दस लक्षण का उत्तम तप धर्म — इच्छा-निरोध व तप की परिभाषा, दशलक्षण पूजन पद (जिसे इन्द्र भी चाहें), सरल अर्थ और प्रसंग सुकुमाल मुनिराज। तप व्रत पर बालोपयोगी सामग्री।
Uttam Tap of Das Lakshan — the dharma of austerity and desire-control: definition, pujan verse, meaning and the Sukumaal Muniraj prasang. Das lakshan dharma on tap.
डाउनलोड / Download PDF: 07-uttam-tap.pdf
दस लक्षण का उत्तम तप धर्म
परिभाषा
समस्त रागादि भावों की इच्छा के त्याग पूर्वक आत्मलीनता द्वारा विकारों पर विजय प्राप्त करना, तप है। ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है।
अतप किसे कहते हैं ?
विषयों की इच्छा पूरी करने को ही, अतप कहते हैं।
तप बारह प्रकार के होते हैं-
6 बहिरंग तप - अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश
6 अंतरंग तप - प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान
अतप क्यों होता है ?
- इच्छाओं की गुलामी के कारण व्यक्ति तप नहीं कर पाता है।
- आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति के बिना तप संभव नहीं है।
अतप के नुकसान
- निरंतर नई-नई इच्छाओं के कारण व्यक्ति सदा दुःखी रहता है।
- इच्छाओं की पूर्ति के बाद भी जीवन में संतोष नहीं होता है।
उत्तम तप धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन)
तप चाहें सुरराय, करम-शिखर को वज्र है।
द्वादश विधि सुखदाय, क्यों न करे निज सक्ति समा।।
उत्तम तप सब-माहिं बखाना, करम-शैल को वज्र-समाना।
बस्यो अनादि-निगोद-मँझारा, भू-विकलत्रय-पशु-तन धारा।।
धारा मनुष-तन महा-दुर्लभ, सुकुल आयु निरोगता।
श्री जैनवानी तत्वज्ञानी, भई विषय-पयोगता।।
अति महादुरलभ त्याग विषय, कषाय जो तप आदरें।
नर-भव अनूपम कनक-घर पर, मणिमयी-कलसा धरें।।
सरल अर्थ
उत्तम तप धर्म को देवों के राजा (इंद्र) भी चाहते हैं। यह तप कर्म रूपी पर्वतों को नष्ट करने के लिए वज्र के समान है। ये बारह प्रकार के तप सुख को देने वाले हैं तो क्यों न उन्हें अपनी शक्ति के अनुसार धारण करें। कर्म रूपी पर्वतों को नष्ट करने के लिए उत्तम तप धर्म वज्र के समान सभी शास्त्रों में कहा है। यह जीव अनादि काल से निगोद में रहा है। वहाँ से निकलकर पृथ्वी आदि स्थावर एवं उसके बाद दो इन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय आदि हुआ; फिर तिर्यंच का शरीर धारण किया। अब यह मनुष्य पर्याय बड़ी कठिनता से धारण की। उसमें भी उत्तम कुल, पूर्ण आयु, निरोगी शरीर, जिनवाणी का संयोग, तत्वज्ञान, आत्मचिंतन में उपयोग बड़ी दुर्लभता से प्राप्त हुआ। जो जीव महा कठिन विषय और कषाय का त्याग कर तप को आदर पूर्वक ग्रहण करते हैं, वे मनुष्य भव रूपी अलौकिक स्वर्ण घर पर, नीलमणि आदि रत्नमय कलश चढ़ाते हैं अर्थात् मनुष्य जन्म को सार्थक बनाते हैं।
प्रसंग / उदाहरण
- उत्तम तप धर्म में प्रसिद्ध — सुकुमाल मुनिराज
- अतप के कारण दुर्गति को प्राप्त — कौरव
काव्य
आत्मलीनता ही तप जानो।
सब पर वस्तु रहित निज मानो।।
विषयों की इच्छा नहीं करना।
निर्वांछक हो तप आचरना।।
नर भव की महिमा पहचानो।
सुकुमाल महामुनि सम तप ठानो।।
— समकित शास्त्री
तप का anti-virus हमें विषय भोगों के virus से बचाता है।
कहानी
एक बार सम्राट चन्द्रगुप्त भटक कर एक गुफा के पास पहुँचे। गुफा में से किसी व्यक्ति की आवाज आ रही थी। वहाँ एक मुनिराज पाठ कर रहे थे। सम्राट ने पूछा- भीतर कौन है? भीतर से आवाज आई- पहले आप अपना परिचय दें कि आप कौन हैं? सम्राट ने उत्तर दिया- मैं चक्रवर्ती हूँ। भीतर से पुनः प्रश्न आया- आप चक्रवर्ती कैसे बने? सम्राट ने उत्तर दिया- मैंने अपनी सेना के बल से षट्खंडों को वश किया है और उन पर विजय पाई है। भीतर से आवाज आई- मैं भी षट्खंडों का विजेता चक्रवर्ती हूँ। सम्राट ने आश्चर्य से पूछा- आप चक्रवर्ती कैसे हुए? उत्तर आया मैंने तप बल से मन-वचन-काय, राग-द्वेष-मोह- इन षट् खंडों को जीता है। क्या तुम इन पर विजय पा सके हो। यह उत्तर सुनकर सम्राट चंद्रगुप्त स्वयं से भी बड़े चक्रवर्ती के सामने नतमस्तक हो गया और उसने कहा- असली चक्रवर्ती तो आप ही हैं। आपके तप बल के सामने मेरा सैन्य बल कुछ भी नहीं है; क्योंकि जिसने स्वयं को जीता है, वही असली विजेता है।
स्रोत: दिगम्बर जैन महासमिति (धार्मिक प्रकोष्ठ चेयरमैन - डॉ.बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग - समकित शास्त्री
प्रूफरीडिंग बाकी है