पृष्ठभूमि — जैन स्वाध्याय सामग्री | Prishthbhumi

पृष्ठभूमि

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पृष्ठभूमि

कविवर व्यास की तरह यदि जैनदर्शन का सार दो शब्दों में कहना हो तो कहा जा सकता है कि -
‘रत्नत्रय ही मुक्ति का मार्ग है’
रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र तीनों की एकरूपता ही मोक्षमार्ग है।
मोक्षमार्ग अर्थात् दुःखों से मुक्ति का उपाय, विकारों से मुक्ति का उपाय। प्रत्येक संसारी जीव दुःखी है और सुखी होना चाहता है, निराकुलरूप सुख मोक्ष में है पर उसे सच्चा मोक्षमार्ग ज्ञात न होने से वह उसे प्राप्त नहीं कर पाता; अतः मोक्षमार्ग बतलाने का प्रयत्न ही समस्त जैनगम में किया गया है।
जीव व पुद्गल (कर्म और शरीर) अनादिकाल से एकमेक हो रहे हैं। ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मों के उदय में जीव के मोह-राग-द्वेषरूप परिणाम (भावकर्म) होते हैं और मोह-राग-द्वेष होने पर आत्मा का द्रव्यकर्मों से संबंध होता है, उसके फलस्वरूप देहादि की स्थिति बनती रहती है और आत्मा मोहादिभावों से दुःखी हुआ करता है। जीव की इसी दुःखान्धता का नाम ही ‘संसार’ है और दुःखों से मुक्त पूर्ण सुखी हो जाने का नाम है ‘मोक्ष’। दुःखों से छूटने के उपाय का कहते हैं ‘मोक्षमार्ग’।
जैनागमों के उपदेशों का केन्द्र बिन्दु ‘आत्मा’ है; अतः आत्मतत्त्व के प्रतिपादन के लिए परद्रव्यों का जितना और जो कथन आवश्यक है, उतना

  1. अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
    परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीडनम्।।
  2. तत्त्वार्थसूत्रः आचार्य उमास्वामी; अध्याय - 1, सूत्र - 1

जैनदर्शन का

पृष्ठभूमि

ही करना सम्यग्दर्शन, विपरीतभिनिवेश रहित आत्मस्वरूप का ज्ञान सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान रहित आत्मस्वरूप में लीनता सम्यक्चारित्र है।

रत्नत्रय साक्षात् मोक्ष का कारण है, मोक्षरूप ही है। यह कर्मबंध का कारण कभी भी नहीं हो सकता; क्योंकि बंध के कारणभूत मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग का रत्नत्रय में अभाव है; अतः ‘रत्नत्रय मुक्ति का ही कारण है’ तथा मुक्ति की प्राप्ति रत्नत्रय से ही होती है, अन्य किसी उपाय से नहीं; अतः ‘रत्नत्रय ही मुक्ति का कारण है।’
समस्त जैनागम मोक्ष और मोक्षमार्ग के प्रतिपादन में ही समर्पित है; क्योंकि संसारी प्राणियों को मुक्ति का उपाय बताना ही जैनागम की रचना का मूल उद्देश्य रहा है।
जैनागम में प्रतिपादित विषयवस्तु एवं अनेक दार्शनिक विचारों को हम निम्नानुसार वर्गीकृत कर सकते हैं -

मोक्षमार्ग

रत्नत्रय
सम्यग्दर्शन
(द्रव्य व्यवस्था)
सम्यग्ज्ञान
(प्रमाण व्यवस्था)
सम्यक्चारित्र
(आचरण व्यवस्था)
देशचारित्र
सकलचारित्र
षड्द्रव्य
(द्रव्य व्यवस्था)
सात तत्त्व और नौ पदार्थ
(तत्त्व व्यवस्था)

और नहीं कथन जैनागमों में मुख्यरूप से वर्णित है। उनमें जीव का प्रतिपादन तो जीव के समझने के लिए ही है, किन्तु अजीव द्रव्यों का प्रतिपादन भी जीव (आत्मा) को समझने के लिए ही है; क्योंकि आत्मा का हित तो आत्मा के जानने में है। अतः आत्मा को सुख-शांति प्राप्त कराने वाला जैन तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित धर्म मात्र ‘धर्म’ नहीं, ‘आत्मधर्म’ है; यही आत्मधर्म मोक्ष का मार्ग है, दुःखों से छूटने का उपाय है।
जैनागमअनुसार वस्तु का स्वभाव तो सदा विद्यमान ही है, उसे क्या छोड़ना और क्या पाना? उसे तो जानना है, समझना है। अज्ञानी ने आज तक उसे समझा नहीं, उसकी श्रद्धा नहीं की, उसका अनुभव नहीं किया। अतः आत्मस्वभाव का साक्षात्कार करना ही एकमात्र कर्तव्य है। स्वभाव के साक्षात्कार से जो स्वभाव पर्याय प्रकट होती है, वही परमार्थ धर्म है, उसे ही पाना है। आत्मसन्मुख होकर आत्मा को मानना, जानना और उसी में रम जाना धर्म है, जिसे क्रमशः सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र कहते हैं; रत्नत्रय धर्म कहते हैं। इन तीनों की एकता ही मुक्ति का मार्ग है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र - तीनों पृथक्-पृथक् मुक्ति के मार्ग नहीं हैं; अपितु तीनों की एकतारूप रत्नत्रय ही मुक्ति का मार्ग है; अतः जैनागमअनुसार मुक्तिमार्ग तीन नहीं, एक है।
श्रद्धा, ज्ञान और चारित्र आत्मा के तीन गुण हैं। इनका स्वभाव परिणमन क्रमशः सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र है। स्वभाव के अनुकूल परिणमन होने से ये धर्म हैं, सुख के कारण हैं और सुखरूप हैं।
मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र क्रमशः उन्हीं गुणों के विपरीत परिणमन हैं; अतः वे अधर्म हैं, दुःख के कारण हैं और दुःखरूप हैं।
आत्मा अथवा सात तत्त्व संबंधी विपरीत मान्यता (श्रद्धान) को मिथ्यादर्शन, तत्त्वसंबंधी विपरीत ज्ञान अथवा मिथ्यादर्शन सहित ज्ञान को मिथ्याज्ञान और मिथ्यादर्शन-मिथ्याज्ञान से युक्त कषाय एवं पंचेंद्रिय विषय रूप प्रवृत्ति को मिथ्याचारित्र कहते हैं। इसके विपरीत आत्मा अथवा सम तत्त्वों के स्वरूप का विपरीतभिनिवेश रहित सम्यग्दर्शन

प्रथम अध्याय

जैनधर्म की प्राचीनता

जैनदर्शन के अनुसार जैनधर्म अनादि-अनंत है। इसके अनुसार वर्तमान चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने तो जैनधर्म की स्थापना की ही नहीं, प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने भी जैनधर्म की स्थापना नहीं की। उन्होंने तो धर्म का उपदेश किया है, प्रचार किया है। उन्होंने धर्म में धर्म नहीं, धर्म में खोई आस्था को स्थापित किया है। उन्होंने जो कुछ कहा है, वह सदा से है, सनातन है।
जैनधर्म के अनुसार भगवान धर्म की स्थापना नहीं करते; क्योंकि धर्म तो वस्तु के स्वभाव को कहते हैं तथा वस्तु का स्वभाव बनाया नहीं जा सकता। जो बनाया जा सके वह स्वभाव कैसा? वह तो जाना जाना है। जैनदर्शन के अनुसार भगवान महावीर भी वस्तुस्वरूप को जानते हैं, बताते हैं, बनाते नहीं; क्योंकि तीर्थंकर भगवान जगत् के तत्त्वज्ञ ज्ञाता-दृष्टा होते हैं, कर्ता-धर्ता नहीं।
तीर्थंकर भगवान महावीर ने भी कोई नया धर्म नहीं चलाया, न ही कुछ संशोधन किए; अपितु पूर्व परम्परा से चले आ रहे मुक्तिमार्ग पर वे स्वयं चले एवं उन्होंने समस्त जीवों को मुक्ति का उपाय बताया; अतः बौद्ध धर्म के संस्थापक बुद्ध के समान महावीर को जैनधर्म का संस्थापक मानना बहुत बड़ी भूल है। भगवान महावीर ने धर्म की स्थापना नहीं की, उसका प्रचार व प्रसार किया है।
इस संदर्भ में ‘जैनिज्म इन बिहार’ नामक पुस्तक के पृष्ठ पर श्रीमान पी.सी. राय चौधरी का निम्न वक्तव्य दृष्टव्य है -
"कुछ आधुनिक लेखकों ने यह लिखकर साधारण भूल की है कि ब्राह्मण धर्म के विरुद्ध असंतोष की भावनाएँ फैल जाने के कारण जैनधर्म की उत्पत्ति हुई। इस गलत धारणा का सूत्रपात इसलिए हुआ कि उन्होंने वर्धमान

