गम्भीर गुरुता वाले हैं, गुरुवर हमारे।। टेक।।
निजानन्द में परिणति पागी, आरम्भ-परिग्रह के हैं त्यागी।
मोह को जीतन हारे हैं गुरुवर हमारे ।।1।।
सर्व जगत से धरें उदासी, तोरी जिनने आशा पाशी।
पंच महाव्रत धारे हैं गुरुवर हमारे ।।2।।
यथाजात मुद्रा के धारी, तीन कषाय चौकड़ी मारी।
सहजहिं समता वाले हैं गुरुवर हमारे ।।3।।
ज्ञान-ध्यान में लीन मुनीश्वर, उपसर्गों में अडिग यतीश्वर।
तिरें सु तारन हारे हैं गुरुवर हमारे ।। 4।।
आत्म स्वरूप सहज दरशावें, साँचा मुक्तिमार्ग बतावें।
परमानन्द विस्तारे हैं गुरुवर हमारे ।।5।।
रचियता - पूजनीय बाल ब्रह्मचारी पंडित श्री रवीन्द्र जी आत्मन्
Source - जिन भक्ति सिंधु