दशलक्षण महापर्व (दसलक्षण वाक्य 1)
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अनुक्रमणिका
दश लक्षण महापर्व
“उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः।”
उत्तम क्षमा
उत्तम मार्दव
उत्तम आर्जव
उत्तम शौच
उत्तम सत्य
उत्तम संयम
उत्तम त्याग
उत्तम तप
उत्तम आकिंचन्य
उत्तम ब्रह्मचर्य
उत्तम क्षमा
Supreme Forgiveness
उत्तम मार्दव
Tenderness
or Humility
उत्तम आर्जव
Straight-forwardness
or Honesty
उत्तम शौच
Contentment
or Purity
उत्तम सत्य
Truthfulness
उत्तम संयम
Self-restraint
उत्तम त्याग
Renunciation
उत्तम तप
Penance or
Austerities
उत्तम आकिंचन्य
Non-attachment
उत्तम ब्रह्मचर्य
Chastity or
celibacy
धर्म के
दशलक्षण
(Ten Virtues)
Supreme Forgiveness
Supreme Tenderness
Supreme Honesty
Supreme Contentment
Supreme Truthfulness
Supreme Self-restraint
Supreme Renunciation
Supreme Austerities
Supreme Non-attachment
Supreme Chastity
#DasLakshanParv
#00
#AadhyatmikPrayogshala
Uttama Kshama - Supreme Forgiveness
(To observe tolerance whole-heartedly, shunning anger.)
उत्तम क्षमा धर्म
उत्तम क्षमा जहाँ मन होई, अन्तर-बाहिर शत्रु न कोई।
Anger makes a man blind and maddens him, for ‘when eyes are blood shot, vision is limited’. Overpowered by anger, a man may commit anything right or wrong, and fails to make distinction between proper and improper, truth or untruth, and good or bad.
क्रोध प्राणियों के अंतरंग और बाह्य को अनेक तरह से ऐसा जलाता है कि उसका कोई प्रतिकार नहीं है। अतः क्रोध कोई एक अपूर्व अग्नि है, क्योंकि अग्नि तो बाह्य को ही जलाती है किन्तु यह अन्तरंग को भी जलाता है। जन्म-जन्म में निर्लज्ज होकर अनिष्टों का करने वाला होने से क्रोध कोई एक अपूर्व गृह या भूत है क्योंकि भूत तो एक ही ऊँ जन्म में अनिष्ट करता है। उस क्रोध का विनाश करने के लिए क्षमा रूपी देवी की आराधना करनी चाहिए जो जिनागम के अर्थ और ज्ञान के उल्लास का कारण है।
- इतना काल बीत जाने पर भी भरत चक्रवर्ती के द्वारा अपने छोटे भाई बाहुबली कुमार पर किये गए क्रोध से अर्जित अपयश लुप्त नहीं हुआ है, बराबर छाया हुआ है।
- इसी लोक में केवल एक बार अपने बड़े भाई कमठ पर वमन किये गए क्रोधरूपी विष ने पार्श्वनाथ के पूर्वभव के जीव मरुभूति को बार बार अत्यंत संतम किया।
- द्वीपायन नामक तपस्वी क्रोध से द्वारिका नगरी को जला कर नरक में गया।
जो अपराधियों का तत्काल प्रतिकार करने में समर्थ होते हुए भी उन्हें क्षमा कर देता है, क्षमा रूपी अमृत का सम्यक् सेवन करने वाले साधुजन उसे पाप का नाशक कहते हैं।
क्षमा के आराधक सन्तों को नमस्कार हो।
#DasLakshanParv
#01
#AadhyatmikPrayogshala
Uttama Mardava - Tenderness or Humility
(To observe the virtue of humility subduing vanity and passions.)
उत्तम मार्दव धर्म
उत्तम मार्दव विनय प्रकासे, नाना भेद ज्ञान सब भासे।
The fools who spend money to earn honor and glory will after death be born as elephants with their trunks hanging down to the earth.
