उत्तम संयम धर्म — नाटिका
-ब्र. कु. बीना जैन (संघस्थ)
एक महिला अपने 6-7 साल के बच्चे को पुकारती है -
माँ-बेटा संयम !
संयम - हाँ माँ !
माँ - संयम बेटा ! इधर मेरे पास आओ।
संयम - माँ! मैं आ गया।
माँ-बेटा! तुम कमरे में क्या कर रहे थे ?
संयम - माँ ! मैं दादी माँ से अपने नाम का मतलब पूछ
रहा था।
माँ - (खुश होकर) अच्छा! तो क्या बताया दादी माँ ने ?
संयम-माँ ! दादी माँ कह रही थीं कि संयम का
मतलब होता है - नियम का अच्छी तरह से पालन करना। तो
माँ! नियम किसे कहते हैं ?
माँ - सुनो बेटा ! तुम रोज सुबह मंदिर जाते हो न ! यह
तुम्हारा एक नियम है।
संयम - अच्छा माँ ! और क्या है नियम ?
माँ- तुम रात में खाना नहीं खाते हो, यह भी नियम
है। और बताऊँ ! तुम प्रत्येक रविवार को पाठशाला में जैनधर्म
पढ़ने जाते हो, यह भी तो नियम है।
संयम - (खुशी से उछल पड़ता है) अरे वाह! मैं भी
इतने सारे नियम पालन करता हूँ।
माँ-हाँ बेटा! बचपन से इन छोटे-छोटे नियम का
पालन करते-करते व्यक्ति एक दिन पूर्ण संयम को धारण कर
लेता है।
संयम - माँ ! यह पूर्ण संयम क्या है ?
माँ-बेटा! घर-परिवार सब कुछ छोड़कर दीक्षा ले लेना
अर्थात् महाराज जी/माताजी बन जाना पूर्ण संयम है।
संयम - माँ ! यह तो बहुत कठिन है न !
माँ-बेटा! यह थोड़ा कठिन तो है परन्तु इससे व्यक्ति
महान् और पूज्य बन जाता है।
संयम-हाँ माँ ! इसीलिए महाराज जी/माताजी ऊँचे
तखत पर बैठते हैं और उनको सब लोग नमोस्तु करते हैं,
उनके चरण छूते हैं।
माँ- हाँ बेटा! इन महाराज जी/माताजी का आशीर्वाद
बहुत मंगलकारी होता है।
संयम - हाँ माँ! आप एक दिन बता रही थीं न कि मेरा
जनम भी एक माताजी के आशीर्वाद से हुआ है।
माँ - हाँ संयम ! उन माताजी ने मुझे एक मंत्र दिया था,
उसकी मैंने खूब जाप की (बेटे को दुलार करते हुए) और मुझे
बेटा मिल गया।
संयम - वो कौन सी माताजी हैं ?
माँ- उनका नाम है ज्ञानमती माताजी, इस समय वो
सबसे बड़ी माताजी हैं।
(बेटा माँ से चिपक जाता है और कहता है)
संयम - माँ! आप मुझे कभी भी छोड़कर माताजी मत
बन जाना।
माँ-ठीक है बेटा! (बेटे को चूम लेती है)
तभी अंदर से दादी माँ आ जाती हैं और उन्हें देखकर
हँसते हुए कहती हैं-)
दादी माँ-क्या बात है भाई ! आज तो माँ-बेटे में बड़ा
प्यार हो रहा है।
(सभी हँसने लगते हैं और बेटा जाकर दादी की गोद में
बैठ जाता है और कहता है-)
संयम-दादी माँ ! मुझे महाराज जी वाली कोई कहानी
सुनना है।
दादी माँ - ठीक है संयम बेटा! मैं तुम्हें एक अच्छी सी
कहानी सुनाती हूँ, ध्यान से सुनना।
(उसी समय संयम की दोनों बड़ी बहनें भी बाहर से
खेलकर आ जाती हैं) (दोनों के हाथ में बैडमिंटन दिखावें)
संयम - आओ जीजी ! आप दोनों बहुत अच्छे समय पर
आई हो, बैठो, दादी माँ एक कहानी सुनाने जा रही हैं।
(दोनों खुश हो जाती हैं और वहीं बैठ जाती हैं। संयम
भी अपनी दोनों बहनों के पास बैठ जाता है)
दोनों बहनें - हाँ हाँ! हम भी कहानी सुनेंगे।
(इस कहानी को भी पात्रों से तैयार कराकर मंच पर
नाटकरूप में दिखाएँ)
दादी माँ-आज से लगभग सौ साल पहले की बात है,
एक महाराज जी थे, उनका नाम था श्री शान्तिसागर जी महाराज।
(बच्चों से पूछती हैं) क्या नाम था उन महाराज जी का ?
बच्चे - श्री शान्तिसागर जी महाराज।
दादी माँ - एक बार वो किसी जंगल में बैठे थे, तभी दो
व्यक्ति वहाँ पर आए और उनके पास में बैठ गए, उन दोनों ने
महाराज जी को नमोस्तु भी नहीं किया।
बड़ी लड़की - दादी माँ ! उन्होंने महाराज जी को नमोस्तु
क्यों नहीं किया ?
दूसरी लड़की - क्या वे दोनों जैन नहीं थे क्या ?
दादी माँ-बच्चों ! वे दोनों जैन थे, लेकिन उन्होंने महाराज
जी से कहा कि हम आपको मुनि नहीं मानते हैं। (बच्चे आश्चर्य
से दादी माँ का मुख देख रहे हैं)
संयम - तब तो महाराज जी को गुस्सा आ गया होगा !
