आखिर मुनिराज इतने स्वस्थ कैसे?

आखिर मुनिराज इतने स्वस्थ कैसे???
(Part–1)

मुनिराजों को देखते ही हमारे मन में विचारों की तरंगें उठने लगती हैं कि हम इतना ठूस-ठूस कर भर-पेट खाते हैं, तब भी हम सीकड़ी मल और हट्टी पहलवान ही रहते हैं और साथ में अनेक बीमारियों का तौफा भी फ्री मिल जाता है और मुनिराजों को देखो तो, खाते मात्र एक बार वो भी थोड़ा-सा, लेकिन रहते एकदम स्वस्थ और निरोगी। आखिर हमारे साथ ऐसा अन्याय क्यों होता है??? इसप्रकार की अनेक विकल्प तरंगों से हमारा चित्त सदैव डोलायमान रहता है।

अरे भाई, यह अन्याय कोई दूसरा हमारे साथ नहीं करता है, अपितु हम स्वयं ही अपने साथ करते हैं, स्वयं ही स्वयं को ठगते हैं।

कैसे???

देखो साहब, वैद्य ने जिस पद्धति से औषधि का सेवन और अन्य वस्तु का परहेज बतालाया है, यदी उसी पद्धति को अपनाएंगे तभी स्वस्थ होगें। यदि हम औषधि का सेवन तो कर रहे हैं,परंतु वैद्य पद्धति से नहीं कर रहे और अनुपसेव्य वस्तुओं का परहेज भी नहीं कर रहे हैं, तो स्वस्थ कतई नहीं हो सकते हैं।

इसी प्रकार भरपूर मात्रा में भोजन तो कर रहे हैं, परंतु योग्य रीति से नहीं कर रहे और अनुपसेव्य वस्तु जैसे वीर्यपात(अब्रह्मचर्य, मैथुन) का त्याग भी नहीं कर रहे हैं, तो स्वस्थ कतई नहीं हो सकते हैं।

अर्थात स्वस्थ होने का रामबाण ऊपर वीर्य रक्षण करना, वीर्यपात/मैथुन/अब्रह्मचर्य कतई नहीं करना।

आखिर इस वीर्य में ऐसा है क्या???

आपका प्रश्न एकदम सही है; क्योंकि जब तक हम इसके निर्माण की दुर्लभता नहीं जानेगें तब तक उसकी रक्षा करने में भी उत्साहित भी नहीं होगें; अतः सर्वप्रथम वीर्य निर्माण की प्रक्रिया को देखते हैं। आयुर्वेद शास्त्रों में वीर्य निर्माण की प्रक्रिया निम्न प्रकार बतलाई है–
भोजन से रस बनता है, 5 दिन के बाद रस का रक्त बनता है, 5 दिन के बाद रक्त से मांस बनता है, 5 दिन के बाद मांस से मेद बनता है, 5 दिन के बाद मेद से हट्टी बनती है, 5 दिन के बाद हट्टी से मज्जा बनता है, 5 दिन के बाद मज्जा से वीर्य बनता है; इसप्रकार लगभग 30-32 दिन में वीर्य का निर्माण होता है।

परन्तु इस गलत फेमी में नहीं रहना की जितना भोजन किया था उतनी मात्रा में ही वीर्य बनेगा।अरे भाई इस में पूरा 50-60 गुणा का अंतर आता है, यथा-

1.133kg रक्त से 28g वीर्य (40 औंस रक्त से 1 औंस वीर्य)
80kg भोजन से 1.6kg रक्त से 20g वीर्य (2 मन खुराक से 2 सेर रक्त से 2 तोला वीर्य)– आयुर्वेदाचार्य पुनर्वसु

इस प्रकार मात्रा में किंचित भेद तो मिलता है परंतु इस में आपत्ति की बात नहीं है, क्योंकि दोनों कथनों की मात्रा में ज्यादा अंतर नहीं है।
यहाँ तो यह देखना है कि "थोड़ा सा वीर्य बनने में 40 से 60 गुणा रक्त लगता है।"