दैव रूपी शिल्पी द्वारा बनाए गए कुल जाति आदि के उत्कर्ष से होने वाली हर्ष रूपी लहरों के द्वारा भाग्यहीनों का हृदय रूपी समुद्र जीवन पर्यंत भले ही नाना रूप होवे, इससे अपने को पुरुष मानने वालों के किसी भी विषय में “मैं इसमें उत्कृष्ट हूँ” ऐसी सम्भावना होती है, किन्तु यह अपने पुत्र के द्वारा भी मान की हानि देखी जाती है। इसलिए उस ओर प्रवृत्ति करनी चाहिए जहाँ दैव का भी प्रवेश नहीं है। अतः पुरुष को माहात्म्य से भ्रष्ट करने वाले इस मान को धिक्कार है।
- मान से सम्राट भरत के पुत्र अर्कीर्ति का सब और अपयश के साथ अपमान का विस्तार हुआ।
- मान के कारण अभिषेतु नामक देव ने सागर चक्रवर्ती के सात हजार पुत्रों को मायामयी भस्म के रूप में परिणत कर दिया।
- जैसे चक्रवर्ती भरत ने बाहुबली मुनिराज को मानरूपी भूत से छुड़ाया उसी तरह साधु को भी अभिमान के चंगुल में फँसे मनुष्यों को शीघ्र ही छुड़ाना चाहिए तथा मार्दव भावना भाते हुए भरत सम्राट की तरह स्वयं भी इस मान का उच्छेदन करके अक्षुद्र्य-मोक्ष को प्राप्त करना चाहिए।
यद्यपि अहंकार या अभिमान बुरे हैं किन्तु अहंकार के कारण जो कर्मक्षय हैं उनको नष्ट करने का संकल्प रूप अभिमान बुरा नहीं है। इस प्रकार का संकल्प करने से साधु अहंकार का मूल से विनाश करने में समर्थ होते हैं।
ऐसे निर्मान मुनि भगवन्तों को नमस्कार हो।
#DasLakshanParv
#02
#AadhyatmikPrayogshala
उत्तम आर्जव धर्म
उत्तम आर्जव कपट मिटावे, दुरगति त्यागी सुगति उपजावे।
जो माया प्रयोजनवश क्रोध आदि के होते हुए भी क्रोधादि नहीं हैं ऐसी प्रतीति कराती है और क्रोध आदि के होते हुए भी क्रोधादि नहीं हैं ऐसी प्रतीति कराती है। तथा गुणों में भी दोष बुद्धि कराती है और दोषों में भी गुण बुद्धि कराती है। तथा जो अत्यन्त सूक्ष्म भी विचारणीय स्थानों को ढंकती हुई विद्या सम्पन्न बुद्धिमानों को भी भ्रम में डाल देती है; यह सब स्वार्थ की महिमा है, और मायाचार उसका सहायक होता है।
वह संसारव्यापी माया सर्वत्र विजयशील है।
संसार मार्ग को बढ़ाने वाली अनन्तानुबन्धी माया ने विष्णु को जो असाधारण कष्ट दिया, जैसा कि लोक में और शास्त्र में कहा है,
वह सज्जनों के हृदय और कानों को करौंत की तरह चीरने वाला है।
“अश्वत्थामा मारा गया” इस प्रकार के वचनों से अपने गुरु द्रोणाचार्य को भुलावने में डालने वाले धर्मराज युधिष्ठिर का मुख तत्काल मलिन हो गया और उन्होंने साधुओं से अपना मुँह छिपा लिया।
जो तीनों लोकों को अपने उदर में रखनेवाली अर्थात् तीनों लोकों को जीतने वाली माया के हृदय को भी विदीर्ण कर देते हैं वे सरल स्वभावी उत्साही लोकोत्तर साधु जयशील होते हैं, उनका पद सबसे उत्कृष्ट होता है।
ऐसे आर्जव धर्म के आराधक सन्तों को नमस्कार हो।
उत्तम सत्य धर्म
उत्तम सत्य-वचन मुख बोले, सो प्राणी संसार न डोले।
जिसमें द्रव्यरूप से नित्य और स्पष्ट ज्ञान के द्वारा जानने योग्य चराचर जगत् के अतीत, अनागत और वर्तमान पर्यायाकार प्रतिबिम्बित होते हैं उस परमब्रह्मस्वरूप होने के लिए जो तत्पर होते हैं उन्हें सनत कहते हैं। और ऐसे संत पुरुषों में जो उपकारी वचन होता है उसे सत्य कहते हैं। परमागम रूपी समुद्र के पारदर्शी धार्मिक पुरुषों को सदा करुणाबुद्धि से सत्य वचन बोलना चाहिए जबतक कि सुनने के इच्छुक जनों का अज्ञान दूर न हो; क्योंकि घोर अज्ञानरूपी विष से पीड़ित जगत् के लिए वह सत्य वचन अद्वितीय उद्बोधक होता है।