जैनधर्म की प्राचीनता

महावीर को जैनधर्म का प्रवर्तक मान लिया। यह तथ्य ठीक नहीं है।
— जैनधर्म की उत्पत्ति एवं प्रसार पहिले से ही हो चुका था और महावीर ने इसका अत्यधिक प्रचार किया था और यही कारण है कि इसप्रकार की गलत धारणा कोई ख्याति प्राप्त विद्वानों से हो गई।"
इसप्रकार हम कह सकते हैं कि जैनमतानुयायी अपने मत के संस्थापक या प्रवर्तक के रूप में किसी एक व्यक्ति विशेष को तो स्वीकार करते ही नहीं हैं; अपितु तीर्थंकरों को भी वे धर्मप्रवर्तक नहीं, धर्मप्रचारक के रूप में ही स्वीकार करते हैं।
भारतवर्ष में इस युग के आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव थे तथा तीर्थंकर भगवान महावीर चौबीसवें एवं अंतिम तीर्थंकर थे।
सद्गुरुओं व सर्वज्ञों की अपेक्षा तीर्थंकर भगवान भी अनन्त होते हैं। तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से भी पहिले अनन्त तीर्थंकर भगवान हो गए हैं एवं सिंहादि अन्य क्षेत्रों में होते रहते हैं। इस सबको समझने के लिए जैनधर्म में प्रतिपादित कालचक्र को समझना होगा।

कालचक्र

जैनधर्म के अनुसार प्रत्येक कालचक्र में अलग-अलग क्षेत्र में एक निश्चित संख्या में क्रमशः तीर्थंकर होते रहते हैं और उनके द्वारा धर्म का प्रचार-प्रसार होता है। जैन ग्रन्थों में कालचक्र का वर्णन निम्नप्रकार मिलता है।
"समय अपने को दुहराता है, यह एक प्राकृतिक नियम व वैज्ञानिक व्यवस्था है। जिसप्रकार दिन-रात, पक्ष-मास, ऋतुएँ और वर्ष अपने को दुहराते हैं, उसीप्रकार शताब्दियाँ, सहस्राब्दियाँ आदि तथा संख्यातीत काल भी किन्हीं प्राकृतिक नियमों के द्वारा अपने को दुहराते हैं।
कालचक्र के इस परिवर्तन में स्वाभाविक उतार-चढ़ाव आते हैं, जिन्हें जैन परिभाषा में उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के नाम से जाना जाता है।

  1. महावीर जयन्ती स्मारिका 1968, पृष्ठ - 128

जैनधर्म की प्राचीनता

जहाँ उत्सर्पिणी क्रमंशः विकास की प्रक्रिया है, वहाँ अवसर्पिणी क्रमशः ह्रास की प्रक्रिया है। उत्सर्पिणी में प्राणियों के बल, आयु और शरीरादि का प्रमाण क्रमशः बढ़ता जाता है और अवसर्पिणी में उसी क्रम से घटता जाता है। इसप्रकार यदि उत्सर्पिणी बढ़ने का नाम है तो अवसर्पिणी घटने का। उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी दोनों में प्रत्येक का काल दस-दस कोड़ा-कोड़ी सागर का।

इसप्रकार कुल मिलाकर बीस कोड़ा-कोड़ी सागर का एक कल्पकाल होता है। प्रत्येक कल्पकाल में तीर्थंकरों की दो चौबीसी होती है।

अवसर्पिणी काल के छः भेद हैं - 1. सुषमा-सुषमा, 2. सुषमा, 3. सुषमा-दुषमा, 4. दुषमा-सुषमा, 5. दुषमा, 6. दुषमा-दुषमा।

इसीप्रकार उत्सर्पिणी भी छह प्रकार का होता है - 6. दुषमा-दुषमा, 5. दुषमा, 4. दुषमा-सुषमा, 3. सुषमा-दुषमा, 2. सुषमा, 1. सुषमा-सुषमा।

उक्त कालों में सुख-दुःख की स्थिति उनके नामानुसार ही होती है। यहाँ सुख शब्द लौकिक सुख (भोग) के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। तृतीय काल तक भोग की ही प्रधानता रहती है। यहाँ तक कि आध्यात्मिक उन्नति के तो अवसर ही प्राप्त नहीं होते।

तीर्थंकरों की उत्पत्ति चतुर्थकाल में ही होती है और मुक्तिमार्ग भी चतुर्थकाल में ही चलता है। इस दृष्टि से चतुर्थकाल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

तृतीय काल के अन्त में चौदह कुलकर होते हैं और चतुर्थ काल में श्रेयांस शलाका के महापुरुष। श्रेयांस शलाका के महापुरुष निम्नानुसार हैं - 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 नारायण, 9 प्रतिनारायण, 9 बलभद्र।

वर्तमान अवसर्पिणी काल का पंचमकाल चल रहा है। इसमें न तो कुलकर ही होते हैं और न श्रेयांस शलाका महापुरुषों की उत्पत्ति ही होती है। किसी को मुक्ति की प्राप्ति भी नहीं होती। चतुर्थकाल में जो श्रेयांस शलाका के महापुरुष हुए हैं, विशेषकर उनके चरित्रों का वर्णन ही जैनपुराणों का कथ्य है।

इसप्रकार अनन्त कल्पकाल बीत चुके हैं और भविष्य में अनन्त होंगे। तदनुसार तीर्थंकरों की अनन्त चौबीसियाँ इस भरतक्षेत्र में हो चुकी हैं और भविष्य में अनन्त और होंगी। ऐसी ही व्यवस्था ऐरावत क्षेत्र की है। विदेहक्षेत्र की व्यवस्था इससे कुछ भिन्न प्रकार की है। वहाँ सदा चतुर्थकाल जैसी स्थिति रहती है।‘’

जैनमतानुसार महाविदेह क्षेत्र में सदैव तीर्थंकरों की उपस्थिति रहती है; क्योंकि जिस समय वर्तमान तीर्थंकर निर्वाण प्राप्त करते हैं, उसी समय उसी नाम से दूसरे तीर्थंकर केवल्य प्राप्त कर तीर्थंकर पद प्राप्त कर लेते हैं। इसप्रकार तीर्थंकरों का क्रम सदा चलता रहता है।

अढ़ाई द्वीप (मनुष्य लोक) में अधिकतम 170 और न्यूनतम 20 तीर्थंकर सदैव विद्यमान रहते हैं। इन न्यूनतम और अधिकतम संख्या का अतिक्रमण नहीं होता। एक तीर्थंकर का दूसरे तीर्थंकर से कभी मिलाप नहीं होता।

