संबोधन-सप्तक । Sambodhan-Saptak

audio
#1

पर लक्ष्य तजो निज तत्व भजो, आत्मन निज में ही शान्ति मिले।
जग का परिणमन स्वतन्त्र अरे, तेरा विकल्प तहाँ नहीं चले ।।टेक।।

परचिन्ता में क्यों मूढ़ बना?,
यह स्वर्णिम अवसर खोता है।
क्रमबद्ध सभी परिणमन सदा, जो होना है, सो होता है।।
स्वयमेव पंच समवाय मिलें, होनी टाले से नहीं टले।
जग का परिणमन स्वतन्त्र अरे, तेरा विकल्प तहाँ नहीं चले ।।1।।

सीता अनुकूल बनाने में, रावण ने क्या क्या नहीं किया।
पर सीता नहीं अनुकूल हुई, अपयश से मर कर नरक गया।।
मिल गया धूल में सब वैभव, अभिमान किसी का नहीं चले।
जग का परिणमन स्वतन्त्र अरे, तेरा विकल्प तहाँ नहीं चले ।।2।।

फिर जो सब जग को ही अपने, अनुकूल बनाने की ठानें।
कैसे सुखशान्ति मिल सकती, झूठा कर्तापन यदि माने।।
धर भेदज्ञान निरपेक्ष रहो, समता से सर्व विभाव टलें।
जग का परिणमन स्वतन्त्र अरे, तेरा विकल्प तहाँ नहीं चले ।।3।।

प्रभु की भी तूने नहीं मानी, तो जग तेरी कैसे माने।
तज दुर्विकल्प हो निर्विकल्प, आराधन का उद्यम ठाने।।
हो जीवन सफल सु आत्मध्यान से, सहज ही कर्म कलंक जलें।
जग का परिणमन स्वतन्त्र अरे, तेरा विकल्प तहाँ नहीं चले ।।4।।

यद्यपि विकल्प ज्ञानी को भी हो, जीव धर्म में लग जावे!
तब सहज होय उपदेश, शास्त्र रचना आदिक भी हो जावे।।
पर लेश नहीं कर्तृत्व उन्हें, अन्तर में भेद विज्ञान चले।
जग का परिणमन स्वतन्त्र अरे, तेरा विकल्प तहाँ नहीं चले ।।5।।

अनुसरण योग्य ज्ञानी को भी, बस वीतराग विज्ञान अहो।
हो धन्य घड़ी परमानन्दमय, निज में ही सहज मग्नता हो।।
ज्ञायक हो ज्ञायक सहज रहो, सम्यक संयम सुख रूप चले।
जग का परिणमन स्वतन्त्र अरे, तेरा विकल्प तहाँ नहीं चले ।।6।।

शुभभाव भूमिकायोग्य सहज ही, परिणति में आ जाता है।
ये भी परिवार मोह का ही, सन्तोष न इनमें आता है।।
स्वाश्रय से ही पुरुषार्थ बढ़े, फिर निजानन्द में लीन रहे।
जग का परिणमन स्वतन्त्र अरे, तेरा विकल्प तहाँ नहीं चले ।।7।।

Artist- Br.Ravindra Ji “Atman”

3 Likes
#2


Sorry but this already present on forum.

#3

Then we need to sort some simple way out to prevent this.

#4

I think one way is to search before asking or adding something.

Another one is - at least on desktop - the forum automatically shows if there was anything posted earlier relevant to the one which we are creating.

1 Like