सुदर्शन नाटक (मूलचन्द्र जैन वत्सल) | Sudarshan Natak — शील / ब्रह्मचर्य धर्म पर पूर्ण प्रकाशित नाटक (साहित्य रत्नालय, बिजनौर)

शील / ब्रह्मचर्य धर्म पर आधारित सेठ सुदर्शन की कथा का एक पूर्ण, स्वतंत्र प्रकाशित नाटक — रचयिता मूलचन्द्र जैन “वत्सल” (प्रकाशक: साहित्य रत्नालय, बिजनौर; श्रावण सं. १९८४)। नटी–नटाचार्य की प्रस्तावना व मंगलाचरण से आरम्भ होकर सुदर्शन की शील-परीक्षा तक — पूरे पात्र-संवाद व मंच-निर्देश सहित ११६ पृष्ठों का ग्रन्थ। यह t/8239 (सेठ सुदर्शन मंचन-नाटक) से भिन्न, स्वतंत्र रचना है।

A complete, independently-published Seth Sudarshan drama on Uttam Brahmacharya (sheel) by Moolchandra Jain “Vatsal” (Sahitya Ratnalaya, Bijnaur, VS 1984 / c.1927) — full characters, dialogue and stage directions. A distinct work from t/8239. Jain daslakshan natak / brahmacharya katha for pathshala and staging.


ग्रन्थ का प्रारम्भिक अंश — प्रस्तावना (नटी–नटाचार्य) व मंगलाचरण

(पूर्ण ११६-पृष्ठ नाटक संलग्न PDF में उपलब्ध है; नीचे केवल प्रारम्भिक अंश दिया गया है।)

(२)

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क्योंकि जिन का हृदय चिंताओं से निरंतर व्याकुल रहता है, ज्ञानेंद्रियों की ज्वाला में भदेव धधकता रहना है—उन्हे नाटक और विनोद शूल की भध्या प्रतीत होने हैं; किन्तु जब हृदय समस्त चिंताओ से निर्मुक्त होकर शांति भग्न होता है, तब ही उत्तम दृश्य प्रबलोकन करने की तन्पर होता है। अतएव यह भभय सर्वधंकार नाटक दिखलाने योग्य है, तब इस सुन्दरमा के स्थान में श्रानंद की खरज प्रारं क्यों न बहाऊं और अपनो कला कुशलऩ् का परिचय कराऊं। तब फिर मै अपनी प्राणप्यारी नदी को बुलाऊं। मिथे। हे मिथे।

खजन जनो के हृदय मे, वर्धित करने मोद।
(नेपथ्य में) दिखलाइअंगी आज में, नाटक साहित विनोद॥

आहा। मेरी पत्नी भी मेरे हृदय के भावो को जानने वाली है। क्यों न हो आन्त में है तो मुभ मटाचारों की पत्नी ही।(दूर से अपनी पत्नी को आनी देखकर) आओ मिथे। आज मेरी इच्छा है, कि हम इन खुजन जनों के सम्मुख कोई समयानुकूल उत्तम नाटक दिखलाऐं किसी पविज हृदय महात्मा के आदर्श का चित्र खींचकर बतलाएं और दुसरो के हृदयो में विनोद के साथ २ पवित्रता की लहरें उमगाए। क्यो ठीक है न ?

(३)

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नदी—प्रियतम। आप का प्रस्ताव तो वास्तव में समयानुकूल है, किन्तु आज कल के मानवों की रुजि आप के विचारों से सर्वथा प्रतिकूल है। आज कल तो आधिक साधको का जुमाना है। नीटंको और अश्लील गायनों पर ही दर्शक राणों का मन बिखाला है, फिर आप के , पविज भावो से भरे हुए सरल नाटक का कीन पसंद करेगा और वह किस का हृदय हरएए करेगा।

नटाचार्य—प्रिये। वास्तव में यह बात सर्वथा सत्य है, किन्तु समग्न मानवों के मन एक से नहीं होते है। क्योकि जहां चुनों में शूत होने है वहां पर हृदय विभोहक फूल भी होते है। यदि कोई अश्लील गायनों और कुटश्यो के द्रष्टंक होते हैं तो कोई सज्चरित्र पविश्रता के उपासक भी होते है। अतन्तु हमे इस वाम का विचार न करके अपने कार्य को प्रारम्भ करना चाहिये।

नदी—अच्छा तब यह बात तो बतलाइए कि आज कौनसा नाटक खेल कर सज्चरित्रता का महत्व दिखलाया जाए और दर्शक मंडली का मन बहलोया जाए।

नटाचार्य—प्रिये। आज वही सुन्दरीन नाटक खेला जा-ए, जिसे रघुषर्म उपासक वत्सल महोदय ने अभी हाल ही

(३)

मैं बनाया है और जिसमें नवीन भाग और गाँवो झांग
शीलवती को महत्व दिखलाया है।

नदी - मियघर! झापने बहुत अच्छा कहा। वह ना-
इक शबध नमयोग्योगी और चित्तकर्षक होगा। वरन, देव
वन्दना पूर्वक झपना कार्य प्रारम्भ कीजिये।

(नटाचार्य और नदी दोनों देव वन्दना करते है)