जैन भूगोल के अनुसार मनुष्यलोक में विद्यमान असंख्यात द्वीप-समुद्रों में से ढाई-द्वीप में ही मानवों की उत्पत्ति होती है; अतः तीर्थंकर भी ढाई-द्वीप में ही उत्पन्न होते हैं।

प्रथम, द्वितीय, तृतीय काल में क्रमशः उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य भोगभूमि की व्यवस्था रहती है, उसमें भोगों की ही प्रधानता रहती है। सबको सभी प्रकार की भोगसामग्री कल्पवृक्षों के माध्यम से सहज उपलब्ध रहती है। जीवन लौकिक दृष्टि से आनन्दमय होने पर भी आध्यात्मिक दृष्टि से उनके विकास का मार्ग एक प्रकार से अवरुद्ध ही रहता है। चतुर्थकाल में कर्मभूमि का आरम्भ होता है। भोगों की सहज उपलब्धि क्रमशः समाप्त होने लगती है और आजीविका प्रयत्नसाध्य एवं क्रमशः श्रमसाध्य होती जाती है, किन्तु आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खुल जाता है। तृतीय काल के अन्त में होने वाले चौदह कुलकर जनसाधारण को कर्मभूमि की व्यवस्था में

  1. डॉ. हुकमचन्द भारिल्लः तीर्थंकर भगवान महावीर और उनका सर्वोदय तीर्थ, पृष्ठ 7-8

जैनधर्म की प्राचीनता

प्रशिक्षित करते हैं। इस अवसर्पिणी काल के चौदहवें कुलकर राजा नाभिराय थे। इन तक आते-आते तृतीय काल समाप्तप्रायः था और भोगभूमि क्रमशः कर्मभूमि के रूप में व्यवस्थित होने लगी थी।

चौदहवें कुलकर राजा नाभिराय की रानी मरुदेवी के गर्भ से प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ था। राजा नाभिराय के बाद वे राजगद्दी पर बैठे। उन्होंने अपने राजकाल में अनेक जनोपयोगी कार्यों के साथ-साथ प्रजा को असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन षट्कर्मों से आजीविका करना सिखाया। क्योंकि उस समय भोगभूमि समाप्त हो जाने से कल्पवृक्षों के अभाव के कारण आजीविका सहज नहीं रह गई थी। आजीविका श्रमसाध्य हो जाने से संघर्ष की स्थिति टालने के लिए व्यवस्था आवश्यक हो गई थी। कर्मभूमि के आरंभ होने में तत्संबंधी समस्त व्यवस्था आरंभ में राजा ऋषभदेव के द्वारा स्थापित हुई। यही कारण है कि उन्हें प्रजापति, ब्रह्मा, विधाता, आदिशुद्ध आदि नामों से भी पुकारा गया है।

इसप्रकार कुशलतापूर्वक अनेक वर्षों तक राज्य करने के पश्चात् राजा ऋषभदेव दीक्षा धारण कर मुनिराज ऋषभदेव बन गए। मुनिराज ऋषभदेव एक हजार वर्ष तक बराबर मौन आत्म साधनापर अनवरोध घोर तपश्चरण करते रहे। एक दिन आत्मोन्नति की दशा में उन्हें केवलज्ञान (पूर्णज्ञान) की प्राप्ति हुई और वे मुनिराज ऋषभदेव से भगवान ऋषभदेव बन गए। इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर होने से उन्हें आदिनाथ भी कहा जाता है।

इस अवसर्पिणी काल की दृष्टि से भरतक्षेत्र के तीर्थंकर भगवान आदिनाथ प्रथम व महावीर चौबीसवें व अन्तिम तीर्थंकर हैं।

उक्त विवरण से स्पष्ट है कि जैन मान्यतानुसार जन्म से कोई भगवान नहीं होता। भगवान जन्माते नहीं, बनते हैं। ऋषभदेव से वर्धमान पर्यंत

  1. प्रजापतीनां प्रथमं जिजीविषुः शशास कृष्यादिसु कर्मसु प्रजा ।। स्वयंभू स्तोत्र

जैनधर्म की प्राचीनता

सभी तीर्थंकर जन्म से तो हम-तुम जैसे ही थे; भगवान तो वे बाद में बने, जब उन्होंने अपने को जीता। मोह-राग-द्वेष को जीतना ही अपने को जीतना है। भगवान तो उन्हें कहते हैं जो पूर्ण वीतरागी व सर्वज्ञ हों। सभी तीर्थंकर जन्म से न तो पूर्ण वीतरागी थे और न सर्वज्ञ ही। पूर्ण वीतरागता व सर्वज्ञता तो सभी ने बाद में तप प्राप्त की, जब वे राज्यादि परिग्रह एवं तत्संबंधी राग त्यागकर साधु बने एवं अन्तर्मन हो उन्होंने सम्पूर्ण राग-द्वेष और अल्पज्ञता का पूर्ण अभाव कर डाला।

अतः जैनों का कहना है कि सर्वज्ञता व पूर्ण वीतरागता की प्राप्ति के पूर्व जहाँ भी तीर्थंकरों की पूर्व अवस्था के साथ ‘भगवान’ विशेषण का प्रयोग हो, उसे उपचारित कथन ही जानना चाहिए। ‘भविष्य में भगवान बनेंगे’ - इस आधार पर ही वैसा कहा जाता है। इस बात को समझने के लिए जैन-दर्शन की कथन पद्धति अनेकान्त और स्याद्वाद को समझना चाहिए। जिसका वर्णन आगे किया जाएगा।

इसप्रकार हम देखते हैं कि जैनों के अनुसार भगवान आदिनाथ या महावीर किसी ने भी कोई नया धर्म नहीं चलाया, न ही वे इसके संस्थापक हैं। उन्होंने धर्म की स्थापना नहीं, उसका अनुसंधान किया है।

जैनमतानुसार प्रत्येक तीर्थंकर का धर्मोपदेश भी समान ही होता है। प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ ने जो उपदेश दिया, वही आदिनाथ से लेकर पार्श्वनाथ से होकर अंतिम तीर्थंकर महावीर पर्यंत ज्यों-का-त्यों चला आ रहा है। तीर्थंकरों के उस भव के जीवन्तत्व में अन्तर हो सकता है, होता ही है; किन्तु तीर्थंकरों के उपदेशों में रंचमात्र भी अन्तर नहीं होता है; क्योंकि वीतरागता व सर्वज्ञता - ये दो लक्षण समस्त तीर्थंकर भगवन्तों के समान रूप से ही पाए जाते हैं; अतः समस्त तीर्थंकरों द्वारा मोक्ष एवं मोक्षमार्ग का स्वरूप समान ही बताया गया है। उन्होंने जो कुछ कहा है, वह सदा से है, सनातन है, अनादि है।

कालचक्र के उपयुक्त विवरण से स्पष्ट है कि जैनमान्यतानुसार तीर्थंकरों की परम्परा अनादि-अनन्त है। इस अवसर्पिणीकाल के प्रथम तीर्थंकर

जैनधर्म की प्राचीनता

ऋषभदेव के पूर्व भी अनन्त तीर्थंकर हो चुके हैं और महावीर के बाद भी इसी भरत भूमि पर उत्सर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर महात्मा होने वाले हैं व तीर्थंकरों की यह परम्परा अनेकाल तक चलने वाली है।

इसप्रकार जैनमतानुसार भगवान महावीर के पूर्व भी जैनदर्शन की एक पूर्ण विकसित परम्परा विद्यमान थी। तीर्थंकर महावीर भरत क्षेत्र में अब तक हुए तीर्थंकरों की अंतिम कड़ी है, प्रारंभिक नहीं।

जैनधर्म की उक्त मान्यता का समर्थन जैन साहित्य एवं पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर भी होता है।