दादी माँ-नहीं! उनको जरा भी गुस्सा नहीं आया,
उन्होंने तो मुस्कुराते हुए उन्हें जवाब दिया कि कोई बात नहीं।
फिर उनमें से एक ने कहा कि आपको कोई ऋद्धि नहीं
है, आपके अवधिज्ञान नहीं है इसलिए हम आपको मुनि तो
नहीं मान सकते हैं।
बच्चे - फिर क्या हुआ दादी माँ ?
दादी माँ-फिर थोड़ी देर बाद महाराज जी ने उनसे
पूछा कि सामने जो पेड़ दिखाई दे रहा है, वह किस चीज का
है। तब एक व्यक्ति ने कहा कि वह आम का पेड़ है। तब
महाराज जी ने कहा कि हम उसको आम का पेड़ नहीं मानते
हैं। दूसरे व्यक्ति ने कहा-महाराज! आप किसी से भी पूछकर
देख लें, हर कोई जानता है कि यह आम का पेड़ है। लेकिन
महाराज जी नहीं माने उन्होंने कहा कि इस पेड़ में न तो आम
हैं, न बौर हैं इसलिए हम इसको आम का पेड़ मान ही नहीं
सकते हैं।
संयम - इसके बाद क्या हुआ दादी माँ ?
दादी माँ - फिर उन दोनों ने महाराज जी से दीक्षा ले ली
और दोनों महाराज जी बन गए। एक का नाम था श्री वीरसागर
जी महाराज और दूसरे मुनिराज का श्रीचन्द्रसागर जी महाराज।
बड़ी लड़की - इन शान्तिसागर जी महाराज का नाम तो
मैंने भी बहुत सुना है।
दूसरी लड़की - दादी माँ! ये महाराज जी बहुत ज्यादा
तपस्या करते थे न !
दादी माँ - हाँ बेटी ! ये बहुत तपस्वी थे। बताऊँ बच्चों !
एक बार वे महाराज जी एक गुफा के अंदर ध्यान कर रहे थे।
तभी एक साँप आया और महाराज जी के शरीर पर चढ़ गया।
संयम - (डरते हुए) अरे बाप रे! महाराज जी तो खूब
डर गए होंगे और गुफा से बाहर आ गए होंगे ?
दादी माँ - (बेटे को गोद में बिठाते हुए) नहीं बेटा! वे
महाराज जी जैसे के तैसे बैठे रहे, ध्यान करते रहे, फिर वह
साँप महाराज जी के गले में लिपट गया।
संयम-मुझे तो साँप को दूर से ही देखकर डर
लगता है।
दोनों बहनें - हाँ हाँ! मुझे भी साँप से बहुत डर
लगता है।
संयम - दादी माँ ! फिर क्या हुआ ?
दादी माँ - थोड़ी देर बाद साँप जहाँ से आया था, वहाँ
चला गया।
तब उनमें से एक व्यक्ति ने समझाते हुए कहा कि
महाराज ! जब आम का मौसम आएगा तब इसी पेड़ में बौर
आएगा और आम आएंगे, अभी चूँकि आम का मौसम नहीं है निडर थे।
इसलिए इसमें न तो बौर हैं और न आम के फल हैं।
यह सुनकर महाराज जी ने तुरंत कहा-महानुभावों !
इसी प्रकार हम भी मुनि हैं, जब चौथा काल आएगा, तब
इसी मुनिवेष में ही ऋद्धियाँ होंगी, अवधिज्ञान होगा,
अभी चूँकि पंचमकाल चल रहा है इसलिए हमारे ऋद्धि
आदि नहीं हैं।
बड़ी लड़की - अरे वाह ! महाराज जी ने तो बहुत अच्छी
बात कही दादी माँ!
दादी माँ-हाँ बेटी! इतना सुनते ही वे दोनों व्यक्ति
महाराज जी के चरणों में लेट गए और बोले गुरुवर ! हमें क्षमा
कर दीजिए, हमने आपका आदर नहीं किया।
दूसरी लड़की - लेकिन दादी माँ! महाराज जी तो गुस्सा
ही नहीं हुए थे !
दादी माँ-हाँ बेटी ! उनका जैसा नाम था वैसे ही वे
शान्ति के सागर थे।
बड़ी लड़की - वे महाराज जी तो वास्तव में बहुत
दादी माँ-हाँ, वे बहुत निडर थे। और बताऊँ बच्चों.
वे शान्तिसागर जी महाराज हमेशा कहा करते थे कि
संयम धारण करने में कभी भी डरना नहीं चाहिए क्योंकि
संयम के द्वारा मनुष्य अपनी आत्मा को भगवान् बना सकता
है। तो बच्चों ! कैसी लगी कहानी ?
सभी बच्चे - बहुत अच्छी, दादी माँ !
दादी माँ - जय बोलो श्री शान्तिसागर जी महाराज की !
बच्चे-जय।
दादी माँ - उत्तम संयम धर्म की।
बच्चे-जय ।
संयम - दादी माँ ! अब मैं आपसे रोज एक कहानी सुनूँगा,
आपको तो बहुत सारी कहानी आती हैं न, दादी माँ !
दादी माँ - हाँ बेटा ! मैंने तुम्हारे लिए खूब सारी कहानियाँ
पढ़ रखी हैं, अब मैं तुम्हें रोज एक कहानी सुनाऊँगी।
प्रूफरीडिंग बाकी है