परमार्थ विंशतिका

परमार्थ विंशतिका

राग-द्वेष की परिणति के वश, होते नाना भाँति विकार।
जीव मात्र ने उन भावों को, देखा सुना अनेकों बार॥
किन्तु न जाना आत्मतत्त्व को, है अलभ्य सा उसका ज्ञान।
भव्यों से अभिवन्दित है नित, निर्मल यह चेतन भगवान ॥१ ॥

अंतर्बाह्य विकल्प जाल से, रहित शुद्ध चैतन्य स्वरूप।
शान्त और कृत-कृत्य सर्वथा, दिव्य अनन्त चतुष्टय रूप॥
छूती उसे न भय की ज्वाला, जो है समता रस में लीन।
वन्दनीय वह आत्म-स्वस्थता, हो जिससे आत्मोक सुख पीन॥२॥

एक स्वच्छ एकत्व ओर भी, जाता है जब मेरा ध्यान ।
वही ध्यान परमात्म तत्व का, करता कुछ आनन्द प्रदान ।।
शील और गुण युक्त बुद्धि जो, रहे एकता में कुछ काल।
हो प्रगटित आनन्द कला वह, जिसमें दर्शन ज्ञान विशाल ॥३॥

नहीं कार्य आश्रित मित्रों से, नहीं और इस जग से काम।
नहीं देह से नेह लेश अब, मुझे एकता में आराम ॥
विश्वचक्र में संयोगों वश, पाये मैंने अतिशय कष्ट ।
हुआ आज सबसे उदास मैं, मुझे एकता ही है इष्ट ॥४॥

जाने और देखता सबको, रहे तथा चैतन्य स्वरूप।
श्रेष्ठ तत्व है वही विश्व में, उसी रूप मैं नहिं पररूप ॥
राग द्वेष तन मन क्रोधादिक, सदा सर्वथा कर्मोत्पन्न ।
शत-शत शास्त्र श्रवण कर मैंने, किया यही दृढ़ यह सब भित्र ॥५॥

दुषमकाल अब शक्ति हीन तनु, सहे नहीं परीषह का भार।
दिन-दिन बढ़ती है निर्बलता, नहीं तीव्र तप पर अधिकार॥
नहीं कोई दिखता है अतिशय, दुष्कर्मों से पाऊँ त्रास।
इन सबसे क्या मुझे प्रयोजन, आत्मतत्त्व का है विश्वास ॥६॥

दर्शन ज्ञान परम सुखमय मैं, निज स्वरूप से हूँ द्युतिमान।
विद्यमान कमों से भी है, भिन्न शुद्ध चेतन भगवान ॥
कृष्ण वस्तु की परम निकटता, बतलाती मणि को सविकार।
शुद्ध दृष्टि से जब विलोकते, मणि स्वरूप तब तो अविकार ॥७॥

राग-द्वेष वर्णादि भाव सब, सदा अचेतन के हैं भाव।
हो सकते वे नहीं कभी भी, शुद्ध पुरुष के आत्मस्वभाव ॥
तत्व-दृष्टि हो अन्तरंग में, जो विलोकता स्वच्छ स्वरूप।
दिखता उसको परभावों से, रहित एक निज शुद्ध स्वरूप ॥८॥

पर पदार्थ के इष्टयोग को, साधु समझते है आपत्ति।
धनिकों के संगम को समझे, मन में भारी दु:खद विपत्ति।
धन मदिरा के तीव्रपान से, जो भूपति उन्मत महान।
उनका तनिक समागम भी तो, लगता मुनि को मरण समान ॥१॥

सुखदायक गुरुदेव वचन जो, मेरे मन में करे प्रकाश।
फिर मुझको यह विश्व शत्रु बन, भले सतत दे नाना त्रास ॥
दे न जगत भोजन तक मुझको, हो न पास में मेरे वित्त ।
देख नग्न उपहास करें जन, तो भी दुःखित नहीं हो चित्त ॥१०॥

दुःख व्याल से पूरित भव वन, हिसा अघद्रुम जहाँ अपार।
ठौर-ठौर दुर्गति-पल्लीपति, वहाँ भ्रमे यह प्राणि अपार ॥
सुगरु प्रकाशित दिव्य पंथ में, गमन करे जो आप मनुष्य।
अनुपम-निश्चल मोक्ष सौख्य को, पा लेता वह त्वरित अवश्य ॥११॥