जैनतर साहित्य एवं पुरातात्विक साक्ष्य

जैनधर्म व तीर्थंकरों की परम्परा की प्राचीनता को वैदिक संस्कृति के प्राचीनतम ग्रंथ वेदों व वैदिक पुराणों में प्राप्त कतिपय उल्लेखों से सिद्ध कर दिया है।

ऋग्वेद में एक स्थान पर ऋषभदेव को ज्ञान का आगार तथा क्रोधादि शत्रुओं का विध्वंसक बताते हुए कहा गया है कि -

अमृत्युवो वृषभो ज्यायिषः, अघ शंसः मर्त्युवः।
दिवा न पाता पितृवश्चिभिः क्षत्रं राजान प्रतिदोषयः।।’

जिसप्रकार जल में मेरा बुढ़ा मेरा युवा मनुष्य का होता है और पृथ्वी की प्यास बुझा देता है; उसीप्रकार पृथ्वी अर्थात् ज्ञान के प्रतिपादक ऋषभ महान है, उनका शासन नर दे। उनके शासन में क्रांति परम्परा से प्राप्त पूर्व का ज्ञान आत्मा के क्रोधादि शत्रुओं का विध्वंसक हो। दोनों (संसारो और सिद्ध) आत्माएँ अपने ही शत्रुओं से चमकती हैं। अतः वही राजा है, वे पूर्व ज्ञान के आगार है और आत्म पतन नहीं होने देते।

ऋग्वेद में ही एक अन्य स्थान पर ऋषभदेव को मन-वचन-काय से संयत कहा गया है

त्रिषावद्धो वृषभो रेरेवीति महादेयो मर्त्यनिधिवेग²

  1. ऋग्वेद सोमरूप पृ. 14
  2. ऋग्वेद सोमरूप पृ. 14

जैनधर्म की प्राचीनता

अर्थात् मन, वचन, काय से बद्ध (संयत) ऋषभदेव ने घोषणा की - महादेव मर्त्यो में निवास करता है।

ऋग्वेद में जो वातरशना मुनियों और श्रमणों की साधना का चित्रण मिलता है, उसका संबंध जैन मुनियों से ही है

मुनयो वातरशनाः पिशंगाः वसते मला।
वातास्यानु ध्राजिं यंति देवासेषितं वक्षत।।
उन्मदिता मौनेयेन वाता आतिष्ठिथा वयुम्।
शरीरादेदमाकथं पूर्व मर्त्यसो अभि पश्यथ।।’

अर्थात् दिगम्बराचार्य मुनिगण मल धारण करते हैं, जिससे वे पिंगल वर्ण दिखाई पड़ते हैं। जब वे वायु की गति को प्राणोप्राणायाम द्वारा प्राप्त कर लेते हैं अर्थात् वे रोक लेते हैं, तब वे अपने तप की महिमा से दीप्तिमान होकर देवता स्वरूप प्राप्त हो जाते हैं। सर्वलौकिक व्यवहार को छोड़कर वे मौनव्रत की अनुभूति में कहते हैं “मुनिभाव से प्रदीप्त होकर हम वायु भाव में स्थित हो गए। भद्रो! तुम हमारा बाह्य शरीर मात्र देखते हो, हमारे अभ्यंतर शरीर को नहीं देख पाते।”

तैत्तरीयउप 7.1 में इन्हीं वातरशना मुनियों को ‘श्रमण’ और ‘ऊर्ध्वमंथी’ भी कहा है। भी उल्लेख है ऋषभदेव का भी उल्लेख है -

वातरशना हवा ऋषयः श्रमणा ऊर्ध्वमंथिनो बभूवुः।

श्रीमद्भागवत में भी श्रमणों की प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि जो वातरशना ऊर्ध्वमंथी श्रमण मुनि हैं, वे शांत, निर्मल, संपूर्ण परिग्रह से संयत ब्रह्मचर्य को प्राप्त करते हैं। वातरशना मुनियों का संबंध दिगम्बर श्रमणों से ही है, इसलिए भिक्षु की भूषण टीका में श्रमण शब्द की व्याख्या इस रूप में की है -

श्रमणो दिगम्बराः श्रमणा वातरसनाः।

भागवत 11/2 में उपर्युक्त व्याख्या का समर्थन इसीप्रकार करते हुए कहा गया है -

  1. ऋग्वेद 10, 136, 2-3

जैनधर्म की प्राचीनता

श्रमण वातरसना आल्हनादि विगरहाः।

श्रमण दिगम्बर मुनि का ही नामान्तर है। आचार्य जिनसेन ने आदि पुराण में वातरसना शब्द का अर्थ निर्ग्रन्थ, निरहार, दिगम्बर करते हुए कहा है -
इतिवात्रां वातरसनां निर्ग्रन्थो निरशनः।
इतिप्रकार ऋग्वेद में अनेक स्थलों पर केशी, अर्हत, यति और व्रात्यों का उल्लेख आया है। विद्वानों के अनुसार उनका संबंध भी जैनसंस्कृति से ही है। ऋग्वेद के गवेषणात्मक अध्ययन के आधार पर डॉ. सागरमल जैन ने ऋग्वेद में ‘अर्हत और ऋषभवाची ऋचाएँ’ नामक लेख में लिखा है -
“ऋग्वेद में ने केवल सामान्य रूप से श्रमण परंपरा और विशेष रूप से जैन परंपरा से संबंधित अर्हत, अर्हत्, व्रात्य, वातरसना मुनि, श्रमण आदि शब्दों का उल्लेख मिलता है; अपितु अर्हत् परंपरा के उपास्य वृषभ का भी उल्लेख प्रामाणिक बार मिलता है। मुझे ऋग्वेद में वृषभवाची 112 ऋचाएँ प्राप्त हुई हैं। संभवतः कुछ और ऋचाएँ भी मिल सकती हैं।”
नाभिपुत्र ऋषभ और ऋषभ पुत्र भरत की चर्चा प्रायः सभी हिन्दू पुराणों में आती है। मार्कण्डेय पु. अ. 90, कर्म पु. अ. 41, भा. पु. अ. 10, वायु पुराण अ. 33, गरुड़ पुराण अ. 1, ब्रह्माण्ड पु. अ. 14, वराह पु. अ. 74, लिंग पुराण अ. 47, विष्णु पु. अ. 1 और स्कन्ध पुराण कुमार खण्ड अ. 37 में ऋषभदेव का वर्णन आता है। इन सभी में ऋषभ को नाभि और मरुदेवी का पुत्र कहा है। ऋषभ से सौ पुत्र उत्पन्न हुए, उनमें से बड़े पुत्र भरत को राज्य देकर ऋषभ ने प्रव्रज्या ग्रहण की। इन्हीं भरत से इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। यथा -
नाभि स्वयम्भवं पुत्रं मरुदेव्यां महाद्युतिः।
ऋषभं पार्थिवं श्रेष्ठं सर्वक्षत्रस्य पूर्वजम्।।
ऋषभस्तु भरतो ज्येष्ठः पुत्रः पुत्रशतोजभूत्।
सोऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं महाप्राव्राज्यमास्थितः।।
हिमाहं दक्षिणं वर्षं तस्य नाम्ना विदुर्बुधाः।
उक्त श्लोक थोड़े से शब्दभेद के साथ प्रायः उक्त सभी पुराणों में पाये जाते हैं। श्रीमद्भागवत में तो ऋषभनाथ का पूरा वर्णन है, और उन्हीं के उपदेश से जैनधर्म की उत्पत्ति बतलाई है। यथा -
बह्वीनि तस्मिन्ने विष्णुतत्त्वान् भगवन् परमर्षिभिः प्रसादितो नामः
प्रियव्रतक्रिया तदवरोधेन भगवद्धर्मो यमनेमिभिर्विशकायो
वातरसनानां श्रमणानाम पोणामधर्मोयत्नां शुश्रूषया।
उक्त कथन में वातरसना (नग्न) श्रमणों के धर्म से स्पष्ट ही जैनधर्म का अभिप्राय है; क्योंकि आगे ऋषभदेव के उपदेश से ही आर्हत धर्म (जैन धर्म) की उत्पत्ति बतलाई है।
भागवत पुराण में भी ऋषभदेव का उल्लेख बड़े ही सम्मान के साथ हुआ है - “ऋषभदेव ने पृथ्वी का पालन करने के लिए भरत को राजगद्दी पर बैठाया और स्वयं उपशमशील, निवृत्तिपरायण महामुनियों के भक्ति ज्ञान और वैराग्यमय परमहितकारी धर्म की शिक्षा देने के लिए बिल्कुल विरक्त हो गए। केवल शरीर मात्र का परिग्रह रखा।”
इसीप्रकार इसके पाँचवें स्कन्ध के, अध्याय 2-6 में ऋषभदेव का सुन्दर वर्णन है, जो जैन साहित्य के वर्णन से कुछ अंश में मिलता-जुलता हुआ है। उसमें लिखा है कि 'नाभि ने मरुदेवी से विवाह किया और उससे ऋषभदेव उत्पन्न हुए। ऋषभदेव ने इन्द्र के द्वारा दी गई जयन्ती नाम की भार्या से सौ पुत्र उत्पन्न किये, और बड़े पुत्र भरत का राज्याभिषेक करके संन्यास ले लिया। उस समय केवल शरीर मात्र उनके पास था और वे दिगम्बर वेष में नग्न विचरण करते थे। मौन से रहते थे, कोई डाँटे, मारें, ऊपर थूकें, पत्थर फेंकें, मूत्रविष्ठा फेंके तो इन सबकी ओर ध्यान नहीं देते थे। वह शरीर ध्वस्त पदार्थों का घर है - ऐसा समझकर अहंकार ममकार का त्याग करके अकेले भ्रमण करते थे। उनका कामदेव के समान सुन्दर शरीर मलिन हो गया था।

