कर्मों का जिसने नाश किया | karmo ka jisne nash kia

तर्ज- तेरी मिट्टी में मिल जाना… (केशरी)
कर्मों का जिसने नाश किया, अंतर्पुरुषार्थ जगाया है।
तब जाके कहीं उन जीवों ने, अविनाशी सिद्ध पद पाया है।

हे मेरे प्रभु!! हे सिद्ध प्रभु!! तुम घाति-अघाति विनाशे हो।
जब भी मैं तुमको देखता हूँँ, तुम मुझको प्रभु ही बताते हो।
अशरीरी हो सर्वज्ञ प्रभु तुम , ज्ञान शरीरी कहलाते।
आतम को ही तुम सिद्ध किये , इसलिए सिद्ध तुम कहलाते।
तुम सम ही मैं बन जाऊं, अंतर में बस थम जाऊं इतनी सी है मुक्ति की विधिऽऽ
अंतर में मैं झूलूंगा, आनंद में मैं फूलूंगा
इतनी सी है सुख की ये विधिऽऽ

दुक्खों से भरा संसार यहां तुम झूम के सुख को पा ना सके।
तुम मुक्त हुए तो ऐसे कि संसार में वापस आ ना सके।
समकित दर्शन और ज्ञान अगुरुलघु में शोभित तुम फूल रहे।
अवगाहन वीरज सूक्ष्मत्व निर्बाध सुक्ख में झूल रहे।
तुम जैसा ही बन जाऊँ, अठ गुण मैं भी प्रगटाऊँ।
इतनी सी है मुक्ति की विधिऽऽ

अंतर में जो झुलूँगा, आनंद में मैं फूलूंगा ।
इतनी सी है सुख की ये विधिऽऽ
सब संसारी यदि सुखी होते, क्यों सिद्ध प्रभु यहाँ से जाते।
थोड़ा-सा भी यदि सुख लगता तो वापस लौट चले आते।
हे सिद्ध प्रभु तुम सुखी रहे , क्यों मैं प्रभु होकर दुखी रहता।
तुम कहते हो भगवान हूँ मैं, भगवान सदा सुख में बहता।
तुम सम ही मैं बन जाऊं, अंतर में बस थम जाऊँ।
इतनी सी मुक्ति की विधिऽऽ
अंतर में मैं झूलूंगा, आनंद में मैं फुलूँगा
इतनी सी है सुख की ये विधिऽऽ ।।

रचयिता-: समकित जैन’शास्त्री’

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