जरा-सा विचार कीजिए कि व्यक्ति एक सवा महीने की मेहनत द्वारा एक, डेड किलो रक्त से बने 20 ग्राम वीर्य को हस्तमैथुन, मैथुन, अब्रह्मचर्य द्वारा क्षण मात्र में बेकार कर देते हैं। फिर वीर्यपात करने के बाद पछताते हैं कि यह क्यों किया, आचार्य अमृत चंद्र देव ने आत्ममख्याति 72 गाथा की टीका में इसी मनोविज्ञान को परिलक्षित किया है,"परंतु अब पछताय होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।

यहाँ आपके मन में एक प्रश्न उठ रहा होगा कि उपर्युक्त बात प्रैक्टिकल सिद्ध नहीं हो रही है, क्योंकि जब एक बार वीर्यपात होने के पश्चात पुनः वीर्यपात भी हो जाता है; अतः आपकी यह बात असिद्ध हो जाती है कि एक सवा महीने की पूरी मेहनत को क्षण मात्र में बेकार कर देते हैं???

भाई आपकी बात एकदम सही होने पर भी उपर्युक्त बात असिद्ध नहीं होती है। इसके 2 कारण हैं–

  1. मान लीजिए कि हमारे वीर्यकोष में 20 ग्राम वीर्य है, हस्तमैथुन आदि कियाओं द्वारा लगभग 15 ग्राम वीर्यपात होता है। शेष बचा वीर्य दूसरी बार में निकल जाता है।

अच्छा साहब ऐसा है तो पूरा वीर्य दो बार में निकल गया, परंतु फिर पुनः प्रयास करने पर वीर्यपात देखा जाता है।

अरे भाई आपके निरीक्षण में थोड़ी सी कमी महसूस होती है। यदि आप बार-बार हस्तमैथुन आदि क्रियाओं द्वारा वीर्यपात करने का प्रयास करते हैं, तब आपको निष्फलता का ही सामना करना पड़ेगा; क्योंकि आपके वीर्यकोष में वीर्य शेष रहा ही नहीं।

यदि आप किंचित समय अंतराल के पश्चात वीर्यपात करने का प्रयास करें तो थोड़ी सफलता मिल सकती है; क्योंकि भोजन भी समयांतराल से किया था, तो उससे निर्मित्त वीर्य भी समय के अंतराल से निकल सकता है, इसमें कोई आपत्ति नहीं है।

अब आपका मन खुशी के मारे फूले नहीं समा रहा होगा, आपका अंतर मन बोल रहा होगा कि भाई अब तो कोई दिक्कत ही नहीं, क्योंकि वीर्य तो नया-नया बन ही रहा है, तो निकालो जितना मन चाहे।

भाई ऐसी स्वछंदता को ग्रहण करने से आपका शरीर और मन भी स्वछंद होकर अपनी स्वस्थता को छोड़ देगा।

कैसे???

वास्तविक वीर्य गाड़ा, श्वेत, पारदर्शी, चिकना होता है; परन्तु मैथुन, हस्तमैथुन आदि द्वारा वीर्य की quality घटती जाती है। अधिक वीर्यपात करने से वीर्य पानी की तरह पतला और अपनी चिकनाहट को भी खो बैठता है, साथ ही साथ वीर्य की शक्ति भी एकदम क्षीण हो जाती है। अत्यधिक हस्तमैथुन करने से वीर्य की शक्ति पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है, जिससे शरीर में नपुंसकता भी आ जाती है अर्थात संतानोत्पत्ति की सामर्थ्य नहीं रहती है।
बार-बार वीर्यपात करने से वीर्याशय खाली हो जाएगा। इसके बाद जो नया वीर्य बनेगा वह सबसे पहले वीर्याशय में ही जाएगा। पूरा नया वीर्य वीर्याशय में जाने के बाद शरीर के पोषण के लिए वीर्य बचता ही नहीं है। जिस कारण स्वास्थ्य निरंतर बिगड़ते ही जाता है।