साता और असाता दोनों कर्म और उसके हैं काज।
इसीलिए शुद्धात्म तत्व से, भिन्न उन्हें माने मुनिराज॥
भेद भावना में हो जिनका, रात-दिवस रहता है वास।
सुख-दुःख जन्य विकल्प कहाँ से, रहते ऐसे भवि के पास ॥१२॥

देव और प्रतिमा पूजन का, भक्ति भाव सह रहता ध्यान।
सुनें शास्त्र गुरुजन को पूजे, जब तक है व्यवहार प्रधान॥
निश्चय से समता से निज में, हुई लौन जो बुद्धि विशिष्ट।
वही हमारा तेज पुंजमय, आत्मतत्व सबसे उत्कृष्ट ॥१३॥

वर्षा हरे हर्ष को मेरे, दे तुषार तन को भी त्रास।
तपे सूर्य मेरे मस्तक पर, काटे मुझको मच्छर डांस॥
आकर के उपसर्ग भले ही, कर दें इस काया का पात।
नहीं किसी से भय है मुझको, जब मन में है तेरी बात ॥१४॥

मुख्य आँख इन्द्रिय कर्षकमय, ग्राम सर्वथा मृतक समान।
रागादिक कृषि से चेतन को, भिन्न जानना सम्यक्जान।
जो कुछ होना हो सो होगा, करूँ व्यर्थ ही क्यों मैं कष्ट?
विषयों की आशा तज करके आरधु मैं अपना इष्ट ॥१५ ॥

कर्मों के क्षय से उपशम से, अथवा गुरु का पा उपदेश।
अनकर आत्मतत्त्व का ज्ञाता, छोडे जो ममता नि:शेष॥
करे निरन्तर आत्म- भावना, हो न दुःखो से जो संतप्त।
ऐसा साधु पाप से जग में, कमलपत्र सम हो नहि लिप्त ॥१६॥

गुरु करुणा से मुक्ति प्राप्ति के लिए बना हूँ मैं निर्ग्रंथ ।
उसके सुख से इन्द्रिय सुख को, माने चित्त दुःख का पंथ॥
अपनी भूल विवश नर तब तक, लेता रहा खली का स्वाद।
जब तक उसे स्वच्छ मधु रसमय, नहीं शर्करा का हो स्वाद ॥१७॥

ध्यानाश्रित निर्ग्रन्थ भाव से, मुझे हुआ है जो आनन्द।
दुर्ध्यानाक्ष सुखों का तो फिर, कैसे करे स्मरण मतिमन्द ?
ऐसा कौन मनुज है जग में, तज करके जो जलता गेह।
छोड़ वापिका का शीतल जल, पड़े अग्नि में आप सनेह ॥ १८ ॥

मोह जन्य मोक्षाभिलाष भी, करे मोक्ष का स्वयं विरोध।
अन्य द्रव्य की करें न इच्छा, जिन्हें तत्त्व का है शुभ बोध ॥
आलोचन में दत्तचित्त नित, शुद्ध आत्म का जिन्हें विचार।
तत्त्वज्ञान में तत्पर मुनिजन, ग्रहे नहीं ममता का भार ॥१९॥

इस निर्मल चेतन के सुख का, जिस क्षण आता है आस्वाद।
विषय नष्ट होते सारे तब, रस समस्त लगते नि:स्वाद॥
होती दूर देह की ममता, मन वाणी हो जाते मौन।
गोष्ठी कथा, कुतूहल छूटे, उस सुख को नर जाने कौन ॥२०॥

वचनातीत, पक्षच्युत सुन्दर निश्चय नय से है यह तत्व ।
व्यवह्यति पथ में प्राप्त शिष्य, वचनों द्वारा समझें आत्मत्व ॥
करू तत्व का दिव्य कथन मैं, नहीं यहाँ वह शक्ति समृद्धि।
जान अशक्त आपको इसमें, मौन रहे मुझसा जड़ बुद्धि। ।२१॥

रचयिता - बा. ब्र. रविंद्र जी 'आत्मन’

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