दस लक्षण धर्म | उत्तम क्षमा से ब्रह्मचर्य तक (1–10) — परिभाषा, पूजन, प्रसंग व काव्य

दस धर्म का पहला अंग उत्तम क्षमा — परिभाषा, द्यानतराय कृत दशलक्षण पूजन का पद, सरल अर्थ, और प्रेरक प्रसंग: क्षमा से मुक्त हुए यशोधर मुनिराज व क्रोध से दुर्गति पाए द्विपायन मुनि। बच्चों व स्वाध्याय हेतु सरल भाषा में।

Uttam Kshama, the first of the ten dharmas of Das Lakshan — definition, dashlakshan pujan verse, simple meaning and inspiring stories (Yashodhar Muniraj, Dvipayan Muni). Das lakshan dharma for kids and swadhyay.

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उत्तम क्षमा

परिभाषा

क्षमा स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो क्रोध के अभाव रूप शान्ति स्वरुप पर्याय प्रकट होती है, उसे क्षमा कहते हैं।

क्रोध किसे कहते हैं ?

गुस्सा करने को क्रोध कहते हैं। क्रोध आत्मा की एक ऐसी विकृति है, ऐसी कमजोरी है, जिसके कारण उसका विवेक समाप्त हो जाता है, भले-बुरे की पहिचान नहीं रहती।

क्रोध क्यों आता है ?

  • जब हमें लगता है कि किसी ने मेरा बुरा किया या काम बिगाड़ा
  • जैसा हमने सोचा वैसा ना होकर कुछ और हो (अपेक्षा की उपेक्षा)

क्रोध के नुकसान

  • बने हुये काम भी बिगड़ जाते हैं।
  • स्वयं भी दुःखी होते है और दूसरों के साथ भी संबंध बिगाड़ लेते हैं।

उत्तम क्षमा धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी कृत दशलक्षण धर्म पूजन)

पीड़ें दुष्ट अनेक, बाँध मार बहुविधि करें।
धरिये छिमा विवेक, कोप न कीजें पीतमा।।
उत्तम छिमा गहो रे भाई, इह-भव जस, पर-भव सुखदाई।
गाली सुनि मन खेद न आनो, गुन को औगुन कहें अयानो।।
कहि है अयानो वस्तु छीनें, बाँध मार बहुविधि करें।
घर तैं निकारै तन विदारै, वैर जो न तहाँ धरै।।
ते करम पूरब किये खोटे, सहें क्यों नहीं जियरा।
अति क्रोध-अगनि बुझाय प्रानी, साम्य-जल ले सीयरा।।

सरल अर्थ

अनेक प्रकार बाँधकर, पीटकर या नाना प्रकार से दुष्टों के द्वारा कष्ट दिए जाने पर भी सज्जन क्रोध नहीं करते हैं एवं क्षमा रुपी विवेक को धारण करते हैं। हे भाई! उत्तम क्षमा को धारण करने से इस भव यश में तथा दूसरे भव में सुख प्राप्त होता है। यदि कोई गाली देता है तो मन में खेद-शोक नहीं ला चाहिए। यदि अज्ञानी/मूर्ख लोग अपने गुणों को अवगुण (दोष) भी कहें, हमारी वस्तु भी छीन लें, इतना ही नहीं, कई प्रकार से सताये जाने पर, बाँधे मारे जाने पर, घर से निकाल देने पर, शरीर को छिन्न-भिन्न कर देने पर भी वैर (दुश्मनी) को धारण नहीं करना चाहिए। हे जीव! जो पूर्व जन्म में खोटे (पाप) कर्म किए तो सहन करने (भोगने) ही पड़ेंगे। हे जीव! क्रोध रुपी अग्नि को समता रुपी शीतल जल लेकर बुझाना चाहिए। यही उत्तम क्षमा धर्म है।

प्रसंग / उदाहरण

  • उत्तम क्षमा धर्म में प्रसिद्ध — यशोधर मुनिराज
  • क्रोध के कारण दुर्गति को प्राप्त — द्वीपायन मुनि

काव्य

क्षमा धर्म का मूल है। क्रोध को करना भूल है।।
क्रोध क्षमा से मिटता है। क्रोधी मानव पीटता है।।
क्रोध से द्विपायन नरक गए। क्षमा से यशोधर मुक्त हुए।।
— समकित शास्त्री

क्षमा का anti-virus हमारे operating system को cool down रखता है और क्रोध virus से बचाता है।

कहानी

एक बार एक संत अपने कुछ शिष्यों को जीवन के रहस्य समझाने के लिए उन्हें एक गाँव ले गये। वहाँ एक ही परिवार के कुछ लोग लड़-झगड़ रहे थे तथा एक-दूसरों पर चीख-चिल्ला रहे थे। शिष्यों को जिंदगी के सबक सिखाने के लिए गुरु ने शिष्यों से पूछा कि लोग गुस्से में चीखते-चिल्लाते क्यों हैं? शिष्य ने कुछ सोचते हुए कहा- क्योंकि लोग गुस्से में अपना संयम और आपा खो देते हैं, इसलिये चीखते-चिल्लाते हैं।

गुरु ने फिर कहा पर जब लोग इतने नजदीक खड़े हैं तो फिर गुस्से में भी चिल्लाने की जरुरत क्यों पड़ती है? धीमी आवाज में भी तो अपना रोष प्रकट किया जा सकता है न! शिष्य ने उत्तर खोजने की कोशिश की, पर कुछ समझ न आने पर गुरु की ओर ही मुख किया।

तब गुरु ने कहा- जब हम सामने वाले पर क्रोधित होते हैं तो मन ही मन उससे दूर हो जाते हैं और दूर के व्यक्ति तक अपनी बात पहुँचाने के लिए चिल्लाना ही पड़ता है। व्यक्ति जितना दूर होगा, उतना ज्यादा जोर से चिल्लाना पड़ता है; उसीप्रकार हम सामने वाले से जितने ज्यादा क्रोधित होते हैं, मन से हम उससे उतना ही दूर हो जाते हैं और उतना ही ज्यादा उस पर चीखते-चिल्लाते हैं।

जैसे क्रोध आने पर हम सामने वाले व्यक्ति पर चिल्लाते हैं, उसकी बात भी सुनना पसंद नहीं करते, उससे दूर जाना चाहते हैं; क्योंकि हम मन ही मन उससे दूर हो जाते हैं तो उसीप्रकार हम क्रोध करते समय अपने आत्म-स्वभाव से भी दूर हो जाते हैं, अपनी आत्मा की बात भी सुनना नहीं चाहते और आत्म-स्वभाव से दूर भागते हैं। इसलिये सबसे पहले अपने आत्मा के प्रति क्रोध का नाश करो। शिष्य जीवन का एक महत्वपूर्ण सबक सीख चुका था।


स्रोत: जैन पाठशाला जयपुर (निदेशक — डॉ. बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग — समकित शास्त्री · jainpathshalajaipur.com

उत्तम मार्दव | दस लक्षण धर्म — परिभाषा, पूजन, प्रसंग व काव्य (मान का त्याग)
उत्तम आर्जव | दस लक्षण धर्म — परिभाषा, पूजन, प्रसंग व लघु नाटक (वादिराज मुनिराज)
उत्तम सत्य | दस लक्षण धर्म — परिभाषा, पूजन, प्रसंग व काव्य
उत्तम शौच | दस लक्षण धर्म — परिभाषा, पूजन, प्रसंग व काव्य (लोभ त्याग)
उत्तम संयम | दस लक्षण धर्म — परिभाषा, पूजन, प्रसंग व काव्य (पांडव मुनिराज)
उत्तम तप | दस लक्षण धर्म — परिभाषा, पूजन, प्रसंग व काव्य (सुकुमाल मुनिराज)
उत्तम त्याग | दस लक्षण धर्म — परिभाषा, पूजन, दान प्रसंग व काव्य
उत्तम आकिंचन्य | दस लक्षण धर्म — परिभाषा, पूजन, प्रसंग व काव्य (परिग्रह त्याग)
उत्तम ब्रह्मचर्य | दस लक्षण धर्म — परिभाषा, पूजन, प्रसंग व लघु नाटक (सेठ सुदर्शन)

दस लक्षण का उत्तम मार्दव धर्म — मान-अभिमान के त्याग की परिभाषा, दशलक्षण पूजन पद, सरल अर्थ और प्रसंग (राजा रावण का मान, उत्तम पर्याय से चांडाल तक का दृष्टान्त)। मृदुता व विनय सिखाने वाली सामग्री।

Uttam Mardav of Das Lakshan — the dharma of humility over pride/ego: definition, pujan verse, simple meaning and prasang. Das lakshan dharma content on maan and mardav for children.

