लघु बोध कथाएं - ब्र. रवीन्द्र जी 'आत्मन्' | Laghu Bodh Kathayen

कषाय की विचित्रता

नगर के बाहर एक छोटा-सा आश्रम था। वहां एक त्यागी जी रहते थे। वहां से निकलने वाले यात्री भी कभी घण्टे-दो-घण्टे तो कभी रात्रि में भी विश्राम कर लेते थे।
एक दिन सर्दी की सांय बरसात भी होने लगी। समीप के नगर की स्त्री पास के गाँव में अपने मायके जा रही थी। स्त्री ने आकर त्यागीजी से रात्रि में रुकने की अनुमति माँगी। त्यागीजी ने सहज भाव से कह दिया - पास के कमरे में ठहर जाओ।
रात्रि के समय उस स्त्री को नींद न आई। उसे कामवासना सताने लगी। वह उठ कर त्यागीजी के समीप आकर, हाव -भाव प्रदर्शित करते हुए , कामना पूरी करने के लिए गिड़गिड़ाने लगी, परन्तु अपने शील में दृढ़ त्यागीजी ने उसे समझा - बुझा कर अपने समीप से हटा दिया।
वह स्त्री लज्जित भी हुई और भयभीत भी। उसने विचारा यदि त्यागीजी ने किसी से कह दिया तो नगर में मेरी बदनामी होगी; अतः इन्हें मार देना चाहिए।
प्रातः वह उनसे क्षमा माँगते हुए बोली- महाराज! मैं घर पहुँच कर आपके लिए मिष्ठान्न भेजूँगी, आप अवश्य ग्रहण कर लेना।
घर जाकर मिष्ठान्न में विष मिलाकर नौकर के हाथ उसने भेज दिया। त्यागीजी ने भी सरल भाव से रख दिया। उसी समय उस स्त्री का परदेश से लौट कर आया हुआ पति बोला -“बाबाजी !भूख लगी है, कुछ खाने को तो कृपा करें।” तब उन्होंने उसे वही मिष्ठान्न दे दिया, जिसे खाकर वह अपने घर चला गया।
वहाँ जहर चढ़ जाने से मर गया। पता लगने पर वह स्त्री पछताती हुई, अत्यन्त दुःखी होती हुई, उन्हीं त्यागी के समीप पहुँची और क्षमायाचना की।

उन्होंने उसे वैराग्यपूर्ण धर्म का उपदेश दिया, जिससे वह स्त्री विरक्त हो गयी।

  1. शील में दृढ़ रहें।
  2. कपट कदापि न करें।
  3. दोष होने पर प्रायश्चित्त लेकर, निर्दोषता पूर्वक आगे बढ़ें।

"दुर्व्यसनों के त्याग बिना आर्थिक समृद्धि भी क्लेश और पतन का कारण बन जाती है।"

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युक्ति एवं धैर्य

एक था चंदन नाम का सीधा-सादा गरीब किसान कठिनाई से कुछ धन जोड़ कर मेले में से एक गाय और एक बाल्टी लेकर लौट रहा था। रास्ते में अँधेरा हो गया, वहीं राहगीरों को लूट लेने वाला डाकू मिल गया। उसने तेज आवाज देकर रोका और गाय एवं शेष रूपये छीन लिए। साथ के अन्य लोगों को भी उसने लूट लिया और जंगल की ओर जाने लगा।
दुःखी किसान ने कुछ सोचा और भगवान का नाम ले उसने पीछे से जाकर बाल्टी उसके सिर में फँसा दी और शीघ्रता से उसके हाथ रस्सी से बाँध दिए। तब तक अन्य लोग भी आ गये।
इसप्रकार राहगीरों एवं ग्रामीणों को लूटमार से राहत मिली।

विपत्ति में रोना उपाय नहीं है। धैर्य ,साहस एवं युक्तिपूर्वक परिस्थिति का सामना करना चाहिए।

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प्रेरणा

महिपाल नाम के स्वाध्यायी सेठ एक दिन तालाब के किनारे खड़े थे, तभी उन्होंने देखा कि एक मेंढक को सर्प ने आकर पकड़ लिया, फिर भी मृत्यु से बेखबर मेंढक, कीड़े खाने में मग्न रहा। जब तक उसका मुख बाहर रहा वह कीड़े खाता रहा। अन्त में सर्प द्वारा निगल लिया गया।
सेठ विचारने लगे कि मेंढक की भाँति सभी मोही जीवों की यही दशा है। जो अन्य जीवों को मरते हुए प्रत्यक्ष देख रहा है और स्वयं भी निरन्तर मृत्यु के समीप आता जा रहा है। तो भी विषय-कषायों में मग्न हुआ परिग्रह में ही उलझा रहता है। एक क्षण भी परलोक के सम्बन्ध में विचार नहीं करता और आत्महित में सावधान नहीं होता। इसीप्रकार दुर्लभ मनुष्य पर्याय का काल पूरा करके दुर्गति में चला जाता है।
सावधान !शीघ्र आत्महित कर लेना चाहिए, ऐसा विचार करते हुए, वे व्यापार, परिवार एवं लोक-व्यवहार से निवृत्ति लेकर चले गये एक पवित्र तीर्थस्थान, अपना हित करने के लिए।
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संतोषवृत्ति

