निगोद में दुख है या अचेतनता?

नित्य निगोदिया जीव के द्रव्य ओर क्षेत्र परावर्तन कैसे होता है? ओर जैसे हमे निद्रा के समय कम ज्ञान होता है और दुख भी नही होता तो वैसे ही निगोद दशा में कम ज्ञान होता है। तो उसको अधिक दुख कैसे होता है?

निगोदिया जीवों का स्वरूप

यह जीव अनन्त काल से नित्य निगोद की अवस्था में ही पड़ा हुआ है। भगवान समान पूर्ण सामर्थ्य होने पर भी गुणों का प्रकाश नाम मात्र का है। जैसे - चमकता हीरा तो हो। पर उसके जरा से भाग को ही उघाड़ दिया जाए शेष भाग को ढंक दिया जाए। निगोदिया जीवों के गुण तो सिद्ध समान है। परन्तु कर्मरूपी आवरण के कारण प्रकाशित बहुत ही थोड़े है। जिसका ज्ञान अनन्तरूप है परन्तु प्रकाशित मात्र अक्षर के अनन्तवें भाग जितना है। ऐसे ही निगोदिया जीवों के सभी गुणों का घात होता है।

इस संसार में दो ही वस्तुएं अव्यक्त है। एक निगोद अवस्था का दुःख और दूसरा निजात्मा का अपार सुख। पण्डित दौलतराम जी ने ज्ञान को ही परमसुख का कारण कहा है। परन्तु ऐसी ज्ञान-हीनता की दशा तो दुःख का कारण होगी ही। इनसे तो नरक की दशा भी भली होगी। क्योंकि वहाँ अपने दुःख को एहसास करने की तो सामर्थ्य है। सम्यग्दर्शन प्राप्ति की योग्यता तो है। परन्तु निगोद दशा में तो इसकी भी सामर्थ्य नही। करणानुयोग में इन जीवों के लिए एक नाम है - ‘सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक’। अर्थात् यह जीव पर्याप्त भी नही है। अपर्याप्तक है। इनके पर्याप्तिया भी पूर्ण नही है। ऐसे नित्य निगोद से निकलना ऐसा है जैसे भाड़ में भुजते हुए चने का उचट जाना। वहाँ की इतनी अधिक जीव राशि में से छह माह आठ समय में मात्र ६०८ जीव ही निकलतें है।

और वहाँ से निकलकर त्रस होते है। त्रसपर्याय का उत्कृष्ट काल साधिक दो हजार सागर ही है। अर्थात् पुनः इतर निगोद , एकेन्द्रिय अवस्था को चले जाते है। और फिर बहुत से काल वही रहतें है। जैसे अगर किसी व्यक्ति के कोई दुःख होता है तो उसे वह कह तो सकता है। ‘व्यक्त’ कर सकता है। परन्तु निगोदिया जीव के पास यह क्षमता भी नही।

यह बादर और सूक्ष्म के भेद से दो प्रकार के होते है। बादर तो हवा , पहाड़ , पानी आदि के प्रभाव से रुक जाते है , मृत्यु को भी प्राप्त हो जाते है। पर सूक्ष्म को इनसे भी कोई प्रभाव नही पड़ता। इनमें से कई एक श्वासोच्छ्वास में अठारह बार जन्म-मरण कर लेते है। एक श्वासोच्छ्वास में २००० कोड़ाकोड़ी आवली होती है। जघन्य युक्तासंख्यात समयों की एक आवली होती है। काल के अविभागी अंश को ही समय कहतें है। अर्थात् २००० कोडकोडी आवलियों में यह १८ बार जन्म-मरण भी इसी पर्याय में कर लेते है। अर्थात् जन्में निगोद की अवस्था में उसी अवस्था में मरण हुआ फिर पुनः उसी अवस्था में जन्म ले लिया। इस प्रकार बहुत काल के लिए ही उसमें जन्म-मरण करते है। कुछ जीव मात्र एक श्वासोच्छ्वास में १८ बार जन्म-मरण करते है। कुछ अधिक काल लेते है। बल्कि एक श्वासोच्छ्वास में १८ बार जन्म-मरण करने वालों से अधिक काल लेने वाले अधिक है।

नित्यनिगोदिया अनादि-अनन्त और अनादि-सान्त के भेद से दो प्रकार के है। अनादि-अनन्त वह है जो आजतक न कभी नित्यनिगोद की अवस्था से निकले और न कभी निकलेंगे। अर्थात् हमेशा के लिए उसी पर्याय के होके रहेंगे। कुछ लोग शंका करते है कि इतने जीव मोक्ष पातें है तो क्या संसार में एक दिन जीवराशि समाप्त नही होवेगी। क्या सभी मोक्ष नही पावेंगे…परंतु ऐसा नही है क्योंकि सम्पूर्ण जीवराशी अक्षय अनंत है और अक्षय अनंत राशि कभी भी समाप्त नही होती।

