सूर्य ग्रहण संबंधी

जिनागम में ग्रहण🌑 का क्या महत्व है?

आजकल कुछ लोग सूर्य-चन्द्रग्रहणादि को अन्धविश्वास मानते हैं और इनके दौरान न करने योग्य कार्य को भी करते हैं। जबकि यह अन्धविश्वास नहीं है, अपितु वैज्ञानिक दृष्टि से भी मान्य है कि इस दौरान कुछ अकरणीय को करने से हानि हो सकती है। जैसे गर्भिणी स्त्री को चाकू या कैंची का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसी तरह और भी अनेक कार्यों का निषेध किया गया है। जैनधर्म में भी इसके बारे में पर्याप्त रूप से कहा गया है। न केवल श्वेताम्बर ग्रन्थों में, अपितु दिगम्बर ग्रन्थों में भी ग्रहणकाल में स्वाध्याय आदि का निषेध किया गया है। श्वेताम्बर जैन परम्परा के ग्रन्थ स्थानांगसूत्र में तो इस सम्बन्ध में बहुत अधिक लिखा गया है। कुछ निश्चयाभाषी जैसे लोग इसे व्यर्थ कहकर मजाक बनाते हैं, उनको दिगम्बराचार्य अमृतचन्द्र विरचित पुरुषार्थसिद्धि-उपाय नामक ग्रन्थ के श्लोक संख्या 36 को देखना चाहिए। वहां स्पष्ट रूप से सम्यक् ज्ञान के 8 अंगों के नाम गिनाते हुए कहा है कि चारों सन्ध्याओं की अन्तिम दो-दो घड़ियों, में दिग्दाह, उल्कापात, वज्रपात, इन्द्रधनुष, सूर्य-चन्द्रग्रहण, तूफान, भूकम्प आदि उत्पातों के समय में सिद्धान्तग्रन्थों का पठन-पाठन वर्जित है। हां, स्तोत्र, आराधना, धर्मकथादिक के ग्रन्थ पढ़ सकते हैं।

-डाॅ0 शुद्धात्मप्रकाश जैन, मुम्बई
( व्हाट्सएप से संकलित )

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जैन मतानुसार सूर्य चंद्र आदि ज्योतिषी देव है, ये निरंतर चलते रहते है, जब सूर्य के नीचे राहु का विमान आ जाता है तो सूर्य ग्रहण होता है, इसमें कोई दोष नहीं। पूजा स्वाध्याय आदि करने में कोई परेशानी नहीं। शास्त्रों में सिद्धांत ग्रन्थ पढ़ने का निषेद है, उसका कुछ और कारन है, क्योकि और मतों वालो के द्वारा शोर और disturbance होती है।

क्या कालाचार का यही अर्थ है या इसका सम्बन्ध सन्धि काल/अति जीव हानि से है।

मेरी समझ से जिनागम में ग्रहण को वास्तविक स्थान दिया गया है; किन्तु इसे कालाचार के अन्तर्गत स्वीकार कर सिद्धान्त शास्त्रों को पढ़ने हेतु निषिद्ध माना गया है।
कारण -

  1. इस समय वातावरण में अधिक जीव होने से सर्व प्रकार की कायिक एवं वाचनिक क्रिया का निषेध किया गया है।
  2. जीव हानि की बहुलता से साधक के परिणामों में मन्दता आती है और वह चित्त को स्थिर करने हेतु सामायिक में स्थिर हो जाता है।
  3. इस काल में जीवों का आवागमन तीव्र हो जाने से दृष्टि, उपयोग, ग्रन्थ-संरक्षण सब स्खलित हो जाता है।
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सूर्य ग्रहण सम्बन्धी कुछ विशेष क्रियाएं होती है या होनी चाहिए (जैसे ऊपर शास्त्रों के पठन का निषेध है) उसका शास्त्रीय प्रमाण है क्या?

@Kishan_Shah @Sanyam_Shastri @Sulabh

जय जिनेन्द्र।
जैन निबन्ध रत्नावली भाग 1 के आधार पर कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं।


इसके संदर्भ में ऐसा ही सुना है कि राहु नामक विमान चन्द्रमा को तथा केतु नामक विमान सूर्य के नीचे आ जाता है जिससे उनका प्रकाश धरती तक नही आ पाता।

इसके संदर्भ में ऐसा कोई special उल्लेख पढ़ने में नही आया लेकिन पुरुषार्थसिद्धि उपाय ग्रन्थ में सम्यकज्ञान के आठ अंग की चर्चा में काल-आचार की चर्चा के अंतर्गत आता है, वास्तव में देखा जाए तो यह सामायिक का काल है और इससे अधिक इसकी विशेषता नही है।


शेष, विद्वज्जन समाधान करें।
:pray::pray::pray:

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धन्यवाद!


!
अत्यंत शोधपूर्ण लेख है। आशा है सभी शंकाओं का समाधान होगा।

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