  1. तत्त्वभूतान 20’ स्कं. पु. अ. 31
  2. श्रीमद्भागवत 95/5/28

जैनधर्म की प्राचीनता

श्रीमद्भागवत के उक्त कथनों से यह ध्वनित होता है कि ऋषभदेव ने ही जैनधर्म का उपदेश दिया था; क्योंकि जैन तीर्थंकर ही केवलज्ञान को प्राप्त कर लेने पर ‘जिन’, ‘अर्हत्’ आदि नामों से पुजते जाते हैं और उसी अवस्था में धर्मोपदेश करते हैं जो कि उनकी उस अवस्था के नाम पर जैनधर्म या आर्हत धर्म कहलाता है।
श्रीमद्भागवत के समान अन्य हिन्दू पुराणों में भी जैनधर्म की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रायः इसी प्रकार का वर्णन पाया जाता है। ऐसा एक भी ग्रन्थ अभी तक देखने में नहीं आया, जिसमें अर्हत्मान या पार्श्वनाथ से जैनधर्म की उत्पत्ति बतलाई गई हो। यद्यपि उपलब्ध पुराण साहित्य प्रायः महावीर के बाद का ही है, फिर भी उसमें जैनधर्म की चर्चा होते हुए भी महावीर या पार्श्वनाथ का नाम तक नहीं पाया जाता। इसमें भी इसी बात की पुष्टि होती है कि हिन्दू परम्परा भी इस विषय में एकमत है कि जैनधर्म के संस्थापक ये दोनों नहीं हैं।
उन संदर्भ में प्रसिद्ध जर्मन विद्वान स्वर्गीय डॉ. हर्मन याकोबी का मत उल्लेखनीय है। डॉ. याकोबी लिखते हैं -
“इसमें कोई भी संशय नहीं है कि पार्श्वनाथ जैनधर्म के संस्थापक थे। जैन परंपरा प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को जैनधर्म का संस्थापक मानने में एकमत है। इस मान्यता में ऐतिहासिक सत्य की संभावना है।”
उत्तराध्ययन सूत्र के प्राक्कथन में डॉ. चॉर्पेन्टर लिखते हैं -
“हमें स्मरण रखना चाहिए कि जैनधर्म भगवान महावीर से प्राचीन है और महावीर के आदरणोय पूर्व पार्श्वनाथ निश्चित रूप से एक वास्तविक व्यक्ति के रूप में वर्तमान थे। अतः जैनधर्म के मूल सिद्धान्त भगवान महावीर से बहुत पहले निर्धारित हो चुके थे।”

  1. There is nothing to note that Parshva was the founder of Jainism. Jain Tradition is unanimous making Rishabha the first Tirthankara (as its founder) there may be something historical in the tradition which makes him the first Tirthankara-Indian Antiquary Vol. IX P. 163.

जैनधर्म की प्राचीनता

मेजर जनरल जे.सी.आर. फालोंग महोदय अपनी The Short Study in Science of Comparative Religion नाम की पुस्तक में लिखते हैं -
“इतनी से आप्रतीत वर्ष पहले से जैनधर्म भारत में फैला हुआ था। आर्य लोग जब मध्यभारत आये तब यहाँ जैन लोग मौजूद थे।”
महाभारत शांतिपर्व में भी ऋषभदेव का उल्लेख है। ऐसा कहा जाता है कि अड़सठ तीर्थों की यात्रा करने से जो फल प्राप्त होता है, उतना फल भगवान आदिनाथ के स्मरण मात्र से ही मिल जाता है -
अष्टषष्टित्यु तीर्थेषु यात्रायां वरफलं भवेत।
श्री आदिनाथस्य स्मरणात्नापि तद्‌भवेत।।
इसीप्रकार हिन्दू पुराणों में मार्कण्डेय पुराण, कर्मपुराण, अग्निपुराण, वायुपुराण, गरुड़पुराण, ब्रह्माण्डपुराण, विष्णुपुराण, स्कन्धपुराण और श्रीमद्भागवत में जो ऋषभदेव का वर्णन उपलब्ध होता है, उससे इतना तो निश्चित हो सिद्ध हो जाता है कि ऋषभदेव निश्चित ही एक ऐतिहासिक पुरुष थे।
डॉ. बुडडकाऊ, डॉ.लिंट्टू ने अपने ग्रंथ ‘भारतीय धर्म एवं संस्कृति’ में लिखा है - “महाभारत में विष्णु के सहस्र नामों में श्रेयांस, अनन्त, धर्म, शान्ति और संभव नाम आते हैं और शिव के नामों में ऋषभ, अजित, अनन्त और धर्म मिलते हैं। विष्णु और शिव दोनों का एक नाम सुव्रत दिया गया है। वे सब नाम तीर्थंकरों के हैं। लगता है कि महाभारत के समन्वयपूर्ण वातावरण में तीर्थंकरों को विष्णु और शिव के रूप में सिद्ध कर धार्मिक एकता स्थापित करने का प्रयत्न किया गया। इससे तीर्थंकरों की परम्परा प्राचीन सिद्ध होती है।”
भारत के राष्ट्रपति प्रसिद्ध दार्शनिक विद्वानडॉ. राधाकृष्णन कुछ विशेष जोर देकर लिखते हैं कि -
"जैन परम्परा ऋषभदेव से अपने धर्म की उत्पत्ति होने का कथन करती है, जो बहुत-सी शताब्दियों पूर्व हुए हैं। इस बात के प्रमाण पाये जाते हैं कि

