवं द्वादशाङ्ग जिनवाणी पर व्याख्यान माला आयोजित करें।
  5. बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं जनसामान्य के लिए प्रश्न मंच का आयोजन करें।

14. हमें याद क्यों नहीं होता?

आज के अधिकतम लोगों के साथ याद नहीं होने की सबसे बड़ी समस्या है। याद नहीं होने में कुछ कारण पूर्व भव के होते हैं, कुछ कारण इस भव के होते हैं एवं कुछ हमारी लापरवाही रूप होते हैं। उनमें से कुछ नीचे दिए गए हैं -

  1. हम मंदिर जैसे धार्मिक स्थलों में अथवा सार्वजनिक स्थानों में जहाँ अनेक लोग पुस्तकें पढ़ते हैं, स्वाध्याय करते हैं, वहाँ जाकर घण्टा बजाना, जोर से जयकार करना या सभी के बीच में आगे जाकर बैठना या नमस्कार करना, सीटी या तालियाँ आदि बजाकर हल्ला करना, ऐसे कार्यों के फलस्वरूप हमें याद नहीं होगा।
  2. किसी की पुस्तक फाड़ना, छुपा देना या अपनी ही पुस्तकों को जहाँ-कहाँ पटक देना, गन्दी कर देना, पैरों में रख देना, किसी के माँगने पर नहीं देने वाले को भी आगे याद नहीं होगा।
  3. पढ़ते हुए के साथ से पुस्तक छीन ली, लाइट बंद कर दी, पढ़ने में बाधाएँ डाली या बातों में लगा दिया तो हमें आगे याद नहीं होगा।
  4. जिस विषय में आ रहा है, उसे दूसरे को नहीं बताना, अच्छे नंबर लाने वालों से ईर्ष्या करना, पढ़ने में छल-कपट करने से भी याद नहीं होगा।
  5. अपने ज्ञान को बेचना, जिनवाणी बेचकर उदरपूर्ति करना, मंदिर की पुस्तकों को यद्वा-तद्वा जहाँ-कहाँ रख देना, उनकी सुरक्षा नहीं करने से भी याद नहीं होगा।
    लापरवाही क्या होती है?
  6. पढ़ते समय मन को इधर-उधर भटकाना।
  7. विद्यार्थी जीवन में लड़कियाँ-लड़कों के चक्कर में पड़ जाना।
  8. बीड़ी-सिगरेट, गुटखा-पाउडर, सुपारी, होटल के चरपरे पदार्थ खाने की आदत रखना।
  9. मुझे क्या बनना है, इस प्रकार लक्ष्य नहीं बनाना।
  10. समय पर भोजन पानी करने का ध्यान नहीं देना। पोहा, कचोड़ी, समोसा आदि खाकर रह जाना।

15. दयालु हाथी

एक नगर से बहुत दूर एक भयंकर अटवी थी। जहाँ शेर, हाथी, घोड़ा, खरगोश, अष्टापद, हिरण, गीदड़, चीता, कौआ, कबूतर, कोयल आदि अनेक जीव-जन्तु रहते थे। उस वन में लम्बे-लम्बे बाँस के वृक्ष थे। उसी अटवी में आम, जामुन, अनार आदि वृक्ष भी थे। एक बार अचानक बाँस से बाँस की टकराहट के कारण आग लग गयी। पूरा जंगल धूँ-धूँ करके जलने लगा। जंगल के पशु-पक्षी अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। लेकिन जहाँ-जहाँ वे जाकर खड़े होते आग वहीं पर भी पहुँच जाती। उसी जंगल में एक बलवान हाथी भी रहता था। उसने जब देखा कि सब पशु-पक्षियों की जान खतरे में पड़ गयी है। मुझे अपने बल का उपयोग करना चाहिए। यही विचार कर उसने जंगल के स्थान के सैकड़ों वृक्ष उखाड़-उखाड़कर फेंक दिए। वृक्ष, झाड़ियाँ, पौधे आदि जितना भी ईंधन उस स्थान पर था, पूरे को उखाड़कर बहुत दूर फेंक दिया। जिससे बहुत बड़ा स्थान ईंधन से रहित हो गया। सब पशु-पक्षी उस स्थान पर आकर जमा होने लगे। सैकड़ों पशु वहाँ आकर खड़े हो गए। खाली स्थान पशुओं से ठसाठस भर गया। उन्हीं पशुओं में हाथी भी वहीं खड़ा था। वह स्थान इतना ठसाठस भर गया कि एक तिल रखने की भी जगह नहीं बची। खड़े-खड़े हाथी की पीठ में खुजली चलने लगी। उसने अपना एक पैर उठाकर खुजलाया जब तक उस स्थान पर एक खरगोश आकर बैठ गया। जब हाथी ने अपना पैर रखने के लिए नीचे देखा तो पैर रखने की जगह नहीं थी तो उस हाथी ने अपना पैर नीचे नहीं रखा, वह तीन दिन तक तीन पैर पर खड़ा रहा। फलतः वह मरकर राजा श्रेणिक के यहाँ मेघकुमार नाम का राजकुमार हुआ।

शिक्षा - एक हाथी दया पालन से राजकुमार हुआ तो हम दया पालन कर स्वर्ग-मोक्ष में जावे तो कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है।

16. पानी कैसे छानें ?