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दस लक्षण का उत्तम मार्दव धर्म

परिभाषा

मार्दव स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो मान के अभावरूप शान्ति स्वरुप पर्याय प्रकट होती है, उसे भी मार्दव कहते हैं।

मृदुता-कोमलता का नाम मार्दव है।

मान किसे कहते हैं ?

घमण्ड को मान कहते हैं।

कुल, जाति, रूप, ज्ञान, धन, बल, तप और प्रभुता - यह आठ मान के भेद हैं।

मान क्यों होता है ?

  • जब जीव ऐसा मानते है कि शरीर, पैसा, घर-संपति आदि मेरे है, मैं इनका मालिक हूँ, तब व्यक्ति को मान होता है।
  • जब जीव दूसरों को खुद से नीचा दिखाना चाहता हो और स्वयं को उनसे श्रेष्ठ समझता हो।

मान के नुकसान

  • घमण्डी व्यक्ति की सभी निंदा करते हैं।
  • घमण्डी व्यक्ति को कोई मित्र नहीं बनाना चाहता है।
  • घमण्ड के कारण जीव के अच्छे गुण भी ढक जाते है।

उत्तम मार्दव धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन)

मान महा विषरूप, करहि नीच-गति जगत् में।
कोमल-सुधा अनूप, सुख पावे प्रानी सदा।।
उत्तम-मार्दव-गुन मन माना, मान करन को कौन ठिकाना।
बस्यो निगोद माहिं तैं आया, दमड़ी-रूकन भाग बिकाय।।
रूकन बिकाया भाग वशतें, देव इकइंद्री भया।
उत्तम मुआ चांडाल हूवा, भूप कीड़ों में गया।।
जीतव्य जोवन धन गुमान, कहा करे जल-बुदबुदा।
करि विनय बहु-गुन बड़े जन की, ज्ञान का पावें उदा।।

सरल अर्थ

मान (अहंकार) हलाहल विष के समान है। यह मान, नीच गतियों को करने वाला है अर्थात् मान के कारण खोटी गतियों में जाना पड़ता है। मार्दव (कोमलता) रुपी अमृत को धारण करने वाला जीव हमेशा सुख पाता है। उत्तम मार्दव को गुण (स्वाभाविक धर्म) मन से माना जाता है और मान करने वाले का कौन-सा ठिकाना है? क्योंकि अनादिकाल से निगोद में रहा, वहाँ से आकर वनस्पति काय का जीव हुआ तो दमड़ी (दमड़ी) रूकन (मुद्रा की सबसे छोटी इकाई) के भाव बिका और कभी-कभी बिना मूल्य के ही बिका। तीव्र पुण्य के उदय से देव हुआ और वहाँ से चलकर फिर एक इंद्रिय हुआ। उत्तम पर्याय के बाद चंडाल हो गया और राजा भी कीड़ों में उत्पन्न हुआ। हे जीव! जीवन, यौवन और धन-दौलत का क्या घमंड करना! ये सब जल के बुलबुले के समान क्षणभर में नष्ट होने वाले हैं। जो बहुत गुणवान हैं, बड़े हैं; उन महापुरुषों की विनय करनी चाहिए, जिससे ज्ञान प्राप्त होता है।

उदाहरण

  • उत्तम मार्दव धर्म में प्रसिद्ध — भरत चक्रवर्ती
  • मान के कारण दुर्गति को प्राप्त — राजा रावण

काव्य

मार्दव मेरा धर्म है।
मानी को न शर्म है।।
मान कषाय ना करना है।
कोमलता को धरना है।।
मान से रावण नरक गया।
मार्दवी भरत को मोक्ष हुआ।।
— समकित शास्त्री

मार्दव का anti-virus हमें अभिमान नामक खतरनाक virus से बचाता है।

कहानी

अब्राहम लिंकन एक बार अपने गांव के नजदीक एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। भाषण के बीच एक महिला खड़ी होकर बोली- अरे, यह राष्ट्रपति है! यह तो हमारे गाँव के मोची का लड़का है।

अपने प्रति ये अपमान जनक शब्द सुनकर लिंकन ने बड़े ही विनम्र शब्दों में उस महिला से कहा- मैडम! आपने बहुत अच्छा किया, जो उपस्थित जनता से मेरा यथार्थ परिचय करा दिया। मैं वही मोची का बेटा हूँ। क्या मैं आपसे एक बात पूछ सकता हूँ?

अवश्य, उस महिला ने कहा।

लिंकन ने पूछा क्या आप यह बताने का कष्ट करेंगी कि मेरे पिताजी ने आपके जूते आदि तो ठीक से मरम्मत किये थे न? आपको उनके कार्य में कोई शिकायत तो नहीं मिली।

उस महिला ने सफाई देते हुए कहा- नहीं-नहीं! उनके कार्य में कोई शिकायत नहीं मिली। वे अपना काम बड़ी अच्छी तरह करते थे।

तब लिंकन ने उत्तर दिया- मैडम! जिस प्रकार मेरे मोची पिता ने अपने कार्य में आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दिया, उसीप्रकार मैं भी आपको आश्वस्त करना चाहता हूँ कि आपने मुझे राष्ट्रपति के रूप में सेवा करने का जो मौका दिया है, उसे मैं बड़ी ही कुशलता से करूँगा और यह मेरी कोशिश रहेगी कि मेरे काम में आपको कोई शिकायत का मौका न मिले।


स्रोत: जैन पाठशाला जयपुर (निदेशक — डॉ. बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग — समकित शास्त्री · jainpathshalajaipur.com

दस लक्षण का उत्तम आर्जव धर्म — सरलता व निष्कपटता की परिभाषा, दशलक्षण पूजन पद, प्रसंग वादिराज मुनिराज, और सरलता पर आधारित एक लघु नाटक/संवाद। बच्चों के दस लक्षण नाटक व प्रवचन हेतु उपयोगी।

Uttam Aarjav of Das Lakshan — the dharma of straightforwardness and honesty: definition, pujan verse, Vadiraj Muniraj prasang and a short natak/dialogue. Ideal for das lakshan drama and kids’ programs.

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दस लक्षण का उत्तम आर्जव धर्म

परिभाषा

आर्जव स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में छल-कपट मायाचार के अभावरूप शान्ति स्वरुप जो पर्याय प्रकट होती है, उसे भी आर्जव कहते हैं।

ऋजुता अर्थात् सरलता का नाम आर्जव है।

माया किसे कहते हैं ?

छल-कपट को माया कहते हैं।

माया कषाय के कारण आत्मा में स्वभावगत सरलता न रहकर कुटिलता उत्पन्न हो जाती है। मायाचारी का व्यवहार सहज एवं सरल नहीं होता। वह सोचता कुछ है, बोलता कुछ है और करता कुछ है।

जीव मायाचारी क्यों करता है?