  1. तीर्थंकर वर्धमान, पृष्ट - 15

जैनधर्म की प्राचीनता

ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की पूजा होती थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जैनधर्म भी वर्धमान और पार्श्वनाथ से भी पहले प्रचलित था। यजुर्वेद में ऋषभदेव, अजिनाथ और अरिष्टनेमि इन तीनों तीर्थंकरों के नामों का निर्देश है। भागवत पुराण भी इस बात का समर्थन करता है कि ऋषभदेव जैनधर्म के संस्थापक थे।"
जैनधर्म साहित्य में प्रथम जैनधर्म संबंधी अनेक उद्धरण से जैनधर्म की समीचीनता व प्राचीनता सिद्ध करने के लिए जैन विद्वान् ‘आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी’ ने अपने ग्रंथ मोक्षमार्ग प्रकाश में बड़ा योगलासिक, दशिणमूर्ति-सद्‌गमान, शेषनागमान सह नाम, माहेन्द्रनाथ, हनुमन्नाटक, रुद्रयामलतंत्र, गणेशपुराण, व्यासकृत सूत्र, भागवत, वातरसना मुनि, श्रमण आदि प्रभासपुराण, नागपुराण, मनुस्मृति, ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि अनेक ग्रन्थों के उद्धरण देकर अंत में कहा है ‘इसप्रकार अन्यमत के ग्रन्थों की साक्षी से भी जिनमत की उत्तमता और प्राचीनता दृढ़ हुई।’
इसीप्रकार अन्यमतों के ग्रन्थोंद्धरणों की समीक्षा कर डॉ. भगचन्द्र भास्कर अपनी पुस्तक ‘जैनदर्शन व संस्कृति के इतिहास’ में लिखते हैं कि
"… इसप्रकार ऋषभदेव का प्राचीन इतिहास जैन, वैदिक और बौद्ध तीनों साहित्यों में मिलता है। — यहाँ यह उल्लेखनीय है कि जैनों के चौबीस तीर्थंकरों का अनुकरण कर वैदिक परम्परा ने चौबीस अवतारों की कल्पना की और बुद्ध परम्परा ने चौबीस बुद्ध बना लिए। अवतारों व बुद्धों की संख्या में यथासमय वृद्धि भी होती रही; पर जैनों के तीर्थंकर चौबीस से पच्चीस नहीं हुए और न चौबीस से तेईस। इससे जैनपरम्परा की वास्तविकता और मौलिकता का आभास होता है।

  1. "There is evidence to show what so far back as the first century B.C. There were people worshipping Rishabhadeva, the first Tirthankara. There is no doubt that Jainism prevailed even before Vardhamana or Parshvanath. The Yajurveda mentions the names of three Tirthankaras & Rishabha. Ajitanath and Aristanemi. The Bhagavata Puran endorses the view that Rishabha was the founder of Jainism-Indian Philosophy, Vol. I P. 287.
  2. मोक्षमार्ग प्रकाशक, पृष्ठ - 143

जैनधर्म की प्राचीनता

ऋषभदेव में ऋषभदेव के साथ ही अन्य तीर्थंकरों का भी उल्लेख हुआ है। उन उन तीर्थंकरों के नामों का उपयोग अपने बुद्धों, प्रत्येकबुद्धों और बोधिसत्त्वों के नामों की अवधारणा में किया है।"
आगे उन्होंने पुनः लिखा है कि 'प्राचीन जैनतर साहित्य में जैनधर्म संबंधी उद्धरण काफी मिला करते थे पर धीर-धीर सम्प्रदायअभिनिवेश से उनका लोप कर दिया गया। पंडित टोडरमलजी ने ‘मनुस्मृति’ और ‘यजुर्वेद’ से निम्नलिखित उद्धरणों को उद्धृत किया है -
चतुर्णां चैव सर्वेषां प्रथमो विमलः स्मृतः।
चतुर्णां वामदेयो वामिश्चन्द्रश्च प्रकीर्तितः।।
मरुदेवी च नाभिस्थ भरत कुल सम्भवः।
अष्टमो मरुदेव्यां तु नाभेर्जातो उत्क्रमः।।
दशमं वर्षं सौराणां सुसुमन्युकृतः।
नीतिनितिकथां यो वृषादी प्रथमो जिनः।। (मनुस्मृति)
ॐ नमो अर्हते ऋषभनाथाय। ॐ ऋषभपवित्रमुहूर्तस्य जपेतुं नमो
पवित्रं माहसत्त्वं वरं शृणु जयं पवित्र-मादितीर्थं स्वाहा। ॐ
आद्यतीर्थं ऋषभं वन्दे। अनुत्तरमृषिं वन्दे सुव्रतं मुनिसुव्रतं ह्यं
शक्रप्रकृतिं तद्‌ऋषभमुनिमुनिसुव्रतं स्वाहा। ॐ नमो मुनिं सुव्रतं
शिरसस्तं ब्रह्मवर्चसं सनातनं धीरं धीरं पुरुषोत्तमं तद्‌ऋषभं नमो
नमः स्वाहा। ॐ स्फटिकेन इन्द्रो वृषभस्या स्वतः पूजित्वाः
स्फटिकेनस्यां अर्हत्नेमिं स्फटिकनां वृषभूरिति स्वाहा।
दीर्घायुस्त्वत्सुखायुं शुभमस्तु। ॐ खं खं खं ऋषभेशः स्वाहा।
वामस्य शमनार्थ्य - मुनिबुद्धिर्धत्ते सोऽजमादिः अरिष्टनेमिः स्वाहा।
(यजुर्वेद)।
इन उद्धरणों में उल्लिखित तीर्थंकरों के नाम और उनके प्रति अभिव्यक्त सम्मान स्पष्ट है। पर आश्चर्य की बात है कि आज ये उद्धरण मनुस्मृति और यजुर्वेद के संस्करणों में क्यों व कैसे लुप्त हो गए, यह विचारणीय है।

  1. जैनदर्शन व संस्कृति का इतिहास, पृष्ठ - 15

जैनधर्म की प्राचीनता

धीर-वीर वैदिक विद्वानों ने अपनी संकीर्णतावश उनको अलग कर दिया अथवा होड़-मरोड़कर उपस्थित किया। टोडारमलजी ने ‘भवानी सत्सगमा’, ‘प्रशानुगुण’, ‘प्रभासुगुण’, ‘नारासुगुण’ आदि ग्रन्थों से भी अनेक उद्धरण दिए हैं, पर वे प्रायः अब मिलते नहीं। शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में यह व्यामोह उचित नहीं कहा जा सकता।’
वेदों में प्राप्त उपर्युक्त उल्लेखों के आधार पर निःसंकोच कहा जा सकता है कि वैदिक संस्कृति के विकास के पूर्व से ही जैनदर्शन के प्रचारक तीर्थंकरों की परंपरा विद्यमान थी; अतः यह कहना हास्यास्पद ही होगा कि वैदिक संस्कृति के विरुद्ध प्रतिक्रियास्वरूप बौद्धों के समान ही जैनदर्शन की भी उत्पत्ति हुई।
बौद्ध साहित्य में भी ऋषभदेव का उल्लेख मिलता है। धम्म पद में उन्हें ‘उवर वीर’ कहा है (उस पवर वीर-422)। मंजुश्री मूल कल्प में उनको निर्ग्रन्थ तीर्थंकर और आम देव के रूप में उल्लिखित किया गया है। ‘न्याय बिंदु’ अध्याय तीन में ऋषभ (वृषभ) और वर्धमान को सर्वज्ञ अर्थात् केवलज्ञानी तीर्थंकर लिखा है। ‘धम्मोत्तर प्रदीप’ पृष्ठ 286 में भी उनका स्मरण किया गया है।
इसप्रकार ऋषभदेव का उल्लेख प्राचीन इतिहास जैन, वैदिक, बौद्ध तीनों साहित्यों में मिलता है।
स्व. डॉ. हजारी जैनबी ने अपनी जैन सूत्रों की प्रस्तावना में इस पर विस्तृत विचार किया है। वे लिखते हैं - "इस बात से अब हम सहमत हैं कि नाथपुत्र, जो महावीर अथवा वर्धमान के नाम से प्रसिद्ध है, बुद्ध के समकालीन थे। बौद्ध-ग्रन्थों में मिलने वाले उल्लेख हमारे इस विचार को दृढ़ करते हैं कि नाथपुत्र से पहले भी निर्ग्रन्थों का जो आज जैन अथवा अर्हत के नाम से अधिक प्रसिद्ध है, अस्तित्व था। जब बौद्ध धर्म उत्पन्न हुआ तो निर्ग्रन्थों का सम्प्रदाय एक बड़े सम्प्रदाय के रूप में गिना जाता