  • जैनाचार्यों ने एक बूँद अनछने जल में असंख्यात जीव बताये हैं।
  • सूक्ष्मद्रष्टि विज्ञानवेत्ता केप्टन स्वोर्सवंसी ने सूक्ष्मदर्शी यंत्र की सहायता से एक बूँद जल में 36,450 त्रस जीव की गणना की है।
  • एक जल की बूँद में इतने जीव पाए जाते हैं कि वे यदि भ्रमर के आकार में होकर उड़ें तो पूरे जम्बूद्वीप को व्याप कर लें।
  • अनछने जल के उपयोग में अधिक हिंसा होती है, जो घोर पाप का कारण है।
  • उज्जैनी नगरी के सेठ जिनदत्त की बहू के द्वारा जीवाणु गिरने पर प्रायश्चित्त के निवेदन पर मुनि महाराज ने 84000 मुनिराजों को आहार अथवा निर्दोष ब्रह्मचर्य की साधना करने वाले गृहस्थ जोड़े को आहार कराने का प्रायश्चित्त दिया। (इतना बड़ा प्रायश्चित्त इस बात का प्रतीक है कि इतनी बड़ी हिंसा होती है)
  • अहिंसा धर्म का पालन करके आप अपनी आत्मा को पवित्र कर सकते हैं।
  • मेक पर्वत के बराबर स्वर्ण दान से अधिक पुण्य संचय का कारण एक जीव की रक्षा में है।
  • जो जीवाणुओं को निरादर से फेंकता है, वह भव-भव में दुर्भग्ग युक्त, मलिन, कुटुम्ब रहित, दरिद्री, रोगी, धन से रहित, पापी होता है।

पानी छानते समय ध्यान देने योग्य बातें -

  1. जिन बर्तनों (टंकी, घड़ा, बाल्टी आदि) में पानी भरना है उनको अच्छा रगड़ कर धोवें ताकि साबुन, राख, गर्द आदि जिससे उनको साफ़ किया है, वह अच्छी तरह निकल जावे।
  2. इन बर्तनों को सबसे पहले भी छने पानी से ही धोवें ताकि उसमें बिना छने पानी का अंश भी नहीं बचे। अन्यथा तीन-चार बार भी छने पानी से धोने पर भी बिना छने पानी का अंश समाप्त नहीं है, छना पानी भी बिना छना ही रहेगा।
  3. छना बड़ा रखे ताकि पानी छानते समय छना घड़े के अन्दर नहीं गिर जावे, नहीं तो पूरा पानी अनछना हो जावेगा।
  4. पानी छानकर छने को छने पानी से ही धोवें, अनछने पानी से नहीं, अनछने पानी में तो जीव हैं ही उससे छने के ऊपर आये जीवों की रक्षा कैसे हो सकती है? ऐसा करने में पानी छानने से कोई लाभ ही नहीं है।
  5. छना छेद वाला, पीला, फटा हुआ तथा ज्यादा पतला नहीं हो साफ़ सफ़ेद हो।
  6. चूड़ी, रूमाल, टावेल या जिस किसी कपड़े से पानी नहीं छाने, क्योंकि चूड़ी आदि से नाक, आँख, पसीना, हाथ आदि पोंछ लेते हैं, उससे सभी बैक्टीरिया, पसीना आदि पानी में मिल जाते हैं, ऐसे कपड़ों से पानी नहीं छाने।

17. चमड़े को पहचानें

आजकल चमड़े तथा बिना चमड़े वाले अर्थात् सिंथेटिक बेल्ट आदि का रंग रूप एक जैसा ही दिखाई देता है। मूल्य की तरफ देखा जाये तो कभी-कभी सिंथेटिक की अपेक्षा चमड़े की वस्तु सस्ती मिल जाती है, कभी-कभी तो चमड़े के बेल्ट वाली पट्टी 40 और 50 रुपये में मिल जाती है। तीसरी बात दुकानदार से पूछने पर वह तो सिंथेटिक को चमड़े की तथा चमड़े की वस्तु को सिंथेटिक कह देता है क्योंकि उसे तो अपना माल बेचने से मतलब रहता है। अतः चमड़े को सही-सही कैसे पहचानें-

  • चमड़े को फोल्ड कर देने पर भी टूटता नहीं है, लोच खाकर सीधा हो जाता है।
  • चमड़े के बीच स्क्रीन पट्टी रहती है उसकी सतह समान नहीं होती है।
  • चमड़े को थोड़ा-सा मोड़ कर सूंघने पर उसमें से बदबू आती है।
  • चमड़े के बेल्ट आदि के नीचे का भाग रेशेदार होता है, उसमें सपोर्ट के लिए कपड़ा आदि नहीं लगा रहता है।
  • चमड़े को थोड़ा-सा टुकड़ा भी जलाकर देखें तो उसमें से बाल जलाने जैसी गंध आती है।
  • चमड़े में प्रतिपल अनंत जीव उत्पन्न होते रहते हैं, वे सब हमारे हाथ-पैर आदि की रगड़ से मरते ही रहते हैं।

