दस लक्षण का उत्तम सत्य धर्म — सत्य वचन की परिभाषा, दशलक्षण पूजन पद, सरल अर्थ और प्रसंग (सत्य से मुनिराज-श्रावक की प्रतिष्ठा)। सत्य व्रत पर बालोपयोगी सामग्री।
Uttam Satya of Das Lakshan — the dharma of truthfulness: definition, pujan verse, simple meaning and prasang. Das lakshan dharma on satya for kids and swadhyay.
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दस लक्षण का उत्तम सत्य धर्म
परिभाषा
सत्यभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो शान्तिस्वरूप वीतराग परिणति उत्पन्न होती है, उसे सत्यधर्म कहते हैं। सत्य के साथ लगा ‘उत्तम’ शब्द मिथ्यात्व के अभाव और सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है।
असत्य किसे कहते हैं ?
वस्तु के सही स्वरूप को समझे बिना कह देना, असत्य है। सत्य बोलने से पहले सत्य समझना भी आवश्यक है। सत्य को परखे बिना बोलाना झूठ बोलने के समान है।
असत्य क्यों बोलते हैं ?
- किसी भी पाप कार्य को करने के लिए या किसी पाप कार्य को छुपाने के लिए व्यक्ति झूठ बोलता है।
- अपने झूठे मान-सम्मान के लिए व्यक्ति किसी भी प्रकार का झूठ बोल सकता है।
असत्य बोलने के नुकसान
- झूठ बोलने पर हमारा कार्य सिद्ध हो या न हो; पर झूठ पकड़े जाने का भय निरंतर बना रहता है।
- झूठ पकड़े जाने पर विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है।
उत्तम सत्य धर्म — पूजन पद (द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन)
कठिन-वचन मत बोल, पर-निंदा अरु झूठ तज।
साँच जवाहर खोल, सतवादी जग में सुखी।।
उत्तम-सत्य-वरत पालीजे, पर-विश्वासघात नहिं कीजे।
साँचे-झूठे मानुष देखो, आपन-पूत स्वपास न पेखो।।
पेखो तिहायत पुरुष साँचे, को दरब सब दीजिए।
मुनिराज-श्रावक की प्रतिष्ठा, साँच-गुन लख लीजिये।।
ऊँचे सिंहासन बैठि वसु-नृप, धरम का भूपति भया।
वच-झूठ-सेती नरक पहुँचा, सुरग में नारद गया।।
सरल अर्थ
कठिन (कठोर) वचन कभी नहीं बोलना चाहिए। दूसरों की निंदा और झूठ वचनों का त्याग करो। सत्यरुपी जवाहर रत्न का उपयोग करने वाला और सत्य बोलने वाला प्राणी, संसार में सुखी रहता है। अतः उत्तम सत्य धर्म का पालन करना चाहिए और दूसरों के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए। जगत् में सच्चे-झूठे मनुष्यों का स्वरूप जानने वाले व्यक्ति, झूठ बोलने वाले अपने पुत्र पर भी विश्वास नहीं करते और सत्य बोलने वाले अन्य का विश्वास कर धन भी देते हैं। सच्चे गुणों या सत्य धर्म को ग्रहण करने से मुनिराजों और श्रावकों की प्रतिष्ठा (सम्मान) होती हैं। ऊँचे आसन पर बैठकर राजा वसु न्याय किया करता था और मात्र एक झूठ बोलने से नरक में चला गया तथा सत्य बोलने वाला एक नारद स्वर्ग गया।
प्रसंग / उदाहरण
- उत्तम सत्य धर्म में प्रसिद्ध — धनदेव
- असत्य के कारण दुर्गति को प्राप्त — सत्यघोष
काव्य
सत्य स्वभावी आतम मेरा।
झूठे को कर्मों ने घेरा।।
हित-मित-प्रिय वचन नित कहना।
झूठ बोल विश्वास ना खोना।।
सत्यघोष का हुआ अपमान।
धनदेव जी पहुंचे देव विमान।।
— समकित शास्त्री
यह anti-virus हमें झूठ के virus से बचाता है।
कहानी
एक बार एक व्यक्ति एक संत के पास आया और रोते हुए कहा कि मैं बहुत बुरा आदमी हूँ। हर प्रकार के व्यसन में लिप्त हूँ कि मुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। संत ने उसे शांत रहने के लिए कहा और पूछा- क्या तुम इन सभी गलत कार्यों को छोड़ना चाहते हो। व्यक्ति ने कहा मैं छोड़ना तो चाहता हूँ, पर छोड़ ही नहीं पाता हूँ।
संत ने कहा तुम्हें कोई भी गलत कार्य छोड़ने की जरुरत नहीं। बस, तुम प्रतिज्ञा करो कि कभी झूठ नहीं - बोलोगे। उस व्यक्ति ने वादा किया कि वह अब से झूठ नहीं बोलेगा। अगले दिन उसने कुछ पैसे चुराने का सोचा, परंतु यह सोचकर की पत्नी पूछेगी कि पैसे कहाँ से आये तो वह कैसे बता पायेगा कि ये पैसे चोरी के है और किसी को यह पता चला तो मेरी कितनी बदनामी होगी और मुझे सजा भी मिल सकती है। यह सोचकर उसने चोरी करने का इरादा छोड़ दिया।
अगले दिन उसे शराब पीने का मन किया, परंतु यह सोचकर कि संत से मिलने पर उन्होंने पूछा तो मैं झूठ भी नहीं बोल पाऊँगा और सच बोला तो उनसे नजरें कैसे मिला पाऊँगा। यह सोचकर कि सच बोलने से मेरी प्रतिष्ठा और नाम खराब हो जायेगा। ऐसे करते-करते उसकी सारी बुराइयाँ अपने आप उससे दूर होती गई और एक दिन वह एक सज्जन और सभ्य व्यक्ति बन गया।
एक अकेले सत्य में इतनी ताकत है कि वह आपकी सारी बुराइयों को दूर कर सकता है।
*स्रोत: जैन पाठशाला जयपुर (निदेशक - डॉ.बी.सी. जैन) · विशेष सहयोग - समकित शास्त्री
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