मिश्र गुणस्थान में क्या विशेषता?

मिश्र गुणस्थान में व्यक्ति क्या करता है , किस अवस्था में होता है ?
कही पर भी मिश्र गुणस्थान का अधिक वर्णन नहीं इसका क्या कोई विशेष कारण है ?
मिश्र गुणस्थान में व्यक्ति मिथ्यादृष्टि कहलाता है की सम्यग्दृष्टि ?

जिस प्रकार अप्रत्याख्यान कषाय के उदय से ना ही सकल संयम उत्पन्न होता हैं और ना ही अविरति अवस्था विद्यमान हैं उसी प्रकार सम्यक्मिथ्यत्व के उदय में ना ही सम्यक्त्व हैं ना ही मिथ्यात्व अवस्था होती हैं।

चारित्र के सम्बन्ध में जैसी अवस्था देश संयमी जीव की होती हैं वैसी ही अवस्था श्रद्धा के सम्बन्ध में मिश्र गुणस्थान वर्ती जीव की होती हैं।

इस गुणस्थान का काल थोड़ा है अतः direct परिणाम अपने ज्ञान का विषय नहीं हैं। इसके वास्तविक परिणाम केवलज्ञान गम्य हैं। श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक ग्रन्थ में भी ऐसा ही कुछ कहा ही।

सातवाँ अधिकार, पेज - २६६ (पाँच लब्धियों के स्वरुप के अंतर्गत)

Hope it clear out your doubts.