इसी के साथ कुछ और भी हानि होती हैं जो इसप्रकार हैं–
•शरीर अंदर से खोखला हो जाता है।
•परिश्रम करने की शक्ति नहीं रहती है।
•सहनशीलता नष्ट हो जाती है।
•शीत और ऊष्णता को झेलने की समर्थ नहीं रहती हैं।
•स्मरण शक्ति हीन और बुद्धि मंद हो जाती है।
•किसी चीज में उत्साह नहीं रहता है और सर्वत्र आलस्य ही छाया रहता है।
•इन्द्रिय और मन कमजोर हो जाते हैं तथा वश में नहीं रहते हैं।
•शरीर दुबला और अनेक रोगो से ग्रसित हो जाता है।
•व्यक्ति अधिक बीमार होने लगता है।
•दुर्बल संतान की प्राप्ति।

यदि आप ऊपर बताए गए कारणों से लाभान्वित होना चाहते हो मैथुन, हस्तमैथुन द्वारा वीर्यपात अवश्य करें…। परंतु अपने विवेक से निर्णय नहीं किया तो हम भी नहीं जानते कि आपकी क्या दशा होने वाली है; अतः अपना विवेक अवश्य जाग्रत रखें…

वीर्य का स्थान

इसमें 2 मत प्राप्त होते हैं–
पहले मत में तिल में तेल की भांति शरीर में वीर्य का स्थान बताया।
दूसरे मत के अनुसार वीर्य का एक विशिष्ट स्थान बतलाया है।

पूर्वोक्त प्रक्रिया द्वारा निर्मित वीर्य अंडकोष में उत्पन्न होता है। इस वीर्य की 2 धाराएं होती हैं, पहली बहिःस्राव धारा वीर्याशय में (यह वीर्याशय मलाशय और मूत्राशय के मध्य में होता है।) जाती है। हस्तमैथुन आदि द्वारा इस वीर्य को बाहर निकाल देते हैं;अतः इसे बहिःस्राव धारा नाम दिया है।

दूसरी अन्तःस्राव धारा रक्त के साथ मिलकर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाती है।

सबसे पहले हमारा वीर्याशय भरता है, उसके बाद यदि अंडकोष में वीर्य बचा रहे तो वह वीर्य अन्तःस्राव धारा द्वारा शरीर में पहुँचकर, शरीर और मन को स्वस्थ बनाता है।

वीर्यपात होने के कारण

मैथुन 3 प्रकार का होता है।
1)मानसिक
2)वाचिक
3)कायिक

  1. सबसे खतरनाक मानसिक मैथुन होता है। भले ही इसमें वीर्यपात नहीं होता, तथापि शरीर और मन को सबसे अधिक हानि पहुंचता है। मानसिक मैथुन से भी वीर्य नष्ट होता है। वीर्य के समीप अनेक छिद्र होते हैं, मानसिक मैथुन से शरीर में उत्तेजना और ऊष्णता बढ़ती है, गर्मी से वीर्य पिघलकरवीर्य वाहिनी शिराओं द्वारा अंडकोष की ओर दौड़ने लगता है, जिससे धीरे धीरे वीर्य निकलना प्रारम्भ हो जाता है तथा गर्मी से वह वीर्य छोटे-छोटे छिद्रों के माध्यम से बाहर निकल जाता है।
    मानसिक विकार से स्वप्नदोष अधिक होते हैं।

