जैन न्याय, आप्तमीमांसा


#1

सन्तान, साधर्म्य, समुदाय, प्रेत्यभाव का क्या अर्थ होता है?


#2

आप्त मीमांसा की कारिका क्रमांक २९


#3

यहाँ संतान का अर्थ संतती, परम्परा है। जो एक पूर्व की पर्याय को आगामी पर्याय से जोड़ती है। जब सर्वथा दो वस्तु या पर्याय को सर्वथा भिन्न मानेगें तो उसमें उन दोनों को जोड़ने वाली संतति का कोई मूल्य नहीं रह जाता है अर्थात उसकी सिद्धि नहीं होती है। संतान, साधर्म्य, समुदाय, प्रेत्यभाव - ये सब शब्द परम्परा, जोडरूप के अर्थ में ही आए हैं।