प्राकृत भाषा और देवनागरी में शास्त्र रचना

क्या कारण हैं की पूर्वाचार्यो ने प्राकृत भाषा और देवनागरी लिपि में शास्त्रों की रचना की, परन्तु कन्नड़/तमिल लिपि में नहीं की या कम की हैं ? जबकि वे उसी कन्नड़/तमिल प्रान्त में काफी समय तक रहे हैं।

प्राकृत - प्रकृति - Nature - स्वाभाविक‌ - May be that the language was simple, hence wisespread at that time (लोक भाषा)।

Also, once a tradition starts, inertia sets in. People do not want to change already established environment.

पूर्ण रूप से ऐसा भी नहीं है। सबसे पहले हस्तलिखित ग्रंथ जो कि श्री षट्खण्डागम जी था उसकी प्रायः प्रति तमिल व कन्नड़ ही थी, और भी बहुत से ग्रंथ कन्नड़ व तमिल में लिखे गए हैं … काफी समय बाद उत्तर भारत व मध्य भारत में प्राकृत प्रकृतिवत् होने के कारण व जन-जन की साधारण बोल-चाल की भाषा होने के कारण आचार्यों ने उसमें लेखनी की व बाद में संस्कृत भाषा आदि में ग्रंथ जब लोगों को संस्कृत की समझ होने लगी व राज-काज की व विद्वानों की भाषा भी यह उस काल में थी । समय पूर्णरूप से याद नहीं आ रहा। संस्कृत में ही राजसी कार्यादि होते व उनकी घोषणा राज-दरबार में की जाती तदुपरांत उसे वहीं के अमात्य प्राकृत में लिप्यंतरण करके संदेश को प्रेषित करते थे। संस्कृत भाषा का उत्कृष्ट उदाहरण स्वरूप ग्रंथ पहला सूत्र जी रूप ग्रंथ ** श्रीतत्त्वार्थसूत्र जी** ग्रंथ रचा गया बाद में समयसारादि की टीका श्री जयसेनाचार्य आदि ने करी। लिपि नागरी ही थी । धीरे-धीरे इसका विकास क्रम देवनागरी लिपि में परिवर्तित हुआ है।

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