ज़्यादा बोलना सरल या मुश्क़िल?

एक धातु अनेक अर्थों को लिए हुए होती है। उन अर्थों में से कुछ विभक्तियों/लकारों या प्रत्यययों के माध्यम से शब्द के अनेक रूप होते हैं। उन शब्दों से बना वाक्य अनेकों अभिप्रायों को लिए हुए होता है। और उन अभिप्रायों में से किसी एक अभिप्राय को मुख्य करके अनुच्छेदों के माध्यम से प्रत्येक वाक्य पल्लवित किया जाता है।

अब विचारिये कि एक वस्तु की योग्यताएं कितनी हैं जो उन धातुओं से बने शब्दों से बताया जाता रहा है। और फिर भी हम फर्राटे से सोचते या बोलते ही जाते हैं।

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I think jyada bolna bht easy h
Pr kam bolna or such bolna mushkil h. Uske liye chij ki perfect jankari chaiye

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अपेक्षा/कथंचित बोलना मुश्किल। कथंचित सरल। दोनों की अपनी-अपनी अपेक्षाएं हैं। आपने सुना होगा ज्यादा बोलने वाले को उतनी इज्जत नहीं दी जाती जितनी कि कम बोलने वाले को। जैसा कि संयम भईया ने बताया उन्होंने काफी सही व संक्षिप्त में समझा दिया। कभी-कभी विवादादि में ज्यादा बोलना मुश्किल हो जाता है , क्योंकि हमारे विचार शब्द रूप परिणमित होने में वायुमंडल के वातावरण और हमारी भाव-भंगिमाऐं उस बात को किस प्रकार ग्रहण कर रही है इस पर निर्भर करती है। अतः इस अपेक्षा से ज्यादा बोलना मुश्किल। ज्यादा बोलना सरल इस अर्थ में कि हमें अपने स्वतंत्रवाहक के रूप में विचार रखना या व्यर्थ के विवाद करने में बुद्धि को कम लगाना पड़ता है। इस अपेक्षा से सरल।