राजा वसु ने गुरुपुत्र पर्वत का पक्ष लेकर अजका अर्थ बकरा ही बतलाया अर्थात् बकरे के मांस से ही यज्ञ करना चाहिए। राजा वसु मर कर नरक गया।
सत्यघोष असत्य बोलने से बहुत दुःख को प्राप्त हुआ। तीनों दण्डों को भोगकर वह मरा और तीव्रतोष के कारण राजा के खजाने में अनगढन जाति का सर्प हुआ।
वहाँ भी मरकर दीर्घ संसारी हुआ।
सत्य स्वभावी आत्मा के आश्रय से समस्त प्राणियों को उत्तमार्थ धर्म प्रकट हो और असत्य अभिप्राय को छोड़कर निष्कलंक ध्रुव आत्मतत्व के आश्रय से वीतराग परिणति को सभी धारण करें।
ऐसे उत्तम सत्यधर्म के आराधक सन्तों को नमस्कार हो।
उत्तम शौच धर्म
उत्तम शौच लोभ-परिहारी, सन्तोषी गुण-रत्न भण्डारी।
आत्मा और शरीर में अभेदज्ञान रूप अविद्या के संस्कार से अपने-अपने विषयों का ग्रहण करने में संलग्न इन्द्रियाँ ही अनादिकाल से मेरे लिए शरण थीं।
अतः परद्रव्य की चाह से मैं किस प्रकार नीचे-नीचे जाता रहा।
अब उत्पन्न हुई शरीर और आत्मा के भेदज्ञानरूप विद्या का सारभूत जो संतोषरूप अमृत है, उसके आस्वाद से मेरा तृष्णारूपी विष दूर हो गया है।
अतः अब वही मैं आत्मा में लीन निर्विकल्प निश्चल ध्यान के द्वारा निरंतर ऊपर-ऊपर विहार करता हूँ।
अपने अतिथिभाव में समस्त लोक के वित्त में आश्चर्य पैदा करने वाले ऋषि जमदग्नि को मारकर उनकी कामधेनु ले जाने वाले राजा कार्तवीर्य को जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने क्रुद्ध होकर सेना और सन्तान के साथ मार डाला।
इसपर मंथकार कहते हैं कि उसको मिला यह दण्ड पर्याप्त नहीं था, मानो इसी से लोभ ने उसे बलपूर्वक नरक में डाल दिया।
जिसके प्रसाद से शुद्धोपयोग में निष्क साधुओं को सदा यह चराचर जगत् इंद्रजाल के तुल्य भासमान होता है है उस भगवती निर्लोभता को मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ।
ऐसे शौच धर्म के आराधक मुनिवरों को नमस्कार हो।
Uttama Sanyam - Self-restraint
(To defend all living beings with utmost power in a cosmopolitan spirit.)
उत्तम संयम धर्म
उत्तम संयम पाले ज्ञाता, नर-भव सफल करै, ले साता।
A man should not wait for an appropriate time to observe self-restraint. He should not think that he would practice self-restraint at a later stage of life; because death keeps no calendar.
हे अंतरात्मन्! मन के दोष और आत्मस्वरूप के विचार में चतुर चेतन! यदि तू भगवान् स्वरूप है तो जैसे भ्रमर अथवा मक्खियों के द्वारा पुष्पों से पी-पी कर अगले हुए रस के समान; अथवा जोकों द्वारा घाव में से पी-पी कर पुनः वमन हुए खून के समान, उसी तरह पापमय इन इन्द्रियों के द्वारा अपने-अपने अनुरूप भोग-भोग कर छोड़े हुए इन पाप बंध के कारण, अतएव कुत्सित स्पर्शनादि विषयों को राग-द्वेष बढ़ाते हुए भोगकर क्यों अपने भगवान् स्वरूप संग स्वयं का वध करता है!
