Followers of Kanji Swami


#25

Brother you are saying the same as I have said


#26

What does Vandnami and Itchami exactly mean?


#27

If it is so, why would anybody loose Samyak Darshan.
A person in 4th gunstaan may also get into some lower gunstaan.


#28

My understanding is Kanji Swami was so impressed and completely transformed when he received Granthraj Samaysarji. Also if you read Ashtapahud and understand the importance of Samyek Darshan, you will try to find a muni that fits all these requirements. 28 moolgoons is part of it. Muni dasha is 6th gunasthan, it means person already has Samyek Darshan which happens in 4th gunasthan. Just imagine the purity and strength of shudhopayog a Muni of 6th gunasthan should have and compare it to our present community. I will also be extremely careful and will never start judging if someone is true bhavlingi muni.
Due to this, strict followers of Digambar scriptures will take safe position of not worshipping anyone and remain neutral. We have to be careful and not commit ‘vinay-mithyatva’. Acharya Kunda Kunda Dev also warns this in Ashtapahud, he is very strict about acharan of munis. Any kind of ‘shithilachar’ will take someone to nigod. I hope it helps.


#29

@Sowmay
According to you, a 5th gunstan Vrati shraviak can be worshiped?


#30

Yes but not all(only 11th pratima dhari) and not similar to 6-7 gunsthan varti jeev.
But generally sanyam is worshipped so in that way it will include sanyam part of 5th gunsthan also.


#31

Any shastriya reference written by “Acharya or Muni” of that?


#32

आर्यिका माताजी और ऐलक जी-क्षुल्लक जी ११ वीं प्रतिमा धारी श्रावक हैं, और तीन पूज्य लिंगो में उन्हें लिया गया है।
आचार्य कुंदकुंद देव ने अष्ट पाहुण जी - दर्शन पाहुण गाथा 18 में ये तीन लिंग की बात की है।

भाई इतना ही काफी था।


#33

@jainsulabh Can you please give ebook link of Asht Pahud Ji, if possible?
I said that because some people say there is “Shuddhopyog” in 4th gunstaan. When asked for shastriya reference they give it from Pandits and fail to show reference from Acharya or Muni.


चतुर्थ गुणस्थान में शुद्धोपयोग
#34

शुद्धोपयोग is possible in 4th Gunisthan, however unlike 7th gunisthan where it can continue for 48 minutes, its max time in 4th gunisthan is 6 aavli only which is very short time.

हम किसी की पूजा क्यों करते है? या follow क्यों करते है? या अपना गुरु क्यों मानते है?
क्योंकि ऐसी प्रकृति है की जो जिसका अनुरागी/ सेवक होता है, वह उसके जैसा हो जाता है | that’s it. हम भगवान की पूजा क्यों करते है ? क्योंकि वे निर्दोष है (18 दोष रहित) और हम भी निर्दोष होना चाहते है, हम किसी व्यक्ति की पूजा नहीं करते बल्कि हम गुणों की पूजा करते है । अब जैन धर्म का सारा मर्म एक line में - “तीन भुवन में सार वीतराग विज्ञानता”

अब जिसमे वीतरागता है वह ही गुरु मानने योग्य है, क्योंकि वीतरागता सार है और इससे ही विज्ञानता प्राप्त होती है । क्या वर्तमान में कोई मुनि वीतरागी हुए है ? अगर है, तो लौकिक बातो में इतनी रूचि क्यों लेते है? अन्य से द्वेष भाव क्यों करते है? औरो से अपनी विनय क्यों कराना चाहते है? और आत्मकल्याण को गौण करके समाजकल्याण के रागी क्यों हुए है? आप कहोगे ये मुनि जहाँ जाते है वहाँ पूजा विधान आदि शुभ कार्य करवाते है, इन्हे देखकर लोभी लोगो को भी दान देने का शुभ भाव आता है, ये मंदिरो का निर्माण कराते है, तीर्थो का जीर्णोद्धार कराते है, औषधालय भोजनशाला धर्मशाला आश्रम गौशाला आदि का निर्माण करते है । तो ये सब तो उनके गुण है जिन्हे देखकर मुझे भी हर्ष होता है । हम गुणों की निंदा नहीं करते । शास्त्र में भी लिखा है किसी के अनेक दोषो को भी गौण करके उसके गुणों को देखना चाहिए ।