दीपक नाम का एक युवक, जिसके पिता पहले ही परलोक सिधार गए, माता बीमार पड़ गयी, भाई-बहिन छोटे थे। आर्थिक तंगी से परेशान होकर वह जिलाधीश महोदय नैतिक विचारों के करुणाशील व्यक्ति थे। उसके वृत्तान्त को सुनकर, तुरन्त कोष से तीस हजार की सहायता हेतु कह दिया।
युवक गाँव का था। वहाँ सस्ती व्यवस्था थी। युवक ने तुरन्त कहा -“श्रीमान दस हजार से मेरा काम हो जायेगा। यह राशि भी मैं अपनी कमाई में से भविष्य में इसी फण्ड में जमा करा दूँगा।”
जिलाधीश महोदय उसकी संतोषवृत्ति से अत्यन्त प्रभावित हुए। उन्होंने उसे दश हजार रुपये तो दिए ही, उसे योग्यतानुसार अपने ही कार्यालय में लिपिक की नौकरी भी दे दी।
युवक कृतज्ञभाव से देखता रह गया। उसने माता का इलाज कराया। वे शीघ्र स्वस्थ भी हो गयी। भाई-बहनों को पढ़ाया और सत्य, ईमानदारी एवं परोपकार के संस्कार देते हुए व्यवस्थित किया। गाँव में भी कार्यालय के सहयोग से अनेक अच्छे कार्य वह निरन्तर करता ही रहा। मरणोपरांत भी गाँव के लोग उसका आदर से स्मरण करते हैं।
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सत्यनिष्ठा

एक गरिमा नाम की बालिका, लौकिक शिक्षा के साथ ही धार्मिक पाठशाला में, नैतिक संस्कार भी ग्रहण कर रही थी। अब वह कक्षा ८ में आ गयी थी, उसकी समझ में आने लगा था कि मात्र पूजा-पाठ ही धर्म नहीं है। धर्म तो सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप है। मोह और क्षोभ से रहित साम्यभाव (समता -परिणाम) ही दुःखों को दूर कर, परम सुख को देने वाला परमार्थ धर्म है।
अहिंसा ही परम धर्म है। जिसका आधार सत्य है। अचौर्य ,ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह तो अहिंसा की प्राप्ति के लिए ही हैं।
वैसे भी किसी कार्य में सफलता हेतु सम्यक् अभिप्राय, सूक्ष्म उपयोग और व्यवस्थित चर्या, परमावश्यक है।
एक दिन सत्य की महिमा को सुनते हुए, उसने अपने जीवन में अहिंसामय सत्य बोलने का नियम ही ले लिया। अनेक प्रसंगों में उसने अपने नियम का भलीप्रकार निर्वाह किया।
एक बार उसके घर में डाकू आ गये। लूटने के बाद सरदार बोला- "किसी के पास यदि कुछ धन हो तो शीघ्र दे दें। तब उसने आगे बढ़कर कहा - “मेरी गुल्लक में रूपये हैं। इन्हें भी लेते जायें।” डाकू सरदार उसकी सत्यनिष्ठा से अत्यन्त प्रभावित हुआ। कुछ देर सोचता रहा फिर बोला - “बेटी !अब हमें इस घर से कुछ भी नहीं ले जाना है, अपना समस्त धन सँभालो। आज से हम डकैती का भी त्याग करते हैं। तुम हमें कुछ अच्छी पुस्तकें अवश्य दे दो, जिससे हमारा जीवन नैतिक और शान्तिमय बन जावे।”
उसने लड़की एवं उसकी माँ के पैर छुए। लड़की ने उन्हें मिष्ठान्न खिलाया और राखी बाँधते हुए कहा -“समस्त नारियों को माता, बहिन और पुत्री समान समझना और उनके शील की रक्षा में सहयोगी बने रहना।”
डाकुओं ने उस घड़ी को धन्य मानते हुए, हर्षपूर्ण अश्रुओं से विदा ली।
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ईमानदारी