अनादि-सान्त राशि वह है जो नित्यनिगोद से बाहर नही निकली पर समय आने पर अवश्य बाहर त्रस पर्याय में आएगी। जो राशि एक बार नित्य निगोद से निकली है। वह पुनः कभी नित्य निगोद में वापिस नही जाती। नित्य निगोद से जो छह महीने आठ समय में ६०८ जीवों के निकलने का कथन है वह इसी अनादि-सान्त राशि से निकलते है। क्योंकि अनादि-अनन्त जीवराशि से कभी कोई जीव नही निकलता।

आज जितने भी जीव देव , नरक , मनुष्य और तिर्यंच चतुर्गति भ्रमण कर रहे है। वह सभी नित्य निगोद से निकलकर ही बाहर आए है। देखो ! कितना कठिन है निगोद से निकलना और अगर साधिक दो हजार सागर की उत्कृष्ट त्रसकाल में भी अपना कल्याण नही किया तो फिर इतरनिगोद है। उसमें भी बहुत से काल बीतते है। और त्रस हुए तो भी उसमें अगर विकलेन्द्रिय हुए तो उसमें कितना काल निकलता है। कितनी दुर्लभ है मनुष्य पर्याय। उसमें भी अनुकूलताओं का मिलना। देव-शास्त्र-गुरु का मिलना। बहुत दुर्लभ है।

पण्डित टोडरमल जी लिखतें है - “नित्यनिगोद से निकलकर बाद में त्रस में तो बहुत थोडें ही काल रहता है तथा कितने काल तक पृथ्वी , अप् , तेज , वायु और प्रत्येक वनस्पति में रहना होता है। नित्यनिगोद से निकलकर बाद में त्रस में रहने का उत्कृष्ट काल तो साधिक दो हजार सागर ही है तथा एकेन्द्रिय में रहने का उत्कृष्ट काल असंख्यात पुद्गलपरावर्तन मात्र है और पुद्गलपरावर्तन का काल ऐसा है जिसके अन्नतवें भाग में भी अनन्त सागर होते हैं। इसलिए इस संसारी के मुख्यतः एकेन्द्रिय पर्याय में ही बहुत काल व्यतीत होता है।”

यह एकेन्द्रिय जीव बहुत कषाय करते है। इनके बाह्य व आंतरिक दोनों प्रकार के बहुत से दुःख होते है। और ऐसी दुःखमय अवस्था में ही बहुत सा काल बिताते है।

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हमारा वास्तविक दुःख, दुःखी होने से नहीं है अपितु दुःख के वेदन से है। जिसकी जितनी इन्द्रिय उसे उतना वेदन। अरे कई बार तो दुःख न होते हुए भी जीव के दुःख का वेदन इतना प्रबल होता है कि वह मन में दुःख को खुद-ब-खुद गढ़ लेता है।

वास्तविक दु:ख तो अज्ञान ही है।
जिसे जितना अधिक ज्ञान उसे उतनी ही आसानी से सुलटने का उपाय बन सकता है। जितनी कम इन्द्रियाँ उतना कम अज्ञान दूर करने की योग्यता।

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दु:ख के वेदन के अभाव में दुःख का और क्या स्वरूप हो सकता है?

कृपया यह बताये की निगोदिया जीव के पांच परावर्तन होते है या नही । होते है तो कैसे होते है?

तो क्या निगोदिया जीव को दुख का वेदन कम है ? क्यों की उसके कम इन्द्रिया है!
और दूसरी तरफ जहां तक अज्ञान कि बात है ? इसमें कोन से ज्ञान के अभाव की बात है -क्षयोपशम ज्ञान या सम्यक ज्ञान ?

आपका jinswara में हार्दिक स्वागत है! यह आपका प्रथम अनुभव सुखद हो!

इन्द्रिय ज्ञान - दु:ख का ज्ञान - दु:ख का वेदन कम
आसक्ति/विषयेच्छा अत्यधिक एवं शक्ति-हीनता अत्यधिक होने से महा दुःखी

दोनों

अतः 4 प्रकार का दुःख -

  1. दुःख के वेदन से - हमारी पकड़ में आता है और इन्द्रियों के बढ़ने से घटता है।
  2. कषाय से दुःख - हमारे अनुभव में आता है और तीव्र लेश्या या व्यथित परिणामों से बढ़ता है।
  3. शक्तिहीनता का दुःख - हमारे अनुभव में आता है और इन्द्रियाँ घटने पर बढ़ता जाता है।
  4. मिथ्यात्व से दुःख - स्थूलता से पकड़ में नहीं आता और सदा एक जैसा रहता है क्योंकि अभिप्राय का दोष है।
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Well described
सही हैं, दुःख का कारण अज्ञान हैं और दुःख कषाय से होता हैं। निगोद में तीव्रअज्ञान और तीव्र कषाय दोनों हैं, इसलिए दुःख हैं। अब यहाँ दुःख क्या हैं या दुःख किसे कहते हैं? इसे भी स्पष्ट करे।

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अभी बुद्धि का server down है, इसलिए उधार लेकर कहता हूँ -

