सामायिक पाठ भाषा | samayik path bhasha

सामायिक पाठ (भाषा)

(पं. महाचन्द्र जी कृत)

( प्रथम प्रतिक्रमण कर्म)

काल अनन्त भ्रम्यो जग में सहिये दुःख भारी।
जन्म-मरण नित किये पाप को है अधिकारी।।
कोटि भवांतर माहिं मिलन दुर्लभ सामायिक।
धन्य आज मैं भयो योग मिलियो सुखदायक।।१।।

हे सर्वज्ञ जिनेश ! किये जे पाप जु मैं अब।
ते सब मन-वच-काय योग की गुप्ति बिना लभ।।
आप समीप हजूर माहिं मैं खड़ो खड़ो सब।
दोष कहूं सो सुनो करो नठ दुःख देहिं जब।।२।।

क्रोध मान मद लोभ मोह माया वशि प्रानी।
दुःखसहित जे किये दया तिनकी नहिं आनी।।
बिना प्रयोजन एकेन्द्रिय विति चउ पंचेन्द्रिय।
आप प्रसादहिं मिटैं दोष जो लग्योमोहि जिय।।३।।

आपस मैं इकठोर थापकरि जे दुःख दीने।
पेलि दिए पगतलैं दाबि करि प्राण हरि ने।।
आप जगत के जीव जिते तिन सब के नायक।
अरज करूँ मैं सुनो दोष मैटो दुःखदायक।।४।।

अंजन आदिक चोर महा घनघोर पापमय।
तिनके जे अपराध भये ते क्षमा क्षमा किय।।
मेरे जे अब दोष भये ते क्षमहु दयानिधि।
यह पडिकोणो कियो आदि षट्कर्म माहिं विधि।।५।।

(द्वितीय प्रत्याख्यान कर्म)

जो प्रमादवशि होय विरोधे जीव घनेरे।
तिनके जो अपराध भयो मेरे अघ ढेरे।।
सो सब झूठी होऊ जगतपति के परसादै।
जा प्रसाद तैं मिलै सर्व सुख दुःख न लाधै।।६।।

मैं पापी निर्लज्ज दयाकरि हीन महाशठ।
किये पाप अघ ढेर पापमति होय चित्त दुठ।।
निदूँ हूँ मैं बार-बार निज जिय को गरहुँ।
सब विधि धर्म उपाय पाय फिर पापहि करहूँ।।७।।

दुर्लभ है नरजन्म तथा श्रावक कुल भारी।
सत संगति संयोग धर्म जिन-श्रद्धा धारी।।
जिन वचनामृत धार समावर्ते जिनवाणी।
तोहू जीव सहारे धिक् धिक् धिक् हम जानी।।८।।

इन्द्रिय लंपट होय खोय निजज्ञान जमा जब।
अज्ञानी जिमि करै तिसि विधि हिंसक ह्वै अब।। गमनागमन करंतो जीव विराधे भोले।
ते सब दोष किये निन्दूं अब मन बच तोले।।९।।

आलोचन विधि थकी दोष लागे जु घनेरे।
ते सब दोष विनाश होउ तुमतें जिन मेरे।।
बार बार इस भाँति मोह-मद दोष कुटिलता।
ईर्षादिक तें भये निंदिये जे भयभीता।।१०।।

(नोट :- यहाँ आलोचना-पाठ पढ़ना चाहिये )

(तृतीय सामायिक भाव कर्म)

सब जीवन में मेरे समताभाव जग्यो है।
सब जिय मो सम समता राखो भाव लग्यो है।।
आर्त्त रौद्र द्वय ध्यान छांड़ि करिहूं सामायिक।
संयम मो कब शुद्ध होय यह भावबधायक।।११।।

पृथ्वी जल अरु अग्नि वायु चउकाय वनस्पति।
पंचहि थावर माहिं तथा त्रस जीव बसैं जित।।
बे इन्द्रिय तिय चउ पंचेन्द्रिय माहिं जीव सब।
तिन तें क्षमा कराऊँ मुझ पर क्षमा करो अब।।१२।।

इस अवसर में मेरे सब सम कंचन अरु तृण।
महल मसान समान शत्रु अरु मित्रहिं सम गण।।
जामन मरण समान जानि हम समता कीनी।
सामायिक का काल जितै यह भाव नवीनी।।१३।।

मेरो है इक आतम तामें ममत जु कीनो।
और सबै मम भिन्न जानि समतारस भीनो।।
मात पिता सुत बंधु मित्र तिय आदि सबै यह।
मोतें न्यारे जानि जथारथ रूप करयो गह।।१४।।

मैं अनादि जगजाल माहिं फँसि रूप न जाण्यों।
एकेन्द्रिय दे आदि जंतु को प्राण हराण्यो।।
ते सब जीव समूह सुनो मेरी यह अरजी।
भव-भवको अपराध छिमा कीज्यो करि मरजी।।१५।।

( चतुर्थ स्तवन कर्म)