एक था चैकपोस्ट का अधिकारी धीरज। अत्यन्त ईमानदार, संतोषी और कर्त्तव्यनिष्ठ। भ्रष्टाचार के युग में व्यक्ति का निर्वाह कठिनता से होता है। अनेक छोटे-बड़े लोग, समय के अनुसार समझौते की नीति से चलने के लिये दबाव बनाते , परन्तु वह अपने सिद्धान्त पर अड़िग रहा। शीघ्र-शीघ्र स्थानांतरण की परेशानियाँ तो उसकी आदत में ही आ गयी थीं।
एक बार तस्करी का माल उसने पकड़ लिया। मालिक बड़ा व्यापारी एवं राजनेताओं से सम्बन्धित था। उसने पहले तो भारी प्रलोभन दिया, ५० लाख तक देने के लिए कह दिया ,परन्तु वह विचलित न हुआ। ऊपर से नेताओं एवं मंत्रियों के फोनों पर भी उसने ध्यान नहीं दिया। नियमानुसार चालान कर दिया और माल जब्त कर लिया।
कोर्ट में पेशी होने पर, रिश्वत के बल से केस शीघ्र ही ख़ारिज हो गया। मंत्रियों की नाराजी के कारण उसे नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा, परन्तु वह निराश न हुआ।
एक बड़े उद्योगपति को जब यह मालूम पड़ा, तब उसने शीघ्र ही उसे बुलाया और अपनी कम्पनी के सर्वोच्च पद पर सम्मान-सहित नियुक्त किया। जहाँ उसे सारी सुविधायें भी थी और वेतन भी पहले से अधिक।
अब वह पहले से सतर्क रहता। मालिक का अहित न होने देता और अधीनस्थ लोगों के हित का सदैव ध्यान रखता। माह में एक बार वह सभी की मीटिंग करता। जिसमें सभी कर्त्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी, संतोष एवं परोपकार आदि की शिक्षा देता।
कम्पनी दिन-प्रतिदिन उन्नति कर रही थी। उसने मालिक को धन की असारता का पाठ पढ़ाते हुए शिक्षा, चिकित्सा व असहायों के सहयोग आदि कार्यों हेतु एक ट्रस्ट बनाने की सलाह दी। मालिक ने सहर्ष स्वीकार करते हुए, उसे ही ट्रस्ट का सचिव बनाया और कम्पनी की आय का एक निश्चित अंश लोकोपकारी कार्यों में खर्च होने लगा।

ठीक ही कहा है -"धन तो पुण्य के उदय से बहुत से लोगों को मिल जाता है, परन्तु जो उसका सदुपयोग कर लें वे प्रसन्न भी रहते हैं और प्रशंसनीय भी होते हैं। "

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चोरी भी हिंसा है

एक विधवा महिला का इकलौता पुत्र बीमार हो गया। जहां वह नौकरी करती थी, उसी सेठ से उसने कर्जा माँगा। दयालु सेठ ने उसे कर्जा दे दिया। वह रुपये लेकर घर आयी, परन्तु रात्रि को चोर घर में घुस कर, वह रुपया एवं अन्य सामान ले गये। धन के अभाव में इलाज न हो सका और उसका पुत्र मर गया। पुत्र के मोह में शोक करती हुई वह स्त्री भी मर गयी।

सत्य ही कहा है -
१.चोरी करना हिंसा करने जैसा ही पाप है।
२. पाप के उदय में सहाय का निमित्त नहीं बनता।
३. मोह ही दुःख का कारण है।
४. मोह के नाश के लिए सत्समागम और ज्ञानाभ्यास करना चाहिए।

जब सेठ ने यह घटना सुनी, उसे वैराग्य हो गया और समस्त परिग्रह का त्याग कर दिगम्बर आचार्य की शरण में पहुँचा और मुनिदीक्षा ले आत्मकल्याण में लग गया।
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सादा भोजन

एक थे ब्रह्मचारी ज्ञानेन्द्रजी। आत्मार्थ की भावना से भरा हुआ था जिनका हृदय। ज्ञान -ध्यान के अभ्यास में प्रयत्न -पूर्वक लगे रहते थे। बाहरी प्रपंचो से कोसों दूर, एक ग्राम से २ कि.मी.दूर एकान्त में स्थित एक तीर्थ क्षेत्र पर सामान्य कमरे में रहते थे। श्रावक लोग खाद्य -सामग्री दे जाते और वे अपना भोजन स्वयं बनाकर खाते।
क्षेत्र की स्वच्छता,स्वाध्याय आदि का तो ध्यान रखते, परन्तु विकास की अन्य योजनाओं से अत्यन्त निस्पृह रहते। किसी बड़े कार्यक्रम के समय तो वे प्रायः अन्यत्र चले जाते थे।
एक दिन एक श्रावक मालपुआ आदि मिष्ठान्न लाया। उन्होंने अस्वीकार कर दिया। विशेष आग्रह करने पर, शिक्षा देने के अभिप्राय से एक मालपुआ वहीं दीवाल पर लगे दर्पण पर रगड़ दिया, जिससे उसमें धुँधला (अस्पष्ट ) दिखने लगा। फिर उन्होंने एक सूखी रोटी उस पर रगड़ दी, जिससे वह फिर चमकने लगा। तब वे बोले -"भाई! इसीप्रकार गरिष्ट मिष्टान्न आदि हमारे उपयोग को मलिन करते हैं और साधना में बाधक होते हैं। "
अतः हमें स्वाद पर दृष्टि न रखते हुए, संयम के अनुकूल सादा भोजन करना ही हितकर है। वह सहज और सस्ता होने से, उपलब्ध भी सहजता से हो जाता है। उसके बनने में आरम्भ भी कम होता है, समय भी कम लगता है और सादगी-पूर्ण जीवन के लिए कमाना भी कम पड़ता है, अतः गृहस्थ को भी सात्विक भोजन ही करना चाहिए, जिससे हमारे परिणाम भी शान्त रहें और हम निराकुलता से धर्मध्यान भी कर सकें।
उन भाई को सादा भोजन एवं सादे जीवन की शिक्षा सहज ही समझ में आ गयी।
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नारियल जैसा

एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा-“महापुरुष अनुकूलताओं तथा प्रतिकूलताओं में अप्रभावित कैसे रहते हैं?”
तब गुरु ने कच्चा और पका हुआ एक-एक नारियल मँगाया और उसे फोडऩे के लिए कहा। पके नारियल मे तो गिरी का गोला सीधा अलग निकल आया और कच्चे नारियल की गिरी,नरेटी से चिपकी हुई थी, वह टूट-टूट कर निकल रही थी।
तब गुरु बोले- महापुरुष पके नारियल की भाँति, शरीर से भिन्न, स्वयं को चैतन्य स्वरूप आत्मा अनुभवते हैं। उन्हें भेद वर्तता हैं; अतः वे बाहर के प्रसंगों से अप्रभावित बने रहते हैं, क्षुब्ध नहीं होते।
अज्ञानी सामान्यजन शरीर से चिपके रहते हैं अर्थात् अपने को और शरीर को एक मानते हैं; अतः उन्हें क्षोभ अर्थात् हर्ष-विषाद होते रहते हैं, तब राग- द्वेष भी होते ही हैं। तत्त्वज्ञान के अभ्यास बिना न मोह मिटता है और न कषायें।
अतः हम ज्ञानाभ्यास के नाम पर भी मात्र ऊपरी अध्ययन में ही न लगे रहें; अपितु दुर्लभ अध्यात्ममय जिनशासन को प्राप्त कर, भेदज्ञान और स्वानुभव का उद्यम करें, वैराग्य भावना भायें, संयम की साधना करें, यही श्रेयस्कर है।
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परिणामों का फल

एक नये श्रोता राजेश ने एक विद्वान विवेकजी से विनम्र होकर पूछा -"स्थूल रूप से मनुष्य को स्वर्ग और नरक कैसे मिलता है ?"विद्वान -"तुम अपनी जिह्वा और मन के अनुसार चलोगे अर्थात तामसिक भोजन या स्वच्छन्दतापूर्वक भोजन करोगे अर्थात चाहे जब (दिन-रात ), चाहे जहाँ ,चाहे जैसे (खड़े हुए या चलते-फिरते जूता आदि पहने ), चाहे जैसा (भक्ष्य या अभक्ष्य )खाओगे या पियोगे तथा कषायों के वशीभूत होकर हिंसा ,चोरी ,कुशील, परिग्रह आदि पापमय वचन बोलोगे अथवा मन में विपरीत या बुरे विचार भी करोगे तो यहीं तुम्हें नरक जैसे कष्ट होंगे और आगे नरक या तिर्यंच दुर्गति में जाओगे।
तथा यदि योग्य सात्त्विक भोजन ,अच्छे भावों पूर्वक करोगे , वाणी से हित-मित-प्रिय धर्ममय ,सत्य वचन बोलोगे , अपने ह्रदय में अच्छे और सच्चे विचार रखोगे, तो तुम्हारी चेष्टायें भी सहज ही उत्तम होंगी। जीवन शांतिमय एवं प्रशंसनीय होगा और आगे भी स्वर्ग या मनुष्यरूप सदगति में जाओगे।
नरक और तिर्यंचगति अशुभभावों का फल है। मनुष्य और देवगति शुभभावों का फल है।
मुक्ति तो रत्नत्रयमय वीतराग भावों का फल है ; अतः ऐसा उत्तम अवसर पाकर, हमें वीतरागता के लिए, रागादि भावों से न्यारे, निज शुद्धात्मा की उपासना करनी चाहिए। स्वर्गादिक तो कृषि में अनाज के साथ होने वाले भूसे के समान, स्वयमेव मिल जाते हैं। परन्तु इनकी वांछा करना कदापि उचित नहीं। "
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एकान्त और मौन