  • जब हम कोई काम स्वयं ना कर सकें और उसे छल-कपट या ठगी से सिद्ध करना चाहे।
  • हम जैसे है, वैसे दूसरों को ना दिखाकर, स्वयं को कुछ और दिखना चाहते हों।

मायाचारी के नुकसान

  • मायाचारी व्यक्ति पर कोई विश्वास नहीं करता है।
  • छल-कपट उजागर होने पर विश्वसनीयता जाती है तथा बहुत अपमान होता है।

उत्तम आर्जव धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन)

कपट न कीजे कोय, चोरन के पुर ना बसें।
सरल-सुभावी होय, ताके घर बहु-संपदा।।
उत्तम आर्जव-रीति बखानी, रंचक दगा बहुत दुःखदानी।
मन में हो सो वचन उचरिये, वचन होय सो तन सों करिये।।
करिये सरल तिहुँ जोग अपने, देख निर्मल आरसी।
मुख करे जैसा लखे तैसा, कपट-प्रीति अंगार-सी।।
नहिं लहे लछमी अधिक छल करि, कर्म-बंध-विशेषता।
भय-त्यागि दूध बिलाव पीवे, आपदा नहिं देखता।।

सरल अर्थ

कोई भी छल-कपट, मायाचारी मत करो क्योंकि ऐसा करने वालों अर्थात् चोरों आदि के नगर कभी नहीं बसे (बने)। तात्पर्य यह है कि छल-कपट चोरी आदि करने से नगरों में नहीं रह पाये। और जो सरल स्वभाव वाले होते हैं, उनके घर में बहुत संपत्ति होती है। उत्तम आर्जव धर्म परंपरा से जीव का सरल स्वभाव कहा गया है। और थोड़ा-सा भी छल-कपट बहुत से दुःख, कष्ट देने वाला होता है। इसलिए उससे बचने के लिए ही मन में जो हो, सो शब्दों में कहना चाहिए, जो शब्दों में कहा जाये, उसे शरीर से भी करना चाहिए। इसप्रकार अपने तीनों योगों (मन-वचन-काय) को सरल/एक जैसा कीजिए। जैसे स्वच्छ दर्पण में जैसा हमारा मुख होता है, वैसा ही दिखता है। छल कपट से प्रीति करना अंगारों से प्रीति करने के समान है। कोई भी अधिक मायाचारी करके धन-संपत्ति प्राप्त नहीं कर सकता, अपितु ऐसा करने से अधिक कर्मों का बंध होता है। छल-कपट करते समय वह कर्म बंध का ध्यान नहीं करता है। जैसे बिल्ली दूध पीते समय भय का त्याग करती है, यह ध्यान नहीं रखती कि पीछे से मार पड़ेगी; उसीप्रकार छल-कपट करने वाला भी कर्म-बंध एवं आपति का ध्यान नहीं रखता है।

उदाहरण

  • उत्तम आर्जव धर्म में प्रसिद्ध — वादिराज मुनिराज
  • मायाचारी के कारण दुर्गति को प्राप्त — मृदुमति

काव्य

आर्जव आत्म स्वभाव है।
मायाचारी विभाव है।।
छल-कपटी तो डरता-छिपता।
सरल स्वभावी निर्भर रहता।।
माया से मृदुमति पशु हुए।
आर्जवी वादिराज प्रभु हुए।।
— समकित शास्त्री

यह anti-virus हमारे system के स्वभाव से विपरीत होने वाले कार्यो रोकता है और स्वभाव के अनुसार कार्य कराता है।

कहानी

लंदन में शेक्सपीयर का लोकप्रिय नाटक चल रहा था। वहाँ के धर्म पुरोहित का मन उत्सुकता से भर गया। वह नाटक देखना चाहता था, पर उसने अपने उपदेश में नाटक देखने वालों की कटु आलोचना की थी और उसे बुरा बताया था। उसे एक उपाय सूझा। उसने नाटक थियेटर के मैनेजर के नाम एक पत्र लिखते हुए उसने अनुरोध किया मैं आपका नाटक देखना चाहता हूँ, पर वहाँ कोई ऐसी व्यवस्था है क्या, जिससे मैं नाटक देख सकूँ, पर दर्शक मुझे नहीं देख सकें?

मैनेजर ने उत्तर लिखा- आप यहाँ अवश्य आइये। आप जैसे लोगों के लिए पीछे चोर दरवाजा है और बैठने के लिए अतिरिक्त व्यवस्था है। वहाँ बैठकर आप दर्शकों की आँखों से बच सकते हैं, पर परमात्मा की नजरों से आप बच सकें- ऐसी व्यवस्था हमारे यहाँ नहीं है।


स्रोत: जैन पाठशाला जयपुर (निदेशक — डॉ.बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग — समकित शास्त्री · jainpathshalajaipur.com

दस लक्षण का उत्तम सत्य धर्म — सत्य वचन की परिभाषा, दशलक्षण पूजन पद, सरल अर्थ और प्रसंग (सत्य से मुनिराज-श्रावक की प्रतिष्ठा)। सत्य व्रत पर बालोपयोगी सामग्री।

Uttam Satya of Das Lakshan — the dharma of truthfulness: definition, pujan verse, simple meaning and prasang. Das lakshan dharma on satya for kids and swadhyay.

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दस लक्षण का उत्तम सत्य धर्म

परिभाषा

सत्यभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो शान्तिस्वरूप वीतराग परिणति उत्पन्न होती है, उसे सत्यधर्म कहते हैं। सत्य के साथ लगा ‘उत्तम’ शब्द मिथ्यात्व के अभाव और सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है।

असत्य किसे कहते हैं ?

वस्तु के सही स्वरूप को समझे बिना कह देना, असत्य है। सत्य बोलने से पहले सत्य समझना भी आवश्यक है। सत्य को परखे बिना बोलाना झूठ बोलने के समान है।

असत्य क्यों बोलते हैं ?

  • किसी भी पाप कार्य को करने के लिए या किसी पाप कार्य को छुपाने के लिए व्यक्ति झूठ बोलता है।
  • अपने झूठे मान-सम्मान के लिए व्यक्ति किसी भी प्रकार का झूठ बोल सकता है।

असत्य बोलने के नुकसान

  • झूठ बोलने पर हमारा कार्य सिद्ध हो या न हो; पर झूठ पकड़े जाने का भय निरंतर बना रहता है।
  • झूठ पकड़े जाने पर विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है।

उत्तम सत्य धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन)

कठिन-वचन मत बोल, पर-निंदा अरु झूठ तज।
साँच जवाहर खोल, सतवादी जग में सुखी।।
उत्तम-सत्य-वरत पालीजे, पर-विश्वासघात नहिं कीजे।
साँचे-झूठे मानुष देखो, आपन-पूत स्वपास न पेखो।।
पेखो तिहायत पुरुष साँचे, को दरब सब दीजिए।
मुनिराज-श्रावक की प्रतिष्ठा, साँच-गुन लख लीजिये।।
ऊँचे सिंहासन बैठि वसु-नृप, धरम का भूपति भया।
वच-झूठ-सेती नरक पहुँचा, सुरग में नारद गया।।