  2. वाचिक से आप सभी परिचित है ही।

3)कायिक मैथुन भी 3 प्रकार का है–
1.स्त्री सहवास
2. हस्तमैथून
3.स्वप्नदोष

स्त्री सहवास और हस्तमैथून से तो आप सभी चिर अनुभूत है ही।

स्वप्नदोष होने के भी अनेक कारण हैं :–

● दिन में जो बुरे विकल्प किए थे, उससे जो वीर्य अंडकोष में आया था, वही रात में निकलता है।
● हस्तमैथुन की लत वाला व्यक्ति किसी दिन किसी कारण वश हस्तमैथुन नहीं कर पाया, तो उसको वीर्यपात के पूर्व संस्करों के वश से रात्रि में स्वप्नदोष अर्थात वीर्यपात होता है।
● जब वीर्याशय पूरा भरा हो, तभी मलाशय और मूत्राशय भी भर जाए और इन्हें खाली नहीं करें, तब इनका दबाब वीर्याशय पर पड़ने से स्वप्नदोष होता है; अतः मल, मूत्र को कभी भी नहीं रिकना चाहिए और रात्रि में करके सोये।
●अतृप्त कामेच्छा के कारण भी होता है।
● मूत्र में होने वाली जलन वीर्याशय में भी जलन उत्पन्न करती है, जिससे स्वप्नदोष होता है।
● सोने से पहले अधिक भोजन करने से भी स्वप्नदोष होता है।

मुनिराज के पास भी अमूल्य निधिवान वीर्य होता है, जिसका दुरुपयोग न करके पूर्ण रूप से सदुपयोग करते है, ब्रह्मचर्य के बल से पहली बहिः स्राव धारा नहीं चलती है, दूसरी अन्तः स्राव धारा द्वारा सम्पूर्ण वीर्य शरीर को पोषित करता है।
इसलिए मुनिराज अल्पाहार करते हुए स्वस्थ एवं निरोगी रहते हैं । इतना ही नहीं, अपितु इस अमूल्य निधिवान वीर्य से
•मन प्रसन्न रहता है।
•स्मरण शक्ति तीव्र होती है।
•शीतोष्ण आदि परिषह को सहन करनी सामर्थ्य जाग्रत होती है।
•आलस्य, तन्द्रता नहीं रहती है।
•रोग निरोधक क्षमता जाग्रत होती है।
•इन्द्रियाँ सबल होती हैं।
•अंग-प्रत्यंग सुदृढ़ होते है।
•सहनशीलता की वृद्धि होती है।
•क्रोधादि कषाय अत्यंत मंद होती है, इत्यादि
ब्रह्मचर्य के बल से वीर्य की पूरी शक्ति शरीर को मिलती है। जिस कारण शरीर की शक्ति को अनुपादेय मानने वाले और शरीर को कृष करने में सतत तत्पर मुनिराजों का शरीर ऊपर कहे गए लाभों से लाभान्वित होता है।

(मुनिराज को वीर्यपात नहीं होता क्या???
क्या काम वासना स्वभाविक नहीं ??? इसी प्रकार के अनेक प्रश्न आपके मन में उठ रहे होंगे, तो उनके समाधान हेतु अगला लेख अवश्य पढ़ियेगा…)

                        – अमन शास्त्री, लोनी
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आखिर मुनिराज इतने स्वस्थ कैसे??
(part-2)

यहाँ एक प्रश्न हो सकता है कि
यदि वीर्य शरीर के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, तो ब्रह्मचर्य के लिए वृष्येष्ट रस का निषेध क्यों किया?

*उत्तर:- * वृष्येट रस के निषेध करने का कारण -
वृष्येट रस से वीर्य अधिक बनता है, वह वीर्य बहिः स्राव धारा द्वारा वीर्याशय में जाता है और वीर्याशय पूरा भर जाता है, जिससे शरीर में उष्णता, उत्तेजना बढ़ती है, ब्रह्मचर्य घात होने की संभावना रहती है; अतः वृष्येट रस का निषेध किया है।
मात्र वृष्येट रस के निषेध की ही बात नहीं है, अपितु पूरे भोजन के निषेध की भी बात है। भगवती आरधनामें भोजन त्याग के कारण में एक यह भी कारण बतलाया है कि ‘मुनिराज इन्द्रिय और काम की उत्तेजना को रोकने के लिए और ब्रह्मचर्य पालनार्थ भोजन का त्याग करते हैं;’ क्योंकि सामान्य भोजन से भी वीर्य बनता तो है ही, वीर्य बनने के बाद आगे की प्रक्रिया तो समान ही होती है।

प्रश्न:- ऊपर कहा गया था जी कि वीर्याशय भरने के बाद वही वीर्य अंतःस्रावी धारा में चला जाता है और शरीर और मन को स्वस्थ रखता ह। जब पूरा वीर्य वीर्याशय में चला गया तो अंतःस्रावी धारा में कैसे जाएगा???