- जैसे हाथी बनावटी हथिनी के शरीर को स्पर्श के लिए दौड़ता है और पकड़ लिया जाता है।
- इसी तरह बंसी में लगे मांस के लोभ से मछली फँस जाती है।
- भ्रमर कमल का रस लेने में आसक्त होकर सूर्य के डूब जाने पर कमल में ही बंद हो जाता है।
- पतंगे दीपक की ओर दौड़कर जल मरते हैं।
- शिकारी की गीतध्वनि को सुनकर हिरण मारे जाते हैं।
इस तरह प्रत्येक इन्द्रिय मन की प्रभुशक्ति को प्रतिरोपित करती है।
चारित्र मोह के उदय से यद्यपि तत्वज्ञानी भी भोगों का सेवन करते हैं किन्तु हेय मानते हुए सेवन करते हैं। जब मोह का उदय मंद हो जाता है तो ज्ञान भावना और वैराग्य से इन्द्रियों को वश में करके विरक्त हो जाते हैं।
ऐसे उत्तम संयम के आराधक मुनिवरों को नमस्कार हो।
#DasLakshanParv #06 #AadhyatmikPrayogshala
Uttama Tapa - Penance or Austerities
(To practice austerities putting a check on all worldly allurements.)
उत्तम तप धर्म
उत्तम तप निरवांछित पाले, सो नर करम-शत्रु को टाले।
Suppression of desires to attain the three jewels is called penance. To discard all desires at heart and become absorbed in the real self in order to conquer the karmas is known as penance.
इन्द्रियों के विषय की अभिलाषा छोड़कर तथा द्रव्यहिंसा और भावहिंसा भी सर्वथा परित्याग करके जो साधु निर्मल तप में उद्यत होकर उसी में लीन होता हुआ उस तप की चरम अवस्था ध्यान को प्राप्त होता है और उसी निर्मल तप में लीन होने से उत्पन्न हुए परमानन्द में रमण करता हुआ प्राणों को छोड़ता है वह साधु स्वर्गलोक और मनुष्य लोक के सुखों को भोगकर अर्थात् जीवन्मुक्ति को प्राप्त करके परम मुक्ति को प्राप्त करता है।
बड़ा खेद है कि चेतना का चमत्कार मात्र स्वभाव वाले आपने आत्मा से विमुख होकर और शरीरदिक में ‘यह मैं हूँ’ ऐसा निश्चय करके अनादिकाल से इष्ट विषयों से राग और अनिष्ट विषयों से द्वेष करता आया हूँ। और इसी से पूर्वबद्ध मिथ्यात्व असंयम कषाय और योगरूप चार पौद्गलिक भावों के द्वारा आठ प्रकार के उन प्रसिद्ध ज्ञानावरणादि रूप पौद्गलिक कर्मों का बंध करता आया हूँ। तथा उन मूर्त कर्मों के उदय से उत्पन्न होने वाले अज्ञानमय मिथ्यात्व रागादि भावरूप परिणमन कर-करके इस संसार में आज तक कष्ट उठा रहा हूँ।
तप शब्द का निष्कर्ष है मन, इन्द्रियों और कषायों का तपना अर्थात् इन की प्रवृत्तियों को अच्छी तरह से रोकना। और तप का लक्षण है इच्छा को रोकना और उसे रोकने का उद्देश्य है रत्नत्रय की प्राप्ति।
ऐसे उत्तम तपधर्म के आराधक सन्तों को नमस्कार हो।
#DasLakshanParv #07 #AadhyatmikPrayogshala
Uttama Tyaga - Renunciation
(To practice austerities putting a check on all worldly allurements.)
उत्तम त्याग धर्म
उत्तम त्याग करे जो कोई, भोगभूमि-सुर-शिवसुख होई।
How can rainfall be possible without clouds? How can corn grow without sowing seeds? Likewise, how can the living beings attain bliss without renunciation?