नमो वृषभ जिनदेव अजित जिन जीत कर्म को।
सम्भव भवदुःखहरण करण अभिनन्दन शर्म को।।
सुमति सुमति दातार तार भवसिन्धु पार कर।
पद्मप्रभु पद्माभ भानि भव भीति प्रीति धर।।१६।।

श्री सुपार्श्व कृतपाश नाश भव जास शुद्ध कर।
श्री चन्द्रप्रभ चंद्रकांति सम देह कांति धर।।
पुष्पदंत दमि दोषकोश भविपोष रोषहर।
शीतल शीतल करण हरण भव ताप दोषहर।।१७।।

श्रेयरूप जिनश्रेय ध्येय नित सेय भव्यजन।
वासुपूज्य शतपूज्य वासवादिक भवभयहन।।
विमल विमलमति देत अन्तगत हैं अनंत जिन।
धर्मशर्म शिवकरण शांतिजिन शांतिविधायिन।।१८।।

कुन्थुकुन्थु मुख जीवपाल अरनाथजाल हर।
मल्लि मल्लसम मोहमल्लमारन प्रचार धर।।
मुनिसुव्रत व्रतकरण नमतसुरसंघ हि नमि जिन।
नेमिनाथ जिननमि धर्म रथमांहि ज्ञानधन।।१९।।

पार्श्वनाथ जिन पार्श्व उपलसम मोक्षरमापति।
वर्द्धमान जिन नमूँ बमूँ भवदुःख कर्मकृत।।
या विधि मैं जिन संघरूप चौबीस संख्यधर।
स्तवूँ नमूँ हूँ बार-बार बन्दूं शिव सुखकर।।२०।।

( पंचम बन्दना कर्म)

बंदू मैं जिनवीर धीर महावीर सुसन्मति।
वर्द्धमान अतिवीर बंदिहूं मनवचतन कृत।।
त्रिशलातनुज महेशधीश विद्यापति बंदू।
बंदूं नितप्रति कनकरूप तनु पाप निकंदुं।।२१।।

सिद्धारथनृपनंद द्वन्द दुःख दोष मिटावन।
दुरित दवानल ज्वलित ज्वाल जग जीव उधारन।। कुण्डलपुर करि जन्म जगत जिय आनन्द कारन।
वर्ष बहत्तर आयु पाय सब ही दुःख टारन।।२२।।

सप्तहस्त तनु तुंग भंगकृत जन्म-मरण भय।
बालब्रह्ममय ज्ञेय हेय आदेय ज्ञानमय।।
दे उपदेश उधारि तारि भवसिंधु जीवधन।
आप बसे शिव माहिं ताहि वंदों मनवचतन।।२३।।

जाके वंदन थकी दोष दुःख दूरहि जावै।
जाके वंदन थकी मुक्तितिय सन्मुख आवै।।
जाके वंदन थकी वंद्य होवें सुरगन के।
ऐसे वीर जिनेश वंदहूँ क्रमयुग तिनके।।२४।।

सामायिक षट्कर्ममाहिं वंदन यह पंचम।
वंदों वीर जिनेन्द्र इंद्रशतवंद्य मम।।
जन्म मरण भय हरो, करो अघ-शांति शांतिमय।
मैं अघकोष सुपोष दोष को दोष विनाशक।।२५।।

(षष्टम कायोत्सर्ग कर्म)

कायोत्सर्ग विधान करूं अंतिम सुखदाई।
काय त्यजनमय होय काय सब को दुःखदाई।।
पूरब दक्षिण नमूँ दिशा पश्चिम उत्तर में।
जिनगृह वंदन करूँ, हरुं, भव पापतिमिर मैं।।२६।।

शिरोनति मैं करूं नमूँ मस्तक करि धरिकैं।
आवर्तादिक क्रिया करूं मन वच मद हरिकैं।।
तीन लोक जिन-भवन मांहि जिन हैं जु अकृत्रिम।
कृत्रिम हैं द्वय अर्द्धद्वीप माहीं वंदों जिम।।२७।।

आठ कोड़ि परि छप्पन लाख जु सहस सत्याणूं।
चार शतक पर असी एक जिन-मंदिर जाणूं।।
व्यंतर ज्योतिषि माहिं संख्यरहिते जिन मंदिर।
ते सब वंदन करूं हरहूँ मम पाप संघकर।।२८।।

सामायिक सम् नाहिं और कोउ बैर मिटायक।
सामायिक सम नाहिं और कोउ मैत्री दायक।।
श्रावक अणुव्रत आदि अंत सप्तम गुण थानक।
यह आवश्यक किये होय निश्चय दुःखहानक।।२९।।

जे भवि आतम काज करण उद्यम के धारी।
ते सब काज विहाय करो सामायिक सारी
राग द्वेष मद मोह क्रोध लोभादिक जे सब
बुध महाचंद्र विलाय जाय तातैं कीज्यो अब ।।३०।।