उत्तर:- जो वीर्याशय में वीर्य है वही अन्तः स्राव धारा द्वारा शरीर में नहीं जाता; अपितु अंडकोष में जो वीर्य होता है, वह वीर्य 2 धाराओं के माध्यम से वीर्याशय और शरीर में जाता है।

प्रश्न:- तो फिर वीर्याशय में पड़ा वीर्य अच्छा है या नहीं???

उत्तर:- अच्छा तो नहीं कह सकते हैं, क्योंकि वह वीर्य बाहर निकलने के लिए ही होता है।
संतानोत्पत्ति के अपेक्षा एक बार अच्छा कह भी सकते हैं, अन्यथा नहीं।
परन्तु उसमें हम कुछ नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वह सहज प्रक्रिया है।

प्रश्न:- क्या वीर्याशय के भरे बिना शरीर में वीर्य जा सकता है?
उत्तर:- नहीं, पहले वीर्याशय ही पूरा भरेगा, फिर शरीर में वीर्य जाएगा।

प्रश्न:- वीर्य के शरीर में जाए बिना शरीर को पोषण मिलना/ स्वस्थ रहना संभव है क्या?
यदि नहीं…
तब भोजन से वीर्याशय भरे तो दिक्कत, भोजन नहीं करें तो दिक्कत, अब करें तो क्या करें???
अतः दोनों का संधि रूप समाधान क्या है ?

उत्तर:- पहले तो वीर्याशय ही भरेगा, बाद में बचा-कुचा वीर्य शरीर में जाएगा।
अब करे तो क्या करें???
वीर्य की 2 गति बतलाई हैं–

  1. अधोगति(अधोधिकारण)
    2)ऊर्ध्व गति(ऊर्ध्वाधिकर्ण)
    अधोगति से वीर्यपात होता है,
    ऊर्ध्वगति से मस्तिष्क में पहुंचता है।
    ये दोनों ही गति अपने हाथ में होती हैं। जो साधक अपने मन को भटकने से बचाता है और मन को एकाग्र करता है, उसके वीर्य की ऊर्ध्व गति होती है।

यदि हम साधारण भोजन करते हैं, तो वीर्याशय उत्तेजित नहीं होता, जिसके कारण साधक अपनी साधना निर्विघ्न रूप से करते हैं और जिसमें मन की एकाग्रता होने से वीर्य की भी ऊर्ध्व गति होती है।

वीर्य की ऊर्ध्वगति वीर्याशय में से नही होती; अपितु अंडकोष में से ही होती है, इस ऊर्ध्वगति के कारण भरे हुए वीर्याशय पर जोर नहीं पड़ता और पूरा वीर्य शरीर में पहुंच जाता है।

निष्कर्ष मात्र यही है कि हम अपने उपयोग को साधकर वीर्य को ऊर्ध्व गति के द्वारा के शरीर और मन के पोषण में लगाएं।

                           ―अमन शास्त्री, लोनी
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आखिर मुनिराज इतने स्वस्थ कैसे???
(part-3)

अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान वीर्य के अनेकों लाभ और कामवासनाओं की अनेकों हानि को देखने पर भी अनेक लोग कहते हैं कि भाईसाहब इसमें हमारी कोई गलती नहीं है; क्योंकि ये तो स्वाभाविक क्रिया(कामवासना) है और जब ऐसी स्वाभाविक कामवासना सिर पर हावी होती है, तब वीर्यपात तो करना ही पड़ता है; क्योंकि कामवासनाओं के आने पर वीर्यपात भी सहज में ही होता है।
भाई, मैं आपकी बात से पूर्ण सहमत हूँ कि कामवासना स्वाभाविक है; परंतु यह कामवासना कहाँ तक स्वाभाविक है और कहाँ से अस्वाभाविक हो जाती है; इसका विचार अवश्य ही करना चाहिए।