  1. जैनदर्शन व संस्कृति का इतिहास : डॉ. भागचन्द्र भास्कर, पृ. 23 व 24

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मूल वैराग्यमय सहस्रनाम’ में कालनिर्मितमहावीरः शूरः शरजितेश्वरः’ कहा गया है; पर आधुनिक संस्करणों में ‘जिनेश्वर’ के स्थान पर ‘जनेश्वर’ रख दिया गया है - ‘कालनिर्मि महावीरः शौरिगुणः जनेश्वरः।’
टोडारमलजी ने भर्तृहरि के ‘वैराग्य शतक’ से निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया है -
एको रागिषु प्रियतमा देहाद्र्धहारी हरौ,
नीरागेषु जिनो विमुक्तललना यस्यो न यस्मात्तः।
दुर्वारास्मरणप्रगाढविषयव्यावर्तनायौ जनः,
श्रेयः कामविहितोचितो हि विषयोन्मुखो च मोक्षं भ्रमः।।
इस श्लोक में रागियों में महादेव और वीतरागियों में जिनेन्द्र की बात कहनेवाले इस श्लोक को आज संस्करण में या तो रखा ही नहीं या कुछ संस्करणों में रखा भी गया तो वह कुछ परिवर्तन के साथ रखा गया।
एको रागिषु रागिते प्रियतमा देहार्धधारी हरौ,
नीरागेष्वपि यो विमुक्तललनायस्यो न यस्मात्तः।।
दुर्वारास्मरणप्रगाढविषयव्यावर्तनायौ जनः,
श्रेयः काम विहितोचितोहि विषयोन्मुखो च मोक्षं भ्रमः।।
इसप्रकार ‘अमरकोष’ में बुद्ध के बाद जिनके भी नाम दिए गए हैं, वर्धमान संस्करणों में वह भाग लुप्त हो गया। पण्डित मिलापचन्द कटारियाजी ने उस लुप्त भाग को इसप्रकार खोज निकाला -
“सर्वज्ञो वीतरागोऽर्हन् केवलौ तीर्थकृज्जिनः।
स्याद्वादीवादो निग्रन्थः निर्ग्रन्थाग्रणि इत्यपि।।”
इसप्रकार के अनेक जैनेतर उद्धरण प्राचीन जैन साहित्य में मिलते हैं; जिससे जैनधर्म की प्राचीनता और लोकप्रियता का पता चलता है; पर

  1. महाभागवत अनुक्रमण पर्व, 148, 82
  2. महाभागवत (गोरखपुर), 1958 पृष्ठ - 6043
  3. श्रृंगार शतक, निर्णयसागर प्रेस, मुंबई, 1818, चतुर्थ संस्करण (सं. कृष्ण शास्त्री)
  4. अर्हत्य साहित्य में जैन उल्लेख और सांप्रदायिकता की संकीर्णता से उनका लोप व महावीर जयन्ती स्मारिका, 1970 पृ. 57-65
    10

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हो। बौद्ध भिक्षुओं ने अपनी कुछ निर्ग्रन्थों का बुद्ध और उसके शिष्यों के देर तक गया है, पर आधुनिक संस्करणों में ‘जिनेश्वर’ के स्थान पर ‘जनेश्वर’ रखा दिया है और कुछ के अनुयायी बन जाने के रूप में वर्णन आता है। इससे ऊपर से हम उक्त बात का अनुमान कर सकते हैं। इसके विपरीत इन ग्रन्थों में किसी भी स्थान पर ऐसा कोई उल्लेख या सूचक वाक्य देखने में नहीं आता कि निर्ग्रन्थों का सम्प्रदाय एक नवीन सम्प्रदाय है और नाथपुत्र उसके संस्थापक हैं। इसके ऊपर से हम अनुमान कर सकते हैं कि बुद्ध के जन्म से पहले अप्राचीन काल में निर्ग्रन्थों का अस्तित्व चला आता है।’
डॉ. जैकोबी ने बौद्ध साहित्य के उल्लेखों के आधार पर निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय का अस्तित्व प्रमाणित करते हुए लिखा है कि - "बौद्ध निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय को एक प्रमुख सम्प्रदाय मानते थे, किन्तु निर्ग्रन्थ अपने प्रतिद्वन्द्वी अर्थात् बौद्धों की उपेक्षा करते थे। इससे हम निर्णय पर पहुँचते हैं कि बुद्ध के समय निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय कोई नवीन स्थापित सम्प्रदाय नहीं था। यही मत पिटकों का भी ज्ञान पड़ता है।’
डॉ. विंसेंट ए. स्मिथ का कहना है कि ‘मथुरा से प्राप्त सामग्री लिखित जैन परम्परा के समर्थन में विस्तृत प्रकाश डालती है और जैनधर्म की प्राचीनता के विषय में अकाट्य प्रमाण उपस्थित करती है तथा यह बतलाती है कि प्राचीन समय में भी वह अपने रूप में मौजूद था। इन्हीं जैन धर्म के आरम्भ में भी अपने विशेष चिह्नों के साथ चौबीस तीर्थंकरों की मान्यताओं में दृढ़ विश्वास था।’
इन शिलालेखों से भी प्राचीन और महत्त्वपूर्ण शिलालेख खण्डगिरि उदयगिरि (उड़ीसा) की हाथी गुफा से प्राप्त हुआ है, जो जैन सम्राट खारवेल ने लिखाया था। इस 2100 वर्ष प्राचीन जैन शिलालेख से स्पष्ट

  1. Indian Antiquary, Vol. 9th, Page, 160
  2. The discoveries have to a very large extent supplied corroboration to the written Jain tradition and they offer tangible incontrovertible proof of the antiquity of the Jain religion and of its early existence very much in its present form, the series twentyfour profittis (Tirthankaras), each with his distinctive emblem, was evidently firmly believed in at the beginning of the Christian era-The Jain Stupa…Mathura Intro, P.6
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पता चलता है कि मगधाधिपति पुष्यमित्र का पुरोहिताचार्य राजा नन्द कलिंग जीतकर भगवान् श्री ऋषभदेव की मूर्ति, जो कलिंग राजाओं की कुलक्रमागत बहुमूल्य सम्पत्ति थी, जयघोष स्वरूप ले गया था। वह प्रतिमा खारवेल ने नन्द राजा के तीन सौ वर्ष बाद पुष्यमित्र से प्राप्त की। जब खारवेल ने मगध पर चढ़ाई की और उसे जीत लिया तो मगधाधिपति पुष्यमित्र ने खारवेल को वह प्रतिमा लौटाकर राजी कर लिया। यदि जैनधर्म का आरम्भ भगवान् पार्श्वनाथ से द्वारा हुआ होता तो उसने कुछ ही समय बाद की या उनके समय की प्रतिमा उन्हीं की होती। परन्तु जब ऐसे प्राचीन शिलालेख में आदि तीर्थंकर की प्रतिमा का स्पष्ट और प्रामाणिक उल्लेख इतिहास के साथ मिलता है तो मानना पड़ता है कि ऋषभदेव के प्रथम जैन तीर्थंकर होने की मान्यता में तथ्य अवश्य है।
इसप्रकार हड़प्पा की खुदाई से एक नया मानगढ़ मिला है। नम मुद्रा के कायोत्सर्ग मुद्रा है। केन्द्रीय पुरातत्व विभाग के तत्कालीन महानिदेशक टी.एन. रामचन्द्रन ने उस पर गहन अध्ययन किया है। उन्होंने अपने हड़प्पा एंड जॉनसन नामक शोधपूर्ण पुस्तक में उस मूर्ति को ऋषभदेव की प्रामाणित करते हुए लिखा है - हड़प्पा की कायोत्सर्ग मुद्रा में उत्कीर्ण मूर्ति पूर्ण रूप से जैनमूर्ति है, उनके मुख पर जैनधर्म का साम्यभाव दूर से झलकता है।’
हड़प्पा की संस्कृति को विद्वानों ने ईसा पूर्व 3000 से 3000 का माना है। इससे स्पष्ट होता है कि आज से चार-पाँच हजार वर्ष पूर्व भी तीर्थंकरों का अस्तित्व था और उनकी पूजा अर्चना होती थी। इन सब आधारों से अनेक विद्वानों ने यह स्वीकार किया है कि सिंधु घाटी की सभ्यता जैन संस्कृति से संबद्ध थी।
श्री पी. आर. देशमुख ने अपनी पुस्तक इंडस सिविलाइजेशन ग्रेवेड एंड हिन्दू कल्चर में लिखा है -