जय, जय, जय, मदन, वहन ऋषर ऋमुर ऐश। युञ्र।
रत्न-त्रय-सुकुर-शीर्ष मुक्ति कामनी के ऐश,
तुर, मर, चर, झचर, सकल करन चरणए सेवा ॥ जयो ॥
झविचल सुखसदेन ऋमल, गुण ऋनंत सहित विमल,
मंगलकर, झानदभर, भव स्वसुट सेवा ॥ जयो ॥
कष्णाकर, कष्णा कर, दांजे थह सुखकर वर।
भंव दुख हर, पाद्र’जिर-मुक्ति राज मेझा ॥ जयो ॥
सतवर हो नष्ट कुमति, जायत हो विमल सुमनि।
दीन वन्धु “वस्सल” कीजे निजासम एदा ॥ जयो ॥

(दोनो जाते है)

प्रथमांङ्क—प्रथम दृश्य

स्थान—नगर श्रुष्टा का वगीचा।.कुमारी खुलोचना
त्रपनी ऋमला और विमला झादि सखियो
के साथ 'कीड़ा’कर रही है।

खुलोचना - (सखियों को ओर देखकर) प्यारी स-
खियों! देखो! आज यह चमेली की क्यारा॑॑ं किस प्रकार
चाँदनी के समान स्वच्छ पुष्! समूह से परिपूर्ण होकर हद्य
को विमोहित कर रही है। ः ′ ,

ऋमला - कुसारी जी! इन_भमय यह शोभा के
पूर्ण वैभ से सुशोभित हो रही है। मो ठीक ही है, इस ऋ-
चरथा में प्रत्येक वस्तु की सुन्दरता यद जाती है और जो
स्वयं सुन्दर है, उसके लिये तो कहना ही क्या?

मुतोचना - हाँ! और इस और तो देखो; यह मोरश्री
का झुंत जो कल श्रीविदग्न हो रहा था, आज मनोरम पुष्पों
से सजित हो कितना रमणीय नात होता है।

( ६ )

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अमला—हाँ कुमारी जी ! समय पर प्रत्येक वस्तु मनोमोहक प्रतीत होती है ।

मुलोचना—ऐसी सखियो ! देखो ! यह भ्रमर इस गुलाब की अर्द्ध विकसित कलिका पर किस प्रकार मुग्ध होकर शोर मचा रहे हैं ।

अमला—हाँ सुनुले ! भौंरे का तो यही स्वभाव हुआ करता है, कि वह सिर्फ किसी सौंदर्य पूर्णं नवीन कलिका को देखते हैं उसी की ओर शोर मचाते हुये उस पर टूट पड़ते हैं । पुरुष समाज का यह बड़ा अत्याचार है । देखो तो ! ( मुलोचना को ओर मुस्करांती हुई ) वैचारी कलिका किस प्रकार लज्जित और संकुचित सी हो रही है ! ( सखियों की ओर देखकर ) किन्तु हमारी इस अर्द्धं विकसित गुलाब कलिका पर अभी किसी रसिक भ्रमर की दृष्टि नहीं पड़ी । क्यो सखी ! इसीलिये ही इस का हृदय प्रेम पराग विहीन सा जान पड़ता है ।

त्रिमला—यह कलिका फैं हैं ! साधारण कली तो है ही नहीं, जो कोई साधारण भ्रमर इसका रंसास्वादन कर सके। इसके लिये तो कोई देवलोक का रसिक भ्रमर ही झावेगा ।


( ७ )

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अमला—हाँ सखी, बहुत ठीक कहा ( मुलोचना-की ओर देखकर ) क्यों कुमारी ठीक है न !

मुलोचना—चलो जी ! उन्हें प्रत्येक नमय यही विनोद्र ही सूभा करता हैं !

अमला—और झाप को शायद धृणा रहा करती हैंगी ! तभी तो किसी भ्रमर राज को हृस अथर्बिली कली का नैरस ही प्रकट नहीं हो पाया । नहीं तो इन रसिक प्रकृति अमरों का समूह इस नई कलिका पर आकर द्रव का शोर मचाने और हठलाने लगता ।

मुलोचना—चैल ! दूर हो । मैं तुम से बात नहीं करना चाहती । तू बहुत चंचल हो गई है । अच्छा फौरै इस नमय के योग्य गीत तो गा !

सब सखियाँ मिलकर—अच्छा

खिले उपवन में विविध प्रसून ! ध्रुव ।
विकसित हुईं नव्य कलिकाएँ, ललितकाएं मनमुग्ध ।
जिन्दें वितीर्ण झ्राहो । विरही मन हुए पूर्णेतः चुम्ब ।। १ ।।
ललित स्वरों से, कोकिल, हो मुदमस्त रही है कूक ।
करके जिसे, श्रवण, उठती, हृदयों में दाधूक हूक।। २।।

(… आगे का पूर्ण नाटक संलग्न PDF में …)


पूर्ण नाटक (मूल प्रकाशित ग्रन्थ, PDF)

057__2015.340931.Sudarshan-Natak.pdf (2.8 MB)

प्रूफरीडिंग बाकी है


स्रोत: दस लक्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम संग्रह — मूल प्रकाशित नाटक (मूलचन्द्र जैन वत्सल, साहित्य रत्नालय बिजनौर)।