कामवासना का स्वाभाविक और अस्वाभाविक स्तर:-
1) यदि कामवासना सामान्य व्यक्ति के सम्बन्ध में चल रही है, तो स्वाभाविक है और यदि किसी व्यक्ति विशेष के सम्बन्ध में चल रही हो, तो वह कामवासना, अस्वाभाविक है(यही अपराध है)।(–सुमतप्रकाश जी)

प्रश्न:- अगर किसी व्यक्ति विशेष के सम्बंध में विचार करेगें, तो किसी एक व्यक्ति के प्रति का ही दोष लगेगा, परंतु यदि व्यक्ति सामान्य के सम्बंध में विचार करेगें, तो अनेक व्यक्तियों सम्बन्धी दोष लगेगा।
जैसे:- हरी सब्जियों सम्बन्ध में है।…

उत्तर:- यहाँ स्वाभाविक / अस्वाभाविक विचार श्रंखला के सम्बंध में विमर्श चल रहा है।
आगम में 4 संज्ञायें कही हैं- आहार, भय, मैथुन और परिग्रह। प्रत्येक जीव को यह चारों संज्ञाएँ होती ही होती हैं अर्थात स्वाभाविक हैं।

स्वाभाविक विचार ‘सामान्य’ रूप से ही आता है; परंतु ‘विशेष’ विचार के लिए मेहनत करनी पड़ती है; जिसकारण से विशेष अस्वभाविक हो जाता है।

ऊपर जो हरि सब्जी का उदाहरण दिया था। वह यहाँ घटित नहीं होता है। यद्यपि दोष तो स्वाभाविक कामविकार और अस्वाभाविक कामविकार दोनों में ही है, परंतु दोनों दोषों के स्तरों में अंतर है।

2) प्रश्न:- इसका अर्थ तो यही हुआ कि हम व्यक्ति सामान्य के सम्बन्ध में कामवासना वाले विकल्प करने के लिए आजाद हैं?

उत्तर:- नहीं भाई, सामान्य व्यक्ति के सम्बन्ध में भी बिना किसी उत्साह से, सहज में वेद कषाय के उदय/उदीरणा से जो विकल्प आ रहे हैं, वे स्वाभाविक हैं।
परन्तु सामान्य व्यक्ति के सम्बंध में भी जो खीच-तान करके विकल्प करते है अथवा बुद्धि पूर्वक ‘विषय भोग- ऐसे भोगूँगा, ऐसे भोगूँगा’ अथवा वेद कषाय के उदय से जो विकल्प आए हैं, उन्हें रुचि पूर्वक आगे बढ़ाते जाना, उनमें अपनी नई-नई कल्पना करना स्वभाविक नहीं है।

जैसे:- रास्ते पर जाती हुई लड़की/लड़के को सहजता से एक बार देखना स्वाभाविक है, परंतु मुड़-मुड़ कर बार-बार देखना, अंगोपांगों का निरीक्षण करना इत्यादि प्रवृत्ति स्वाभाविक नहीं है।

अतः सामान्य व्यक्ति के संदर्भ में भी बुद्धि पूर्वक विकल्प आगे नहीं बढ़ाना है। यदि बुद्धि पूर्वक विकल्पों को बड़ायेगें तो वह अस्वाभाविक हो जाएगा। जिसके कारण हम अधिक दोष के भागीदार हो जायेगें।

प्रश्न:- तब फिर कामवासना के स्वाभाविक विकल्प किस level तक के हो सकते हैं।

उत्तर:- अंग और उपांग से रमण करने के सभी विकल्प स्वाभाविक है। ‘सभी’ शब्द से तात्पर्य है कि आपको अंगोंपांग से रमण करने के जितने भी और जैसे भी विकल्प आते हैं, उन सब का यहाँ ‘सभी’ शब्द से ग्रहण किया है। परंतु ध्यान रखना की बुद्धि पूर्वक खीच-तान न हो।

प्रश्न:- अंग और उपांग में क्या क्या लेना है?
उत्तर:- हाथ, पैर, जननेन्द्रिय इत्यादि अंग हैं और आँख, नाक, ओठ आदि उपांग हैं।