  1. The Harappan Statuette being exactly in the above specified Prose. We may notbe wrong in identifying, that The God represented as a Tirthankara or a Jaina ascetic of accredited fame and penance. P-1

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जैनों के पहले तीर्थंकर सिन्धु सभ्यता से ही थे। सिंधु जनों के देव नम होते थे। जैन लोगों ने उस सभ्यता/संस्कृति को बनाए रखा और नम तीर्थंकरों की पूजा की।
इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं की यह मान्यता है कि वैदिक आर्यों के आगमन से पूर्व भारत में जो सभ्यता थी, वह अत्यन्त समृद्ध और सम्पन्न थी। विद्वानों ने उसे प्रथम संस्कृति से संबद्ध किया है। सन् 1922 से 1927 के बीच भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा सिंधु घाटी के हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से कई नए तथ्य प्रकाश में आए हैं, जिनसे जैन धर्म की प्राचीनता के साथ-साथ उसकी प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। इन दोनों स्थानों में जिस संस्कृति की खोज हुई, वह सिंधु घाटी की सभ्यता कही जाती है। विद्वानों के अनुसार वह लगभग 5000 वर्ष पुरानी संस्कृति है।
मोहनजोदड़ो से कुछ नम कायोत्सर्ग मुद्राएँ मिली हैं, उनका संबंध जैनसंस्कृति से है। प्रगामी पुरातत्वज्ञ ने यस्मात्तः।।
रामप्रसाद चन्द्र में अपने शोधपूर्ण लेख में लिखा है -
"सिंधु मुहरों में से कुछ मुहरों पर उत्कीर्ण देवमूर्तियाँ न केवल योग मुद्रा में अवस्थित हैं, वरन् उन प्राचीन युग में सिंधु घाटी में प्रचलित योग प्रकारों का द्योत है। उन मुहरों में खड़े हुए देवता योग की खड़ी मुद्रा भी प्रकट करते हैं और यह भी कि कायोत्सर्ग मुद्रा आश्चर्यजनक रूप से जैनों से संबंधित है। यह मुद्रा बैठकर ध्यान करने की न होकर खड़े होकर ध्यान करने की है। आदिपुराण से प्राप्त अनुभव में ऋषभ अथवा वृषभ की तपस्या के सिलसिले में कायोत्सर्ग मुद्रा का वर्णन किया गया है। मथुरा के कुषाण पुरातत्व संग्रहालय में एक शिला फलक पर जैन ऋषभ की कायोत्सर्ग मुद्रा में खड़ी हुई चार प्रतिमाएँ मिलती हैं, जो ईसा की द्वितीय शताब्दी की निश्चित की गई हैं। मथुरा की यह मूर्ति संख्या 12 में प्रतिबिंबित है। प्राचीन राजवंशों के काल की भित्ति स्थापत्य में कुछ ऐसी प्रतिमाएँ मिलती हैं, जिनकी भुजाएँ दोनों ओर लटकी हुई हैं। यद्यपि ये मूर्ति प्रायः उसी मुद्रा में मिलती
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है, किन्तु वैराग्य की वह झलक नहीं है जो सिन्धुघाटी की इन खड़ी मूर्तियों में जैनों की कायोत्सर्ग प्रतिमाओं में मिलती है। ऋषभ का अर्थ होता है वृषभ (बैल) और वृषभ जिन वृषभ का चिह्न है।’
इसी बात की पुष्टि करते हुए प्रसिद्ध विद्वान् राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं -
"मोहनजोदड़ो की खुदाई में योग के प्रमाण मिले हैं और जैन मार्ग के आदि तीर्थंकर ऋषभदेव थे। जिनके साथ योग और वैराग्य की परंपरा उसी प्रकार लिपटी हुई है जैसे कालान्तर में शिव के साथ सन्निहित हो गई। इस दृष्टि से जैन विद्वानों का यह मानना अयुक्तिसूचक नहीं दिखता कि ऋषभदेव वेदोल्लिखित होने पर भी वेद पूर्व हैं।’
जैनधर्म प्रगतिशिक्षक और प्रगतिदायक धर्म है। इस बात की पुष्टि करते हुए डॉ. विशुद्धानन्द पाठक और पं. जयशंकर मिश्र लिखते हैं -
"विद्वानों का अभिमत है कि यह धर्म प्रगतिशिक्षक और प्रगतिदायक है। सिंधु घाटी की सभ्यता से मिली योग मूर्ति तथा ऋग्वेद के कतिपय मंत्रों में ऋषभ तथा अरिष्ट नेमि जैसे तीर्थंकरों के नाम इस विचार के पुष्ट आधार हैं। भागवत और विष्णु पुराण में मिलने वाली जैन तीर्थंकर ऋषभदेव की कथा भी जैनधर्म की प्राचीनता व्यक्त करती है।’
श्री नीलकंठ शास्त्री ने ‘उड़ीसा में जैनधर्म’ नामक पुस्तक में जैनधर्म को संसार का मूलधर्म बताते हुए द्रविड़ों को जैनों से संबद्ध किया है। वे लिखते हैं -
"जैनधर्म संसार का मूल अध्यात्म धर्म है। इस देश में वैदिक धर्म के आने से बहुत पहले से ही यहाँ जैनधर्म प्रचलित था।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि अप्राचीन काल में जैनों के तीर्थंकर ऋषभदेव से लेकर चौबीसवें तीर्थंकर महावीर की परम्परा प्रचलित थी।

  1. मार्डेन रिव्यू अगस्त 1932 पृ. 156-60
  2. संस्कृति के चार अध्याय, पृ. 62
  3. भारतीय इतिहास और संस्कृति पृ. 199-200

द्वितीय अध्याय

परमात्मा का स्वरूप

धर्मप्रचार करनेवाले सर्वज्ञ को परम्परा से जैनपरम्परा में सामान्यतया अरहंत, जिन, परमात्मा, परमेश्टी, केवली, भगवान व तीर्थंकर - इन शब्दों का प्रयोग होता रहा है। इनमें से तीर्थंकरों को छोड़कर शेष सब पर्यायवाची ही हैं।

परमात्मादशा को प्राप्त करना ही सम्पूर्ण जैनधर्म का उद्देश्य है। जैनधर्म तो आत्मा को परमात्मा के रूप में विकसित करने की एक कला है, परमात्मादशा की प्राप्ति ही जैनसाधना का एकमात्र साध्य है।

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3028.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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