फल -

  • हम वर्षों में माप एक बेल्ट खरीदते हैं, फिर भी हमें कलखानों में मारे जाने वाले पशुओं की हत्या का पाप लगता ही है।
  • जिसका चमड़े का बेल्ट-पर्स आदि बना है, उसके शरीर में जितने रोम छिद्र होंगे, उतने करोड़ वर्ष तक उस बेल्ट आदि का उपयोग करने वाले को नरक में कोड़ों की मार आदि की वेदना भोगनी होगी।

18. विजयदशमी

प्रतिवर्ष आसोज (कुंवार) महीने के शुक्लपक्ष की दशमी को हमारा पूरा देश हर्षोल्लास सहित मनाता है। हिन्दू धर्म में इस दिन रामचन्द्रजी ने रावण को युद्ध में मारकर विजय प्राप्त की थी तथा सीता को प्राप्त किया था।

जैनधर्म में इस दिन सर्वप्रथम छहखण्डों को जीतकर चक्रवर्ती भरत ने अयोध्या नगरी में प्रवेश किया था। चक्रवर्ती भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम भारत घोषित हुआ था। चक्रवर्ती भरत ने दीक्षा लेते ही संसार के कारणभूत चार गतियां कर्मों को नष्ट कर दिया था, इसलिए इस दिन को विजयदशमी के नाम से प्रसिद्धि मिली है।

दोनों ही धर्मों में विजय का प्रारम्भ होने से इस दिन में शुरू किया गया प्रत्येक कार्य सफल होता है। इस दिन कार्य प्रारम्भ करने लिए मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता नहीं होती है।

लोगों ने इसको दशहरा नाम दिया, क्योंकि रावण का नाम दशानन था, उसका हरा अर्थात् मरण आज हुआ। किसी की हत्या अथवा मरण कोई अच्छा काम तो नहीं हो सकता है वह कोई अच्छा मुहूर्त भी नहीं हो सकता, जिसमें कोई मरा हो। इसलिए मंगलमय तो विजयदशमी हुई दशहरा नहीं। खुशी में किसी का पुतला तो नहीं जलाया जा सकता है खुशियों में लड्डू खिलाये जाते हैं फिर हम रावण का पुतला क्यों जलायें?

पुतला जलाने से हानि -

  • पुतला जलाने से हत्या के भाव उत्पन्न होते हैं, जिससे हत्या का ही पाप लगता है।
  • किसी को मारने के भाव से भव-भव में भी किसी के हाथ से मारे जाते हैं।
  • रावण में भरे जाने वाले पटाखे आदि से अनावश्यक हिंसा एवं धन की बर्बादी होती है।

19. संकल्पो हिंसा

चित्र वाले वस्त्र पहनने / रखने से उनको धोना, कूटना, निचोड़ना, प्रेस करना आदि कार्य करने पड़ते हैं, इससे उन जीवों को ही एक प्रकार से कूटने, धोने का पाप लगता है। दूसरी बात उन कपड़ों को पहनकर खिड़ाकर यदि सो रहे हैं तो छिपकली आदि जीव-जन्तु उनको सही जीव समझ कर उनको खाने के लिए झपटते हैं, उस समय जीव के स्थान पर उन वस्त्रों पर सोने वाले पहनने वाले को ही काट लेते हैं, कभी-कभी तो इन जानवरों का जहर चढ़ जाने से मृत्यु भी हो सकती है।
टेंटू लगाने से शरीर के जिस स्थान पर टेंटू लगाया है, उस स्थान की चमड़ी के सेल्स नष्ट हो जाने से भविष्य में यदि उस स्थान से ब्लड लेने की आवश्यकता पड़ी तो नहीं ले सकते हैं।
टेंटू लगाने से भी उपर्युक्त घटनाएँ घट सकती हैं।
टॉफी, बिस्कुट, चमई की मिठाई आदि में यदि जीव-जन्तुओं की आकृतियाँ बनी रहती हैं, उनको खाते समय बच्चे आदि यही कहते हैं, मैंने आज शेर खाया। हाथी, ऊँट खाया आदि। ऐसी वस्तुएँ खाने से माँसाहार के संस्कार पुष्ट होते हैं। सज्जन समझदार व्यक्ति को पकौड़ी आदि खाते समय यदि किसी चीज से ऐसा विकल्प हो जाये कि यह मछली, माँस या अण्डे जैसा लग रहा है, यह उस जानवर जैसा लग रहा है तो वे उस वस्तु को तत्काल छोड़ देते हैं, भोजन ही छोड़कर उठ जाते हैं। कई लोग भोजन के समय माँस आदि का नाम सुनकर भोजन छोड़ देते हैं तो इस प्रकार की आकृति वाली चीजें खाने में क्या संकल्पो हिंसा नहीं होगी?

