दस धर्म का पहला अंग उत्तम क्षमा — परिभाषा, द्यानतराय कृत दशलक्षण पूजन का पद, सरल अर्थ, और प्रेरक प्रसंग: क्षमा से मुक्त हुए यशोधर मुनिराज व क्रोध से दुर्गति पाए द्विपायन मुनि। बच्चों व स्वाध्याय हेतु सरल भाषा में।
Uttam Kshama, the first of the ten dharmas of Das Lakshan — definition, dashlakshan pujan verse, simple meaning and inspiring stories (Yashodhar Muniraj, Dvipayan Muni). Das lakshan dharma for kids and swadhyay.
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उत्तम क्षमा
परिभाषा
क्षमा स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो क्रोध के अभाव रूप शान्ति स्वरुप पर्याय प्रकट होती है, उसे क्षमा कहते हैं।
क्रोध किसे कहते हैं ?
गुस्सा करने को क्रोध कहते हैं। क्रोध आत्मा की एक ऐसी विकृति है, ऐसी कमजोरी है, जिसके कारण उसका विवेक समाप्त हो जाता है, भले-बुरे की पहिचान नहीं रहती।
क्रोध क्यों आता है ?
- जब हमें लगता है कि किसी ने मेरा बुरा किया या काम बिगाड़ा
- जैसा हमने सोचा वैसा ना होकर कुछ और हो (अपेक्षा की उपेक्षा)
क्रोध के नुकसान
- बने हुये काम भी बिगड़ जाते हैं।
- स्वयं भी दुःखी होते है और दूसरों के साथ भी संबंध बिगाड़ लेते हैं।
उत्तम क्षमा धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी कृत दशलक्षण धर्म पूजन)
पीड़ें दुष्ट अनेक, बाँध मार बहुविधि करें।
धरिये छिमा विवेक, कोप न कीजें पीतमा।।
उत्तम छिमा गहो रे भाई, इह-भव जस, पर-भव सुखदाई।
गाली सुनि मन खेद न आनो, गुन को औगुन कहें अयानो।।
कहि है अयानो वस्तु छीनें, बाँध मार बहुविधि करें।
घर तैं निकारै तन विदारै, वैर जो न तहाँ धरै।।
ते करम पूरब किये खोटे, सहें क्यों नहीं जियरा।
अति क्रोध-अगनि बुझाय प्रानी, साम्य-जल ले सीयरा।।
सरल अर्थ
अनेक प्रकार बाँधकर, पीटकर या नाना प्रकार से दुष्टों के द्वारा कष्ट दिए जाने पर भी सज्जन क्रोध नहीं करते हैं एवं क्षमा रुपी विवेक को धारण करते हैं। हे भाई! उत्तम क्षमा को धारण करने से इस भव यश में तथा दूसरे भव में सुख प्राप्त होता है। यदि कोई गाली देता है तो मन में खेद-शोक नहीं ला चाहिए। यदि अज्ञानी/मूर्ख लोग अपने गुणों को अवगुण (दोष) भी कहें, हमारी वस्तु भी छीन लें, इतना ही नहीं, कई प्रकार से सताये जाने पर, बाँधे मारे जाने पर, घर से निकाल देने पर, शरीर को छिन्न-भिन्न कर देने पर भी वैर (दुश्मनी) को धारण नहीं करना चाहिए। हे जीव! जो पूर्व जन्म में खोटे (पाप) कर्म किए तो सहन करने (भोगने) ही पड़ेंगे। हे जीव! क्रोध रुपी अग्नि को समता रुपी शीतल जल लेकर बुझाना चाहिए। यही उत्तम क्षमा धर्म है।
प्रसंग / उदाहरण
- उत्तम क्षमा धर्म में प्रसिद्ध — यशोधर मुनिराज
- क्रोध के कारण दुर्गति को प्राप्त — द्वीपायन मुनि
काव्य
क्षमा धर्म का मूल है। क्रोध को करना भूल है।।
क्रोध क्षमा से मिटता है। क्रोधी मानव पीटता है।।
क्रोध से द्विपायन नरक गए। क्षमा से यशोधर मुक्त हुए।।
— समकित शास्त्री
क्षमा का anti-virus हमारे operating system को cool down रखता है और क्रोध virus से बचाता है।
कहानी
एक बार एक संत अपने कुछ शिष्यों को जीवन के रहस्य समझाने के लिए उन्हें एक गाँव ले गये। वहाँ एक ही परिवार के कुछ लोग लड़-झगड़ रहे थे तथा एक-दूसरों पर चीख-चिल्ला रहे थे। शिष्यों को जिंदगी के सबक सिखाने के लिए गुरु ने शिष्यों से पूछा कि लोग गुस्से में चीखते-चिल्लाते क्यों हैं? शिष्य ने कुछ सोचते हुए कहा- क्योंकि लोग गुस्से में अपना संयम और आपा खो देते हैं, इसलिये चीखते-चिल्लाते हैं।
गुरु ने फिर कहा पर जब लोग इतने नजदीक खड़े हैं तो फिर गुस्से में भी चिल्लाने की जरुरत क्यों पड़ती है? धीमी आवाज में भी तो अपना रोष प्रकट किया जा सकता है न! शिष्य ने उत्तर खोजने की कोशिश की, पर कुछ समझ न आने पर गुरु की ओर ही मुख किया।
तब गुरु ने कहा- जब हम सामने वाले पर क्रोधित होते हैं तो मन ही मन उससे दूर हो जाते हैं और दूर के व्यक्ति तक अपनी बात पहुँचाने के लिए चिल्लाना ही पड़ता है। व्यक्ति जितना दूर होगा, उतना ज्यादा जोर से चिल्लाना पड़ता है; उसीप्रकार हम सामने वाले से जितने ज्यादा क्रोधित होते हैं, मन से हम उससे उतना ही दूर हो जाते हैं और उतना ही ज्यादा उस पर चीखते-चिल्लाते हैं।
जैसे क्रोध आने पर हम सामने वाले व्यक्ति पर चिल्लाते हैं, उसकी बात भी सुनना पसंद नहीं करते, उससे दूर जाना चाहते हैं; क्योंकि हम मन ही मन उससे दूर हो जाते हैं तो उसीप्रकार हम क्रोध करते समय अपने आत्म-स्वभाव से भी दूर हो जाते हैं, अपनी आत्मा की बात भी सुनना नहीं चाहते और आत्म-स्वभाव से दूर भागते हैं। इसलिये सबसे पहले अपने आत्मा के प्रति क्रोध का नाश करो। शिष्य जीवन का एक महत्वपूर्ण सबक सीख चुका था।
स्रोत: जैन पाठशाला जयपुर (निदेशक — डॉ. बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग — समकित शास्त्री · jainpathshalajaipur.com