पर यदि इन गुणों से गुरुपना हो तो ये गुण अन्य मत के साधुओ में भी है, फिर तो उन्हें भी गुरु मानना चाहिए, कई मत वाले सेवा को ही धर्म मानते है, यदि तप और कस्ट सहने से गुरुपना हो तब तो नेपाल में एक बौद्ध साधू ने १ महीने तक बिना कुछ खाये ध्यान किया, वह पदमाशन से नहीं हिला और वह भी अहिंसा का ही उपदेश देते है, फिर तो उन्हें भी गुरु मानना चाहिए। इसलिए ‘जो वीतरागी हुआ हो और जिसे जिनदेव में बहुत श्रद्धा हुई हो’ मेरे अनुसार वही गुरु है । द्रव्यलिंगी और भावलिंगी मुनियो की ब्राह्मम प्रवर्ति सब एक सी ही होती है, कोई बाहर से देखकर नहीं कह सकता के अमुक मुनि द्रव्यलिंगी है या भावलिंगी । अंजन चोर ने ऐसा क्या निर्णय किया जो भाव भासन हुआ? यही की जिनदत्त सेठ कभी झूट नहीं बोलते । अब जिनदत्त सेठ एक ग्रहस्त ही थे, सो ग्रहस्त भी गुरु होता है यदि वह जिनदेव का सेवक हो और वीतरागी हुआ हो ।


#35

“Shubhopyog” and “Shuddhopyog” are 2 different things. I think you haven’t understood what I have written. I was asking for the reference from Acharya or Muni. There are different sects one who believe in “Shuddhopyod” in 4th gunstan and others who don’t.

Also lets don’t get into the discussion about true Muni in present time or not.


#36

What do you think - What’s सम्यक दर्शन and the process to attain it?


#37

Samyak darshan is a stage of a person in which he has true belief of 7 tatva. Who has faith only in true dev, shastra, Guru. Who knows that the body is not him, he is the soul. He knows that he is changing the body from Anadikaal. His kashayes are mild. He has interest in his aatma only. Even when he is eating the food, he thinks, “I am eating this from Anadikaal, when that time will come when I will not have to eat anything”. He follows non-violence as much he can follow. Though he is doing activities for his livelihood etc, but he doesn’t have interest in them. He prioritize swadhyay other any other activity. He helps others also so that they also get interest in religion.

Samyak darshan can be attained either by updesh, Jin Bimb Darshan, Vedna, Jati smaran and seeing other dev’s riddhi.


#38

@Chinmay sorry if you found my words harsh. Actually, I mistook you as “Samay” who was the first to post on this thread. Since I have discussed with him on the topic, I thought of not going into the details again.


#39

:+1: “तीन भुवन में सार वीतराग विज्ञानता”, छहढाला की ये पंक्ति सच में मिथ्यात्व को गलाने वाली है. मै भी मानता हूँ जो मुनि २८ मूलगुण का पालन करे वे ही सच्चे मुनि है.


#40
ननु शुभोपयोगिनामपि क्वापि काले शुद्धोपयोगभावना दृश्यते, शुद्धोपयोगिनामपि क्वापि काले शुभोपयोगभावना दृश्यते, श्रावकाणामपि सामायिकादिकाले शुद्धभावना दृश्यते, तेषां कथं विशेषो भेदो ज्ञायत इति । परिहारमाह- युक्तमुक्तं भवता, परं किंतु ये प्रचुरेण शुभोपयोगेन वर्तन्ते ते यद्यपि क्वापि काले शुद्धोपयोगभावनां कुर्वन्ति तथापि शुभोपयोगिन एव भण्यन्ते । येऽपि शुद्धोपयोगिनस्ते यद्यपि क्वापि काले शुभोपयोगेन वर्तन्ते तथापि शुद्धोपयोगिन एव । कस्मात् । बहुपदस्य प्रधानत्वादाम्रवननिम्बवनवदिति ।।२८७ ॥

यहाँ कोई शंका करता है कि शुभोपयोगियों के भी, किसी समय शुद्धोपयोगरूप भावना दिखाई देती है, शुद्धोपयोगियों के भी, किसी समय शुभोपयोग भावना देखी जाती है, श्रावकों के भी सामायिक आदि के समय शुद्ध भावना देखी जाती है; तब उनका विशेष भेद कैसे ज्ञात होता है ? आचार्य उसका समाधान करते हुये कहते हैं - आपका कहना उचित है; परन्तु जो अधिकतर शुभोपयोग रूप आचरण करते हैं, वे यद्यपि किसी समय शुद्धोपयोगरूप भावना करते हैं, तो भी शुभोपयोगी ही कहलाते हैं। तथा जो शुद्धोपयोगी हैं, वे भी किसी समय शुभोपयोगरूप वर्तते हैं, तो भी शुद्धोपयोगी ही हैं। दोनों रूप प्रवृत्ति होने पर भी ऐसा क्यों है ? बहुपद की-बहुलता की प्रधानता होने के कारण, आम्रवन-नीमवन आदि के समान¹, दोनों रूप प्रवृत्ति होने पर भी, अधिकता की अपेक्षा अन्तर है ॥ २८७ ॥