20. कर्म फल

  • इस दुनियाँ में कोई भी ईश्वर या परमात्मा नहीं है, जो हमें सुखी और दुखी बनाता हो बल्कि हम ही जैसा अच्छा अथवा बुरा कार्य करते हैं, उसके पुण्य फल में सुख तथा पाप फल में दुख मिलता है।

  • जो व्यक्ति भक्ति पूर्वक जिनेन्द्र भगवान अथवा मुनिराजों का पूजन करता है, स्तोत्र पाठ पढ़ता है, वह अत्यन्त रूपवान सुंदर बनता है। उसकी तृष्णा (तीव्र लालसा) कम हो जाती है एवं उसे मनवांछित फलों की प्राप्ति होती है।

  • देव-शास्त्र-गुरु को विनय पूर्वक नमस्कार करने से उच्च गोत्र अर्थात् अच्छे कुल में जन्म होता है।

  • मुनियों को दान देने से दाता प्रसिद्धि ख्याति को प्राप्त होता है, लोग उसका आदर सम्मान करते हैं।

  • दूसरों का उपकार करने वाला सुख-शांतिमय जीवन व्यतीत करता है, अगले भव में स्वर्ग-सम्पदा को प्राप्त करता है।

  • हिंसा करके जीव नरकों में जाकर अनेक प्रकार छेदन-भेदन आदि के दुःखों को प्राप्त करता है।

  • झूठ बोलने वाला मतिभ्रंद, तोतला बनता है, उसे मुख सम्बन्धी अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। नरक में भी बहुत पीड़ा होती है।

  • चोरी करने वाला गरीब, अंगहीन बनता है, उसका कोई सम्मान नहीं करता, उसे सदा तिरस्कार मिलता है।

  • कुशील अर्थात् गाली बकने से, लोक निंद्य आचरण करने से शरीर रोगी बनता है। पेड़-पौधों की पर्याय में जन्म लेना पड़ता है, नरकों में भी उसे अनेक भयंकर दुख सहने पड़ते हैं।

  • अधिक परिग्रह जोड़कर रखने वाला हमेशा टेंशन (तनाव) में रहता है, मरकर सर्प बनता है। तथा नरक में भयंकर यातनाएँ सहन करनी पड़ती है।

21. यह भी हिंसा है

  • मैं तेरे दाँत तोड़ दूँगा, जमीन में गाड़ दूँगा, सिर काट डालूँगा, हाथ-पैर तोड़ दूँगा आदि कहना भी हिंसा है।
  • किसी बीमार-तड़फते, बहुत दिनों से बिस्तर पकड़े हुए व्यक्ति के लिए भगवान से मरने की प्रार्थना करना भी हिंसा है।
  • जन्मते ही मर जाता तो अच्छा था! हे भगवान्! ये कब मरेगा, ये जल्दी मर जावे तो हम साता से जीवे। इस प्रकार विचार करना भी हिंसा है।
  • हे भगवान्! अब तो मुझे या इसको उठा ले, भगवान् मुझे कब उठायेगा, परेशान होकर ऐसे विचार करना भी हिंसा है।
  • कोई बहुत दिन से बीमार है, दुखी है उसके मर जाने पर अच्छा हुआ बेचारा बहुत दुखी था सुखी हो गया यह सोचना का कहना भी हिंसा है।
  • पागल कुत्ते आदि को मारने, भगाने आदि के लिए कहना या मरने पर खुश हो जाना भी हिंसा है।
  • देवी-देवता, धर्म-पुण्य आदि के लिए मुर्गा, बकरा आदि की बली चढ़ाना भी हिंसा है।
  • बीमारी को ठीक करने, दूसरे की भूख मिटाने अथवा दूसरे को संतुष्ट करने के लिए किसी को मारना भी हिंसा है।
  • क्लेश, लड़ाई, झगड़ा, सांसारिक प्रपंचों से बचने के लिए आत्महत्या कर लेना बहुत बड़ी हिंसा है।

22. सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य

सम्राट् चन्द्रगुप्त पूर्व भव में एक निर्धन परिवार में जन्मे थे। वे बहुत सीधे-साधे भोले-भाले बालक थे। उनमें व्यापार-व्यवसाय करने तक की बुद्धि नहीं थी। इस कारण माता-पिता, भाई-बन्धुओं ने उन्हें घर से निकाल दिया था। वे इधर-उधर भटकते-भटकते एक गाँव में पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक लकड़हारे के यहाँ नौकरी की। वे लकड़हारे के साथ लकड़ी काटकर लाने में बदले में लकड़हारा उन्हें रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था कर देता था। लकड़हारे के साथ रहने से वह लकड़ी काटना तो सीख गए लेकिन लकड़ी बेचना नहीं सीख पाये।

