द्रव्य का ज्ञान किस प्रमाण ज्ञान से?

द्रव्य की पर्याय तो प्रत्यक्ष का विषय बनता ही है, क्या द्रव्य भी प्रत्यक्ष का विषय बनता है, या मात्र पारोक्ष ज्ञान (अनुमान, आगम आदि) से ही उसका ज्ञान क्षद्मस्थ जीव को हो सकता है?
(पुद्गल द्रव्य के संबंध में इस प्रश्न का उत्तर अपेक्षित है)

Note: पर्याय के बिना द्रव्य नहीं, द्रव्य के बिना पर्याय नहीं, इन्द्रिय का विषय मात्र पर्याय ही होती है।

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पुद्गगल परमाणु को मति श्रुत ज्ञानी तो आगम व अनुमान से ही जानेगे ,और छद्मस्थ जीव मे अवधि ज्ञान वालो मे सर्व- अवधि ज्ञान वाले परमाणु को जानते है।

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क्या यहाँ परार्थ अनुमान अपेक्षित है ? क्योंकि स्वार्थ अनुमान से भी यदि परमाणु का ज्ञान स्वीकार किया जाए, तो फिर प्रत्यक्ष (सांव्यवहारिक), स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, और तर्क से भी उस परमाणु का ज्ञान मानना चाहिए । स्वार्थ अनुमान की अन्यथा अनुपपत्ति होने से ।
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परमाणु के संबंध में बात समझना थोड़ा अलग हो जाता है। वो इन्द्रिय का विषय ही नहीं है। मेरा general प्रश्न है कि क्या द्रव्य भी प्रत्यक्ष का विषय बन जाता है मात्र पर्याय ही प्रत्यक्ष का विषय बनती है (क्यूंकि इन्द्रिय ज्ञान मात्र वर्तमान पर्याय को ही विषय बनाते है)?
Note: प्रमाण ज्ञान सामान्य - विशेषात्मक रूप होता है।
द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक ये नय के भेद है।

यहॉ परार्थानुमान ही अपेक्षित है ।

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द्रव्य को प्रत्यभिज्ञान का विषय भी बताया है।

प्रत्यभिज्ञान से द्रव्य का ज्ञान होता है ,परन्तु वह द्रव्य को प्रत्यक्ष नहीं जानेगा ।

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मन द्वारा द्रव्य का ज्ञान भी मानना चाहिए क्योंकि -

  • मति-श्रुत ज्ञान का विषय बताते हुए तत्त्वार्थसूत्र में कहा है - मतिश्रुतयोर्निबंधो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु (अध्याय 1, सूत्र 26) - अर्थात् ये दोनों ज्ञान छहों द्रव्यों और उनकी कुछ पर्यायों को जानने में समर्थ है ।
  • नयों की प्रवृत्ति मात्र श्रुत ज्ञान में ही होती है । अतः अन्य ज्ञानों में सामान्य-विशेष (द्रव्य-पर्याय) का भेद ही नहीं बनता । (this may require some revision)
  • मतिज्ञान द्वारा जब किसी वर्तमान पर्याय का जानना होता है, तो वहाँ मात्र पर्याय का ज्ञान नहीं हो रहा है, अपितु पूरी वस्तु का जानपना होता है । यदि मात्र पर्याय का जानना भी मति ज्ञान में माना जाए तो पर्यायार्थिक नय में विशेष क्या होगा ?
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प्रमाणात्मक होने से अन्य ज्ञान तो सदैव ही सामान्य विशेषात्मक होते है।

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हाँ, ‘भेद नहीं बनता’ से इतना तात्पर्य था कि कभी मात्र सामान्य का ग्रहण हो और कभी मात्र विशेष का - ऐसा भेद नहीं बनता.
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परार्थानुमान पूर्वक स्वार्थानुमान हो सकता है अतः दोनो ही अनुमान लिये जा सकते है।

प्रत्यभिज्ञान के भी अनेक भेद है, वह भी घटित हो सकता है।

अव्यक्त होने से द्रव्य परोक्ष प्रमाण का विषय नहीं, जीव के सम्बन्ध में मन के निमित्त से अनुभव गोचर है और पुद्गल में अनुमानादिक का, यही अनुमान है कि - पर्याय के बिना का ज्ञान नहीं होता, पर्याय की निरंतरता की नित्यता भी यही बोध करा रही है।

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प्रवचन सार सूत्र—ज्ञान तत्व प्रज्ञापन–१८ “ज्ञान अधिकार”। ____ज्ञान और ज्ञेय ८६.जीव ज्ञान रुप से परिणमित होकर स्वतंत्रतया ही जानता है, इसलिए जीव ही ज्ञान है। ‌‌ ८७.वर्तचुकी,वर्त रही,और वरतनेवाली ऐसी विचित्र पर्यायों की परम्परा के प्रकार से त्रिविध कालकोटि को स्पर्श करता होने से अनादि-अनंत ऐसा द्रव्य ज्ञेय है। ८८.ज्ञेयभूत द्रव्य के स्व और पर ऐसे दो भेद हैं। ८९. ज्ञान स्व-पर प्रकाशक है। ‌ ९०ज्ञान स्व-पर ज्ञायक होने से ज्ञेय की द्विविधता है—(१)स्व ज्ञेय (२)पर ज्ञेय। ९१.दीपक को स्वप्रकाश्य को प्रकाशित करने में अन्य प्रकाशक की आवश्यकता नहीं होती। ९२.आत्मा स्वमेव ज्ञान क्रिया को प्राप्त होने से ज्ञायक है। ९३.ज्ञायक आत्मा को ,जो ज्ञेयभूत पर को जानता है ,स्व ज्ञेय को जानने के सम्बंध में अन्य ज्ञायक की आवश्यकता नहीं होती।
( गाथा-३६)

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