¹ आम के बगीचे में एक-दो नीम के वृक्ष होने पर भी, आम के वृक्षों की बहुलता के कारण, आम का ही बगीचा कहलाता है.

#41

@jinesh
गाथा १४ देखिये

[सुविदिदपयत्थसुत्तो ] जिसने संशयादि रहित होने के कारण अच्छी तरह से निज शुद्धात्मा आदि पदर्थों और उनके प्रतिपादक सूत्रों (आगम-जिनवाणी) को जान लिया है, और उनका श्रद्धान किया है, उसे पदार्थों और सूत्रों को अच्छी तरह जाननेवाला कहते हैं । [संजमतवसंजुदो ] बाह्य में द्रव्येन्द्रियों से निवृत्त होकर छहकाय के जीवों की रक्षा से और अन्तरंग में अपने शुद्धात्मा के अनुभव के बल से स्वरूप में संयमित होने से जो संयम-सम्पन्न हैं तथा बहिरंग और अन्तरंग तप के बल से काम-क्रोधादि शत्रुओं के द्रारा जिसका प्रताप खण्डित नहीं हुआ है, ऐसे निज शुद्धात्मा मे प्रतापवंत-विजयवंत होने से (स्वरूपलीन होने से)जो तप-सम्पन्न हैं । [विगदरागो ] वीतराग शुद्धात्म-भावना के बल से समस्त रागादि दोषों से रहित होने के कारण जो विगतराग हैं । [समसुहदुक्खो ] वीतराग निर्विकल्प समाधि से उत्पन्न उसीप्रकार परमानन्द सुख-रस में लीन जो निर्विकार स्व-संवेदनरूप उत्कृष्ट कला, उसके अवलम्बन से इष्ट-अनिष्ट पंचेन्द्रिय विषयों में हर्ष-विषाद रहित होने के कारण जो समसुख-दु:ख हैं । [समणो ] ऐसे गुणों से समृद्ध श्रमण-उत्कृष्ट मुनि, [भणिदो सुद्धोवओगो त्ति ] शुद्धोपयोग कहे गये हैं - यह अभिप्राय है ॥१४॥

यहाँ कहा गया है “श्रमण-उत्कृष्ट मुनि”, उनके गुण भी बताये है, जैसे छहकाय के जीवों की रक्षा करने वाले , बहिरंग और अन्तरंग तप करने वाले आदि। क्या ये गुण चतुर्थ गुणस्थान “अविरति” श्रावक में पाए जा सकते है?

गाथा १६ देखिये

[तह सो लद्धसहावो ] जैसे निश्चय रत्नत्रय लक्षण शुद्धोपयोग के प्रसाद से (यह आत्मा) सभी को जानता है, उसी प्रकार पूर्वोक्त (पन्द्रहवीं गाथा में कहे) शुद्धात्मस्वभाव को प्राप्त करता हुआ, [आदा ] यह आत्मा [हवदि सयंभु त्ति णिद्दिट्ठो ] स्वयंभू है, ऐसा कहा गया है । वह आत्मा कैसा होता हुआ स्वयंभू है ? [सव्वण्हू सव्वलोगपदिमहिदो भूदो ] सर्वज्ञ और सम्पूर्ण लोक के (विविध) राजाओं द्वारा पूजित होता हुआ स्वयंभू है । वह स्वयंभू कैसे है? [सयमेव ] वह निश्चय से स्वयं ही स्वयंभू है ।

क्या चतुथ गुणस्तानी श्रावक राजाओ के द्वारा पूज्य है?

मुझे गाथा २८७ में आचार्य श्री क्या कहना चाह रहे है, कुछ कुछ समझ आ रहा है, किन्तु मै सुनिश्चित नहीं हूँ। इसका सही अर्थ क्या है आपको बाद में सुनिश्चित हो कर बताऊंगा।


चतुर्थ गुणस्थान में शुद्धोपयोग
#42

@Sowmay Please do answer my question.
According to you, can a 5th gunstan Vrati shraviak be worshiped?