त्याग इस प्रकार जाननाः जिन्होंने धन, सम्पदा आदि परिग्रह को कर्म के उदय जनित पराधीन, विनाशिक, अभिमान को उत्पन्न करनेवाला, तृष्णा को बढ़ाने वाला, राग द्वेष की तीव्रता करने वाला, आरम्भ की तीव्रता करने वाला, हिंसादि पाँच पापों का मूल जानकर इसे अंगीकार ही नहीं किया वे उत्तम पुरुष धन्य हैं।
जिन्होंने इसे अंगीकार करके फिर इसे हलाहल विष समान जानकर जीर्ण तृण की तरह त्याग दिया उनकी भी अविचल्य महिमा है।
- त्याग और शौच में यह अन्तर है कि शक्ति के अनुसार अनियत काल तक परिग्रह की निवृत्ति को त्याग कहते हैं। नियत काल तक सब कुछ त्यागने को कायोत्सर्ग कहते हैं। और कर्म के उदय के वश जो अपने पास में नहीं है उसमें होने वाली लालसा को रोकना शौच है। अर्थात् जो हमें प्राप्त नहीं है उस विषय की तृष्णा को रोकना शौच है। और जो हमारे पास है उसे छोड़ना त्याग है।
दुष्ट विकल्पों का त्याग करो, पापों में प्रवृत्ति का त्याग करो, चार कषायों का त्याग करो, विकथा करने का त्याग करो, दूसरों के सत्य व असत्य दोष कभी नहीं कहो। अन्याय का धन ग्रहण करने का दूर से ही त्याग करो।
ऐसे उत्तम त्यागधर्म के आराधक मुनिवरों को नमस्कार हो।
#DasLakshanParv #08 #AadhyatmikPrayogshala
उत्तम आकिंचन्य धर्म
उत्तम आकिंचन्य व्रत धारे, परम समाधि दशा विस्तारे।
“अपने ज्ञानदर्शनमय स्वरूप के बिना अन्य किंचित्मात्र भी मेरा नहीं है, मैं किसी अन्य द्रव्य का नहीं हूँ”- ऐसे अनुभव को आकिंचन्य धर्म कहते हैं।
हे आत्मन् ! अपने आत्मा को देह से भिन्न, ज्ञानमय, अनुपम, स्पर्श-रस-गंध-वर्ण रहित, अपने स्वाधीन ज्ञानानंद सुख से परिपूर्ण, परम अतीन्द्रिय, भयरहित अनुभव करो। मेरा स्वभाव तो सुख से परिपूर्ण है, परन्तु यहाँ कर्म के आधीन दुःखों से व्याप्त हो रहा हूँ।
मिथ्यात्व नाम के कर्म के उदय से अपने स्वरूप के ज्ञान से रहित होकर देहादि पर-द्रव्यों को अपना स्वरूप जानकर अनन्तकाल से मैंने परिभ्रमण किया है।
परिग्रह सबसे बड़ा पाप है और आकिंचन्य सबसे बड़ा धर्म। जगत् में जितनी भी हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील प्रवृत्तियां देखी जाती हैं- उन सबके मूल में परिग्रह है। जब मोह-राग-द्वेष आदि सभी विकारी भाव परिग्रह हैं तो फिर कौन सा पाप बच जाता है, जो परिग्रह की सीमा में न आ जाता हो।
क्षमा तो क्रोध के अभाव का नाम है, मार्दव मान के, आर्जव माया के तथा शौच लोभ के। पर आकिंचन्यधर्म- क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद- सभी कषायों के अभाव का नाम है। अतः आकिंचन्य सबसे बड़ा धर्म है।
परपदार्थ की छूटने से कोई अपरिग्रही नहीं हो जाता; बल्कि उसके रखने का भाव, उसके प्रति एकत्वबुद्धि या ममत्व परिणाम छोड़ने से परिग्रह छूटता है- आत्मा अपरिग्रही अर्थात् आकिंचन्यधर्म का धनी बनता है।
ऐसे उत्तम आकिंचन्य धर्म के धारक मुनियों को नमस्कार हो।
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म
उत्तम ब्रह्मचर्य मन लावे, नर-सुर सहित मुक्ति-फल पावे।
ब्रह्म शब्द का अर्थ है आत्मा या ज्ञान। उसमें प्रवृत्ति का नाम ब्रह्मचर्य है।
यद्यपि निजआत्मा में लीनता ही ब्रह्मचर्य है; तथापि जबतक हम अपने आत्मा को जानेंगे नहीं, मानेंगे नहीं; तब तक उसमें लीनता कैसे संभव है? इसीलिए कहा भी गया है कि आत्मलीनता अर्थात् सम्यक्चारित्र आत्मज्ञान एवं आत्मश्रद्धा पूर्वक ही होता है।