रघुराज पूजा-पाठ, स्वाध्याय दानादि तो करता था ,परन्तु दिनभर, व्यापारादि की व्यस्तता रहती। रात्रि में मनोरंजन के नाम पर घूमता, टी.वी. देखता, मित्रों के साथ इधर-उधर की बातें करता ; अतः उसके मन में अशान्ति बनी रहती।

एक दिन उसने एक अत्यन्त संतोषी, धैर्यवान, शान्तचित वाले साधर्मी विनयजी से उपाय पूछा। उन्होंने कहा -“व्यापारादि सीमित करो। टी.वी. देखना और विकथाएँ भी छोड़ो। इनसे मन थकता है और विकृत होता है। बाहर के अनेक प्रसंगों की जानकारी होने से स्वयं की कषायें निमित्त पाकर जाग्रत होती हैं।”
फिर उसने कहा -"थोड़ी देर एकान्त और मौन आवश्यक है। इससे परपदार्थों से उपयोग टूटता हैं और तत्त्वचिंतन और आत्म-निरीक्षण के लिए अवसर मिलता है। "
एकत्व ही आत्मा का स्वरुप है और सौन्दर्य भी; अतः आत्मीक ज्ञान और आनन्द की उपलब्धि के लिए, एकाकी जीवन और मौन एक पात्रता ही समझो।
स्वाध्याय के माध्यम से हम जो सीखते हैं, उसका ऊहापोह, निर्णय और चिन्तन होने पर ही वह सीखना सार्थक होता है। साधकों का जीवन प्रायः मौनरुप ही रहता है। वे बाहर से अपने उपयोग को समेटते हुए, अन्तर्मुख उपयोग में सहज अपने स्वरुप की प्राप्ति कर लेते हैं।
उस व्यक्ति ने जब यह प्रयोग किया, तब स्वयं शांति मिलने लगी। बाहर से विरक्तता आती गयी और एक दिन वह निवृत्त होकर, चला ही गया साधना के मार्ग पर।
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संतोष और विवेक

सुमेर, असहाय, वृद्ध एवं शरीर से रोगी था। उसका एक पैर बस दुर्घटना में कट गया, फिर भी वह अपने घर में कभी बाहर चबूतरे पर बैठा हुआ भजन गाता और मोहल्ले वाले लोगों के कुछ काम करता रहता। महिलायें अपने छोटे बच्चों को उसके समीप छोड़ जाती। वह उन्हें खिलाता रहता तथा उन्हें अच्छी बातें सुनाता रहता। अपने भाग्य पर संतोष रखता हुआ, भगवद् भक्ति में चित्त को लगाये रखता।
परिवार में कोई नहीं था, पूरा मोहल्ला ही उसका परिवार था। भोजन भी कभी बना लेता। प्रायः महिलाएं अपने घर से बचा हुआ भोजन सहज ही दे जाती।
एक बार सुमेर को बहुत तेज ज्वर आया। उसने विचार किया कि अब अन्तिम समय है। धर्मार्थ औषधालय के वैद्यजी एवं मंत्री जी को बुलाया और भी अनेक लोग आ गये। उसने अपना घर औषधालय के लिए दान में लिख दिया। निःशल्य होकर, सबसे क्षमाभाव करके, शान्त-भावोंपूर्वक देहादि से भिन्न,निजात्मा एवं परमात्मा का विचार करते हुए देह छोड़ दी ।

बाद में उसके घर का जीर्णोद्धार करने के लिए जब नींव खोदी, तब उसमें स्वर्ण,चांदी के आभूषण,सिक्के आदि बहुत धन एक घड़े में भरा हुआ मिला।
एक व्यक्ति ने कहा- " देखो! अपने घर में ही इतना धन होने पर भी व्यर्थ परेशान रहा।"

दूसरा स्वाध्याय भाई बोला-" बाह्य सम्पदा तो पुण्योदय बिना नहीं मिलती परन्तु वह अपने संतोष, परोपकार एवं भक्ति की भावना से ऐसी स्थिति में भी कितना प्रसन्न रहा और कैसे शान्त परिणामों से देह छोड़ी। सत्य ही कहा है कि सुख के लिए सम्पदा नहीं,विवेक और संतोष चाहिए।"
उसी समय एक तत्त्वाभ्यासी महिला ने कहा,-"अरे! ऐसे ही अपने घर में अर्थात् आत्मा में अनन्त गुणों का भण्डार भरा है। ज्ञान और आनंद का सागर लहरा रहा है, परन्तु उसे देखे बिना हम भी तो भोगों के भिखारी हो रहे हैं। हमें भी अपना ज्ञान और सुख अपने में ही देखना श्रेयस्कर है।"
विवेकी ट्रस्टियों ने उसके धन का एक अलग से फण्ड बना कर उसकी स्मृति में प्रतिवर्ष एक नैतिक एवं एक चिकित्सा शिविर लगाने की घोषणा कर ही दी।
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व्यर्थ हैं विकल्प