नियमसार गाथा 6 -
दुःख/पीड़ा = शरीर और आत्मा के एकत्व से जनित प्रतिकूल अवस्था

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सही कहा !! परन्तु मुझे यह दुख के वेदन वाला दुख और शक्तिहीनता के दुख में ज्यादा अंतर ख्याल में नहीं आया ?
दूसरी बात जो निगोदिया जीव के पांच परावर्तन वाली बात है उसको भी स्पष्ट कीजिए l

अभय कुमार जी के स्वाध्याय से :
अगर तुम्हारी आखों पर काली पट्टी बांधकर तुम्हे कहि ले जाये, स्कूटर पर बैठाकर ले जाये, तो थोड़ी ही देर में तुम्हे कितनी बेचैनी होने लगेगी, जब एक इन्द्रिय पर आवरण पड़ने से इतनी बेचैनी हुई तो सोचो निगोद में कितनी बेचैनी होगी |

सुदृष्टितरंगनी से :
किसी के हाथ पैर बांधकर, उसे रस्सी से उल्टा लटकादें और फिर उसे डंडे से मारे (like third degree torture), तो ऐसा दुःख तो नरक में है और यदि किसी के हाथ पैर बांधकर, सुई धागे से उसकी दोनों आँखें सिल दे, उसके दोनों होठ सिलदे, उसके दोनों कान सिलदे, उसकी नाक सिलदे और उसे एक बोरी में इतना कस कर बांधदे की वो हिल डुल न पाए, फिर उसे डंडे से मारे, तो ऐसा दुःख निगोद में है |

As per my understanding :
यदि कोई कहे की मन के बिना दुःख संभव नहीं, तो बहुत से पंछी मुर्गी आदि मन से रहित असंज्ञी है पर वे प्रत्यक्ष ही दुखी देखे जाते है, सो यह सिद्ध होता है की मन के बिना भी जीव बहुत दुःख अनुभव कर सकता है |

यदि कोई कहे कि मन और इन्द्रियों के अभाव में इच्छाओ का भी अभाव हो जायेगा, सो चींटी के मन तो नहीं है पर गुण खाने की इच्छा है, मक्खी को मिठाई पर बैठने की, छोटी मछली को निरंतर भोजन ढूंढ़ने कि, सो मन के आभाव में भी इन जीवो को छुदा कि अत्यंत वेदना है, सो यह सिद्ध होता है कि मन के अभाव होने पर भी छुदा तृषा राग द्वेष आदि 18 दोषो का अभाव नहीं होता ।

यदि कोई कहे कि अल्प ज्ञान तो बहुत दुःख अनुभव नहीं कर सकता, सो स्वप्न में तो ज्ञान थोड़ा है, परन्तु यदि स्वप्न में भूत देखा हो तो स्वप्न में थोड़ी भय कसाय उत्तपन्न होती है या बहुत होती है, आप तो स्वप्न से जागने पर भी डर के कारन थोड़ी देर अपनी जगह से हिलता डुलता भी नहीं, सो यह सिद्ध होता है कि थोड़े ज्ञान में भी तीव्र कसाय उत्तपन्न हो सकती है । अल्प ज्ञान भी तीव्र कसाय का वेदन कर सकता है ।

जैसे बड़े शीशे में भी हाथी झलक सकता है और शीशे के छोटे से टुकड़े में भी हाथी झलक सकता है, हाथी झलकने के लिए शीशे के बड़े-छोटे होने से फरक नहीं पड़ता । ऐसे ही बहुत ज्ञान भी बड़े दुःख का वेदन कर सकता है और अल्प ज्ञान भी बड़े दुःख का वेदन कर सकता है, बहुत दुःख का वेदन करने के लिए बहुत ज्ञान चाहिए, ऐसा नहीं ।

[जैसे किसी मुनि के ज्ञान थोड़ा होने पर भी वे सुरेंद्र,नरेंद्र और असुरेन्द्र से भी अधिक सुख को अनुभवते है और सुरेंद्र,नरेंद्र,असुरेन्द्र बहुत ज्ञान होने पर भी मुनि जितना सुख नहीं अनुभवते ] [गर्भ में (शुरू के ३ माह में) शिशु के इन्द्रियों का विकास तो नहीं हुआ परन्तु माता खाबे चरपरो, सो एसिड बूँद बूँद करके गिरता है सो थोड़े (निद्रा जितने) ज्ञान में भी जलन अनुभव करता है ]

जो जैसा अनुभवता है, वो वैसा ही परिणमता है (from समयसार) । सो यदि अक्षर के अनंतवे भाग जितना ज्ञान भी आकुलता का अनुभव करे, तो पूरा आत्मा ही आकुलता रूप परिणमता है । क्योंकि ज्ञान का अंश भी पूर्ण आत्मा है ।

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निगोदिया जीव को 3 परावर्तन हो सकते हैं।

देखें - संसारिणो मुक्ताश्च की टीकाएँ… सर्वार्थसिद्धि

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konse 3 ?

Sir, these are like senses… If its 1 then it means first only, 2 means first 2 and so on.