जबतक पाँचों इन्द्रियों के विषयों में प्रवृत्ति नहीं रुकेगी, तबतक आत्मलीनता नहीं होगी और जबतक आत्मलीनता नहीं होगी तबतक पंचेन्द्रियों के विषयों से प्रवृत्ति का रुकना भी संभव नहीं।
आज मात्र स्पर्शन इन्द्रिय के विषय-सेवन के त्यागरूप व्यवहार ब्रह्मचर्य को ही ब्रह्मचर्य माना जाता है। स्पर्शन इन्द्रिय के भी सम्पूर्ण विषयों के त्याग को नहीं, मात्र एक क्रियाविशेष के त्याग को ही ब्रह्मचर्य कहा जाता है, जबकि स्पर्शन इन्द्रिय का भोग तो अनेक प्रकार से संभव है।
यदि आत्मलीनता का नाम ब्रह्मचर्य है तो क्या स्पर्शन इन्द्रिय के विषय ही आत्मलीनता में बाधक हैं, अन्य चार इन्द्रियों के विषय क्या आत्मलीनता में बाधक नहीं?
यदि हैं, तो उनके भी त्याग को ब्रह्मचर्य कहा जाना चाहिए।
ब्रह्म शब्द का अर्थ निर्मल ज्ञानस्वरूप आत्मा है। उस आत्मा में लीन होने का नाम ब्रह्मचर्य है। जिस मुनि का मन अपने शरीर से निर्ममत्व हो गया, उसी के वास्तविक ब्रह्मचर्य होता है।
ऐसे उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म के आराधक सन्तों धर्मात्माओं को नमस्कार हो।
क्षमा-वाणी
क्षमा वीरस्य भूषणम् !!!
उपसर्गों में भी समता धारण किए रहना क्या कायरों का काम है?
क्षमा कायरता नहीं, क्षमा धारण करना कायरों का काम भी नहीं;
पर वीरता भी तो मात्र दूसरों को मारने का नाम नहीं है,
दूसरों को जीतना ही वास्तविक वीरता है।
अपनी वासनाओं को, कषायों को मारना; विकारों को जीतना ही वास्तविक वीरता है।
O Mortal Man! Ask forgiveness, ask forgiveness
& ask forgiveness from all with a feeling
‘Welfare of all living beings, and peace and happiness for all creatures’.
Forgiveness is not merely a matter of oratory,
it is treasure of the inner Soul as well.
The sweet taste of sucrose can be felt only by the tongue.
But the sweetness of forgiveness lies dormant in the inner soul.
दूसरों से क्षमायाचना करो एवं क्षमा करो के साथ साथ क्षमाभाव को भी भीष्माव रखकर मैं बीजमजाएँ, आजारें और अनन्तशक्ति के सगर निशुद्ध तत्व में निपुण हो अनन्तकाल तक अनन्त आनन्द में मग्न रहें।
ऐसी क्षमा के धारक सभी सधर्मियों को नमस्कार हो।
दशलक्षण महापर्व
"उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिंचन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः ।”
उत्तम क्षमा
Supreme Forgiveness
उत्तम मार्दव
Supreme Tenderness
उत्तम आर्जव
Supreme Honesty
उत्तम शौच
Supreme Contentment
उत्तम सत्य
Supreme Truthfulness
उत्तम संयम
Supreme Self-restraint
धर्म के दश कहे लक्षण, तिन थकी जिय सुख लहै।
भवरोग को यह महा औषधि, मरण-जामन दुःख दहे ।।
उत्तम तप
यह वरत नीका, मीत जी का, करो आदरतें सही।
मैं जजों दशविधि धर्म के अंग, तासु फल है शिवमही !!
उत्तम त्याग
Supreme Renunciation
उत्तम आकिंचन्य
Supreme Non-attachment
उत्तम ब्रह्मचर्य
Supreme Chastity
#DasLakshanParv
#AadhyatmikPrayogshala
अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें
मूल दस्तावेज़ (PDF): 160.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है