एक व्यक्ति को व्यर्थ वस्तु खोजने का विकल्प आ गया। उसने सोचा-“मिट्टी व्यर्थ है।”
मिट्टी बोली-“मेरे बिना तो जनजीवन की कल्पना ही नहीं हो सकती। रहने का स्थान-धरती है। खाद्य-सामग्री खेतों और बागों में पैदा होती है। धातुएं मिट्टी में से निकलती हैं आदि।”
उसने सोचा कि पत्थर बेकार है। पत्थर बोला-" भवनों, मन्दिरों का निर्माण पत्थरों से ही होता है। आप जिन मूर्तियों की पूजा करते हैं, वे पत्थर से ही निर्मित हैं।"
उसने विचारा कि कूड़ा, विष्टा आदि व्यर्थ है।
उत्तर मिला-" खाद आदि इन्हीं की बनती है।"
प्रकृति में एक से दूसरे पदार्थो का निमित्त- नैमित्तिक सम्बन्ध है, इसी से विश्व की स्थिति है। संसार के कार्य चल रहे हैं। व्यवहार से हर पदार्थ का उपयोग है।
उसने एक साधु से पूछा, तब गम्भीर होते हुए साधु ने कहा-"परपदार्थो में अच्छे-बुरे की कल्पना ही मिथ्या है। व्यर्थ तो हमारे मोह और कषायें हैं, जिनसे न स्वयं को सुख, न दूसरों को सुख। मिथ्या अहंकारादि दुर्भाव स्वयं के लिए दुःख के कारण हैं और इनके वशीभूत होकर होने वाली प्रवृत्तियां, दूसरों के लिए दुःख का निमित्त होती हैं।"

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देखा-देखी

ग्राम पंचायत के सरपंच का चुनाव जीतने के बाद जैन साहब का विजय जुलूस निकल रहा था। परोपकारी लोकप्रिय होने के कारण महिलायें भी मंगल कलश लिए गीत गा रहीं थी। उधर से जैसे ही जैन साहब का निकलना हुआ कि एक विधवा स्री निकली। उसने देखा तो अपशकुन के भय से वह गली में छिप गयी। जैन साहब ने देख लिया। वे उसके विवेक पर बहुत प्रसन्न हुए। सबको सौ-सौ रुपये और उस स्त्री कोएक हजार रुपये उन्होंने दिलवा दिये।
परस्पर की वार्ता से, यह बात सभी स्त्रियों को जब मालूम पड़ी तो उन्होंने अभिप्राय तो समझा नहीं। ऐसे ही दूसरे प्रसंग पर बहुत स्त्रियाँ सफेद धोती पहन कर खड़ी हो गयी।
जैन साहब ने पूछा -“ऐसा क्यों किया ?”
तब एक स्त्री बोली -"आपको प्रसन्न करके अधिक रुपये पाने के लोभ से। "
तब वे बोले -“मैंने विधवा के विवेक पर खुश होकर उसके सहयोग की भावना से ऐसा किया था। आप लोगों को लोभवश ऐसा करना कदापि उचित नहीं था।”
कार्य करने से पहले भलीप्रकार विचार कर लेना ही हितकर है।

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लोभी जौहरी

एक सड़क किनारे स्थित झोपड़ी में सीधा-सा मजदूर रघु, अपने परिवार सहित रहता था। एक दिन उसे जंगल में एक चमकदार पत्थर मिला, जिसे उसने चमक के कारण बच्चे के खेलने के लिए उठा लिया। वास्तव में वह पत्थर नहीं, कीमती हीरा था।
एक दिन दरवाजे पर बच्चा उस हीरे से खेल रहा था। उधर से एक लोभी जौहरी धनपाल निकला। उसने देखकर रघु को बुलाया और वह चमकदार पत्थर, पाँच सौ रुपये में माँगा। इससे वह समझ गया कि यह कोई कीमती रत्न है। उसने कहा पाँच हजार में दूँगा। जौहरी एक हजार, दो, तीन और चार हजार कह कर आगे बढ़ गया। उसने सोचा यहाँ कौन लेगा ? लौट कर आऊँगा,तब अपने आप दे देगा।
होनहार की बात, तभी ईमानदार जौहरी जिनपाल उधर से निकला। उस मजदूर ने उसे वह पत्थर दिखाया। तब उसने दस हजार देकर, उसे उसकी दुकान पर आने की कह कर, वह हीरा ले लिया।
जब उधर से लोभी जौहरी धनपाल वापस आकर पाँच हजार में ही माँगने लगा तब उसने समस्त हाल कहा।अब क्या हो सकता था ? लोभवश ठगने के भाव के कारण वह लाभ से वंचित रहा। जब मजदूर रघु जौहरी जिनपाल की दुकान पर गया तो उन्होंने परख कर, उस हीरे के पचास हजार रुपए ओर दिये।
"असंतुष्ट व्यक्ति प्राप्त अवसर एवं सामग्री का भी सदुपयोग नहीं कर पाता। उसकी वृत्ति पागल कुत्ते की भांति हो जाती है जिसे एक क्षण भी न चैन है और न स्थिरता।"