एक दिन उनको नियमित बनाकर लकड़हारे ने अपनी पत्नी को मारा। लकड़हारे को मारते देख उनको बहुत बुरा लगा। वे नौकरी छोड़कर स्वयं लकड़ी काटकर बाजार में बेचने के लिए ले गए। व्यापार करना नहीं आने के कारण दो-तीन दिन तक भी उनकी लकड़ी नहीं बिकी। पैसों के अभाव में वे तीन दिन तक भूखे रहे। भूख के कारण उनका किसी भी कार्य में मन नहीं लग रहा था। चौथे दिन पुनः वे लकड़ी बेचने के लिए बाजार में बैठे थे तभी उन्होंने एक नग्न दिगम्बर साधु को देखा। साधु को देखकर उन्होंने सोचा-अहो, इनके पास तो पहनने के लिए एक लंगोटी भी नहीं है, इन्हें देखकर लगता है कि ये बहुत दिनों से भूखे-प्यासे हैं, क्या इनके घर-बार, बाल-बच्चे, पत्नी आदि कोई नहीं है, ये अकेले ही हाथ में ये मयूर पंख एवं कुण्डी लेकर कहाँ जा रहे हैं। मैं भी इनके पीछे-पीछे चलकर देखता हूँ, ये कहाँ जाते हैं, क्या करते हैं आदि…। मन में इस प्रकार के विचार करते-करते वे उनके पीछे चल दिए।

उन्होंने जब शहर में मुनिराज को बड़े-बड़े सेठ-साहूकारों ने सम्मान पूर्वक भोजन के लिए आह्वान करते हुए देखा तो आश्चर्यचकित हो गए। मुनिराज एक परिवार के सामने जाकर खड़े हो गए। सेठ ने मुनिराज का जैसा-जैसा सम्मान किया, देखते रहे और मुनिराज के साथ वे भी उस सेठ के घर पहुँच गए। जब मुनिराज आहार करके वन में चले गए। तब सेठ ने उनको (चन्द्रगुप्त के जीव को भी) सम्मान पूर्वक सुस्वादु भोजन करवाया। उस भोजन से सन्तुष्ट होकर उन्होंने मुनिराज के चरणों में अपना जीवन समर्पित कर दिया। वे मुनि बन गए। जब उनको तीन दिन की आयु बची। उन्होंने समाधि-मरण किया। फलतः वहाँ आकर सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य हुए। एक बार गुरु दर्शन एवं गुरु चरणों में समर्पित होने से उन्हें इतना बड़ा राज्य मिला तथा भविष्य में मोक्षपुरी का राज्य भी अवश्य मिलेगा।

23. सीखें: सभ्यताएँ

  • रास्ते में सड़क पर थूँकना, नाक साफ़ करना, पान आदि का पीक डालना आदि अच्छे काम नहीं हैं, क्योंकि कफ आदि को देखकर ग्लानि आती है, उल्टी का मन होने लगता है इसलिए यदि थूँकना पड़े तो सड़क के एक साइड में थूँककर उस पर धूल आदि डाल देना चाहिए ताकि मक्खी, मच्छर आदि उस पर चिपकर कर नहीं मरें और किसी को ग्लानि भी नहीं आवे।
  • अपने परिचित, रिश्तेदार, अध्यापक, मित्र, अड़ोस-पड़ोस आदि मिलें तो अभिवादन, नमस्ते, जयजिनेन्द्र आदि अवश्य करना चाहिए।
  • सड़ी हुई सुधार कर छिलके, कचरा, सड़े-गले-सब्जियाँ, बची साग-सब्जी, रोटी आदि जहाँ कहीं नहीं फेंकना चाहिए। जहाँ उनको डालने का स्थान है वहीं डालना चाहिए।
  • दो या अधिक लोग बात कर रहे हों तो बिना पूछे बीच में नहीं बोलना चाहिए।
  • अपनी हैल्थ-डाइट का विचार न करके अति चुस्त या अति ढीले जोकर जैसे कपड़े अथवा अति फैशन वाले कपड़े जिनको देखकर हँसी भी आवे और शर्म भी, ऐसे वस्त्राभूषण नहीं पहनने चाहिए।
  • जिससे हम बात कर रहे हैं उसकी पोस्ट, आयु आदि को नहीं देखते हुए जैसे-तैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • बाजार के बीच में खड़े-खड़े बात करना, टट्टूओं की हँसी करना, मजाक करते-करते लोगों के बीच में से निकलना, जहाँ कहीं पर खड़े-खड़े खाना असभ्यता है।
  • छींकने, उबासी लेते, खाँसते समय मुँह पर हाथ अवश्य लगाना चाहिए क्योंकि छींक आदि के साथ निकलने वाली वायु में करोड़ों बैक्टीरिया होते हैं। जो हाथ नहीं लगाने पर पास में बैठने वाले के शरीर में पहुँच जाते हैं।
  • बड़ों के सामने गैस पास करना, नाक साफ़ करना आदि सब असभ्यताएँ हैं, इन सब कार्यों को करते समय सावधानी रखना चाहिए।

24. धार्मिक स्थल पर क्या नहीं करें?