सरल अर्थ

कठिन (कठोर) वचन कभी नहीं बोलना चाहिए। दूसरों की निंदा और झूठ वचनों का त्याग करो। सत्यरुपी जवाहर रत्न का उपयोग करने वाला और सत्य बोलने वाला प्राणी, संसार में सुखी रहता है। अतः उत्तम सत्य धर्म का पालन करना चाहिए और दूसरों के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए। जगत में सच्चे-झूठे मनुष्यों का स्वरूप जानने वाले व्यक्ति, झूठ बोलने वाले अपने पुत्र पर भी विश्वास नहीं करते और सत्य बोलने वाले अन्य का विश्वास कर धन भी देते हैं। सच्चे गुणों या सत्य धर्म को ग्रहण करने से मुनिराजों और श्रावकों की प्रतिष्ठा (सम्मान) होती हैं। ऊँचे आसन पर बैठकर राजा वसु न्याय किया करता था और मात्र एक झूठ बोलने से नरक में चला गया तथा सत्य बोलने वाला एक नारद स्वर्ग गया।

प्रसंग / उदाहरण

  • उत्तम सत्य धर्म में प्रसिद्ध — धनदेव
  • असत्य के कारण दुर्गति को प्राप्त — सत्यघोष

काव्य

सत्य स्वभावी आतम मेरा।
झूठे को कर्मों ने घेरा।।
हित-मित-प्रिय वचन नित कहना।
झूठ बोल विश्वास ना खोना।।
सत्यघोष का हुआ अपमान।
धनदेव जी पहुंचे देव विमान।।
— समकित शास्त्री

यह anti-virus हमें झूठ के virus से बचाता है।

कहानी

एक बार एक व्यक्ति एक संत के पास आया और रोते हुए कहा कि मैं बहुत बुरा आदमी हूँ। हर प्रकार के व्यसन में लिप्त हूँ कि मुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। संत ने उसे शांत रहने के लिए कहा और पूछा- क्या तुम इन सभी गलत कार्यों को छोड़ना चाहते हो। व्यक्ति ने कहा मैं छोड़ना तो चाहता हूँ, पर छोड़ ही नहीं पाता हूँ।

संत ने कहा तुम्हें कोई भी गलत कार्य छोड़ने की जरुरत नहीं। बस, तुम प्रतिज्ञा करो कि कभी झूठ नहीं - बोलोगे। उस व्यक्ति ने वादा किया कि वह अब से झूठ नहीं बोलेगा। अगले दिन उसने कुछ पैसे चुराने का सोचा, परंतु यह सोचकर की पत्नी पूछेगी कि पैसे कहाँ से आये तो वह कैसे बता पायेगा कि ये पैसे चोरी के है और किसी को यह पता चला तो मेरी कितनी बदनामी होगी और मुझे सजा भी मिल सकती है। यह सोचकर उसने चोरी करने का इरादा छोड़ दिया।

अगले दिन उसे शराब पीने का मन किया, परंतु यह सोचकर कि संत से मिलने पर उन्होंने पूछा तो मैं झूठ भी नहीं बोल पाऊँगा और सच बोला तो उनसे नजरें कैसे मिला पाऊँगा। यह सोचकर कि सच बोलने से मेरी प्रतिष्ठा और नाम खराब हो जायेगा। ऐसे करते-करते उसकी सारी बुराइयाँ अपने आप उससे दूर होती गई और एक दिन वह एक सज्जन और सभ्य व्यक्ति बन गया।

एक अकेले सत्य में इतनी ताकत है कि वह आपकी सारी बुराइयों को दूर कर सकता है।


स्रोत: जैन पाठशाला जयपुर (निदेशक — डॉ.बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग — समकित शास्त्री · jainpathshalajaipur.com

दस लक्षण का उत्तम शौच धर्म — लोभ के त्याग व मन की पवित्रता की परिभाषा, दशलक्षण पूजन पद, सरल अर्थ और प्रसंग। संतोष व शुचिता सिखाती सामग्री।

Uttam Shauch of Das Lakshan — the dharma of purity and freedom from greed (lobh): definition, pujan verse, meaning and prasang. Das lakshan dharma on shauch and santosh.

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दस लक्षण का उत्तम शौच धर्म

परिभाषा

‘शुचेर्भावः शौचम्’ शुचिता अर्थात् पवित्रता का नाम शौच है। शौच के साथ लगा ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है। अतः सम्यग्दर्शन के साथ होने वाली वीतरागी पवित्रता ही उत्तम शौच धर्म है।

लोभ किसे कहते हैं ?

लालच को लोभ कहते हैं।

लोभ को पाप का बाप कहा जाता है, क्योंकि जगत में ऐसा कौनसा पाप है जिसे लोभी न करता हो? उसकी प्रवृत्ति जैसे भी हो, येन-केन-प्रकारेण धनादि भोग-सामग्री इकट्ठी करने की ही रहती है।

जीव लोभ क्यों करते हैं?

  • हमें जितना मिला है, उतने में हम संतुष्ट ना होकर और ज्यादा पाने की इच्छा करते हैं।
  • दूसरों की अधिक वस्तुयें देखकर उन्हें पाने की ओर आकर्षित होते हैं।

लोभ के नुकसान

  • लोभी व्यक्ति जितना मिलता है, उसमें कभी भी खुश नहीं रह पाता है।
  • वह और अधिक पाने के चक्कर में हमेशा दुखी रहता है।
  • लोभ के कारण जितना मिला है, उसे भी खो देता है अथवा उसका भी सुखपूर्वक भोग नहीं कर पाता।

उत्तम शौच धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन)

धरि हिरदै संतोष, करहु तपस्या देह सों।
शौच सदा निरदोष, धरम बड़ो संसार में।।
उत्तम शौच सर्व-जग जाना, लोभ ‘पाप को बाप’ बखाना।
आशा-पास महादुःखदानी, सुख पावे संतोषी प्रानी।।
प्रानी सदा शुचि शील-जप-तप, ज्ञान-ध्यान प्रभाव तें।
नित गंग जमुन समुद्र न्हाये, अशुचि-दोष स्वभाव तें।।
ऊपर अमल मल-भर्यो भीतर, कौन विधि घट शुचि कहे।
बहु देह मैली सुगुन-थैली, शौच-गुन साधु लहे।।

सरल अर्थ

हृदय में संतोष धारण करके, शरीर से तपस्या करनी चाहिए। निर्दोष शौच धर्म ही सर्व जगत में प्रसिद्ध है। आशा अर्थात् इच्छा रुपी नाग महादुख को देने वाला है। संतोष को धारण करने वाले प्राणी सुख प्राप्त करते हैं। यह जीव शील, जप, तप, ज्ञान, ध्यान के प्रभाव से पवित्रता प्राप्त करता है। गंगा-यमुना आदि नदियों एवं समुद्रों में निरंतर नहाने से भी पवित्रता नहीं होतीः क्योंकि इस शरीर का स्वभाव ही अपवित्र (अशुचि) है। यह शरीर ऊपर से तो मल रहित पवित्र दिखाई देता है, परंतु इसके भीतर मल भरा हुआ है। तब ऐसे शरीर को किस प्रकार से पवित्र कहा जाए। जिनका शरीर तो बहुत मैला है, परंतु जो उत्तम गुणों के भंडार हैं- ऐसे महाव्रती साधु ही इस उत्तम शौच गुण को प्राप्त करते हैं।

उदाहरण

  • उत्तम शौच धर्म में प्रसिद्ध — बाहुबली भगवान
  • लोभ के कारण दुर्गति को प्राप्त — सुभौम चक्रवर्ती

काव्य

परम पवित्र आत्मा जानो।
लोभ पाप का बाप बखानो।।
लोभी का चित महा मलीना।
निर्लोभी जीवन नित जीना।।
दुर्गति में गिरे सुभौम लोभ से।
बाहुबली शिव गए शौच से।।
— समकित शास्त्री

यह anti-virus हमारे system को बाहर से ही नही अंदर से भी Clean कर देता है।

कहानी

स्कूल के छात्र ने अपने अध्यापक से पूछा कि ये लालच क्या होता है?