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खाली मन

एक नवयुवक संतोष ने सत्समागम का निमित्त पाकर, ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। दूसरे लोगों को देख-देखकर वह जप,पाठ, पूजा,स्वाध्याय आदि करने लगा, परन्तु उसके मन में यही भाव चलते रहते कि एक सुन्दर और सुविधा युक्त भवन बन जाये। कुछ फण्ड और अन्य आमदनी हो जाये। उसके लिए कुछ धार्मिक आयोजन कर लें।प्रचारक एवं कर्मचारी, गाड़ी आदि साधन हो जायें। विश्व में ख़ूब ख्याति हो जाए; अतः उसके चित्त में शान्ति नहीं थी।
एक दिन वह बाजार से निकल रहा था। मार्ग में पूर्व के परिचित मित्र की दुकान मिली। मित्र ने बुलाया और वह भी स्नेहवश दुकान में भीतर जाकर बैठ गया।उसकी किराने की दुकान में अनेक छोटे-बड़े डिब्बे लगे थे। वहां खाली डिब्बे भी थे। उन्हें देखकर कौतूहलवश उसने पूछा- " इनमें क्या है?"
मित्र ने बताया- “आतमराम है।”
उसने तो ग्रामीण दुकानदारी की भाषा में कहा, परन्तु वह ब्रह्मचारी युवक विचारने लगा कि मित्र ठीक ही तो कह रहा है कि जो खाली होते हैं, उनमें आतमराम होता है। मेरा मन भी जब इन बाह्य विकल्पों से खाली होगा, तभी परमात्मा का ध्यान हो सकेगा।
सचेत होकर वह लग गया बाह्य विकल्पों को छोड़कर,समता की साधना और आत्मा की आराधना में, निस्पृह भाव से। अब उसकी परिणति बदल चुकी थी। संतोष,समता एवं शान्ति उसकी पावन मुद्रा से ही दिखती थी।

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कष्टकारी छल

खेत में फसल पक रही थी। इस वर्ष मौसम के सहयोग से फसल भी अच्छी थी। किसान हरि, फसल की रक्षा के लिए वही सोता था।
एक रात्रि को चोरी करके चोर, उधर से निकल रहे थे। उसने अपनी बड़ी टॉर्च से गाड़ी की सायरन जैसी आवाज एवं रोशनी, दूसरी ओर फेंकी। चोर समझे कि कोई गाड़ी आ रही है, वे धन को खेत में फेंककर भाग गये।
हरि उतरा, उसने इकट्ठा कर मचान के निचे गाढ़ दिया।कुछ दिनों बाद वे ही चोर उधर से फिर निकले।उसने वैसा ही किया। चोर इधर उधर देखने लगे और तो कोई दिखा नहीं, किसान दिख गया। उन्होंने उसे पकड़ कर मारा और पिछला धन भी निकल ले गये।
हरि दुःखी होता हुआ विचारने लगा - "लोभवश किसी को धोखा देने का दुष्फल जीव को स्वयं ही भोगना पड़ता है मेहनत से प्राप्त, भाग्य प्रमाण सामग्री में ही संतोष करना हितकर है।"
अंत में हरि ने फिर कभी ऐसा न करने की प्रतिज्ञा कर ली और संतोषपूर्वक रहने लगा।

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कटु वचन

हरेन्द्र अपने मित्र देवेन्द्र के यहां गया। वहां उसका उत्साहपूर्वक स्वागत हुआ। नाना मिष्ठान एवं पकवान बनाये गये। भोजन के बाद सुन्दर बिस्तरों पर आराम कराया। मंहगी भेंट आदि दी गयी, परन्तु चलते समय वहीं खड़ी देवेन्द्र की पत्नी ने हंसी करते हुए कुछ अयोग्य वचन कह दिए-" तुम्हें घर पर ऐसे भोजन कहां मिलते होंगे?"
स्वाभिमानी हरेन्द्र को बहुत बुरा लगा और उसने वहां भविष्य में न आने का नियम ही ले लिया।
वास्तव में कटु वचन,स्नेह को भंग करने वाला महादोष है। कठोर एवं निंद वचनों द्वारा अगणित विसम्वाद एवं संघर्ष होते देखे जाते हैं।
सावधान! मौन रहो या योग्य हित-मित-प्रिय वचन बोलो।