अन्तं क्षेमे कृतं पापं धर्म क्षेत्रे विनश्यति।
धर्म क्षेत्रे कृतं पापं वज्र लेपो भविष्यति॥

धार्मिक स्थल-भगवान का मंदिर, धार्मिक पुरुष-गुरु। जहाँ भगवान् को विराजमान करके धार्मिक अनुष्ठान किए जा रहे हैं वहाँ हमें श्रद्धा-तन्मयता दिखाई नहीं करना चाहिए, क्योंकि वहाँ पर किया हुआ छोटा-सा पाप भी बहुत बड़े रूप में फलता है अर्थात् राई के दाने के बराबर पाप भी पहाड़ के बराबर होकर फल देता है, क्योंकि अन्य स्थान पर किए गए पापों को हम धार्मिक स्थल अर्थात् जिनेन्द्र भगवान् और गुरु के सामने प्रायश्चित लेकर धो सकते हैं, लेकिन उन्हीं के सामने पाप करने का अर्थ है जेलर की जेब काटना अर्थात् चोरी करने से कोई जेल में बन्द कर दिया गया वह यदि जेल में रहते हुए जेलर की ही जेब से चोरी करता है तो उसकी सजा कभी माफ़ नहीं होती, उसी प्रकार भगवान्। गुरु के सामने किए गए पाप कभी माफ़ नहीं होते।
भगवान् के मंदिर में क्या नहीं करें?

  • बिना प्रयोजन की अर्थात् इधर-उधर की ऐसी-वैसी बातें नहीं करें।
  • मंदिर में खाना-खेलना, हँसी-मजाक करना, पानी आदि पीना भी बड़ा पाप है।
  • मंदिर में मोबाइल करना-सुनना, नम्बर देना-लेना आदि नहीं करें।
  • मंदिर में पंखा, कूलर चलाना, उसकी हवा में बैठना, सोना आदि न करें।
  • मंदिर में से चीज उठाकर न स्वयं खाये और न दूसरे को खिलावे।

25. राम कहानी

  • राम अयोध्या के राजा दशरथ और कौशल्या के पुत्र थे। इनके दूसरी माताओं से जन्मे भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न ये तीन भाई प्रमुख थे।
  • राम का विवाह स्वयंवर विधि से राजा जनक की पुत्री सीता से हुआ था।
  • राजा दशरथ ने कैकई को वचन दिया था सो उनके वचनों की रक्षा हेतु राम स्वयं ही राज्य छोड़कर वनवास चले गए थे, उनके साथ सीता और लक्ष्मण भी गए थे।
  • राम के बन जाने पर राजा दशरथ ने मुनि दीक्षा धारण की थी।
  • राक्षस वंश में उत्पन्न विद्याधर रावण ने सीता का हरण किया था।
  • वानरवंशी हनुमान सुंदर विद्याधर पुरुष थे, जो आकाश में यहाँ-वहाँ उड़कर अथवा विमान से जाने की क्षमता रखते थे, उन्होंने सीता की खोज की एवं सीता की प्राप्ति में सहयोग प्रदान किया।
  • लक्ष्मण (नारायण) ने रावण (प्रतिनारायण) का वध किया था। युद्ध जीतने के पश्चात् राम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया।
  • राम एवं सीता के युगल पुत्रों का नाम अनंगलवण एवं मदनकुश था, जिन्हें संक्षिप्त में लव-कुश कहते थे।
  • अग्निपरीक्षा देने के पश्चात् वैराग्य-भावों से भरी सीताजी ने पृथ्वीमति आर्यिका से आर्यिका के व्रतों को धारण किया और घोर तपश्चरण करते हुए सोलहवें स्वर्ग में प्रतीन्द्र नामक देव बनीं।
  • लक्ष्मण के मरण के पश्चात् राम ने भी मुनि दीक्षा धारण की एवं तीर्थंगिरी, मांगीतुंगी सिद्ध क्षेत्र से मोक्ष पद प्राप्त किया।

26. अजान फल

चार मित्र घूमने निकले। घूमते-घूमते नगर से बाहर वे बहुत दूर पहुँच गए। वहाँ उन्हें जोरों की भूख लगने लगी किन्तु खाने-पीने का कुछ सामान पास न होने पर वे यहाँ-वहाँ कोई फल मिल जाए ढूँढ़ने लगे। तभी एक पेड़ पर लाल रंग के बड़े-बड़े फल उन्होंने देखे।