अध्यापक ने उसे थोरी की बजाय प्रेक्टिकली समझाने के लिए कहा कि स्कूल के बाहर एक बड़ी-सी खिलौनों की दुकान है। तुम वहाँ जाओ और अपना मनपसंद खिलौना लेकर आओ। पर शर्त यह है कि जब तुम खिलौना चुनने के लिए दुकान में घूमोगे तो फिर पीछे मुड़कर नहीं आ सकते और खिलौना चुनते ही तुम्हें आगे के खिलौने न तो देखने मिलेंगे और न ही अपना चुना हुआ खिलौना बदलने का मौका।

छात्र उस दुकान पर जाता है, उसे एक खिलौना पसंद आता है, पर यह सोचकर कि कहीं आगे ज्यादा अच्छा खिलौना हुआ तो वह आगे बढ़ता गया। कई बार उसे लगा कि पीछे छूटा हुआ खिलौना ही ज्यादा अच्छा था, पर नियम के अनुसार वह पीछे मुड़कर नहीं जा सकता था।

आखिर में वह बिना खिलौने के ही वापस अपने अध्यापक के पास आया और सारी बात अपने अध्यापक को बताई। तब उसके अध्यापक ने समझाया कि यही लालच है कि हमें जो मिलता है, हम उसमें संतुष्ट न होकर और ज्यादा और अच्छा पाने के कारण जो मिला होता है, उसके भी महत्व को न पहचान कर उसे भी खो बैठते हैं और बाद में पछताते हैं।


स्रोत: जैन पाठशाला जयपुर (निदेशक — डॉ. बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग — समकित शास्त्री · jainpathshalajaipur.com

दस लक्षण का उत्तम संयम धर्म — इन्द्रिय व मन के संयमन की परिभाषा, दशलक्षण पूजन पद, सरल अर्थ और प्रसंग पांडव मुनिराज। संयम व्रत पर प्रेरक बाल सामग्री।

Uttam Sanyam of Das Lakshan — the dharma of self-restraint over senses and mind: definition, pujan verse, meaning and the Pandav Muniraj prasang. Das lakshan dharma on sanyam.

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दस लक्षण का उत्तम संयम धर्म

परिभाषा

संयमन को संयम कहते हैं अर्थात् उपयोग को परपदार्थ से समेट कर अपने में सीमित करना अथवा व्रतों, समितियों का पालन करना, क्रोधादि का निग्रह करना और पाँच इन्द्रियों के विषयों को जीतना संयम है।

असंयम किसे कहते हैं?

पाँच इन्द्रिय एवं मन के विषयों में रत परिणाम असंयम हैं।

संयम दो प्रकार का होता है- छहकाय के जीवों के घात एवं घात के भावों के त्याग को प्राणीसंयम और पंचेंद्रियों तथा मन के विषयों के त्याग को इन्द्रियसंयम कहते हैं।

असंयम क्यों होता है?

  • हिंसा में प्रमाद परिणति मूल कारण होती है।
  • विषय सेवन में अभिलाषा मूल कारण है।

असंयम के नुकसान

  • संयम के बिना अहिंसा का पालन संभव नहीं है।
  • जीवन में धैर्य का अभाव हो जाता है।
  • लौकिक कार्यों में भी सफलता के लिए संयम और अनुशासन आवश्यक होता है।
  • संयम से रहित सफल व्यक्ति भी अवनति को प्राप्त होता है।

उत्तम संयम धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन)

काय-छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्री-मन वश करो।
संयम-रतन संभाल, विषय-चोर बहु फिरत हैं।।
उत्तम संयम गहु मन मेरे, भव-भव के भाजें अघ तेरे।
सुरग-नरक-पशुगति में नाहीं, आलस-हरन करन सुख ठाहीं।।
ठाहीं पृथ्वी जल आग मारुत, रूख त्रस करुना धरो।
सपरसन रसना घ्रान नैना, कान मन सब वश करो।।
जिस बिना नहिं जिनराज सीझे, तू रुल्यो जग-कीच में।
इक घरी मत विसरो करो नित, आव जम-मुख बीच में।।

सरल अर्थ

छह काय के जीवों की रक्षा और पाँच इंद्रियों एवं मन को वश में करना चाहिए। विषय-कषाय रुपी चोर बहुत घूम रहे हैं, इसलिए संयम रुपी रत्न संभाल कर रखो। हे मेरे मन! उत्तम संयम धर्म को ग्रहण करो, जिसके कारण अनेकानेक भवों के पाप नष्ट हो जायेंगे। आलस्य को हरने वाला और सुख को देने वाला यह उत्तम संयम धर्म देव, नरक, तिर्यंच गति में नहीं होता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति- ये पाँच स्थावर और त्रस इन छह काय के जीवों की दया धारण कर स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण एवं मन को वश में करो। इस संयम के अभाव में जिनराज (तीर्थंकर) गृहस्थ अवस्था में थे, उन्होंने संयम अंगीकार नहीं किया था, तब तक वे मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सके थे। इसलिए हे जीव! इस संयम को ग्रहण न करने के कारण से ही तुम संसार रुपी कीचड़ में फँसे हो। हम निरंतर मृत्यु रुपी यमराज के मुख की ओर जा रहे हैं। इसलिए उत्तम संयम धर्म को एक क्षण को भी नहीं भूलना चाहिए।

प्रसंग / उदाहरण

  • उत्तम संयम धर्म में प्रसिद्ध — पांडव मुनिराज
  • असंयम के कारण दुर्गति को प्राप्त — ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती

काव्य

संयम आतम रतन अमूल्य।
असंयमी जीवन पाप का मूल।।
जीवों के प्रति दया को धारो।
गज-मृगादि के दुःख विचारो।।
तंदुल मच्छ नरक में जाता।
महामच्छ सुर गति को पाता।।
— समकित शास्त्री

यह anti-virus हमें नुकसान पहुँचाने वाले किसी भी अन्य हानिकारक sites (इंद्रिय विषय-भोग) पर जाने से रोकता है और सावधान करता है।

कहानी

एक पिता अपने पुत्र के साथ पतंग उड़ा रहे थे। पुत्र ने कहा- ये डोर पतंग को रोके हुए है, नहीं तो ये पतंग आसमान में कितनी ऊँची जा सकती थी। पिता पुत्र के आशय को समझ रहे थे। उन्होंने पतंग की डोर काट दी। डोर कटते ही पतंग आसमान में थोड़ा और ऊपर गई।

यह देख खुश होते हुए बेटे ने कहा- देखा, मैंने कहा था न पापा! डोर के कारण ही पतंग की उन्नति रुकी हुई थी, पर यह क्या! पतंग थोड़ा ऊपर जाने के बाद हिचकोले खाते हुए नीचे की ओर आने लगी और पेड़ में फँसकर फट गई। अब मुस्कुराने की बारी पिता की थी। पिता बोले- बेटा! डोर ने पतंग को रोका नहीं था, बल्कि सँभाला हुआ था। उसको संयमित रखा था। बिना डोर के पतंग का हाल तो तुम देख ही चुके हो।

इसीप्रकार आत्म-संयम भी ऊपर से देखने पर रुकावट जैसा प्रतीत होता है, पर यदि हम भी अपनी इंद्रियों और मन पर संयम की डोर नहीं बाँधेंगे तो हमारी दशा भी फटी हुई पतंग की भाँति हो जायेगी।


स्रोत: जैन पाठशाला जयपुर (निदेशक — डॉ. बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग — समकित शास्त्री · www.jainpathshalajaipur.com

दस लक्षण का उत्तम तप धर्म — इच्छा-निरोध व तप की परिभाषा, दशलक्षण पूजन पद (जिसे इन्द्र भी चाहें), सरल अर्थ और प्रसंग सुकुमाल मुनिराज। तप व्रत पर बालोपयोगी सामग्री।

Uttam Tap of Das Lakshan — the dharma of austerity and desire-control: definition, pujan verse, meaning and the Sukumaal Muniraj prasang. Das lakshan dharma on tap.