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नैतिक शिक्षा

एक काॅलेज के प्राचार्य नवीनचंदजी नैतिक विचारों वाले योग्य प्रशासक थे। उनके बंगले में आम, अमरूद, अनार के पेड़ थे और कुछ टमाटरादि सब्जी की क्यारियां थी। काॅलेज की भी बहुत-सी जमीन में खेती होती थी।

लड़के खेत में से भी कभी गन्ना, चना, मटर आदि चोरी से खा लेते थे। उनके द्वारा कई बार समझाने पर भी चार-छह लड़के नहीं माने। एक रात्रि लड़कों ने चोरी से बंगले के पेड़ से कुछ आम खाये, कुछ पता नहीं चला और चौकीदार भी सोता रहा।
परन्तु प्रात: प्राचार्यजी अनशन पर बैठ गये। एक दिन तो कोई कुछ न बोला। दूसरे दिन लड़के चौकीदार के समीप पहुंचे तो वह बोला-“अब क्यों आये हो? मैं तो तब ही जाग गया था, जब तुम लोग घुस थे और फल तोड़ना प्रारम्भ किया था, परन्तु साहब ने मुझे इशारे से मना कर दिया।”
लड़के घबराये । विचारा कि- साहब को सारी जानकारी है। चुपचाप ऑफिस में पहुंच कर पैर पकड़ कर रोते हुए क्षमा मांगने लगे।
साहब- " माता-पिता किस आशा से पढ़ते भेजते हैं। यदि नैतिकता ही नहीं सीख सके तो अन्य शिक्षा से क्या होगा ? भ्रष्टाचार बढ़ाओगे । अपना अहित तो करोगे ही, समाज और देश के भी पतन के कारण बनोगे।
विषय का ज्ञान तो उसी क्षेत्र में काम आता है, परन्तु नैतिकता (ईमानदारी, कर्त्तव्यनिष्ठा, विनय, सेवा भावना) तो सर्वत्र काम आती है। इसी से तो व्यक्ति और देश की प्रतिष्ठा बढ़ती है। विषय के ज्ञान का भी सदुपयोग होता है।"
उसके पश्चात काॅलेज में कभी इस प्रकार के चोरी आदि के प्रसंग नहीं बने। प्राचार्यजी का समय-समय पर नैतिकतापूर्ण सम्बोधन, काॅलेज की पहिचान ही बन गया।

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परोपकार

एक युवक योगेश, अपनी माँ के साथ रहते हुए गरीबी के दिन काट रहा था। पिताजी छोटेपन में ही परलोक सिधार गये थे। एक दिन माँ ने कहा -“दूर जंगल में स्थित मन्दिर में एक देव रहता है, उससे गरीबी दूर करने का उपाय पूछ कर आओ।”
योगेश चल दिया, परन्तु रात्रि होने से एक गाँव में एक घर में ठहर गया। वहाँ गृहस्वामी ने अतिथि समझ कर सुलाया और बातें करते हुए कहा -“मेरा भी एक प्रश्न देव से पूछ कर आना की मेरी युवा लड़की बोलती नहीं है, वह कब बोलेगी या नहीं बोलेगी ?”
आगे चलकर सांयकाल दूसरे गाँव में रुक गया। एक बाग के स्वामी ने अपना प्रश्न पूछ कर आने के लिए कहा कि उसके एक आम के पेड़ की वृद्धि क्यों नहीं होती ?
योगेश चलते हुए तीसरे दिन मन्दिर में पहुँच गया। वहाँ पूजा भक्ति करने के बाद बैठा ही था कि देव ने कहा -“मात्र दो प्रश्न पूछ सकते हो।” तब उसने पहले बाग के स्वामी का प्रश्न पूछा।
उसके उत्तर में देव ने कहा -“उसी पेड़ की जड़ों के समीप, धन के कलश है, उन्हें निकालो तब वृक्ष बढ़ेगा और फलेगा।”
दूसरा प्रश्न पूछने पर कहा -“वह लड़की उसके पति का मुख देखकर बोलने लगेगी।” योगेश अपना प्रश्न पूछे बिना ही चल दिया। बाग में आकर उसके कहने से वहाँ खोदने पर चार कलश निकले। तब प्रसन्न होकर बाग के स्वामी ने दो कलश उस युवक को दे दिए।
दूसरे गाँव आने पर वह उत्तर बता ही रहा था कि वह लड़की आकर बोलने लगी। तब गृह स्वामी ने उस युवा के साथ उसका विवाह कर दिया। सम्मान सहित योग्य सामान भी दिया और गाड़ी से उसे उसके घर पहुँचाया। माँ देखकर प्रसन्न हुई तथा उसने कहा -"यह तुम्हारी स्वार्थ-त्याग और परोपकार-वृत्ति का ही फल है; अतः जीवन में धैर्य और धर्म कभी नहीं छोड़ना।"

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