एक मित्र कहने लगा चलो इन्हें तोड़कर खाएँ। तभी दूसरे मित्र ने पूछा - क्या तुम जानते हो यह कौन-सा फल है, नहीं जानते पहले मित्र ने कहा - नहीं, लेकिन अच्छे लग रहे हैं, चक्कर ही देख लेते हैं। दूसरे मित्र ने कहा - भाई हमारी पाठशाला में हमें मैयाजी ने बताया था कि कभी भी अजान फल नहीं खाना अतः मैं तो इन फलों को नहीं खाऊँगा, तभी सभी मित्र कहने लगे तुझे नहीं खाना तो मत खा, हमें तो भूख लगी है हम तो खाएँगे। उन्होंने फल तोड़े उन्हें खाया तो वे मीठे भी लगे तब उन्होंने मित्र से कहा - ये बहुत मीठे हैं तू भी खा ले, लेकिन उसने अपने नियम का ध्यान रखते हुए खाने से मना कर दिया। वापस घर पहुँचते ही तीनों मित्रों के पेट में बहुत जोरों से दर्द हुआ, खून की उल्टी होने लगी डॉक्टर के पास उन्हें ले जाया गया, तब डॉक्टर ने बताया इन्होंने जहरीले फलों को खाया है उनमें दो को तो बचा लिया गया किन्तु एक जिसने तीन चार फल खाये थे, वह मर गया। शेष दोनों मित्रों को अपनी गलती का अहसास हुआ एवं उन्होंने भी हमेशा के लिए अजान फल का त्याग कर दिया।

अतः जिस फल या पदार्थ का हमें ज्ञान न हो अथवा जिस खाद्य सामग्री के बनने की प्रक्रिया उसमें मिश्रित अन्य पदार्थों की सही-सही जानकारी हमें न हो, ऐसे पदार्थ कभी नहीं खाना चाहिए। बाजार के खाद्य पदार्थों में अनेक प्रकार के अखाद्य पदार्थों अण्डा, माँस, चर्बी, जिलेटिन, प्राणिजन्य आदि पदार्थ मिलाये जा रहे हैं, जिन्हें हमें जानकर अपने धर्म की रक्षा करते हुए अभक्ष्य-भक्षण से बचना चाहिए।

27. मितव्ययता

लाला लापतराय बहुत बड़े दानी-परोपकारी व्यक्ति थे। एक दिन किसी संस्था का एक व्यक्ति अपनी संस्था हेतु यहाँ दानराशि लेने के लिए पहुँचा। सर्वप्रथम उसको लालाजी से ही भेंट हो गई। लालाजी उसे सम्मानपूर्वक अपनी बैठक में ले जा रहे थे।

बैठक के रास्ते में कुछ अंधेरा था। उनका एक नौकर मार्ग दिखाने के लिए लालटेन जला रहा था। उसने माचिस की एक तिली जलाई लेकिन प्रमाद के कारण उस तिली से वह लालटेन नहीं जला पाया। तिली बुझ गई। लालाजी ने उसको डाँट दिया- मुझे ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता नहीं है जो एक बार लालटेन जलाने के लिए दो तिलियाँ खराब करता हो, जो इतनी सावधानी भी नहीं रख सकता हो।

यह सब देख संस्था के व्यक्ति को अपनी आशाओं पर पानी फिरता नजर आया। “यह लाला इतना कंजूस है, हमारी क्या सहायता कर सकता है?” यह सोचता हुआ उनके पीछे-पीछे जा रहा था। उसे जी में उसे और नौकर को अपने साथ भोजन करवाया तथा कुछ देर आराम करने के बाद अपने आने का कारण पूछा। संस्था के व्यक्ति ने कहा- “लालाजी! मैंने आपके बारे में बहुत सुना था इसलिए आशा लेकर आया था लेकिन मेरी आशा आपके यहाँ पूरी नहीं हो सकती।” …? लालाजी ने कहा- “क्यों आप क्या आशा, लेकर आये थे और किस कारण से आपकी आशा पूरी नहीं हो सकती ?” उस व्यक्ति ने कहा- “हमने परोपकार के लिए एक संस्था की स्थापना की है, उसमें आपके कुछ सहयोग लेने की आशा लेकर आया था लेकिन …” यह बात पूरी नहीं कर पाया था कि लाला ने चेक निकालकर दे दिया। चेक में भरी रकम देख वह आश्चर्यचकित हो गया। उसने कहा- “मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ।” लाला ने कहा- “अवश्य पूछिये।” उस व्यक्ति ने कहा- “आपने एक तिली के लिए नौकर को इतना डाँटा ?” लाला ने उत्तर दिया, मैं बिना प्रयोजन, अनावश्यक, बिना धैर्य की चीज भी खर्च नहीं कर सकता, न किसी को ऐसा करते हुए देख सकता हूँ और आवश्यकता पड़ने पर/आवश्यक चीज के लिए लाखों रुपये भी खर्च करने में पीछे नहीं हटता, मना नहीं करता हूँ। उसने प्रमाद से अनावश्यक एक तिली ज्यादा जलाई, इसलिए मैंने उसको डाँटा था। संस्था के प्रचारक की पूरी बात समझ में आ गई। उसने भी लाला लापतराय से मितव्ययता की शिक्षा ली।

सारांश : मितव्ययता देश, समाज, घर आदि सभी स्थानों पर आवश्यक एवं हितकारी है। यदि भारत का हर व्यक्ति मितव्ययता का सूत्र सीख ले तो आज भी भारत सोने की चिड़िया है और सब का गुरु भी है।