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दस लक्षण का उत्तम तप धर्म

परिभाषा

समस्त रागादि भावों की इच्छा के त्याग पूर्वक आत्मलीनता द्वारा विकारों पर विजय प्राप्त करना, तप है। ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है।

अतप किसे कहते हैं ?

विषयों की इच्छा पूरी करने को ही, अतप कहते हैं।

तप बारह प्रकार के होते हैं-
6 बहिरंग तप - अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश
6 अंतरंग तप - प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान

अतप क्यों होता है ?

  • इच्छाओं की गुलामी के कारण व्यक्ति तप नहीं कर पाता है।
  • आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति के बिना तप संभव नहीं है।

अतप के नुकसान

  • निरंतर नई-नई इच्छाओं के कारण व्यक्ति सदा दुःखी रहता है।
  • इच्छाओं की पूर्ति के बाद भी जीवन में संतोष नहीं होता है।

उत्तम तप धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन)

तप चाहें सुरराय, करम-शिखर को वज्र है।
द्वादश विधि सुखदाय, क्यों न करे निज सक्ति समा।।
उत्तम तप सब-माहिं बखाना, करम-शैल को वज्र-समाना।
बस्यो अनादि-निगोद-मँझारा, भू-विकलत्रय-पशु-तन धारा।।
धारा मनुष-तन महा-दुर्लभ, सुकुल आयु निरोगता।
श्री जैनवानी तत्वज्ञानी, भई विषय-पयोगता।।
अति महादुरलभ त्याग विषय, कषाय जो तप आदरें।
नर-भव अनूपम कनक-घर पर, मणिमयी-कलसा धरें।।

सरल अर्थ

उत्तम तप धर्म को देवों के राजा (इंद्र) भी चाहते हैं। यह तप कर्म रूपी पर्वतों को नष्ट करने के लिए वज्र के समान है। ये बारह प्रकार के तप सुख को देने वाले हैं तो क्यों न उन्हें अपनी शक्ति के अनुसार धारण करें। कर्म रूपी पर्वतों को नष्ट करने के लिए उत्तम तप धर्म वज्र के समान सभी शास्त्रों में कहा है। यह जीव अनादि काल से निगोद में रहा है। वहाँ से निकलकर पृथ्वी आदि स्थावर एवं उसके बाद दो इन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय आदि हुआ; फिर तिर्यंच का शरीर धारण किया। अब यह मनुष्य पर्याय बड़ी कठिनता से धारण की। उसमें भी उत्तम कुल, पूर्ण आयु, निरोगी शरीर, जिनवाणी का संयोग, तत्वज्ञान, आत्मचिंतन में उपयोग बड़ी दुर्लभता से प्राप्त हुआ। जो जीव महा कठिन विषय और कषाय का त्याग कर तप को आदर पूर्वक ग्रहण करते हैं, वे मनुष्य भव रूपी अलौकिक स्वर्ण घर पर, नीलमणि आदि रत्नमय कलश चढ़ाते हैं अर्थात् मनुष्य जन्म को सार्थक बनाते हैं।

प्रसंग / उदाहरण

  • उत्तम तप धर्म में प्रसिद्ध — सुकुमाल मुनिराज
  • अतप के कारण दुर्गति को प्राप्त — कौरव

काव्य

आत्मलीनता ही तप जानो।
सब पर वस्तु रहित निज मानो।।
विषयों की इच्छा नहीं करना।
निर्वांछक हो तप आचरना।।
नर भव की महिमा पहचानो।
सुकुमाल महामुनि सम तप ठानो।।
— समकित शास्त्री

तप का anti-virus हमें विषय भोगों के virus से बचाता है।

कहानी

एक बार सम्राट चन्द्रगुप्त भटक कर एक गुफा के पास पहुँचे। गुफा में से किसी व्यक्ति की आवाज आ रही थी। वहाँ एक मुनिराज पाठ कर रहे थे। सम्राट ने पूछा- भीतर कौन है? भीतर से आवाज आई- पहले आप अपना परिचय दें कि आप कौन हैं? सम्राट ने उत्तर दिया- मैं चक्रवर्ती हूँ। भीतर से पुनः प्रश्न आया- आप चक्रवर्ती कैसे बने? सम्राट ने उत्तर दिया- मैंने अपनी सेना के बल से षट्खंडों को वश किया है और उन पर विजय पाई है। भीतर से आवाज आई- मैं भी षट्खंडों का विजेता चक्रवर्ती हूँ। सम्राट ने आश्चर्य से पूछा- आप चक्रवर्ती कैसे हुए? उत्तर आया मैंने तप बल से मन-वचन-काय, राग-द्वेष-मोह- इन षट् खंडों को जीता है। क्या तुम इन पर विजय पा सके हो। यह उत्तर सुनकर सम्राट चंद्रगुप्त स्वयं से भी बड़े चक्रवर्ती के सामने नतमस्तक हो गया और उसने कहा- असली चक्रवर्ती तो आप ही हैं। आपके तप बल के सामने मेरा सैन्य बल कुछ भी नहीं है; क्योंकि जिसने स्वयं को जीता है, वही असली विजेता है।


स्रोत: दिगम्बर जैन महासमिति (धार्मिक प्रकोष्ठ चेयरमैन — डॉ.बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग — समकित शास्त्री

दस लक्षण का उत्तम त्याग धर्म — दान व त्याग की परिभाषा, दशलक्षण पूजन पद, चार प्रकार के दान (मुनि, आर्यिका, श्रावक-श्राविका), प्रसंग और काव्य। दान व त्याग सिखाती सामग्री।

Uttam Tyag of Das Lakshan — the dharma of renunciation and charity (daan): definition, pujan verse, the four kinds of daan and prasang. Das lakshan dharma on tyag and daan.

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दस लक्षण का उत्तम त्याग धर्म

परिभाषा

निज शुद्धात्मा के ग्रहण पूर्वक, बाह्य और अभ्यन्तर परिग्रह से निवृत्ति ही उत्तम त्याग है।

अत्याग किसे कहते हैं ?

रागादि के कारण पर वस्तु के ग्रहण को, अत्याग कहते हैं।

त्याग धर्म है।
दान पुण्य है।

जीव त्याग क्यों नहीं कर पाता है?

  1. तीव्र राग और आसक्ति के कारण त्याग नहीं हो पाता है।
  2. गुण और दोष की सच्ची समझ नहीं होने के कारण भी व्यक्ति अपने दोषों का त्याग नहीं कर पाता है।

त्याग न करने के नुकसान

  1. अपने विकारों एवं दोषों का त्याग किए बिना जीवन में सुख समृद्धि संभव नहीं है।
  2. अपने दोषों को पहचानकर उनका त्याग नहीं करने पर लोक में भी निंदा के पात्र बनते हैं।
  3. गलत कार्यों का त्याग नहीं करने पर तत्संबंधी पाप का बन्ध निरंतर चलता रहता है।

उत्तम त्याग धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन)

दान चार परकार, चार संघ को दीजिए।
धन बिजली उनहार, नर-भव लाहो लीजिए।।
उत्तम त्याग कह्यो जग सारा, औषध शास्त्र अभय आहारा।
निहचै राग-द्वेष निरवारे, ज्ञाता दोनों दान संभारे।।
दोनों संभारे कूपजल-सम, दरब घर में परिनया।
निज हाथ दीजे साथ लीजे, खाय-खोया बह गया।।
धनि साधु शास्त्र अभय-दिवैया, त्याग राग-विरोध को।
बिन दान श्रावक-साधु दोनों, लहैं नाहीं बोध को।।