अरे सहधर्मियों जरा विचार कीजिए कि जो विकल्प आप पहली बार हस्तमैथुन/मैथुन करते समय करते हैं, दुबारे हस्तमैथून/ मैथुन करते समय वैसे विकल्प नहीं करते, जैसे पहली बार में किए थे; अपितु उसमें कुछ नया-नया ही खोजते हैं।

परन्तु हमें इन दिनरात विषय-भोगों के चिंतन से क्या फल प्राप्त होनेवाल है, इसका भी विचार कर लेना चाहिए………

तो चलिए जरा इन सबके फल का विचार करते हैं– विषय भोग के भाव अशुभ विकल्प हैं और अशुभ विकल्पों से पाप का ही बंध होता है, यह तो हम सभी जानते ही हैं; परंतु अब हमें यह देखना है कि उनसे पाप का बंध कैसा होता है?

आप सभी ने ‘निदान’ यह शब्द तो सुना ही होगा। इसका अर्थ है - ‘आगामी काल में यही चाहिए। इसप्रकार मन के उपयोग को निदान कहते हैं।’(विजयोदया टिका)

हम दिनरात ‘आगामी काल में विषय-भोग कैसे मिलेगें और यदि मिल जाये तो इस-इसप्रकार भोगूँगा’; इसप्रकार हम अप्रशस्त निदान करते रहते हैं। यदि आपके पल्ले में कदाचित विकल्प की पूर्ति योग्य पुण्य पड़ा होगा तो हो सकता है, आपको आगामी काल में कल्पनानुसार विषय-भोग मिल भी जाये; परंतु यदि आपके पल्ले में विकल्प की पूर्ति योग्य पुण्य नहीं हो तो आपको इच्छानुसार भोग नहीं मिलेगें।

प्रश्न:- तो फिर किस प्रकार के भोग मिलेगें?
उत्तर:- आपने कल्पना की थी कि मुझे विषय-भोग सुंदर, सुरूप, सुडौल, अच्छे आकार वाले व्यक्ति के साथ निर्विघ्न भोगना है। यदि आपके पास पुण्य होगा तो आपको उपर्युक्त मनोवांछित वस्तुएँ मिल जाएगीं; परंतु थोड़ा कम पुण्य हुआ तो हो सकता है कि निर्विघ्न भोग न मिले; यदि पुण्य थोड़ा और कम हुआ तो कुरूप व्यक्ति मिले; पूण्य थोड़ा ओर काम हुआ तो बुरे आकार वाला व्यक्ति मिले; यदि पुण्य थोड़ा और कम हुआ तो तिर्यंच गति में बिल्ला- बिल्ली के भोग मिले और यदि पुण्य हुआ ही नहीं(अत्यंत अल्प हो) तो हो सकता है पूरा विपरीत फल ही मिले अर्थात आप अंदर ही अंदर घुटते जाओगे, परंतु भोगो की प्राप्ति नहीं होगी, इत्यादि।

इनमें से पहले स्तर वाला इच्छानुसार भोगों की प्राप्ति अत्यधिक पुण्यवान जीवों को ही होती हैं, जो हम है नहीं। जब पहले स्तर वाला भोग नहीं मिला निम्न स्तर वाले भोग मिलेगें।

तथा इच्छानुसार भोग मिलने का अर्थ है कि हमने एक रुपये की toffee के लिए 1000000 करोड़ो रूपये खर्च कर दिए। आगे आप स्वयं ही समझदार हैं।

मुनिराज को भी कामविकार के विकल्प आते हैं (क्योंकि वेद काषाय की उदीरणा 6वें गुणस्थान तक होती है।), परन्तु उन विकल्पों में खीच-तान नहीं करते है; अपितु घटाने का ही प्रयास करते है।

प्रश्न:- मुनिराज को ऐसे विकल्प आते हैं तो वे क्या करते है???

(उत्तर के लिए आगे पड़ते रहें और जानते रहे निदान क्या है???)
– अमन शास्त्री, लोनी

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