28. अहिंसा का प्रभाव

दीवान अमरचन्द्र व्रती श्रावक थे। उन्होंने मांस खाने और खिलाने का त्याग कर रखा था। चिड़िया घर के शेर को मांस खिलाने के लिये खर्च देने से इंकार कर दिया। चिड़ियाघर के कर्मचारियों ने कहा- शेर का भोजन तो मांस ही है यदि नहीं दिया जायेगा तो वह भूखा मर जायेगा। दीवान साहब ने कहा भूख मिटाने के लिये उसे मिठाई खिलाओ। उन्होंने कहा शेर मिठाई नहीं खाता। दीवान अमरचन्द्र ने कहा हम खिलायेंगे। वह मिठाई का थाल लेकर कई दिन भूखे शेर के पिंजरे में भय रहित घुस गये और शेर से कहा कि यदि भूख शांत करनी है तो यह मिठाई भी तेरे लिये उपयोगी है और कहा यदि मांस ही खाना है तो मैं खड़ा हूँ मेरा मांस खालो। शेर भी तो आखिर जीव ही था दीवान साहब की निर्भयता और अहिंसामयी प्रेमवाणी का उस पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि उसने सबको चकित करते हुए शांत भाव से मिठाई खाली। इस प्रकार दयामय परिणाम के द्वारा क्या संभव नहीं है सब कुछ संभव है। इस अहिंसा धर्म का सहारा लेकर ही तो महात्मा गांधी भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करा सके।

29. नारे

औरो के दुःख दूर करेंगे।
बाद में दूजा काम है करना।
णामोकार ही एक सहारा।
जिनदर्शन से मिले किनारा।
सच्चे जैनी तुम बन जाओ।
पूजन कर सारे सुख पाओ।
स्वर्ग सम्पदा पाएगा।
कर्म काट भगवान बनेगा।
सदा सुखों से रहते हैं।
तीर्थंकर का पद धरते हैं।
सुख का गेट वो खोलेगा।
नरक निगोद में जाएगा।
जीवन भर सुख पायेगा।
उसका खून जलाता है।
बंदर वो ही बनेगा।
रोगी जीवन जियेगा।
रो रो कर ही जीता है।
पाप बहुत कमायेगा।
नरकों में पीटे जाते हैं।
जहर साथ में खाते हैं।
जेल में वो पड़ेगा।
भिखारी वो बन जायेगा।

णामोकार का पाठ करेंगे
जिसने अंजन चोर को तारा
जिनदर्शन ही एक सहारा
प्रतिदिन दर्शन करने जाओ
अष्ट द्रव्य ले मंदिर जाओ
मंदिर जो नित आएगा
जिनपूजन अभिषेक करेगा
दान चार जो देते हैं
तीर्थवंदना जो करते हैं
सदा सत्य जो बोलेगा
रात में जो भी खाएगा
जो पाऊच मसाला खाएगा
गुस्सा जो भी करता है
नकल जो भी करेगा
जो अनछना पानी पियेगा
शराब जो भी पीता है
होटल में जो खाएगा
मांस जो भी खाते हैं
नेलपालिस जो लगाते हैं
चोरी जो भी करेगा
जुआओ जो भी खेलेगा

इष्ट प्रार्थना

हमारे कष्ट मिट जाये, नहीं यह भावना स्वामी।
डरे न संकटों से हम, यही है भावना स्वामी ॥1॥

हमारा भार घट जाये, नहीं यह भावना स्वामी।
किसी पर भार न हों हम, यही है भावना स्वामी ॥2॥

फले आशा सभी मन की, नहीं यह भावना स्वामी।
निराशा हो न अपने से, यही है भावना स्वामी ॥3॥

बढ़े धन सम्पदा भारी, नहीं यह भावना स्वामी।
रहे संतोष थोड़े में, यही है भावना स्वामी ॥4॥

दुःखों में साथ दे कोई, नहीं यह भावना स्वामी।
बनें सक्षम स्वयं ही हम, यही है भावना स्वामी ॥5॥

दुःखी हों दुष्ट जन सारे, नहीं यह भावना स्वामी।
सभी दुर्जन बनें सज्जन, यही है भावना स्वामी ॥6॥

मनोरंजन हमारा हो, नहीं यह भावना स्वामी।
मनोभंजन हमारा हो, यही है भावना स्वामी ॥7॥

रहे सुख शांति जीवन में, नहीं यह भावना स्वामी।
न जीवन में असंयम हो, यही है भावना स्वामी ॥8॥

फले फूले नहीं कोई, नहीं यह भावना स्वामी।
सभी पर प्रेम हो उर में, यही है भावना स्वामी ॥9॥

दुःखों में आपको ध्यायें, नहीं यह भावना स्वामी।
कभी न आपको भूलें, यही है भावना स्वामी ॥10॥

आदिनाथ भगवान
का
निर्वाण
स्थान
७२ जिनालय
भरत जी द्वारा निर्मित
बाली मुनि
रावण
श्री कैलाश गिरी जी
महाक्षेत्र

स्रोत: Gyata संग्रह।

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