सरल अर्थ

दान चार प्रकार का है। ये चार संघ अर्थात् मुनि, आर्यिका, श्रावक-श्राविका को देना चाहिए। धन, सम्पति, वैभव, बिजली की चमक की तरह हैं। अतः दान देकर मनुष्य भव का लाभ ले लेना चाहिए।

समस्त संसार में उत्तम त्याग धर्म श्रेष्ठ कहा गया है। औषधि, शास्त्र, अभय, आहार दान- ये तो व्यवहार त्याग के रूप में हैं। राग और द्वेष का निवारण करना (त्यागना), निश्चय त्याग है। बुद्धिमान लोग दोनों (व्यवहार और निश्चय) दान करते हैं। कुएँ का पानी नहीं निकालने पर खराब हो जाता है और उससे अधिक बढ़ता भी नहीं है तथा निकालने पर खराब नहीं होता एवं जितना निकालते हैं, उतना फिर से भर जाता है। उसीप्रकार घर में धन, वैभव की दान के अभाव में स्थिति बनती है। इसलिए धन-सम्पति को अपने हाथ से दान देकर साथ में ले लीजिए। धन वैभव खाने-पीने में खर्च करना तो बह जाने के समान है, वह नष्ट हो जायेगा; लेकिन साथ रहने वाला नहीं हैं। धन्य हैं वे साधु, जो ज्ञानदान, अभयदान देने वाले हैं और राग-द्वेष त्यादि विकारों का त्याग करने वाले हैं। दान के बिना श्रावक और साधु सम्यग्ज्ञान को प्राप्त नहीं करते।

उदाहरण

  • उत्तम त्याग धर्म में प्रसिद्ध - पुरुरवा भील
  • अत्याग के कारण दुर्गति को प्राप्त - रुद्र

काव्य

त्याग रूप ही आत्मधर्म है।
राग-द्वेष तो भाव कर्म हैं।।
कषाय भाव से मुख को मोड़ो।
अभक्ष्य और पापों को छोड़ो।।
भवःदुख के अभाव का कारण।
भील पुरुरवा वीर गया बन।।
— समकित शास्त्री

यह anti-virus हमारे अंदर मौजूद अनुपयोगी वस्तुओं को delete करने की सलाह देता है।

कहानी

सन् 1912 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया गया। उस समय देशबंधु चितरंजन दास देश के अद्वितीय प्रतिभाशाली बैरिस्टर थे। महात्मा गाँधी ने देशबंधु से देश सेवा के लिए वकालत छोड़ देने का आग्रह किया। तब देशबंधु ने उत्तर दिया- आप मुझे वकालत करने दीजिए। उसकी 50 हजार रुपया से अधिक मासिक आमदनी मैं पूरी काँग्रेस को दे दिया करूँगा।

तब गाँधीजी बोले- हमें रुपया नहीं चाहिए। रुपयों को लात मारने वाला त्यागी व्यक्ति चाहिए। तुम-सा व्यक्ति पाकर हम जितना चाहेंगे, उतना रुपया पा सकेंगे। दास बाबू ने गाँधी जी की बात मान ली।


स्रोत: जैन पाठशाला जयपुर (निदेशक — डॉ. बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग — समकित शास्त्री · jainpathshalajaipur.com

दस लक्षण का उत्तम आकिंचन्य धर्म — परिग्रह के त्याग व निर्ममत्व की परिभाषा, दशलक्षण पूजन पद, परिग्रह के 24 भेद, मुनि-मुद्रा का महत्व और प्रसंग। अपरिग्रह पर बाल सामग्री।

Uttam Aakinchanya of Das Lakshan — the dharma of non-possession (aparigrah): definition, pujan verse, the 24 kinds of parigrah and prasang. Das lakshan dharma on aakinchan.

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दस लक्षण का उत्तम आकिंचन्य धर्म

परिभाषा

आत्मा को छोड़कर किंचित्मात्र भी परपदार्थ तथा पर के लक्ष्य से उत्पन्न होने वाले मोह-राग-द्वेष के भाव आत्मा के नहीं हैं- ऐसा जानना, मानना और उनसे विरत होना, उन्हें छोड़ना ही उत्तम आकिंचन्यधर्म है।

परिग्रह किसे कहते हैं ?

आत्मा में उत्पन्न होने वाले मोह-राग-द्वेषादि भावरूप आभ्यन्तर परिग्रह को निश्चय परिग्रह और बाह्य परिग्रह को व्यवहार परिग्रह भी कहा जाता है।

दो प्रकार का परिग्रह- आभ्यन्तर और बाह्य
14 आभ्यन्तर परिग्रह- मिथ्यात्व, क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा (ग्लानि), स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद
10 बाह्य परिग्रह दस प्रकार के होते हैं- क्षेत्र (खेत, प्लाट), वास्तु (निर्मित भवन), धन (चांदी, सोना, जवाहरात, मुद्रा), धान्य, द्विपद (मनुष्य, पक्षी), चतुष्पद (पशु), यान (सवारी), शय्यासन, कुप्य और भांड

जीव परिग्रह क्यों करते हैं ?

  1. पर पदार्थों में सुख की कल्पना के कारण व्यक्ति परिग्रह का संचय करता है।
  2. जब व्यक्ति अपनी प्रभुता पर पदार्थों से समझता है तो परिग्रह को जोड़ता है।

परिग्रह के नुकसान

  1. जितना अधिक परिग्रह उतने अधिक विकल्प, जैसे उनकी चोरी का भय, रक्षा के उपाय, वृद्धि के विकल्प आदि।
  2. परिग्रह एक ऐसा पाप है जिसको करते हुए भी व्यक्ति प्रायः उसको पाप रूप स्वीकार नहीं करते हैं और जिस पाप को पाप ही ना समझा जाए तो उसको रोकने का उपाय कोई क्यों करेगा ? (अंतरंग परिग्रह)

उत्तम आकिंचन्य धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन)

परिग्रह चौबीस भेद, त्याग करें मुनिराज जी।
तिसना भाव उछेद, घटती जान घटाइए।।
उत्तम आकिंचन गुन जानो, परिग्रह-चिंता दुःख ही मानो।
फाँस तनक-सी तन में सालै, चाह लंगोटी की दुःख भालै।।
भालै न समता सुख कभी नर, बिना मुनि-मुद्रा धरें।
धनि नगन पर तन-नगन ठाढ़े, सुर-असुर पायनि परें।।
घर-माँहिं तिसना जो घटावै, रुचि नहीं संसार-सों।
बहु-धन बुरा हू भला कहिये, लीन पर उपगार कों।।

सरल अर्थ

परिग्रह के चौबीस भेद होते हैं। उनका त्याग मुनिराज करते हैं और तृष्णा भाव को क्षय करते हैं। इसीप्रकार श्रावकों को भी धीरे-धीरे दोनों प्रकार के (अंतरंग और बहिरंग) परिग्रहों को कम करना चाहिए। उत्तम आकिंचन्य उत्कृष्ट गुण जानना चाहिए। परिग्रह की चिंता दुःख देने वाली मानो। जिसप्रकार छोटी-सी फांस लग जाने पर पूरे शरीर में कष्ट देती है, उसीप्रकार एक लंगोटी की इच्छा दुःख देने वाली है। दिगम्बर मुनि की मुद्रा को धारण किए बिना मनुष्य कभी समता और सुख प्राप्त नहीं कर सकता है। वे मुनिराज धन्य हैं जो पर्वतों पर नग्न खड़े रहकर तप करते हैं, उनके चरणों की सुर-असुर आदि अर्चना करते हैं। घर में रहते हुए भी जो अपनी तृष्णा को घटाते हैं और संसार में अपनी रुचि नहीं रखते हैं, वे श्रावक भी धन्य हैं। बहुत धन-सम्पति तो बुरी ही होती है, परंतु जो धन परोपकार में लगता है, वह फिर भी श्रेष्ठ कहा गया है।