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:boom: चौदह गुणस्थान :-
जब यह जीव स्व-पर का भेद विज्ञान करता है , द्रव्यकर्म -भावकर्म- नोकर्म से भिन्न अपने आपको ज्ञाता-द्रष्टा चैतन्य रूप अनुभव करता है, तब पहले गुणस्थान से इसके चौथा गुणस्थान होता है | वहां अंतरंग में तो अनंतानुबंधी कषाय और मिथ्यात्व का अभाव होता है और बहिरंग में अन्याय -अनीति -अभक्ष्य भक्षण -अनाचार रूप प्रवर्ति का अभाव होता है | सच्चे वीतरागी देव-शास्त्र-गुरु ही पूज्यनीय हैं,अन्य नहीं ,ऐसी श्रद्धा होती है | “इस भूमिका में आत्मानुभव कम-से- कम छह महीने में एक बार अवश्य होता है , अन्यथा चौथा गुणस्थान नहीं रहता”
यहाँ साधक जब आत्मानुभव को जल्दी-जल्दी प्राप्त करने का पुरुषार्थ करता है तो अप्रत्याख्यानावरण कषाय इसके मंद होने लगती है | जब यह कम-से-कम पंद्रह दिन में एक बार आत्मानुभव होने की योग्यता बना लेता है , तब अंतरंग में तो अप्रत्याख्यानावरण कषाय का अभाव होता है,और बहिरंग में अणुव्रतादिक बारह व्रतों का धारण तथा ग्यारह प्रतिमायों के अनुरूप आचरण क्रम-क्रम से शुरू होता है, यहाँ तक पांचवां गुणस्थान (गृहस्थ अवस्था) है।
“इस भूमिका में आत्मानुभव कम-से-कम पंद्रह दिन में एक बार अवश्य होता है,अन्यथा पांचवां गुणस्थान नहीं रहता”
यहाँ पर साधक अभ्यास के द्वारा आत्मानुभव का समय बढाता है और अंतराल कम करता जाता है , फलस्वरूप प्रत्याख्यानावरण कषाय मंद पड़ने लगती है,और अभ्यास करते- करते जब इसके अन्तर्मुहूर्त में एक बार आत्मानुभव होने की योग्यता बनती है, तब अंतरंग में तो प्रत्याख्यानावरण कषाय का अभाव होता है,और बहिरंग में अठाईस मूलगुणों का पालन तथा नग्न-दिगम्बर मुनि अवस्था के अनुरूप आचरण होने लगता है | यहाँ साधक जब आत्मानुभव से हटता है तो मूलगुणों के पालनरूप प्रवर्ति में अथवा स्वाध्याय- चिंतवन आदि में लगता है। यहाँ यह समझना जरुरी है कि यदि इस साधक को अन्तर्मुहूर्त के भीतर आत्मानुभव नहीं होता,तो गुणस्थान गिर जाता है वह छठे से पांचवें गुणस्थान में आ जाता है-
यद्यपि बाह्य आचरण अभी भी मुनि अवस्था का ही है। प्रत्याख्यानावरण कषाय का फिर से उदय हो जाता है,यदि फिर पंद्रह दिन तक भी आत्मानुभव न हो , तो वह चौथे गुणस्थान में आ जाता है।और यदि छह महीने तक भी आत्मानुभव न हो तो पहले गुणस्थान (मिथ्यात्व अवस्था ) में ही पहुँच जाता है। तीसरा और दूसरा गुणस्थान जीव के चौथे गुणस्थान से पहले गुणस्थान की तरफ गिरते समय होते हैं। पुनः यदि अपनेआपको ठीक कर लेता है तो फिर ऊपर चढ़ने की संभावना रहती हैं |
छठे गुणस्थान में जब आत्मानुभव होता हैं तो सातवां गुणस्थान हो जाता हैं उसी को शुद्धोपयोग कहते हैं | यदि उस आत्मानुभव से नीचे न गिर कर यह साधक ध्यान की लीनता को बढ़ाता हैं तो सातवें आठवां -नवां-दसवां , ये गुणस्थान होते हैं | वहां अंतरंग में संज्वलन कषाय तीव्र से मंद-मंदतर-मन्द्तम होती चली जाती हैं और ध्यानस्थ अवस्था चलती रहती है , जिसे शुक्ल-ध्यान कहते हैं | आठवें -नवें -दसवें गुणस्थानों में ध्यानस्थ अवस्था रहते हुए उसमें गहराई उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है | सातवें में डुबकी लगाता था और फिर बाहर आ जाता था | आठवें में भीतर डूबता जाता है परन्तु अभी सतह पर बुलबुले उठ रहें हैं | और अधिक गहराई में जाता है तो बुलबुले उठने भी बंद हो जाते हैं |
आत्मध्यान की गहनता के फलस्वरूप सूक्ष्मलोभ का भी अभाव होकर कषाय रहित बारहवां गुणस्थान होता है | इसके पश्चात शुक्लध्यान के दुसरे पाये के द्वारा आत्मा के ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य अनंतता को , पूर्ण विकास को , प्राप्त हो जाते हैं -(अरिहंत अवस्था ) तेरहवां गुणस्थान हो जाता है | यहाँ पर शरीर का और शरीर -सम्बन्धी कर्म-प्रकर्तियों का सम्बन्ध अभी शेष है | यहाँ बिना किसी प्रयत्न या इच्छा के , मेघ की गर्जना के समान सहज- स्वाभाविक रूप से , वाणी खिरती है , जिससे प्राणीमात्र को आत्मकल्याण का , अनंत दुःख से छूटने का और परमात्मा बनने का मार्ग मिलता है | पुनः शुक्ल ध्यान का पाया बदलता है - तीसरे पाये से योग-निरोध करते हुए चौदहवें गुणस्थान में प्रवेश करते हैं , और फिर चौथे पाये के शुक्लध्यान द्वारा शरीर से भी रहित होकर (मोक्ष अवस्था) सिद्ध भगवान- सच्चिदानंद परमात्मा हो जाते हैं |
गुणस्थानों की इस परंपरा में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि (अध्यात्म- करणानुयोग-चरणानुयोग) इन तीनों का कार्य साथ-साथ चलता है। चेतना में लगना-अध्यात्म द्रव्यानुयोग , कषाय का घटना- करणानुयोग , और आचरण का परिवर्तित होना- चरणानुयोग , ये तीनों एक साथ होते हैं | यही निश्चय-व्यवहार की मैत्री है , यही जैन धर्म का अनेकांत हैं।
अतः सार यही है कि एक ही बीमारी है - रागद्वेष , और एक ही इलाज है - स्वानुभव
संसारी जीव - कषाय = परमात्मा
जितनी कषाय उतना परमात्मा से दूर और जितनी कषाय का अभाव उतना परमात्मा के नज़दीक कषाय का सर्वथा अभाव सो परमात्मपनाअपने में देखों जानों कि हम कहाँ खड़े हैं।
मैं चेतन ज्ञानदर्शन मयी शुद्ध, था और रहूँगा हूँ ,विचारना …:pray:t2:

धवला पुस्तक 1 में मिश्र गुणस्थान का स्वरूप अपेक्षित विस्तार से दिया गया है। कृपया वहीं से शुद्ध/शुद्धतोन्मुख होकर पढ़ें।

फिर पुनः चर्चा कर सकते हैं।:pray::pray::pray:

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