जिनेन्द्र मूरत में हमने देखा, स्वयं की सूरत झलक रही है ।
लिया जो अनुभव में हमने उनको, सहज में दृष्टि सुलझ रही है ॥टेक॥
भले ही सारा ये जग निहारे, वो किन्तु स्व में ही स्व निहारें ।
लिया जो श्रद्धा में हमने उनको, कली रतनत्रय की खिल रही है ॥
जिनेन्द्र मूरत…॥1॥
हैं वीतरागी प्रभु हमारे, उन्हीं के चरणों में सिर हमारे ।
लिया जो भक्ति में हमने उनको, विपत्तियाँ सारी टल रही हैं ॥
जिनेन्द्र मूरत…॥2॥
सुनी देशना प्रभु तुम्हारी, क्रमबद्ध हो गयी मति हमारी ।
होना है जो वो निश्चित ही होगा, कर्तृत्व हिमगिरि पिघल रही है॥
जिनेन्द्र मूरत…॥3॥