उदाहरण

  • उत्तम आकिंचन्य धर्म में प्रसिद्ध — शान्ति-कुंथु-अरनाथ
  • परिग्रह के कारण दुर्गति को प्राप्त — श्मश्रु नवनीत

काव्य

पर वस्तु त्याग आकिंचन जानो।
तृष्णा भाव न मन में आनो।।
परिग्रह भाव महा दुःखकारी।
संसार बढ़ावे बोझा भारी।।
श्मश्रु नवनीत सम सपने छोड़ो।
शांति-कुन्थु-अरि सम मुख मोड़ो।।
— समकित शास्त्री

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कहानी

एक विदेशी टुरीस्ट ने जब पहली बार एक संत को देखा तो वह उनके रहन-सहन को देख आश्चर्यचकित रह गया। छोटी-सी कुटिया, गिनती के दो कपड़े और नाम मात्र के बर्तन। वह आश्चर्यचकित था कि इतनी-सी वस्तुओं के साथ कोई अपना पूरा जीवन कैसे व्यतीत कर सकता है।

विदेशी टुरीस्ट ने पता करने के लिए संत से पूछा- आपका बाकी सामान और कपड़े कहाँ हैं ?
प्रश्न के जवाब में संत ने टुरीस्ट से सवाल किया- तुम्हारा बाकी सामान कहाँ हैं?
टुरीस्ट ने कहा- पर मैं तो यात्री-पर्यटक हूँ।
संत ने कहा- मैं भी तो इस दुनिया में यात्री और पर्यटक ही हूँ।

सच ही है, जैसे धर्मशाला में ठहरे यात्री की धर्मशाला की किसी भी वस्तु पर कोई भी अधिकार नहीं होता, कोई भी वस्तु उसकी अपनी नहीं होती; वैसे ही इस संसार का किंचितमात्र भी मेरा भी नहीं है, यही आकिंचन्य धर्म है।


स्रोत: जैन पाठशाला जयपुर (निदेशक — डॉ. बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग — समकित शास्त्री · jainpathshalajaipur.com

दस लक्षण का उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म — शील व ब्रह्मचर्य की परिभाषा, दशलक्षण पूजन पद, प्रसंग सेठ सुदर्शन, और शील पर आधारित दृष्टान्त/संवाद। दस लक्षण नाटक व प्रवचन हेतु उपयोगी।

Uttam Brahmacharya of Das Lakshan — the dharma of celibacy and sheel: definition, pujan verse, the Seth Sudarshan prasang and a dramatizable scene. Ideal for das lakshan drama and children’s programs.

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दस लक्षण का उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

परिभाषा

ब्रह्म अर्थात् निज शुद्धात्मा में चरना, रमना ही ब्रह्मचर्य है।
आत्मलीनता पूर्वक पंचेन्द्रिय के विषयों का त्याग ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है।

अब्रह्म किसे कहते हैं ?

शुद्धात्मा की अरुचि पूर्वक पंचेन्द्रिय विषयों में लीनता ही अब्रह्म है।
स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण- ये पांच इन्द्रियाँ हैं।

जीव कुशील क्यों करता है ?

  1. पाँच इंद्रियों की आधीनता/गुलामी के कारण।
  2. सही समय पर उचित शिक्षा व मार्गदर्शन नहीं मिलने के कारण।

कुशील के नुकसान

  1. कुशील करने वाला व्यक्ति परिवार, समाज, देश हर जगह निंदा व दंड का पात्र बनता है।
  2. कुशील के कारण बड़े बड़े राजा-महाराजा या धनपतियों के भी धन, यश, वैभव के नष्ट होने में देर नहीं लगती है।

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी रचित दशलक्षण धर्म पूजन)

शील-बाड़ नौ राख, ब्रह्म-भाव अंतर लखो।
करि दोनों अभिलाख, करहु सफल नर-भव सदा।।
उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनो, माता-बहिन-सुता पहिचानो।
सहें बान- वरषा बहु सूरे, टिकें न नैन-बान लखि कूरे।।
कूरे तिया के अशुचि तन में, काम-रोगी रति करें।
बहु मृतक सड़हिं मसान-माहीं, काग ज्यों चोंचें भरें।।
संसार में विष-बेल नारी, तजि गये जोगीश्वरा।
‘द्यानत’ धरम दस पैड़ि चढ़ि के, शिव-महल में पग धरा।।

सरल अर्थ

शील की रक्षा नौ बाड़ों को लगाकर करनी चाहिए (व्यवहार ब्रह्मचर्य) और अंतर में आत्मचिंतन करना चाहिए (निश्चय ब्रह्मचर्य)। निश्चय एवं व्यवहार ब्रह्मचर्य की प्राप्ति के इच्छुक होकर मनुष्य जन्म सार्थक करना चाहिए। मन में ब्रह्मचर्य धारण कर माता, बहिन, पुत्री की पहचान करना चाहिए। वीरों के द्वारा होने वाली बाणों की वर्षा को यह जीव सहन कर लेता है, परंतु कुशील स्त्रियों के विकारी नेत्र रुपी बाण को सहन नहीं कर पाता। ऐसे काम रुपी रोग से पीड़ित स्त्री के अपवित्र शरीर में उसीप्रकार रति (प्रेम) करता है; जिसप्रकार श्मशान भूमि में सड़े हुए मृतक शरीर को कौआ प्रेमपूर्वक चोंच भरकर खाता है।
सर्वत्र नन्दतु संसार में नारी को विष- बेल के समान कहा गया है, जिसका सभी मुनिराजों ने त्याग कर दिया है। यहाँ कवि द्यानतरायजी कहते हैं कि ये दश धर्म रुपी सीढ़ियाँ चढ़कर जीव मोक्ष रुपी महल में प्रवेश हो जाता है।
(स्त्रियों को विष-बेल कहने का अभिप्राय स्त्रियों के प्रति काम की इच्छा रखना है, बहिन अथवा माता के प्रति राग रखना नहीं है।)

उदाहरण

  • उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म में प्रसिद्ध — सेठ सुदर्शन
  • कुशील के कारण दुर्गति को प्राप्त — यमदंड कोतवाल

काव्य

ब्रह्म रुप आतम है अपना।
शील विरुद्ध नहीं आचरना।।
इन्द्रिय विषयों से प्रीति छोड़ो।
विपरीत शील से नाता तोड़ो।।
कुशील पाप से दुख नहीं पाओ।
सुदर्शन, अनंतमती बन जाओ।।
— समकित शास्त्री

यह anti-virus हमें हमारे system की विशेषताएँ एवं खूबियाँ बताता है तथा अन्य virus के नुकसान से सावधान करता है।

कहानी

गुरुकुल के स्नातकों की मनोवैज्ञानिक परीक्षा करने के लिए गुरु ने शिष्यों से कहा- प्रत्येक छात्र आधे मुहूर्त तक इस पहाड़ की तरफ देखता रहे और वहाँ जिसको जो सुंदर वस्तु दिखे, वह मुझे बताना। सबने उस ओर देखा। समय पूर्ण होने पर किसी ने पत्थर, किसी ने कोई पेड़, किसी ने लताओं आदि की सुंदरता का वर्णन किया। अंत में एक छात्र ने बताया कि मुझे सबसे सुंदर अपना ज्ञान ही दिखा, जो सबको जान सकता है। यदि ज्ञान न हो तो दुनिया की कितनी भी सुंदर वस्तु की क्या कीमत!


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